सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

 

badhte 

                     लेखनी-अँक-6-अगस्त 2007

              Indians rediscovering themselves ! 

                    

               

                          Quote of the month

 

" अंग्रेजी का माध्यम भारतीयों की शिक्षा में सबसे बड़ा कठिन विघ्न है।...सभ्य संसार के किसी भी जन समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है। "

                                                                      -महामना मदनमोहन मालवीय- 

 

 

 

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राष्ट्र-संघ में हिन्दी

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सकल्प या सरोकार !

 
13 से 15 जुलाई तक न्यूयौर्क मे विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ और पूरा न्यूयौर्क ही हिन्दीमय हो गया। हर हिन्दी प्रेमी की आखे न्यूयौर्क पर थी और मनचाहे निष्कर्ष के लिए ललायित थीं। पर एकबार फिर सैकड़ो परचे और घंटो की प्रदर्शनियों और चर्चों के बाद  मात्र एक घोषणापत्र के साथ विद्वत् समाज विदा हुआ...हिन्दी की दशा या दुर्दशा नही, अगली साल की जगह और तारीख के बारे में सोचते हुए...निष्कर्ष रूप पारित घोषणा-पत्र में से  कुछ  योजनाओं ने ध्यान जरूर आकर्षित किया ...योजनाएं जो जाने कबसे शुरु हो जानी चाहिए थीं:

-सम्मेलन प्रधानमंत्री जी के इन उद्गारों का भी स्वागत करता है कि बाहर बसे अनिवासी भारतीय लेखकों का हिंदी साहित्य भी पाठ्यक्रम में लिया जाए और दुनिया के अन्य देशों में हिंदी पढ़ाए जाने के लिए मानक पुस्तकें बनाई जाएं। सम्मेलन प्रधानमंत्री जी के द्वारा हिंदी को इंटरनेट की ताकतवर भाषा बनाने के लिए अच्छे हिंदी सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और खोज इंजन बनाने की व्यवस्था ...।  

और मुख्यतः

7. केंद्रीय हिंदी संस्थान भी विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार व पाठ्यक्रमों के निर्माण में अपना सक्रिय सहयोग दे। "

इन प्रस्तावों को अगर  वाकई में कार्यान्वित किया गया और इनपर  ठीक से ध्यान दिया गया तो हिन्दी और प्रवासियों के हित में विदेशों में लिया गया यह एक  सफल और ठोस कदम होगा। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का संपूर्ण घोषणा-पत्र विश्व हिन्दी सम्मेलन की औफिशियल वेव-साइट पर पढ़ा जा सकता है। 

तो पहले दूसरे और तीसरे की तरह यह आठवां सम्मेलन भी समाप्त हो ही गया, यादों की स्मारिका में एक नया पन्ना जोड़कर विद्वत व उत्साही जनसमुदाय ने एकबार फिर एक दूसरे से विदा ली...परन्तु एक प्रश्न तो फिर भी सबकी ही आंखों के आगे सांप-सा कुंडली मारे ही बैठा रह गया 'अब आगे और क्या '...बारबार पूछने को मन करता है उनसे जिन्होंने आठों सम्मेलनों में भाग लिय़ा  -कितनी प्रगति हुई, कितने सार्थक दिखते हैं ये प्रयास  ?
प्रश्नों के  उत्तर तो शायद आज भी भविष्य की गोद में ही सोए पड़े हैं परन्तु मानस पटल पर हिन्दी का वह पर्व जरूर ही अपनी खट्टी मीठी यादें  संजोए जा बैठा है और  शायद  भुलाए भी न भूलें
हिन्दी के वे अद्बुत तीन दिन !

