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भाग-4.

 

 

 

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बाहर पैटियो पर सूखने और विलुप्त होने से पहले बूंदें आनन्दमग्न नाच रही थीं---अपनी सामर्थ से कई-कई गुना ऊपर उठ-उठकर। खुद उन्होंने भी इस सुख को भली-भांति जाना था कभी। बरसात शायद इसीलिए होती है कि पुरानी यादें रिमझिम बरसें। आजफिर पानी जमकर गिर रहा था। वैसे इंगलैंड में तो रोज ही बरसात होती है और शेखर सरकार आदी हो चुके हैं इस वक्त-बेवक्त की बरसात के...आखिर पिछले तीस साल से यूँ ही तो भीग रहे हैं। अब तो निमोनिया होने का भी डर नहीं लगता। कोई मां थोड़े ही है जो पूरे वक्त रोकती-टोकती रहे उन्हे-“ सुमी, यह मत खाओ, पेट खराब हो जाएगा। देखो फिर पानी में भीगे तुम। जाओ कपड़े बदल लो तुरंत। फेफड़े सरदी पकड़ लेते हैं, फिर बुढ़ापे तक खांसते रहना मेरी तरह।“ मुँह और बालों पर गिर आयी चन्द काल्पनिक ठंडी बूंदों को गीली कोट की बांहों से तुरंत ही पोंछने की कोशिश की उन्होंने। अंदर बैठे होने के बावजूद भी बाहर गिरती बूंदों की नमी और ठंडक, दोनों को ही पूरी तरह से महसूस कर पा रहे थे वह अब...कांपते पैरों के नीचे भी और ठंड से अकड़ते चेहरे पर भी।

हाथ की ऐंठती उंगलियों को गरमाहट के लिए आपस में रगड़ते-रगड़ते अबतक लाल कर डाला था उन्होंने और अब वे सूजी लाल उँगलियां मां के हाथों की याद दिला रही थीं-‘ तो क्या मां को भी आदत थी इन नम बूंदों को अंदर ही अंदर सोखते रहने की? क्या यही वे बूंदें थीं जिनके समंदर में डूबकर मां की आंखों की चमक हमेशा के लिए ही खो चुकी थी ! ‘

अकेलेपन और दुःख ने मां और बेटे के बीच एक बहुत ही करीब का और नाजुक सा रिश्ता कायम कर दिया था। एक दूसरे की तरफ देखते, जरूरतों को पढ़ते-समझते ही बीतते थे दोनों के दिन रात। बचपन से ही मां के माथे की हर शिकन को होठों की बस होठों की मुस्कान में ही तो बदलना चाहते थे। बिना बाप के बेटे की हर ज़रूरत के लिए जितना ही मां परेशान होती, उतनी ही उनकी परेशानी और कुछ न कर पाने की असमर्थता नन्हे शेखर को दुख देती-धिक्कारती। जल्दी-से बड़े होने के लिए वह बेचैन हो उठते। अपने अभाव का दुख नहीं था उन्हें, बस मां का दुःख बर्दाश्त नहीं होता था उनसे। यूँ तो मां की तरह ही जिन्दगी की हर बंदिश और सीमाओं से समझौता करते हुए ही बड़े हुए थे वे भी, परंतु मां का छोटा-बड़ा हर दुःख उन्हें पागलपन की हद तक विचलित कर देता था। माँ की आंख से टपका मात्र एक आंसू उनके मन में सैलाब ला सकता था। और सैलाबों से जूझना, तैरकर खुदको और माँ को बचाते हुए साहिल पर आ पाना कितना कठिन होता है, बचपन से ही भली-भांति जान गये थे शेखर सरकार। वैस भी माँ के बगैर तो कोई अस्तित्व ही नहीं था...जिन्दगी ही नहीं थी उनकी। माँ ने खाया या नहीं...माँ सोई या नहीं, मां की तबियत ठीक है या नहीं, कोई दर्द, तकलीफ तो नहीं, बस बचपन से यही तो थी पढ़ाई के अलावा उनकी एकमात्र दिनचर्या। और फिर तब कदिन पहले से ही कठिन जिन्दगी और उलझाती, मां अपनी बहू पिनाकी बोस को उनकी जिन्दगी में ले आई थीं।

एक नया रंग और नया ही मौसम लेकर आयी थी पिनाकी काली बाड़ी में। कितने अरमान और ज़िद से लाई थीं मां पिनाकी को घर में बहू बनाकर। कुम्हलाने और कलुछाने से पहले कितना झूमकर कहती थीं – ‘ हमारे  तो दरिद्दर ही दूर हो गए। लक्ष्मी सा रूप और सरस्वती के गुण लेकर आयी है बहू। सच कहूं तो भगवती खुद ही चलकर आयी है काली बाड़ी में।‘

शेखर सरकार मां के चेहरे पर आयी इस नयी संतुष्ट मुस्कान पर न्योछावर थे और मां अपनी बहू पर। तभी तो बिना कुछ कहे और जान-समझे ही वरण कर लिया था पिनाकी का। काली बाड़ी की नयी मालकिन के स्वागत में क्या-क्या पापड़ बेलने होंगे, यह तब न शेखर ने ही सोचा था और ना ही खुशियों के सातवें आसमान पर बैठी श्रीमना ने। उसके लिए तो उनकी पिनाकी बहू नहीं, खुशियों का समन्दर थी...हजारों रतन गर्भ में छुपाए, उनकी अपनी रत्नगर्भा।

पिनाकी के घर ट्यूशन करके ही शेखर सरकार ने अपनी केमिकल इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और पहले दिन से ही, उन्हें देखते ही पिनाकी के पिता कार्तिक बाबू अपनी  केमिकल्स की फैक्टरी वाला अपना सपना जीने लग गये थे। इस होनहार युवक में न सिर्फ उन्हें एक योग्य और संस्कारी जंवाई दिख रहा था अपितु वह अजन्मा बेटा भी जो उनकी स्वर्गीय पत्नी अपनी कोख से उन्हें न दे पायी थी। वे जान गये थे कि कुशाग्र बुद्धि शेखर सरकार उनके व्यापार और सपने, दोनों को ही नई बुलन्दियों पर ले जाने में सक्षम हैं। सूझबूझभरी और पैनी आंखों में वही लगन और कर्मठता दिखी उन्हें जो कभी खुद उनके अपने पास थी। युवा पंखों में वही आतुर फड़फडाहट थी जो किसी भी ऊंचाई को नाप-तौल सकती थी। फिर बेटी के चेहरे पर भी तो एक गुलाबी आभा दिखती थी उन्हं शेखर के सानिध्य में। और इस तरह से शीघ्र ही नियति के सारे निर्णय खुद अपने हाथों में ले लिए कार्तिक बाबू ने। और तब खुद उनकी अपनी जिन्दगी भी कार्तिक बाबू के सपनों के ताने-बानों में उलझकर हमेशा के लिए ही बदल गयी। परन्तु किसी को भी तो कुछ हासिल नहीं हुआ इन सपनों के जाल से...ना तो कार्तिक बाबू के घर जमाई के सपने को उनके स्वाभिमान ने पूरा होने दिया और ना ही अम्मा की आदर्श बहू के सपने को पिनाकी ने। ‘क्या हर रिश्ते का जन्म सिर्फ जरूरतों से ही होता है? ‘

शेखर सरकार अपने इस प्रश्न का उत्तर तो आज तक नहीं ढूँढ पाए क्योंकि जीवन की तरह ही, रिश्तों को भी तो नफे-नुकसान के तराजू में तौलना उन्हें आया ही नहीं! हां याद आते ही एक मलिन अवसाद की परछांई जरूर शाम के बढ़ते अंधेरे से भी ज्यादा उनकी आँखों को गहरा जाती है।

अगर बस यही जीवन है तो इन रिश्तों में अपनी जरूरतों को, खुद को ढूंढ क्यों नहीं पा रहे वह-आकंठ बस डूबे ही क्यों रह जाते हैं ? छोटे-बड़े अतृप्त और असमर्थ इन अहसासों का कौनसा किनारा अब उन्हं डूबने से बचा पाएगा, यह तक तो कभी जान नहीं पाए वे।

