सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

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July-2007  बरखा विशेषांक...

 

 

Quote of the month

 

Hearing is one of the body's five senses. But listening is an art.

-Frank Tyger

 

 

 

(सर्वाधिकार सुरक्षित) copyrights to writers and publisher only

संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल. 

संपर्क -सूत्र-  editor@lekhni.net  ,  shailagrawal@hotmail.com

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    अपनी बात 

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विरही की पीर और नीर बहाती बदरी...उमड़ते-घुमड़ते बादल और आवेगी मन... नायिका के घने लहराते कुंतल, पर्वतों से उन्नत उरोज...रूप और यौवन की उफनती निर्झरणी और फूलों से लदी-फंदी वल्लरी-सी सुकुमार नायिका ...साहित्य-संदर्भ में वर्षा ऋतु का नाम लेते ही महाकवि कालीदास के मेघदूत की छवि  ही सर्वप्रथम आंखों  में तैरती है। अषाढ़ का प्रथम मेघ और विरही, एकाकी, वह निष्कासित यक्ष, नेह-संदेश ले जाते बादल, पथ का सारा सौंदर्य, सदा के लिए ही तो अमर हैं काव्य-प्रेमियों के मानस-पटल पर।

 एक मेघदूत ही नहीं, वर्षा-ऋतु तो सदियों से ही ललित कला में पूरे श्रृंगार, करुणा व आवेग ...एक अकथनीय गरिमा के साथ सतरंगी छटा लेकर उभरी है, प्रसंग विरह का हो या फिर मिलन का। क्रोधी- भयावह, करुण और कोमल--- वर्षा के हर रूप को ही कवि और चित्रकारों ने सराहा है। अषाढ़ के उमड़ते-घुमड़ते बादल, सावन की भीनी-भीनी रिमझिम, भादों की मूसलाधार, या फिर काली डरावनी रात में आकाश का सीना चीरती चपल विद्युत-रेखा... सदियों से ही वर्षा ऋतु के हर रूप को मानव संवेदनाओं से जोड़ा गया है और नए-नए मानकों के साथ शब्दों और रंगों में उकेरा गया है। सौम्य रूप में तो बरखा प्रियतमा और जीवन-दायिनी है ही।

ग्रीष्म-ऋतु की तपन के बाद जब बर्षा से नम धरती पर हरियाली फैलती है---नए अंकुर  फूटते हैं और लजीली कोपलें फूलों के गहने धारण करती हैं, तो पूरा-का-पूरा देश लहलहा उठता है। यही वजह है कि साहित्य ही नहीं, भारतीय जन-जीवन में भी राग-रस से स्निग्ध बरखा-ऋतु का अपना एक अलग ही और उल्लासमय स्वरूप है।

स्नेह-फुहारों से भिगोती यह ऋतु हर्ष और उल्लास के कई-कई त्योहार लेकर आती है, चाहे वह शिव पार्वती के अटूट मिलन का पर्व (हरितालिका या हरियाली तीज, गनगौर) हो या फिर भाई बहनों के संबन्धों की रेशमी डोर। गदराई डालों पर लटकते झूले, बागों में नाचते मयूर, पीहू-पीहू कुहुकते पपीहे...झींगुर और दादुर सभी का तो अपना-अपना संगीत है और साथ ही रंग-बिरंगे परिधानों में सजी-संवरी रमणियां; सावन की छटा मनमोहिनी है और पहली बरसात का तो आज भी बेचैनी से ही इन्तजार होता है।

फूलों का सिंगार, झूले, मेंहदी, चूड़ी, बिन्दी, महावर और साथ में कजरी और बिरहे के उल्लासित भीगे-भीगे स्वर... मीठी-मीठी छेड़छाड़... प्रकृति ही नहीं, इस ऋतु की सरस परम्पराएं और तरह-तरह के गीत, जन-जीवन में भी उतने ही लुभावने और प्रचिलित हैं, जितने कि मध्यकालीन मुगल और राजपूत चित्रकला या काव्य व साहित्य में दिखाई देते हैं। 

शहरों में जीवन भले ही बदल जाए, पर गांवों और छोटे शहरों में जन-मानस आज भी वहीं-का-वहीं  है...प्रकृति के करीब और जोशीला ! सैकड़ों सालों से चले आ रहे इन त्योहारो को... ऋतुओं के परिवर्तन को आजभी वैसे ही गाजे बाजे से, हर्षोल्लास के मेले के रूप में ही मनाया जाता है।

