मैं नीर भरी दुख की बदली!
क्रंदन में आहत विश्व हंसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!
मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग भरा,
नभ के नवरंग बनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!
मैं क्षितिज पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रजकण पर जलकण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली!
पथ न मलिन करता आना,
पद चिन्ह न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
महादेवी वर्मा
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कविता (आज और अभी )

माँ
क्या सूरत क्या सीरत थी
माँ ममता की मूरत थी
पाँव छुए और काम हुए
अम्माँ एक महूरत थी
बस्ती भर के दु:ख-सुख में
मां एक अहम ज़रूरत थी
सच कहते हैं माँ हमको
तेरी बहुत ज़रूरत थी
मंगल नसीम
*
मुक्त किया
जाओ बेटे,
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
मैने ही नही,
हर माँ ने अपने बेटे को मुक्त कर दिया।
तुम्हे बाँध लिया था
मैने अपने आँचल में।
लेकिन बँध गई मैं
अपने ही बंधन में।
तुमने रेशमी डोर तोड़कर
स्वयं को स्वतंत्र कर लिया,
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
तुम तो अतिथि थे मेरे,
अपना बसेरा बनाने से पूर्व
आश्रय लेने मेरे घर आए थे।
मैने ही घर की दीवारों पर,
तुम्हारा नाम लिख दिया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
अपने अंक में भरकर,
तुम्हे अपना मान बैठी।
तुम्हारे सपनों पर,
अपना अधिकार जमा बैठी।
तुमने ही तो मुझे,
स्वयं को स्वयं से अलग करना सिखलाया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
तुम्हारी अंगुली पकड़कर,
जिस राह पर चलना सिखलाया।
वह तो पगडंडी थी,
तुम्हे मुख्य मार्ग तक ले जाने वाली
उसी दोराहे पर आकर,
तुमने मेरा हाथ छुड़ाकर अपना रास्ता अपना लिया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।
ईश्वर द्वारा नियुक्त
मैं धाय थी तुम्हारी,
जिसका दायित्व आज पूर्ण हुआ।
हे मेरी अनमोल निधि,
मैने तुम्हे आज जगत के हवाले कर दिया।
मैने तुम्हे आज मुक्त कर दिया।।
रेणु 'राजवंशी' गुप्ता
*
मां
द्वार पर बिछी हुई
मां के माथे की शिकन
प्रतिरात कुचली जाती है
मेरे पांवों तले,
न वह छोड़ती है
प्रतीक्षा करना
न मैं कभी आता हूँ समय से पहले
पद्मेश गुप्त
*
एक प्रश्न
यह जो भाई हमारे हैं
तेरी आँखों के तारे हैं
मैं कौन हूँ माँ
मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या है?
बूढ़ी माँ के छुर्रियों वाले हाथों ने
मेरा सर सहलाया
मुझे बतलाया----
'' तू मेरा हृदय है बेटी
तेरे ही सहारे
मैने हर सुख-दुख
यह जीवन जिया है।
साँसों के इस रिश्ते को
समझ ले मेरी लाडली
मैने तुझे और तूने मुझे रोज ही
एक नया जन्म दिया है।''
शैल अग्रवाल
*
मां
पूछा जब सूरज ने
घास के तिनके से
सूख सूख कैसे तू हरियाता है
इतनी ज्वाला सह जाता है
बोला वह हंसकर
बैठा हूँ मां की गोद में।
शैल अग्रवाल

(मातृ दिवस पर विशेष)
*
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कहानी ( धरोहर)
अनुपमा का प्रेम
शरद चन्द चट्टोपाध्याय
ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया है। संसार में उसके लिए सीखने योग्य वस्तु और कोई नही है, सबकुछ जान चुकी है, सब कुछ सीख चुकी है। सतीत्व की ज्योति को वह जिस प्रकार देख सकती है, प्रणय की महिमा को वह जिस प्रकार समझ सकती है,संसार में और भी कोई उस जैसा समझदार नहीं है, अनुपमा इस बात पर किसी तरह भी विश्वाश नही कर पाती। अनु ने सोचा '' वह एक माधवी लता है, जिसमें मंजरियां आ रही हैं, इस अवस्था में किसी शाखा की सहायता लिये बिना उसकी मंजरियां किसी भी तरह प्रफ्फुलित होकर विकसित नही हो सकतीं। इसलिए ढूँढृ-खोजकर एक नवीन व्यक्ति को सहयोगी की तरह उसने मनोनीत कर लिया एवं दो चार दिन में ही उसे मन प्राण, जीवन, यौवन सब कुछ दे डाला। मन-ही-मन देने अथवा लेने का सबको समान अधिकार है, परन्तु गृहण करने से पूर्व सहयोगी को भी आवश्यकता होती है। यहीं आकर माधवीलता कुछ विपत्ति में पड़ गई। नवीन नीरोदकान्त को वह किस तरह जताए कि वह उसकी माधवीलता है, विकसित होने के लिए खड़ी हुई है, उसे आश्रय न देने पर इसी समय मंजरियों के पुष्पों के साथ वह पृथ्वी पर लोटती-पोटती प्राण त्याग देगी।
परन्तु सहयोगी उसे न जान सका। न जानने पर भी अनुमान का प्रेम उत्तरोत्तर वृद्धि पाने लगा। अमृत में विष, सुख में दु:ख, प्रणय में विच्छेद चिर प्रसिद्ध हैं। दो-चार दिन में ही अनुपमा विरह-व्यथा से जर्जर शरीर होकर मन-ही-मन बोली, '' स्वामी, तुम मुझे गृहण करो या न करो, बदले में प्यार दो या न दो, मैं तुम्हारी चिर दासी हूँ। प्राण चले जाएं यह स्वीकार है, परन्तु तुम्हे किसी भी प्रकार नही छोड़ूंगी। इस जन्म में न पा सकूँ तो अगले जन्म में अवश्य पाऊंगी, तब देखोगे सती-साध्वी की क्षूब्द भुजाओं में कितना बल है।'' अनुपमा बड़े आदमी की लड़की है, घर से संलग्न बगीचा भी है, मनोरम सरोवर भी है, वहां चांद भी उठता है, कमल भी खिलते है, कोयल भी गीत गाती है, भौंरे भी गुंजारते हैं, यहां पर वह घूमती फिरती विरह व्यथा का अनुभव करने लगी। सिर के बाल खोलकर, अवंकार उतार फेंके, शरीर में धूलि मलकर प्रेम-योगिनी बन, कभी सरोवर के जल में अपना मुंह देखने लगी, कभी आंखों से पानी बहाती हुई गुलाब के फूल को चूमने लगी, कभी आंचल बिछाकर वृक्ष के नीचे सोती हुई हाय की हुताशन और दीर्घ श्वास छोड़ने लगी, भोजन में रुचि नही रही, शयन की इच्छा नहीं, साज-सज्जा से बड़ा वैराग्य हो गया, कहानी किस्सों की भांति विरक्ति हो आई, अनुपमा दिन-प्रतिदिन सूखने लगी, देख सुनकर अनु की माता को मन-ही-मन चिन्ता होने लगी, एक ही तो लड़की है, उसे भी यह क्या हो गया ? पूछने पर वह जो कहती, उसे कोई भी समझ नही पाता, ओठों की बात ओठों पे रह जाती। अनु की माता फिर एक दिन जगबन्धु बाबू से बोली, ''अजी, एक बार क्या ध्यान से नही देखोगे? तुम्हारी एक ही लड़की है, यह जैसे बिना इलाज के मरी जा रही है।''
जगबन्धु बाबू चकित होकर बोले, '' क्या हुआ उसे?''
'' सो कुछ नही जानती। डॉक्टर आया था, देख-सुनकर बोला, '' बीमारी-वीमारी कुछ नही है।''
'' तब ऐसी क्यों हुई जा रही है?'' जगबन्धु बाबू विरक्त होते हुए बोले, '' फिर हम किस तरह जानें?''
'' तो मेरी लड़की मर ही जाए?''
