सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

 Lekhni-Blooming in May.

 

 

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सु-मन समारोह

 

 



 

 

(सर्वाधिकार सुरक्षित) copyrights to writers and publisher only

संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल. 


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      अपनी बात

 

क्या कभी सोचा है आपने कि फूलों का एक पर्यायवाची सुमन (सु-मन) भी क्यों है---शायद इसलिए कि कांटों पर भी मुस्कुराते रहते हैं ये---अपने रूप-रंग और गन्ध से पूरा वातावरण ही सजा संवार देते हैं, बिना जाने या भेद-भाव किए कि राजमहल में खिले हैं या जंगल में --- क्योंकि खुशबू और सौंदर्य दोनों ही नैसर्गिक या स्वभावगत् हैं इनके--- अब ऐसे उदार मानस को सु-मन नही तो क्या कहेंगे हम !

प्रकृति और पुरुष का संबन्ध अनादि काल से ही रहा है--- चाहे वह प्रभात की पहली किरण हो या सावन की पहली फुहार, अगर धरती जगती-संवरती है तो उसपर रचे-बसे प्राणी भी । मौसम अच्छा हो तो, ' मन-मयूर नाच उठा ' किसने नही कहा, और यही मौसम अगर बोझिल और ऊदा-ऊदा हो जाए तो आँखें तक सावन भादों हो जाती हैं, हम सभी जानते हैं यह !  

शायद यही वजह है कि अधिकांशत: ठंड और अंधेरे से भरे ब्रिटेन ही क्या, पूरे यूरोप में ही गरमी का मौसम एक त्योहार की तरह मनाया जाता है---रंग-रूप और उल्लास से महकता और गमकता। यह मौसम बच्चे बूढ़े जवान सभी के मन में एक नयी उमंग भर देता है। धरती दुल्हन सी संवर जाती है। सूरज की सुनहरी किरनों में नहाए डैफोडिल्स, क्रोकस, बिजी-लिजी और फ्यूशिया व फौरगेट मी नौट जैसे फूलों से भरी क्यारियां बगीचों को ही नहीं, हर उदास और खिन्न मन तक को लहलहा देती हैं और तरह तरह के फूलों की खुशबू हवा के हर झोंके के साथ आंखों में ही नहीं, आत्मा तक पैठ जाती है। ये वो खुशनुमा महीने हैं जब  आदमी ही नहीं, आकाश तक कुछ और ही ज्यादा साफ और नीला दिखता है यहां पर--- और समन्दर तो उससे भी ज्यादा गहरा नीला----स्पष्ट और पारदर्शीं ----बिल्कुल ही यहां की बिल्हौरी आंखों की तरह ।

बसंत के आगमन के साथ साथ, जब हर कोपल, हर किसलय, ज़जबातों और यादें की सुरभित मलय लिए इन्द्रधनुषी धनक दे रही है--चारो तरफ सु-मन ही सुमन खिल आए हैं, तो आइये हम आप भी अपनी ' लेखनी ' के साथ  भरपूर स्वागत करते हैं इस हरियाली---इस उत्साह और उल्लास का ! 

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1 मई

(अंत्तर्राष्ट्रीय श्रम दिवस पर विशेष)

हजार कांटों के बाबजूद भी 

गुलाब आज भी हमारे हृदय के करीब है।

फूलों में इसका अलग और अप्रतिम स्थान है।

प्रस्तुत है सभी के प्रिय पुष्प गुलाब पर

एक अनूठा दृष्टिकोण और आरोप--

युग कवि निराला जी की

(बहु चर्चित कविता कुकुर्मुत्ता का एक अंश)

 

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अबे सुन बे गुलाब !