और शायद यहीं आकर भारत अन्य देशों से भिन्न हो जाता है। अति व्यस्त जीवन-शैली के होते, जहां पाश्चात्य देशों में क्रिसमस को छोड,  सभी त्योहार... हर खुशी सप्ताहांत तक ही सीमित रहती है (वैसे भी जहां बारहों महीने बरसात हो...न आने का पता, न जाने का, तो भरपूर स्वागत कैसे हो पाए और जहां मां-बाप, भाई-बहनों या पारिवारिक सदस्यों तक का खुले मन से स्वागत न हो, वहां ऋतुओं का कैसा! न किसी के पास वक्त है और ना ही चाह।) परन्तु भारत में आज भी हर ऋतु के आगमन को त्योहार की तरह ही मनाया जाता है, और ये उत्सव कभी-कभी तो एक दो दिन नहीं, महीनों या पूरे-पूरे पखवाड़े(पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक) चलते हैं, फिर वर्षा तो वैसे भी ऋतुओं की रानी है।  

भारतीय मनीषियों और ऋषियों ने हर महीने एक पर्व की परिकल्पना यही सोचकर की थी कि थके-हारे परिवार पुनः उत्साहित और प्रसन्न-चित हो सकें... मिल-बैठकर हंस बोल लें। आज जब पूरा विश्व ही निराशा और कुंठाओं से ग्रस्त है...हंसी ढूंढता, बेचैन रहता है, तो इन त्योंहारों का महत्व और भी स्पष्ट और सार्थक हो जाता है।

बचपन से ही जिन रस्मों और यादों में जिया जाए, उनसे निकल पाना प्रायः संभव नहीं, क्योंकि यही वे स्मृतियां और अनुभव हैं जो जीवन में नींव के पत्थर बनते हैं। विचारों और सोच में रंग भरते हैं। ये तीज-त्योहार ही तो हमें हमारे विलक्षण भारतीय संस्कार और तौर-तरीके सिखाते हैं। आपस में जोड़ने का काम करते हैं।

सावन के पहले सोमवार से ही बनारस के जन-जीवन में बढ़ता वह हर्षोल्लास, भीड़-भाड़, आजतक भुलाए नहीं भूलती। इस अद्भुत नगरी में यह वह महीना है जब प्रकृति और परमेश्वर एक हो जाते हैं। बाबा विश्वनाथ अपने पूरे श्रृंगार के साथ सड़कों पर घूमते दिखाई देते हैं और हर मन्दिर, हर गली में एक मेला-सा लग जाता है। नव-विवाहिताओं के सिंदूर और महावर की चमक तो गली-गली और कोने-कोने बिक रहे फूलों से होड़ लेने लग जाती है...हो भी क्यों न, श्रंगार और सावन का चोली-दामन का जो साथ है!  

माना कि सावन की झांकी के नाम पर स्वनियंत्रित मानस-मंदिर की वे मूर्तियां गरिमा की जगह कौतुक ही अधिक पैदा करती हैं और लाउड-स्पीकर पर बजते , कजरी, बिरहा और देवी-गीतों को अनसुना कर पाना बच्चे-बूढ़े क्या, किसी के लिए भी संभव नहीं ...(न तब और न शायद आज ही!) पर आसपास के गांवों से आई और उमड़ती भीड़, इस बात की गवाह है कि भगवान के सजे-धजे इस यंत्रीकरण का जनता पूरे साल इन्तजार करती है।  