पर एक शेखर के रूप और गुणों को देखकर ही तो रिश्ता मांगा था कार्तिक बाबू ने और बस इतना ही सुख काफी था श्रीमना के एकाकी अस्तित्व और मान सम्मान के लिए भी। हाथ जोड़कर कहा था तब-“ शेखर से अच्छा दामाद और बेटा मुझे और कहां मिलेगा बोहू दी...आप बस ‘हां’ कर दो, बाकी सब मैं संभाल लूंगा। आपकी सेवा करती, आपके चरणों में बैठी बेटी आंखों के आगे ही जीवन निकाल दे, इससे बड़ा सुख मेरे लिए भला और क्या हो सकता है

जिनके पांच मंजिले मकान की सीढ़ियां चढ़ने की श्रीमना के कमजोर घुटने हिम्मत तक नहीं जुटा पाए थे वही कार्तिक बाबू उसके सामने घुटने टेके बैठे थे। खुद चलकर आए थे उसके पास....श्रीमना बारबार सोचती और फूली न समाती। जिन कार्तिक बाबू के सहारे वह पिछले दस वर्षों तक अपनी गृहस्थी चला रही थी, जिन कार्तिक बाबू के यहां एक-एक करके वह अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख आयी थी, उसी कार्तिक बाबू की बेटी थी पिनाकी और सब जानते थे कि रंगरेजी टोला में बसने वाला हर व्यक्ति बस कार्तिक बाबू के लिए ही काम करता है---कैसे मना कर पाती श्रीमना कार्तिक बाबू को!

और आखिर क्यों नहीं, क्या कमी थी उनके श्रवण कुमार जैसे समझदार और होनहार बेटे में? इतना समझदार कि बिना कहे ही हर बात, हर दर्द समझ ले ...प्यार करे तो खुशियों से झोली भर दे। दूसरा कोई और कहां मिलेगा उन्हें शेखर जैसा? बड़े पुण्य प्रताप से जनमते हैं ऐसे बेटे। हर धूप छांव में बरगद के पेड़ सा ही तो खड़ा रहता है उनके आंगन में। कई-कई जन्मों के आशीर्वादों के बाद किसी-किसी को ही मिल पात होंगे ऐसे बेटे ? कितनी जिम्मेदारियां और तकलीफें उठाई हैं पर इसने भी इस छोटी सी उम्र मं ! श्रीमना ने भर आई आंखें पोंछ डालीं---परेशान होने की जरूरत नहीं पर अब। बहू के आते ही घर से खोई सारी खुशियां खुद ही लौट आएँगी...मंगलसूत्र, चंदनहार, कंगन, सभी कुछ। भगवान ने जब खुशियां लौटाई हैं तो पूरी तरह से ही जिएगी अब वह...बहू-बेटे की हर खुशी बांटती, पोते-पोतियों को खिलाती, मगन हंसती-गाती।

और तब बहुत सोच-विचारकर श्रीमना ने ‘हां’ कर दी। बेटे को संभालने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी थी। श्रवण कुमार जैसे शेखर के लिए मां की ही ‘ हां’ काफी थी। परन्तु पिनाकी के लिए बस इतना काफी नहीं था, बहुत कुछ चाहिए था उसे जिन्दगी से ---और भी कई सपने थे उसके बेहद अपने, जिनमें श्रीमना के लिए कोई जगह नहीं थी। ...

क्या वाकई में पिनाकी इतनी गलत थी, जितना कि वे समझते थे या थोड़ी गलती कहीं उऩसे भी हुई थी ? क्या वाकई में पिंकी ही जिम्मेदार थी इस प्रलय की, उनकी अपनी सोच और परिस्थियों का कोई योगदान नहीं था क्या....क्या जीवन की विषमताओं और जरूरतों ने कुछ ज्यादा ही सख्त नहीं कर दिया था उन्हें? वैसे भी कौन खुश रह पाया---वह, मां, मनु---या फिर खुद पिंकी ही!

रिश्तों की उस रेशमी उलझी डोर को एक बार फिर से उठा लिया था शेखर सरकार ने और असफल व नामुमकिन वह प्रयास---पिनाकी बोस, एक हठी नाम...उस हठी लड़की सा ही, पानी पर लिखे होने के बावजूद भी, बारबार और धीरे-धीरे उनकी आँखों में तैरने लग जाता...बेचैन अहसास क्या, खुद बेचैनी बनकर। चाहे-अनचाहे उन्हें डुबोने और भिगोने लग जाता...अस्तित्व और उनकी जिन्दगी का दुःखदायी हिस्सा, क नासूर बनकर।

पिंकी यानी कि पिनाकी बोस, गोरी-चिट्टी, तीखे नाक-नक्शों वाली पिंकी...बी.ए. तक पढ़ी-लिखी, सुरुचिपूर्ण और गृहकार्य में दक्ष, सुगढ़ उनकी पत्नी पिंकी। जिसकी कोख से कभी उनकी मनु का जन्म हुआ था। परन्तु दोस्त, दुश्मन रिश्तेदारों की तरह नामों का भी तो एक खास चेहरा होता है, खास जगह और पहचान होती है जिन्दगी में, फिर पिनाकी क्यों उनकी यादों और पहचानों में...जिन्दगी में अपनी सही जगह नहीं ढूँढ पाई...एक भग्न प्रतिमा-सी भटकती और भटकाती ही रही! क्यों आजतक नहीं जान पाए वे कि पिनाकी उनकी, उनके परिवार की...मां की दोस्त है या दुश्मन !  क्यों आजभी शीशे में बाल संवारते, चलते-फिरते, अपनी शकल की जगह उन्हें पिनाकी ही दिखने लग जाती है...बेवजह ही उनकी तरफ प्यार से देखती, मुस्कुराती...उनका घर-संसार संवारती। कभी-कभी तो उलाहने तक देती। अपनी बड़ी-बड़ी भूरी आँखों से एकटक बस उन्हें ही घूरती, जाने क्या-क्या कह जाती है पिनाकी उनसे। पर उन्होंने तो बरसों पहले ही पिनाकी यादों को विस्मृति की संदूकची में रखकर संयम के ताले लगा दिए थे...ताली रखकर भूलतक गए हैं अब तो वे। पर क्या सही था यह कदम उनका...क्या हर लड़की की बस यही इच्छा नहीं होती कि उसका, सिर्फ उसका अपना एक घर हो, जहां वह अपने पति और बच्चों के साथ मनमानी जिन्दगी जी सके...पटरानी बनी राज कर सके?कई दूसरों के साथ रह पाती हैं, कई नहीं। परन्तु पिनाकी को यह नहीं भूलना चाहिए था कि मां कोई दूसरी नहीं, सबसे ज्यादा अपनी है...शेखर से भी ज्यादा। क्यों शेखर की पत्नी पिनाकी के लिए इस अभद्र अपराध की कोई माफी नहीं थी शेखर की आँखों में, क्यों नहीं समझ पायी उनकी अपनी पत्नी पिनाकी इतनी जरा-सी इस बात को ! सामने हवा में उड़ता वह पत्ता भी उनके मन-सा ही एक सूखी और कटीली डाल पर जा अटका था  और बर्फीली हवाओं में फंसा बेचैन कांप रहा था। नम हो आई आँखें पोंछ डाली उन्होंने। कौन सी नयी बात है इसमें, जीवन के झंझावत में तो हर पल ही ऐसा होता रहता है...कहीं से उड़कर कहीं भी अटक जाते हैं हम भी तो किसी एक ही पल की डाल पर!...

 

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दो लघु कथाएँ 

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शैल अग्रवाल 

        गेंद

      

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       बच्चों को पिता बहुत ही समझ और निष्ठा  से बड़ा कर रहे थे। समझ और निष्ठा जो प्यार और सम्मान पैदा करती है।

       ' हमेशा एक दूसरे का ध्यान रखोगे, लड़ोगे  नहीं कभी,' अक्सर ही  वे  समझाते।  बच्चे भी उन्हं देखते ही लड़ाई और बहस  बीच में छोड़ देते । 'कट्टी' भूलकर दोस्त बन जाते और  साथ-साथ खेलने लगते।  पिता भी हरदम  ध्यान रखते कि घर में बच्चों के लिए हर चीज बराबर की और एक सी ही हो पाए। खिलौने तक बराबर के और एक से आते। हां खिलौनों के रंग जरूर बदल जाता। एक के लाल होते तो दूसरे के नीले। बेटा साल भर छोटा होने की वजह से ज्यादा लाडला और नटखट था। पिता के कहने से पहले ही, बहन छोटे भाई से ही रंग पसंद करवाती और छांटने के बाद तुरंत ही  भाई अपने हिस्से के खिलौने अलमारी में रख आता। बहन के खिलौनों से ही खोलता  और टूटने या खराब होने के बाद ही अपने निकालकर लाता। फिर दीदी को छूने तक न देता। "तुम्हारा तो लाल था ना!और लाल तो टूट गया। यह तो नीला है। और नीला तो मेरा है।" समझदार बड़ी  बहन कुछ न कह पाती।  

       वैसे तो दीदी पर जान छिड़कता था भइया। उसकी हर बात भी  मानता था, परन्तु खिलौनों के साथ-साथ  बहन की हर चीज पर  बस उसका  ही कब्जा होता। मां-बाप भी बहन को ही समझाते- ' छोटा भाई है। नासमझ है। खिलौने देने में दुख कैसा...  छोटे भाई का वह ध्यान नही रखेगी, तो और कौन रखेगा !'

