साहित्य-भारती

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(गजल संभवतः आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय गत्वर विधा है ,यूँ तो पक्ष-विपक्ष में दावे, विचार संभव हैं पर वास्तविकता यही है। हिन्दी ग़ज़ल के नामकरण और इसकी 'सार्थक जमीन' को लेकर स्वयं ग़ज़लकारों की अपनी अपनी मान्यताएँ हैं। प्रस्तुत है भारतीय हिन्दी ग़ज़ल़ परम्पराओं की स्थिति व संदर्भों का ज़ायजा लेता मधुर नज्मी ( जो खुद एक अच्छे ग़ज़लकार हैं) का  एक तथ्यपूर्ण लेख,

 

 समकालीन हिन्दी ग़ज़ल

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मधुर नज्मी

समकालीन भारतीय साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय गत्वर विधा है ग़ज़ल। पत्र-पत्रिकाओं से लेकर, आज के तथाकथित काव्यमंचों तक की सही वास्तविकता यही है। दावे, विचार अलग-अलग संभव हैं। ग़ज़ल विधा के मुकाबले गीति-विधा भरपूर संप्रेषणीय, जनबोधी होने के बावजूद पाठक-श्रोता को पकड़कर छोड़ देने की अनुभूति देती है। ग़ज़ल पकड़कर छोड़ती नहीं। आंतरिक जमीन से सहजतः बांध-जोड़ लेती है। इसे छंदसिकता का प्रताप ही कहेंगे। नई कविता में ' पकड़ने' ' छोड़ने' की परिस्थियां कम ही बनती हैं। अपवाद कहां नहीं होते? आज समूची छंदासिक कविता ही ' किसिम-किसिम' की साजिशों का शिकार है। सहभागी कवि, समीक्षक, कच्चे संपादक, पाठक-श्रोता, कमोबेश सबके सब हैं। छंद की अस्मिता को स्वीकारते सभी हैं, किंतु साहित्यिक संगोष्ठियों, दूरदर्शनी अवसरों पर, अपने-अपने ' प्रतिबद्ध शिविरों' की सुधि आते ही छांदसिक कविता-संदर्भ पर कुछ कहने से मुंह चुराने लगते हैं। 

हिन्दी ग़ज़ल के नामकरण और इसकी 'सार्थक जमीन' को लेकर स्वयं गजलकारों के अपने अपने 'गोवर्धन' हैं। मोहन अवस्थी 'अनुगीत', गोपाल दास नीरज 'गीतिका', चंद्रसेन विराट ' मुक्तिका', चंद्रभाल सुकुमार ' द्विपादिका' , कोई सिर्फ ग़ज़ल, कोई हिन्दी ग़ज़ल नाम से इसको व्याख्यायित रूपायित करते हैं। नाम चाहे जो भी दिए जाएँ, शर्त अनुशासन और संयम है। हिंदी ग़ज़ल की सार्थक जमीन संज्ञक विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार त्रिलोचन शास्त्री, स्व. प्रभाकर माचवे, माहेश्वर तिवारी, कैलाश गौतम, माधव मधुकर, मधुरिमा सिंह, ज्ञान प्रकाश विवेक से पत्र माध्यम से बातें हुईँ जो समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की दिशा में समझने जानने की सुविधा मुहैया करती हैं।

त्रिलोचन शास्त्री ने ' सार्थक जमीन' पर अपना विचार व्यक्त करते हुए मुझे लिखा ' हिन्दी ग़ज़ल की सार्थक जमीन? यह सवाल काफी टेढ़ा है और फंसने वाला है। उत्तर देकर कोई अपना सिर ओखली में क्यों दे?

