सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

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Reflecting upon Truth/अंक 2 अप्रैल 2007-

 

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   अपनी बात

 

 

वक्त पंख लगाकर उड़ रहा है और देखते देखते लेखनी का दूसरा अंक आपके हाथों में है। पहले अंक पर जो भी प्रतिक्रियाएं और शुभकामनाएं मिलीं लेखनी आभारी है, ऐसे ही संवाद जारी रहे और लेखनी आप सबके भरपूर स्नेह व रुचि के लायक बनी रहे,  इसी विश्वास के साथ इस बार लेखिनी सच की सियाही में डूब गई है---सच जो सिपाही की तरह जीवन के मोर्चे पर भी है और प्रिय या इष्ट की तरह हृदय में भी, सच जो एक अहसास भी है और एक कर्तव्य भी--- नहीं वह नहीं, जिसे हम आप सच की तरह जानते या मानते हैं, अपितु  हमारे बेहद  निजी और एकाकी सच--- 

 

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स्मृति-शेष

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15 वीं पुण्य तिथि पर

 

बनारस में

जब मैने वहां

आंसुओं की श्रद्धांजली दी थी

और यादों का

एक और दिया

लहरों पर बहाया था

जब मैने वहां

प्रार्थना की थी

उद्दाम उन लहरों से

बहती उन हवाओं से

कि भाव पुष्पों से भरी 

मेरी इस नाव को

तुम तक ले जाएँ वे 

जब मैने वहां

याद किया था

बहते दियों संग

बिछुड़े उन प्राण को

तो बोलो भगवाल

क्या तुमने भी देखा था

कैसे मेरी गंगा मां का

जल से भरा मन

कुछ और ही

उमड़ आया था

और सूखे पत्तों की

नाव में बैठा

अकेला वह दिया

दूर कहीं जाकर

अनन्त;

छू आया था ---

*

शैल अग्रवाल

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अप्रैल--2007.

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अपने अपने सच

शैल अग्रवाल

सच अज्ञान के अँधेरे को चीरता उजाले की तरफ ले जाता है, मोक्ष दिलवाता है और अंत में हमेशा इसीकी जीत होती है, यह तो थी वेदकालीन ऋषि मुनियों की सार्व भौमिक सच की परिभाषा---पर क्या इसके अलावा कुछ और सच भी नहीं, जो बस हमारे अपने होते हैं----  मन की तहों के अन्दर सिमटे-लिपटे,चेतना के आकाश पर ध्रुवतारे से अटल---चन्द यादें और उम्रभर की पसंद,नापसंद, सफलता-असफलता ,---पहुंच से परे की वे नामुराद इच्छाएं--- सुनहरे सपने और सलेटी बादल, आकंक्षाओं के गगन चुम्बी शिखरों के पीछे से झांकते---जहां कभी मंजिल ही रास्ता बन जाती है तो कभी रास्ते खुद मंजिल बनकर आजीवन मार्गदर्शन करते हैं।

जिन्दगी को चाहे हम सिगरेट की तरह कश पे कश पी लें, या यह ही हमें चुटकियों में लेकर धुंए-धुंए उड़ा दे ,एक बात तो निश्चित है कि वक्त की हल्की सी भी हलचल हुई नही कि उंगलियों पर जमी राख पैरों तले बिछे कालीन (यथार्थ) पर आ गिरती है । औरफिर इन्ही आधे अधूरे जलते-बुझते निशानों से उठती है एक कसक, एक चाह, और शुरु हो जाती है आंख मिचौली, एक दीवनगी, जो कभी एक कविता तो कभी एक लक्ष, एक इरादा बनी आंखों में समा जाती है---जीने का संबल और आधार बन जाती है। साधारण आदमी को भी लौह पुरुष बना अदम्य शक्ति का संचार कर देती है। लोहा जितना गरम, प्रहार उतना ही तीव्र---सृजन तो कभी विध्वंस का कारण बनती है। संसार को कभी पिकासो और टर्नर देती है तो कभी एटम बम।

यही सृजन और विध्वंस ही तो प्रकृति के अटल नियम या सच भी हैं। वैसे भी टूटना और जुड़ना, दोनों ही  सृजन  प्रक्रिया के दो अनिवार्य पहलू हैं, एक को पाने के लिए दूसरे से कहीं न कहीं गुजरना ही होता है।  शायद इसी प्रकरण को अरस्तू ने कैथारसिस का नाम दिया था---तोड़कर कुछ जोड़ना, गालिब भी तो कुछ ऐसा ही कह रहे थे, जब दर्द को ही दवा कह रहे थे । यही कुछ बदलने, या तोड़ने और जोड़ने (सुधार) का दर्द ही तो सहिष्णु और ममतामयी गौरी को दुर्गा और काली बनाता है, या फिर शिव से ताण्डव करवाता है।

गौर से देखें तो सच दो तरह के होते हैं; एक तो वह जो स्थूल या प्रमाणित होता है, जैसे आकाश में सूरज चन्दा और धरती पर नदी, पेड़, पहाड़, आदमी, जानवर आदि। इन्हें हम देख सकते हैं और ये करीब करीब एक निश्चित आकार और स्वरूप के ही होते हैं । जैसे जाड़े के बाद बसंत ऋतु, फिर ग्रीष्म और बरसात आदि आदि --यह चक्र सदियों से चला आ रहा है और ऐसे ही चलेगा। दूसरे हैं व्यक्तिगत सच, जो मनुष्य के अपने अनुभव, शिक्षा, परिवेश, और संस्कार, योग्यता, पसंद नपसंद के आधार पर  बनते हैं और उसे भी बनाते या बिगाड़ते हैं---एक सपना, एक याद, एक अनुभव, या फिर एक सीख, एक संकल्प-सी इतनी तीव्र हो जाए कि सांसों सी जीवन की जरूरत बन जाए, तो वही तो है हमारा निजी या व्यक्तिगत सच। वैसे भी जो दिन-रात प्रेरित करे , आँखों से हटे ही नहीं, उसे सच नही तो और क्या कहेंगे ? हमारी शकल -सूरत, परिस्थितियों योग्यता--पहचान की तरह, यह भी  हमारे बेहद अपने और व्यक्तिगत होते हैं, हमारे अपने-अपने निजी सच !

पर शरीर और आत्मा की तरह साथ साथ रहते हुए भी, क्या ये निजी सच, सामूहिक और सामाजिक सच से पूर्ण सामंजस्य रख पाते हैं ? शायद नहीं ! क्योंकि  यही सच देश के लिए प्राण न्योछावर करते वीर का भी है और नफरत में जान लेते हत्यारे या आतंकवादी का भी। दोनों की ही सोच उतनी ही गहरी और सच्ची है उनके लिए। प्रेम या वात्सल्य में अपना सबकुछ लुटा देने वाली ममता हो या फिर परियों और राक्षसों में विश्वास करने वाले बालक का मन--दोनों  ही अपने संसार में पूरी तरह से डूबे रहते हैं और समय के उस पड़ाव पर वही उनके जीवन का सबसे बड़ा सच होता है।  पर इसी टकराव ने तो ऐसे नतीजे पैदा किए हैं,  जिनके बल पर इन्सान चांद पर जा पहुंचा है, गौतम, गांधी और हिटलर, मुसोलिनी पैदा किए हैं। मदर टैरेसा और ईशू जैसी लगन और निष्ठा व समर्पण, बिन लादेन जैसी दीवानगी, सभी का यही तो जिम्मेदार रहा है। यही ताजमहल बनाता है और यही अमेरिका के ट्रेड सेन्टर को उड़ाता है। इसी के बल पर देश जातियां और कुनबे संवरते हैं और इसी के प्रहार से हिरोशिमा व नागासकी का विनाश होता है। जैसे सफेद काले दो ही रंग नही होते, उनके बीच में एक पूरा इन्द्रधनुष समाया होता है, आदमी और उसके सच की संभावनाओं का विस्तार भी अछोह है और रंग भांति-भांति के। मन और अस्तित्व की तहों में रचा-बसा यह सच आजीवन ही हमारे साथ रहता हैं और हमारी मान्यताओं और विचारों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है । बीजरूप में यही हमारे व्यक्तित्व की इमारत की नींव का पत्थर है---हमारा अचेतन मन है। इसी सच को नकारने या झुठलाने के प्रयास में आदमी हजार कुंठाएं और रोग भी पाल सकता है और इसी सच के सहारे माटी का पुतला अदम्य साहस भी जुटा पाता है---मुश्किल से मुश्किल काम हंसते-हंसते कर ले जाना ---नश्वर शरीर के होते हुए भी अनश्वर आत्मविश्वास जुटा पाना---- अस्तित्व पर फैले आकाश सा शाश्वत बन जाना, संभव हो पाता है क्योंकि ईश्वर सा ही करीब करीब हर पल यह साथ जो रहता है हमारे। ऐसे कई युग-पुरुषों के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है, जिन्हे किसी एक घटना ने इतना धिक्कारा, या प्रेरित किया कि उनके जीवन की धारा ही मोड़ दी, फिर चाहे वे युग-पुरुष गान्धी हों या जीवन का सार ढूंढते गौतम बुद्ध--- सहना या लड़ना, दोनों यही तो सिखलाता है हमें। इसी संदर्भ में याद आ रही है दिनकर जी की कविता ''चांद और कवि''--

