सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर 

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"ज्योति-पर्व"

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"A candle loses nothing by lighting another candle."

                            

 लेखनी-अँक-9.

 

 

 (सर्वाधिकार सुरक्षित)

copyrights to writers and publisher only.

     संरचना व संपादन:: शैल अग्रवाल. 

संपर्क -सूत्र-  editor@lekhni.net  ,  shailagrawal@hotmail.com

      पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

 


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 -अपनी बात  

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        -शैल अग्रवाल-  

अब जब रातें गहरा आई हैं और दिन छोटे लगने लगे हैं, एकबार फिर  त्योहारों का मौसम आ गया है। कहीं गरबा की मनोहारी छटा है, तो कहीं ईद की सेवईयों की मीठी खुशबू। कहीं दिवाली और गाइ-फौक्स के पटाखों का शोर है, तो कहीं उपहारों से लदे-फंदे फादर क्रिसमस के आगमन की उत्साह पूर्ण तैयारियाँ। यहाँ इंगलैंड में तो आजकल दिवाली और ईद के लिए जो सजावट होती है अधिकांशतः क्रिसमस के बाद ही उतर पाती है और तब काली-से-काली और थरथराती रातें भी नए उल्लास में उष्मित हो जगमगाने लगती हैं...  झिलमिल करते घर-आँगन, बाजार, मोहल्लों की तरह ही ...।

       अंधेरे और पतझड़ के इस मौसम में जब अंधेरा नभ से उतर-उतरकर आंखों में भरता जाता है, मन की तहों में जमने लगता है, हर समाज दीप और ज्योति के पर्व मनाता है, जिससे कि हम याद रख सकें कि अंधेरे को दूर करना जरूरी है। कीचड़ से भी कमल उग आता है -जरूरत है तो बस थोड़े-से आत्म-विश्वास की। एक लौ (लगन) की; लौ- ज्ञान की, लौ-सेवा-सहकार की, लौ- अच्छाई में विश्वास की, लौ-एकता ... विश्व-बन्धुत्व की...। फिर हमारे पास तो पूर्वजों की जगमग यादे हैं। ज्ञान की अनमोल धरोहर है। एक लौ-सा ही दीप्त  सजग और कर्मठ इतिहास है।

       इस वर्ष क्यों न हम आप  आस्था और विश्वास के कुछ नए दीप जलाएँ--- जोत जो न सिर्फ अमा को चीरे, अपितु  निश्चित दिशा उजागर करे। आइये एक दूसरे के गले मिलकर एक नया दशहरा, नई दिवाली, नई ईद...और नया क्रिसमस मनाएँ !

                                                                   

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दीपावली विशेषः

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"तमसो मा ज्योतिर्गमय "

 

जल मेरे दीप अभी और जल

बुझ रही बाती कुछ और जल।

 

अपने उर का नेह पिला

तूने जो लौ लगाई थी

अंतस की चिनगारी ले वह

अँधियारे से लड़ आई थी।

 

बुझ न जाए यूँ तिलतिल

कुछ और उर में नेह भर

नेह का यह कर्ज तुझ पर

जल मेरे दीप और जल ।

 

इरादों की दुनिया में

रिवाजों का अर्थ नहीं

अंतः सलिला में डूबने

या उबरने का तर्क नहीं।

 

उदधि हो जा इसके लिए

उमंगों की तरंग बन

मुट्ठियों में ले ले अँधेरे

जल मेरे दीप और जल ।

 

बादल और सिन्धु-सा

कर्ता और कर्म-सा

साथ है यह उम्र का

हार कर पीछे न हट।

 

शब्दों के अभाव में

अर्थ बन जा

सूरज-सा

हर राह पे चमक ।

 

तेरे पथ में कर्मयोगी

हारने का विकल्प नहीं

डूबे ना वो आखिरी किरन

डूबती सांसों से लड़।

 

जल मेरे दीप

सुबह होने तक जल ! 

-शैल अग्रवाल-

 

 

 

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दिया और बाती

 

रात थी घनेरी

बात भी अकेली

उर में सब नेह भरे

बैठा रहा एक दिया

बाती की आस में

अंतस जगमगाने को

भीग गई बाती तब

दिए के नेह से

तिलतिल  

जल जाने को...