हिन्दी ग़ज़ल, अगर इसकी कोई खासियत है, यदि अलग से पहचान है, तो जाहिर है कि ' हिन्दी ग़ज़ल' वैसे ही जैसे गुजराती ग़ज़ल, पंजाबी ग़ज़ल और सिंधी ग़ज़ल। ग़ज़ल लिखने का मतलब ही है कि ग़ज़ल के प्रेरणा स्रोत तक पहुंचा जाए। उर्दू ग़ज़ल खड़ी हुई फारसी का नमूना सामने रखकर फारसी की ग़ज़लों से प्रभाव सभी उर्दू शायरों ने लिया है। उर्दू में जो ग़ज़लें आसानतर नजर आती हैं उन्हें लोग हिन्दी ग़ज़ल कह पड़ते हैं। 'गालिब' ने अपनी गजलों को खतों में हिन्दी कहा है। यहां ' हिन्दी' का अर्थ, हिंद की जबान में ग़ज़ल यानी फारसी से भिन्न। यह जो भाषा बन रही थी, उर्दू के पुराने शायर इस भाषा को जैसा सुनते थे, वैसा ही लिखा करते थे। जो बहर से परिचित हैं, वे किस शब्द का क्या उच्चारण है, बहर की जानकारी के आधार पर कर लेते हैं। एक टुकड़ा लीजिए, ' अगर और जीते रहते' ' अगर और ' मिलकर बहर को बनाते हैं। 'र' और 'औ' मिल जाए तो ' अगरौर' बनेगा जो बोलचाल में व्यंजन के बाद स्वर आ जाने पर मिलता है। 

हिंदी में हिन्दी के छंद कम ही हैं। हिन्दी उच्चारण की संस्कृति को सुरक्षित रखती यदि बोलचाल के लहजे पर आचार्यों ने ध्यान दिया होता। उर्दू आगरा से दिल्ली तक लिखी गई और बोल की रंगत उसमें उधर की ही है। हिंदी में 'यह '  'वह' का प्रयोग है। इसका उच्चारण पूरब वाले 'ह' सहित करते है। जो उर्दू में कविता करता है, वह हिंदी वालों से तुलनात्मक रूप से भिन्न उच्चारण करता है। उच्चारण का यह संस्कार उर्दू लेखकों में बराबर मिलता है। हिंदी में उच्चारण का प्रतिमान नहीं मिलता। उर्दू में है और इसमें भिन्नता नहीं है। उर्दू वाले इन्ही दो शब्दों का उच्चारण बिना 'ह' के करते हैं। ' वह' को दाबकर 'वो' पढ़ते हैं। क्या हिंदी का उच्चारण उर्दू से भिन्न नहीं हो सकता? दोनों की बुनयादी भाषा एक ही है। उर्दू में ग़ज़ल इतनी उँचाई पर पहुँच चुकी है कि वहां भाषा जो माध्यम है, वह नपी तुली बन जाती है। कविता का माध्यम भाषा ही तो है।   

' हिन्दी गजल' में बहुधा अशोभन वाक्य रचना मिलती है। अधूरे वाक्य मिलते हैं। हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वाले फारसी तक तो पहुँचने वाले कम ही हैं तो भी यह साफ है कि उर्दू भी अगर वे अच्छी तरह जानते तो ' हिंदी ग़ज़ल' का व्यक्तित्व कभी न कभी बन जाएगा। भाई मधुर जी आप आजमगढ़ में हैं जो मौलाना शिब्ली का शहर है। कैफी आज़मी वग़ैरह यहीं के हैं। आपको हिन्दी उर्दू के झगड़े मिटाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। आमफ़हम जबान नहीं है। यह दावा ही फिजूल है, हिन्दी कितनी सर्वजन बोधगम्य है, यह आपसे छुपा नहीं है।'

संदर्भित सभी तथ्यपरक बिंदुओं की ओर संकेत किया है त्रिलोचन जी ने। समकालीन हिंदी ग़ज़ल और ग़ज़लकारों को वैचारिक आयाम देते हुए ये वाक्य एक संक्रम (सेतु) हैं। एक अन्य पत्र में लोचन जी ने लिखा-' उर्दू की ऊँचाइयां हिंदी में खोजना, मरीचिका में पानी की खोज है। अभी तो हिंदी में अभ्यास-काल ही है। फिर भी जो प्रयत्नशील हैं उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हिंदी में गजल दो तरह की हैं। हिन्दी में उर्दू की ग़ज़लों के असर से नागरी लिपि में छपाई हुई ग़ज़ल। यह हिंदी वहीं तक है, जहां तक नागरी लिपि का सवाल है। लिपि बदल दी जाए तो उर्दू ग़ज़ल से बहुत अलग नहीं है। सवाल उठता है हिन्दी में ग़ज़ल नाकाम क्यों है? हिंदी का वातावरण जो अलग है, उसको रूपायित करने के लिए वाक्यों में लोच की जरूरत है और उस लोच को लाने में बड़ी मशक्कल है। उर्दू में छपी ग़ज़लों में जो भाषा जाती है, वह बोलचाल की भाषा पकड़ती है , जिससे कविता में जीवन-तत्व आता है। हिंदी में लिखने वाले बोलचाल का सौंदर्य पकड़ ही नहीं पाते।'