भूल मत गर पाई खुशबू रंगोआब,

खून चूसा तूने खाद का अशिष्ट,

डाल पर इतरा रहा कैपिटलिस्ट,

कितनों को तूने बनाया है गुलाम,

माली कर रखा, सहाया जाड़ा घाम।

शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा,

इसीलिए साधारणों से रहा न्यारा।।  

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

 

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रचना और रचनाकार

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शैल अग्रवाल

 

कलाकार से अक्सर ही एक सवाल पूछा जाता है, ' क्यों लिखते हो, क्यों सृजन करते हो, तुम्हारा दृष्टिकोण क्या है--ध्येय क्या है आदि आदि---? ' और अक्सर ही खुद की पड़ताल करता  वह उलझन में पड़ जाता है क्योंकि अक्सर ही उसे खुद भी पता नही होता कि वह सृजन क्यों कर रहा है? अब आलोचक चाहे जैसे भी परखे, पल-पल साथ निभाती यह सृजन वेदना  उसके लिए मात्र सुन्दर ही नहीं, एक शगल और मनोरंजन ही नही, शिव और सच भी बन चुकी होती है---वैसे भी कोई लड़ाई तभी तो लड़ी जाती है, जब कुछ बचाने या बदलने की चाह और जरूरत हो।  लगन की यह तीव्रता या अनिवार्यता बाध्य करती है उसे कि बाहरी परिस्थितियों और दबाव के रहते भी वह अंतर्मन को सुने और कुछ सकारात्मक करे। यही उर्जा और बेचैनी, पल पल उसे संरक्षण या शिव की तरफ ही तो खींचती है--- संरचना और संरक्षण: यही तो सृष्टि की अनिवार्यता हैं । ये वे पल हैं जब दर्द ही उसकी दवा है (गालिब)।  और यही वजह है कि अक्सर कुरूप से कुरूप और दुरूह पल में भी वह प्रकृति का सारा सौंदर्य अपनी कृति में समेट पाता है,या समेटने की सामर्थ रखता है। 

सृजन करना और बस करते ही जाना, यही उसकी आदत--- सांसों-सी एक जरूरत बन चुकी होती है उसके अंत्तर्मन का यह एकांत ही उसकी सारी सृष्टि है---पूजा-स्थली है , यहीं बैठकर तो वह खुदको अपने और रचयिता के करीब पाता है और जमाने की छान-बीन और सीख , उसकी सोच को सुलझाने के बजाय, अक्सर ही, कुछ और ही उलझा कर रख देती है। उसके मन की तहों में रोपित विचार भी तो खुद ही जनमते हैं और खुद ही पल्लवित भी होते है; जब भी वह इस नैसर्गिक प्रक्रिया को रोककर  नियम और तौर तरीकों का अनुसरण करने बैठा , तो सृजन का वह पल कहीं पीछे छूट गया और मलय सी चंचल वह खुशबू  तुरंत ही तिरोहित भी हो गई और जांच पड़ताल के बोझ तले दबी बीज-रूपी कृति जाने किन अंधेरों में जा झुपी।  

'धोया निचोड़ा और सुखाया

फिर मन के किसी अंधेरे कोने में

उगने को मैं छोड़ आया

हाँ, यही तो लिखा था

बारबार ही पढ़ा था

हरे भरे बगीचे

जीने के सौ तरीके

नाम की उस किताब में---- '

 जो बाहर से परख और निरख रहा है ---निर्णय ले रहा है वह आलोचक या पाठक है, स्वयं कलाकार नही। पाठक या आलोचक के लिए एक दृष्टिकोण--एक नीति जरूरी है , क्योंकि उसे एक लाइन खींचनी होती है , एक आलोचनात्मक परख नीति अपनानी पड़ती है, जहां से खड़े होकर वह देखता है कि कृति रेखा के नीचे है या ऊपर--या फिर किस दायरे में आएगी---पर इस उद्देश्य या नीति के भी तो कई-कई दृष्टिकोण हो सकते हैं; जैसे कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक वगैरह,वगैरह। कलाकार के बस की यह बातें नहीं--क्योंकि सृजन और सृजन ही उसका उद्देश्य भी है और दृष्टिकोण भी--- समय के उस बिन्दु में वह तो पूरी तरह से बस सृजन प्रक्रिया में ही डूबा होता है---इसके आगे पीछे देखने की न उसे फुरसत है और ना ही सुध। 