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज बनता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे-
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

तो क्या विचारों का सच भौतिक सच से ज्यादा बलवान है---शायद नहीं। कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि सच और सपने  से भ्रमित हो रही हूँ और दोनों को गडमड कर रही हूँ, नहीं ! सच और सपने में वही फर्क होता है जो यथार्थ और कल्पना में है, भौतिक या प्रमाणित सच को हम नकार नहीं सकते, पर अपने अस्तित्व को, खुद को नकारना भी तो आसान नहीं। इसी कल्पना और यथार्थ के सच की उलझन और ऊब को बहुत खूबसूरती से चित्रित करती है बच्चन जी की यह कविता,

लो दिन बीता, लो रात गई

सूरज ढलकर पश्चिम पहुंचा,

डूबा, संध्या सी वह संध्या थी,

क्यों उठते उठते सोचा था,

दिन में होगी कुछ बात नई।

लो दिन बीता, लो रात गई।

 

धीमे धीमे तारे निकले,

धीरे धीरे नभ में फैले,

सौ रजनी सी वह रजनी थी

क्यों संध्या को यह सोचा था,

निशि में होगी कुछ बात नई।

लो दिन बीता, लो रात गई।

 

चिड़िया चहकीं, कलियां महकीं,

पूरब से फिर सूरज निकला,

जैसे होती थी सुबह हुई।

क्यों सोते सोते सोचा था,

होगी प्रात: कुछ बात नई।

लो दिन बीता, लो रात गई।

माना हर सपने का जन्म किसी सच की ही कोख से होता है और हर सपना एक सच बनने की गुंजाइश भी रखता है , पर जरूरी नहीं कि हर सपना सच हो (मूर्त रूप ले) नतीजा लगन की तीव्रता और जरूरत के साथ साथ और भी कई तथ्यों पर भी तो निर्भर करता है। पर सच तो दोनों ही हैं, आखिर यही आँखें ही तो सच और सपने, दोनों को ही संजेती हैं।  सच भी सपना बनकर अदृश्य हो सकता है और भटका और तड़पा सकता है और अक्सर एक सपना भी सच्चे साथी-सा (मूर्त या अमूर्त रूप में) साथ रहकर अटूट सामर्थ भर देता है , जीने का मकसद बन जाता है। व्यर्थ के तर्क-वितर्कों में न पड़ते हुए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि दोनों ही तरह के (यथार्थ और धारणात्मक) सच की अपनी अपनी जगह और जरूरत है। चाहे कैसा भी और कोई भी सच हो , आंखों-सा ही, यह हमें जरूरत अनुसार ही दृश्य दिखलाता और समझाता आया है या हम वही देखते और समझते हैं, जो देखना या समझना चाहते हैं क्योंकि दुनिया की अन्य सभी जीवित वस्तुओं की तरह इस के भी  भिन्न -भिन्न स्वभाव, जरूरतें और दृष्टिकोण होते हैं, जो सदियों से ही हमारी समझ और राग-द्वेष से तुड़ते-मुड़ते व रंगते रहे हैं। व्यक्तिगत परिस्थिति, परिवेश और समाज के अनुसार सच का रूप ही नहीं, परिभाषाएं तक बदल जाती हैं। किसी एक व्यक्ति का सच आसानी से दूसरे का झूठ भी हो सकता है, जैसे कि हमारी संस्कृति में विवाह के पूर्व शारीरिक यौन संबन्ध असमान्य समझे जाते हैं , तो पाश्चात्य देशों में यह एक साधारण सी बात है और पूरी तरह से सामान्य हैं। विभिन्न सामाजिक मान्यताओं में इस तरह के टकराव के हमें कई उदाहरण मिल जाएँगे। हमारे यहां चचेरे मौसेरे भाई बहनों का रिश्ता भी सगे भाई बहनों सा ही पवित्र है, परन्तु कुछ समुदायों में यही शादी की अनिवार्य सी शर्त है। परन्तु इसका यह मतलब नही कि आज के विश्वीकरण के इस युग में, हर समाज हर सच को अपनी जरूरत और चाहत का चोला पहनाने की, या मनमानी करने की इजाजत देता है, या फिर हम सफेद झूठ का सहारा लेकर मनमानी कर सकते हैं। बेधड़क आगे बढ़ सकते हैं। मनसा, वाचा, कर्मणा, सामाजिक संदर्भ में हमें कल्याणकारी सच को ही अपनाना होगा, या फिर नीर क्षीर विवेकी होकर ही प्रस्तुत करना और पहचानना होगा । हां कला और व्यक्तिगत राग अनुराग में हम इसे कल्पना की उड़ान दे सकते हैं। फिर अक्सर सबकुछ जानते हुए, साहस होते हुए भी हर सच का हिमायती नही बना जा सकता क्योंकि कायदे कानून और प्यार व नफासत के दायरे में बंधा यह समाज ---और इसके नियम यह इजाजत नहीं देते और मनुष्य आजभी , इस इक्कीसवीं सदी में भी एक सामाजिक प्राणी है और यही उसके हित में भी है। हां, कपड़े फाड़कर खुद को पागल करार दे दे, तो बात दूसरी है। हमें तो वैसे ही चलना होगा जैसे समाज या दुनिया चाहती है, चाहे वे अमेरिका के प्रेसिडेंट हों या ईराक के शाषक---इंगलैंड की भावी साम्राज्ञी हो या नेपाल की---वरना नतीजा क्या होगा, सभी जानते हैं !