त्रिलोचन जी के पत्र से ' हिन्दी ग़ज़ल' बहस की परिधि में कैद होती दीखती है। त्रिलोचन जी किसी विषय को टालते नहीं, पूरी वैचारिक अग्निमा से विषय की तहें खोलते हैं। 

उनका एक अन्य पत्र इस तथ्य को उद्घाटित करता हैः ' हिन्दी ग़ज़ल या तो उर्दू की उपलब्धियां उसी माहौल में इस्तेमाल कर लेती है अथवा जो भी ग़ज़लें लिखी गयी हैं, उनमें अभ्यास ही अधिक है। स्वतंत्र उपलब्धि गायब है। ' हिंदीपन' का मतलब हिंदी मुहावरा-संस्कार आदि भी हैं। मुझको लगता है सदियों के मश्क के बाद, उर्दू में ग़ज़ल को जो ऊँचाई मिली, वह हिन्दी को भी दीर्घ साधना और अभ्यास के बाद शायद मिल जाए। अभी तो मुझे हिन्दी गजल से संतोष नहीं है। यहां मैं यह बात और को देखकर नहीं, अपने आप को भी देखकर कह रहा हूँ। काम बहुत कठिन है। आगे-आगे देखिए होत है क्या ?'

स्वर्गीय प्रभाकर माचवे हिंदी साहित्य के मानक साहित्यकार थे। ' समकालीन हिंदी ग़ज़लः स्वरूप और संभावना' विषय पर उत्तर देते हुए अपने पत्र में लिखाः ' ग़ज़ल के साथ वही दिक्कत या ट्रेजेडी है जो हिन्दी में अंग्रेजी काव्यरूप सॉनेट (चतुर्दशपदी) और गीत लेखन के साथ भी हुई ( जिसे नवगीत ने सुधारा) कि असली-नकली का फर्क कम दिखाई देता है। बाजार में माल चल गया फिर शुद्ध के नाम पर क्या-क्या वनस्पतियां मिलावट में आ गईं, जिसका विश्लेषण साधारण पाठक तो नहीं कर पाता, हिंदी के संपादक भी नहीं कर पाते। वे कैसी-कैसी ऊलजलूल चीजें ग़ज़ल के नाम पर छाप रहे हैं। 

हिंदी में लिखी जाने वाली ग़ज़ल नामक रचना न उत्तम कविता है, न उत्तम गीत। वह ग़ज़लनुमा निरी अनुगूंज है। एक गंगाजमुनी घालमेल लिखा, सुनाया और छपाया जा रहा है। हिंदी के मासिकों में जो आज छप रहा है, वह चलताऊ माल है और ग़ज़ल के सस्ता बन जाने की आशंका है। उससे बचना चाहिए। मैने भी ग़ज़ल जैसे छन्द का प्रयोग किया था। कुछ छपा भी था। आज ग़ज़ल में जो कुछ छप रहा है, ऐसी रचनाओं को देखकर ही कभी ' समर्थ' रामदास ने मराठी में कहा थाः' शाइरी घास की तरह उगने लगी है।' किसी ने उर्दू में कहाः ' शाइरी चारा समझकर सब गधे चरने लगे हैं।'

एक वाजिब स्थिति की आइनादारी करती हैं ये पंक्तियां।'