विधालय में भी यह वर्षा-महोत्सव बहुत जोर-शोर के साथ एक विशिष्ट रूप में मनाया जाता था। करीब-करीब चौदह साल तक लगातार यही सिलसिला था (शिशु-बिहार से स्नातक तक)। पचास-साठ बालिकाओं के सामूहिक नृत्य के साथ सुबह-सुबह सात बजे ही प्रभात फेरी...फिर शान्ति-निकेतन की ही परम्परा पर विविध और अनोखे सांस्कृतिक कार्यक्रम। नए-पुराने बाउल-गीत, रविन्द्र-संगीत, मनीपुरी नृत्य सभी का समावेश, हर साल ही एक नया समां बांध देता था। अल्पना और फूलों से गुंथे मंच के साथ-साथ लकड़ी के पीढ़े और स्तंभ...सभी महीनों पहले से ही रंगने-संवारने शुरू हो जाते थे और हर साल ही छोटे-बड़े सभी ये काम विद्यार्थी खुद-ही तो किया करते थे, वह भी गए साल के दुगने उत्साह से। हरेक को बस एक ही फिक्र रहती थी कि कुछ और नया व अच्छा कर पाए! फिर एक सावन वह भी आया जो शान्ति -निकेतन में गुजरा, आजतक भुलाए नहीं भूलता। कला और परम्पराओं की मानो बाढ़ आ गई थी चारो तरफ। हर दिन त्योहार... एक नया महोत्सव। घने पेड़ों की शाखों से टपकती बूंदों के नीचे भीगते अक्सर ही लम्बी सैर पर निकल जाया करते थे सान्थाल-गांवों की तरफ। वहां घरों के दरवाजे पर बंधी बंदनवार, और घंटियां, नित-नई अल्पना, नए-नए बाउल गीत (बंगाल के गांवों में गाए जाने वाले भक्ति रस में डूबे भिक्षु गीत)---और आदिवासियों के हाथों बनाया गया वह बेंत और चमड़े का सामान, बातिक और एम्बौस् टेक्नीक से बहुत ही कलात्मक ढंग से सजा-संवरा...उन पिछड़ी जातियों की लोक परम्परा और अनूठी प्रतिभा को बेहद पास से देखने और जानने का अद्भुत मौका था वह!

ऋतु की भीनी-भीनी स्मृति सुगन्ध...उल्लासपूर्ण अनूठे गीत-संगीत, सभी को समेटकर (कीचड़ व उमस तक को भूले बगैर) आप तक पहुंचाने का प्रयास है यह अंक ... किस अंतस को कितना भिगो पायीं ये फुहारें...काश, जान पाते!

 

      

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ऋतु विशेषः 

(यूं तो भारत के हर प्रान्त में ही वर्षा का स्वागत जोश से होता है परन्तु उत्तर प्रदेश और राजस्थान में वर्षा की छटा निराली है। स्वागत की कई-कई रसीली और  गीत-संगीतमय परंपराएँ हैं। स्मृति कोष से यादों के उन्ही चन्द छींटें को लेकर आ पहुंची हैं कादम्बरी मेहरा।)

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बरखा ऋतु और तीज-त्योहार

-कादम्बरी मेहरा-


 

ई सावन की बहार, पड़े बूंदन फुहार

देखो भींजत अंगनवां , अरे संवरिया।। देखो...

गोरिया के  माथे सोहे लाली रे टिकुरिया।

सिर पे धानी रे चुनरिया, अरे संवरिया।।

 

भारत का श्रावण मास ! श्रावण नक्षत्र से श्रावण यानी सावन। 'मासे  मासोत्तमे श्रावणमासे।'

बैसाख, जेठ व आसाढ़ की तपिश के बाद घने काले मेघों का मास जिनकी उदारता मौसम को ठंडा बना देती है। मौसम की यह जीवन-दायिनी  शीतलता, कौन इससे वंचित रहना चाहेगा। अंग्रेजों ने भी इसके अभ्यागत असर को अनुभव किया । मौसम से ही शब्द ढाला मौनसून। यूं तो आसाढ़ से  ही मेघ आकाश पर छा जाते हैं परन्तु सावन आते-आते सारी सृष्टि अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित हो जाती है। मैं ठहरी रंग रसिया। सघन भूरे संवलाए आकाश  के नीचे हरियाली के सारे स्वर ! सावन मास न केवल रंगों का वरन् स्वरों का भी मास है। एक ओर घन-गर्जन व जल-नर्तन, दूसरि ओर पशु-पंछियों का कलरव और इम सबसे सर्वोपरि किशोरियों के स्वर,

आयो सावन अधिक सुहावन

     वन मां बोलन लागे मोर।

दामिनी दमकें मेघा गरजें

       रिमझिम मेंह मचावें शोऱ।।

कदाचित  निरंतर श्रवण के लिए इस ऋतु का नाम श्रावण रखा गया होगा।

 भारत के सभी कवियों ने श्रावण मास की सुन्दरता व उसके प्रभाव को व्यक्त किया है। रामायण में श्री राम सिया को ढूंढते समय कहते हैं,