वैसे भी कलाकार अधिकांशत: अपनी परिस्थितियों का ही तो परिणाम होता है , परिस्थितियां---जिन्हे बदलने या सुधारने की चाह उसे बेचैन कर रही होती हैं। उसकी कला उसके आस-पास व्याप्त इसी संघर्ष का ही फल है । कलाकार के अंतस को आसानी से संतुष्ट होना या संतुलित होना नहीं आ पाता क्योंकि सोच और चाह की धधकती चिनगारियां उसे स्थिर नहीं रहने दे सकतीं। यह अस्थिरता और बेचैनी कुछ और नही , बस बाहर से घेरती समस्याओं का एक आन्तरिक प्रतिबिम्ब है---- इसी से बचने के लिए तो कभी वह पलायन वादी सृजन करता है --- कोलाहल की अवनी छोड़ निर्जन में जाना चाहता है, जहां सागर की लहरियां तक निश्छल प्रेम कथा सुना रही हों, (जयशंकर प्रसाद --कविता--ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे धीरे), तो कभी असंतुष्ट होकर ललकारता है--खुद को भी और अपनी परिस्थियों को भी। और कभी-कभी तो शिव मंगल सिंह सुमन की तरह यह तक कहने की हिम्मत रखता है कि ' तूफानों की ओर घुमा दे माझी तू निज पतवार, आज हृदय और सिन्धु में साथ उठा है ज्वार।' --क्योंकि इसी हलचल और कोलाहल से उबरना और उबारना यही और मात्र यही वह चाहता है।

जब साहित्य या कला  प्राय: इसी मौलिक संघर्ष का नतीजा हैं--- अंतस् और बाह्य का सामंजस्य, एक अनवरत् तलाश हैं, तो अधिकांशत: इसी संघर्ष या खोज में उलझा भी रह जाता है वह। वेद कुरान और गीता रामायण से लेकर आजतक की हर छोटी बड़ी कृति उसके इसी मन्थन का सार हैं । हाँ कुछ शान्त और संतुष्ट पल जरूर अपवाद की तरह उसके जीवन में आते हैं, जिन्हे अपने उलझे वक्त से चुराकर  कलाकार स्वान्त: सुखाय सृजन करता है ,अपनी उर्जा को समेटनता है,खुद को समझाता-सुलझाता और स्थिर करता है--परन्तु उसकी वह संपूर्णत्व की खोज तो जारी ही रहती है पानी के अन्दर पैठकर भी और किनारे पर बैठकर भी। 

मुख्यत: कुछ बदलना, कुछ बांटना, कुछ सीखना और कुछ सिखाना---यानी कि परिवर्तन या क्रान्ति, इसी जुझारु सोच का नाम साहित्य और कला है। जब कला जीवन और प्रकृति दोनों के ही संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है और फल भी तो इसकी साधना-रत कलाकार कैसे चुप बैठ सकता है ? वह अनिवार्य रूप से गतिमान है। यह तनाव  उसे चाहकर भी स्थिर नही होने देगा। इसी दबाव के नीचे, सामंजस्य ढूँढता ही तो वह कल्पना लोक में आ छुपा है। उसकी यह गति उसे आगे की ओर ले जा रही है या पीछे की ओर यह वह नही जानता। वह तो बस इस गति की गूंज अनुगूंज को पकड़ने में---समझने में ही लगा हुआ है। निर्णय लेने का काम--- प्रगति, अधोगति या प्रतिगति की जांच, यह सब काम आलोचक और पाठक के हैं । सृजन बिन्दु पर बैठा वह कलाकार पूरे विवेक के होते हुए भी दोनों काम निष्पक्षता से नहीं कर सकता , फिर उससे यह पूछना कि तू सृजन क्यों करता है, बिल्कुल वैसा ही होगा जैसे कि मझली से पूछा जाए कि वह हमेशा  पानी में ही क्यों रहती है---या फिर तैरने या डूबने से पहले उसने पानी की थाह ली भी थी या नही... !  