आज गजल के लिए सुखद स्थिति कम और खतरे की स्थिति ज्यादा है। सुविख्यात रचनाकार कैलाश गौतम ने इस कड़ी को आगे ले जाते हुए लिखा कि 'साहित्य की कोई भी विधा कभी पुरानी नहीं पड़ती, बशर्ते उसकी अनुभूति का कलेवर अधुनातन होता रहे।, उसकी संवेदनाएँ समय के साथ चलती रहें। आज आम आदमी की सही बात ग़ज़ल में हो रही है, लेकिन खतरा बढ़ता गया है। आद ग़ज़ल धीरे-धीरे गरीब की बीबी होती जा रही है। लोग उसकी ' सिधाई' का भरपूर और गलत फायदा उठा रहे हैं। हर रचनाकार ग़ज़ल पर हाथ साफ कर रहा है और ग़ज़ल टुकुर-टुकुर मुंह देख रही है।'

समकालीन ग़ज़ल की परिदशा को रेखांकित करती हुई इसकी आंतरिक तरलता को स्पर्शित करते हुए हिंदी ग़ज़ल की प्रमुख कवियत्री मधुरिमा सिंह ने लिखाः ' ग़ज़ल जिंदगी की पलकों पर थरथराती हुई आंसू की बूंदें हैं, जो सूरज की रोशनी अपने अँदर समोकर सतरंगी आभा से आलोकित हो जाती है। ग़ज़ल धूप की नदी में पांव छपछपाती हुई चांदनी है। कभी-कभी जिन्दगी एक डाकिए जैसी हो जाती है, यानी दर्द की चिठ्ठी बांटती तो है, पर खुद पढ़ नहीं सकती। अपनी हथेली पर झिलमिलाती हुई आंसू की बूंद को, उसकी तरलता और पारदर्शिता को छुए बिना, दूसरे की हथेली पर सावधानी से रख देने का दूसरा नाम ग़ज़ल है।'

वरिष्ठ नवगीतकार / ग़ज़लकार माहेश्वर तिवारी ने दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल पर विचार देते हुए लिखा कि दुष्यंत कुमार के बाद, भवानी शंकर, सूर्यभानु गुप्त, विनोद तिवारी, महेश अनघ, शिव ओम अंबर, ज़हीर कुरैशी, मधुरिमा सिंह, माधव मधुकर आदि ने ग़ज़ल लेखन के प्रति, अपने गंभीर रचनात्मक जुड़ाव से उसकी संभावनाओं को आगे बढ़ाने का काम किया। वहीं दोयम दर्जे के लेखन ने उसे एक लचर काव्य-रूप बनाए रखा। दूसरी श्रेणी के इन ग़ज़लकारों के पास न ग़ज़ल की परंपरा थी न उसका व्याकरण था। ऐसी स्थिति में उमाशंकर तिवारी, मधुर नज्मी, अनिल गौड़, कृष्णानंद चौबे, प्रमोद तिवारी, महेश अश्क आदि के प्रयास अनदेखे रह गए। नकली सिक्कों ने प्रामाणिक सिक्कों को बाजार में घेर लिया। उसके पीछे एक कारण यह भी था कि ये रचनाकार प्रचारवादी या बड़बोले होने की अपेक्षा रचनात्मक प्रशांतता से जुड़े रहे। इन्होंने ग़ज़ल को हिन्दी कविता जैसा कथ्य और अबिव्यक्ति का व्यापक धरातल दिया। लेकिन इस अराजकता के बीच संभावनाओं के संकेत छुपे हुए हैं। ग़ज़ल की भाषा का मुद्दा लगभग तय हो चुका है। उसके लेखन में गंभीर रचनात्मक अनुशाषन आ जाए, इसकी अपेक्षा ही बची है।'

