सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

Discovering the beauty of stillness.
एकांत
अंक-7-सितम्बर-2007
In you the worlds arise
Like waves in the sea.
It is true!
You are awareness itself.
So free yourself
From the fever of the world.
-Ashtavakra Gita 15:7
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संरचना व संपादन: शैल अग्रवाल.
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पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।
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अपनी बात

-शैल अग्रवाल
' शिवोहँ' या फिर ' अहं बृहास्मि ' के इस संसार में मानव जो ईश्वर के सारे तत्व लेकर पैदा हुआ है यदि अपनी शक्ति को पहचानते हुए, आसपास से सामंजस्य बिठा सके...कुंठित न हो या खुद को प्रदूषित न करे, तो संभावनाओं का अंत नहीं। जरूरत है तो बस ...खुद से साक्षात्कार... एक समग्र दृष्टिकोण की। शांत उस एकांत की, जहाँ हर तनाव से मुक्ति मिल सके और तन-मन दोनों ही कुँठा-मुक्त हो पाएँ। इस मनोवृत्ति के साथ आज के युग की बहुत सी बीमारियाँ जैसे रक्तचाप आदि से भी छुटकारा पाया जा सकता है ! एकांत की आजके व्यस्त जीवन में असंख्य उपयोगिताएँ हैं...जरूरत बस खुद के साथ चलने...किसी भी अन्य चीज की तरह, खुद को, अपनी जरूरतों को, अपने स्वभाव को धैर्य के साथ भलीभांति समझने की है।
किसी सूफी कवि ने लिखा था कि ' जहाँ मैं चुप हो जाऊँ, वहाँ से आकर मुझे सुनो'। यहाँ वह बात सुनने की नहीं, जुड़ने की कर रहा है। जब जुड़ते ङैं तो एकात्मकता खुद ही आ जाती है और हमारी सोच भी सकारात्मक हो जाती है। प्रिय की बातें अच्छी लगती है क्योंकि उसका साथ भाता है और मन उससे पूर्णतः संतुष्ट है। स्नेह, आक्रोश क्या, उसका तो मौन तक भाता है और यदि मन न मिले तो प्रिय-से-प्रिय संवाद भी कड़कड़ ध्वनि ही तो करते रह जाते हैं। स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो, सुनने और समझने के लिए प्रायः ध्वनि-समूह या वाणी ही पर्याप्त नहीं, मनःस्थिति भी एक अहं पात्र निभाती है। याद आ रही है खुद की ही लिखी एक क्षणिकाः
तू ही नहीं, तेरा परिवेश बोलता है
ढूँढ लाता है मन नित नए संदर्भ
और मेरा चेहरा ...
तेरे आइने में खो जाता है।।
अभिव्यक्ति जब तीव्र हो या भावों का बाहुल्य हो तो शब्दों का गूँगे हो जाना स्वाभाविक है। यदि समग्र और सूक्ष्म दृष्टि हो परखने और सुनने के लिए तो हम ही नहीं, हमारे आसपास की हर चीज, पूरी प्रकृति...जड़, चेतन सभी संवाद करते रहते हैं और मौन को भी सुना व समझा जा सकता है। एकाग्रता और तारतम्य के उस अनूठे पल में बैठा इन्सान स्व से निकलकर समस्त से जुड़ जाता है...धरती सा भीगता, आसपास का सब सोखता, चुपचाप कई-कई रंगों में खिलआता है।
हमारे ऋषि मुनि इसी शान्ति को ढूँढते जंगल-जंगल और पहाणों पर भटकते फिरते थे और वह भी तब जब जीवन इतना व्यस्त या उलझा हुआ भी नहीं था। भौतिकता के अजगर ने हमें इस हद तक निगला नहीं था। स्व से साक्षात्कार या रचयिता की तलाश में संसार छोड़े ये एकान्त-प्रेमी मनस्वी सृष्टि और मन के रहस्यों पर सोचते-विचारते जीवन के मूल्यों का मनन किया करते थे और फिर निस्वार्थ भाव और उतनी ही तन्मयता से, अपने शिष्य व संसार के साथ बांटते भी थे।
सन्यास लेकर या एकांत में जाकर बसे ये व्यक्ति संसार से कटते नहीं थे, वरन् और भी जुड़ जाते थे। स्व से निकलकर समस्त हो जाते थे। आजभी आदान-प्रदान से ही सृष्टि आगे बढ़ पाएगी और यही प्रकृति का नैसर्गिक नियम भी है, पर जब हर आदमी ही खुद में डरा और अंसतुष्ट है अपनी ही सुरक्षा सीमा की लाइनें खींचने में लगा है तो फिर दूसरे पर विश्वास कैसे करपाए और दूसरों के साथ कैसे कुछ बांट पाए?
