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साहित्य में पर्यावरण की महत्ता

डॉ. विमला उपाध्याय (धनबाद)
डॉ. बो.ड्रूस ने चेतावनी दी है 1990 से 2020 के बीच हर रोज 50 जीव और पादप प्रजातियां समाप्त हो जाएंगी। अगर वनों के कटान और औध्योगिक गैसों से उत्पन्न तापक्रम वृद्धि पर नियंत्रण न हो पाया तो भयंकर परिणाम होंगे।
चेतावनी जो आज सुनाई पड़ती है वह हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले दी थी। उनकी चिंता निसंदेह दूसरे तरह की थीं। वे पृथ्वी को मां मानते हुए उनकी सुरक्षा, उनको संवारने, वर्षा और वन, जीव-जन्तुओं आदि के प्रति वे सदैव प्रस्तुत थे। इसका कारण था इन सबके प्रति इनका आत्मीय रिश्ता। यह संबन्ध प्राचीन ग्रंथों में मंत्र बनकर संचित है।
वृक्षान् छित्वा पशून हत्वा
कृत्वा रुधिर-कर्दनम्
स्वर्ग: चैत गम्यते मर्त्यै:
नरक केन गम्यते?
(पेड़ों को काटकर, जीवों को मारकर उनके रक्त को कीचड़ बनाकर ही यदि स्वर्ग जाया जाता हो, तो फिर नरक को जाने का मार्ग कौन सा है !)
वाल्मीकि वनों को पुत्रवत् मानकर उनकी ऱक्षा को सदैव तत्पर रहते हैं और चेतावनी देते हैं कि जो भी मेरे वन के पत्र अंकुर का विनाश और फल-फूल का अभाव करेंगे, वे निश्चित रूप से शाप के भागी होंगे। ऋग्वेद के पृथ्वी सूक्त में है --' माता भूमि पुत्रोsहम पृथ्व्या ' ' भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूं।'
नदियां हैं माताएं, पर्वत पिता। पर्वत के आश्रय से नदियां निकलती हैं। नदी सदा नीरा है। कामदुधा पिलाती है, पालती है, पोषती है। नदी को मातृत्व यों ही नहीं मिला है, यह गंगा बनकर सगर के साठ हजार पुत्रों को तारती है-
' सगर सुवन सठ सहस
परस जल मात्र उधारिणी '
एक है भौगोलिक गंगा, जो हिमालय से निकलकर अपने आसपास की भूमि व नगरों का सिंचन करती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। एक है सांस्कृतिक गंगा, मानस गंगा, जो श्री विष्णु के श्री नख से द्रवित होकर ब्रह्मा के कमंडल की शोभा बनती है, देवताओं का सर्वस्व, शिव के सिर माला और भगीरथ राजा के पुण्य का फल है।
श्री हरिपद नख चंद्र-
कांतमनि द्रवित सुधारस,
ब्रह्म कमंडल मंडन
भवखंडन सुर सबरस
शिव सिर मालती माल
भगीरथ नृपति पुण्य फल
-सत्य हरिश्चन्द्रः गंगा वर्णन
यह मानवजाति का सांस्कृतिक सिंचन करती हुई शेषशायी विष्णु में समा जाती है। इसलिए गंगा की पवित्रता, मर्यादा की रक्षा के लिए मैथिल कोकिल विध्यापति गंगा में प्रवेश के पूर्व उनसे प्रार्थना करते हैं।
एक अपराध छमव मोर जानी
परसल माय पाय तुम पानी।
पर्यावरण कई तत्वों का संधान है। प्रकृति (पहाड़, नदी, वन, सागर, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, आकाश, ग्रह , नक्षत्र) के साथ है मनुष्य का व्यवहार जगत। कल-कारखाने, उध्योग, प्रतिष्ठान, खनन, कृषि, आवास, नगरीकरण आदि में पर्यावरण की मर्यादा का ध्यान न रखकर मनमानी करना। कल-कारखानों की खतरनाक गैस को हवा में छोड़ना, कूड़ा-कचरा, मलवा बगल में फेंकना या नदी में बहा देना। कुकुरमुत्तों की तरह उगे घरों का बेतरतीब होना। आबादी के रोजगार के लिए वनों की कटाई, मांस भक्षण के लिए जीव-जन्तुओं की हत्या। संचार की जरूरत के मुताविक वाहनों की अधिकता। पेट्रोल, डीजल गैस के कारण वातावरण का दूषित होना। दिल्ली को निकलिए तो आँखें लाल होंगी और जलने लगेंगी, सांस लेने में तकलीफ होगी। इन सबका समाधान है रिट्रीट-प्रकति की ओर लौट चलना। चिड़िया की तरह प्रकृति के साथ तादाम्य , उसके प्रति उत्सुकता, उससे अभिभूत रहना।
प्रथम रश्मि का आना
रागिनी कैसे तूने पहचाना।
कहां कहां हे बाल विहगिनी
पाया तूने यह गाना।।
वृक्ष के पक्षी अचानक कलरव करने लगते हैं। कौन उन्हे बता देता है कि सूर्योदय होने वाला हैः
कूक उठी सहसा तरुवासिनी
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझकोअंतर्यामिनी,
बतलाया उसका आना।
-प्रथम रश्मिः सुमित्रा नन्दन पंत
प्रकृति से हमारा ऐसा रागात्मक संबन्ध होगा, तभी पर्यावरण असंतुलन घटेगा। हमारे आचार्य पंच नदियों में स्नानभले ही न कर पाते हों, पर स्नान के समय पांचों नदियों का श्रद्धास्मरण अवश्य करते रहे हैं।
पर्यावरण शब्द बना है। परि (चारों ओर से, आस-पास, अच्छी या पूरी तरह) आवरण (ढका हुआ अथवा घेरा) सो यह वातावरण के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है यानी हमारी चारों ओर का घेरा, जिससे हम घिरे हुए हैं। धरती के जिस भाग में हम रहते हैं, उसे जीव मंडल कहते हैं। इस जीव मंडल की माप लगभग स्थिर है। यह क्षेत्र धरती के लगभग 16 किलोमीटर की उंचाई तक फैला हुआ है। संपूर्ण पृथ्वी को घेरने वाले इस आवरण का क्षेत्रफल लगभग 45 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इस जीव मंडल में धरती, वायु और जल की समृद्ध संपदा है और ये तीनों ही जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं। इनके बिना कोई जीवधारी जीवित नहीं रह सकता। इसलिए मिट्टी पानी और हवा यही सब रोगों की दवा। इनको अपने अनुकूल बनाना पर्यावरण को अनुकूल बनाना है, जिसका आधार है प्रकृति।
जल है तो जीवन है। जल बरसता है मेघ से। मेघदूतम् (कालीदास) में इसकी संरचना है। धूमज्योतिसलिलमरुता, सन्निपातः क्व मेघः, धूप और जल का संघात है मेघ। कालीदास मेघ को कामनाओं का रूपदाता, प्रकृति पुरुष और निष्पाप कहते हैं। जानामि त्वां प्रकृति पुरुषं कामरूपं मघोनः।
मेघ के जल के कारण ही प्रकृति नाना रूपों में हमें लुभाती है, रमाती है। जल से उपजता है अन्न, जिसे खाकर बनता है , रक्त, वीर्य, जो अजस्र कामनाएं जगाता है। मेघ कहीं ठहरता नहीं है, जो कुछ जल है बरसाता है। किसी से राग-द्वेष नहीं, परहित कारण शरीर ही धारण करता है। अतः है निष्पाप। महादेवी वर्मा ने अपनी तुलना बदली से की हैः
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना।
परिचय मेरा इतिहास यही,
उमड़ी कल थी, मिट आज चली
मैं नीर भरी दुःख की बदली।
मेघ समय पर आए, खुलकर बरसे, इसके लिए पेड़-पौधे लगाना, नदी तालाब, सागर एवं अन्य जलाशयों को संरक्षित रखना, पर्वतों को कांटना- छांटना नहीं, यही अनिवार्यता है। इसीलिए साकेत के नवे सर्ग में मैथलीशरण गुप्त मेघगीत गाते हैं और उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं:
जड़ चेतन में बिजली भर दो
ओ उद्बोधन बरसो।
चिन्मय बने हमारा मृगमय
पुलकांकुर बन बरसो।
मंत्र पढ़ो छींटे जागो
सोए जीवन बरसो।
घट पूरो त्रिभुवन मानस रस
कण-कण, क्षण-क्षण बरसो।
आज भीगते ही घर पहुंचे
जन-जन के जन बरसो।
दरसो परसो घन बरसो।
कवि छतनार बरगद के पेड़ और तुलसी के बिरवे को नई पीढ़ी व चेतना के प्रतीक गुलाब के समकक्ष रखकर नव मूल्यबोध को स्थापित करने की बेचैनी प्रकट करता है।
छोटे से आंगन में, मां ने लगाए हैं,
तुलसी के बिरवे दो
पिता ने उगाया है
बरगद छतनार,
मैं अपना नन्हा गुलाब कहां रोप दूं।
मुठ्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं
वन-वन, पर्वत-पर्वत
रेती-रेती बेकार।
- केदार नाथ सिंहः एक पारिवारिक प्रश्न
प्रकृति के नाना रंगों, रूपों,छवियों और प्रभावों अंतर्यात्रा करने से एक ही सूत्र हाथ लगता है प्रकृति के साथ तादात्म्य। प्रकृति के समान होना, उसी का स्वभाव, त्याग, लोक संग्रह ऱखना।
कितनी कष्ट सहिष्णुता, कितना धैर्य ' खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराय'। इसके लिए चाहिए ऊपर बढ़ना, बढ़ते जाना पर अपनी जड़ को धरती के भीतर जमाए रखना, पांव जमीन पर हों तभी सिर आसमान में रहता है।
प्रकृति से रागात्मक संबन्ध, उनके संरक्षण हित की प्राणपन से चेष्टा, तभी उसकी शाखा -प्रशाखाएं आकाश को ललकारेंगी। आकाश यहां ग्रह, नक्षत्र, अंतरिक्ष का ध्योतक है, जिसकी छतरी में हम विश्राम करते हैं। यही है पर्यावरण, जिसकी चिंता-महत्ता का बोध हमारे आचार्यों, शास्त्रों और साहित्य में है।
' नवयुग शंख ध्वनि,
हमें जगा रही
तू जाग-जाग मेरे विशाल '
- दिनकर
*
साभार, विकल्प 2006
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आने पर मेरे बिजली-सी कौंधी सिर्फ तुम्हारे दृग में
लगता है जाने पर मेरे सबसे अधिक तुम्ही रोओगे!
मैं आया तो चारण जैसा
गाने लगा तुम्हारा आंगन;
हंसता द्वार, चहकती ड्योढ़ी
तुम चुपचाप खड़े किस कारण?
मुझको द्वार तक पहुँचाने सब तो आये, तुम्ही ना आए,
लगता है एकाकी पथ पर मेरे साथ तुम्ही होओगे !