घन घमंड नभ गर्जत घोरा। पिया बिनु डरपत मन मोरा।

दामिनी दमक रही घन माहीं। खल की प्रीत जथा चिर नाहीं।।

साधु सन्तों के लिए यह प्रवचन का समय है,

पावस आइल देखि कै कोइल साधै मौन।

दादुर जब वक्ता भये पूछत हमको कौन।।

या फिर

बढ़त बढ़त संपत्ति सलिल, मन सरोज बढ़ि जाय।

घटत घटत फिर ना घटै, बरु समूल कुम्हलाय।।

 सावन ऋतु में भरे जलाशयों में कमल के विकास को देखकर कवि ने लालच का वर्णन किया है ।

किसान के भाग्य खुल जाते हैं। नम धरती। बोआई का समय। पशु के भाग्य खुल जाते हैं। नम घास। चराई का समय। स्त्रियों के भाग्य खुल जाते हैं। भरे जलाशय। पानी भरने की छुट्टी। मेले झूलों के लिए समय मिल जाता है।

श्रावण मास। धरती की अंगड़ाई के साथ ही युवा जगत भी अंगड़ाई लेता है। रोमांस का समय। किसी का मिलन । किसी की जुदाई। मौसम की ठंडक का फायदा उठाकर कमाई करने शहर हाट चले जाते हैं। विशेषकर कला-जीवी। गर्मियों में छप्पर के नीचे बैठकर जो हाथ की कुशलता से सामान तैयार किया था वही मेलों में बिकेगा। कुछ बेचेंगे, कुछ खरीदेंगे,

रानीः -राजा लश्कर जइयो जी तो लइयो मोरी धानी चुनरी।

राजाः -रानी मैं क्या जानूं जी कि कैसी तोरी धानी चुनरी ।।

रानीः -ऊदा ऊदा दढिया होय किनारों चहुंओर जड़ी।

राजाः -रानी अबकी जइहों जी शहर से लइहों धानी चुनरी।

रानीः - राजा इहां कैसे ओढ़ेंगे नजरिया लागे धानी चुनरी।।

राजाः - रानी पीहर जइहो जी , उहां पै ओढ़ौ धानी चुनरी।

राजाः -रानी हम कैसे देखेंगे कि कैसी लागे धानी चुनरी।

रानीः - ओ राजा तीज पै अइहो जी तो तब देखो धानी चुनरी।।

सावन  में मायके जायेगी। क्योंकि सावन भाई बापू की खैर मनाने का मास है। घर में दूध-दही, फल, अनाज  की बहुतायत होती है। बेटी का मरद परदेस चला गया तो बेटी को मायके बुला लिया जाता है। कवि  शैलेन्द्र ने ऐसी ही एक किशोरी की हृदय विदारक अरज एक गीत में उतारी है,

अबके बरस भेज भइया को बाबुल

         सावन मां लीजो बुलाय रे।

अंबुआ तले जब झूले पड़ेंगे

              ठंडी पड़ेंगी फुहारें

लौटेंगी जब तेरे आंगन में बाबुल

               सावन की ठंडी बहारें

पूछेंगी जब मेरे बचपन की सखियां

                 दीजो संदेशा भिजाय रे।

आज भी जब बेटी बेटे ब्याह गये, माता पिता स्वर्ग सिधार गये, यह गीत आंसुओं से रुला जाता है। झूले को देखकर किसे मायके की याद नहीं आती ?

मैने देखा पूरे भारत में जितना झूले का चाव है अन्य किसी सभ्यता में नहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के भारत पर दृष्टि डालें तो बगीचे रखना रईसों का शौक था, खासकर गंगा और जमुना किनारे वाले शहरों में। यह बगीचे वनस्पति संग्रह के लिए कम और ऐशो-आराम संग्रह के लिए अधिक होते थे। इनमें बाकायदा आरामगृह, वीथियां झरोखे, गोल गुम्बददार जालियां (गजीबो), शिकारगाह, अमराइयां, संगीतकारों के रहने के इंतजाम आदि होते थे। श्रावण मास में झूले डलवाये जाते थे और मित्रों का जमघट लगता था। बनारस ऐसे बगीचों के लिए प्रसिद्ध है। अपने बचपन की यादों में ऐसे बगीचों में की गई पिकनिक की याद है। पिताजी के ननिहाल में ऐसा ही एक बगीचा था। अब वहां पिताजी की नानी, नारायणी देवी के नाम पर नारायण नगर बस गया है। ननिहाल वाले मकान में एक ओर घर-वालियां रहती थीं और दूसरी ओर दीवानखाना था जिसमें शाम को संगीत की महफिलें सजती थीं। उस समय की मशहूर गायिका थीं स्वर्गीया श्रीमती जद्दन बाई, जो श्रीमती नरगिस दत्त की मां थीं।