शून्य का अर्थ भारतीय दर्शन में कभी रिक्तता नहीं, संपूर्णता ही रहा है; एक ऐसी सम्पूर्णता या तृप्ति जिसके बाद कुछ भी शेष नहीं रहपाता, ना तो इच्छा ही और ना ही उपलब्धि... पर भावों और समझ के इस सुगढ़ तालमेल के लिए सोच और समझ, दोनों ही चाहिएँ और आज के इस आपाधापी भरे जीवन में दोनों का ही अभाव है। न तो समय है किसी के पास और ना ही चाह। उहापोह व चिन्ताओं से भरे उद्विग्न चित्त में इतनी शान्ति ही नहीं रह पाती कि खुद अपने मन तक की बात सुनी या समझी जा सके...अन्तरात्मा की बात सुनना या फिर आसपास की, दूसरों की जरूरतों को सुनना समझना तो वैसे भी बहुत दूर की बात हो जाती है।
निश्छलता और सहजता आज पीछे छूट चुकी है। खुद अपनी पहचान तक अनजान होती जा रही है। एक अंधी दौड़ में भागते, किधर जा रहे हैं या जाना है, शायद ही किसी को पता हो। बड़ों की तो छोड़िए बच्चों तक से बचपन छिनता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में हाँफते मां-बाप पहले दो तोतले शब्द सुनते ही उन्हें यथार्थ की चक्की में झोंक देते हैं। डेढ़ से लेकर दो साल की उम्र से ही जीवन की दौड़ पाठशालाओं के चक्कर लगाने शुरु कर देती है। बेफिक्र खेल की उम्र में सवाल-जबाब, प्रतिस्पर्धा और परिणामों के दुरूह जंगल में भटका देती है। औरफिर रही सही कसर चौबीसों घंटे आती अनर्गल टी.वी. की चैनल पूरी कर देती हैं। अब प्रकृति और जीवन को देखने-समझने का, आनन्द लेने का वक्त किसके पास है... ठहरे तो दूसरे जो आगे निकल जाएंगे!
अकेलापन कितना सुहाना है, यह कोई कवि, प्रेमी, योगी, चित्रकार या संतुष्ट ही बता सकता है, जिसकी विस्मित और जिज्ञासु आखों के आगे बदलियों में घुमड़ता आकाश हो या चांद-तारों से झिलमिल दोनों ही सुन्दर और रहस्यमय हैं। समृति की सुखद शहनाई पर थिरकता इनका मन पल-पल ही नई-नई राहों पर चल पड़ता है। पैरों के नीचे की नम दूब हो या आँखों के आगे फैली सुनहरी धूप...पूरा ही संसार तो सुन्दर व चित्रमय है; क्योंकि निराश से निराश पलों में भी, अभिन्न संगिनी आशा और प्रेरणा जो साथ हैं उनके। पूरा जीवन ही मानो एक पाठशाला है जहाँ छोटी-से-छोटी घटना पलपल कुछ-न-कुछ सिखाती चलती है...कुछ ले या दे जाती है। कली-कली किलक-किलक के हर सुबह गुदगुदाती है और मस्त पवन पे खुशबू-सा सवार मन हर रात ही कुलाचें मार स्वप्नलोक तक बिचर आता है...अभिष्ट पा लेता है। और यही अकेलापन कितना सूना और डरावना भी हो सकता है, यह किसी अकेले और निराश आदमी से पूछना होगा हमें, जिसके एकाकी संसार की सारी हलचलें खुद उसी के अंतस के कोलाहल में खोयी रहती हैं। सारे शब्द, सारी उमंगें, सुख-चैन मानो आत्महत्या-सी कर लेते हैं। और हताश्, विक्षिप्त-सा वह तिनके-तिनके का सहारा ढूँढता, बस वहीं तो डूबता- उबरता रह जाता है।
संसार की किसी भी वस्तु की तरह अकेलेपन या एकान्त के भी दो पहलू हैं...कौन सा छुएगा यह तत्कालीन मनःथिति पर ही निर्भर करता है। रंगों का और भावों का बहुरंगी ' पैलेट' है सदा ही इन आँखों के आगे। मन की तूलिका किस रंग में डूबेगी और किस तस्बीर को उकेरेगी, उसे ही तो आँखें देख पाएँगी! पर ये स्थितियाँ... ये परिणाम भी तो प्रायः खुद हमारे ही बनाए होते हैं शून्य से रिक्त इस मानस पटल पर। वही 'शून्य' जो सही या दाहिनी ओर आ जाए तो किसी भी शक्ति और मूल्य की इकाई को अपरम्पार करता चला जाए और गलत या बांयी तरफ हो तो पूर्णतः संज्ञाहीन!
शायद यही वजह है कि इस शून्य को इतना अधिक महत्व दिया गया है दर्शन में भी और गणना में भी, पर क्या भगवान की तरह आदमी भी इतना विवेकी और समर्थ है कि मात्र एक शून्य से ही अपने लिए एक मनमाफिक सृष्टि की रचना कर ले...अच्छे-बुरे हर अनुभव से एक सक्रिय और सार्थक निष्कर्ष ले सके!