मौन तुम्हारा प्रश्न-चिन्ह है,
पूछ रहे शायद कैसा हूँ?
कुछ कुछ चातक से मिलता हूँ-
कुछ कुछ बादल के जैसा हूँ;
मेरा गीत सुना सब जागे, तुमको जैसे नींद आ गई,
लगता मौन प्रतीक्षा में तुम सारी रात नहीं सोओगे!
तुमने मुझे अदेखा करके
संबन्धों की बात खोल दी;
सुख के सूरज की आँखों में-
काली-काली रात घोल दी;
कल को गर मेरे आंसू की मंदिर में पड़ गई जरूरत-
लगता है आंचल को अपने सबसे अधिक तुम्ही धोओगो!
परिचय से पहले ही, बोलो,
उलझे किस ताने-बाने में?
तुम शायद पथ देख रहे थे,
मुझको देर हुई आने में;
जगभर ने आशीष पठाए, तुमने कोई शब्द न भेजा,
लगता तुम मन बगिया में गीतों का बिरवा बोओगे!
-राम अवतार त्यागी-

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहां मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोर मचाता है
जो बीत गयी सो बात गयी
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियां
मुरझांईं कितनी वल्लरियां
जो मुरझाईं फिर कहां खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गयी सो बात गयी
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गयी सो बात गयी
मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु पर फूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गयी सो बात गयी
-हरिवंश राय बच्चन
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कविता आज और अभी

गली अति सांकरी
कैसी होगी...!
कहां रही होगी
वह सांकरी गली
जिसमें दो नहीं समाते थे...
दो भी नहीं समाते थे,
कोई दूसरा जाता
तो एक होकर रह जाता था।
आज का युग---
ज्ञान-विज्ञान का
मानवता का
अधिकारों की एकता
और समानता का युग...
नहीं मानता कोई एकाधिकार
कोई अंधविश्वास
कोई तंत्र-मंत्र
वह नृशंस
कल्पना भी
गले नहीं उतरती
वर्तमान चिंतकों के।
कहते हैं---
वहां तानाशाह रहा होगा कोई
या कोई तांत्रिक...
शत्रु मानवता का
तभी तो कहलाई वह
सांकरी गली
पर्याय संकीर्णता का
कलंक मानवता के नाम पर।
किंतु अब
सबको साथ चलना है
और भला आगे पीछे भी क्यों!
सबको साथ
मिलाकर कंधे से कंधा
लेकर हाथों में हाथ।
फिर कैसे बच पाती
वह सांकरी गली!
किसी ने चौड़ा कराया होगा उसे...
गलीवासियों को
किसी अन्य बस्ती में
ले जाकर बसाया होगा
कौन जाने किसने
उस गली को
मैदान बनाने का बीड़ा उठाया होगा।
कोई नही जानता
कहां गई वह गली?
पुरानी--- बहुत पुरानी
पोथियों में मिलता है
उसका उल्लेख
जिनके पीले...
टूटते हुए पृष्ठों को
सहेज पाना भी
दुष्कर हो चला है अब।
समय ही कहां है!
और भी बहुत कुछ
सार्थक है करने-धरने को
आज के मानव के पास।
भविष्य की ओर दौड़ते
चौड़े राजमार्गों पर रुककर
कौन होगा
जो उस गली के विषय में सर खपाए?
फिर भला
आज के विशाल साहित्य में
ढाई आखरवाली
उस गली का उल्लेख
कैसे आए!
*

उपलब्धि
चेचक पर
विजय के बीस वर्ष
पूरे हुए...
यह समाचार आया है।
और पता है हमें
यह भी
कि इस बीच---
आतंकवाद और उग्रवाद ने
प्रतिवर्ष
हजारों को
जीवन-बंधन से मुक्त कराया है।
हम प्रगति पर हैं...
अब इन्सान
कीड़े-मकोड़ों के हाथों नहीं मारा जाता
अब इन्सान
इन्सान के हाथ मरने का गौरव पाता है।
*
सीतेश आलोक
(साभार, साहित्य अमृत)
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कहानी-समकालीन

तपिश :शैल अग्रवाल.
जून की तपती दोपहरी की हवा आंच की लपटों सी झुलसा रही थी ... चेहरे और बांहों पर थप्पड़ मारे जा रही थी, पर चारो तरफ आदमियों का रेला था, ट्रैफिक जाम था। इँगलैंड में रहकर वह ‘ पागल कुत्ते और अंग्रेज ही भरी दुपहरी में घर से बाहर निकलते हैं’, वाली कहावत कई बार सुनकर भी, इंगलंड लौटने से पहले आखिरी दिन की घुमाई का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा था मैं... संभव ही नहीं था मेरे लिए यह !.चाहे कितनी ही धूप हो या गरमी, बेखबर दिल्ली की ये सड़कें कब धक्कम-धक्का और चहल-कदमी से खाली रह पातीं हैं.?.. तो मैं अकेला ही नहीं, सैकड़ों और भी पागल हैं इस दुनिया में, मैं खुलकर मुस्कुराए बगैर न रह सका।
“ जी जनाब. कहां ले चलूं…?”
हाथ हिलाते ही, मिनटों में सामने आ खड़ा वह औटो-चालक उस उम्र का था, जब लोग घरों में बैठकर आराम करते हैं, पोते-पोतियों के संग खेलते हैं। उसकी आंखों की धधकती लपट और झुलसी हुई रंगत बता रही थी कि शायद उसकी जरूरतों का, विस्तार उम्र से कहीं ज्यादा लम्बा था, पर उन कपड़ों की सादगी, चेहरे की सौम्यता और बातचीत का सलीका तो कुछ और ही कहानी कह रहे थे. बारबार सोचने पर मजबूर कर रहे थे कि सामने खड़ा यह आदमी निश्चय ही बेहद संयमी और कुलीन है, फिर इस शांत और संतुलित आदमी को भरी गर्मी में औटो ही चलाने की क्या जरूरत पड़ गई, कौनसी ऐसी मजबूरी है जो इसे इस उम्र में भी यूं गली-गली भटका रही है, चाहकर भी कुछ सोच-समझ नही पाया मैं ? मुझे तो बस घूमना था औटो में...क्या फर्क पड़ता है, आदमी जवां है या बुढ्ढा... इस उम्र में इसे इतनी मेहनत करनी भी चाहिए, या नही--- वैसे भी यह सवाल मेरे सोचने के नहीं, उसके परिवार के लिए थे और फिर जिन्दगी कब हरेक के साथ वफा करती है ; भगवान ने भी तो पांचों उंगलियां एक सी नहीं बनाईं---सबकी अपनी-अपनी किस्मत है ! बेलगाम घोड़े-सी सरपट दौड़ती उस सोच को पलभर में ही, मात्र एक हलके से गरदन के झटके की चाबुक से ही, यथार्थ की ओर मोड़ लिया था मैंने।
“हुज़ूर कहां चलेंगे आप?", खुद में गुमसुम देखकर आखिर उस सामने खड़े बुजुर्ग ने दुबारा पूछ ही लिया मुझसे।
“कहीं भी, जहां सैलानियों की भीड़भाड़ हो, सुहाने मंजर और खूबसूरत चेहरे हों। नयन तृप्ति भी हो और साथ-साथ भयानक इस गर्मी से भी निज़ाद मिले। आसपास, या जहां भी तुम्हारा जी चाहे...कोई अच्छा और वातानुकूलित मॉल भी चलेग! मेरे लिए तो। “
इसके पहले कि वह विनम्र औटोवाला मुझसे कुछ और पूछे, मैं उसकी औटो में बैठ चुका था और यही नहीं, सवारी मिलते ही सैर-सपाटे की मौज में भी आ गया था। मेरे लिए यह वक्त अब ज्यादा सोचने-समझने का नहीं, भारत को आंखों में भरकर साथ ले चलने का था। पल-पल को जी भरकर जी लेने का था। कल रात देखी उस नई फिल्म का गीत अनायास ही सीटी की एक फड़कती धुन बनकर होठों पर मचलने लगा। परन्तु वह औटोवाला मेरे इस अनायास और अनियंत्रित उत्साह से ज़रा भी सहमत नहीं लगा। सिकुड़ी हुई भौंहें बता रही थीं कहीं कुछ ऐसा था जो बेहद ही आपत्ति-जनक लग रहा था ---मेरी भाषा और भूषा दोनों में ही उसे।
अपनी रंग-बिरंगी मार्क्स-स्पैन्सर की टी-शर्ट और हाफ-पैंट पर मैने एक भरपूर नजर डाली और फिर सब ठीक तो है, के अन्दाज से उसकी तरफ देखने लगा, मानो कह रहा होऊं, ‘ अरे भाई, आज़ाद देश है मेरा। और फिर कुछ ही दिनों के लिए तो इंगलैंड से भारत आया हूँ, वह भी घूमने का मन बनाकर, दफ्तर जाने के लिए तो नहीं! फिर भला कौन होगा ऐसा जो खुश होनेपर, ऐसे मौज-मस्ती के आलम में भी गुनगुनाता न हो ?’
आमिर और काजल पर फिल्माया गया वह सुरीला गाना भी किसी को नापसंद और आपत्ति-जनक हो सकता है, यह मैं सोच ही नहीं सकता था। जाने क्यों यूं बेकार में ही चिड़चिड़ा रहा था वह ... लगता है धूप चढ़ गई थी उसे ! वह बुजुर्ग सा दिखने वाला औटोवाला अब पलपल मेरे मन में एक नया प्रश्न उठा रहा था...होता कौन है यह मुझे यूँ आंखों ही आंखों में आंकने और तौलने वाला ? सब बूढ़े एक से ही होते हैं शायद... (अगले पल ही मैं खुद, मन ही मन, इतना बूढ़ा और खूसट न होने के लिए भगवान को धन्यवाद दे रहा था और अनायास ही उसके प्रति उठी सहानुभूति में थोड़ी कमी भी महसूस कर रहा था।) छोड़ो इन बातों को, मुझे क्या पड़ी, लू खाए या बीमार पड़े यह —मस्ती और खरीददारी के इरादे से निकला हूँ , तो आज बस वही करूंगा !