 

-शैल अग्रवाल- 

 

 

 

 

 


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जो है, क्या वही सही है...या हम चाहते हैं...क्या नियति को स्वीकारना ही जीवन है...मूल्यों का यह टकराव और सामंजस्य की बेड़ियां... कहां तक सही हैं नेह और विश्वास की सीमाएं...? जीवन की उहापोह उतनी ही शाश्वत है जितना कि जीवन खुद और हम; पुरुष व प्रकृति- रंगभूमि के दो स्थाई पात्र...पर क्या सब जान-समझकर भी कुछ बदल पाते हैं! 

टूटता-झरता पतझर यूरोप में एक बेहद अनूठा और खूबसूरत मौसम है। पेडों से गिरते कई-कई रंगों के सूखे पत्ते धरती को मानो रंग-बिरंगे परिधान पहना देते हैं...और तब निर्झर आंसूओं में डूबी प्रकृति कई-कई सवाल खड़े कर देती है...सवाल जो बिखरे हैं चारो तरफ...सवाल जिनके जबाव हर जाती ऋतु बसंत से पूछती ही रह जाती है।

मन्थन में इसबार प्रस्तुत है अज्ञेय जी का एक मार्मिक एवं विचारोत्तेजक आलेख 'बर्लिन की डायरी से'- 

 

पतझर का एक पात

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                              सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

आज जैसे जंगल पहले न देखे हों, ऐसा नहीं, पर पत्तियों के ऐसे जलते रंगों का पुंज---वह नहीं देखा...हमारे यहां इक्के-दुक्के पेड़ ऐसे देखने को मिल जाते हैं, बहुत हुआ तो आठ-दस पेड़ों की पांत। पर इस वनखण्डों में सभी कुछ ऐसी भड़कीली लाल-पीली-सुनहली पोशाक पहने थे, और नीचे बिछे पत्तों पर पड़ते हुए धूप के वृत्त सोने के मुकुट-जैसे चमक जाते थे। हमारे पैरों से रौंदी जाकर पत्तियां एक तीखी परन्तु हृद्य गन्ध दे रही थीं---और मुझे बचपन की स्मृतियों में डुबाए दे रही थीं।

मेरी साथिन ने, जो जर्मन है पर यहां के एक भारतीय विद्यार्थी की वाग्दत्ता है और इसी से मेरी परिचित हुई, सहसा कहा, " मुझे बचपन की याद आ रही है---पिता के साथ इस वन में घूमने आया करती थी। वह भी ऐसे ही तुम्हारी तरह ही तेज चलते थे---अब तो लोग तेज चलते ही नहीं।"

मैं कहने को हुआ " और लड़कियां कौन तेज चलती हैं? खासकर हमारे देश में तो---" पर चुप रहा मुसकरा दिया।

सामने कई पैरों की चाप सुनाई दी, थोड़ी देर में पगडंडी के मोड़ के आगे लोग दीखे। एक छोटी सैनिक टुकड़ी---नायक के साथ आठ सैनिक जिन्हें शायद मार्च का अभ्यास कराया जा रहा था। वे आकर दूसरी ओर निकल गये, हम आगे बढ़ते रहे। 

चुपचाप। पर मौन से भी मुझे लगा कि कुछ बदल गया है। साथिन से पूछा, " क्या बात है?" और उसके बदले हुए स्वर से चौंक गया--- " इन सिपाहियों ने आकर सब कुछ बिगाड़ दिया!" 

मैने कहा " वे तो गये। पत्तियां तो अब भी वैसी ही रंगीन हैं, और धूप---" 

उसने आविष्ट स्वर में कहा, " नहीं, मैं और सैनिक नहीं देखना चाहती! क्यों सब जगह सैनिक हैं?"

प्रसंग बहुत ही नाजुक था---हर जर्मन के लिए होता, पूर्वी बर्लिन में और भी अधिक क्योंकि वहां सैन्य-सत्ता कहीं अधिक दृश्य है, और नागरिक जीवन पर उसकी छाप कहीं अधिक गहरी।...मैं उससे उनके युद्धकालीन अनुभवों की बात पूछना चहता---पर दूसरे के जीवन को कुरेदने का अधिकार तभी मिलता है जब पहले सहानुभूति का सम्बन्ध स्पष्ट हो चुका हो---क्या वैसी स्थिति मेरी है? मैने कुछ पूछा नहीं---उस समय...पर कितने प्रश्न मेरे मन में थे---हैं...

