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भाग-6

 

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यह तो निश्चित  वर्जिन लगती है!

छोड़ यार! देखना, बिस्तर भी सबसे ज्यादा यही गर्म करेगी। बस, पटने भर की बात होती है। उस 'नन' सी लगती रोजी को नहीं देखा, कितने नखरे करती थी!

क्या तुम ऐसे ही..आई मीन, यू नो व्हाट के बिना ही, बता सकते हो यह सब?

पहले ने भद्दी सी हंसी हंसते हुए आँख मारी और दूसरे ने उतने ही मसखरेपन से ज़बाव  दिया,  

अरे, और नहीं तो क्या! गुरू हूँ आखिर तुम्हारा...। बाल यह कोई ऐसे ही धूप में ही तो हरे लाल बैंजनी नहीं हो गए। एक-एक करके ये  सारे रंग भरे हैं इनमें।"

हॉल के एक कोने में खड़ा शरारती लड़कों का वह झुंड नवांगतुका सहपाठिनियों को देखकर जाने क्या-क्या अश्लील और अटपटी अटकलें लगाए जा रहा था और फिर खुद ही, एक बेहद भौंडी हंसी के साथ बेमतब की उन बातों का पूरा-का-पूरा ज़ायका भी ले लेता था।  रिफ्रेशर सप्ताह था वह।  रिफ्रेशर यानीकि एक-दूसरे को जानने पहचानने का, दूसरों के साथ, उस नये माहौल के साथ सामंजस्य और गंभीर पढ़ाई शुरू करने के पहले मौज-मस्ती का सप्ताह।

और न चाहते हुए भी, यूनिवर्सिटी में आते ही,  अपने आकर्षक और सुरुचिपूर्ण परन्तु गम्भीर और अलग वेशभूषा व व्यक्तित्व के कारण,  उनके बेहूदे मज़ाकों का निशाना बनी मनु सब कुछ सुन, देख और सह रही थी।.वही मनुश्री सरकार जो  जरा-सी भी उलटी-सीधी  बात स्वीकार तक न कर पायी थी, खड़ी-खड़ी न सिर्फ सब सुन रही थी अपितु  सोच भी रही थी कि अब उसका अगला कदम क्या होना चाहिए...क्या उचित रहेगा उसके लिए...'ऐसी घटिया सोच वालों के लिए क्या सजा हो सकती है!'  मन तो कर रहा था  कि पास पड़े पत्थर से सर फोड़ दे, उन बेवकूफ-से दिखते  विदूषकों का, परन्तु अगल पल ही खुदको संयत कर लिया खुदको और ऐसा कुछ भी नहीं किया । पहले दिन से ही जान चुकी थी सयानी मनु कि इस यौनमुक्त समाज में ऐसी बातें...इस तरह के मज़ाक और छेड़छाड़, बेहद  आम बातें हैं। तेज तर्रार मनु तो यह भी जानती थी कि अपने देश में नहीं, एक अपरिचित और अनजानों के बीच खड़ी थी वह, जहां बहुत कुछ जानना समझना और सीखना था... व्यर्थ की मुसीबतों से दूर रहते हुए; क्योंकि यहां शायद ही कोई मदद के लिए आगे आ पाए!

और शायद यही सोचकर सबकुछ अनदेखा करती,  लम्बे-लम्बे कदम लेती और किनारा काटती  वापस भी कमरे में आ गई थी मनु।  ...कैसे रह और पढ़ पायेगी इस तरह से,  इस अभद्र और अशिष्ट वातावरण में वह...क्या आदत पड़ पाएगी उसे भी, यह सब यूँ ही अनदेखा और अनसुना करते रहने की?..हमेशा मज़ाक की तरह ही झेलते रहने की सब कुछ।...दुस्वप्न की तरह  बारबार बस वही एक बात कचोटे जा रही थी उसे। मनु सोच रही थी, ' कैसा है यह, यहां का उन्मुक्त और आधुनिक समाज, जहां उच्छृंखलता और अभद्रता  ही जरिया है आपसी परिचय का युवाओं में...और फिर परिचय भी किसलिए; मात्र मौज-मस्ती और उच्छृंखलता के लिए?  कोई रोक नहीं किसीपर..!जहां 12-12 साल के बच्चों को यौन निरोधक दवाएं देकर मां-बाप और समाज, दोनों ही अपनी-अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा लेते हैं... और क्या अपेक्षा कर सकती थी मनु? ' यूं तो उसने यह भी सुन और पढ़ रखा था कि जीवन के अधिकांश स्थाई और महत्वपूर्ण रिश्तों की नींव यहां विद्यार्थी दिनों में ही रखी जाती है, परन्तु खुद अपने साथ उसे कोई ऐसी संभावना दूरदूरतक नजर नहीं आई थी...उस घटना के बाद तो हरगिज ही नहीं। यूनिवर्सिटी में पहला दिन था उसका और ऐसी शुरुवात की अपेक्षा नहीं की थी शिष्ट और सौम्य मनु ने। आर्किटेक्ट बनने आई थी वह और सिर्फ खूबसूरत इमारतें ही नहीं, एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज भी बसता था उसकी सपने देखती आँखों में।  