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 कविता (धरोहर)  

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आज प्रथम गाई पिक पंचम।

गूंजा है मरु विपिन मनोरम।

 

मस्त प्रवाह कुसुम तरु फूले,

बौर-बौर पर भौंरे झूले,

पात-पात के प्रमुदित मेले,

छाय सुरभी चतुर्दिक उत्तम।

 

आँखों से बरसे ज्योति-कण,

परसे उन्मन-उन्मन उपवन,

खुला धरा का पराकृष्ट तन,

फूटा ज्ञान गीतमय सत्तम।

 

प्रथम वर्ष की पांख खुली है,

शाख-शाख-किसलयों तुली है,

एक और माधुरी घुली है,

गीतों-गन्ध-रस वर्णों अनुपम।

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सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला '

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 कविता आज और अभी

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गुलमोहर

खिड़की के नीचे से प्यार गुनगुनाता है

गुच्छा गुलमोहर का हाथ यों हिलाता है

अभी नहीं, अभी नहीं

कल आएँगे गांव तुम्हारे।

 

मरमरी उंगलियों में मूंगियां हथेली

चितवन की चौपड़ पर प्यार की पहेली

रुको नहीं, रुको नहीं

चित आएँगे

दांव तुम्हारे।

 

लेती मद्धम हिंडोल सपनों से भरी नाव

नीम तलक जा पहुंचा महुए का एक गाँव

यहाँ नहीं, यहाँ नहीं

कहीं और देखे थे

पाँव तुम्हारे।

 

मन में लहराते हैं रंगे रेशमी रूमाल

वृक्षों पर आवारा कोयल गाती धमाल

कहाँ गयी, कहाँ गयी

चौबारे बसती थी

छाँव तुम्हारे।

 

वक्त के सिराहने यों एक बात उग आयी

सुबह- सुबह लिखवायी पाती में पठवायी

आज नहीं. आज नहीं

कल आएंगी

नाम तुम्हारे।

 

पूर्णिमा बर्मन

 

 

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           बसंत आया !

कोयल फिर कुहकी

भंवरे फिर बहके

गेहूँ की बाली पर

सरसों के झुमके

 

रंगों की रंगोली से

फागुन की ठिठोली से

तारों की चोली से

किसने है मन भरमाया

            बसंत आया!

     

फिर चली

मदमस्त पुरवाई

मदिर मलय वो

संदेशे ले आई

 

पीहु कहां, पीहु कहां

रूखे तन, सूखे मन

पुलक-पुलक बूटे से फूटे

धरती ने क्यों यह

रूप सजाया

     बसंत आया!

 

धूप छाँव

रुनझुन पायल

धरती-तन

हरियाला आंचल

 

तारों की छांव में

खुशियों के गांव में

कौन यह नई नवेली

दुल्हन ले आया

       बसंत आया!

 

कली-कली

डाल-डाल

सज आईं गोपिकाएँ

झूम उठे पात पात

 

बन उपवन

कान्हा बन

किसने फिर यह

रास रचाया

   बसंत आया! 

शैल अग्रवाल

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कहानी (धरोहर)

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घीसू

:जयशंकर प्रसाद 

संध्या की कालिमा और निर्जनता  में किसी कुँए पर नगर के बाहर खड़ी प्यारी स्वर लहरी गूंजने लगती। घीसू को गाने का चस्का था, परन्तु जब कोई न सुने? वह अपनी बूटी अपने लिए घोटता और आप ही पीता।

जब उसकी रसीली तान दो चार को पास बुला लेती, वह चुप हो जाता। अपनी बटुई में सब सामान बटोरने लगता और चल देता। कोई नया कुँआ खोजता, कुछ दिन वहां अड्डा जमाता।

सब करने पर भी वह नौ बजे नन्दू बाबू के कमरे में पहुंच ही जाता। नन्दू बाबू का भी यही समय था बीन लेकर बैठने का। घीसू को देखते ही वह कह देते 'आ गए घीसू। '

' हाँ बाबू, गहरे बाजों ने बड़ी धूल उड़ाई, साफे का लोच आते आते बिगड़ गया। ' कहते-कहते वह प्राय: अपने जयपुरी गमझे को बड़ी मीठी आँखों से देखता और नन्दू बाबू उसके कन्धे तक बाल,छोटी छोटी दाढ़ी, बड़ी बड़ी आँखों को स्नेह से देखते। घीसू उनका नित्य दर्शन करने वाला, उनकी बीन सुनने वाला भक्त था। नन्दू बाबू अपने डिब्बे से दो खिल्ली पान की देते हुए कहते,. '' लो , इसे जमा लो ! क्यों, तुम तो इसे जमा लेना ही कहते हो न?''