वन में एक छोटी झील मिली, उसमें तिरते पत्तों को हम देखा किये। जर्मन स्वभाव की कल्पनाशीलता जागी, उसने कहा, "ये पत्तियां परियों की डोगियां हैं। जाड़ों में ये बर्फ के नीचे छिप जाएँगी; वसंत में फिर निकलेंगीं। अगले वर्ष--- " पर अगले वर्ष के उल्लेख से वह फिर उदास हो गयी।

लौटकर विदा लेने से पहले मैने उसे भोजन पर आमंत्रित किया, और हम लोग एक रेस्तरां की ओर बढ़े। रास्ते में उसने कहा," तुम मुझे जर्मनी से बाहर कहीं---या अपने देश में ---कोई काम नहीं दिला सकते---मैं झाड़ू-बरतन के लिए भी तैयार हूं।"

मैने चौंककर कहा," क्यों?" क्योंकि मुझे मालूम है वह एक दैनिक-पत्र में काम करती है।

उसने इधर-उधर देखकर कहा, " क्योंकि बर्लिन अब रहने लायक नहीं रह गया है। मैं शान्ति के वातावरण में रहना चाहती हूं।"

मैने पूछा, " तो क्या पश्चिमी बर्लिन में नहीं जाया जा सकता?"  

" पर मैं काम लेकर जाना चाहती हूं---भागकर नहीं। यहां असह्य है---पर शरणार्थी बन जाना भी तो---भविष्य गिरवी रख देना है।"

मैं थोड़ी देर चुप रहा। फिर मैने कहा, " वे राजनीतिक शरणार्थी तो बड़े आदमी होते हैं---तुम तो एक बिचारी लड़की--- "

उसने जोर से कहा," नहीं, नहीं, नहीं! भागकर नहीं जाऊंगी, शरणार्थी नहीं बनूंगी! यहां गुलामी है, पर गुलाम विद्रोह तो कर सकते हैं, और अनेक साथ होते हैं। पर शरणार्थी सब अकेले होते हैं---और लड़ेंगे किससे?"

खाने बैठे तो हमें पासपोर्ट दिखाने को कहा गया---पूर्वी बर्लिन में बिना इसके खाना नहीं मिल सकता---क्योंकि अगर पश्चिमी जर्मन का हो तो उसे खाना नहीं दिया जाएगा। पहले चौंका, फिर मुझे स्थिति याद आ गयी, चुपचाप पासपोर्ट दिखा दिया।

अब रात में पश्चिमी बर्लिन के इस छोटे होटल की तीसरी मंजिल से बाहर का प्रकाश देखता हुआ सोच रहा हूं: कौन-सा अच्छा है---अपने देश में दासवत् रहना, या दूसरों के बीच अनाथवत्? 

वह कहती थी, हिन्दुस्तानी भोले होते हैं; ठीक ही है; पर भोलापन खोने को इतिहास ने उन्हें बाध्य भी नहीं किया। यह उनका सौभाग्य रहा है। वे यूरोप के असमंजस का हल नहीं निकाल सकते, पर सहानुभूति तो दे सकते हैं... 

 

                                                   *  

 

 

 

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कविता (धरोहर)

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गोपालदास "नीरज"

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अंधियार ढल कर ही रहेगा

आंधियां चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,
लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो,
हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा ।

 

 

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मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

यह जो रात चुरा बैठी है चांद सितारों की तरुणाई,
बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरन न आई,
खुलते ही पलकें फूलों की, बजते ही भ्रमरों की वंशी
छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही जैसे तेज धार से काई,
तम के पांव नहीं होते, वह चलता थाम ज्योति का अंचल
मेरे प्यार निराश न हो, फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