' जरूरी आवेदन-पत्र, शिक्षाशुल्क आदि की कार्यवाहियां तो कल के सत्र में भी  पूरी की जा सकती हैं, अभी तो इन असभ्यों से कैसे निपटना है, यह सोचो!'... और अपनी वर्षों की आदत के खिलाफ, खिन्न मनु ने उसी वक्त अपने सभी आवश्यक काम अगले दिन के लिए टाल दिए। ...इंगलैंड के उस बर्फीले मौसम में दूर-दूरतक कोई ऐसा नहीं था जिसके साथ वह सलाह मशवरा कर सके,  रोज-रोजके अच्छे-बुरे वे अनुभव और अकेलापन बांट पाए! बाहर तेज हवा के साथ बरसात हो रही थी और पानी से भी ज्यादा सूखे पत्ते बरस रहे थे। देखते-देखते ही हवा के भंवरों में फंसी, तेज गति से गोल-गोल घूमती पत्तियों से पूरा लॉन ढक गया। कोई और दिन होता तो  इंगलैंड के इस आकस्मिक पतझड़ का यह अनूठा और नया दृश्य बेहद सुन्दर और आकर्षक लगता मनु को, परन्तु उस दिन तो ऐसा लगा मानो प्रलय ही आ गयी थी...मानो शिवजी ने  अपनी तीसरी आंख खोल दी  थी और क्रुद्ध  होकर तांडव नृत्य कर रहे थे।

मनु परदे खींच, अधिकाशतः बन्द कमरे में ही पढ़ाई करते या टेलिविजन के आगे वक्त गुजारने की ठान चुकी थी। ऐसे सहपाठियों से तो यही अच्छा है...क्या पता एक भी उसके स्वभाव , उसके संस्कारों जैसा मिले भी या नहीं उसे, यही गुनती-बुनती! अनायास ही अम्मा, बाबा और दादी की बेहद याद आने पर , मनु ने खुद को भी समझा लिया-'जिद करके आई हो, तो अब दुखम-सुखम कैसे भी, यह पढ़ाई तो पूरी करो।'

वह तो अच्छा था कि अगले दिन ही जोनुस और मोती मिल गए  और दोनों ने ही मनु का साथ परछांई जैसी वफादारी से निभाया। नहीं, परछाँई से भी कहीं ज्यादा...परछाँई तो अंधेरे में साथ छोड़ देती है, पर इन दोनों ने तो सोते-जागते कभी मनु का साथ ही नहीं छोड़ा। हर सुख-दुख में साथ-साथ रहे। मोती एक लावारिश कुत्ता, जिसके परित्यक्त जीवन की खबर टेलीविजन पर सुनकर वह उसे सेंट बर्नार्डो से उठा लायी थी और जोनुस---जोनुस को तो किसी परिचय की जरूरत ही नहीं! हर व्यक्ति जानता था जोनुस को, हरेक ने नाम सुन रखा था जोनुस का। जो भी पल भर के लिए ही उससे मिलता, उसीका ही तो हो जाता था। उसके आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह पाता था। पूरी यूनी के कैम्पस में बिल्कुल ही अकेला और अलबेला था जोनुस। लम्बा-पतला, बड़े-बड़े बालों और बेहद आकर्षक और तरल आँखों वाला। दूसरों से इतना अलग कि दूर क्या, मीलों से पहचाना जा सके। सिर्फ भव्य शरीर का ही नहीं, एक भव्य मन का मालिक। विध्यालय के पहले दिन की उस भूलभुलैया में उसी से तो पूछा था मनु ने रजिस्ट्रार के औफिस जाने का रास्ता! व्यक्तित्व ही ऐसा था उसका कि हर आदमी खुद ही तो खिंच जाता था उसके प्रति और मनु भी खिंचती ही चली गयी थी उसके रूप-गुण, उसकी अच्छाइयों की तरफ। हमेशा दूसरों के बारे में सोचने वाला, हर पल मदद को तत्पर... एक मसीहा-सा... हर मददगीर को बस जोनुस ही तो दिखलाई देता था यूनी में हर वक्त। चौबीसों घटे...वक्त और सहूलियत की कोई पाबंदी नहीं थी उसके साथ। उसके दरवाजे हर सहपाठी के लिए हरदम खुले रहते थे। कुछ मनचलों ने तो उसका नाम ही जोनेथन 'सेवियर' अब्राहम ही रख डाला था। किसी को नोट्स चाहिएं तो जोनुस से मिल सकते थे-फुटबॉल किट या टैनिस-रैकेट से लेकर रात-बेरात खाने-पीने का सामान, सबके लिए सबकुछ रहता था उसके पास। नहीं हो, तो जुटा पाने की क्षमता थी जोनुस में।