एक बार फिरसे मैने खुदको एक नये उत्साह से लैस कर लिया था। ‘ वाह, क्या बोल लिखे हैं लिखने वाले ने, और क्या धुन बनाई है बनाने वाले ने...चांद सिफारिश करता जो हमारी----‘ मेरा इरादा अब जोर-जोर से गाने का बन ही रहा था, कि एकबार फिर उसी बेबाकी से टोक दिया उसने मुझे।
“ आशिक मिज़ाज लगते हैं ज़नाब? “
“ नहीं भाई, लोफर किस्म का आदमी नहीं हूँ मैं। बरसों बाद मुल्क लौटा हूं, इसलिए चप्पा-चप्पा आंखों में भर लेना चाहता हूँ। “ मेरे लिए अब अपनी सफाई में कुछ कहना बहुत ही ज़रूरी हो चला था, पर जाने क्या था उन भेदती छोटी-छोटी, सलेटी और मटमैली पड़ती आंखों में कि ज्यादा कुछ और न कहकर, पूरा विषय ही बदल दिया मैने।
“ सुना है देश ने बहुत तरक्की कर ली है, खुशियाली से झूम रहा है---दो वक्त का खाना ही नहीं, बिजली पानी सबकुछ ही मयस्सर है आजकल ? ” , चढ़ते पारे को नीचे लाने के लिए मैने आधे मसखरेपन और आधी सच्चाई के साथ अटपटे-से लगते कई प्रश्नों की बौछार कर दी उसपर।
“होगा.! “, मेरे उत्साह को पूरी तरह से अनसुना और अनदेखा करते हुए उसने उतनी ही बेबाकी और बेरुखी से ज़बाव भी दे दिया।
“क्यों खुश नहीं दिखते तुम देश की तरक्की से ? ‘’, मैं उसकी अनमयस्कता पर हैरान था।
“कैसे खुश रह सकता हूं ज़नाब, मुझे भीख मांगने का पेशा जो नहीं आता---वैसे भी हर आदमी तो सबकुछ खा और पचा नहीं पाता, कईयों का हाज़मा बेहद नाजुक होता है हुज़ूर और कईयों के तो यह चेहरे के ठीक आगे जड़ी नाक तक आड़े आ जाती है?”
लंबी-पतली नाक पर आंख पड़ते ही, आंखों ही आंखों में तैरती हंसी होठों पर मचलने लगी। बात असल में यूं थी कि नाक तो अच्छी भली और सुगढ़ ही थी, पर नीचे का नज़ारा ज़रूर उसीकी ही तरह बिगड़ैल और बेतरतीब लगा मुझे।
“क्या मधुमक्खी के छत्ते-से ये दाढी-मूंछ दिक किए रहते हैं तुम्हें? “, मैने एकबार फिर हल्की-सी चुहल करनी चाही।
और तब उसने पलटकर पहली बार बेहद ही बुज़ुर्गाने अन्दाज़ से मेरी तरफ देखा और इसबार तो एक दबी सी मुस्कान भी दिखाई दी मुझे उन खुश्क और भिंचे-भींचे, पतले होठों पर, पर तुरंत ही जज़बातों की उष्मा को पसीने की धार की तरह ही पेशानी से पोंछकर तटस्थ भी हो गया वह।
‘बेकार है इतने रूखे और खब्ती आदमी से सर खपाना ’, सोचकर मैने बैठे-बैठे ही दोनों हाथ आगे बढ़ाकर हलका-सा झटका दिया और औटो के वे धूल-भरे बंधे परदे खोलने चाहे, शायद लू से ही थोड़ी बहुत राहत मिले !
पर तुरंत ही “ नहीं ज़नाब, नहीं खुलेंगे !” , कहकर उसने गाड़ी की स्पीड थोड़ी और बढ़ा दी। फिर थोड़ी ही देर बाद अपने आप ही रुक-रुककर पुनः बोलने भी लगा वह , “ वैसे भी बन्द परदों में तो घुट जाओगे ज़नाब। बरसात के बाद का सूरज है, कड़क तो होगा ही...पर अब तो यह तपिश ही अपनी किस्मत है ! ‘’
मुझसे नहीं, शायद अब वह खुद से ही बातें कर रहा था। आवाज मानो किसी गहरे अंधे कुंए से आ रही थी... गूंजती हुई और अस्पष्ट। कहे शब्द मुश्किल से ही सुन और समझ पा रहा था मैं। हां, सोच की जाने किन-किन गोल भंवरों में फंसा वह उसी रीते आकाश-सा लगा मुझे, जहां से उसे उतारने की कोशिश में, पिछले कई मिनटों से मैं उलझा हुआ था।
उसे तो पर शायद चन्द सही शब्द तक नहीं मिल पा रहे थे मुझ जैसे अज़नबी से एक साधारण-सी बात-चीत तक करने के लिए---अंत में बेहद ही फसफसे और दर्द में गुंथे वे शब्द खुद ही हवा में तैर उठे, “ मेरी बिट्टो की गड्डी है यह ज़नाब ! ‘’
तब... एकबार फिर बिल्कुल ही चुप हो गया वह और मुझे लगा कि अभीतक के मेरे हर हल्के-पुल्के फितरों से...व्यर्थ की बातचीच से, वह चुप्पी कई-कई गुना ज्यादा वज़नी और मुखरित थी। मुझे यूं सोच में डूबा देखकर पर और ज्यादा देरतक चुप न रह सका वह।
“क्यों परेशान होते हो ज़नाब, घूमने के लिए आए हो, घूम-फिरकर खुशी-खुशी वापस लौट भी जाओ। कुछ नहीं मिलेगा फालतू की इन बातों में उलझकर। “
मुझे लगा कि अब वह बहुत कुछ कहना चाह रहा है और मुझसे जुड़ भी रहा है। कितना सही था मैं... उसके बाद तो औटो की ही स्पीड से बिना रुके लगातार बोलता ही चला गया था वह। भावनाओं का अब एक ऐसा बहाव था मेरे चारो तरफ जिसमें सारा शोर डूब चुका था, मानो किसी बरसाती नदी ने किनारे तोड़ दिए थे, मानो विचारों की एक सुलगती भट्टी में पकने के लिए जा बैठे थे हम दोनों---घर से निकलते वक्त मैने कब सोचा था कि अपनी छुट्टी का आखिरी दिन यूँ गुज़ारूंगा !
“ आज तो जिधर भी देखो, यही इस देश का सबसे बड़ा पेशा है हुज़ूर। गरीब और ज़रूरत-मन्द ही नहीं, राजे-महाराजे, नेता-अभिनेता, सेठ-साहूकार सभी लाइन में लगे रहते हैं अब तो---सबके हाथों में वही एक कटोरा रह गया है...बस। मेहनत-मज़दूरी तो कोई करना ही नहीं चाहता। सबको मुफ्त की ही चाहिए,। अब या तो लोगों के बिस्तर इतने गुदगुदे हो गए हैं कि किसीकी आंख ही नहीं खुलती, या फिर इतने अंधे हो गए हैं इस कमाई के पीछे कि घरबार तक का होश ही नहीं रह गया...मान-मर्यादा और सही-गलत तो बहुत दूर की बात है ! ”, अपने आक्रोश में बोलता ही जा रहा था वह। मन की विष्तृणा अब उसके चेहरे पर ही नहीं, आवाज़ तक में थी, फिरभी एक-एक शब्द बहुत ही तौल-तौलकर बोल रहा था वह।
“कैनौट-प्लेस की तरफ ले चलूं जनाब, वहां उस इलाके में आए दिन ही कुछ-न-कुछ चलता रहता है आप जैसे लोगों के लिए...अब आपको उन विदेशियों की तरह कुतुब-मीनार और लाल-किला तो दिखा नहीं सकता मैं...ऐसे आपकी भी लम्बी सैर हो जाएगी और मेरे भी चार पैसे बन जाएंगे ? वैसे भी सुना है आप जैसे, बाहर से आए लोग इतनी कमाई करके आते हो इन पौंड और डालरों में कि हमारे रुपयों का कोई मोल ही नहीं रह जाता आपकी निगाह में ? ’’
“हाँ , हाँ , क्यों नहीं ! ’’ मैने तुरंत ही विषय बदलना चाहा।
‘ नहीं, ऐसी बात नहीं है, एकबार भारतीय तो मरते दमतक भारतीय। हम भारतीय पौंड में कमाएं या डौलर में, पर सोचते तो हमेशा रुपयों में ही हैं। ‘ चाहकर भी ऐसा कुछ न कह सका मैं उससे। पता नहीं अब मैं उसकी गरीबी पर शर्मिन्दा था या अपनी फिजूलखर्ची पर---पर एक बात तो निश्चित थी कि मेरा वह बेफिक्र और मौज-मस्ती वाला मिज़ाज पूरी तरह से गम्भीर और भारी हो चला था...वही गम्भीरता और उदासी फिरसे पीछे-पीछे आ लगी थी... जिसे चार साल पहले यहीं कहीं, भारत में ही छोड़ गया था मैं।
दिन को पर अब ऐसे तो नहीं खराब होने दूंगा मैं...मैने तुरंत ही जेब से कीमती काला चश्मा निकाला और आंखों पर लगा लिया। औटो अब एक कुशल नटी की तरह ही कारों और बसों के बीच मुश्किल से बची जगह से भी अपने लिए रास्ता और संतुलन बनाता रफ्तार से आगे बढ़ा जा रहा था और मेरी आँखें हर नये पुल और भव्य इमारत को प्रशंशात्मक दृष्टि से देख, परख और सराह रही थीं। ओह, तो यह प्रगति मैदान है, अब ऐसा लगता है...इतना आलीशान और सुन्दर ! हैरान था मैं दिल्ली की प्रगति पर। अभी भी आंखों के आगे अम्मा-बाबा और यारों के साथ घूमी हजारों दिल्ली की नुनखुरी यादें पसीने की गिरती बूंदों सी सरोबार किए जा रही थीं मुझे। बीच-बीच में बातचीत को जारी ऱखने के लिए कुछ सवाल भी पूछ ही लेता था मैं उससे।
“.तो, क्या यह मैट्रो चालू हो गयी ? “
उसने पलटकर फिर मेरी तरफ बेहद आश्चर्य के साथ देखा---साफ था कि देश की तरक्की का ज्ञान ड्राईंगरूम में बैठकर भारतीय चैनल पर देखी खबरों तक ही सीमित रह गया था मेरा, परन्तु इतना तो उसे भी मानना ही पड़ेगा कि भारत के बारे में आई हर खबर को, आज भी, चार साल बाद भी, उतने ही मनोयोग से सुनता और देखता हूँ मैं,, जितना कि तब, जब यहां दिल्ली के इसी उत्तम नगर में रहता था।
“ हां, हां, ज़नाब कबकी, अब तो बाबू ही नहीं, सारे ये चार पैसे कमाने वाले दुकानदार भी, गाड़ी स्टेशन पर ही छोड़कर जाते हैं। “
“शायद धीरे-धीरे यह भीड़भाड़ भी कम हो जाए फिर तो ? “
एकबार फिर मेरी प्रवासी आंखें एक सुनियोजित और समृद्ध भारत के सपने देख रही थीं।
“ नहीं ज़नाब, जब तक बढ़ती जन-संख्या नहीं रुकेगी, यह भीड़भाड़ नहीं रुक सकती। शिक्षा की बहुत जरूरत है देश को। कोई होश नहीं किसीको और ना ही कर्तव्य-बोध अपने किसी भी दायित्व के प्रति ! जब एक बूढ़ी मां को नहीं संभाल पाते ये नौज़वान, ज़वान बहन को नहीं संभाल पाते, तो भारत मां की क्या ऱखवाली कर पाएँगे, या फिर देश के बारे में कैसे सोच पाएंगे? “ , बोलते बोलते भावुक हो चला था वह और उसकी आवाज़ गहराकर थर्राने लगी थी। इतनी साफ-सुथरी भाषा और इतनी सुलझी सोच और औटो चलाने का पेशा---वह आदमी अब मेरे लिए रेशम की एक ऐसी चिकनी, फिसलती गुत्थी बनता चला जा रहा था जिसका हर मुलायम सिरा पलक झपकते ही एक नई गुत्थी में तब्दील हो जाता है। चाहकर भी पर कुछ भी तो नहीं पूछ पा रहा था मैं उससे--- अब वह मात्र एक औटो-चालक नहीं रह गया था, घंटे भर के साथ ने और भी बहुत कुछ जानने का कौतुहल जगा दिया था मन में?