वह विनम्र भाव से पान लेते हुए हंस देता---उसके स्वच्छ मोती से दांत हंसने लगते।

घीसू की अवस्था पच्चीस की होगी। उसकी बूढ़ी माता को मरे तीन वर्ष हो गए थे।

नन्द बाबू की बीन सुनकर वह बाजार से कचौड़ी और दूध लेता, घर आता, अपनी कोठरी में गुनगुनाता हुआ सो रहता।

उसकी पूँजी थी एक सौ रुपए। वह रेजगारी और पैसे की थैली लेकर दशाश्वमेध पर बैठता, एक पैसा रुपया बट्टा लिया करता और उसे बारह चौदह आने की बजत हो जाती थी।

गोविन्दराम जब बूटी बनाकर उसे बुलाते, वह अस्वीकार करता। गोविन्दराम कहते, ' बड़ा कन्जूस है। सोचता है पिलाना पड़ेगा, इसी डर से नहीं पीता।' 

घीसू कहता, ' नहीं भाई, मैं संध्या को केवल एक बार पीता हूँ'। '

गोविन्दराम के घाट पर बिन्दो नहाने आती, दस बजे। उसकी उजली धोती में गोराई फूटी पड़ती। कभी रेज़गारी पैसे लेने के लिए वह घीसू के सामने आकर खड़ी हो जाती, उस दिन घीसू को असीम आनन्द होता। वह कहती, ' देखो, घिसे पैसे न देना।' 

' वाह बिन्दो ! घिसे पैसे तुम्हारे लिए ही हैं ? क्यों ?'

' तुम तो घीसू ही हो, फिर तुम्हारे पैसे क्यों न घिसे होंगे ? ' कहकर जब वह मुस्कुरा देती तो घीसू कहता,' बिन्दो ! इस दुनिया में मुझसे अधिक कोई न घिसा; इसीलिए तो मां बाप ने घीसू नाम रखा था। '

बिन्दो की हंसी आँखों में लोट जाती। वह एक दबी हुई साँस लेकर दशाश्वमेध के तरकारी बाजार में चली जाती।

बिन्दो नित्य रुपया नहीं तुड़ाती, इसलिए घीसू को उसकी बातों के सुनने का आनन्द  भी किसी-किसी दिन मिलता। तो भी वह एक नशा था, जिससे कई दिनों के लिए भरपूर तृप्ति हो जाती, वह मूक मानसिक विनोद था।

घीसू नगर के बाहर गोधूलि की हरी-भरी क्षितिज रेखा में उसके सौदर्य में रंग भरता, गाता, गुनगुनाता, और आनन्द लेता। घीसू की जीवन-यात्रा का यही सम्बल था, यही पाथेय था।

संध्या की शून्यता, बूटी की गमक, तानों की रसीली गुनगुनाहट और नन्दू बाबू की बीन---सब बिन्दो की अराधना की सामग्री थी। घीसू कल्पना के सुख में सुखी होकर सो रहता।

उसने कभी विचार भी न किया था कि बिन्दो कौन है ? किसी तरह से उसे इतना विश्वास हो गया था कि वह एक विधवा है; परन्तु इससे अधिक जानने की उसे जैसे आवश्यकता नहीं।

रात के आठ बजे थे, घीसू बाहरी ओर से लौट रहा था। सावन के मेघ घिरे थे, फूही पड़ रही थी। घीसू गा रहा था--' निस दिन बरसत नैन हमारे ।