यही नहीं, और भी बहुत कुछ एक-सा था उन दोनों के स्वभाव में। सहपाठी जब एक-दूसरे की बाहों में डूबे, शरीर के सुख ढूंढ रहे होते थे या आमोद-प्रमोद और शराब, कहकहों में खाली वक्त गुजारते, मनु और जोनुस  दर्दमन्दों का सहारा बने सड़कों पर घूमते रहते थे, दुखियों और  भ्रमितों का दुखदर्द बांटते थे। कभी कड़ाके की ठंड में साथ-साथ खड़े होकर गरम सूप बांटते तो कभी कंबल। हर बेघर के लिए छत और दो वक्त की रोटी जुटाने की लालसा रखते थे वे। शायद यही वजह थी कि जहां हमउम्र उन्हें बौर्न फोर्टी या अंकल, आंटी कहते थे, लंदन के कोने-कोने में बसे अधिकांशतः बेघर और शरणार्थी उन्हें अपना हमदर्द और हमराज की शकल में पहचानते और मानने लगे थे। जानते थे वे कि इन पर भरोसा किया जा सकता है, क्योंकि सिर्फ सूप और कम्बल ही नही,  दया और ममता भी भरपूर थी उनके पास बांटने के लिए... चाहे फिर वह अंधे विकलांगों को सड़क पार कराने की बात हो या फिर बूढ़े असहायों के घर जाकर छोटे-छोटे काम करने की, या फिर बस पल दो पल साथ बैठकर सूनापन बांटने और राहत देने की ही ...।

मनु जो बचपन से ही दूसरों की आंखों का दुख-दर्द पढ़ती, समझती बड़ी हुई थी, उसके लिए भी यह सब करना, दूसरों के दुखदर्द को बांट पाना, जौनेथन की तरह ही, बेहद  स्वाभाविक ही था। क्योंकि वह भी तो  चारो तरफ, अपने आसपास, आनन्द, उत्साह और विश्वास की भरपूर लहर देखना चाहती थी।

यही वजह थी कि घर से जब भी किसी नेक इरादे के साथ मनु निकलती, तो अगले मोड़ पर ही जौनेथन दिख जाता...। कभी बांगलादेश में आई बाढ़ के लिए चंदा एकत्रित करता, तो किसी दिन बौसनिया के शरणार्थियों के हक के लिए प्लैकार्ड लिए खड़ा, बारिश में चौराहे पर भीगता हुआ जोनुस। कभी लाइब्रेरी में बैठा बच्चों के लिए वर्कशौप आयोजित करता रहता देर रात तक, तो कभी स्थानीय कलाकारों के साथ किसी अन्य चैरिटी के लिए एक रंगारंग शाम का आयोजन। अक्सर ही चाहे-अनचाहे मनु की उससे मुलाकात हो ही जाती थी... कहीं भी, किसी भी सांस्कृतिक या सामाजिक आयोजन में। मनु  खुदको उससे दूर नहीं रख पा रही थी। गिटार पर जौन बर्न्स, ब्राउनिंग या टैगोर के गीत गाता वह मनु को उतना ही अच्छा लगता था, जितना कि हाइड-पार्क में खड़े होकर मानव अधिकार और मानवता की बातें समझाता हुआ। अनूठी विलक्षण प्रतिभा के साथ बेहद कोमल सहृदय मन भी तो था जोनुस का।