एक कोलाज था चारो तरफ...घटनाओं का...समस्याओं का ...लोगों का। कही आखें ही आखें थीं, सब देखती, समझती, तो कहीं बस कान थे, लगातार सुनते, मनमानी गढ़ते और  सबको घेरे हुए था एक विशाल उत्साही जन समुदाय ... भीड़ के रेले के साथ-साथ पल-पल ही  संचालित और यंत्रवत् दौड़ता-भागता, अजस्र वाग्धारा की उर्जा पर, अदम्य जिज्ञासा पर, कुछ नए, कुछ पुराने मित्रों के संग मिल-बैठने की बेइन्तहां ललक पर... दो पैरों के अथक वाहन ... और सद्भावना के संकल्प पर। 

मात्र तीन दिन के छोटे-से समय में कई-कई बड़ी-बड़ी समस्याओं के हल ढूंढने थे ...हिन्दी का भविष्य, भारत का भविष्य और साथ-साथ प्रवासियों से लेकर भारतवासियों तक के लिए, कई महत्वाकांक्षी और सार्थक योजनाएं ...विश्व-भारती का कुटुम्ब सम्मेलन था वह।

सार्थक और निरर्थक शब्दों के ठहाकों और तरह-तरह की हिन्दी के प्रति चिन्ताओ के कोलाहल में डूबा, हिन्दी के उत्थान के लिए उत्साहित व परेशान, इधर से उधर दौड़ता-भागता वह हिन्दी-प्रेमी समुदाय वास्तव में पूर्णतः निमग्न लगा। संक्षेप मे लिखूं तो बिल्कुल कुंभ के मेले-सा ही वातावरण था, जहां विद्वान और साधू, सिद्धहस्त योगी व आत्मविभोर श्रद्धालु और छद्मवेशी सभी आ पहुचे थे हिन्दी की वैतरणी में डुबकी लगाने।     

 तीन दिन के लिए न्यूयौर्क की वह सेवेन्थ एवेन्यू हिन्दी का राजमार्ग बन चुकी थी, जिसपर चौबीसो घटे हिन्दी की ही सवारी चल रही थी। आते-जाते टैक्सी-ड्राइवर, इस अद्भुत और रंग-बिरंगी भारतीय छटा से अभिभूत थे। पूछ रहे थे, " कैसा और क्या महोत्सव चल रहा है यहांपर...क्यों इतने सारे भारतीय जमा हैं ...क्या कोई भारतीय फैशन शो है (सारे कार्यक्रम फैशन इन्स्टीट्यूट मे ही तो थे, इसलिए उनका ऐसा सोचना भी तो सहज और व्यवहारिक ही था और फिर वह भारतीय महिलाओ के रंग-बिरंगे परिधानों की अभूतपूर्व छटा...उससे भला कोई कैसे बच पाता)?"

ऐसा नही कि बस बदहवासी और उन्माद के पंखो पर ही जिए जा रहे थे हम। बहुत कुछ ऐसा हो रहा था पलपल, जो सार्थक भी था और इतिहास भी रच रहा था। पहले ही दिन की सुबह जब यू.एन.ओ में हिन्दी गूंजी, तो मानो हर भारतीय और हिन्दी प्रेमी का दिवा-स्वप्न जी उठा और दिन भर की चहल-पहल और गंभीर चर्चे व पर्चों के बाद, हर शाम एक अलग तरह का ही ललित और जोशीला रंग लेकर आई। 

कवि सम्मेलन में जब बहु-चर्चित हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने अपने तीखे व्यंग्यों को प्रस्तुत किया तो उपस्थित श्रोताओं का हंसते-हंसते बुरा हाल था ( उनका वह आयकर के साथ कवि सम्मेलन में मिले हजारों जूतों पर भी इनकम टैक्स देने वाली लाइन जहां सटीक थीं वहीं इनकम टैक्स वालों का जबाब कि नहीं आप ही रखो हमारी तरफ से तो एक लाख तक की छूट है वाकई में नहले पर दहला था)। यही नहीं, तीनों दिन गंभीर विचार विमर्श के साथ-साथ कितने रोचक और यादगार भी होंगे, इसका भी भरपूर आभास मिल गया  हमे उस पहली ही शाम से।

विवेकी और सरस श्री अशोक चक्रधर जी के संचालन में संचालित और उनके प्यार भरे लवस्कार के साथ कवि सम्मेलन कविता-सा ही बहता रहा तीन घंटे तक। एक-के-बाद-एक कई भावभीने और गरिमामय काव्यपाठ हुए। कविताओं के नए-नए रंग आए और भावनाओं का एक बहुरंगी इन्द्रधनुष। परन्तु समय इतना कम लगा और काव्य पिपासा इतनी जगी कि बाद में छोटे-छोटे  और भी निजी सम्मेलन हो ही गए और गई रात तक चले भी। 