शायद यही वजह है कि उन्ही दो आँखों में बसकर भी कल्पना और यथार्थ के सच में बहुत अंतर होता है और हमें समाज के अंदर रहते हुए ये दूरी रखनी ही पड़ेगी। कई बार सबकुछ जान समझकर भी चुप रह जाना पड़ता है(सामूहिक हित के लिए धारणात्मक सच की बलि के कई उदाहण हमें आदिकाल से ही मिल जाएंगे, जैसे कि द्रोणाचार्य को कमजोर करने के लिए युधिष्ठिर जो सत्यवादी थे उनके मुंह से अश्वत्थामा हाथी की मृत्यु की खबर का प्रसारण, वह भी योगेश्वर कृष्ण द्वारा) क्योंकि स्थूल सच तो बस सच होता है उसमें अच्छे बुरे का विवेक नही होता और यही विवेक ही स्थूल सच को धारणात्मक सच बनाता है। अपने संत और विद्वान भी तो यही समझा रहे थे  जब उन्होंने कहा था कि ''सत्यं वद्, प्रियं वद्। मा वद्, सत्यं अप्रियम्।'' हां व्यक्तिगत संदर्भ में मन-माफिक सत्य को अपनाने का पूर्ण अधिकार है किसी भी व्यक्ति को, बल्कि अधिकार ही नही, जरूरी भी है यह। पर यहां भी विवेक को तो नहीं ही छोड़ा जा सकता। जड़ वनस्पति भी फलने फूलने के लिए वही अपनाती है जो उसे चाहिए या जो उसके लिए हितकारी है। इस संदर्भ में हमें यह भी नही भूलना चाहिए कि  देखने वाले की योग्यता और दृष्टि कैसे भी देखे, पर सच तो सच ही रहता है--अपरिवर्तनशील और अटूट। जैसे कि हम किसी भी दृष्टि से देखें आधा भरा गिलास, और आधा खाली गिलास दोनों ही सही वक्तव्य हैं और सच भी हैं, बस दृष्टिकोण और विश्वास में फर्क है। अखंड और भौतिक सच ऐसे होते हैं, जिन्हें हम चाहकर भी नहीं बदल सकते, जैसे कि जीवन और मृत्यु का शारीरिक सच। पर अब अगर हर बात, हर जीवन एक सांस-हीन शून्य पर ही अटक जाए तो फिर क्या रहजाता है शेष और अशेष, समझने या समझाने को, ऐसा सोचकर हाथ पर हाथ धरकर भी तो नही बैठा जा सकता--- हमें तो बस यही मानकर चलना चाहिए कि वाकई में सच वही है जो अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाए, अब यह अंधेरा चाहे विचारों का हो या फिर इन्द्रियों के यथार्थ का !

कितनी भी हम इस सच की पड़ताल कर लें, इन गुत्त्थियों को सुलझाना इतना आसान तो नही, क्योंकि मात्र बचपन में ही नही, आजीवन ही ' तोड़ने के लिए ही रेत के घरौदे बनाता ' मानव स्वभाव तो नही बदला जा सकता। कितना भी भटकें, समाज और संसार को दोष दें, अक्सर हम खुद ही अपने मित्र और सबसे बड़े शत्रु होते हैं। अमृत और गरल में से क्या पीना है अधिकाशत:, यह स्वेच्छा पर ही होता है। वैसे भी, ज्ञान भी तो बेहद व्यक्तिगत  समझ है और व्यक्ति विशेष की निजी पात्रता पर ही निर्भर करता है। ज्ञान के साथ अगर सुख-शान्ति है, तो ठीक से न पचा पाओ तो गलानि और कुंठाओं की अपच भी तो है, अन्य किसी भी औजार की तरह यह भी एक औजार है और संयम व सिद्ध-हस्तता मांगता है । फिर एक कर्मरत इन्सान को इन वाद विवादों में पड़ने की क्या जरूरत --गीता में भी तो जीवन का सबसे बड़ा धर्म कर्म ही बताया गया है? हां, अति जरूर किसी चीज की भी अच्छी नही होती--कला और साहित्य में तो अतिशयोक्ति एक अलंकरण हो सकता है जीवन में नहीं। कल्पना का संसार कितना भी इन्द्रधनुषी हो, पैरों के नीचे तो आज भी वही यथार्थ की धरती ही चाहिए।  हर सुख दुख को अपनाते, नटी की तरह संतुलन रखते हुए चलते जाना , क्या यही जीवन नहीं---जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सच नहीं-----============================================================================

 

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कविता (धरोहर )

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना ।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना ।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

 

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कविता (धरोहर)


लौट रहा हूँ मैं अतीत से

देखूँ प्रथम तुम्हारे तेवर मेरे समय! कहो कैसे हो?

शोर शराबा चीख़ पुकारें सड़कें भीड़ दुकानें होटल

सब सामान बहुत है लेकिन गायक दर्द नहीं है केवल

लौट रहा हूं मैं अगेय से

सोचा तुमसे मिलता जाऊं

मेरे गीत! कहो कैसे हो?

भवन और भवनों के जंगल चढ़ते और उतरते जीने

यहाँ आदमी कहाँ मिलेगा सिर्फ मशीनें और मशीनें

लौट रहा हूं मैं यथार्थ से

मन हो आया तुम्हे भेंट आऊँ

मेरे स्वप्न! कहो कैसे हो?

नस्ल मनुज की चली मिटाती यह लावे की एक नदी है

युद्धों का आतंक न पूछो खबरदार बीसवीं सदी है

लौट रहा हूँ मैं विदेश से

सबसे पहले कुशल पूछ लूँ

मेरे देश! कहो कैसे हो?

यह सभ्यता नुमाइश जैसे लोग नहीं हैं सिर्फ मुखौटे

ठीक मनुष्य नहीं है कोई कद से ऊंचे मन से छोटे

लौट रहा हूँ मैं जंगल से

सोचा तुम्हें देखता जाऊं

मेरे मनुज! कहो कैसे हो?

जीवन की इन रफ्तारों को अब भी बांधे कच्चा धागा

सुबह गया घर शाम न लौटे उससे बढ़कर कौन अभागा

लौट रहा हूँ मैं विछोह से

पहले तुम्हे बांह में भर लूं

मेरे प्यार! कहो कैसे हो?

चन्द्रसेन विराट 

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कविता आज और अभी

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कहीं

चीखते शहर में

खामोशी का मोहल्ला

कोई तो होगा।

 

कहीं तो होगी

खामोशी की जुबान की बस्ती,

जहां न घंटे घड़ियालों का शोर होगा

न अजानों की आवाजें।

 

कहीं तो होगी

कभी न खत्म होने वाली वो गली

जहां न डींगे होंगी, न दावे

जोर जोर से मेजों पर गिरते।

 

जहां लोग बतियाते हंसते होंगे

खामोशी से।

 

जरूर होगा वो घर

जहां कुछ बांटने के लिए

शब्दों की जरूरत नहीं होती।

 

जरूर होगा ये सब

कहीं न कहीं

इसी चीखते शहर में

 

मैं ढूँढ लूंगा

चुपचाप।

अरुण अस्थाना 

 

*

 

मुखरित मौन

उसकी खामोश चीखों से

तंग आकर मैं उसे

अपने घर में उठा तो लाई

पर अब सोचती हूँ

इसकी आर्त आँखें

और व्यथित हृदय की

पीड़ा को सुनकर भी

क्या मैं कुछ कर पाऊँगी

मैने तो अभी-अभी

इसे भुलाकर भँवरों पर

तैरना सीखा है

कंटीले कांटे वाले

झाड़ को तोड़ा है

वैसे भी इसका साथ तो

किसी को भी रास नही आया

वन वन भटक कर

अग्नि परीक्षा देकर भी

सीता ने सिर्फ

बनवास ही पाया है

राधा का दीवाना कृष्ण भी तो

उसे छोड़ आया था

कभी मर्यादा के नाम पर

कभी कर्तव्य के नाम पर

हर बार

इसी को तो दफनाया गया है

सूली पर चढ़ाया गया है

असफल कामनाओँ का

कफन ओढ़े

घायल हठीला यह सच

अभी तक जिन्दा है, आश्चर्य है

मर जाए तो शायद अमर हो जाए

बेशर्म, मेरी नींद उड़ाकर

मेरे तकिए पर सर रखे

आराम से सो रहा है

और मैं सोच रही हूँ

इसे जगाऊं, बाहर फेंक आऊँ

पर ऐसा कब होता है

अपनी अस्मत् से

जुदा होकर भी

क्या कोई कभी जिया है-----

फिर भी सोचने में क्या बुराई है

पर डरती हूँ इस गूंगे सच की

उंगली पकड़े पकड़े

कहीं मैं मुखरित

ना हो जाऊं ? 