सड़क पर कीचड़ की कमी न थी। वह धीरे धीरे चल रहा था, गाता जाता था। सहसा वह रुका। एक जगह सड़क में पानी इकठ्ठा था। छींटों से बचने के लिए वह ठिठककर---किधर से चले---सोचने लगा। पास के बग़ीचे के कमरे से उसे सुनाई पड़ा---'' यही तुम्हारा दर्शन है---यहाँ इस मुँहजली को लेकर पड़े हो। मुझसे--- '

दूसरी ओर से कहा गया ' तो इसमें क्या हुआ ! क्या तुम मेरी ब्याही हुई हो, जो मैं तुम्हें इसका जबाव देता फिरूँ ? ' इस शब्द में भर्राहट थी, शराब की बोली थी।

घीसू ने सुना, बिन्दो कह रही थी---''मैं कुछ नहीं हूँ, लेकिन तुम्हारे साथ मैने धरम बिगाड़ा है। सो इसलिए नहीं कि तुम मुझे फटकारते फिरो। मैं इसका गला घोंट दूंगी और तुम्हारा भी---बदमाश---। '

' ओह ! मैं बदमाश हूँ ! मेरा ही खाती है और मुझसे ही---ठहर तो, देखूँ किसके साथ तू यहाँ आई है, जिसके भरोसे इतना बढ़-बढ़कर बातें कर रही है ! पाजी---लुच्ची---भाग, नहीं तो छुरा भोंक दूँगा। '

 ' छुरा भोंकेगा ! मार डाल हत्यारे ! मैं आज अपनी और तेरी जान दूँगी और जान लूँगी---तुझे भी फांसी पर चढ़वाकर छोड़ूँगी। '

एक चिल्लाहट  और धक्कम-धक्का का शब्द हुआ। घीसू से अब न रहा गया, उसने बगल के दरवाजे पर धक्का दिया, खुला हुआ था, भीतर घूम-फिरकर पलक मारते-मारते घीसू कमरे के अन्दर जा पहुँचा। बिन्दो गिरी हुई थी और एक अधेड़ मनुष्य उसका जूड़ा पकड़े था। घीसू की गुलाबी आँखों से खून बरस रहा था। उसने कहा, ' है ! यह औरत है---इसे--- '

मारने वाले ने कहा, 'तभी तो,  इसी के साथ यहाँ तक आयी हो ! लो, यह तुम्हारा यार आ गया। ' 

बिन्दो ने घूमकर देखा---घीसू ! वह रो पड़ी।

अधेड़ ने कहा, ' ले, चली जा, मौज कर ! आज से मुझे अपना मुँह मत दिखाना !'

घीसू ने कहा, ' भाई तुम विचित्र मनुष्य हो। लो चला जाता हूँ। मैने तो छुरा भोंकने इत्यादि और चिल्लाने का शब्द सुना, इधर चला आया। मुझे तुम्हारे झगड़े से क्या सम्बन्ध ! '

अधेड़ ने कहा,' इसे साथ ले जाओ। ' 

' मैं कहाँ ले जाऊँगा भाई ! तुम जानो, तुम्हारा काम जाने। लो, मैं जाता हूँ। '

बि'न्दो ने कहा,' ठहरो ! '

घीसू रुक गया।

बिन्दो ने फिर कहा, ' तो जाती हूँ---अब इसी के संग---। '

'हाँ-हाँ, वह भी क्या अब पूछने की बात है ! '

बिन्दो चली, घीसू भी पीछे-पीछे बगीचे से बाहर निकल आया। सड़क सुनसान थी। दोनों चुपचाप चले। गोदौलिया चौमुहानी पर आकर घीसू ने पूछा ' अब तो तुम अपने घर जाओगी?'

' कहाँ जाऊंगी ! अब तुम्हारे घर चलूँगी। '

घीसू बड़े असमंजस में पड़ा। उसने कहा, ' मेरे घर कहाँ ? नन्दू बाबू की एक कोठरी है, वहीं पड़ा रहता हूँ, तुम्हारे लिए वहाँ रहने की जगह कहाँ !'