        एकदिन आंगन में पड़ी रबर की  पुरानी गेंद के साथ  बहन खेल रही थी । भाई  ने देखा  और गेंद  हाथ से छीन ली।

        'मेरी गेंद है। मुझे दो। अब मैं खेलूंगा इसके साथ।' 

          ' तुम जाओ। दूसरी ले लो। बहुत सारी गेंदें हैं। ' बहन वोली। 

          ' नहीं मुझे तो यही चाहिए।'

            'तो मुझे दूसरी लाकर दो। '

         भाई खेलने में मस्त हो गया। बहन की बात सुनी अनसुनी हो गयी। उदास बच्ची आंखों में आसू भरे फिर देखती  रह गयी। पिता से नहीं देखा गया। बेटी को गोदी में लेकर बोले " अगर दीदी तुम्हें अच्छी नहीं लगती  और तुम इसे किसी भी खिलौने के साथ नहीं खेलने दोगे, तो  चलो, हम  इसे बाबाजी को (डरावना,राख मले जटाजूट वाला  भिखारी, जिसकी धमकी देकर बच्चों को अक्सर डराया जाता था)  दे आते हैं?"

       सुनते ही बच्चा सहम गया और गेंद तुरंत ही बहन को वापस  लौटा दी।  पर अगले पल ही दौड़ कर   पिता के पास वापस जा पहुँचा । बांहें फैलाकर गोदी में जा बैठा और   बोला,  "अब चलो, मुझे भी  बाबाजी को दे आओ। "

        डरी बहन ने तुरंत ही गेंद भाई को वापस  लौटा दी। 

 

 

 

      वीर

     

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         उस दिन  कपड़े पहनाते समय जब  अचानक ही अपाहिज मेजर साहब  का संतुलन बिगड़ा और वे  बिस्तर से नीचे की ओर  ढुलकने लगे, तो नर्स ने संभालने की बहुत कोशिश की पर संभाल नहीं पाई। नतीजा  यह हुआ  कि अगले पल  ही दोनों फर्श पर थे। मेजर साहब नीचे और नर्स उनके ऊपर, अभी भी कसकर  उन्हें  पकड़े ङुए और  संभालने की कोशिश करती हुई । नर्स का भय और चिन्ता के मारे बुरा हाल था, ' पता नहीं कमजोर और बीमार मेजर साहब  का क्या हाल हो? कहीं जाने और चोट न लग गयी हो  ? '

       डरी और  परेशान नर्स को देखकर  मेजर साहब  अपना दर्द भूल अपना वही पुराना ठहाका लगाते हुए बोले,  "  जेनी,क्या तुम नहीं सोचतीं कि अब तुम्हें मेरे ऊपर से उठ ही  जाना चाहिए। आखिर एक खूबसूरत युवती को यूँ एक दिलेर नौजवान की बाहों में देखकर लोग जाने क्या-क्या सोचने और कहने लग जाएँ !"  

        पल भर में ही घबराई नर्स के चेहरे की वे सारी भय और चिंता की लकीरें   आत्मविश्वास और  मुस्कुराहट में तब्दील हो गयीं।            

 

 

 

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ज्ञान-भारती

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(नए वर्ष में संकल्प लेने का रिवाज है ताकि कुछ हानिकारक आदतें छोड़ी जा सकें या फिर एक दृढ़ निश्चय के साथ किसी मनचाहे गन्तव्य को पाया जा सके। इन संकल्पों को कैसे सुलभता से पूरा किया जाए, या मुश्किल व परीक्षा की घड़ियों में कैसे डगमगाने से बचा जाए- जैसी सभी जटिल गुत्थियों के समाधान, प्रेरक व सरल शब्दों में और रोचक उदाहरणों के साथ लेकर आए हैं श्री सीताराम गुप्ता जी इस लेख में...।)

                           मन है कल्पवृक्ष अर्थात् संपूर्ण इच्छाओँ को पूर्ण करने वाला

                                                      -सीताराम गुप्ता

एक थका-हारा व्यक्ति एक जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठा था। उसे जोर से प्यास लगी थी। उसने सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि  मुझे पीने के लिए ठंडा-ठंडा पानी मिल जाए। उसका ये सोचना था कि वहां फौरन एक लोटा ठंडा पानी पहुंच गया। उसने अपनी प्यास बुझाई और आराम करने लगा। अब उसे भूख भी लग आई थी। उसने फिर सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन भी मिल जाए। उसका इतना सोचना था कि उसके सामने खूब सारा स्वादिष्ट भोजन आ गया। उसने पेट भर भोजन किया। भोजन करने के बाद उसके मन में विचार आया कि इस निर्जन वन में मेरे सोचते ही पानी और खाना आ गया। आखिर कहां से आया ये भोजन और पानी? कहीं ये भूत-प्रेत की तो माया नहींयदि इस समय कोई भूत-प्रेत आकर मुझे खा जाए तोइस विचार से वह डर गया और थर थर कांपने लगा। उसका इतना सोचना और अपनी सोच के प्रभाव से भयभीत होना था कि सचमुच एक भूत वहां आ उपस्थित हुआ और बोला, " मैं तुम्हें खाउँगा।" 

वह व्यक्ति बुरी तरह डर गया और सोचने लगा कि हो न हो इस वृक्ष में ही कोई जादू है जो मेरे मन के विचारों को जान लेता है और फिर वैसा ही कर देता है। पहले उसने मुझे पानी दिया, फिर भोजन दिया और अब भूत के रूप में मृत्यु। अचानक उस व्यक्ति के मन में इसके विपरीत भाव आया और कहने लगा, " नहीं, नहीं, ये नहीं हो सकता। मैं कोई सपना देख रहा हूं। भूत-वूत कुछ नहीं होता और मैं किसी भूत-प्रेत से नहीं डरता।" उसका ये सोचना और कहना था कि भूत गायब। वस्तुतः वह व्यक्ति एक कल्पवृक्ष के नीचे बैठा था। कहते हैं कल्पवृक्ष सब इच्छाओं को पूरी करने वाला होता है। उसके नीचे बैठकर जो भाव मन में लाए जाएँ अथवा इच्छा की जाए वह अवश्य पूर्ण होती है।

इस प्रसंग में एक बात स्पष्ट होती है वह ये कि कल्पवृक्ष के नीचे जाने वाली हर इच्छा पूर्ण होती है लेकिन इच्छा के पूर्ण होने के लिए सबसे जरूरी चीज है मन में इच्छा का होना अर्थात इच्छा के अभाव में कल्पवृक्ष भी फल नहीं दे सकता। कामना नहीं तो कैसी कामना पूर्ति? हर फल या परिणाम किसी कर्म के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है। कर्म नहीं करेंगे तो फल नहीं मिलेगा। कर्म की प्रेरणा विचार से ही उत्पन्न होती है और विचार का उद्गम है मन। कल्पवृक्ष भी तभी इच्छा पूरी करेगा जब मन में कोई इच्छा उत्पन्न होगी।

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसी इच्छा होगी वैसा ही परिणाम आएगा। भोजन की इच्छा तो भोजन और पानी की इच्छा तो पानी तथा मृत्यु का भय तो मृत्यु का सामना। हमारी इच्छापूर्ति हमारी सोच का ही परिणाम है। हमारी सफलता-असफलता, सुख-दुख, लाभ-हानि, आरोग्य-रुग्णता सब हमारी सोच द्वारा निश्चित होते हैं।