'' यह तो बड़ी कठिन बात है। ज्वर नहीं, खांसी नहीं, बिना बात के ही यदि मर जाए, तो मैं किस तरह से बचाए रहूंगा?'' गृहिणी सूखे मुँह से बड़ी बहू के पास लौटकर बोली, '' बहू, मेरी अनु इस तरह से क्यों घूमती रहती है?''
'' किस तरह जानूं मां?''
'' तुमसे क्या कुछ भी नही कहती?''
'' कुछ नहीं।''
गृहिणी प्राय: रो पड़ी, '' तब क्या होगा?'' बिना खाए, बिना सोए, इस तरह सारे दिन बगीचे में कितने दिन घूमती-फिरती रहेगी, और कितने दिन बचेगी? तुम लोग उसे किसी भी तरह समझाओ, नहीं तो मैं बगीचे के तालाब में किसी दिन डूब मरूँगी।''
बड़ी बहू कुछ देर सोचकर चिन्तित होती हुई बोली, '' देख-सुनकर कहीं विवाह कर दो; गृहस्थी का बोझ पड़ने पर अपने आप सब ठीक हो जाएगा।''
'' ठीक बात है, तो आज ही यह बात मैं पति को बताऊंगी।''
पति यह बात सुनकर थोड़ा हंसते हुए बोले, '' कालिकाल है! कर दो, व्याह करके ही देखो, यदि ठीक हो जाए।'' दूसरे दिन घटक आया। अनुपमा बड़े आदमियों की लड़की है, उस पर सुन्दरी भी है; वर के लिए चिन्ता नही करनी पड़ी। एक सप्ताह के भीतर ही घटक महाराज ने वर निश्चित करके जगबन्धु बाबू को समाचार दिया। पति ने यह बात पत्नी को बताई। पत्नी ने बड़ी बहू को बताई, क्रमश: अनुपमा ने भी सुनी।
दो-एक दिन बाद, एक दिन सब दोपहर के समय सब मिलकर अनुपमा के विवाह की बातें कर रहे थे। इसी समय वह खुवे बाल, अस्त-व्यस्त वस्त्र किए, एक सूखे गुलाब के फूल को हाथ में लिये चित्र की भांति आ खड़ी हुई। अनु की माता कन्या को देखकर तनिक हंसती हुई बोली, '' व्याह हो जाने पर यह सब कहीं अन्यत्र चला जाएगा। दो एक लड़का लड़की होने पर तो कोई बात ही नही !'' अनुपमा चित्र- लिखित की भांति सब बातें सुनने लगी। बहू ने फिर कहा, '' मां, ननदानी के विवाह का दिन कब निश्चित हुआ है?''
'' दिन अभी कोई निश्चित नही हुआ।''
'' ननदोई जी क्या पढ़ रहे हैं?''
'' इस बार बी. ए. की परीक्षा देंगे।''
'' तब तो बहुत अच्छा वर है।'' इसके बाद थोड़ा हंसकर मज़ाक करती हुई बोली, परन्तु देखने में खूब अच्छा न हुआ, तो हमारी ननद जी को पसंद नही आएगा।''
'' क्यों पसंद नही आएगा? मेरा जमाई तो देखने में खूब अच्छा है।''
इस बार अनुपमा ने कुछ गर्दन घुमाई, थोड़ा सा हिलकर पांव के नख से मिट्टी खोदने की भांति लंगड़ाती लंगड़ाती बोली, '' विवाह मैं नही करूंगी।'' मां ने अच्छी तरह न सुन पाने के कारण पूछा, '' क्या है बेटी?'' बड़ी बहू ने अनुपमा की बात सुन ली थी। खूब जोर से हंसते हए बोली, '' ननद जी कहती हैं, वे कभी विवाह नही करेंगी।''
'' विवाह नही करेगी?''
'' नही।''
'' न करे? '' अनु की माता मुंह बनाकर कुछ हंसती हुई चली गई। गृहिणी के चले जाने पर बड़ी बहू बोली,'' तुम विवाह नही करोगी?''
अनुपमा पर्ववत गम्भीर मुंह किए बोली,'' किसी प्रकार भी नहीं।''
''क्यों?''