सिर्फ भूमिका है बहार की यह आंधी-पतझारों वाली,
किसी सुबह की ही मंजिल है रजनी बुझे सितारों वाली,
उजड़े घर ये सूने आंगन, रोते नयन, सिसकते सावन,
केवल वे हैं बीज कि जिनसे उगनी है गेहूं की बाली,
मूक शान्ति खुद एक क्रान्ति है, मूक दृष्टि खुद एक सृष्टि है
मेरे सृजन हताश न हो, फिर दनुज थकेगा, मनुज चलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

व्यर्थ नहीं यह मिट्टी का तप, व्यर्थ नहीं बलिदान हमारा,
व्यर्थ नहीं ये गीले आंचल, व्यर्थ नहीं यह आंसू धारा,
है मेरा विश्वास अटल, तुम डांड़ हटा दो, पाल गिरा दो,
बीच समुन्दर एक दिवस मिलने आयेगा स्वयं किनारा,
मन की गति पग-गति बन जाये तो फिर मंजिल कौन कठिन है?
मेरे लक्ष्य निराश न हो, फिर जग बदलेगा, मग बदलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

जीवन क्या?-तम भरे नगर में किसी रोशनी की पुकार है,
ध्वनि जिसकी इस पार और प्रतिध्वनि जिसकी दूसरे पार है,
सौ सौ बार मरण ने सीकर होंठ इसे चाहा चुप करना,
पर देखा हर बार बजाती यह बैठी कोई सितार है,
स्वर मिटता है नहीं, सिर्फ उसकी आवाज बदल जाती है।
मेरे गीत उदास न हो, हर तार बजेगा, कंठ खुलेगा !
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा !

  

 

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जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |


नयी ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,

उडे मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,

लगे रोशनी की झडी झूम ऐसी,

निशा की गली में तिमिर राह भूले,

खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,

उषा जा न पाये, निशा आ ना पाये |


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |


स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,

कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,

मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,

कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,

चलेगा सदा नाश का खेल यूं ही,

भले ही दिवाली यहां रोज आये |


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |


मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,

नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,

उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,

नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,

कटेंगे तभी यह अंधरे घिरे अब,

स्वय धर मनुज दीप का रूप आये |


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना

अन्धेरा धरा पर कहीं रह न जाये |

 

 

 

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तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

सूनी है मांग निशा की चंदा उगा नहीं
हर द्वार पड़ा खामोश सवेरा रूठ गया,
है गगन विकल, आ गया सितारों का पतझर
तम ऎसा है कि उजाले का दिल टूट गया,
तुम जाओ घर-घर दीपक बनकर मुस्काओ
मैं भाल-भाल पर कुंकुम बन लग जाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

कर रहा नृत्य विध्वंस, सृजन के थके चरण,
संस्कृति की इति हो रही, क्रुद्व हैं दुर्वासा,
बिक रही द्रौपदी नग्न खड़ी चौराहे पर,
पढ रहा किन्तु साहित्य सितारों की भाषा,
तुम गाकर दीपक राग जगा दो मुर्दों को
मैं जीवित को जीने का अर्थ बताऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

इस कदर बढ रही है बेबसी बहारों की
फूलों को मुस्काना तक मना हो गया है,
इस तरह हो रही है पशुता की पशु-क्रीड़ा
लगता है दुनिया से इन्सान खो गया है,
तुम जाओ भटकों को रास्ता बता आओ
मैं इतिहास को नये सफे दे जाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

मैं देख रहा नन्दन सी चन्दन बगिया में,
रक्त के बीज फिर बोने की तैयारी है,
मैं देख रहा परिमल पराग की छाया में
उड़ कर आ बैठी फिर कोई चिन्गारी है,
पीने को यह सब आग बनो यदि तुम सावन
मैं तलवारों से मेघ-मल्हार गवाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

जब खेल रही है सारी धरती लहरों से
तब कब तक तट पर अपना रहना सम्भव है !
संसार जल रहा है जब दुख की ज्वाला में
तब कैसे अपने सुख को सहना सम्भव है !
मिटते मानव और मानवता की रक्षा में
प्रिय ! तुम भी मिट जाना, मैं भी मिट जाऊंगा !

तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा !

 

 


                                               *
 

 


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कविता आज और अभी

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(माह के हस्ताक्षर) 

.दिविक रमेश 

.नरेश शांडिल्य

 

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 अंधेरों के ख़िलाफ़ः

 

बाबजूद बेशुमार दुआओं के

मेरी ओर

लगातार बढ़ रहा है

अंधेरे का एक भयावह सैलाब

शह और मात की

शतरंजी दहशत का

एक बेचैन सा दबाब

 

दूसरी ओर

हज़ारों बद्दुआओं के बावजूद

मेरे मग़ज़ की भित्तियों में

कहीं पलकें झपकाता रहता है...एक जुगनू

अंधेरों के खिलाफ

अदब के साथ

रह-रहकर चमकता है मौन

 

ताज्ज़ुब है

उसकी खामोश और अदना-सी मौजूदगी भी

चर्चा का विषय है

माफ़िया अंधेरों की

रोज़-रोज़, रात-रात

आपात बैठक का

 

कैसा भी

कितना भी हो प्रकाश

प्रकाश से डरता है...अंधकार

              नरेश शांडिल्य   

 

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         डर  

 

बस इतना ही मालूम था मुझे

 

कि एक डोर है यह

जिसका यह सिरा मेरे हाथ में है।

 

कहां है दूसरा सिरा

सब कुछ अदृश्य था

जितना भी खींच लूं

हिला लूं कितना भी

कहीं कोई तनाव नहीं था डोर में

हालांकि

आ बसा था तनाव

पूरा

मेरी देह में

 

डर भी था कितना

और वह भी अजाना

कि नहीं छोड़ पा रहा था डोर को।

 

तभी किसी विचार की तरह

 

न जाने कैसे सूझा

और पाया

वह डोर, डोर थी ही नहीं

      

एक उंगली थी किसी दैत्य की।

 

मेरा हिलना डुलना

यहां तक कि चलना भी

उसी उंगली के वश था

 

मैं स्वयं

जैसे उसी के वशीभूत था

उसकी अद्भुत आत्मीयता से

 

उसकी उंगलियों से ही

निरंतर उतर रही थीं

उदासियां

मेरी देह में

कि तन रही थीं जो निरंतर

 

और मैं

कुर्बानी की हद तक

स्वीकार कर रहा था जिन्हें।

 

कितनी कठोर होती है सच की समझ

मैने जाना था।

 

झटक दिया था

एक ही झटके में 

मैने उस दैत्य की उंगली को

 

आश्चर्य!

न डर था, न तनाव

मैं स्थिर था

मेरी उदासियां तक

कुर्बान हो चली थीं

खुद मुझ पर।  

दिविक रमेश         

    

 

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जो साथ सफर में तुम होते

 

जो साथ सफ़र में तुम होते

काहे को इतने गम होते

 

कन्धों पर पंख उगे रहते

कदमों पर फ़लक झुके रहते

क्या जाने फिर क्या हम होते

 

चंदा, सूरज, अरबों तारे

इस झोली में होते सारे

हम कौन खुदा से कम होते

 

फिर आज़ आज़, कल कल होता

हर पल का कोई हल होता

दीदे ना इतने नम होते

          नरेश शांडिल्य 

 

 

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खुशी

खुशी को मैने

 

उंगलियों में पकड़ा

और सहलाया उसकी उंगलियों को

 

पाया

खुशी सर्माते शर्माते

सकुचा गई थी

 

मैने

थोड़ा खोला खुशी की पंखुड़ियों को

 

पाया खुशी

मेरी खुशी में

सम्मिलित हो गई थी

 

मैने खोल दिया पूरा

और कर दिया अर्पित उसे

उस पूरी दुनिया पर

जहां नहीं थी वह

 

पाया

मैने कभी नहीं देखा था खुशी को

इससे ज्यादा खुश

पहले कभी

 

ताज्जुब

मेरी खुशी तक मना रही थी जश्न

जैसे मुक्त हो गई हो मेरी कैद से।

दिविक रमेश

 

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पुनर्जन्म

 

निरर्थक प्रश्नों

और वाहियात उत्तरों के बावजूद

पेड़ के हर ठूँठ में

सोई है एक प्रतीक्षा

करवट ले रहा है एक हरा स्वप्न

कमर कस रहा है

एक निश्चित संघर्ष

 

अपने होने

न होने की बह