शैल अग्रवाल

 

 *

 

सच जो,

 

सच जो

मरता नहीं कभी

बस घोंटता है गला

खतरनाक यह बीमारी

लग जाती जिन्हें

राम-रहीम दोनों ही

कभी रहते थे यहां

पर अब कोई नही

जरूरत ही नहीं

रणभूमि है यह तो

वीरान मकबरे

और ठंडे शिलान्यासों की

जीत की हार की

कांटे या फूल

कोई भी

फरक नहीं पड़ता

दफन हुए पड़े

सब एहसास यहां

उड़तीं बस अफवाहें

नफरत

हिंसा से कही

हजार बातें

जी भरकर दु:ख

खरीदो भाई

दिन रात इस

दर्द की खुली

दुकान से---

शैल अग्रवाल

 

 *

 

प्यार न लिखना

 

सब कुछ कहना

सब की सुनना

चाहे मेरी बात न करना।

 

खत लिख देना

शिकवे करना

चाहे मेरा नाम न लिखना।

 

जब भी लिखना

सच ही लिखना

चाहे मुझको प्यार न लिखना।

अरुण अस्थाना

 

 *

फिर भी

झूठ और छल का साम्राज्य है

और हम सच की बातें करते हैं

 

क्या करें अगर यह भी न करें

हो सकता है सच आज एक सपना हो

सच का राज

सचाई का दिन

मुमकिन है कभी सच न हो

 

सच शायद चला गया है हमारे बीच से

अपना पता दिए बगैर

अपनी मरजी से जा रहा

देर हो तो न तकना राह

शायद कोई पुर्जा छोड़ा हो

उसे ही खोजा जा रहा

किसी को नहीं मालूम

वह कब तक लौटेगा

या लौटेगा भी कभी

पर उसका स्मरण अनुस्मरण पुनर्स्मरण

जरूरी है

 

सच कहीं है

तभी तो झूठवाले

झूठ को सच करने

की कोशिश करते

 

आओ सच को सच करने की कोशिश करें

साबित नहीं सच करने को

झूठ और छल का राज है

और हम सच की बातें करते

 

सच का जिक्र करने सच के बारे में बोलने से भी

झूठ का तिलिस्म कहीं टूटता है

सोचने से भी अंधेरा कुछ घटता है

कोहरा छंटता है------

प्रेम रंजन अनिमेष (साभार,रचना-समय) 

 

*

 

सच के पीछे का सच

 दीख रहा होता जो सच वह ओढ़ा गया

कलात्मक सच

एक तरह का झूठ जो बार-बार दोहराने से सच होता

बहुत लचीला

सच नियामक नहीं होता वो जो अभिनय से जन्मा

जीवंत इतना अभिनय

कोई चिंता न भय

और सच के पीछे का सच तुड़ता नहीं

मुड़ता नहीं

बदलता नहीं

सच कभी सहमता नहीं

भीतर-भीतर बहुत गहरे रखता आदमी

सात तालों में बन्द और चाबी पता नहीं।

मोहन सगोरिया ( साभार , रचना-समय)  

 

*

 

एक और सच 

माना कि सच है आज भी

आकाश में खेलता चंदा

फूल फूल इतराती तितली

और बन्द आंखों में रचे बसे

धुत् ये सपने----

पर रोज ही तो निकलता है

चांद को निगले हुए

झुलसाता हुआ सूरज

और लस्त तितली

बिखरे पंखों संग

घास पर तिनके तिनके

लुढ़की नजर आती है

ले उड़ा है आजफिर क्यों

टूटा-कांपता जर्जर मन मेरा

एक तेज हवा का झोंका

और एक और सच

जिन्दगी-सा

सामने बिखरा पड़ा

एक अधलिखी चिठ्ठी

एक अधपड़ी किताब

मन की झूठी प्याली पर

कल की प्यास के कुछ

आधे अधूरे निशान

और थके होठों की

वही पुरानी

अथक मुस्कान !

शैल अग्रवाल

 

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कहानी- समकालीन

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कड़ियां

:तेजेन्द्र शर्मा

 

दादाजी नहीं रहे।

राज पर इस समाचार का कुछ अजीब-सा असर हुआ था। बहुत निर्लिप्त भाव से उसने यह समाचार सुना था। जब फूफाजी ने सुबह-सुबह आकर सूचना दी, तो राज उस समय घर में नहीं था। वह सुबह की दौड लगाने 'हैप्पी क्लब' गया हुआ था। घर पहुंचा तो घर में चुप्पी-सी छायी हुई थी।

घर में उसका सामना स्नेह से हुआ। स्नेह यानी राज की छोटी बहन, जिसे वह चिढाने के लिए 'फत्तो' के नाम से पुकारता था। पूछा, ''अरी फत्तो, आज स्कूल नहीं गयी?''

''भैया, दादाजी का देहांत हो गया।'' स्नेह ने बुझी हुई आवाज़ में बताया।

राज की निगाह उठी, उसने फूफाजी को बैठे देखा। वह उन्हें 'खटारा फूफा' कहा करता था। उनकी खटारा कार बाहर खड़ी देखकर उसे पहले ही आश्चर्य हुआ था कि आज सुबह-सुबह बुआ क्या करने आ गयीं, क्योंकि बुआ अक्सर राखी या भैयादूज पर ही आती थीं।

फूफा को देखते ही राज को अपने जीवन की एक घटना कुरेदने लगती है. तब घर की आर्थिक स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं थी। राज ने हायर सेकंडरी के बाद स्टेनोग्राफी का कोर्स कर लिया था और नौकरी की तलाश में था। आख़िरकार खटारा फूफा ने ही अपने एक मित्र से कहकर राज को दो सौ रूपये महीने पर स्टेनो की एक नौकरी दिलवा दी थी। साथ ही एक हिदायत भी दी थी कि 'देखो बेटा, नौकरी तो तुम्हारी लग गयी पर एक बात का ख़्याल रखना कि सूरी (राज का बॉस) को कभी पता न चले कि मैं तुम्हारा फूफा हूं.। मैंने उसे बताया है कि तुम मेरे पड़ोस में हते हो.'

बकरी ने दूध दिया भी तो, मेंगनी डालकर। खटारा फूफा की इस हिदायत के बाद तो राज वह नौकरी करना ही नहीं चाहता था, पर मां के काफी समझाने-बुझाने पर चुप रह जाना पड़ा। लेकिन तीन महीने बाद ही राज इस नौकरी को छोड एक बैंक में लग गया था।

इस चक्कर में राज ने रिश्तों पर एक शोध ही कर डाला। वह सोचता था कि फूफा, मौसा, चाची, मामी - इन सबका रिश्ता मुझसे क्या है, यह तो सबको मालूम है, किंतु मैं इनका क्या लगता हूं? अगर हमारे पुरखों ने इस संबंध को कोई नाम ही नहीं दिया तो इसका एक ही अर्थ है कि मैं इनका कुछ नहीं लगता.

    मगर लोकलाज तो रखनी ही होती है. उसने फूफा के पांव छुए. पापा तैयार हो रहे थे, अस्पताल जाने के लिए और फूफा बता रहे थे, ''भाई साहब, कल शाम पिताजी सैर के लिए निकले थे। उधर से इलाके के कुछ शरारती लडक़े तेजी से कार भगाते आ रहे थे। और उन्होंने कार उनपर चढा दी। 'रिब्स' तो सारी टूट गयीं। रात भी बेहोशी में आपका ही नाम रटते रहे.''

    राज फिर हैरान! उसे दादाजी की वे बातें याद आने लगीं जो उन्होंने पूरे होशो-हवास में उससे कही थीं-'राजकुमार, मैंने तो कह दिया है कि मनोहर लाल (राज के पिता) मेरी अर्थी को हाथ भी न लगाये, चाहे चील-कौवे ही मेरी लाश को क्यों न खा जाएं.' और बेहोशी में वे उसके पापा का ही नाम पुकारते रहे! विश्वास नहीं होता.