''चाहै जिसे हाथ पकड़ा देने का नाम ही विवाह नहीं है। मन का मिलन न होने पर विवाह करना भूल है !'' बड़ी बहू चकित होकर अनुपमा के मुंह की ओर देखती हुई बोली, '' हाथ पकड़ा देना क्या बात होती है? पकड़ा नहीं देंगे तो क्या ल़ड़कियां स्वयं ही देख-सुनकर पसंद करने के बाद विवाह करेंगी?''
''अवश्य!''
''तब तो तुम्हारे मत के अनुसार, मेरा विवाह भी एक तरह क भूल हो गया? विवाह के पहले तो तुम्हारे भाई का नाम तक मैने नही सुना था। ''
'' सभी क्या तुम्हारी ही भांति हैं?''
बहू एक बार फिर हंसकर बोली, '' तब क्या तुम्हारे मन का कोई आदमी मिल गया है?'' अनुपमा बड़ी बहू के हास्य-विद्रूप से चिढ़कर अपने मुंह को चौगुना गम्भीर करती हुई बोली, ''भाभी मज़ाक क्यों कर रही हो, यह क्या मज़ाक का समय है?''
''क्यों क्या हो गया?''
'' क्या हो गया? तो सुनो---'' अनुपमा को लगा, उसके सामने ही उसके पति का वध किया जा रहा है, अचानक कतलू खां के किले में, वध के मंच के सामने खड़े हुए विमला और वीरेन्द्र सिंह का दृश्य उसके मन में जग उठा, अनुपमा ने सोचा, वे लोग जैसा कर सकते हैं, वैसा क्या वह नही कर सकती? सती स्त्री संसार में किसका भय करती है? देखते देखते उसकी आंखें अनैसर्गिक प्रभा से धक्-धक् करके जल उठीं, देखते देखते उसने आंचल को कमर में लपेटकर कमरबन्द बांध लिया। यह दृश्य देखकर बहू तीन हाथ पीछे हट गई। क्षणभर में अनुपमा बगल वाले पलंग के पाये को जकड़कर, आंखें ऊपर उठाकर, चीत्कार करती हुई कहने लगी, '' प्रभु, स्वामी, प्राणनाथ! संसार के सामने आज मैं मुक्त-कण्ठ से चीत्कार करती हूँ, तुम्ही मेरे प्राणनाथ हो! प्रभु तुम मेरे हो, मैं तुम्हारी हूँ। यह खाट के पाए नहीं, ये तुम्हारे दोनों चरण हैं, मैने धर्म को साक्षी करके तुम्हे पतिरूप में वरण किया है, इस समय भी तुम्हारे चरणों को स्पर्श करती हुई कह रही हूं,'' इस संसार में तुम्हें छोड़कर अन्य कोई भी पुरुष मुझे स्पर्श नहीं कर सकता। किसमें शक्ति है कि प्राण रहते हमें अलग कर सके। अरी मां, जगत जननी---!''
बड़ी बहू चीत्कार करती हुई दौड़ती बाहर आ पड़ी, ''अरे, देखते हो, ननदरानी कैसा ढंग अपना रही हैं।'' देखते-देखते गृहिणी भी दौड़ी आई। बहूरानी का चीत्कार बाहर तक जा पहुंचा था,'' क्या हुआ, क्या हुआ, क्या हो गया?'' कहते गृहस्वामी और उनके पुत्र चन्द्रबाबू भी दौड़े आए। कर्ता-गृहिणी, पुत्र, पुत्रवधू और दास दासियों से क्षणभर में घर में भीड़ हो गई। अनुपमा मूर्छित होकर खाट के समीप पड़ी हुई थी। गृहिणी रो उठी, '' मेरी अनु को क्या हो गया? डॉक्टर को बुलाओ, पानी लाओ, हवा करो,'' इत्यादि। इस चीत्कार से आधे पड़ौसी घर में जमा हो गए।
बहुत देर बाद आंखें खोलकर अनुपमा धीरे धीरे बोली, ''मैं कहां हूं?'' उसकी मां उसके पास मुंह लाती हुई स्नेहपूर्वक बोली,''कैसी हो बेटी? तुम मेरी गोदी में लेटी हो।''
अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़ती हुई धीरे धीरे बोली,'' ओह तुम्हारी गोदी में? मैं समझ रही थी, कहीं अन्यत्र स्वप्न नाट्य में उनके साथ बही जा रही थी?'' पीड़ा-विगलित अश्रु उसके कपोलों पर बहने लगे।
माता उन्हें पोंछती हुई कातर स्वर में बोली, ''क्यों रो रही हो बेटी?''