“ कितना कमा लेते होगे तुम रोज़ रोज़, इस तरह से यह औटो चलाकर ?” खुद को रोकते-रोकते आखिरकार पूछ ही बैठा था मैं।
“ ..एक अकेले आदमी की आराम से गुज़र हो जाए, इतना तो कमा ही लेता हूं, जनाब !”
उसकी गरदन आत्म-विश्वास से तनी हुई थी और अब तो वह भी गीत गुनगुना रहा था---शायद बातचीत को वहीं खतम कर देना चाहता था। मैं सोचने पर मज़बूर था कि मुझे इतना व्यक्तिगत सवाल नहीं पूछना चाहिए था। और तब न चाहते हुए भी, गरदन एक बेचैन अन्दाज़ में बेमतलब ही इधर-उधर घूमने लगी, मानो मुझसे कह रही हो कि जिन्दगी के अनगिनत कठिन निर्णय की तरह एकबार फिर थोड़ी जल्दबाज़ी कर चुके हो तुम। मैं खुद को, अपनी सोच को एकबार फिरसे एक नयी उलझन के कटघरे में खड़ा कर चुका था।
“अरे, ज़रा रोकना भाई। लो, बीस रुपये लो और वह ठंडे फालसे खरीद लाओ। कई बरस हो गये यूँ फालसे खाए बगैर--- वहां इंगलैंड में तो ये मिलते ही नहीं। और हां, दस, दस रुपये के दो पैकेट बनवाना, एक अपने लिए और एक मेरे लिए। ऐसे मैं कोई अच्छा थोड़े ही लगूंगा, अकेले-अकेले खाते और तुम्हारे साथ दिनभर घूमते हुए? और हां, मसाले का नमक डलवाना मत भूलना।”
जाते-जाते पलटकर मैने उसे एकबार फिरसे याद दिलाया।
“नहीं जी, सब ठीक लगता है। और फिर हमारा तो यह पेशा ठहरा ! क्या पता हमारी आपकी अगली मुलाकात कभी हो भी, या नहीं... और अगर हो भी तो, हम एक दूसरे को पहचान तक पाएँ, यह भी ज़रूरी नहीं ? “
फालसों का पूरा पैकेट मुझे पकड़ाते हुए वह पहली बार खुलकर मुस्कुराया था।
अब एकबार फिरसे मस्त होकर वह अपना वही पुराना गीत गुनगुनारहा था। ...गीत के बोल जाने-पहचाने से ही थे, पर पूरी तरह से पकड़ में नहीं आ रहे थे। या फिर उसकी सोच की तरह ही रहस्यमय और गडमड हो चुके थे वे भी । कभी ‘ चलत मुसाफिर मोह लिया रे ‘ सुनाई देता तो अगले पल ही ‘ अबकी बरस भैया को बाबुल ’ या फिर कुछ और वही पुरानी गुरुबानी और पंजाबी तोड़े।
गरमी की उस तपती लू में उन स्वर लहरियों की वीरानगी और उदासी दुगनी महसूस हो रही थी मुझे---एक खलिश-सी थी उस आवाज़ में।
क्या वाकई में इतना उदास है यह सामान्य-सा दिखता आदमी या मेरी कल्पना-शक्ति ही बहुत ज्यादा सक्रिय, संवेदनशील और प्रखर हो चुकी है यूं सबसे दूर-दूर और अकेले-अकेले रह-रहकर ?
मैं अभी उस सुरीली गुत्थी का एक भी सिरा किसी भी छोर से पकड़ तक पाऊं कि एक बेहद ही झटके वाली क्रूर-क्रिच की आवाज के साथ वह दौड़ता -भागता औटो रुक गया और औटोवाला पागलों की सी बदहवासी-से कूदता-लांघता सामने के फुटपाथ पर जा पहुंचा। यही नहीं मेरे देखते-देखते ही उसने सामने सहमी-सहमी खड़ी उस लड़की को उन लड़कों के चंगुल से परे धकेलकर दूर भेज दिया। मैं भी तो तीर की तरह दौड़ता, यह जा वह जा, वहीं उसके पास आ खड़ा हुआ था।
छेड़छाड़ करते उन लोफर से लगते लड़कों के गाल पर अब वह थप्पड़ पर थप्पड़ रसीद किए जा रहा था। पता नहीं कैसी गिद्ध-सी दृष्टि पायी थी उसने, जो इतनी दूर से, इतनी भीड़भाड़ के बाद भी कुछ नहीं छुपा रह पाया था पैनी उन आंखों से---लड़कों की गुंडागर्दी, बद्तमीज़ मनमानी और लड़कियों की मज़बूर परेशानी सभी कुछ !
अब पूरी तरह से आपे से बाहर हो चुका था वह। बिफर चुका था। शेर की तरह दहाड़ और गुर्रा रहा था। मन की अगन् और उठते गिरते हाथ का कड़ा बिजली सी बरपा रहे थे चारो तरफ। अपने ही आक्रोष के आवेग से कांप और हांफ रहा था वह। बेरहमी से बालों से पकड़कर लड़कों को लथेड़ते और घसीटते, अब लात, घूंसे और थप्पड़ों में से, किसी की भी कोई गिनती नहीं रह गयी थी उसके पास। एकसी ही रफ्तार से पीटते-पीटते जब वह खुद भी पूरी तरह से लस्त हो चला, तो गुस्से से हांफते हांफते ही, दूर पड़ी चुन्नी उठाई और लड़की को उढ़ा दी, मानो वह लड़की जिसके साथ अभी-अबी यह अवांछनीय घटना घटी थी, उसकी कोई बेहद नज़दीकी...सगी अपनी बहन या बेटी ही थी।
वहां सामने फुटपात पर अब अच्छी-खासी भीड़ जमा हो चुकी थी मुफ्त के तमाशबीनों की। अब तक चुप-चुप सबकुछ देखती-सहती भीड़ में अचानक ही होश आ चुका था। क्या हुआ, क्या हुआ की खुसुर-पुसुर मधुमक्खी के छत्तों-सी चारो-तरफ भिनभिना रही थी और तब खबर लगते ही पुलिस भी वहां डंडा हिलाती आ पहुंची और लोफर से लगते उन लड़कों के साथ-साथ औटोवाले के हाथों में भी हथकड़ी डाल दी।
पर ठीक लहीं, खम्बे से सटी और मलमल की सफेद चुन्नी में मुंह छुपाए, भयभीत वह चौदह-पंद्रह साल की लड़की अभी भी रोए जा रही थी। उस अनचाहे और आकस्मिक हादसे से अकेले ही उबरने की कोशिश में खंबे को मुक्कों से रहरहकर पीट भी रही थी। (उसकी सहेली तो पहले ही उसे अकेला छोड़, भाग खड़ी हुई थी)। पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदती धीमी-धीमी आवाज में सुबक-सुबककर खुद से ही कुछ कहती वह लड़की अब दबी दबी हिचकियां भी ले रही थी, मानो इन दरिंदों की भीड़ और अंधे पुलिस वालों के आगे आने की हिम्मत ही नहीं थी उसमें---या फिर शायद बेहद ही थक और पूरी ही तरह से टूट चुकी थी वह बेमतलब के इस फसाद से।
“ इन्हें क्यों इस तरह से लिए जा रहे हो तुमलोग...इनका तो कोई भी दोष नहीं... यह तो बस मुझे और नेहा को उन गुंडों से बचा रहे थे?”
अब मेरे लिए और तटस्थ रह पाना संभव नहीं था। सान्त्वना देते हुए, उसकी पीठ पर हाथ रखकर पूछा मैने, “ क्या तुम इनकी बेटी हो?”
“नहीं..!”
“...इन्हें जानती हो?”
“...नहीं!”
हर ज़बाव के साथ मेरा आश्चर्य दुगना होता जा रहा था।‘ बेगानी शादी में अब्दुला दीवाना’ तो बहुत देखे थे , पर ‘ बेगाने दुःख में अब्दुला दीवाना’ से मिलने का यह पहला ही मौका था। उसे बचाना मेरे लिए कितना जरूरी था नहीं जानता मैं, पर मैने बज़ाय दूसरा औटो पकड़ने के, खुद को उसके पीछे-पीछे ही चलते पाया। पुलिस चौकी में पहुंचते ही फोन आ चुका था और वह दोनों अपराधी लड़के तुरंत ही छोड़ भी दिए गये थे, क्योंकि उनमें से एक किसी मंत्रीजी का बेटा था और दूसरा उसका खास दोस्त और किसी बड़े पुलिस –अधिकारी का बेटा।
औटो वाले के हाथों बुरी तरह से पिटने के बाद भी, उन दोनों के चेहरे पर एक बेहद ही क्रूर और विजयी मुस्कान थी और उन्होंने ‘ सैंया भये कोतवाल तो हमें डर काहे का ‘ के भाव से औटोवाले की तरफ देखा, मानो उसे चेतावनी दे रहे हों, ’ देखा हमसे भिड़ने का नतीज़ा...मच्छर से मसल दिए जाते हैं तुम्हारे जैसे लोग!‘ हां, सारी सज़ा तो अब अकेले ही भुगतनी थी उसे अब, जो गलती उसने की थी और जिस नाइंसाफी ने उसे इतना भड़काया था...दोनों की ही ! हथकड़ी में जकड़ा और घुटनों में मुंह छुपाए बैठा वह औटोवाला, एक पिंजरे में बन्द शेर-सा बेहद निरीह और लाचार लगा मुझे...सरकस में प्रदर्शित शेर की तरह ही उसपर कार्यवाही होनी तो वाकई में अभी बाकी ही रह गई थी?