    राज को कभी भी अपने पापा व दादाजी के बीच के संबंध समझ नहीं आये अपने जिन दो बेटों पर वे जान छिड़कते थे; वे तो उनके पास ही थे। फिर पापा को याद क्यों किया? क्या अंतिम समय में अपने किये पर पश्चाताप कर रहे थे? मुझे क्यों नहीं याद किया? मेरे भी तो देनदार थे!

    उसे अपने पापा पर भी आश्चर्य हो रहा था।  दादी के मरने पर दादाजी ने कहा था - 'मनोहर, तुम्हारी मां मेरे और तुम्हारे बीच एक पुल थी. आज वह पुल ढह गया है.' और दादी के जाने के बाद न तो पापा ने और न दादाजी ने ही उस पुल को दोबारा बनाने की चेष्टा की। पर आज, सिर्फ समाचार मिलते ही मम्मी और पापा दोनों चलने को तैयार हो गये!

    मम्मी, जिनको अपनी ससुराल से सिवाय बुराई के कभी कुछ नहीं मिला, वह भी इस समय रो रही हैं। उन्हें दादाजी ने कभी पसंद नहीं किया. कहते - 'राज बेटे, तुम्हारी मां अगर चाहे तो मनोहर से, मुझसे और अपने भाई-बहनों से एक साथ बनाकर रखे. आदमी वही करता है जो उसकी औरत चाहती है।'

    इस तरह राज पर एक और रहस्य खुला था कि इस पूरे संसार में संबंधों को बिगाड़ने का काम औरतें ही करती हैं. पर वे औरतें उसकी दादी, चाची या बुआ भी तो हो सकती हैं. सिर्फ उसकी मम्मी ही क्यों?प्रश्न तो बहुत सारे थे, परंतु उनके उत्तर कहीं छिपे हुए थे।

    ''ठीक है. आप और मम्मी चलिए. मैं 'हाफ़-डे' करके सीधे श्मशान-घाट पहुंच जाऊंगा।'' राज की उहापोह उसे परेशान किये थी।

    पापा-मम्मी चले गये। स्नेह को भी साथ लेते गये। घर में राज अकेला रह गया। जाते हुए हिदायतें दी गयी थीं - 'ताला ठीक से बंद कर देना, दूध ढंककर रखना,' इत्यादि-इत्यादि।

    राज के मानस-पटल पर फिर पुरानी यादें उभरने लगीं।

    उन  दिनों राज आठ-नौ वर्ष का रहा होगा। पापा का तंबादला पंजाब से दिल्ली हो गया था। पापा ने दादाजी को पत्र लिखा थाः 'यदि आप आज्ञा दें तो कुछ दिन परिवार सहित आपके साथ ही रहना चाहूंगा। वैसे, महीने भर में मुझे सरकारी क्वार्टर भी मिल जायेगा।'

    तार की गति से पत्र का उत्तर पहुंचा थाः 'यहां का घर छोटा है। अपने लिए मकान का प्रबंध करके ही दिल्ली आना। यहां तो बहुत दिक्कतें हैं।'

    राज के बाल सुलभ मन पर दादाजी की पहली छवि यह बनी थी कि दादाजी उसे अपने साथ नहीं रखना चाहते। आख़िर क्यों?

    दफ़्तर के लिए तैयार होने लगा राज। उसका मन कुछ उचाट-सा हो रहा था। रह-रहकर एक ही बात उसके दिमाग में घुमड़ रही थी कि दादाजी के जीवन में पैसे का ही सबसे अधिक महत्व क्यों था? उनके लिए जीवन में सफल होने का मतलब था बंगले, गाड़ियां, पैसा और बस पैसा! जो बेटे और बेटियां अमीर थे, उनसे तो दादाजी का बहुत प्यार था, लेकिन जो अमीर नहीं बन पाये, दादाजी की लिस्ट में से उनका नाम कटता गया. अंबाले वाली बुआ तो पिछले बारह वर्ष से विधवा हैं. चार बच्चे भी हैं उनके, पर दादाजी ने अंबाला की ओर कभी भूलकर भी नहीं देखा।

    कहीं ऐसा तो नहीं कि दादाजी के प्रति बहुत कठोर हो रहा है राज? खिर दादाजी देखने में 'विलेन' तो नहीं लगते! फिर पापा से उनकी इस कदर बेरूखी क्यों? वैसे एक बार उन्होंने इस सिलसिले में जरूर कुछ कहना चाहा था -'राज, एक वक्त था जब मनोहर की बहुत जरूरत थी. बड़ा बेटा है; मैंने सोचा था कि मेरी बाज़ू बनकर खड़ा होगा। पर वह अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ता रहा।  कितना समझाया था उसे कि पढ़-लिखकर कुछ बन ले। क्या मिला उसे आखिर आज़ादी की लड़ाई से?'

    'परंतु दादाजी, उन दिनों तो हर कोई देश की ख़ातिर बलिदान देने को तैयार रहता होगा. गांधी, नेहरू सब ही।'

    'नेहरू प्रधानमंत्री बन गया। मनोहर की तरह छोटी सी नौकरी नहीं कर रहा। अरे, अगर स्वतंत्रता सेनानी था भी तो उसका फ़ायदा उठाता। लोगों को देखे, किसी ने परमिट ले लिये हैं, कोई फ़ैक्टरियां खोले बैठा है। एक यह है कि हरिश्चंद्र बने घूमते हैं.'

    दादाजी भी अपनी जगह ठीक थे। आख़िर उनकी भी कुछ अपेक्षाएं रही होंगी अपने बेटे से। वे अवश्य चाहते रहे होंगे कि जो दुःख उनके परिवार को पापा के कारण सहने पडे, उनका मुआवजा तो कम-से-कम उन्हें मिल पाता। लेकिन दादाजी घोर 'प्रैक्टिकल' और पापा महा-आइडियलिस्ट। निबाह होता भी तो कैसे?

    किंतु अब, जबकि दादाजी नहीं हैं, क्या राज को उनके विषय में इस तरह सोचना चाहिए? नहीं! मृत व्यक्ति की तो केवल बड़ाई की जाती है। उनके गुण गाये जाते हैं। आज यही हो रहा होगा वहां. हर रिश्तेदार दादाजी की शान में कसीदे पढ़ रहा होगा। दादाजी तिहत्तर के होकर गये हैं - पूरा जीवन जीकर, किंतु रोने वाले तब भी उनके असामायिक निधन पर शोक प्रकट कर रहे होंगे।

    लेकिन क्या राज भी उनसे लिपटकर रो पायेगा? आखिर क्यों वह दादाजी के प्रति सहज नहीं हो पाता? दादी के मरने पर तो राज बहुत रोया था। पर दादी तो उसे प्यार भी बहुत करती थीं। उसकी बड़ी बहन की शादी पर देने के लिए दादी ने एक सोने का सेट बनवाया था। आखिर दीदी उनकी सबसे बडी पोती जो थी। वह तो पांच हज़ार कैश भी देने वाली थीं। पर विवाह से छः-सात महीने पहले दादी सबको रोता हुआ छोड़ ग़यीं।

    विवाह के समय पापा गये थे दादाजी के पास। छूटते ही दादाजी ने कहा था-'किस सेट की बात कर रहे हो तुम! जिसने देना था वह तो मर गयी। मैं तो तुम्हें फूटी कौड़ी भी देने के हक में नहीं हूं. वो तो सविता मेरी भी पोती लगती है, इसलिए कुछ-न-कुछ तो देना ही पडेग़ा।' और दादाजी ने पांच सौ रूपये दिये थे अपनी सबसे बडी पोती के विवाह पर!