अनुपमा दीर्घ नि:श्वास छोड़कर चुप रह गई। बड़ी बहू चन्द्रबाबू को एक ओर बुलाकर बोली, ''सबको जाने को कह दो, ननदरानी ठीक हो गई हैं।'' क्रमश: सब लोग चले गए।
रात को बहू अनुपमा के पास बैठकर बोली, ''ननदरानी, किसके साथ विवाह होने पर तुम सुखी होओगी ?'' अनुपमा आंखें बन्द करके बो
ली, '' सुख दु:ख मुझे कुछ नही है, वही मेरे स्वामी हैं---''
'' सो तो मैं समझती हूँ, परन्तु वे कौन हैं?''
'' सुरेश! मेरे सुरेश---''
'' सुरेश ! राखाल मजमूदार के लड़के ?''
''हां, वे ही। ''
रात में ही गृहिणी ने यह बात सुनी। दूसरे दिन सबेरे ही मजमूदार के घर जा उपस्थित हुई। बहुत सी बातों के बाद सुरेश की माता से बोली, '' अपने लड़के के साथ मेरी लड़की का विवाह कर लो।'' सुरेश की माता हंसती हुई बोलीं '' बुरा क्या है?''
'' बुरे-भले की बात नहीं, विवाह करना ही होगा!''
'' तो सुरेश से एक बार पूछ आऊं। वह घर में ही है, उसकी सम्मति होने पर पति को असहमति नही होगी।'' सुरेश उस समय घर में रहकर बी.ए. की परीक्षा की तैयारी कर रहा था, एक क्षण उसके लिए एक वर्ष के समान था। उसकी मां ने विवाह की बात कही, मगर उसके कान में भी नही पड़ी। गृहिणी ने फिर कहा, ''सुरो, तुझे विवाह करना होगा।'' सुरेश मुंह उठाकर बोला, '' वह तो होगा ही! परन्तु अभी क्यों? पढ़ने के समय यह बातें अच्छी नहीं लगतीं।'' गृहिणी अप्रतिभ होकर बोली '' नहीं नहीं, पढ़ने के समय क्यों? परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह होगा।''
''कहां?''
'' इसी गांव में जगबन्धु बाबू की लड़की के साथ।''
'' क्या? चन्द्र की बहन के साथ ? जिसे मैं बच्ची कहकर पुकारता हूं?''
'' बच्ची कहकर क्यों पुकारेगा, उसका नाम अनुपमा है।''
सुरेश थोड़ा हंसकर बोला, '' हां अनुपमा! दुर वह?, दुर, वह तो बड़ी कुत्सित है!''
'' कुत्सित कैसे हो जाएगी? वह तो देखने में अच्छी है!''
'' भले ही देखने में अच्छी! एक ही जगह ससुराल और पिता का घर होना, मुझे अच्छा नही लगता।''
'' क्यों? उसमें और क्या दोष है ?''
''दोष की बात का कोई मतलब नहीं! तुम इस समय जाओ मां, मैं थोड़ा पढ़ लूं, इस समय कुछ भी नहीं होगा!''
सुरेश की माता लौट आकर बोलीं, '' सुरो तो एक ही गांव में किसी प्रकार बी विवाह नही करना चाहता।''
'' क्यों?''
'' सो तो नही जानती!''
अनु की माता, मजमूदार की गृहिणी का हाथ पकड़कर कातर भाव से बोलीं, '' यह नही होगा बहन! यह विवाह तुम्हे करना ही पड़ेगा।''
'' लड़का तैयार नहीं है; मैं क्या करूं, बताओ?''