सकारात्मक सोच का अच्छा परिणाम तथा नकारात्मक सोच का बुरा परिणाम। हमारी सफलता, सुख, समृद्धि, आरोग्य और दीर्घायु हमारी सकारात्मक सोच या भावधारा का परिणाम है तो असफलता, दुख, हानि, रुग्णता तथा अल्पायु हमारी नकारात्मक सोच का परिणम। सफलता, सुख-समृद्धि, आय, स्वास्थ्य तथा आयु के प्रति अविश्वास, संशय तथा भय ही इनकी प्राप्ति में प्रमुख बाध्य है। मनुष्य वास्तव में वही तो है जो उसकी सोच है। तभी तो कामना की गई है कि मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो 'तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु' 

मन तो संकल्पविकल्पात्मक है। उसमें परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न होते रहते हैं। अच्छे विचार आते हैं तो बुरे विचार भी आते हैं। बुरे विचार आते हैं तो उसके विरोधी विचार अर्थात अच्छे विचार भी अवश्य उत्पन्न होते हैं। मन में उठने वाले विचारों पर नियंत्रण कर हम जीवन को मनचाहा आकार दे सकते हैं। जैसा भाव या विचार वैसा ही जीवन। अच्छे विचारों का चुनाव कर जीवन को उन्नत तथा बुरे विचारों का चुनाव कर जीवन को अवनत हम स्वयं बनाते हैं।

ये पूरा बृह्माण्ड ही कल्प वृक्ष है जो हमारे भावों के अनुरूप हमारी सृष्टि का निर्माण करता है। हमारी आंतरिक और बाह्य सृष्टि सब हमारे भावों से आकार पाती है और भावों से ही नियंत्रित होती है। सकारात्मक भावों द्वारा इसे सही आकार प्रदान किया जा सकता है तथा नियंत्रण द्वारा गलत आकार पाने से रोका जा सकता है। लेकिन हमारी सृष्टि के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है हमारे मन की ही। विचारों के अभाव में कल्पवृक्ष हो या ये पूरा बृह्माण्ड अथवा इस बृह्मण्ड को संचालित करने वाली दिव्य शक्तियां सब निरर्थक हैं। इस बृह्माण्ड अथवा भौतिक जगत् के निर्माण के मूल में भी एक दिव्य विचार ही तो है ऐसा उल्लेख हमारे आर्ष-ग्रन्थों में मिलता है. कल्पवृक्ष मनुष्य-मन की ही सृष्टि है। मनुष्य का मन ही सही अर्थों में कल्पवृक्ष है। 

कहते हैं कि पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है। पारस पत्थर किसी ने देखा नहीं सिर्फ किस्से सुने हैं पारस पत्थर के। पारस पत्थर प्रतीक है अपरिमित लाभ के स्रोत का। यह एक मुहावरा बन गया है। किसी के लिए कोई व्यापार पारस पत्थर सिद्ध होता है तो किसी के लिए दूसरी वृत्ति। वस्तुतः सबसे महत्वपूर्ण पारस पत्थर है मनुष्य का मन। मन रूपी पारस पत्थर को छुआने के लिए सकारात्मक विचार रूपी लोहे की आवश्यकता होती है तभी वह सोना बनता है अर्थात अपरिमित लाभ का कारण बनता है। मन को किसी सकारात्मक उपयोगी विचार से ओतप्रोत कर लो तो असीमित लाभ संभव है। जैसा विचार वैसा लाभ। सुख-दुख की अनुभूतियां मन में उत्पन्न विचार की ही देन हैं। स्वास्थ्य विषयक सकारात्मक विचार स्वास्थ्य तथा आरोग्य प्रदान करेंगे तथा समृद्धि के प्रति विश्वास से ओतप्रोत विचार समृद्धि देंगे। कुछ लोग केवल भौतिक सुख और समृद्धि चाहते हैं। उनको ये सब मिलता भी है लेकिन वास्तविक सुख और समृद्धि नहीं। यदि जीवन में संतोष की कामना करोगे तो संतोष भी मिलेगा और संतुष्टि के सामने मात्र भौतिक सुख और समृद्धि कोई मायने नहीं रखते। अतः मन को संतुलित सकारात्मक विचारों से ओतप्रोत रखना श्रेयस्कर है।

प्रायः कहा जाता है कि पुरुषार्थ से ही कार्य़ सिद्ध होते हैं मन की इच्छा से नहीं। बिल्कुल ठीक बात है लेकिन मनुष्य पुरुषार्थ कब करता है और किसे कहते हैं पुरुषार्थपहली बात तो यह है कि मन की इच्छा के बिना पुरुषार्थ भी असंभव है। मनुष्य में पुरुषार्थ या हिम्मत अथवा प्रयास करने की इच्छा भी किसी न किसी भाव से ही उत्पन्न होती है और सभी भाव मन द्वारा उत्पन्न और संचालित होते हैं। अतः मन की उचित दशा अथवा सकारात्मक विचार ही पुरुषार्थ को संभव बनाता है। पुरुषार्थ के लिए उत्प्रेरक तत्व मन ही है।

कई व्यक्ति तथाकथित पुरुषार्थ तो करते हैं लेकिन फिर भी सफलता से कोसों दूर रहते हैं। एक श्रमिक कितना परिश्रम करता है लेकिन क्या उसका परिश्रम या पुरुषार्थ अपेक्षित कार्य-सिद्धि प्रदान कर पाता हैकार्य -सिद्धि अथवा सफलता या लक्ष्य-प्राप्ति पूर्ण रूप से पुरुषार्थ पर नहीं मन की इच्छा पर निर्भर है। कालिदास कहते हैं नास्त्यगतिर्मनोरथानां ' अर्थात मनुष्य के लिए कुछ भी अगम्य नहीं है। इच्छाएँ ही हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं, सफलता प्रदान करने में सहायक होती हैं लेकिन संतुलित सकारात्मक इच्छाएँ क्योंकि जैसी इच्छा वैसा परिणाम। 

कल्पवृक्ष मनचाही वस्तु ही नहीं देता अपितु आनंद का अनुपम व अजस्र स्रोत भी है। कल्पवृक्ष अथवा हमारा मन। आनंद भी मन का एक भाव है। भौतिक सुख-सुविधाओं में आनंद नहीं यदि मन प्रसन्न नहीं। मन के प्रसन्न होने पर आर्थिक समृद्धि अथवा भौतिक सुख-सुविधाओं में कमी होने पर भी आनंद ही आनंद है। जिस दिन मन को नियंत्रित कर उसे सकारात्मकता प्रदान करना सीख जाएंगे, पारस पत्थर हाथ में आ जाएगा। कल्पवृक्ष बनते देर नहीं लगेगी।   

  

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जितेन्द्र सहाय

यस सर!

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क्या आपको पता है कि आज के दौर में सफलता का मूलमंत्र क्या है? ' जी नहीं!' किताबों की बातें तो रहने ही दें। मुझसे यह जान लें कि सफलता का मूलमंत्र है- 'यस सर!' यानी ' जी हां।' ' हां हुजूर।'

मेरे ख्याल से मेरी तरह आप भी अंग्रेजी की इस उक्ति से बखूबी परिचित होंगे। भले ही कोई अंग्रेजी के अन्य शब्दों से परिचित न हो, किंतु यदि उसने 'यस सर' का सधा हुआ प्रयोग करना सीख लिया है तो निश्चय रूप से सभ्य सुसंकृत कहलाने के काबिल है। वैसे 'सर' शब्द आज क युग में सर्वहारा से हब तक सबकी जबान पर है, किंतु ' यस' लग जाने पर इस शब्द के साथ एक विशिष्टता जुड़ जाती है।

अन्य बच्चों की तरह मैने भी सर्वप्रथम, वर्ग में लगाई जाने वाली हाजिरी के प्रत्युत्तर में 'यस सर' कहना सीखा। उस समय यह वाक्यांश बड़ा ही अर्थवान् लगता था और उसे बोलते हुए आदर, उत्साह आदि भावनाएँ प्रकट होती थीं। बाद में ' बा-बा ब्लैक शीप' का रट्टा लगाते हुए ' यस सर...यस सर...' की सम्मान सूचक ध्वनि ने हमेशा दिलो दिमाग के अंदर खुशी और उत्साह के भाव का संचार किया। किंतु वयःसंधि की सीमा-रेखा तोड़ने तक तो इस उक्ति के अर्थ भी बदलने लगे। उस समय तक मेरा एक सहपाठी अपने साथ पढ़ने वाली एक सहपाठिन में रुचि लेने लगा था। क्लास-रूम में कई दफा उस पर कागज की गोली फेंकते हुए शिक्षकों द्वारा पकड़ा गया और हर दफा शिक्षकों के डाँटने और दुबारा ऐसी हरकत न करने की ताकीद के प्रत्युत्तर में वह 'यस सर' कहकर सर झुका लता। किंतु उसने अपनी हरकत नहीं छोड़ी। सच तो यह है कि युवावस्था के लड़के-लड़कियों के 'यस सर' के टोन में काफी वैराइटी मिलती है और आरंभ में इसका सार्थक उपयोग बड़ों की खिल्ली उड़ाने के लिए करते हैं। एक शिक्षक ने एक सोलह वर्षीय छात्र से कहा- " क्या तुम्हें यह नहीं लगता कि मैं यह सब तुम्हारे भले के लिए कर रहा हूँ?"   "यस सर! पर क्या आपको पता है-मर लिए भला क्या है?"

