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मां तुझे नमन
मां

उसकी सस्ती धोती में लिपट
मैने न जाने
कितने रंगीन सपने देखे हैं
उसके खुरदुरे हाथ
मेरी शिकनें संवार देते हैं
उसकी दमे से फूली सांसें
पड़ाव हैं
कमजोर दो बाहें
मेरी ठांव हैं
उसकी झुर्रियों में छिपी हैं
मेरी खुशियां
और बिवाइयों में
भविष्य!
-दिव्या माथुर
*
मां के नाम चिठ्ठी
प्यारी माँ तू कैसी है क्या मुझको याद करती है तूने पूछा था कैसा हूँ मै मै अच्छा हूँ तेरी ही सोच के जैसा हूँ यंहा सब सो गए हैं मै अकेला बैठा हूँ सोचता हूँ क्या करती होगी तू काम करते करते बालों का जूडा बनाती होगी या फिर बिखरे समानो को समेटती होगी पर माँ अब समान फैलाता होगा कौन मै तो यंहा बैठा हूँ मौन सुनो माँ तुमने सिखाया था सच बोलो सदा आज जो सच बोला तो क्लास के बाहर खड़ा था तुमने ने जैसा कहा है वैसा ही करता हूँ ख़ुद से पहले ध्यान दुसरों का रखता हूँ पर देखो न माँ सब से पीछे रह गया हूँ सब कुछ आता है मुझको फ़िर भी टीचर की निगाह से गिर गया हूँ किसी पे हाथ न उठाना तुम ने कहा था पर जानती हो माँ आज उन्होंने बहुत मारा है मुझे जवाब मै भी दे सकता था पर मारना तो बुरी बात है न माँ यंहा सभी मुझे बुजदिल समझते हैं मै कमजोर नही हूँ मै तो तेरा बहादुर बेटा हूँ हूँ न माँ अब तुम ही कहो क्या मै कुछ ग़लत कर रहा हूँ तेरा कहा ही तो कर रहा हूँ तू तो ग़लत हो सकती नही फिर सब कुछ क्यों ग़लत हो रहा है बताओ न माँ क्या इनको ये बातें मालूम नही माँ एक बार यहां आओ न जो कुछ मुझे बताया इन्हे भी समझाओ न एक बात बताओ क्या आज भी तू कहेगी कि तुझे मुझपे गर्व है माँ बोलो न क्या मै तेरी सोच के जैसा हूँ और तेरा राजा बेटा हूं!
-रचना श्रीवास्तव
*
मां

अपनी कमजोर आंखों से
चुन लेती है वह मेरे फूल शूल
अपने से सटा लेती है मुझे
अपने जोड़ों का वह दर्द भूल
हैं शुभ्र-केश प्रकाश स्तंभ
मेरी कश्ती कभी नहीं डोली
है ध्रुवतारे सी साथ सदा
मैं रास्ता कभी नहीं भूली
पांव पोंछता रहता है
उसका सदा उजला आंचल
आज भी मेरे सर पर है
उसकी दुआओं का गगनांचल
-दिव्या माथुर
*
जाल

हर आशीष में तुमने कहा
चांद सूरज से आकाश पे चमको
जीवन के मनचाहे मुकाम पर पहुँचो
पर राह में गिरे इन थके लोगों का
क्या हो माँ, तुम ही कहो
जीवन की इस दौड़ में
गिरतों को झुककर उठा लूँ
साथ लेकर चलूँ
या
रौंदकर आगे बढ़ जाऊँ
मत कहना फैसला यह
निजी खयाल का है
आदमी और अस्मद् के
अपने सवाल का है
अहमियत और सहूलियत के
अनगिनित टकराव का है
मेरे ख्याल से तो
शेर और बकरी बनाए
जिसने इसी दुनिया में
उसी अनदेखे जाल का है...
-शैल अग्रवाल
*
मां के हाथ का खाना

बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती है
तुम्हारी मां
कौन-से मसाले डालती है वो
पूछकर आना उनसे
कहा एक मित्र ने,
हंस पड़ी मां
स्वादिष्ट खाना क्या सिर्फ मसालों से बनता है?
कौन-सा घी इस्तेमाल करते हो तुम
पूछा दूसरे मित्र ने,
खाने में तरलता सिर्फ घी से आती है?
एक प्रश्न मस्तिष्क में कौंधा
इसमें कोई खास बात नहीं,
अगर हमारे पास समय हो
तो हम भी बना दें
इतना ही स्वादिष्ट खाना
जवान लड़कियों ने कहा
क्या सिर्फ समय देने से ही बन जाता है
खाना स्वादिष्ट
नहीं,
कुछ न कुछ अद्भुत जरूर है मां के पास
तभी तो
करेले में भी आ जाती है मिठास!
उन्हें बहुत अच्छा लगता है
गर्म गर्म खाना और अपने सामने बैठकर खिलाना
गुब्बारे सी फूल जाती है रोटी
मचल उठता है बच्चा
पहले मैं लूंगा
फूलों सी महक आती है उसमें
तैरता रहता है स्नेह का घी
सब्जी जीभ से लगते ही
सम्पूर्ण जिस्म बन जाता है जीभ
तृप्त हो जाती है आत्मा
मां देखती रहती है, मुस्कुराती रहती है
कभी-कभी आंसू छलक जाते हैं उसके,
सोचता हूं किसी मां के हाथ का खाना खाकर ही
ऋषियों ने कहा होगा-
अन्न ही ब्रह्म है!
-अनिल जोशी
*