शक्ति और शून्य की बात चली तो याद आया कि वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरे बृह्मांड में बस एक निश्चित मात्रा की ही उर्जा और सामग्री है, जो इस बड़े से शून्य में उन्मुक्त विचरती रहती है और आपसी जुड़ाव व टकराव से नित नए रूप में विघटित और संघटित होती रहती है। पर इस तरह से तो हम सभी कहीं न कहीं जाकर एक दूसरे से जुड़गए !
स्पष्ट से इस तथ्य को समझने के लिए भी पहले हमें 'मैं' और ' तुम' से रिक्त होना पड़ेगा। 'शून्य ' या एकाग्रता की उसी स्थिति में पहुँचना होगा, जहाँ भेदभाव मिट जाते हैं। पर क्या यह सब इतना आसान है! हाँ, यदि कुछ पल के लिए भी संभव हो पाए, हम उस मनःस्थिति को पा सकें, तो व्यक्तिगत के साथ-साथ मानव-समाज के भी बहुर्मुखी विकास और उत्थान की सीमाएं कई-कई गुना बढ़ जाती हैं, क्योंकि धीरे-धीरे सारी ही नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और भावनाएँ मिटती चली जाएँगी, जो दो कदम आगे बढ़ने पर चार कदम पीछे खींच लिया करती हैं।
आज पश्चिम ने भी इस सोच...चित्त की शान्त, समग्र इस एकाग्रता के महत्व को समझा और सराहा है। जाना है कि कैसे न सिर्फ निर्लिप्त कर्मयोग आशा और निराशा से परे है (गीता), वरन् इस मनःस्थिति के सहारे व्यक्ति अछिन्न शक्तियों से लैस, जीवन की हर लडाई लड़ और जीत सकता है। यही वजह है कि आज अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों में बड़ी-बड़ी मैनेजमेंट कमेटियां और बिजनेस स्कूल विद्यार्थियों को गीता पढ़ा रहे हैं...जीवन और कार्य प्रणाली के सफल संयोजन के लिए पूर्व के संचित ज्ञान और दर्शन का सहारा ले रहे है... ताकि वे भी अपनी समस्त शक्तियों के पूर्णत्व को पा सकें। खुद से लड़ें नहीं, खुद के साथ होकर शान्त और प्रफुल्लित रह पाएँ। उर्जा को बिखेरें नहीं, संजो कर मनोनीत दिशा दे पाएँ!
मन और शरीर की यह संयुक्त मनोदृष्टि( होलिस्टिक एटीट्यूड) ही सामाजिक और व्यक्तिगत स्वास्थ और सफलता की कुंजी है। पर लगता है आज हम भारतीय और भारतवंशी यही बात भूलते जा रहे हैं।
तनावपूर्ण और भागम-भाग भरे इस जीवन से अलग, शान्त और स्वस्थ जीवन की दृष्टि कहाँ से लाई जाए---कहना आसान नहीं। शायद इसके लिए संयमी और संतुलित जीवन और बचपन से ही उत्तेजनाओं की खोज में न रहने वाली प्रवृत्ति के साथ-साथ जो है उसी में संतुष्ट रहने की प्रवृत्ति को भी फिर से सीखना होगा। परिणाम को भूलकर काम पर ही केन्द्रित रहने से लालच और भृष्टाचार जैसी आज के युग की दो सबसे बड़ी महामारी भी समाज से खुद ही मिट जाएंगी।
इसमें ललित कलाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है! वैसे भी ललित कलाओं को योगियों ने भी साधना या योग में से ही एक माना है क्योंकि ये भी तो हमें चरमोत्कर्ष पर पहुँचाकर वही निमग्न और निर्मल आनन्द देती है...जहाँ नाद के सम पर नर और नारायण एक हो जाते हैं और सफेद काले दो रंग के मानव मन में बहुरंगी ज्ञान और शक्ति की आभा का इंद्रधनुष छा जाता है। यह जीवन से पलायन नहीं वरन् खुद को पहचानने की, मन को एकाग्र करने की ही एक प्रक्रिया है। पहला वह फूल जो हमारी आँख के आगे सुबह सुबह अपनी पंखुरियाँ खोलता है या पहली वह किरन जो रात को दिन में बदलने की ताकत रखती है... आज पता नहीं कविता-कहानी और चित्रों के अलावा कितनों ने साक्षात देखी है, परन्तु लेखनी का यह अंक इसबार एकांत के उसी अनछुए जादू के नाम।...
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14 सितम्बरःहिन्दी दिवस पर विशेषः
हिन्दी ही आखिर क्यों???