इस शब्द के पीछे छिपा हुआ जो उपहास है, क्या उसे बताने की जरूरत है?

आइए अब थोड़ा बड़ों की दुनिया में झांक लें। इस दुनिया में तो 'यस सर' विनम्रता की प्राथमिक पहचान है और इसके बगैर तो काम ही नहीं चल सकता। इसके लगातार प्रयोग से यह जीभ के साथ उसी प्रकार लिपट-चिपट जाता है, जैसे चंदन बृक्ष के साथ भुजंग। जहां मोटी-मोटी किताबों की रटें लगाकर प्राप्त किया ज्ञान चुकने लगता है, अक्सर अकेला 'यस सर' सफलता के झंड गाड़कर चला आता है। सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत का मनसा, वाचा, कर्मणा पालन करने वाले जहां मुंह की खा जाते हैं, वहां झूठ और आडंबर का पैंट कोट चढ़ाए तथा 'यस सर' को टाई की तरह गले में फंसाए व्यक्ति सफलता के शीर्ष से हाथ हिलाता नजर आ जाता है। यकीन न हो तो साक्षात्कार कीजिए किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान के सेल्समैन या एक्जीक्यूटिव से।

आप कितने महान व्यक्ति हैं, कितने आज्ञाकारी और कितनी कार्यक्षमता अपने अंदर रखते हैं, इसका फैसला एक मिनट में 'यस सर' द्वारा हो जाता है। आपने किसी प्रश्न या सौंपे जा रहे दायित्व के जवाब में ' नो सर' कहा नहीं कि आपके कैरियर या प्रतिष्ठान पर खतरा मंडराया। यही कारण है कि बिजनेस एक्जीक्यूटिव हमेशा सिर्फ 'यस सर...यस सर' कहते हैं और इसके आगे की सारी बातें स्वयमेव ही शातिपूर्वक संपन्न हो जाती हैं। किसकी मजाल जो इस वाक्य में छिपे मकड़जाल की चपेट में आने से स्वयं को बचा ले? मुझे तो यही एक ऐसा वाक्य मिला है आज तक, जिसके कई-कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। शब्दों की सब्जी मंडी में यह प्याज है जिसके छिलकों की गणना और महिमा से हम सब परिचित हैं। 

एक कनिष्ठ अधिकारी अपने बॉस के साथ समुद्र के किनारे टहल रहा था। अचानक बॉस के मन में क्या सनक सूझी कि उसने अपने मातहत से पूछा-"क्या तुम यह समुद्र लांघ सकते हो?" बेचारे मातहत को हमेशा 'यस सर' कहने की आदत थी, सो उसके मुंह से तपाक से निकल गया-"यस सर !'' बॉस चौंक उठे। "क्या तुम सचमुच लाँघ सकते हो?" उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा। मातहत को अब अपनी गलती समझ में आई। किंतु उसने दुनिया भर की शालीनता अपने चेहरे पर समेटते हुए कहा "यस सर! मगर आपकी उंगली पकड़कर। यदि आप लांघ सकते हैं तो आपकी उंगलियां पकड़कर चलने वाला यह खादिम क्यों नहीं?" अब बॉस ही अपनी झेंप मिटाने को 'हें...हें...' कर 'गुड जोक'...'गुड जोक'...कहते हुए हंसने लगे। 

दफ्तर में बॉस जिस किसी भी कार्य के लिए कहें, उसके जवाब में 'यस सर' कहने से बेहतर और कोई विकल्प नहीं। लेकिन जब फाइल सामने आए तो आप वही लिखिए, जिसे लिखना आप उचित समझते हों। बड़े बाबू दफ्तर में यह सलाह एक नए लिपिक को बराबर देते रहते हैं। लेकिन लिपिक बेचारा आधुनिक शासन-क्षेत्र का एक ऐसा मोहरा है, जिसे बड़े बाबू तथा बड़े साहब दोनों को 'यस सर', 'यस सर' कहते हुए अपने हित में एक राह निकालनी पड़ती है। ऐसी परिस्थिति में 'यस सर' मजबूरी का एक पर्यायवाची शब्द बन जाता है। एक सरकारी अधिकारी होने के नाते मैं अपने अधीनस्थों से अपने प्रत्येक परामर्श के एवज में 'यस सर' सुनने का आदी हो चुका हूँ। बहुधा ऐसे मौके भी आते हैं, अपने से बड़े अधिकारियों के फालतू एवं चालू किस्म के सुझावों पर मुझे भी 'यस सर' कहना पड़ा है, लेकिन राइटिंग में आते ही वही चीज 'नो सर' भी हो जाती है। कभी-कभी तो कई अधिकारी झुंझलाकर जवाब-तलब भी करत कि जब आपसे मौखिक बातचीत हुई थी, तो आपने 'यस सर' क्यों कहा? अब भला मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि 'यस सर' महज एक ऐसा औपचारिक मुहावरा है जो सहज भाव से मुंह से निकल जाता है जिसका अर्थ उद्गम के समय समझ में नहीं आता। लिखते समय सावधानी विशेष रूप से बरतनी पड़ती है। इसलिए अधिकांश नेता, प्रशासक तथा सफल लोग लिखते हैं कम, बोलते हैं ज्यादा। 

इसमें दो मत नहीं कि लगातार 'यस सर' सुनते रहने से अधिकारियों के अहम् की तुष्टि होती रहती है और इसी से उनकी कार्यक्षमता में भी वृद्धि हो सकती है। किन्तु कभी-कभी ऐसा भी देखने में आया है कि ऐसे अधिकारी स्वेच्छाचारी हो जाते हैं और अपनी दक्षता में घुन लगा बैठते हैं। यह वाक्य अधिकारी को असीम आनन्द प्रदान कर देता है, किन्तु विवेक या निर्णय शक्ति का हरण कर लेता है। 'यस सर' का सटीक प्रयोग तो बहुधा बेधड़क होता है और बड़ी दूर तक असर डालता है। चर्चिल एक मुखर सांसद थे, एक दिन वह आधे दर्जन दफा, सदन में अपनी बात रखने को खड़े हुए, किन्तु हर बार अपनी ही पार्टी की एक खूबसूरत महिला सांसद द्वारा बीच में टपक पड़ने के कारण केवल 'यस सर' कहकर बैठ जाते। इस बार बार ' यस सर' के पश्चात उनके बैठ जाने पर स्पीकर ने खीझकर इसका कारण जानना चाहा। चर्चिल ने ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर स्पीकर तो झेंप गए और सांसद में पूरा अट्टाहास हुआ।