दूसरी शाम थी भारत की सुरीली ललित कलाओं की धरोहर के नाम, जब विलायत खां के साहबजादे शुजाद अली और उनके सुपुत्र ने सभागार का मन जीतने के लिए अपने सहयोगियों की संगत में सितार और गिटार उठाए और पूरे ही परिसर को मंत्रमुग्ध कर दिया। फिर नृत्यांगना पद्मश्री गीता चंद्रन का अपने ग्रूप के साथ मनोहारी नृत्य...मन घंटों सुनने और देखने के बाद भी और-और ही मांगता रह गया। तीसरी शाम आयी गजल सम्राट पंकज उधास को लेकर, जिनकी मखमली आवाज को किसी भी परिचय की दरकार नहीं, परन्तु व्यक्तिगत मजबूरियों की वजह से जिसे सुने बिना ही इंगलैंड वापस लौटना पड़ा मुझे। परन्तु यदि अनुभव के आधार पर लिखूं, तो जो थे, या जिन्होंने उन्हें सुना होगा , अवश्य ही इस समापन सांस्कृतिक शाम में केक पर शीर्शस्थ चेरी जैसा ही आनन्द उठाया होगा ...क्योंकि सुर...साज और सोज़ के अद्भुत संगम का ही तो नाम है पंकज उधास।       

सच कहूं तो कई-कई गरिमामय पल आए उन बहत्तर घंटो मे, जिनसे प्रभावित व अभिभूत मन भावुक हो चला और आँखें पूर्णतः नम। पल जिन्होने याद दिलाया कि इसी न्यूयौर्क मे खड़े होकर कभी हमारे पूर्वज और मनीषी स्वामी श्री विवेकानन्द जी ने भी अपना पहला आख्यान दिया था, जिसने भारतीय धर्म ( समाज के स्थाई संकल्प) और दर्शन ( मुख्य विचारधाराओं) की दुंदुभी बजा दी थी इस' बिग एपल ' में...और उपस्थित हर मन में भारतीयता के झंडे लहरा दिए थे।

विवेकी मंत्री महोदय श्री आनन्द शर्मा जी के आग्रह पर जब य़ू. एन. ओ के मुख्य सभागार में सत्र की शुरुवात जन-गण-मन अधिनायक से हुई, तो उपस्थित समुदाय के उल्लासित चेहरों पर इरादों की कुछ और दृढता व सच्ची निष्ठा आ मिली थी। फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के सचिव वान की मून ने अपने आत्मीय और भावभीने भाषण में भारत और भारतीय भाषा हिन्दी के साथ आत्मीय सबन्धो का उद्घोष करके , बारबार हिन्दी और कोरियन मिले-जुले उत्पादन के इन्तजार की बात करके (उनकी बेटी ने एक भारतीय नवयुवक से विवाह किया है) वातावरण की गरिमा को बनाए रखते हुए भी, माहौल को एक नया और उल्लासमय सदर्भ दे दिया ...झीनी ही सही हिन्दी को एक आत्मीय मान्यता देते हुए उन्होंने हिन्दी और विश्वभाषा की दूरियो को, असफलता के  भय को कुछ और कम कर दिया ... इतना कम कि माननीय मंत्रीजी तक खुद को न रोक सके और कह बैठे कि अब तो आपकी समझ में आ ही गया होगा कि हमारा यही सभागार चयन करना, मुहिम को यहांतक लाना कितना अधिक सही था।

 परन्तु अगले पल ही, अगली बार क्या क्या प्रयास होने चाहिए, और क्या क्या होगा कि हिन्दी विश्व-भाषा बन सके जैसी वार्ताओं ने तुरत ही उस सुनहरी आशा की धूप पर गहन काली शंकाओं के बादल भेज दिए और भूला-बिसरा एक दुख मन को रह-रहकर फिरसे सालने लगा ---क्या हम अपने और देश के कोष को और अधिक सोच, कौशल और उपयोगिता के साथ इस्तेमाल नही कर सकते ...कुछ भी कहें, अभी भी कई-कई भयावह सिन्डरैला समस्याएँ हैं समाज और जीवन में, जिनकी तरफ ध्यान देना आजभी, भारत के इस  हाल ही में उपलब्ध  व्यापारीकरण के सफल युग में भी, अत्यंत जरूरी है ।