प्रवासी चिन्ता
मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।
तूने अपना सुख, अपना श्रम, अपना श्वेद सघन देकर,
मेरे सुख मे अपने सुख, दुख में अपने दुख बिलराकर,
जीने की कला सिखाई थी, उंगली मेरी पकड़-पकड़कर,
तेरा वह निश्छल निश्वार्थ प्रेम, तेरी वह अथक लगन,
स्नेहपूर्ण नयनों की छवि, अब भी मन मे आती है।
मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।
माना मैने ही की थी, तुझसे सात समंदर की दूरी,
इसे बनाए रखना अब, बन गयी है अपनी मजबूरी,
पर तू यह न समझना, मेरी भक्ति घटी है तुझमें,
तू निशिदिन प्रतिपल रहती है मेरे मन मंदिर में,
आ-आकर तू मेरे जागृत मन में या कभी सपन में,
कभी बनती है सघन छांव, कभी फुहार बरसाती है।
मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।
तेरे सम अपनी, तेरे सम प्यारी, मुझको मेरी मातृभूमि,
भवसागर की झंझा में उसको, बना न सका मैं कर्मभूमि,
उस मातृभूमि के ऊपर जब, संकट के बादल घिरते हैं,
उसके ही जाये पाले पोसे, विश्वासघात जब करते हैं,
पंजाब या कश्मीर की घाटी, लहू बहाता भाई का भाई,
नस-नस में रक्त उबलता है, फटने लगती यह छाती है।
मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।
चिता जलाए एक बार, चिंता पल पल सुलगाती है।
मां आज व्याकुल है मेरा मन, चिंता तेरी सताती है।
-महेशचन्द्र द्विवेदी
*
चिहुक

चिहुक पपीहा अब ना गाए
कागज की नैया ले डूबी
पूरा जंगल...
बरसाती सब ताल-तलैया
नेहभरा मन
जलती मशाल ले
टोहता वही आजभी
एक ढहती कुटिया
कंद में लिपटे धूल-धूसरित
वे गीता और रामायन...
सर्फ ये कुंडली मारे बैठे
धनकती एक आवाज
कनक किरन-सी कोने-कोने
आजभी रहे उजागर...
मेरा ही बस जो नाम पुकारे
चलती-फिरती कपड़े तहाती
बरी तोड़ती, हंसती-गाती
चहके ना पर सूखी तुलसी
बिन भोग उदास ये ठाकुर
बिखरा पड़ा जलता नहीं
अब आरती का दिया...
-शैल अग्रवाल
*

(2007)
माँ
क्या सूरत क्या सीरत थी
माँ ममता की मूरत थी
पाँव छुए और काम हुए
अम्माँ एक महूरत थी
बस्ती भर के दु:ख-सुख में
मां एक अहम ज़रूरत थी
सच कहते हैं माँ हमको
तेरी बहुत ज़रूरत थी
मंगल नसीम
*
मुक्त किया
जाओ बेटे,
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
मैने ही नही,
हर माँ ने अपने बेटे को मुक्त कर दिया।
तुम्हे बाँध लिया था
मैने अपने आँचल में।
लेकिन बँध गई मैं
अपने ही बंधन में।
तुमने रेशमी डोर तोड़कर
स्वयं को स्वतंत्र कर लिया,
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
तुम तो अतिथि थे मेरे,
अपना बसेरा बनाने से पूर्व
आश्रय लेने मेरे घर आए थे।
मैने ही घर की दीवारों पर,
तुम्हारा नाम लिख दिया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
अपने अंक में भरकर,
तुम्हे अपना मान बैठी।
तुम्हारे सपनों पर,
अपना अधिकार जमा बैठी।
तुमने ही तो मुझे,
स्वयं को स्वयं से अलग करना सिखलाया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
तुम्हारी अंगुली पकड़कर,
जिस राह पर चलना सिखलाया।
वह तो पगडंडी थी,
तुम्हे मुख्य मार्ग तक ले जाने वाली
उसी दोराहे पर आकर,
तुमने मेरा हाथ छुड़ाकर अपना रास्ता अपना लिया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
ईश्वर द्वारा नियुक्त
मैं धाय थी तुम्हारी,
जिसका दायित्व आज पूर्ण हुआ।
हे मेरी अनमोल निधि,
मैने तुम्हे आज जगत के हवाले कर दिया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।।
रेणु 'राजवंशी' गुप्ता
*
मां
द्वार पर बिछी हुई
मां के माथे की शिकन
प्रतिरात कुचली जाती है
मेरे पांवों तले,
न वह छोड़ती है
प्रतीक्षा करना
न मैं कभी आता हूँ समय से पहले
पद्मेश गुप्त
*
एक प्रश्न
यह जो भाई हमारे हैं
तेरी आँखों के तारे हैं
मैं कौन हूँ माँ
मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या है?
बूढ़ी माँ के छुर्रियों वाले हाथों ने
मेरा सर सहलाया
मुझे बतलाया----
'' तू मेरा हृदय है बेटी
तेरे ही सहारे
मैने हर सुख-दुख
यह जीवन जिया है।
साँसों के इस रिश्ते को
समझ ले मेरी लाडली
मैने तुझे और तूने मुझे रोज ही
एक नया जन्म दिया है।''
शैल अग्रवाल
*
मां
पूछा जब सूरज ने
घास के तिनके से
सूख सूख कैसे तू हरियाता है
इतनी ज्वाला सह जाता है
बोला वह हंसकर
बैठा हूँ मां की गोद में।
शैल अग्रवाल

(मातृ दिवस पर विशेष)
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