'यस सर'-पदबंध को महिमा-मंडित भी होते देखा है, जब ऊंचे प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारी तथा शीर्ष राजनेता अपने पुराने शिक्षकों का अभिवादन कर अतीत के गलियारों में झांकने को मजबूर करते हैं। 'यस सर', 'यस सर' की झड़ी लग जाती है- जब ये शिक्षक स्कूल या कालेज की बीती घटनाएं अपने वरिष्ठ पुराने छात्रों के बीच रखते हैं। कहावत है कि ताली दोनों हाथों से बजती है, अतः पुराने छात्र भी अपने शिक्षक की प्रशंसा में पीछे नहीं रहते।' सर!' 'सर!' कहते हुए उनके सामने .दों की बारात सजा देते हैं, जिससे शिक्षक आहलादित होकर अपनी ओर से भी कुछ जोड़-घटाव करते हैं। छात्र 'यस सर'. 'यस सर' की हामी भरते हुए उनकी स्मृति की दाद देत हैं और एक अत्यंत आत्मीयता का माहौल खड़ा हो जाता है। यहां ' यस सर' श्रद्धा और प्रेम क रूप में प्रतिष्ठा पाता है। 'यस सर' का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए एक पदाधिकारी ने 'नारे और मेरा जीवन' में लिखा है कि बचपन में अत्यंत आज्ञाकारी होने के कारण ये दो शब्द कालांतर में एक लत की तरह व्यक्ति से चिपक जात हैं। लेखक इतना ईमानदार है कि बचपन से जवानी तक की घटनाओं को उसने बड़े मनोरंजक ढंग से आगे बढ़ाया है- 

जब मुझे कहा जाता है-खीर खा लो, मैं तुरंत खीर खा लेता। जब कहा जाता-बिना इजाजत के घर के बाहर न जाओ, मैं शौचालय भी आज्ञा मांगकर ही जाता। यदि आदेश होता कि शरारती लड़कों के साथ न रहो, घर में ही मन लगाकर पढ़ो, तो मैं बाहर न जाकर घर में ही मक्खी मारता रहता। यदि कही जाता कि कुछ संगीत-गायन का भी अभ्यास करो तो मैं गवैयों के साथ अभ्यास शुरु कर देता, अगरचे मेरा गला बड़ा बेसुरा था।

 जब मैं जवान हुआ और बी.ए. करने के बाद एक फर्म में अफसर हो गया तो मेरा आज्ञाकारी व्यक्तित्व बॉस की आज्ञा के लिए बराबर ललायित रहता।  'यस सर', 'यस सर' हर बात पर कहने की ऐसी आदत लगी कि जब बॉस ने कहा कि एयर इँडिया की उड़ान बड़ी अच्छी होती है, तो मैने 'यस सर' कहकर एयर इँडिया का टिकट बॉस के साथ जाने के लिए मंगवा लिया, यद्यपि मैं इस टिकट का हकदार नहीं था, और मेरे पास उतने पैसे भी नहीं थे, जिसके कारण मुझे कर्ज लेना पड़ा। एक दिन बॉस न कहा "थम्स-अप बड़ा स्वादिष्ट होता है!" मैं 'यस सर' कहकर बिना दूसरे पेय को चखे ही थम्स-अप पीने लगा तथा बॉस को खुश करने के लिए दफ्तर के लोगों को भी इसे पीने की आदत लगवाई। मेरी दोस्ती उन लोगों से ज्यादा हुई जो 'यस सर' को पूरी तरह जीवन में साधे हुए थ और 'यस सर' कहने की दौड़ में जैसे लोगों से प्रतिस्पर्धा करते थे। 'यस सर' एक मंत्र है-विघ्नविनाशक, मंगलकारी मंत्र! जपते चलो।

कुछ लोगों को 'यस सर' से एलर्जी भी होती है। अतः ऐसे लोगों को फौरन भांपकर उनके लिए इस वाक्य का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए, अन्यथा काम बिगड़ने का खतरा है। मेरे एक विद्वान मित्र को आकाशवासी मं रिकार्डिंग के लिए आमंत्रित किया गया। रिकार्डिंग के समय कार्यक्रम अदिशासी आदतन उनक प्रत्यक जवाब में 'यस सर' दोहराने लगा। वह उत्तेजित हो उठे और कार्यक्रम से उनका मन उचटने लगा। केन्द्र निर्देशक भी रिकार्डिंग रूम में ही खड़े थे। उन्होंने श्थिति को समझा और कार्यक्रम अधिशासी को 'यस सर' कहने से मना किया। इसके बाद ही मित्र का तनाव कम हुआ और रिकार्डिंग पूरी हुई। 'यस सर' का अत्यधिक प्रयोग सत् पुरुष सुनना पसंद नहीं करते। यह दोगर बात है कि सच का आतंक होता है, झूठ मित्र की तरह होता है।

कुछ लोग 'यस सर' का प्रयोग टरकाने के लिए भी करते हैं। बहुधा आफिस में यदि कोई अपने कार्य के बारे में दरयाफ्त करता है तो संबंधित लिपिक टरकाने के लिए कह देता है-" यस सर, आपका काम हो रहा है।" यदि आप अचानक किसी अवांछित जगह पर पहुंच गए हो तो स्वागतकर्ता 'यस सर' कहते हुए आपको इस तरह से घूर सकता है, मानो कह रहा हो-' मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?' 'यस सर' के ऐसे आदरभाव में 'भाव' महत्वपूर्ण होता है।

'यस सर' से संबंधित एक घटना याद आती है, जो अपने में बड़ी शिक्षाप्रद है। एक दिग्गज सेनापति न अपने पुत्र के आपरेशन के लिए, जिसे हृदय रोग था, एक बड़ी रकम की सहायता मुख्यमंत्री से मांगी। मुख्यमंत्री ने तुरंत मुख्य सचिव को आर्थिक सहायता दिलवाने के लिए कहा। मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री से कहा-'यस सर!' मुख्य सचिव ने स्वास्थ्य सचिव से मुख्यमंत्री की बात कही। स्वास्थ्य सचिव ने कहा 'यस सर!' स्वास्थ्य सचिव ने स्वास्थ्य निर्दशक को वह आदेश पहुंचाया- उन्होंने कहा- 'यस सर!' स्वास्थ्य्य निर्देशक ने उसी तरह उप निर्देशक को कहा। उन्होंने भी कहा-'यस सर!' पूरा तंत्र जैसे सहायता के लिए बेचैन हो गया। 

कुछ दिन बाद स्वंत्रता सेनानी की पुनः मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई। मुख्यमंत्री ने कहा "आपरेशन सफल हुआ न, बच्चा तो अब स्वस्थ होगा? किंतु एक बात, प्राप्त हुए रुपयों के खर्चे का ब्यौरा, रसीद के साथ सरकार को भज दें, जिससे हिसाब-किताब ठीक रहे।" स्वतंत्रता सेनानी ने दुखी होकर कहा-" रुपये कहां मिले, ऊपर से नीचे तक 'यस सर' हो गया।" मुख्यमंत्री ने आश्चर्य व्यक्त किया-"नहीं मिले? मैं तुरंत मुख्य सचिव को बताता हूँ।" मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव स रौब से पूछा-" इन्हें लड़के के आपरेशन के लिए रकम क्यों नहीं मिली?" मुख्य सचिव ने कहा- " सॉरी सर, मैं स्वास्थ्य सचिव से पूछता हूँ।" स्वास्थ्य सचिव ने कहा-  "सॉरी सर, मैं स्वास्थ्य निदेशक से पूछता हूँ।" निदेशक ने कहा- " सॉरी सर, मैं उप निदेशक से पूछता हूँ।" उप निदेशक ने कहा-"सॉरी सर, मैं आफिस में पता लगाता हूँ।" इतना सुनकर बचारे स्वतंत्रता सेनानी ने मुख्यमंत्री से कहा-" महाशय! पहले 'यस सर' था, अब 'सॉरी सर' ऊपर से नीचे तक है। कृपा करके इन्हें ज्यादा तकलीफ न दें, इस बीच मेरा बच्चा नीचे से ऊपर चला गया।...यस सर।"

गुलामी के समय की शासन प्रणाली, संचिका परिचालन विधि तथा डेस्क सिस्टम की लीक पर चलने वाली मानसिकता की उपज है - 'यस सर', और 'सॉरी सर'। ये दोनों मौसेरे भाई, नौकरशाही में एलीटिज्म को कायम रखते हुए नौकरशाही का, व्यवस्था के प्रति बिकने का व्यापार चालू रखते हैं। आज के प्रशासन तंत्र की संरचना इन मुहावरों से इस तरह प्रभावित है कि दफ्तरों में इनके प्रयोग की अनावश्यक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना मुश्किल हो गया है। एक तीसरा शब्द युग्म है-'एक्सक्यूज मी', जो प्रेम-त्रिकोण बनाने के लिए 'यस सर' ' सॉरी सर' के साथ जुट जाता है तथा सूखे पांव वैतरणी पार करवाने में लोगों का सहायक होता है। इस शार्टकट के जमाने में इन तीनों से बनी त्रिवेणी में स्नान कर 'हर-हर गंगे' कहते हुए कोई भी अपना अभिष्ट सिद्ध करने में सफल होगा। यह जान जाइये कि इन तीनों में कहीं कोई अकड़ नहीं, अहंकार नहीं, अनास्था नहीं, वरन् विनय, करुणा और सेवा के भाव हैं, जो पत्थर को भी मोम बना देते हैं।