'' न होने पर भी मैं किसी तरह नहीं छोड़ूंगी।''
'' तो आज ठहरो, कल फिर एक बार समझा देखूंगी, यदि सहमत कर सकी।'' ---
अनु की माता घर लौटकर जगबन्धु बाबू से बोलीं,''उनके सुरेश के साथ हमारी अनुपमा का जिस तरह विवाह हो सके, वह करो!''
''पर क्यों, बताओ तो? राम गांव में तो एक तरह से सब निश्चिन्त हो चुका है! उस संबन्ध को तोड़ दें क्या?''
'' कारण है।''
'' क्या कारण है?''
'' कारण कुछ नहीं, परन्तु सुरेश जैसा रूप-गुण-सम्पन्न लड़का हमें कहां मिल सकता है? फिर, मेरी एक ही तो लड़की है, उसे दूर नहीं ब्याहूंगी। सुरेश के साथ ब्याह होने पर, जब चाहूंगी, तब उसे देख सकूंगी।''
''अच्छा प्रयत्न करूँगा।''
'' प्रयत्न नहीं, निश्चित रूप से करना होगा।'' पति नथ का हिलना डुलना देखकर हंस पड़े। बोले,'' यही होगा जी।''
संध्या के समय पति मजमूदार के घर से लौट आकर गृहिणी से बोले, ''वहां विवाह नही होगा।---मैं क्या करूं बताओ उनके तैयार न होने पर मैं जबर्दस्ती तो उन लोगों के घर में लड़की को नहीं फेंक आऊंगा!''
'' करेंगे क्यों नहीं?''
'' एक ही गांव में विवाह करने का उनका विचार नहीं है।''
गृहिणी अपने मष्तिष्क पर हाथ मारती हुई बोली, ''मेरे ही भाग्य का दोष है।''
दूसरे दिन वह फिर सुरेश की मां के पास जाकर बोली, '' दीदी, विवाह कर लो।''
''मेरी भी इच्छा है; परन्तु लड़का किस तरह तैयार हो?''
'' मैं छिपाकर सुरेश को और भी पांच हजार रुपये दूंगी।''
रुपयों का लोभ बड़ा प्रबल होता है। सुरेश की मां ने यह बात सुरेस के पिता को जताई। पति ने सुरेश को बुलाकर कहा, ''सुरेश, तुम्हे यह विवाह करना ही होगा।''
''क्यों''
''क्यों, फिर क्यों? इस विवाह में तुम्हारी मां का मत ही मेरा भी मत है, साथ-ही-साथ एक कारण भी हो गया है।''
सुरेश सिर नीचा किए बोला, ''यह पढ़ने लिखने का समय है, परीक्षा की हानि होगी।''
''उसे मैं जानता हूँ बेटा! पढ़ाई लिखाई की हानि करने के लिए तुमसे नही कह रहा हूं। परीक्षा समाप्त हो जाने पर विवाह करो।''
'' जो आज्ञा!''
अनुपमा की माता की आनन्द की सीमा न रही। फौरन यह बात उन्होंने पति से कही। मन के आनन्द के कारण दास दासी सभी को यह बात बताई। ब़ड़ी बहू ने अनुपमा को बुलाकर कहा, '' यह लो! तुम्हारे मन चाहे वर को पकड़ लिया है।''
अनुपमा लज्जापूर्वक थोड़ा हंसती हुई बोली, '' यह तो मैं जानती थी! ''
'' किस तरह जाना? चिट्ठी पत्री चलती थी क्या?''
'' प्रेम अन्तर्यामी है! हमारी चिठ्ठी पत्री हृदय में चला करती है।''
'' धन्य हो, तुम जैसी लड़की!''