साहित्य की विविध विधाओं में सर्जनारत ग़ज़लकार ज्ञान प्रकाश ' विवेक' का ग़ज़ल को लेकर अभिमत हैः 'इधर लिखी जा रही अधिसंख्य ग़ज़लों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी की ग़ज़ल के पास अपनी कोई सार्थक जमीन है ही नहीं। मेरी यह बात निर्मम और तल्ख लग सकती है किंतु बारीकी से देखें और हिंदी ग़ज़ल की पड़ताल करें तो अदिसंख्य ग़ज़लों में कच्चापन मिलेगा, दोहराव और विषय की नासमझी, अनुभवहीनता और कथ्यहीन अशआर इस कदर लिखे गए और प्रकाशित हुए कि अच्छी और स्तरीय ग़ज़लें कहीं भीड़ में खो गईं। इधर मंचीय प्रवृत्तियां बढ़ी हैं। इधर ग़ज़ल में चौंकाने वाले शे'र खूब लिखे गये हैं  वस्तुतः ऐसे शे'र सार्थक जमीन से जुड़े हुए नहीं होते। उनमें सिर्फ शब्दों की कलाबाजी होती है। हिन्दी ग़ज़ल को सार्थक जमीन के लिए यह भी जरूरी है कि ग़ज़ल विधा पर गोष्ठियां, बहसें आयोजित हों। अभी तक दुष्यंत कुमार को मील का पत्थर समझ लिया गया है।'

आज हिन्दी ग़ज़ल के बुनियादी सवालों को उत्तरित करने की आवश्यकता है। त्रिलोचन शास्त्री की सारगर्भित बात ' उत्तर देकर कोई ओखली में सर क्यों दे ?' लगभग सभी ग़ज़लकारों की बात है। कोई खुलकर अपनी बात नहीं कह पा रहा है। 'समकालीन ग़ज़ल' कहकर या अन्य नाम देकर विषय से पलायन की स्थिति है। ' हिन्दी गजल' कहकर या अन्य नाम देकर विषय में पलायन की स्थिति है। 'हिन्दी ग़ज़ल' ' उर्दू ग़ज़ल' कहकर या अन्य नाम लेकर वाजिब मुद्दों से टकराने की स्थिति कहीं नहीं है। ग़ज़ल के लिए विभाजक बिंदु की अनिवार्यता है। चिमटा से अंगारा छूने की यह प्रक्रिया सांघातिक है। हिन्दी ग़ज़ल में हिंदीपन कितना? यह सवाल भी हिंदी ग़ज़लकारों के लिए एक चुनौती है। परंपरा को जानने के लिए परंपरा की सविवेक जानकारी आवश्यक है।

आज की उर्दू ग़ज़ल और हिंदी ग़ज़ल में फर्क भाषा का, लीपि का तो हो सकता है, देखने पढ़ने में कहीं से नहीं है। ग़ज़ल को सिर्फ ग़ज़ल ही रहने दिया जाए, इसी में ग़ज़ल का हित है। हिन्दी में हिन्दीपन की दरकार है। हिन्दी ग़ज़ल को 'हिन्दी गज़ल' कहलाने के लिए भारतीय परंपराओं और संस्कारों से सविवेक सशर्त जुड़ना होगा। नए बिंबों, प्रतीकों, मुहावरों की निर्मिति करनी होगी। हिंदी शब्दावली का मर्मस्पर्शी प्रयोग वांछित है। मिथकों, ऐतिहासिक संबुद्धता को साधना होगा। रूमानियत के भाव-भीने संस्पर्शों की नर्मियां, विचारोत्तेजक कथन की सधुक्कड़ी मुद्रा, अर्थ की दुहरी सांकेतिकता, सर्जनात्मक काव्य-भाषा के निर्माण की प्रक्रिया , जबान के शे'र, काकु वक्रोक्ति का प्रयोग, मनःस्थितियों मनोवैज्ञानिक संदर्भों को उभारने-उकेरने की प्रवृत्ति, रदीफ (समांत) के तौर पर हिन्दी-काव्य-सरोकार के प्रति ध्यान रखना, स्थूल के साथ सूक्ष्म पर नजर रखना, यथार्थ के साथ आदर्श का मर्मीपुट, उक्ति वैचित्र्य के लिए संस्कारों को अनाहत रखना, जातीय संस्कारों, ग्राम्य संस्कारों के प्रति जागतिक जागृति, परंपरित ग़ज़लों की गुणवत्ता को स्वीकारते हुए, परंपरित ग़ज़लों के प्रति आक्रमक तेवर, कथ्य शिल्प की अभिव्यंजना, लोकतांत्रिक भावनाओं का समाहार, उत्सवधर्मी संस्कृति की समझ, उदारवादी सोच की संपृटक्ति, परंपरित ग़ज़लों के प्रति सविवेक विद्रोह, वैश्विक प्रवृत्ति के लिए सतर्कता, कल्पना की निरर्थक उड़ानों से परहेज, अनुवाद की भाषा के स्थान पर निजी भाषा का वाजिब प्रयोग, आदि विचार-तत्व हिन्दी ग़ज़लकारों से, उसकी अस्मिता मुहैया करने के लिए आग्रही हैं।

