कविता आज और अभी

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इला कुमार

नन्ही चिड़िया

पीले परों वाली

सलेटी नन्ही चिड़िया

मुलायम रोऔं से ढकी है तुम्हारी छाती

दाना चुगने के क्रम में

तुम

मेरे कितने पास आ गयी हो

फिर भी

नहीं गया है तुम्हारा डर

मेरे प्रति यह वेवजह आशंका

आखिर क्यों है?

चुगती हो कुछ दाने

जाती हो ऊपर

उस पेड़ पर बने अपने घोंसले में

रुकती हो वहां कुछ क्षण

नन्ही चोंच में डालकर वे कण

वापस आती हो

चुगती हो अगला दाना

मैं भी तो बीनती हूँ दाल

बच्चों की रसोई के लिए

आओ मेरे पास

समझो मैं

नहीं जानती मेरी भाषा

मैं कहां समझ पाती हूँ

मन की सात तहों के भीतर बैठा

हमारे चेतन का स्वामी

एक ही है अदृश्य अगोचर

वह जो  रचयिता है इस मैं उस तुम का

आओ बैठो मेरी कुर्सी के हत्थे पर

खा लो कुछ दाने इसी थाली से

ले जाओ

चोंच में भरकर कुछ और दाने

नन्ही चिड़िया! 

 

 

जिद मछली की

समुद्र के रास्ते से आता है सूरज

सूर्य

जो उदित होता है सीना चीरकर

बादलों का

धप्प् से गिर जाता है सागर की गोद में

गोद भी कैसी

आर न पार कहीं और छोर दीखती नहीं

एक सुबह अल्ल सबेरे जागी

छोटी सी मछली

मचल गयी देखेगी वह

सूरज का आना

तकती रही रह रहकर

 

दुsप्प...! दुsप्प...! सतह के ऊपर

बार बार

जान नहीं पाई

कब और कैसे सूरज उग पड़ा

 

जिद मझली की

जरूर देखेगी वह जाना सूरज का

आखिर

घूम फिरकर आएगा थककर

खुली खुली अगोरती बाहों में

सागर के

 

शाम की लाली तले एकबार फिर

दप्प् से कूद गया सूरज

समय की अतल गहराइयों में

न जाने कितने काल खंडों में

तैरती है वही मछली

दिग्भ्रमित

युग युगान्तरों से अतल तल को

अपने डैनों से कचोटती

 

क्या जान पाएगी कभी

खुद ही है

वह सूरज और सागर भी

बादलों के पार स्थित

निर्द्वन्द आकाश में उद्बूत

अनन्य महाभाव भी...

 

 

फूल चांद और रात

अब कोई नहीं लिखता 

कविता फूलों की सुगन्ध भरी

रात नहाई हो निमिष भर भी

चांदनी में 

फूलों के संग

पर कोई नहीं कहता

उस निर्विद्ध निमिष की बात

जो अब भी टिका है

पावस की चम्पई भोर के किनारे

 

चांदनी की बात

झरते हुए हारसिंगार तले

बैठकर रचे गए विश्वरूप

श्रंगार की बात

 

अभी अभी साथ की सड़क पर गुजरा है

मां के साथ

मृग के छौने सरीखा

रह रहकर किलकता हुआ बालक

 

चलता है वह नन्हे पग भरता

बीच बीच में फुदकना

उसकी प्रकृति है

 

कोई नहीं करता प्रकृति की बात

फूल चांद और रात की बात।