अनुपमा के चले जाने पर बड़ी बहू ने धीरे धीरे मानो अपने आप से कहा,''देख-सुनकर शरीर जलने लगता है। मैं तीन बच्चों की मां हूँ, और यह आज मुझे प्रेम सिखाने आई है। ''
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चाँद परियाँ और तितली

बच्चों,
चाँद परियाँ और तितली नाम के इस स्तंभ में हम आपके लिए इसबार दो कविता और पंचतंत्र से एक कहानी लेकर आए हैं। भविष्य में और भी नए नए स्तंभ आपकी पसंदानुसार लाएंगे। आप यहाँ जो भी पढ़ना या देखना चाहते है, उसके बारे में लिखें, आपके सुझाव और फरमाइशों का हमें इन्तजार रहेगा।

कविता
आम और कबूतर
आ से आम और क से कबूतर
बोले एक दिन पन्नों के अन्दर
चलो उड़ें आकाश में हम
देखें चन्दा और सूरज के घर
आम छुपा चन्दा पर जाकर
थके कबूतर के टूटे पर
मुन्ना ढूँढे अब पलटके पन्ने
ब से बिल्ली और ख से खरगोश
उछलेंगे जो घास पे आकर
खेलेगा वह हंस-हंसकर।
शैल अग्रवाल
*
बिल्ली मासी
बिल्ली मासी बिल्ली मासी
घूमी आज फिर तुम मनमानी
कभी छतपर तो कभी पेड़पर
देखे जाकर चंदा मामा और
फूलों पर उड़ती तितली रानी
डराया क्या पर चूहो को भी
कुतर किताब फाड़के चुन्नी
करता जो हमसे शैतानी ?
शैल अग्रवाल

कहानी
जंगल का राजा शेर ( पंचतंत्र की कहानियों पर )
बहुत दिन पहले की बात है जंगल का राजा शेर था--एक ऐसा शेर जो घमंडी और क्रूर था और अपनी प्रजा को बहुत सताता था उसका हुक्म था कि हर दिन एक जानवर खुद ही उसके पास आए, जिसे वह मारकर खा जाया करता था। सारे जानवर बहुत परेशान थे पर फिर भी डर के मारे एकएक करके हर रोज ही उसके पास पहुँच जाते थे और चुपचाप उसका शिकार भी बन जाते थे। पर जब चालाक लोमड़ी की बारी आई तो वह दिनभर आराम से सोती रही और जब शाम हो गई तब भी बहुत ही आराम से उठी और जानबूझकर बहुत ही धीरे धीरे चलकर शेर के आगे जा पहुँची। भूखा शेर उसे देखते ही गुस्से में दहाड़ा, इतनी देर कैसे कर दी, जानती नही कि मैं सुबह से ही भूखा हूँ?
लोमड़ी हाथ जोड़कर बोली, जानती हूँ महाराज, जानती हूँ। और मैं तो सुबह ही आपके पास पहुँच भी जाती पर क्या करूँ रास्ते में उस बब्बर शेर ने जो रोक लिया मुझे। कहने लगा, अब मैं ही तुम्हारा राजा हूँ। तुम सबको बस मेरी ही बात माननी चाहिए, क्योंकि तुम्हारा वह राजा तो अब बिल्कुल ही बूढ़ा और बेकार हो चुका है। बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाकर आपतक पहुँच पाई हूँ। इसी चक्कर में तो शाम हो गई। शेर का गुस्सा अब काबू से बाहर था। ऐसा कहा उसने--यह बहरूपिया कौन है जो मेरे राज्य में घुसपैठ कर बैठा है, मुझे अभी उसके पास ले चलो? तुरंत ही चल पड़े वे दोनों (गुस्से में अंधा शेर और चालाक लोमड़ी) इस नए शेर को ढूँढने। अब आगे आगे लोमड़ी और पीछे पीछे शेर। सारा जंगल छानने के बाद पास ही के कुँए के आगे जाकर लोमड़ी रुकगई और बोली, महाराज देखिए यहींपर रहता है वह बदमाश शेर। शेर ने कुँए में झाँककर देखा तो अपनी परछाँई को दूसरा शेर समझकर गुस्से में दहाड़ा। परछांई भी जब उसपर वापस दहाड़ी तो शेर पूरी तरह से गुस्से से बेकाबू हो गया और अपना सारा विवेक खो बैठा और बिना सोचे समझे ही, दुश्मन को खतम करने के इरादे से कुँए में कूद भी गया। और तब शेर को मरने के लिए वहीं कुँए के अन्दर छोड़कर चालाक लोमड़ी वापस जंगल में लौट गई और सब जानवरों को बता दिया कि अब किसी को भी शेर से डरने या उसके पास जाने की जरूरत नहीं, क्योंकि शेर नही रहा। इस तरह से अपनी बुद्धि के बल पर शेर से कम ताकतवर होते हुए भी उसने ना सिर्फ खुदको, बल्कि जंगल के बाकी सभी जानवरों को भी शेर के पंजों से छुड़ा दिया।
शैल अग्रवाल
मार्च--2007
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My Column.