तब ना टी.वी. था, ना रेडियो। संगीतकार इन्ही महफिलों के दम पर अमर संगीत रच पाये। रेडियो का युग आया तो श्रीमती जद्दनबाई स-दल-बल मुंबई पधार गयीं। संगीत का स्वर्ण-युग यों ढल गया। हमारे भाग्य में रह गया सेकेंड हैंड संगीत-श्रवण, यानि असली गायन के सी.डी, टेप आदि।

फिर भी जब शुभा गुर्टू की स्वर-लहरी गूंजती है,   

झूला, धीरे से झुलाओ बनवारी रे

                    सांवरिया बनवारी रे

झूला झुलत मोरा जिया डरत है

 याद आते हैं मौलश्री के फूल, तुलसी के नन्हे नन्हे गाछ, मेले से लाई पैसे पैसे की गागर, सुराही और धानी, गुलाबी रंगों की पुड़िया। जाने कितनी छोटी छोटी लकीरें रंगके हम सजाते थे अपनी कपड़े की गुड़ियाँ। कुर्सी के डंडे में उनके लिए झूला बांधा जाता था। खाटों के पीछे उनकी ससुराल और बरांडे के दूसरी ओर मायका। क्या वह कल्पना का अछूता स्वर्ग कभी साकार हो पाया किसी अल्हड़ बाला के यथार्थ में ?  संदेह है,   

बैरन जवानी ने झूले सजाये

और मेरी गुड़िया चुराई

बाबुल रे मै तेरे नाजों की पाली

          काहे को हो गई पराई...

 थोड़े हाथ-पांव लम्बे हुए तो कुछ लच्छन सीखो की गुहार पड़ने लगी। जन्माष्टमी के ड्रामे। माखनचेर लीला !

बरांडे में एक ओर चादरों में नाडा डालकर पर्दा बनाया जाता था, उसके पीछे तखत बिछाकर स्टेज। स्टेज से सटा कोठरी का दरवाजा-यानि हमारा नेपथ्य ! पांवों से भारी सेर सेर भर के घुंघरू बांधकर नाच ! तबले से अधिक तखत की पट पट ताल ! 

अरे नागनिया बन के डस गई मोहन

                                तेरी बांसुरिया।

रिमझिम रिमझिम मेंहा बरसे

                              चमके बिजुरिया।

अरे मै कैसे आऊँ मोहन मेरी

                              भीगे चुनरिया। अरे नागनिया...

कारे कारे बदरा गरजें

                                  डरपत रे जियरा

अरे मैं कैसे आऊँ मोहन

                                  नाहीं सूझे डगरिया।

 तब क्या अभिसारिका नायिका का अर्थ पता था ? क्या हमारी मां दादी को भी पता था ? 

झूले पर पेंग चढाते ।  धक्का देती कहारिन गंगाजली ! समवेत स्वर गूंजता,

उड़ि जाओ रे सुगनवा गंगा पार

                       खबर लाओ साजन का।

जिया सावन में लरजे हमार

                         बताय जाओ साजन का।

सोने की थाली में जेवना परोसा

                      उड़ि जाओ  से सुगनवा गंगा पार

                            खिलाय आओ साजन का।

रूपे की गागर गंगाजल पानी

उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार

                         पिलाय आओ साजन का।

मोगरा के फूलन बिछौना लगाया

 उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार

                        बुलाय लाओ साजन का।

कोई  नवोढ़ा परदेस गये पिया को याद कर रही है सावन में। तोते को दूत बना रही है संदेश भिजवाने के लिए। तोते से याद आयी---कच्चे अमरूदों की ललक ! काले नमक की चोरी। तोते के झूठे ज्यादा मीठे होते हैं ! तोते का काटा खाओगी, जुबान पैनी हो जायेगी। संस्कृत के रूप अच्छी तरह रट पायेंगे। और वह कच्चे करौंदे, कंटीली झाड़ियों में घुस-घुसकर झोली भरते थे उनसे। यहां उसे क्रेनबरी कहते हैं। आयुर्वेद ने उसे सौ गुणों से युक्त माना है। उन्ही से सीखकर इस देश में क्रेनबरी हर चीज में परोसी जा रही है जबकि भारत में इसकी उपज और प्रयोग नगण्य है।

सावन की बात चली तो गीता दत्त की याद आई। कितना सटीक वर्णन,

हौले हौले हवाएं डोलें, कलियों के घूंघट खोले

आना मेरे मन के राजा पिहू पिहू पपीहा बोले।।

कारे कारे बदरा छाये और संदेशा लाये

सावन सुहावन आया, पिया मोरे तुम ना आये।।

बिरही गगन रोये, मेरे दो नयन रोये

पिया तुम पास नहीं कहां किस देस खोये।

घन घन बदरा गाजे घन घन पायल बाजे

छाई छाई हाय बहार, तुम बिन जिया ना लागे।।

विरहा  बात चली तो मीराबाई की सानी कहां ?  