जब तक आपके पास राष्ट्रभाषा नहीं आपका कोई राष्ट्र भी नहीं।
मुंशी प्रेमचन्द

लोकतंत्र हिन्दी के बिना चल नहीं सकता और यदि चलता है तो झूठा है। ...आज भाषा का संबन्ध विस्तृति से इतना ही जितना सस्कृति से है। आज संस्कृति के नये दायरे बन रहे हैं। मनुष्य संवेदना की खोज कर रहा है और हिन्दी उसकी सेवा मे उपस्थित है।
जैनेन्द्र कुमार

नागरी लिपि में सभी भारतीय भाषाएँ लिखी जाने पर उनमें भेद की दीवारें समाप्त हो जाएँगी।
अज्ञेय

हिन्दी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व्यवहार में आने वाली भाषा है।...देवनागरी दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है।
राहुल सांकृत्यान

अगर हम सधारण बुद्धि से काम लें, तब हमें पता पता चलेगा कि हमारी कौमी ज़बान हिन्दी ही हो सकती है।
सरोजनी नायडू

जिसके लिए हमारी जनता का हृदय फट चुका है, उसकी भाषा अंग्रेजी के प्रति अपना मोह हमें छोड़ देना चाहिए।
रामधारी सिंह दिनकर

यदि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विरुद्ध अंग्रेजी के षडयंत्र को विफल न किया गया तो जनतंत्र मखौल बनकर रह जाएगा।
श्री नरायण चतुर्वेदी

हिन्दी से किसी भी भारतीय भाषा को भय नहीं है, यह सबकी सहोदरा है।...दक्षिण की भाषाओं ने संस्कृत से बहुत कुछ लेन-देन किया है, इसलिए उसी परम्परा में आई हुई हिन्दी बड़ी सरलता से राष्ट्रभाषा होने के लायक है। हिन्दी प्रेम और सौहार्द की भाषा है। आजादी के लिए लड़ाई के समय हिन्दी देश की एकता और राष्ट्रीयता की भाषा रही है। ऐसी भाषा कभी भी विघटन की भाषा नहीं हो सकती।
महादेवी वर्मा

हिन्दी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का स्त्रोत है।...हिन्दी में जो ध्वनि संगीत है, जो शांति की सूक्ष्म झंकार परिव्याप्त है, जो पवित्रता है वह बेजोड़ है। भावी मनुष्यत्व के तत्वों से हिन्दी परिपूर्ण होगी। भविष्य में संस्कृति का जो नवीन संस्करण होगा, उसे हिन्दी अपने में समाहित करेगी।
सुमित्रानन्दन पंत