    यह तो हो नहीं सकता कि दादाजी का दिल न हो। बिरजू चाचा और नारायण चाचा से तो बहुत प्यार था उन्हें. उनके तो बच्चों को भी बहुत प्यार करते थे वे। फिर राज का ही भाग्य ऐसा क्यों? राज बेचैन हो उठा। उसका मन दफ़्तर जाने को नहीं हो रहा था। उसने फैसला किया कि आज वह दफ़्तर नहीं जायेगा।

    बहुत प्रयत्न करने पर भी दादाजी के बारे में सोचने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा था। एक के बाद एक यादें उसके दिमाग को मथे जा रही थीं।

    पापा की बदली शिमला हो गयी थी। घर की माली हालत तो कभी भी अच्छी नहीं रही, और अब तो घर में डालडा घी भी प्रयोग होने लगा था। मम्मी थैले में छुपाकर डालडा घी लाया करती थीं कि कहीं कोई पड़ोसी देख न ले। पापा तब भी चिल्लाया करते थे-'कोई चोरी तो नहीं कर रहे! अपने बच्चों को भूखा तो नहीं मार रहे! अगर देसी नहीं खरीद सकते, तो कुछ तो लेंगे ही!'

    दादाजी, दादी और बिरजू चाचा का परिवार, सब शिमला आये हुए थे। मम्मी ने मटर-पनीर की सब्ज़ी बनायी थी, कढ़ी-चावल और साथ में सूजी का हलवा। चाचा-चाची, बच्चों और दादी ने तो खाना खा लिया, पर दादाजी तो देसी घी के बिना खाने की सोच ही नहीं सकते थे। उन्होंने सूखी रोटी, दही में नमक-मिर्च डालकर खायी और उसी शाम बाज़ार जाकर दो किलो देसी घी ले आये-'बहू, हमने तो कभी डालडे में बना खाना खाया नहीं। अब इस उमर में क्या स्वाद बदलेंगे! हमारा खाना इसी में बना दिया करो।'

    पापा बुरी तरह आहत हुए थे और मम्मी रूआंसी।

    वहीं पापा ने उनसे राज की पढ़ाई की बात शुरू की थी कि शिमला में दसवीं क्लास में उसे दाखिला नहीं मिल पा रहा, अतः वह वापस दिल्ली में जाकर पढ़ना चाहता है। और दादाजी ने अपने ज्ञान-भंडार के द्वार खोलते हुए जवाब दिया था-'मनोहर, बच्चे हमेशा मां-बाप के पास ही अच्छे लगते हैं। हमें देखो! तुम्हारे समेत सात बच्चे थे, पर सबको ठीक से पाला। जो परवरिश मां-बाप अपने बच्चों को दे सकते हैं वह और कोई नहीं दे सकता।'

    इस तरह एक बार फिर दादाजी ने राज को जता दिया था कि उनके घर में उसका स्वागत नहीं है। राज में भी तो दादाजी का ही ख़ून था। गर्मी खा गया। प्रतिज्ञा की कि पढ़ूंगा तो दिल्ली में ही; नहीं तो पढ़ाई छोड दूंगा। और ऐसे में काम आये उसके पापा के दोस्त, ईश्वरदास, जो वहीं दादाजी के घर के पास करोलबाग में रहते थे।

    दादाजी को झटका लगा था। रिश्तेदारों में दबी ज़ुबान बातें होने लगी थीं। दादाजी मन-ही-मन तिलमिला उठे थे, पर समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें।

    समझ तो ख़ैर राज भी नहीं पा रहा था कि वह दादाजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने जाये या नहीं। दादाजी के दोहरे मानदंडों को वह समझ नहीं पाता था। बिरजू चाचा के बच्चों के बारे में कहते थे-'भई, असल से सूद ज्यादा प्यारा होता है.' और राज के लिए-'देखो, राज, तुम्हारे साथ हमारा जो भी रिश्ता है, वह मनोहर की वजह से है. अगर मनोहर हमसे बनाकर नहीं रखेगा तो हम तुम्हें कैसे प्यार दे पायेंगे?'

    राज को दादाजी की यह दलील कभी समझ में नहीं आयी। वह चीख-चीखकर दादाजी से कहना चाहता था कि 'मै भी आप ही का खून हूं दादाजी! मुझे भी आपका प्यार पाने का उतना ही हक़ है जितना कि बिरजू चाचा के बच्चों को। मैं भी आपका सूद हूं। मुझे मूल से मत तोलिये। मेरे तो नाना-नानी भी नहीं हैं। आपके प्यार का जितना हकदार मैं हूं, उतना तो कोई भी नहीं. 'किंतु दादाजी तक उसकी बात कभी पहुंच नहीं पायी।

    वह स्वयं से ही तर्क-वितर्क करता रहता। यदि दादाजी की पापा से नहीं बनती तो इसमें उसका क्या दोष? वह तो दादाजी, दादी व चाचा का समान रूप से आदर करता है। फिर वह दादाजी के प्यार से वंचित क्यों रहे? लाख चाहकर भी वह दादाजी व पापा के मन की गांठें नहीं खोल पाया था।

    फिर आया दीवाली का त्योहार। चारों ओर रोशनी. सत्य की असत्य पर जीत। संभवतः अबकी बार दादाजी का हृदय-परिवर्तन हो ही जाये राज ने सोचा। पापा का पत्र भी आया था जिसमें दीवाली पर दादाजी के घर जाने की हिदायत थी। बिरजू चाचा स्वयं उसे लेने आये थे। और दादाजी की ओर से उसे पहला तोहफ़ा मिला था एक 'ग्रे' वर्सटेड पैंट का कपड़ा और एक सफेद कमीज़। बहुत अच्छा लगा था। फिर से दिमाग़ ने सोचा, 'नहीं, दादाजी इतने बुरे तो नहीं। अगर प्यार न होता तो यह सब क्यों करते?' मगर कुछ तय नहीं कर पाया राज।

    उस रात खाने पर दादाजी ने कहा था-'राज बेटा, उस दिन भी दीवाली ही थी। घर में ख़ुशी का माहौल था। अभी लक्ष्मी-पूजा शुरू ही की थी कि पुलिस आ पहुंची थी मनोहर लाल को पकड़ने। और हमारी दीवाली, अमावस में बदल गयी थी। साहबज़ादे के क्रांतिकारी कारनामों से तंग आ गया था सारा घर।'

    लेकिन पिता-पुत्र के संबंधों के कारण तीसरी पीढ़ी क्यों यातना भोगे? क्या दादाजी को मुझसे अधिक प्यार नहीं होना चाहिए था? पापा के हिस्से का प्यार क्या उसके हिस्से में नहीं पड़ना चाहिए था?

    आखिरकार राज ने श्मशान घाट चलने का फैसला किया। कपड़े-वपड़े पहनकर जैसे ही कलाई में बांधने को घड़ी उठायी कि फिर दादाजी याद आ गये। एक बार उन्होंने कहा था-'राज तुम दसवीं पास कर लो. तुम्हें एक घड़ी ले दूंगा. अब तुम घड़ी पहनने लायक हो गये हो।'

    दसवीं तो हो गयी पर घड़ी? उसे न आना था, न आयी. वह दादाजी व पापा के संबंधों की भेंट चढ ग़यी। फिर घड़ी क़ी ओर देखा। फिर दादाजी की याद आयी।  घड़ी, घड़ी, दादाजी!

    रसोई का सामान ठीक से रखा। मैला कपडा लेकर साइकल को साफ करने लगा। लेकिन हर चीज़ कहीं-न-कहीं दादाजी से जुड़ जाती थी। मसलन, 'राज, तुम्हारे पास साइकल नहीं है न। हायर सैकेण्डरी पास कर लो एक नयी साइकल ले दूंगा।'

    बाल-सुलभ मन में फिर एक नया उत्साह। हायर सेकेण्डरी में अच्छे रिजल्ट के लिए दो गुनी मेहनत। रिजल्ट निकला और फर्स्ट डिविजन की खबर वाला समाचार-पत्र लेकर वह दादाजी के घर पर। पीठ ठोंकी, अच्छे रिज़ल्ट के लिए शाबाशी दी, किंतु साइकल? वह भी घड़ी क़े पास पहुंच गयी थी!