कुल मिला-जुलाकर न्यूयार्क के उन तीन दिनो की सबसे बड़ी और मुख्य उपलब्धि थी,कई-कई विद्वानो और प्रियजनो का एक बेफिक्र और खुले माहौल मे मिलना-जुलना, आपस में विचार-विमर्श करना। कई-कई गरिमामय और औजस्वी वाक् सरस्वती में मानस  ने  अनगिनित डुबकियां लीं। और कई-कई मनीषी विचारधाराओं का आपस में टकराव, हिन्दी और भारत के विश्व-परिवार के लिए सोच में एक नई उर्जा की उत्पत्ति कर गया। हां एक ही समय मे दो-दो सत्र होने की वजह से समय और चयन की उलझन जरूर थी, फिर भी जो भी मिला,प्रसाद की तरह उसे ही ले-देकर मन सतुष्ट भी था और स्फूर्त भी। वार्ताओ के आयाम बहुरगी और विविध थे। ग्याना की  युवा और नई पीढ़ी की  महिला का भारत और भारतीय संस्कृति से लगाव व हनुमान-चालीसा का पाठ मन जोड़ने वाला था और उनकी हिन्दी शिक्षण पुस्तिकाओ और शिक्षको के लिए की गई भावभीनी फरियाद मन को छू गई...दूसरी याद जो मुखर है वह है श्रीगुलजार जी की हिन्दी फिल्मी गीतो पर एक बेहद रोचक वार्ता...' जहा गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है' और ' बीड़ी सुलगा ले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है' और ' तेरे बिना जिन्दगी से----' आदि तरह- तरह के रसीले और भावोत्तेजक गीत कैसे चरित्रानुसार उनकी कलम से निकले ---जैसी अपनी रचना प्रक्रिया उन्होने श्रोताओ के साथ बांटी और साथ में ही जापानी हिन्दी प्रेमियों की उपस्थिति में बारबार ' मेरा जूता है जापानी,ये पतलून इंगलिस्तानी, सरपर लाल टोपी रूसी, फिरभी दिल है हिन्दुस्तानी। ' गीत का उल्लेख हर भारतीय मन को अद्भुत काव्यमय राष्ट्रीयता से ओतप्रोत कररहा था वहीं  दोनें अमरीकी शिक्षिकाओं  के अनुभव भी कम रोचक नहीं थे। इन्होने बताया कि कैसे हिन्दी फिल्मी गीतों के सहारे वे हिन्दी व्याकरण जैसे क्लिष्ट विषय को भी अपने शिष्यों को समझा पाती हैं। बहुत ही आँख खोलने वाला अनुभव था वह...वाकई में जहां चाह वहां राह ! सुषम जी का प्रवासियों से आत्म-निरीक्षण का आवाहन भी प्रशंसनीय था। हर लेखक का अपना पाठक और आलोचक होना उतना ही जरूरी है जितना कि रचना प्रक्रिया में डूबना, तभी तो वह नीर-क्षीर विवेकी होकर उत्कृष्ट व विशिष्ट कृतियां दे पाएगा।

श्री करण सिह जी का ओजस्वी समापन भाषण उस ज्ञान-भोज का यादगार स्वादिष्ट मिष्ठान था...एक विद्वान देश और भाषा-प्रेमी संत के सहज उद्गार थे, जिसे आजभी गर्व है अपनी संस्कृति और संस्कारों पर।

यों तो उन बहत्तर घटो की अनगिनित खट्टी-मीठी यादे बिखरी पड़ी हैं, परिचित और नव परिचितों की...हिन्दी प्रेमियों के बढ़ते परिवार की।  कुछ समयाभाव की वजह से, कुछ न जानने की वजह से कई प्रिय जनों से न मिलपाने का , और कईयों से न मिलने जैसा ही मिलने का अफसोस भी रहा,  परन्तु साथ साथ कई नए अच्छे लोगों  भी मिले और मेरे जैसे संकोची व्यक्ति के लिए इतना ही बहुत था। उन  सभी  यादो में जगमग एक विशेष याद है, प्रिय कथाकारा सूर्यबाला जी से एक छोटी-सी परन्तु आत्मीय मुलाकात और वह भी अचानक ही ब्रेकफास्ट टेबल पर---एक और बेहद प्यारी बहन का कुंभ के मेले में यूं अचानक ही मिल जाना एक सुखद संयोग ही था  क्योंकि माहौल वाकई में बेहद आत्मीय था।  बचपन में पढ़ी सूर्यबाला जी  मेरे सामने थीं...कबसे मिलना चाहती थी उनसे। (वो भी उसी शहर से हैं और वहां के स्थानीय आज अखबार में अक्सर उनकी रचनाएं आती और आकर्षित करती थीं।)... कई-कई प्यारी रचनाओं के साथ   जुड़ा एक पूर्व परिचित नाम,  जिसे इस सम्मेलन ने एक आत्मीय चेहरा  ही नहीं, प्यारी-सी , यादों भरी पहचान भी दे  दी।