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समुद्र के किनारेः

-वंशीधर त्रिपाठी
जैसे मौसम के अनुसार पक्षी एक स्थान से उड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं वैसे ही मेरी भी आदत बन गई है। जाड़े में जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ती है, लोगों की कपकपी छूटती है तो मैं दक्षिण भारत की ओर सरक जाता हूँ। इस बार वाराणसी से उड़कर मैं चेन्नई आ गया हूँ। यहाँ मेरी पुत्री पूनम रहती है। उसके पति नितिन पांडेय यहाँ नेस्ले कंपनी में कर्यरत हैं। यहाँ पूनम का परिवार वाल्मीकि नगर में रहता है। यहाँ से समुद्र का किनारा पास में ही है। समुद्र की ध्वनि पूनम के आवास (श्रीकृपा) से सुनाई पड़ती है। समुद्र की यही ध्वनि ब्राह्म मुहूर्त में मुझे जगाती है। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा मैं समुद्र-गीत सुनता रहता हूँ। फिर बिना किसी को जगाए चल पड़ता हूँ समुद्र दर्शन के लिए। ज्ञातव्य है कि बाहर जाते समय दरवाजा ओठगाने पर स्वचलित रूप से उसमें ताला लग जाता है।
मैं समुद्र के किनारे आ जाता हूँ। क्या बताऊँ कैसा लग रहा है वहाँ, सबकुछ वर्णातीत है। समुद्र के किनारे टहलता हूँ। ठँडी-ठँडी हवाएँ मुझे स्पर्श करके आगे बढ़ जाती हैं। समुद्र के किनारे बालू की राशी से लहरें टकराती हैं। इस टकराव से उनका नीलापन समाप्त हो जाता है, वे सफेद हो जाती हैं। अरे, यह तो गुणात्मक परिवर्तन है। कहाँ नीलापन, कहाँ सफेदी! सबकुछ ' टकराहट' का परिणाम है। ऐसा माना जाता है कि टकराहट से नए गुणों की उत्पत्ति होती है। वस्तु में प्रच्चन्न गुणों का उद्भव टकराहट से ही तो होता है। किसी उर्दू शायर ने ठीक ही कहा है--- ' सुर्खरू होता है इन्साँ ठोकरें खाने के बाद/रँग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद।' अरे हाँ, कार्ल मार्क्स ने भी तो कुछ ऐसी ही बात कही थी। उसने कहा था -टकराव (संघर्ष) की स्थिति में मात्रात्मक से गुणात्मक परिवर्तन होता है। समुद्र के नीले जल का सफेद होना गणात्मक परिवर्तन ही तो है। मुझे लगता है। मुझे ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स का यह सिद्धाँत जड़-जगत में तो लागू होता है, पर चेतन जगत्, मानव जगत् इस सिद्धांत की सीमा से बाहर पड़ता है। चेतन जगत् का व्यापार जड़-जगत की भांति यंत्र चलित नहीं होता। इसलिए जड़-जगत् से संबंधित उक्तियों एवं दृष्टांतों को चेतन-जगत् पर आरोपित नहीं करना चाहिए। मार्क्स ने अपने सारे दृष्टांत जड़-जगत् से उठाकर चेतन् जगत के मस्तक पर चस्पाँ कर दिए हैं। दृष्टांतों की यही तो कमी है। इनकी सहायता से बात तो झट से समझ में आ जाती है, पर इनसे विषय की यथार्थ व्याख्या नहीं हो पाती।
साहित्य और दर्शन में तो दृष्टांतों की भरमार है। दृष्टांतों के माध्यम से लोगों के मस्तिष्क में ऐसी-ऐसी बातें भर दी जाती हैं, जो यथार्थ से कोसों दूर होती हैं। इस संबंध में साहित्य से एक उदाहरण। 'उत्तररामचरितम्' में भवबूति कहते हैं--- ' जैसे एक ही जल भँवर, बुदबुद और लहरों का रूप धारण कर लेता है वैसे ही करुण रस निमित्त भेद से भिन्न-भिन्न रसों में रूपान्तित होता है।'
एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद्
भिन्नः पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान्।
आवर्तबुदबुदतरड्गमयान् विकारा
नम्भो य़था सलिलमेव हि तत्समस्तम्।।
यहाँ कवि ने यह मान लिया है कि तत्वतः रस अनेक नहीं, एक है करुण। इसी एक करुण रस का रूपांतरण विभिन्न स्थितियों में होता रहता है जिससे अन्य रसों की सृष्टि होती है। मुझे ऐसा लगता है कि करुणरस को महिमामंडित करने के लिए कवि ने जल के दृष्टांत का सहारा लिया है। यह दृष्टांत यथार्थ पर परदा डालता है। वास्तविकता यह है कि विभिन्न रसों की अपनी अलग-अलग सत्ता होती है। हाँ, इनका अधिष्ठान एक होता है, मानव-चित।
अरे, मैं कहाँ से कहाँ चला गया। कहाँ समुद्र का यह मनोरम दृश्य, कहाँ मार्क्स की नीरस व्याख्या और भवभूति की कल्पनात्मक उड़ान। हाँ, तो समुद्र के किनारे मुझे केकड़े दिखते हैं। लहरें आती हैं, उनका घरौंदा बिगाड़ देती हैं। थोड़ी देर में किलबिलाते हुए वे अपने बालू-घर से बाहर आते हैं और तीर की तरह दूसरी ओर भाग जाते हैं। इतने छोटे जीव को भी अपने प्राण-रक्षा का ढंग आता है। कितना गहरा है प्रकृति का रहस्य। किसने इन क्षुद्र जीवों को बताया है कि खतरे की स्थिति में क्या करना चाहिए। मेरे पैर मुझे ढोकर आगे ले जा रहे हैं। एक जगह कुछ मछुआरे मिलते हैं। वे समुद्र में अपना जाल फैलाते हैं। जाल का एक सिरा एक के हाथ में और दूसरा सिरा दूसरे के हाथ में। कुछ देर बाद वे जाल लिए-दिए बाहर आते हैं। उनके जाल में कुछ मछलियाँ फँस जाती हैं। जाल किनारे पर फैलाकर एक मछुआरा उसमें फँसी मछलियों को बीनता है। कमर में लटके अपने छोटे जाल में उन्हें डालकर समुद्र में फिर उतरता है। कमर के जाल में रखी मछलियों को शायद यह भ्रम हो सकता है कि वे पुनः अपने घर आ गई हैं, पर जाल की सीमा उन्हें यथार्थ का बोध कराती होगी। अब उनका निस्सीम घर ससीम हो गया है। वे जल में रहते हुए भी जल में नहीं हैं, जाल में हैं। 'जल' और 'जाल' इन दोनों शब्दों में अंतर तो एक मात्रा का ही है, पर मात्रा का यह अंतर अर्थ में, यथार्थ में कितना अंतर पैदा कर देता है, यह तो आप मछलियों से ही पूछें।
हाँ, तो मछुआरों का मत्स्य व्यापार चल रहा है। लहरों का अपना व्यापार चल रहा है। मैं समुद्र के किनारे टहलते-टहलते आगे बढ़ रहा हूँ। फिर पास में दिखता है एक शिव-मन्दिर। किनारे से चलकर मैं शिव-मन्दिर पर पहुँच जाता हूँ। वहाँ मूर्ति के सम्मुख 'शिवमहिम्नस्त्रोत' का सस्वर पाठ करता हूँ। आस-पास के तामिल-भाषी लोग मुझे सस्वर पाठ करते देख मेरी ओर आकर्षित होते हैं और मुझे ध्यान से सुनते हैं। भारतीय संस्कृति का यह विस्तार मेरे मन में आल्हाद पैदा करता है। आपको शिव-मन्दिर कश्मीर में मिलेगा, कन्याकुमारी में मिलेगा , राजस्थान -गुजरात में मिलेगा, असम में भी मिलेगा, पूरे भारत में मिलेगा।
प्रार्थना के बाद मैं मंदिर के चबूतरे पर बैठ जाता हूँ। सामने विशाल समुद्र लहरा रहा है। मछुआरों की छोटी-छोटी नौकाएँ दूर समुद्र में तैरती दिखती हैं। नौकाओं से उछलकर मेरी दृष्टि लहरों पर चली जाती है। मन अतीत की