    पापा ने रूआंसा चेहरा देखा. बात समझ में आ गयी। एक नयी साइकल राज को मिल गयी। दादाजी का चेहरा थोड़ा धुंधला हो गया. पापा का चेहरा साफ़ दिखायी देने लगा।

    राज श्मशानघाट पहुंचा। अभी दादाजी वहां नहीं पहुंचे थे। इधर-उधर कई मुर्दे जल रहे थे। चारों ओर मृतात्मा के लिए रोते, दुःखी होते संबंधी-मरे हुओं का टैक्स वसूलते पंडे। एक चिता की लकड़ी थोड़ी ग़ीली थी, अतः धुआं उठ रहा था और लाश जलने में कठिनाई हो रही थी। ठीक तभी - दादाजी चार कंधों पर सवार हुए वहां पहुंचे। पापा! इनको क्या हुआ? सिर मुंड़ा हुआ, धोती शरीर पर लपेटे, हाथ में कमंडल - जल से भरा. दोनों चाचा के सिर देखें वहां बाल मौजूद थे। फिर पापा!

    सब रो रहे थे। चिता सजाई जा रही थी। सबकी आंखें नम। राज दादाजी की ओर देख रहा था। अपनी घड़ी और साइकल के बारे में पूछ रहा था। उसके मन से एक ही आवाज़ उठ रही थी, दादा जी आप कैसे मर सकते हैं? आप तो मेरे देनदार हैं। आप नहीं मर सकते!

    पापा ने चिता का चक्कर लगाया और चिता को अग्नि दी। अब दादाजी से कभी मुलाक़ात नहीं हो पायेगी। क्या राज की सारी निराशाएं भी चिता के साथ ही जल जायेंगी? शोले ऊपर उठने लगे। एकाएक राज को लगा कि चिता में से एक साइकल निकली और शोलों के ऊपर स्थिर हो गयी। कुछ ही क्षणों में साइकल का एक पहिया घड़ी बन गया और दूसरा पहिया पापा का मुंड़ा हुआ सिर और दोनों पहिये घूमने लगे। घड़ी मुंड़ा हुआ सिर, साइकल !

राज से देखा नहीं गया. उसने मुंह फिर लिया।

 

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कविता

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1.  चूँ चूँ मियां लाल बन्दर

समझें खुद को बड़ा सिकन्दर

जा डाली पर उलटे लटके

देते फूल फलों को झटके

डाली से गिरा जब एक आम

चूँ चूं मियां संग धड़ाम।

 शैल अग्रवाल

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2. बंदर ने एक पैंट सिलाई

अच्छी सी जैकेट मंगवाई

फिटिंग पूंछ की सही ना आए

दरजी की आफत है आई।

शैल अग्रवाल

 

प्रेरक प्रसंग

elephant!!! गुरुजी ने शिष्यों से पूछा, बताओ बच्चों, हाथी कैसा होता है और यही नही उन्होंने एक हाथी भी मंगवा दिया, जिससे कि बच्चे उसे अच्छी तरह से देख सकें और जान सकें कि हाथी कैसा होता है। छोटे छोटे बच्चे और बड़ा सा हाथी , जिन बच्चों के हाथ उसके पैर तक पहुंचे उन्होंने लिखा खंबे की तरह होता है, जिनके कान पर थे उन्होंने बताया कि हाथी सूप की तरह होता है और जिनके हाथ पूँछ आई उन्होंने बताया हवा करने वाले चंवर जैसा। यही नही जो उसकी पीठ पर जा बैठे थे वे कहरहे थे कि एकदम काले-काले बादलों जैसा। सभी अपनी-अपनी जगह पर सही थे, फिर भी गलत थे, क्योंकि हाथी के पैर खम्बे जैसे थे पर हाथी नही था, उसके कान सूप जैसे थे, वह नही था, वगैरह वगैरह--- । किसी भी बात को हम उसके संदर्भ से निकालकर सुनें या बताएं तो वह सच नहीं आधा सच रह जाती है और गलत संकेत देती है। अगर उन्होंने थोड़ा पीछे हटकर पूरा हाथी देखा होता,  तो वे आराम से ठीक ठीक बता सकते थे कि वाकई में हाथी कैसा होता है --यदि हम किसी भी चीज को सही या सच में जानना चाहते हैं तो हमें झट से आधी अधूरी जानकारी पर ही निर्णय नही ले लेना चाहिए, और ना ही सुनी-सुनाई बात पर आँख बन्द करके विश्वास करना चाहिए, जबतक पूरी बात खुद नहीं देखें और समझेंगे, सच को कैसे जान पाएंगे ! 

शैल अग्रवाल

 

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Shail Agrawal.

 

 

Like life and its driving forces, truth can also differ many a shade for different people, knowledge---a realisation---an undying quench---a vibrant imagination-- what is truth, apart from an obvious object or occurrence in front of our very own eyes? It is always difficult to fathom it out because of its multi faced nature. Let’s say, there are two kinds of truth; universal and individual. It is easy to realise or grasp universal and scientifically proven truth, but not the other kind because human mind and heart are two most complex organs God has created, and to revel its mysteries, like God itself; is a monmouth task and even a life time is too little for it. Probably one can understand the futility of it all---this restless on going march of hope and despair better through the extract of this poem by Amrita Pritam: 

''Who will ever stitch a torn phulkari of light?
In the niche of the sky the sun lights a lamp.
But who will ever light a lamp
on the parapet of my heart?''
  One may not always be able to stare straight into its eyes, but truth shadows every moment of our life to enlighten the darkest corner of our heart and mind. Love it or loath it: It will keeps on reincarnating itself. To kindle our knowledge and spirit we have to be at peace with it; make it our friend and guide, otherwise its powerful murmurs will keep on spinning us like this Unending ' Enigma of Creation'

:"Let us admit that you have solved the enigma
of Creation.
But what is your destiny?
Let us admit that you have stripped Truth
of all its vestments.
But what is your destiny?
Let us admit you have lived one hundred happy years
and there are one hundred more ahead of you.
But what is your destiny?"

-Omar Khayyam

 

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 Favourites Forever

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The Road Not Taken

Two roads diverged in a yellow wood,

And sorry I could not travel both

And be one traveller, long I stood

And looked down one as far as I could

To where it bent in the undergrowth;

 

Then took the other, as just as fair,

And having perhaps the better claim

Because lt was grassy and wanted wear;

Though as for that the passing there

Had worn them really about the same,

 

And both that morning equally lay

In leaves no step had trodden black,

Oh, I kept the first for another day!

Yet knowing how way leads on to way;

I doubted if I should ever come back.

 

I shall be telling this with a sigh

Somewhere ages and ages hence

Two roads diverged in a wood, and I--

I took the one less travelled by,

And that has made all the difference.

Robert Frost

 

 

 

 

 

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He Wishes For Clothes Of heaven 

 

 

 

Had I the heaven's embroidered clothes,

 

Enwrrought with golden and silver light,

 

The blue and the dim and the dark cloths

 

Of night and light and the half light,

 

I would spread the cloths under your feet:

 

But I, being poor, have only my dreams;

 

I have spread my dreams under your feet;

 

Tread softly because you tread on my dreams.

 

W. B. Yeats

 

 

 

 

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Here and Now

 

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The waiting game

 

 

All empty

Pockets peeled

Turned inside out

Rinsed and dried

To be pegged in a line

Once a coveted thought

Now just a small seed

On an open palm

Hurriedly dug and buried

Deep again

in the darkest  soil

To culminate--------------

Covered and forgotten

Exactly how 

It all once began!

 

Shail Agrawal

 

 

 

 

                                                            

 

 

 

Truth

 

No, truth is not what

We often hear and say

But something-----

 

much more deep-rooted

pragmatic and poignant

hidden deep inside

 

It starts to rule and controls us

colours our dreams and ambition

Becomes the anchor of our life.