                                                                                                  (साभार आजकल)  

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गांधीगिरी के वर्तमान फंडे

गांधीगिरी का जोर है लेकिन गांधीजी के तीनों नटखट बन्दर शांत बैठे हैं। जबकि शांति बन्दरों के स्वभाव में दूर-दूरतक नहीं है। यहीं से असली गांधीगिरी की शुरुआत हुई है। जिसकी अलख जगाने का श्रेय लगे रहो मुन्ना भाई से संजय दत्त के खाते में क्रेडिट हो गया है। जब उधमी बंदर तक शांत हैं तो अन्य किसी निखट्टू की क्या मजाल जो धमाल मचा सके। 

ऊपर से तीनों बंदर शांत हैं पर भीतर से मन उधेड़बुन में लगा हुआ है। यही गांधीगिरी की सच्चाई है कि कभी किसी फल तोड़ने का स्वप्न मन में कुलाचें ले रहा है तो कभी किसी फूल को तोड़ने-मसलने का।  पर जब उन पर कैमरे की नजर नहीं होती तो वे गांधीगिरी भूल अपनी बंदरी करतूतों में मशगूल हो जाते हैं।

मुन्नाभाई का भी सपना है कि वे तीन बंदर पालें। उन्हें इतना पालतू बना लें कि वह न तो कैमरे के सामने और न पीछे, कभी भी मन को चलायमान होने दें। उनके बंदरों की पोज गांधीजी के बंदरों से अलग होंगे। अब मुन्नाभाई कोई मदारी तो हैं नहीं जो बंदर या बंदरी के गल्ले में रस्सी बांधकर भाईगिरी दिखलाएँगे। उन्हें तो हाइटेक तरीक से रिमोटिया आधार पर बिना रिमोट के . इशारे भर से हैंडल करना होगा। 

बापू ने नोट पर चोट की। इस चोट का निशान वाटर मार्क के रूप में नोटों पर देखा जा सकता है। 500 के नोट को गांधी कहा जाता रहा है। हजार के नोट का भी यही हुआ। कार्य करवाने के लिए बतौर रिश्वत गांधीजी की खूब चर्चा हुई। मिनिमम एमांउट एक गांधी सैट कर दिया गया। मतलब एक पांच सौ का नोट। पुलिस वालों ने इसका पूरा लाभ उठाया। झूठ को सच में तब्दील करने के लिए एक औजार बनकर सामने आया और सच को छुपाने के लिए भी इसी की मदद ली गयी।

गांधीजी का दर्शन भूल नेता तन मन से धन कमाने में तल्लीन हो जाते हैं। यह बिल्कुल साफ है कि हम गांधीजी को अपने स्वार्थ साधने के लिए याद करते हैं। फिरभी उनकी महानता के लिए समर्पित खब्ती भी देश में बहुतेरे हैं। एक सर्वे तो गांधीजी को एक बुरा पिता और पति मानने में भी संकोच नहीं करता। मुन्नाभाई इन अमेरिका की योजना अधर में है। गांधीगिरी का होल वर्ड पर प्रभाव आँका जा रहा है। गांधीजी ने उन्ही बंदरों की फिदरत को बदला जो दो बिल्लियों के झगड़े में तराजू में तोलते हुए, रोटी को बराबर न होने पर सारी खा गया, इसमें उसका हुनर काम में आया और बिल्लियां कूदती-फांदती रह गयीं। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे देश की जनता से वोट लेने के बाद नेता बंदरगिरी पर उतर आते हैं। धोती,सोटा और लंगोटी वाले बापू ने बंदरों तक को काबू में कर लिया पर वे इन तथाकथित वोट के चहेते बंदरों के अंदर की मंशा न समझ पाये जो उनके आचार-विचारों को चने की तरह भून कर, बेचकर जेब भर गये।