 

बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की

सावन मे उमग्यो मेरो मनवा भनक सुनी हरि आवन की

उमड़ घुमड़ चहुं दिसि से आयो दामन दमके झर लावन की

नान्ही नान्ही बूंदन मेहा सीतल पवन सोहवन की 

मीरा के प्रभु गिरधर नागर आनंद मगन गावन की।

श्रावण नक्षत्र के साथ ही चौमासा शुरु होता है। यानि देवता सो जाते हैं या कहिए छुट्टी पर चले जाते हैं। चौमासा यानि सावन, भादों, क्वार व कार्तिक ! असाढ़ मास की चांदनी एकादशी को देव-शयनी एकादशी भी कहा जाता है। तबसे लेकर कार्तिक मास की देव-उठनी एकादशी तक चौमासा। देव उठनी एकादशी को तुलसी विवाह होता है, फिर सब ठीक। इस काल में हिंदु विवाह आदि नहीं करते थे। कारण था स्वास्थ्य ! बरसात में जलचरों का बाहुल्य, मच्छरों, मक्खियों एवं कुकुरमुत्ते का उद्भभव अनेकों मौसमी संक्रामक रोगों को जन्म देता है। इसी कारण से जैन धर्मावलम्बी मूलक सब्जियां नहीं खाते। दही भी नहीं खाया जाता क्योंकि उसमें बैक्टीरिया होते हैं और बरसाती दही अक्सर बुड़क जाता है। भारत में कढ़ाही में तला भोजन अदिक शुद्ध माना जाता है क्योंकि उसमें संक्रामक रोगाणु नहीं बच सकते। इधर पानी बरसा उधर पकौड़ों की मांग आई। चाय और पकौड़े। तले समोसे, अंदरसे, जलेबियां, पतावड़, पुलबड़ियां आदि बरसातों के प्रिय व्यंजन हैं। सावन मास में धूप न निकलने के कारण संक्रामक रोगों के कीटाणु मर नहीं पाते। कीट-पतंगे जलाशयों में पानी भरने से बहुलता से जन्मते हैं। ताजी तुलसी की पत्ती व अदरक की चाय गुणकारी होती है।

श्रावण मास के प्रमुख त्योहार सोमव्रत एवं मंगलागौरी पूजन है। पूरा महीना शंकर पार्वती को अर्पित है। सावन के सोमवारों को मंदिरों में श्रंगार किया जाता है। अनोखे श्रंगार। बनारस के मारवाड़ी मन्दिर में मक्खन की बट्टियों का श्रंगार देखा। मक्खन को शुद्ध करके उसी के फूल-पत्ती, झूले, मूर्तियां, खंभे, पशु-पक्षी ! पिघलता भी नहीं था। भारत की हस्तकला देखने का सबसे सुन्दर अवसर इसी समय प्राप्त होता है।

श्रावण मास के मंगल किशोरियां पति प्रप्ति के लिए व्रत रखती हैं  एवं विवाहिता स्त्रियां पुत्र कामना से गौरी का पूजन करती हैं।

कामिका एकादशी व्रत कृष्णपक्ष की एकादशी को रखा जाता है, जिसके प्रभाव से पाप नाश होते हैं।

सारी दुनिया को अचंभित करने वाला श्रावण मास का अनूठा त्योहार है नाग-पंचमी। पूरे भारत में नागों को बुलाकर दूध पिलाया जाता है। विश्वास है कि ऐसा करने से सांप नहीं काटता। दरअसल वर्षा के आगमन से सांपों के बिलों में पानी भर जाता है और वह बिलबिलाकर बाहर निकल पड़ते हैं। मेढकों का स्वर्णकाल यही होता है और शिकार करने का सांपों के लिए इससे अच्छा समय और क्या होगा।

नागपंचमी की