“ तो तुम मारपीट का भी धंधा करते हो ?” सामने पड़ी हुई फाइल बन्द करते हुए वह थानेदार जोर से गरजा और “ सारी मर्दानगी दो दिन में ही निकाल दूंगा... स्साले तेरी “ कहकर मुंह में आई भद्दी गाली पान की पीक के साथ ही वहीं थूक दी उसने। छींटे अब सामने दीवाल पर ही नहीं, मेजपर और सामने वहीं जमीन पर बैठे औटो वाले के बालों तक पे बिखर चुके थे और देश के कानून की दशा और बेहूदगी की खुले आम बयानगी कर रहे थे। अभी वह ज़बाव देने के लिए मुंह खोले भी, इसक पहले ही तड़ाक-तड़ाक से दो डंडे और उसकी झुकी पीठ पर पड़ गए, पर उसमें कोई हरकत नहीं हुई। वह बैठा-बैठा बस उसी सामने बिछी टूटी –फूटी, खुरदुरी जमीन को ही घूरत रहा... जब से वे गुंडे सीना ताने छूटकर गए हैं, यूं ही बुत बना बैठा है वह... यह जमीन बेगुनाह और लाचारों के शरीर पर पड़ते कोड़ों से चटकी या फिर देश के भ्रष्ट और अंधे कानून से, शायद यही सोचता और गुनता-बुनता ?
मुझे लगरहा था कि इतना तटस्थ-सा दिखते हुए भी अपने हालात की पेचीदगी को भलीभांति समझ रहा था वह...शायद अभ्यस्त था इस नाइंसाफी का...जानता था कि एक और रात उसे यहीं, इसी हवालात में ही गुज़ारनी होगी। और कितना सही था मेरा यह अनुमान , अगले पल ही,” रातभर भूखे-प्यासे हवालात में बन्द रहोगे, तो अगली बार खुले सांड-सा यह मारपीट का जोश तो नहीं ही उठेगा तुम्हारे अन्दर ! “कहकर उसे लौकअप में बन्द कर दिया गया था।
सलाखों के पीछे से जब आँख मुझपर पड़ी, तो हाथ जोड़ते हुए बेहद ग्लानि के साथ उसने मेरी तरफ देखा और विदा में हाथ जोड़कर सर झुका लिया। पहली बार उसकी स्वाभिमानी आँखों में शर्म का अहसास था और चन्द भीगी बूंदें भी थीं कोरों पर, मानो अवांछनीय इस घटना के लिए, मुझे घुमा न पाने के लिए बेहद शर्मिंदा था वह। उसकी भलमनसाहत और उसके साथ हुए अन्याय से मैं खुद कटा जा रहा था और उसके दुख से कहीं न कहीं बहुत गहरे जुड़ भी चुका था। मेरा ध्यान अब उसकी तारतार हुई कमीज़ और पैंट पर था जो इस घटना की तरह ही उसकी इज्जत ढकने में पूरी तरह से असमर्थ हो चली थी, यही नहीं, कई छोटी-मोटी खरोचों के साथ-साथ, दांई हथेली के पास मार-पीट के दौरान हुआ एक बड़ा-सा घाव था, जो रिस-रिसकर बहता कपड़ों को ही नहीं, पहनने वाले तक को और भी दयनीय स्थिति में लिए जा रहा था।
पता नहीं उन सूअर के बाल वाली थानेदार की चुंधी आंखों में शरम न जाने कहां से आ गई या फिर चाभी दराज में रखकर वह आश्वस्त हो चला था, थानेदार उसकी तरफ घूमा और थोड़ी सी नरम आवाज में पूछने लगा, “ क्या तुम्हे इन बाबूजी के हाथ कोई संदेश भेजना है घरपर ? ” यही नहीं, मेरी तरफ देखते हुए हाथ हिलाकर मिलने का इशारा तक कर दिया उसने।
क्या पूछूँ और कैसे मदद करूं, मुझे पता नहीं था, पर मेरे हाथ अगले पल ही बैग के अन्दर सैवलौन का ट्यूब ढूँढ रहे थे और दवा के साथ ही उसके हाथ पर चार सौ रुपए ऱखकर मैने खुदको उससे यह पूछते हुए पाया,
“ क्यों ठीक हैं ना, या फिर कुछ और भी दे दूँ ! बताओ अगर घर पर किसी से कुछ कहना है तो कह दूंगा मैं...कम-से-कम एक फोन तो कर ही सकता हूं तुम्हारे लिए ?”
“ मेहर हो वाहे गुरुजी की आपपर ! मेरा घर में इंतजार करने वाला कोई नहीं है ज़नाब। हां, इस नंबर पर फोन करके कह दीजिएगा कि संतसिंह औटोवाला आकर औटो जरूर ले जाए और यह रुपये भी उसी को ही दे दीजिएगा---बाकी हिसाब मैं एक दो दिन के बाद खुद ही आकर कर लूंगा!“ उसने एकबार फिर अपनी उसी बेहद सधी और शान्त आवाज़ में ही मुझे जबाव दिया, पर न जाने क्यों मेरा गला खुद-ब-खुद भर आया था और कोट की जेब के अन्दर बन्द मेरी मुठ्ठियां भिंचने लगी थीं। अब मेरा मन भी उस भ्रष्ट थानेदार पर दो-चार लात-घूंसे चलाने को कर रहा था, पर ऐसा कुछ भी नहीं किया मैने...खुद को संयत करते हुए उससे विदा ली और नं. कसकर मुठ्ठी में पकड़े कायरों सा तुरंत ही बाहर भी निकल आया।
“अपराधी पकड़े जाएं या छूटें, पर तुम हिम्मत मत हारना ! कम-से-कम तुम्हारी सुदर्शन-चक्र-सी यह उर्जा अपराधियों के मुखौटे तो उघाड़ ही रही है...मान-हनन तो कर ही रही है पापियों का...कुछ और नहीं तो जनता को सचेत तो कर ही रही है। तुम्हारी जैसी अन्याय और अभद्रता के खिलाफ लड़ने की आंच और हिम्मत तो मुझमें है ही नहीं शायद....तभी तो पलटकर भी नहीं देखा मैने, यूं अकेला ही छोड़ दिया तुम्हे ---या फिर शायद दूसरों के दुःख की निजी सुःख के आगे कभी कोई अहमियत ही नहीं रही मेरी आंखों में ?” जैसा कुछ होठों ही होठों में बुदबुदाता मैं थाने के बाहर खड़ा-खड़ा खुद से ही बातें किए जा रहा था। फोन करने के ठीक बीस मिनट बाद ही संतसेंह आ पहुंचा और मेरे हाथों से चाभी का गुच्छा लेते ही उसकी आंखें नम होआईं।
“ थके हाथ-पैरों और बूढ़ी आँखों से ठीक से पूरी देखभाल न कर पाएंगे बच्चियों की, शायद यही सोचकर यह औटो किराए पर ली है इन्होंने...पर यह सब इनके बस की बात नहीं, वह भी इस उम्र में...कितनी बार समझाया है मैने ! आप ही बताओ, हर आदमी तो प्रेसिडेंट बुश नहीं ही बन सकता ना ? “
मेरी तरफ देखे बगैर या मेरी बात सुने बगैर ही अपनी ही धुन में बोले जा रहा था वह।
“ गरमी-सरदी, अंधड़-पानी ही नहीं, हारी-बीमारी तक की परवाह नहीं रही अब तो इन्हें...किस आग में यह जल रहे हैं और किस लगन की धूनी लगा बैठे हैं करतार भाई, अच्छी तरह से जानता भी हूँ और समझता भी हूँ मैं, पर यह तपिश कहीं इन्हें ही न राख कर दे...करौलबाग की अच्छी-खासी चलती दुकान, जनकपुर का कारखाना, सभी कुछ तो स्वाहा कर चुके हैं इस चक्कर में, घरबार सुख-चैन सभी कुछ...अब बस एक जान ही तो रह गई है वह भी देखो कितने दिन की ! अब तो रोज-रोज बस यह होता रहेगा. हुज़ूर...लौकअप में ही गुजरेगा इनका बुढ़ापा...कितनी बार समझा चुका हूँ,, पर बन्दा नजाने किस मिट्टी का बना है?”
उसकी आवाज अब पूरी तरह से फसफसी और भर्राई हुई थी।
“ और बाबूजी, वह तो अच्छा है कि आगे पीछे कोई नहीं। वैसे यह ज़िद भी तो खुद इनकी अपनी ही है कि इस उम्र में भी , दो वक्त की रोटी तक खुद ही कमाकर खाएँगे, वरना इन जैसे फरिश्तों के लिए रोटियों की कोई कमी है...अपना घर फूंककर दूसरों के लिए दिए की तरह उजाला देने वाले आखिर कितने मिलेंगे आपको...सोने तक में खोट हो सकता है, परन्तु अपने करतार भाई में नहीं!”
गला खंखारकर वह अपने को एकबार फिर संयत कर चुका था पर मैं देख रहा था कि अंदर ही अंदर उसकी यादों और आँसुओं में एक होड़ लग चुकी थी।
“पूरा मोहल्ला ही इनके एहसान तले दबा पड़ा है, जनाब। सुख्खी चाची सही ही कहती थीं कि खुद को ही करतारा के रूप में बसा लिया है रब ने इस मोहल्ले में । किसी का छोटा-बड़ा कैसा भी दुख हो, बन्दा हमेशा ही मदद के लिए सबसे आगे-आगे खड़ा दिखता है। जानते हो बाबूजी, आज का यह बूढ़ा कमजोर करतारा औटो चलाने वाला कभी दिल्ली का जानामाना नागरिक करतार सिंह दुग्गल हुआ करता था। इनकी ड्राई फ्रूट्स की सबसे बड़ी और अच्छी दुकान थी यहां करौल बाग में। लावारिश बच्चों को अक्सर ही बैठे-बैठे काजू और किशमिश खिलाता था ---गरीब और अभागों को अक्सर कपड़े और जूते भी बांटा करता था यह। किसी का दःख तो आजभी रत्तीभर बर्दाश्त नहीं इसे---बेटियों का खास करके! ऐसा बांका, समझ और दबदबे वाला इन्सान तो हमारे पूरे मोहल्ले में ही दूसरा और कोई नहीं था जनाब। वह तो जस्सी बेटी की लाश जबसे नाले के पास मिली है, आपा खो चुके हैं करतार भाई...पागल से हो गये हैं...जाने किसकी नज़र लग गई इनके भरेपूरे और सुखी परिवार को? कहां-कहां नहीं ढूंढा हमने उन अपराधियों को ...पुलिस...मंत्री,कायदे-कानून सबके ही दरवाजे खटखटा डाले थे...धरती आकाश सब एक कर दिए थे करतार भाई ने, पर क्या हाथ लगा कुछ भी तो नहीं। इस मुहिम में पर टूटे नहीं ये, हां बेघर और बेकार ज़रूर हो गये। आज भी सोते-जागते हरेक से बेटियों की ठीक से देख-रेख और लालन-पालन करने को ही कहते घूमते दिखते हैं ...परिवार के हर सदस्य की सुरक्षा के लिए सचेत रहने को कहते हैं। एक चौकस चपरासी की तरह दिनरात मोहल्ले की गश्त लगाते हैं ये।
दूसरों के बच्चों को छाती से लगाकर अपनी आग ठंडी करने का हुनर भलीभांति आता है करतार भाई को, मज़ाल है जो इनके आगे एक भी आंसू बह जाए...कभी घर का सामान बेचकर अनाथ लड़कियों की शादी कराते हैं तो कभी, कहीं भी बेमतलब ही भिड़ जाते हैं---बस इनके आगे बच्चियों के साथ कोई ज़रा सी बद्तमीजॉ भर कर दे, या मात्र एक सीटी ही बजाकर तो देख ले! पर अब एक इनके ही यूँ अकेले-अकेले लड़ते भिड़ते रहने से दुनियाभर के ये सारे लफंगे-लुच्चे खतम तो नहीं हो जाएँगे ज़नाब...मिटना तो दूर की बात क्या सुधरेंगे भी?"