पहली फिल्म गांधी के जरिए बेन क्गिसले ने इतना कमाया कि कोई क्या कमाएगा? वर्तमान में गांधीजी को बाजार की मांग के मुताबिक पेश करके कैश किया रहा है। बापू ने जीवन भर चरखा चलाया और नेता उनकी  नीतियों को चरखाते रहे। चरते रहे, खाते रहे। सबमें स्वार्थ छिपे हैं। बापू के आदर्शों की बलि चढ़ाकर असहयोग आंदोलन की तर्ज पर हमने हिंदी से असहयोग और अँग्रेजी से सहयोग आरंभ कर दिया। अंग्रेजों के भारत छोड़ो आन्दोलन से  जुड़कर हमने भारत छोड़ दिया और इँडिया से जुड़ गए। अहिंसा के पाठ से अ हटाकर हिंसा को अपना लिया। सच बोलने की आपकी सलाह पर सच बोल दिया कि हम सच नहीं बोल सकते। आपने बुरा न देखने के लिए कहा तो हमने देखना बंद करके करना शुरु कर दिया। आपने बुरा न सुनने के लिए कहा तो हमने टी.वी. पर देखना शुरु कर दिया और उसकी आवाज बंद कर दी। उमा खुराना प्रकरण हमारी गांधीगिरी के नए सोपान का ताजा कीर्तिमान है। 

दुनिया में भारत को गांधी, गरीबी और ताजमहल के लिए पहचाना जाने लगा है, यह एक ताजा सर्वे की रपट है। अंग्रेजों ने इसे जादू, टोने, सांपों और सोने की चिड़िया के रूप में पहचान दिलाई थी।

 लगे रहो मुन्नाभाई फिल्म ने संजय दत्त के लिए ख्याति के अनेक सोपान खोल दिए। गंधीजी का अभिनय कर जिन अभिनेताओं की पारी चमकी उनमें संजयदत्त सर्वोपरि दिखाई देते हैं। यह युवराज के लगातार छः छक्के लगाने के कीर्तिमान से बड़ा है।  

                             

 

                                                                                अविनाश बाचस्पति

 

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                                                             स्मृति शेष...अतीत के खजानों से,

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 तलत महमूद

 

 

(प्रस्तुत है लेखनी के पाठकों के लिए गीत और ग़ज़ल की दुनिया का सबसे नाजुक स्वर... प्रेम के अमर गायक स्व. तलत महमूद पर उनकी मृत्यु के तुरंत बाद ही  श्री गोविन्द प्रसाद द्वारा लिखित एक पूरी तरह से विमुग्ध और रूमानियत भरा लेख...  तलत की कंपित मधुर आवाज की तरह ही  स्वरों के निजत्व से ओतप्रोत और भावभीना...।)

                                       

 

तेरी हर चाप से जलते हैं खयालों में चिराग ...     

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात नेहरू युगीन प्रेम और संस्कति को अपनी आवाज से रूपायित करने वाले तलत महमूद की मृत्यु (1 मई 1998) से सचमुच एक ' युग' का अन्त हो गया।

तलत महमूद पर बात करने से पहले यह बेहतर होगा कि पृष्ठभूमि के रूप में तत्कालीन फिल्म गायकों के परिदश्य में झांकने के बहाने मैं अपनी बात के.एल.सहगल-जो अपने जमाने के गायकों में 'दादा' माने जाते थे- से शुरू करूँ। ' न्यू थियेटर्स' की देवकी बोस के निर्देशन में बनी फिल्म चंडीदास( 1932) से लेकर अपनी आखिरी फिल्म शाहजहाँ और परवाना (1946-47) तक कुंदन लाल सहगल शिखर गायक के रूप में रहे। सहगल की गायकी का असर इस कदर था कि उनके समकालीन पंकज मलिक, के. सी. डे., सी. एच. आत्मा और जगमोहन जैसे सभी गायक &#