परन्तु मनु से पहली करीबी और निजी मुलाकात पार्क में स्केच करते हुए ही हुई थी उसकी। यही वह शौक था, जिसने दूर से प्रशंशा करती मनु को जोनुस के बगल में ही नहीं, बहुत नजदीक लाकर खड़ा कर दिया था। यह बात और है कि बगल-बगल में खड़े घंटों स्केच करते रहने के बाद भी, महीनों उन्होंने एक दूसरे से बात तक नहीं की थी। कभी-कभार गुड-मौर्निंग के अलावा और कुछ नहीं कहा था एक-दूसरे से।

और फिर एक दिन पेन्ट करते-करते अचानक ही मनु का बर्न्ट एम्बर के रंग का ट्यूब खतम हो गया, जिसके बिना न शाम की लाली पूरी हो सकती थी और न तनों और पत्तों का भूरापन। और मनु मांगने से रोक भी तो न  पायी थी खुदको। शायद यह भी बात करने का एक सुविधाजनक बहाना ही तो था स्वभाव से बेहद शर्मीली मनु के लिए। 

मांगने पर हंसकर ही जबाव दिया था जोनुस ने-" ओह, तो तुम्हारे जंगल में भी हर सुबह एक शर्मीला सूरज निकल आता है औरफिर शाम को इन्ही चार रंगों के पीछे छुप जाता है ?"

इसके पहले कि मनु कुछ जबाव दे या सोच तक पाए, दोनों ही एक साथ बोल पड़े-" बर्न्टएम्बर, योलो ओकर, इन्डिगो और सीपिया ग्रीन !"  

शर्म से बीरबहूटी बनी मनु अब और क्या जबाव दे पाती, और भी सकुचा गयी। मात्र किसी के बगल में खड़े होना...बातें करना इतना सुख दे सकता है- नया अनुभव था मनु के लिए। लालची मन अब सिलसिला खतम ही नहीं होने देना चाहता था। पलकें नीचे किए-किए खुदमें ही डूबी मनु कहना कुछ और चाहती थी और कह कुछ और बैठी,-"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं। मेरा काम इन रंगों के बिना भी चल जाता है। " अगले पल ही गला घंघारकर उसने खुदको संयत करने की एक और असफल कोशिश की।  

"बस! मैं न जाने कबसे तुमसे बातें करना चाहती थी। बहाना ढूँढ रही थी और आज रंग खतम होत ही, सहज ही तुमसे मांग भी बैठी। विश्वास करो, हरेक से इतना,यूँ नहीं खुल पाती हूँ मैं। आज ही न जाने क्या हो गया था मुझे।" अनायास ही मन की बात होठों पर आ गयी। अब तो उसे खुद ही नहीं मालूम था कि क्या कहना चाह रही थी वह या किस बात की सफाई दे रही थी। और तब मनु का हाथ प्यार से अपने हाथ में ले लिया जोनुस ने।  

" कोई बात नहीं, मेरी नन्ही राजकुमारी! तुम्हारे द्वारा बनाई  हर तस्बीर के लिए  सिर्फ मेरे रंग ही नहीं, मैं खुद भी हाजिर हूँ हर पल। तुम बेझिझक, वक्त-बेवक्त, कभी भी मुझे आवाज दे सकती हो। मित्र आखिर होते किस लिए हैं ?" 

फिर तो रोज ही दोनों की खनकती हंसी से पूरा जंगल गूंजने लगा और नदी के किनारे हाथों में हाथ लेकर साथ-साथ  घूमते हुए, उनका बातों का जो सलसिला चला तो कभी खतम ही नहीं हो पाया। हाथ जो पकड़ा तो छूटा ही नहीं।...पढ़ाई ही नहीं, ब्रिटेन को, यहां के समाज, रीति-रिवाजों को...खुद मनु के मन तक को जानने समझने में, जौनेथन उसकी पूरी मदद कर रहा था और घर-परिवार से दूर, अकेली बैठी मनु के लिए यह कोई कम सहारे या सुख की बात नहीं थी!  

     

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