संतसिंह ने एक गहरी सांस ली और पल भर के लिए बोलते-बोलते रुक गया, मानो सिर्फ उन बहते आंसुओं को ही नहीं, खुद अपने ही खून की घूंट भी पीने की कोशिश कर रहा हो। पर अभी उसकी बात खतम नहीं हो पाई थी...अन्दर ही अन्दर बहुत कुछ ऐसा था, जो निरंतर ही मथे जा रहा था उसे...कुछ ऐसा जो उसने अभी तक बताया ही नहीं था मुझे।
" बन्दा करे भी तो क्या करे साहब, सदमा ही कुछ ऐसा है...एक ही तो बेटी थी इनकी... वह भी बुढ़ापे की औलाद...कोई भी तो अरमान पूरे नही कर पाए यह अपने ! शादी के पूरे सोलह साल बाद हुई थी बेटी और मां भी तो जापे में ही चल बसी थी। बीस साल से बिना मां की बेटी के मां-बाप दोनों खुद ही तो रहे हैं ये। दूसरी शादी तक नही की। कहते थे कि दूसरी आएगी तो बेटी को दुःख देगी। आखिर खुद भी तो सौतेली ही मां के ही हाथों पले-बढ़े थे ! अपने सारे दुःख तो हंस-हंसकर सह लेते, पर बेटी का दुख कैसे गंवारा हो... और देखो कैसी फूटी किस्मत लेकर पैदा हुई हमारी जस्सी बेटी कि मरते वक्त दरिंदों के हाथ चिथड़े-चिथड़े होकर ही लाश बूढ़े बाप के हाथ लग पाई...मरने के पहले एक, दो नहीं, पता नहीं कितने दरिंदों का शिकार हुई थी बेचारी कि लुटे तनपर इज्जत ढकने को एक चिथड़ा तक नहीं था ---दर्द से फटी आंखों तक को तो पलकों का सहरा नहीं मिला बाबूजी?"
याद आते ही वह लम्बा चौड़ा जवान सन्तसिंह दुःख में दोहरा होता चला गया और फफक-फफककर रो पड़ा। किं-कर्तव्य-विमूढ़ मैने तसल्ली देनी चाही, पर कोई फायदा नहीं। अभीभी अपनी उसी डरावनी यादों की दुनिया में ही भटक रहा था वह...लगता था बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए थे उस अभागी और नृशंस हत्या को और जख्म अभी तक ताजे ही थे।
" न करे भगवान, पर पापी इस दुनिया में जाने कितनी मासूम बच्चियां इन हालातों से गुजरी होंगी ! बोलो बाबूजी पर सबके बाप तो ऐसे दुख में पागल नहीं हो जाते...कनून हाथ में नहीं ले लेते?"
जैसे वह रुक-रुककर और धीरे-धीरे बोल रहा था, मुझे नहीं लग रहा था कि उसे पूरी तरह से विश्वाश दिला पाऊंगा मैं, शायद यह जस्सी का ही दर्द था, जो उसे भी कहीं गहरे ले डूबा था।
" दुनिया में जीना है तो आम आदमियों की तरह इसके सारे कयदे-कनून तो मानने ही पड़ते हैं, साहब ! अच्छी लगे या बुरी, पर यह दुनिया कब हमारे हिसाब से चलती है, हमें ही इसके हिसाब से चलना पड़ता है...अच्छा बुरा सब कुछ सहते हुए। हाल ही में हुए उस निठारी कांड के बारे में तो आपने सुना ही होगा... कम-से-कम खबर तो लगी ही होगी आपको भी वहां पर भी, ...ज्यादा देर की तो खबर नहीं, पर क्या कर पाया कोई...चारो तरफ बस एक दहशत सी ही तो फैलकर रह गई और एकबार फिर हमसब अपने अपने घरों में चूड़ियां पहनकर ही बैठे रह गये। अब तो कोई बच्चों को घर के दरवाजे तक खेलने नहीं जाने देता। ना ही सौदे-भाजी के लिए ही भेजता है। शाम होते ही मोहल्ले की सारी चहल-पहल गायब हो जाती है। उल्लू बोलने लग जाते हैं। बच्चों की किलकारियां तक गुम हो चुकी हैं। अब तो शायद ही कोई आदमी अपनी परछांई तक पर भरोसा कर पाए !"
इसके पहले कि मैं उसे कुछ समझाऊं, वह खुद ही एक निष्कर्ष पर पहुंच चुका था। सवाल पूछने की अब उसकी बारी थी।
" क्या आप वाकई में ऐसा सोचते हो कि अब फिर दुबारा कभी ऐसा नहीं होगा...सारे अपराधी पकड़ में ही आ जाएंगे...सुधर जाएंगे?
क्या इतना भरोसा है आपको अपने समाज पर...इसकी कानून व्यवस्था पर, पुलिस और सरकार पर...खुद अपने आप पर? कुछ नही बदलेगा, दुनिया है जनाब, जैसे चलती आई है, चलती रहेगी। यूं ही ले देकर छूट जाते हैं सब चोर-उचक्के यहां। कुछ नहीं होता किसी का...किसी का ताऊ पुलिस कमिश्नर निकल आता है तो किसी का मामा मुख्य मंत्री। एक रावण के मरते ही दूसरा रावण पैदा हो जाता है ...सच कहूं तो सबकी मिली भगत जो है, पुलिस नेता चोर-उचक्के सबकी शकल एक सी ही नजर आती है अबतो मुझे। किससे न्याय मांगें और किससे फरियाद करें ! दो चार पुतले जलेंगे , लाठी चार्ज होगा फिर सब शान्त...फाइल तक गायब। लोग भूल जाते हैं। पहले लोगों की आंखों में थोड़ी बहुत शरम तो थी , पर अब तो कनून और उसके रखवाले भी अच्छा-बुरा सब हजम कर लेते हैं...कुछ भी खा पीकर डकारते तक नहीं ये लोग। ना ही इनका हाजमा ही खराब होता है। पता नहीं, कैसी आग लग गई है देश को ...अपने इस समाज को....न्याय और कनून को ? आप ही बताओ बबूजी, किसके पास इतना वक्त है, जो काम-धंधा, घर परिवार छोड़कर सड़कों पर उतर आए, कनून हाथ में ले ले...हर आदमी तो करतारा नहीं ही बन सकता ?"
मैं नहीं जानता कि संतसिंह मुझसे क्या तसल्ली या जबाव चाहता था, या फिर मैं उसे पल भर में ही कैसे समझा पाऊं कि अपने हित में कानून तोड़ना भले ही अपराध हो, जनहित में ऐसा करना क्रान्ति ही कहलाएगा। या फिर कब और किस मजबूरी के तहत् दरिया से भी नरम दिल करतार सिंह दुग्गल जैसे इन्सान करतारा बन जाया करते हैं ? यह तलवार की धार-सी तेजी और कड़क ...यह तड़प यों ही तो नहीं जागती मन में ? मानाकि हर वाद एक नशा होता है, भले ही वह आदर्शवाद या सुधारवाद ही क्यों न हो--- पर जरूरत पड़ने पर जगधात्री मां भी तो चंडी बनी ही थीं...राम ने भी तो धनुष-बाण उठाए ही थे...एक आराम-तलब स्वार्थी जिन्दगी ही सब जीते रहे , तो सुच्चा सन्त कौन कहलाएगा? किसी को तो कृपाण और कटार उठानी ही पड़ती है....सफाई करनी हो तो, कोई तो मेहतर बनेगा ही !
पता नहीं मेरी बात उसकी समझ में आ रही थी या नहीं, या फिर पहले से ही वह यह सब सोच और समझ चुका था पर जिस तपिश में वह पिघल रहा था, उसकी आंच मुझे भी झुलसाने लगी थी। मैने देखा सन्तसिंह अब कलाई पर बंधी घड़ी देख रहा था और घर वापस जाना चाहता था। उसने बन्द हो आई अपनी गड्डी एकबार फिरसे स्टार्ट कर ली थी।
" कहो तो आपको भी घर तक छोड़ दूं बाबूजी...अब आधी रात गए दूसरी गड्डी तो यहां पर मुश्किल से ही मिलेगी ?"
" हां, हां, क्यों नहीं !", कहकर एकबार मैं फिर उसी औटो में बैठ चुका था, जिसमें बैठकर सुबह-सुबह दिल्ली घूमने के इरादे से घर से निकला था। हाँ, चालक बदल चुका था....वक्त बदल चुका था और मेरा वह सैलानी मन भी तो बदल चुका था। सुरीले गीतों की जगह अब फड़फड़ करते धूलभरे पर्दों से आती बेहद गर्म हवा थी, जो कि अभी भी थप्पड़ की तरह ही लग रही थी और दिमाग की एक-एक कड़कती नस को चीरे जा रही थी। एकबार फिर वही प्रगति मैदान, जामा मस्जिद., कुतुब मीनार औ र लालकिला थे...तस्बीर से आंखों के आगे से दौड़ते-भागते , पर बिल्कुल ही बेजान और आकर्षण-हीन। देखते-देखते पूरी दिल्ली को भी, मेरी थकी आँखों-सा ही सियाह अंधेरे ने ढक लिया और चारो तरफ एक रहस्यमय और निराश सन्नाटा पसरने लगा। पर मेरी बन्द पलकों के पीछे तो अभी भी घटनाओं का कभी न खतम होने वाला एक अद्भुत कालचक्र जारी था।
परत-दर-परत घटनाओं के उस जाल से उभरकर जो तस्बीरें आँखों के आगे आ जा रही थीं, उनसे एक बात तो बिल्कुल ही साफ थी , कि इतनी लगन और हिम्मत कितनों के पास होती है , माना यह एक बेहद ही व्यक्तिगत और अलग मुद्दा है और बहुत ही धैर्य व शान्ति के साथ ही सोचने -समझने की बात है , पर एक बात तो निश्चित है कि वक्त बदले या जमाना... आज भी , हज़ार खामियों के बाद भी, आग में तपते सोने -से करतार सिंह जैसे इन्सान ना तो कभी हार मानते हैं और ना ही अपनी तरलीफों से टूटते या बिखरते हैं....वैसे भी बिना नफे-नुकसान की सोचे, ये तो बस वही करते आए हैं जो इन्हें सही लगता है, या फिर करना चाहिए, क्योंकि इनके लिए यूँ सारे दिन-रात लौकअप में गुजारना...जीवन स्वाहा करना तो आसान है पर एक और बहन या बेटी को लुटते और मिटते देख पाना नहीं।...