They burnt their bras and broke free from all sorts of shackles and slavery. there was a big outcry and upheaval when women demanded their rights and equality in early 19'th century. But that was then, today women have established themselves in each and every power corridor. They are successfully running not only their own households but countries. Seated in shops offices and parliaments, they are changing the thinking of society world-wide.Truelly they are now a force to reckon with. 17'th march is recognised as an International Women's day. Bringing out first issue of Lekhni on this day may suggest that it believes in all sorts of 'isms' , but truth is far from it. ---a voice against any sort of social unjustice---yes! But not the one for power struggle! One is most child like and helpless when one wants to exert power--be it a man, woman or even an e.magjine. Anyway word exert implies resistence and true power comes from within----trust and understanding oneself and his surroundings.. heritage and culture---joy and sorrow---.so to you all, with much love--- your very own 'lekhni' with its first issue---on this very special mother's day!
shail Agrawal.
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favourites Forecer
Warning
When I am an old woman I shall wear purple
With a red hat which doesn't go, and doesn't suit me,
And I shall spend my pension on brandy and summer gloves
And say we've no money for butter.
I shall sit down on the pavement when I'm tired
And gobble up samples in shops and press alarm bells
And run my stick along the public railings
And make up for the sobriety of my youth.
I shall go out in my slippers in the rain
And pick the flowers in other peoples gardens
And learn to spit.
You can wear terrible shirts and grow more fat
And eat three pounds of sausage at a go
Or only bread and pickle for a week
And hoard pens and pencils and beermats and things in boxes.
But now we must have clothes that keep us dry
And pay our rent and not swear in the street
And set a good example for the children.
We must have friends to dinner and read the papers.
But maybe I ought to practice a little now?
So people who know me are not too shocked and surprised
When suddenly I am old, and start to wear purple.
Jenny Joseph.
*
An Ordinary Women
Let me tell you something of myself.
I was then rather young,
Someone was touched by the grace of the green age.
That knowledge used to send
A thrill through my body.
I forgot, I am rather ordinary.
There are thousands and thousands of women
Very much like me,
Those who have only the magic of youthfulness
To show for their youth
I beg of you,
Write a story about an ordinary women.
She is long suffering.
If within the depth of her nature
Something uncommon does lie burried.
How would she prove it?
How many are there, who could even come to know it;
Most people's eye are open only to the magic of age,
Their minds do not thurst for truth.
Rabindra Nath Tagore
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Here and Now

Witch
The witch lived down our street
They all said she was, so it was true
--And I believed it more than anyone
(being the youngest).
Her house was dark, the curtains never pulled
And every time I passed it
I knew she was castung spells just then
Because a nasty feeling ran my back.
I knew she was watching.
She had a cat as well, which sat and looked.
It wasn't like other cats, who wandered up
And rubbed arround and purred and went away.
This one sat and looked.
It looked right through you, thinking--
And then it went indoors to tell her.
(It didn't run, it turned and walked away,
Tail up, no looking back:
Down the alley, up the steps, to her door--
Which always opened just as it arrived
And closed again as soon as it was through.
Once they dared me to go and knock.
As I reached for the bell, the door opened.
I could see her white smile in the gloom.
'' I've come to-----------''
'' Yes, I know, she said,'' come in.''
I didn't
I ran away.
What was she waiting for?
The voice of a child once again, perhaps,
Brightly, chattering in her kitchen?
An old lady with her cat.
Martin Underwood

Departure
Gently cusping my face
in her old wrinkled hands