बिन्दो ने रो दिया। चादर की छोर से आँसू पोंछती हुई, उसने कहा, ' तो फिर तुमको इस समय वहाँ पहुँचने की क्या पड़ी थी। मैं जैसा होता भुगत लेती ! तुमने वहाँ पहुंचकर मेरा सब चौपट कर दिया---मैं कहीं की न रही ! '

सडक पर बिजली के उजाले में रोती हुई बिन्दो से बात करने में घीसू का दम घुटने लगा। उसने कहा,' तो चलो। '

दूसरे दिन, दोपहर की थैली गोविन्दराम के घाट पर रखकर घीसू चुपचाप बैठा रहा। गोविन्दराम की बूटी बन रही थी। उसने कहा, ' घीसू, आज बूटी लोगे?'

घीसू कुछ न वोला।

गोविन्दराम ने उसका उतरा हुआ मुँह देखकर कहा, ' क्या कहें घीसू ! आज तुम उदास क्यों हो? '

' क्या कहूँ भाई ! कहीं रहने की जगह खोज रहा हूँ ---कोई छोटी-सी कोठरी मिल जाती. जिसमें सामान रखकर ताला लगा दिया करता।'

गोविन्दराम ने पूछा, ' जहाँ रहते थे ?'

' वहाँ अब जगह नहीं है। '

' इसी मढ़ी में क्यों नहीं रहते ! ताला लगा दिया करो, मैं तो चौबीस घंटे रहता नहीं। '

घीसू की आँखों में कृतज्ञता के आँसू भर आए।

गोविन्दराम ने कहा, ' तो उठो, आज तो बूटी छान लो। '

घीसू पैसे की दुकान लगाकर अब भी बैठता है और बिन्दो नित्य गंगा नहाने आती है । वह घीसू की दुकान पर खड़ी होती है, उसे वह चार आने पैसे देता है। अब दोनों हंसते नहीं, मुस्कुराते नहीं।

घीसू का बाहरी ओर जाना छूट गया है। गोविन्दराम की डोंगी पर उस पार हो आता है, लौटते हुए बीच गंगा में उसकी जहरीली तान सुनाई पड़ती है; किन्तु घाट पर आते-आते चुप।

बिन्दो नित्य पैसा लेने आती। न तो कुछ बोलती और न घीसू कुछ कहता। घीसू की बड़ी-बड़ी आँखों के चारों ओर हलके गढ़े पड़ गए थे, बिन्दो उसे स्थिर दृष्टि से देखती और चली जाती। दिन-पर-दिन वह यह भी देखती कि पैसों की ढेरी कम होती जाती है। घीसू का शरीर भी गिरता जा रहा है। फिर भी एक शब्द नहीं। एक बार पूछने का नाम नहीं।

गोविन्दराम ने एक दिन पूछा, ' घीसू, तुम्हारी तान इधर नहीं सुनाई पड़ी?'

उसने कहा, ' तबियत ठीक नहीं है।' 

गोविन्दराम ने उसका हाथ पकड़कर कहा, ' क्या तुम्हे ज्वर आता है ?'

' नहीं तो, आजकल भोजन बनाने में आलस करता हूँ, अण्ड-बण्ड खा लेता हूँ। '

गोविन्दराम ने पूछा, 'बूटी छोड़ दी, इसी से तुम्हारी यह दशा है।'

उस समय घीसू सोच रहा था---नन्दू बाबा की बीन सुने बहुत दिन हुए, वे क्या सोचते होंगे !

 गोविन्दराम के चले जाने के बाद घीसू अपनी कोठरी में लेट रहा। उसे सचमुच ज्वर आ गया।

भीषण ज्वर था, रात भर छटपटाता रहा। बिन्दो समय पर गयी, मढ़ी के चबूतरे पर घीसू की दुकान न थी। वह खड़ी रही। फिर सहसा उसने दरवाजा ढकेल कर भीतर देखा---घीसू छटपटा रहा था। उसने जल पिलाया।

घीसू ने कहा, ' बिन्दो !क्षमा करना; मैने तुम्हे बड़ा दुख दिया। अब मैं चला। लो, यह बचा हुआ पैसा ! तुम जानो भगवान-----' कहते-कहते उसकी आँखें टँग गयीं। 

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