* *

पकड़े गए
-नरेन्द्र कोहली
''आज के समाचार पढ़े ?''
'' कोई विशेष बात ?'' मैंने पूछा।
''अरे, आतंकवादियों के चार साथी पकड़े गए।'' रामलुभाया प्रसन्न ही नहीं, बहुत ही उत्साहित भी लग रहा था।
मेरी भी तंद्रा टूटी, ''क्या गुलामनबी आजाद पकड़ा गया ?''
''गुलामनबी आजाद ? नहीं तो।'' वह बोला, ''उसका क्या काम ?''
''तो कौन पकड़ा गया ?'' मेरी उत्सुकता सातवें आसमान पर थी, ''मुफ्ती स्वयं या महबूबा मुफ्ती ?''
''तुम पागलों के समान जाने किस-किस के नाम बोले जा रहे हो।'' रामलुभाया कुछ परेशान सा होकर बोला, ''मैं कह रहा हूं कि आतंकवादियों के साथी पकड़े गए हैं।''
''मैं भी तो उन्हीं की बात कर रहा हूं।'' मैंने कहा, ''तो यासीन मलिक पकड़ा गया होगा।''
''अरे नहीं। मैं उन सबकी बात नहीं कर रहा हूं।'' वह बोला, ''मैं उनकी बात कर रहा हूं, जिन्होंने आतंकवादियों की सहायता की थी।''
''अच्छा वे, जो उनके समर्थन में धरने पर बैठे थे?''
''नहीं।''
''तो अरुंधती राय होगी, जिसने उनके समर्थन में एक लंबा निबंध लिखा था।'' मैं रुका, ''या फिर उस पत्रिका का संपादक, जिसने वह निबंध छापा था।''
''तुम तो पागल हो एकदम।'' रामलुभाया ने कुछ बिगड़ कर कहा, ''तुम तो इतने बड़े-बड़े लोगों के नाम ले रहे हो ...।''
''आतंकवादियों के साथी बड़े लोग होते हैं ?'' मैंने पूछा, ''तो अपराधी कौन होता है ?''
''अपराधी वह होता है, जो किसी की जेब कतर ले।''
''जो देश को कतर दे, वह अपराधी नहीं होता ?''
''नहीं। वह नेता होता है।'' वह बोला, ''अपराधी वह होता है, जो किसी से रिश्वत ले।''
''और जो देश को तोड़ने के लिए, देश के शत्रुओं से लाखों करोड़ों रुपए ले, वह रिश्वत नहीं, मानदेय है ? ऐसा काम करने वाला व्यक्ति अपराधी नहीं होता ?''
''नहीं । वह मानवाधिकारवादी होता है।'' रामलुभाया बोला, ''अपराधी तो वह होता है, जो किसी की हत्या कर दे।''
''और जो बम फोड़वा कर सैकड़ों लोगों की हत्या करवा दे, वह अपराधी नहीं होता।''
''नहीं। वह तो सिद्धांतवाचक होता है। अपराधी तो वह होता है, जो किसी को लूट लेता है।''
''और जो सैकड़ों लोगों के भाग्य को ही लूट लेता है, वह अपराधी नहीं होता ?''
''नहीं। वह तो इतिहास-पुरुष होता है।'' वह मेरी नासमझी पर हंस रहा था।
''तो फिर पकड़े कौन लोग गए हैं ?''
''जिन्होंने आतंकवादियों की सहायता की थी।''
''अर्थात् तुम आतंकवादियों को नहीं पकड़ते, उनकी सहायता करने वालों को पकड़ते हो।''
''नहीं। पकड़ते तो आतंकवादियों को भी हैं, किंतु फिर उन राक्षसों के पक्ष में बड़े-बड़े मानवीय तर्क उपस्थित करते हैं। उनकी सहानुभूति में सड़कों पर उतर आते हैं। धरने पर बैठते हैं, जुलूस निकालते हैं। आंदोलन चलाते हैं। अंतत: उनको छुड़वा लेते हैं।''
''तो अफज़ल को छुड़वाओगे ? मदनी को छुड़वाओगे ?''
''हां। फांसी अच्छी बात नहीं है।''
''तो सतवंतसिंह को फांसी देने की क्या आवश्यकता थी ? केहर सिंह को क्यों मृत्युदंड दिया था ? और नाथूराम गोडसे को फांसी पर क्यों लटकाया ?''
वह एक क्षण को भी संकुचित नहीं हुआ, ''क्योंकि सहानुभूति के पात्र तो केवल अल्पसंख्यक लोग हैं।''
''ठीक है। ठीक है। मैं जानता हूं कि जिस दिन बहुसंख्यक लोग भी आतंकवाद के मार्ग पर चल पड़ेंगे, वे तुम्हारी सहानुभूति अर्जित कर लेंगे। तुम्हारी सहानुभूति या तो भय से उपजती है, या लोभ से। न्याय क्या होता है, वह तुम जानते ही नहीं।'' मैंने कहा, ''अब ये बताओ कि आतंकवादियों के कौन से साथी पकड़े गए हैं?''
''जिस मालिक मकान ने बिना यह जाने कि वे आतंकवादी हैं, उन्हें अपना मकान किराए पर दे दिया था और गली की नुक्कड़ पर साईकिल की मुरम्मत वाला मिस्त्री, जो एक पुराने साईकिल का अच्छा मूल्य पा कर उनको साईकिल दे बैठा था।''
''यह तुम्हारा कैसा विधान है रामलुभाया?'' मैंने पूछा।
''यह तो राजनीति है।'' वह बोला और मुस्कराने लगा।
- नरेन्द्र कोहली , 175 वैशाली, पीतमपुरा, दिल्ली - 110088
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 चाँद परियाँ और तितली
कहानी की कहानी
-शैल अग्रवाल
बच्चों की फरमाइश पूरी करना चंदामामा के लिए असंभव सा होता जा रहा था और यह बात उन्हें बहुत दुख दे रही थी। ठीक भी तो था, वे बच्चों को प्यार भी तो बहुत करते थे, परन्तु कभी राजा-रानी की, तो कभी परियों वाली, कभी शेर-भालू की, तो कभी पिंजरे में बन्द तोते की, रोज-रोज नई कहानियां वे लाते तो लाते भी कहां से, और बच्चों की तो हमेशा बस यही एक जिद थी कि नई कहानी ही सुनेंगे! हारकर पूरे ही चन्द्रलोक में ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि जो भी बच्चों को रोज नई कहानी सुनाएगा, उसे न सिर्फ पूरा राजपाट दे दिया जाएगा, बल्कि अपने हृदय से लगाकर...बेहद करीब रखेंगे चंदामामा।
अगले दिन ही कहानी सुनाने वालों की लाइन लग गई, अब भला प्यारे-प्यारे से चंदामामा के पास चंद्र्लोक में कौन नही रहना चाहेगा, जहां चारो तरफ टिमटिम करते सुनहरे-रुपहले तारे हों और परियों का भी साथ हो!
पर चंदामामा की तो एक और शर्त भी थी, जिसका पता चलते ही सभी कहानी सुनाने वालों के पसीने छूटने लगे। अब भगवान के अलावा ऐसी कहानी कौन कह सकता है जो कभी खतम ही न हो--या जहां से खतम हो फिर वहीं से शुरु भी हो जाए! फिर भी कहानी तो सुनानी ही थी, सबसे पहले वह जादूगर आया जिसका चारो तरफ बहुत नाम था और जिसे अपने जादू पर बहुत ज्यादा विश्वास भी था।
चंदामामा के आगे आते ही उसने अपनी कहानियों का पिटारा खोल दिया और सब कहानियां उछलकर तुरंत ही बाहर भी आ गईं। चारो तरफ बिखर गईं। चंदा के सिंहासन पर, रात की छतपर, तारों की खूंटी पर... अब चारो तरफ कहानियां ही कहानियां लटक रही थीं पर उन्हें क्रम से बांचने वाला वहां कोई नही था। कहानियां खुद अपनी-अपनी कहानी कह रही थीं और जादूगर चंदा के पास बैठा-बैठा इस अनहोनी जादूगरी पर खुश हो-होकर मुस्कुरा रहा था। अनियंत्रित इस शोर से चंदा के सर में ही नहीं, वहां उपस्थित सभी प्यारे-प्यारे बच्चों के सर में भी दर्द होने लगा और खुश हो कर सो जाने के बजाय वे सब जोर-जोर से रोने लग गये। अब तो सारे बच्चों की मांएं भी घबरा गईं। किसी ने अपने बच्चे को कंधे से लगाकर थपकी देनी शुरु कर दी तो कोई लोरी गा रही थी। कइयों ने तो झुंझला-झुंझलाकर बच्चों को पीट तक डाला और बच्चों को कभी चंदामामा के पास न भेजने की तुरंत ही धमकी तक दे डाली। अब भला चंदामामा बच्चों से कैसे दूर रह पाते, उसी वक्त जादूगर को आकाश-महल से बाहर भेजने का हुक्म दे दिया गया।
अब आई सुन्दर सी नन्ही परी की बारी, जो जाने कबसे लाइन में खड़ी इन्तजार कर रही थी। जब उसने चंदामामा के महल में घुसते ही अपने जुही की पंखुरियों-से कोमल और सुन्दर पंखों को फड़फड़ाया, तो झरती सुनहरी उस धूल के संग कई-कई कहानियां झिलमिल करती चांदनी में तैरने लगीं, मानो चारो तरफ कहानियों का एक रंग-बिरंगा इन्द्रधनुष निकल आया हो। अब तो खुश-खुश दौड़ते भागते बच्चे मन में आता जिस कहानी को पकड़ते और सुनने लग जाते, औरफिर सुनकर छोड़ भी देते यूँ ही तैरने और इन्द्रधनुष बनाने के लिए। इस तरह से उस हँसी-खुशी के माहौल में आराम से बीसियों साल निकल गए। बच्चे इतने खुश थे कि उन्हें अंधेरी रातों में भी कहानी ढूंढने में आनन्द आता---कहानी मिलती या नहीं, कितनी मिलती, इसतक की परवाह नहीं रह गई थी उन्हें अब तो। फिर एक दिन जब वे छोटे-छोटे बच्चे बड़े हो गए और खुद उनके अपने भी बच्चे हो गए, तो उन्होंने जाना कि उनके बच्चे अभी तक वही कहानियां सुन और सुना रहे हैं जो खुद उन्होंने भी कभी परी से सुनी और सुनाई थीं । असल में परी के पंख में जितनी भी कहानियां थीं, वे पृथ्वी के साथ-साथ ही घूमती रहती थीं और पूरे साल में जाकर चक्कर पूरा कर पाती थीं ---हां तुम लोगों ने ठीक समझा परी के पास बस तीन सौ पैंसठ ही कहानियां थीं, साल के हर दिन की एक नई कहानी। पर चन्दा तो हमेशा ही, लगातार एक नई कहानी चाहता था इसलिए यह बात फैलते ही उसकी खोज फिरसे जारी हो गई।
इसबार उसने चंद्गलोक पर ही नहीं, सूर्यलोक, पृथ्वी और नौ ग्रह, सब जगह ही डुगडुगी बजवा दी।
' लगातार कहानी कहो और चंद्रलोक के सिंहासन पर बैठो।'
पर लगातार कहानी तो किसी के पास नही थी। कोई भी आगे नही आया। चंदा अब सचमें ही बेहद उदास हो गया ---इतना उदास कि उसका पूरा मुंह कुम्हला गया, सारी चमक गायब हो गई। आंखों के नीचे बड़े-बड़े गढ्ढे बन गए...वही गढ्ढे जिन्हें आजकल एस्ट्रोनौट्स ने मून-क्रेटर का नाम दिया हैं। चंदामामा दिन-रात दुबला होता जा रहा था। किसी काम में उसका मन नहीं लग रहा था। उसका यह दुख उसकी मां से, जो अब बेहद बुढ़िया हो चली थी, देखा न गया। अपना सूत कातने का चरखा लेकर वह चांद के पास जा बैठी। चंदा का सर अपनी गोदी में ऱखकर बोली, मेरे चंदा, तू इतना उदास क्यों है, आ मैं सुनाऊंगी तुझे लगातार एक नई कहानी। चंदा को उस सफेद रूखे बालों वाली बुढ़िया मां की बात सुनकर हंसी आ गई। बोला, जाओ मां! यह सब तुम्हारे बस का नहीं। क्यों नहीं? हंसकर बुढ़िया मां फिरसे बोली, आखिर मां हूं तेरी। बचपन से ही तेरी देखभाल करती आई हूँ...और तेरी हर जरूरत, पसंद-नापसंद को भलीभांति से जानती भी हूं। लगातार यह चरखा बुन सकती हूं तो क्या लगातार एक नई कहानी नहीं कह सकती--- और फिर तुम और तुम्हारे ये संगी-साथी, ये तारे भी तो हैं ही मेरी मदद के लिए। देखना मिलजुलकर सब काम हो ही जाएगा, परिवार और सहयोग की ताकत बहुत होती है और आपस में प्रेम हो, तो यह ताकत कई-कई गुना बढ़ जाती है।
उस दिन से आजतक चंदा के साथ बैठी बुढ़िया नानी सूत की तरह ही कहानियां बुनती जा रही है। चरखा चलता रहता है, कहानियां निकलती रहती हैं। न चरखे का सूत टूटता है और ना ही कहानियों का क्रम। और अगर कभी सूत टूट भी जाए तो नानी इतनी सफाई से जोड़ देती है कि पास बैठे चंदा तक को पता नही चल पाता। उसकी ये कहानियां कभी-कभी तो चंदामामा को इतना खुश कर देती है कि वह फूलकर कुप्पा हो जाता है तो कभी इतना डरा देती है कि सूखकर कांटा। यही वजह है बच्चों कि तुम रोज ही चंदामामा को घटते बढ़ते देखा करते हो। चरखा बुनती नानी के पास हर रात एक नन्हा तारा अपनी नई कहानी लेकर आता है और रातभर खेलता रह जाता है। एक नए आत्म विश्वास के साथ जगमग- जगमग, जब वह अपनी नयी कहानी कहता है तो नानी उसे बेहद प्यार से देखती है और पृथ्वी पर बैठे बच्चों की तरह ही, कहानी को बहुत ध्यान से सुनती भी है । विश्वास नही तो आज ही रात को देखना, चंदा में बैठी वह बुढ़िया नानी, अभी भी वहीं बैठी दिखाई देगी वैसे ही चरखा चलाती और अगर ध्यान से सुनोगे तो रात के सन्नाटे में नन्हे-नन्हे तारों की नई-नई कहानियां भी चलते चरखे की आवाज के साथ किलक-किलककर गूंज रही होंगीं!
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तो बच्चों अबतक तो तुम जान ही गए होगे कि चंदामामा कितने हठी हैं---बिल्कुल तुम्हारी ही तरह और तुम सब बच्चों से कितना प्यार भी करते हैं!
इसबार चंदामाम के इसी बाल-हठ पर हम तुम्हारे लिए दिनकर जी की एक बहुत ही रुचिकर और लुभानी कविता लेकर आए हैं, उम्मीद है कि कहानी की तरह यह भी तुम्हे पसंद आएगी --