आज के इस बहुरंगे युग में 'यस सर' जैसा बहुरंगा संक्षिप्त वाक्य शायद ही मिले। 'यस सर' आज के युग की एक आत्मिक नहीं, यांत्रिक अभिव्यंजना है, जिसका प्रयोग अत्यंत भ्रामक और छलपूर्ण सिद्ध हो सकता है। इसके अर्थ के सत्यापन के लिए आपको अपने मन को टटोलना होगा, व्यक्ति की परख करनी होगी तथा परिस्थितियों को भांपना पड़ेगा। व्यवहार में 'यस सर' का न तो कोई निश्चित अर्थ है, न ही उपयोग; फिर भी हमारी जिह्वा से यह चासनी की तरह टपकता है। विनम्रता प्रदर्शन के लिए यह सबसे फुर्तीला मुहावरा बन गया है। भले ही हमारी आवाज में दम न हो, हमारा शब्द-ज्ञान काफी कमजोर हो, किंतु सफलता तलवे चाटेगी, यदि 'यस सर' के सार्थक प्रयोग से हम भिज्ञ हो, क्योंकि 'यस सर' कहना सामाजिक शिष्टाचार का एक अंग बन गया है। यदि भरोसा न हो तो आप इस 'यस सर' को भूलकर देखें, मेरा दावा है कि यह दुनिया भी आपको बिसार देगी। इस 'यस सर' में जादू है। इसका प्रयोग करके कई अफसरों ने अपने मंत्री को अपनी मुठ्ठी में कर रखा है और राजनीतिक दबाव के बावजूद इस 'यस सर वादी' अफसर की ' अवसरवादिता' चलती रहती है। 'यस सर' वह सोने की तलवार है, जिसमें धार नही होती, केवल चमक होती है।

'यस सर' के संबंध में अब तक जो मैं कह रहा था, वह समाज के वर्तमान और प्रत्यक्ष रूप का विश्लेषण करता है, किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। जरा इसकी परंपरा दर्शन और मनोविज्ञान पर विचार किया जाए तो अनेक तथ्य उपलब्ध होंगे। फिर आप खुद भी 'यस सर', 'नो सर ' का अर्थ पटल खोलने में समर्थ हो सकेंगे। 'यस सर' अथवा ' जी हां' एक स्वीकृति सूचक अभिव्यंजना है। चाहे-अनचाहे इस व्यंजना के प्रयोग में 'जी हां' का अर्थ ' जी नहीं' हो जाता है। अलंकार शास्त्र में कभी-कभी प्रयुक्त शब्द का अर्थ उल्टा हो जाता है, जैसे पंडित का अर्थ मूर्ख और पहलवान का अर्थ दुर्बल हो जाता है। कभी-कभी मौन भाषा का प्रयोग भी आवश्यक हो जाता है। कहा गया- 'मौनं स्वीकृति लक्षणम्'। अर्थात 'नो सर'। बड़ा मुश्किल है समझना। शब्दों के पीछे अर्थछाया की जो रेखा बनती है, वही महत्वपूर्ण है। यह रेखा एक अबूझ पहेली-सी है।

बुद्ध से अनेक प्रश्न पूछे गए थे। जैसे 'ईश्वर है?', 'ईश्वर नहीं है?' 'आत्मा है?', ' आत्मा नहीं है?' ' पुनर्जन्म होता है?', 'पुनर्जन्म नहीं होता है?' इन सभी प्रश्नों के उत्तर में बुद्ध मौन रहे। शिष्यों ने इस मौन की व्याख्या की। कहा-' बुद्ध के मौन का अर्थ है-' हां' (यस सर)। दूसरे पक्ष ने कहा- बुद्ध के मौन का अर्थ है-'नहीं' (नो सर)। मौनं स्वीकृति लक्षणम्। मौनं अस्वीकृति लक्षणम्। इसी आधार पर बुद्ध को एक पक्ष ने अऩीश्वरवादी, अनात्मवादी, पुनर्जन्म- विरोधी माना, तो दूसरे पक्ष ने इसी मौन के आधार पर ईश्वरवादी, आत्मवादी और पुनर्जन्मवादी मान लिया। शताब्दियों तक विवाद बना रहा।

बहुत बाद में नागार्जुन ने इसका समाधान प्रस्तुत किया। कहा-' सारे प्रश्न ही गलत थे। अतः गलत प्रश्न (फैलेसस क्वेश्चन) का उत्तर हां या ना में नहीं हो सकता।' प्राश्चिकों ने पूछा ' जैसे?' नागार्जुन ने कहा-' यदि मैं आपसे एक प्रश्न करूँ और आप हां या ना में जवाब देकर देखिए। प्रश्न है-क्या आपने अपनी मां को झाड़ू से पीटना बन्द कर दिया? आप हां और ना कुछ नहीं कह सकते। दोनों गलत होंगे, क्योंकि प्रश्न ही गलत है। इसलिए ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म जैसे गढ़े हुए शब्द अननुभूत तथा अदृष्टपूर्व हैं।' जैसे कोई कहे-आपने आपने नदेज्दा फ्योदोरीसना को देखा है? कोई क्या उत्तर देगा? रूसी भाषा का यह शब्द उत्तरदाता के लिए अपरिचित है। अतः'यस सर', ' नो सर' दोनों बेमानी हैं। वैस कहा भी जाता है कि विकल्पहीन सच, आपको कहीं का नहीं छोड़ता। और आज तमाम दुनिया निर्मूल और भ्रांत प्रश्नों पर बिना समझे-बूझे 'यस सर', 'नो सर' कहे जा रही है। झूठे प्रश्न, झूठे उत्तर। लेकिन मलुष्य तो विवक्षु प्राणी है। वह बोलना चाहता है। दूसरे वह किसी-न-किसी के अधीनस्थ है। अधीनस्थता ना नहीं जानती । वह हां कहलवाती है। 'यस सर' एक विवश सरेंडर है, यही ठकुरसुहाती और आत्मप्रवंचित खुशामद-भरी वाणी है। हम 'यस सर' की दासता में फंसे हैं। सभी दास हैं। ये दास भक्तिकाल के सूरदास, तुलसीदास, कबीरदास, केशवदास, मलूकदास, रविदास नहीं, वरन् बॉस-दास हैं।   

 

 

 

 

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स्मृति शेष में इसबार जैनन्द्र कुमार जी की कलम से  पढ़िए शांत नास्तिक साहित्यकार प्रेमचंद की अंतिम यादें,

एक शांत नास्तिक संत

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-जैनेन्द्र कुमार

मुझे एक अफसोस है, वह अफसोस यह है कि मैं उन्हें पूरे अर्थों में शहीद क्यों नहीं कह पाता हूँ, मरते सभी हैं, यहां बचना किसको है! आगे-पीछे सबको जाना है, पर मौत शहीद की ही सार्थक है, क्योंकि वह जीवन की विजय को घोषित करती है। आज यही ग्लानि मन में घुट-घुटकर रह जाती है कि प्रेमचन्द शहादत से क्यों वंचित रह गये? मैं मानता हूँ कि प्रेमचंद शहीद होने योग्य थे, उन्हें शहीद ही बनना था।

और यदि नहीं बन पाए हैं वह शहीद तो मेरा मन तो इसका दोष हिंदी संसार को भी देता है।

मरने से एक सवा महीने पहले की बात है, प्रेमचंद खाट पर पड़े थे। रोग बढ़ गया था, उठ-चल न सकते थे। देह पीली, पेट फूला, पर चेहरे पर शांति थी। 

मैं तब उनकी खाट के पास बराबर काफी-काफी देर तक बैठा रहा हूँ। उनके मन के भीतर कोई खीझ, कोई कड़वाहट, कोई मैल उस समय करकराता मैने नहीं देखा, देखके तो उस समय वह अपने समस्त अतीत जीवन पर पीछे की ओर भी होंगे और आगे अज्ञात में कुछ तो कल्पना बढ़ाकर देखते ही रहे होंगे लेकिन दोनों को देखते हुए वह संपूर्ण शांत भाव से खाट पर चुपचाप पड़े थे। शारीरिक व्यथा थी, पर मन निर्वीकार था।