 

A silent glance, a casual word

a single action a chance meeting

Which we pursue and admire

 

No truth is not

What we often

hear and say

 

It is that obstinate passion

which strings our soul

And governs our life!

 

Shail Agrawal

 

 

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Story (Classic)

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The Bull

by; Saki.

Tom Yorkfield has always regarded his half brother, Laurence with a lazy dislike, tonned down as years went on, to a tolerant feeling of indifference. There was nothing very tangible to dislike him for; he was just a blood relation, with whom Tom had no single taste or interest in common, and with whom, at the same time, he had had no occassion to quarrel. Laurence had left the farm early in the life, and had lived for a few years on a small sum of money left to him by his mother; he had taken up painting as a proffession, and was reported doing fairly well at it, well enough, at any rate, to keep body and soul together. He specialised in painting animals, and he was successful in finding a certain number of people to buy his picures. Tom felt a comforting sense of assured supriority in contrasting his position with that of his half brother; Laurence was an artist chap, just that and nothing more, though you might make it sound more important by calling him an animal painter; Tom was a farmer, not in a very big way, it was true, but the Hrlsery Farm had been in the family for some generations, and it had a good reputation for the stock raised on it. Tom has done his best, with the little capital at his command, to maintain and improve the standard of his small herd of cattle, and in Clover Fairy he had breed a bull which was something rather better than any that his immediate neighbours could show. It would not have made a sensation in the judging-ring at an important cattle show, but it was as vigorous, shapely, and healthy a young animalas any small practical farmer could wish to possess. At the King's Head on market days Clover Fairy was very brightly spoken of, and Yorkfield used to declare that he would not part with him for a hundred pounds; a hundred pounds is a lot of money in the small farming line, and probably anything over eighty would have tempted him.

It was with some especial pleasure that Tom took advantage of one of Laurence's rare visits to the farm to lead him down to the enclosure, where Clover Fairy kept solitary state-the grass widower of a grazing harem. Tom felt some of his old dislike for his half-brother reviving; the artist was becoming more languid in his manner, more unsuitably turned out in attire, and he seemed inclined to impart a slightly patronising tone to his conversation. He took no heed of a flourishing potatoe crop, but waxed enthusastic over a clump of yellow flowering weed that stood in a corner by a gateway, which was rather galling to the owner of a really very well weeded farm; again, when he might have been duly complimentary about a group of fat, black-faced lambs, that simply cried aloud for admiration , he became eloquent over the foilage tints of an oak copse on the hill opposite. But now he was being taken to inspect the crowning pride and glory of Helsery; however grudging he might be in his praises, however backward and niggardly with his congratulations, he would have to see and acknowledge the many excellencies of that redoubtable animal. Some weeks ago , while on a business journet to Taunton, Tom had been invited by his half brother to visit a studio in their town, where Lawrence was exhibiting one pf his pictures, a large canvas representing a bull standing knee-deep in some marshy ground; jt had been good of its kind, no doubt , and Lawrence had screened inordinately pleased with it; ' the best thing I have done yet,' he had said over and over again, and Tom had generosity adreed that it was fairly life-like. Now the man of pigments was going to be shown a real picture, a living model of strength and comeliness, a thing to feast eye on, a picture that exhibited new pose and action with every shifting minute, instead of standing glued into one unvarying attitude between the four walls of a frame. Tom unfastened a stout wooden door and led the way into a straw-bedded yard.

' Is he qutet?' asked the artist, as a young bull with a curly red coat came inquiringly towards them.

' He is playful at times,' said Tom, leaving his half brother to wander whether bull's idea of play were of the catch-as-catch-can order.Laurence made one or two perfunctory comments on the animals appearance and asked a question or so as to his ageand such-like details; then he coolly turned the talk into another channel. 

' Do you remember the picture I showed you at Taunton?' he asked.

' Yes,'  grunted Tom; ' a white-faced bull standing in some slush. Don't admire those herefords much myself; bulky-looking brutes, don't seem to have much life in them. Daresay they're easier to paint that way; now this young bugger is on the move all the time, are'nt you Fairy?'

'I've sold that picture,'  said Laurence, with considerable complacency jn his voice.

'Have you?' said Tom; ' glad to hear it, I'm sure. Hope you're pleased with what you've got for it.'  

'I got three hundred pounds for it,' said Lawrence.

Tom turned towards him with a slowly rising flush of anger in his face. Three hundred pounds! under the most favourable market conditionsthat he could imagine his prized Clover Fairy would hardly fetch a hundred, yet here was a piece of varnished canvas, painted by his half brother, selling for three times that sum. It was a cruel insult that went home with all the more force because it emphasized the triumph of the patronizing self satisfied Laurence.The young farmer had meant to put his relative just a little out of conceit with himself by displayingthe jewel of his possessions, and now the tables were turned, and his valued beast was made to look cheap and insignificant, beside the price paid for a mere picture. It was so monstrously unjust; the painting would never be anything more than dexterous piece of counterfeit life, while Clover Fairy was a real thing, a monarch in his little world, a personality in the countryside. After he was dead, even, he would still be something of a personality; his descendents would graze in those valley meadows and hillside pastures, they would fill stall and byre and milking shed, their good red coat would speckle the landscape and crowd the market-place; men would note a promising heifer or a well proportioned steer, and say: 'Ah, that one comes of good old Clover Fairy's stock. all that time the picture would be hanging , lifeless and unchanging, beneath its dust and varnish, a chattel that ceased to mean anything if you chose to turn it with its back to the wall. These thoughts chased themselves angrily through Tom Yorkfield's mind, but he could not put them into words. When he gave toungue to his feelings he put matters bluntly and harshly.

' Some soft witted fools may like to throw away there hundred pounds on a bit of paintwork; can't say as I envy them, their taste. I'd rather have the real thing than a picture of it.' 

He nodded towards the young bull, that was alternately staring at them with nose held high and lowering its horns with a half-playful, half-impatient shake of the head.

Laurence laughed a laugh of irritating, indulgent amusement.

'I don't think the purchaser of my bit of paintwork, as you call it, need worry about having thrown his money away. As I get to be better known and recognised my pictures will go up in value. that particular one will probably fetch four hundred in a sale-room five pr six year hence; pictures aren't a bad investment if you know enough to pick out the work of the right men. Now you can't say your precious bull is going to get more valueable the longer you keep him; he'll have his little day, and then, if you go on keeping him, he w'll come down at last to a few shillings worth of hoofs and hide, just at a time, perhaps, when my bull is being bought for a big sum for some important picture gallery.'

It was too much. The united force of truth and slander and insult put over heavy a strain on Tom Yorkfield's powers of restraint. In his right hand he held a useful oak cudgel, with his left he made a grab at the loose collar of Lawrence's canary-coloured silk shirt. Lawrence was not a fighting man; the fear of physical violance threw him of his balance as completely as overmastering indignation had thrown Tom of his, and thus it came to pass that Clover Fairy was regaled with the unprecedented sight of a human being scudding and squaking across the enclosure, like the hen that would persist in trying to establish a nesting-place in the manger. In another crowded happy moment the bull was trying to jerk Lawrence over his left shoulder, to prod him in the ribs while still in the air, and so kneel on him when he reaches the ground. It was only the vigorous intervention of Tom that induced him to relinquish the last item of his programme.

Tom devotedly and ungrudgingly nursed his half brother to a complete recovery from his injuries, which consisted of nothing more serious of nothing more serious than a dislocated shoulder, a broken rib or two, and a little nervous prostation. after all, there was no further occassion for rancour in the yong farmer's mind; Lawrence's bull might sell for three hundred, or for six hundred, and be admired by thousands in some big picture gallary, but it would never toss a man over one shoulder and catch him in jab in the ribs before he had fallen on the other side. That was Clover fairy's noteworthy achievement , which could never be taken away from him.

Lawrence continues to be popular as an animal artist, but his subjects are always kittens, or fawns or lambkins-never bulls.     

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