चाँद का कुर्ता
रामधारी सिंह ' दिनकर '

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
" सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।"
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, " अरे सलोने,
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।
घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है।
अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,
सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।
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The world is changing; because its climate is changing. The climate is getting hotter and so are people---more violence, more crime, and more injustice! So then, what's the solution--- Look to the east: Spirituality (unity of body and soul), Dharma-chakra (wheel of righteousness)!
Room was filled with enthusiasts; people serious about their business; people who have really done something for destitutes; people who believe in deeds, not in speeches--- and I, amidst all of it, was feeling very ashamed and Stupid. Poor farmers committing suicide because they can not get out of the debt---children orphaned, families ruined and that also in todays thriving Indian economy! An Indian and a Hindu; learning from others what is wrong with my country and what they are doing about it! People who ruled it for so long now making orphanages and schools there...once again in a strange way...taking the lead. Nothing wrong in taking help and expertise but being totally devoid of self esteem or spineless will only cripple: be it an individual or a nation; howsoever great or small!
India is a growing economy; a country more than a billion people; a country with fastest per capita growth after china; yet still divided with its prejudices; its unjust cast system and shackled with poverty and corruption; over indulgence of affluent and heart wrenching suffering of its destitute. What is this India---still a land of milk and honey or a struggling land; corrupted by modern vices and beguiling ways? How the World looks at us and what we Indians are doing to improve our lot?
Is it sufficient to sit back smugly, even in todays ever changing climate, on our past idealism and principles... Just keep on parrotting great scriptures and not even trying to understand a thing? Time and time it has been proven that our's is a very tolerant society and religion- very liberal one; not a movement to convert or force the world; but a decipline or a way of life, devised by sages and rishis thousands of years ago and still voluntarily practiced by its deciples: an unsolicited code of society; withstanding and taking every pressure easily... moving forward beautifully with ever changing time and its need, all because it is based on sympathy and understanding...on the code of 'one for all and all for one...unity in divercity!'
Swami Dayananda Saraswati is a well-known Swami of the Advaita-Vedanta tradition. Being highly articulate in several languages, including English, he has been able to reach out to hundreds of thousands of people through his writings and speeches and personal leadership. He has founded the Arsha Vidya Gurukulam as well as several charitable institutions around the world . In his recent trip to the UK he answered few of these Questions very profoundly. I can explain no better than quoting from one of his interview .
" What, in your opinion, is the most important teaching of Hinduism?
If I were to choose one aspect, it would be the teaching that God is the only reality, which can be invoked through any name or form. All worship offered with a pure heart is valid. There can be million forms of worship, offered to any name or form that you choose. This is the universal outlook of Hinduism. Hinduism is a very profound religion, not based in simple beliefs. God is to be understood, not just believed in.
What do you feel about the direction that modern-India is travelling in?
Economically India is beginning to do well. But politically our direction is a matter of concern and certainly not good for culture and tradition. There are well-entrenched forces that are trying to subvert the unity of the country both politically and culturally who have made considerable progress in their agenda.
Is India becoming too materialistic?
Not really. On the surface, it looks as though Hindus in India are now very materialistic and greedy. But if we look beyond the surface, it is not the case. The value of spirituality and duty is still very much alive among all sections and age groups of our society. But everybody is striving for material security in a competitive world. A few generations ago, we lived in a society where everybody knew exactly what he/she would do before they were even born. Everything in life was definite. There was nothing to worry about, because it was a zero-competition environment. But that is dying. Now all of a sudden, intense competition has been introduced in the lives of Indians. Everybody is competing for jobs and resources. It is like putting a domestic into the wild.
In your opinion, is this a good or bad thing?
I can't say whether this change is good or bad, but it is the reality and there is no going back.
Having travelled significantly outside of India, what are your thoughts on Western society?
I have no problem with the West. They have achieved many things. But they have come to a certain stage of extreme materialism where they have to face certain stern realities. We see the amount of psychiatric disease, depression etc prevalent in the West, even amongst people who are rich in terms of money. The wisdom of ancient India is the solution to such problems. The society needs to learn that the most important thing is that a person has to be at comfort with oneself, and learn who we really are.
Some Hindus say that to get involved in (or have strong views on) society's problems and conflicts, especially things like religious conversions, is 'unspiritual', and not befitting behaviour for a Swami. What is your response to this?
A sadhu cannot directly participate in political activities. I can however offer guidance, like Vashista and Vyasa used to, if somebody seeks advice. That is my position.
Right now, Hindu society is at a stage where anybody may be called on to do duties that are not traditionally prescribed for him or her. For example, the traditional Kshatriya roles of society are not being fulfilled by people from Kshatriya descent, and in such times, anybody who has a natural inclination towards the job should do it.
In your opinion, can a person who is not a Hindu by birth become a Hindu?
I consider everybody to be a Hindu until they say they are not."
Does this mean that being Hindu means understanding ourselves and our God (our motives, our driving forces: need of our soul). Understanding others we live with (other co-inhabitant of this planet and its total need, even our environment) ... In other words living in peace and harmony...not stepping on each other's toes in an over-heated rat race... creating and preserving a world; where not only we all can live but help others live happily too: at least striving towards it...dispelling myths and misunderstandings---that you are a kuleen or Brahmin not by birth but by noble deeds! Infect being a good Hindu means: being an understanding human being--- a caring member of the one big family: the whole world...this beautiful planet earth, 'वसुधैव कुटुम्बकम् '!
What better way to sum it up than with this Bhajan; a favorite of our Bapu, Mahatma Gandhiji: ‘ Vaishnav jan te tene kahie je peer paraai jane re'
Those are the blessed one or closer to God, who understand and feel the pain of other's!

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| The Hill |
| by Rupert Brooke |
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Breathless, we flung us on the windy hill, Laughed in the sun, and kissed the lovely grass. You said "Through glory and ecstasy we pass; Wind, sun, and earth remain, and birds sing still, When we are old, are old...." "And when we die All's over that is ours; and life burns on Through other lovers, other lips" said I, "Heart of my heart, our heaven is now, is won!"
"We are Earth's best, that learnt her lesson here. Life is our cry. We have kept the faith!" we said; "We shall go down with unreluctant tread Rose-crowned into the darkness!".... Proud we were, And laughed, that had such brave true things to say. - And then you suddenly cried, and turned away. |
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So, We'll Go No More a Roving |
| by Lord George Gordon Byron |
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So, we'll go no more a roving So late into the night, Though the heart be still as loving, And the moon be still as bright.
For the sword outwears its sheath, And the soul wears out the breast, And the heart must pause to breathe, And love itself have rest.
Though the night was made for loving, And the day returns too soon, Yet we'll go no more a roving By the light of the moon. |

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