अंत में देश और भाषा के प्रति लिए गए हर सही और सार्थक संकल्प के संपूर्ण व सफल होने की कामना करते हुए अपनी बात मैथली शरण गुप्त के शब्दों में  समाप्त करना चाहूंगीः

'मानस -भवन में आर्यजन,

जिसकी उतारें आरती

भगवान भारतवर्ष (और विश्व) में

गूँजे हमारी भारती।। '

 

 

 

*

     

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15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस विशेष

( गदर आन्दोलन के 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं और  देश की स्वाधीनता के साठ वर्ष। स्वतंत्र भारत के इस गौरवमय  और ऐतिहासिक पल पर लेखनी की  ओर से सभी देश-विदेश में बसे  भारतीय और भारतवंशियों को कोटि-कोटि बधाइयां और देश के सभी उन वीर सैनानियों को भावभीनी श्रद्धांजली, जिनके रक्त की एक-एक बूंद के हम  चिर ऋणी हैं।) 

 

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सारे जहां से अच्छा

 

सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलसितां हमारा

 

गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में

समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहां हमारा

 

पर्वत वो सबसे ऊंचा, हमसाया आसमां का

वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा

 

गोदी में खेलती हैं, जिसमें हजारों नदियां

गुळशन है जिसके दम से, रश्के जिनां हमारा 

 

ऐ आबे-रौंदे-गंगा, वो दिन है याद तुझको

उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा

 

मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा

 

यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से

अबतक मगर है बाकी, नामो निशां हमारा

 

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन, दौरे जहां हमारा

 

इकबाल कोई मरहूम, अपना नहीं जहां में

मालूम क्या किसी को, दर्दे निहां हमारा 

 -मोहम्मद इकबाल-

 

 

 

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ऐ मेरे वतन के लोगो 

 

ऐ मेरे वतन के लोगों
तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सब का
लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर
वीरों ने है प्राण गँवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो -
जो लौट के घर न आये -

ऐ मेरे वतन के लोगों
ज़रा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी

जब घायल हुआ हिमालय
खतरे में पड़ी आज़ादी
जब तक थी साँस लड़े वो
फिर अपनी लाश बिछा दी
संगीन पे धर कर माथा
सो गये अमर बलिदानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी

जब देश में थी दीवाली
वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में
वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो आपने
थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी

कोई सिख कोई जाट मराठा
कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पर मरनेवाला
हर वीर था भारतवासी
जो खून गिरा पर्वत पर
वो खून था हिंदुस्तानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी

थी खून से लथ-पथ काया
फिर भी बन्दूक उठाके
दस-दस को एक ने मारा
फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त-समय आया तो
कह गये के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारों
अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने
क्या लोग थे वो अभिमानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी

तुम भूल न जाओ उनको
इस लिये कही ये कहानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो क़ुरबानी

जय हिन्द... जय हिन्द की सेना
जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द।

 रामचंद्र द्विवेदी "प्रदीप"



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                                                                                                                                                     -शैल अग्रवाल

आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन

हिन्दी और प्रवासी साहित्य

(14 जुलाई-2007) 

 

भारतेन्दु हरिश्चन्द ने कभी कहा थाः 

निज भाषा  उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

    

   अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।

     पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

 

   उन्नति पूरी है तबहि, जब घर उन्नति होय।

निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।

             

    निज भाषा उन्नति बिना, कबहूँ न ह्यौंहिं सोच।

        लाख उपाय अनेक यों, भल