ऐसी अवस्था में भी (बल्कि ही) उन्होंने कहा- जैनेन्द्र! लोग ऐसे समय याद किया करते हैं ईश्वर। मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई है।

शब्द हौले-हौले थिरता से कहे गए थे और मैं अत्यंत शांत नास्तिक संत की शक्ति पर विस्मित था।

मौत से पहली रात को मैं उनकी खटिया के बराबर बैठा था। सबेरे सात बजे उन्हें इस दुनिया पर आँख मीच लेनी थीं। उसी सबेरे तीन बजे मुझसे बातें होती थीं। चारो तरफ सन्नाटा था। कमरा छोटा और अँधेरा था। सब सोए पड़े थे। शब्द उनके मुंह से फुसपुसाहट में निकलकर खो जाते थे। उन्हें कान से अधिक मन से सुनना पड़ा था। 

तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरे सामने कर दिया, बोले-दाब दो।

हाथ पीला क्या सफेद था और पूला हुआ था, मैं दाबने लगा।

वह बोले नहीं, आँख मींचे पड़े रहे। रात के बारह बजे ' हंस' की बात हो चुकी थी। अपनी आशाएँ, अपनी अभिलाषाएँ, कुछ शब्दों से और अधिक आँखों से वह मुझपर प्रगट कर चुके थे। ' हंस' की और साहित्य की चिंता उन्हें तब भी दबाए थी। अपने बच्चों का भविष्य भी उनकी चेतना पर दबाब डाले हुए था। मुझसे उन्हें कुछ ढारस था।

अब तीन बजे उनके फूले हाथ को अपने हाथ में लिए मैं सोच रहा था कि क्या मुझ पर उनका ढारस ठीक है। रात के बारह बजे मैने उनसे कुछ तर्क करने की धृष्टता भी की थी। वह चुभन मुझे चुभ रही थी। मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?

इतने में प्रेमचन्द जी बोले, जैनेन्द्र! बोलकर, चुप मुझे देखते रहे। मैने उनके हाथ को अपने दोनों हाथों से दबाया। उनको देखते हुए कहा, आप कुछ फिकर न कीजिए बाबूजी। आप अब अच्छे हुए और काम के लिए हम सब लोग हैं ही।

अब मुझे देखते, फिर बोले-आदर्श से काम नहीं चलेगा। मैने कहना चाहा...आदर्श, बोले-बहस न करो। कहकर करवट लेकर आँखें मींच लीं।

उस समय मेरे मन पर व्यथा का पत्थर ही मानो रख गया। अनेकों प्रकार की चिंता-दुश्चिंता उस समय प्रेमचन्द जी के प्राणों पर बोझ बनकर बैठी हुयी थी। मैं या कोई उसको उस समय किसी तरह नहीं बटा सकता था। चिंता का केन्द्र यही था कि 'हंस' कैसे चलेगा? नहीं चलेगा तो क्या होगा? 'हंस' के लिए तब भी जीने की चाह उनके मन मं थी और ' हंस' न जियेगा, यह कल्पना उन्हें असह्य थी, पर हिन्दी-संसार का अनुभव उन्हें आश्वस्त न करता। 'हंस' के लिए न जाने उस समय वह कितना झुककर गिरने को तैयार थे। 

मुझे यह योग्य जान पड़ा कि कहूं ...' हंस' मरेगा नहीं, लेकिन वह बिना झुके भी क्यों न जिये? वह आपका अखबार है, तब वह बिना झुके ही जियेगा। लेकिन मैं कुछ भी न कह सका और कोई आश्वासन उस साहित्य-सम्राट को आश्वस्थ न कर सका।

थोड़ी देर में बोले -गरमी बहुत है, पंखा करो। मैं पंखा करने लगा। उन्हें नींद न आती थी, तकलीफ बेहद थी। पर कराहते न थे, चुपचाप आंख खोलकर पड़े थे। 

दस पंद्रह मिनट बाद बोले-जैनेन्द्र, जाओ, सोओ।

क्या पता था अब घड़ियां गिनती की शेष हैं, मैं जा सोया। और सबेरा होते-होते ऐसी मूर्छा उन्हें आयी कि फिर उनसे जगना न हुआ। 

हिंदी संसार उन्हें तब आश्वस्त कर सकता था, और तब नहीं तो अभी भी आश्वस्त कर सकता है। मुझे प्रतीत होता है, प्रेमचन्द जी का इतना ऋण है कि हिन्दी संसार सोचे, कैसे वह आश्वासन उस स्वर्गीय आत्मा तक पहुंचाया जाये।

       

 

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जूली स्करडेनिस

( अमरीकी यात्रा लेखिका)

भव्य सौंदर्य की मिसाल

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ऱाजस्थान की चित्रित हवेलियां 

बारह वर्ष पूर्व मैं पहली बार भारत आयी। तीन सप्ताह के उस छोटे झटपट दौरे ने मुझे देश के अनेक प्रमुख नगरों और स्थानों से परिचित करवाया था। लेकिन भारत के उत्तर पश्चिम छोर में बसे राजस्थान न मेरा सबसे अधिक मन लुभाया था। समय गुजरने के साथ राजस्थान की छवियां मेरे मष्तिष्क में उतनी ही तरोताजा बनी रहीं जैसी जब मैंने उन्हें पहली बार देखा था, उस कभी न अंत होने वाले मरुस्थल में बिखरे छोटे-छोटे गांव, विशाल मध्ययुगीन दुर्ग, हिन्दु मन्दिर, महाराजाओं के विलासमय प्रासाद और सदा की भांति शुष्क रगिस्तानी वातावरण के ठीक विपरीत चटख पीले, नारंगी और लाल रंग के परिधानों धारण किये राजस्थानी महिलाएँ।

मैन वापिस लौटने का स्वप्न संजोया था। और मेरा यह स्वप्न पूरा हुआ। यह मेरा उस क्षेत्र को पूरी तरह से खोजने का मौका था जिसके साथ मुझे अपनी पहली यात्रा के दौरान प्रेम हो गया था। मैने ऊँटों, दुर्गों और प्रासादों की अपेक्षा की थी और मुझे निराशा नहीं हुई। मुझे वे प्रचुर संख्या में मिले। लेकिन मैने शेखावाटी की अपेक्षा नहीं की थी जो राजस्थान के उत्तर पूर्व का एक क्षेत्र है जहां अपूर्व ढंग से चित्रित विशाल मकान हैं जिन्हें हवेलियां कहा जाता है। मैने "भव्य" शब्द को साधारण तौर पर नहीं प्रयुक्त किया है। शखावाटी को भारत के समृद्धतम कलात्मक और वास्तुशिल्पीय क्षेत्रों में एक कहा गया है। 

मूलतः सैन्य तानाशाहों और बाद में राजपूत योद्धाओं द्वारा शाषित शेखावाटी इसलिए समृद्ध हुआ क्योंकि यह अरब सागर पर स्थित गुजरात को देश के भीतरी भागों से जोड़ने वाले कारवां मार्ग पर स्थित था। व्यापारियों ने इन कारवां मार्गों पर व्यापार केन्द्र स्थापित किये जो शीघ्र ही नगरों में बदल गये। जैसे जैसे वे धनवान हुए उन व्यापारियों ने अपनी संपदा हवलियों, मंदिरों, कुओ तथा व्यापारिक स्मृति स्थलों, जिन्हें छत्रियां कहा जाता था, पर लगा दी।

19वीं शताब्दी के आरंभ से मध्य काल तक ब्रिटिश शासन के कारण व्यापार बम्बई, कलकत्ता और मद्रास ( अब क्रमशः मुम्बई, कोलकता और चेन्नै) चला गया। चतुर शेखावाटी व्यापारी, जिन्हें मारवाड़ी कहा जाता था, अपने शेखावाटी गृह प्रदेशों को छोड़कर बड़े बन्दरगाह नगरों की ओर बढ़ चले। लेकिन कम से कम आगामी कुछ पीढ़ियों तक उनके परिवार पीछे रह गये जबकि धनाड्य व्यापारिओं ने अपने पूर्वजों के मकानों को चित्रों से अलंकृत करने में अपना धन लगा दिया। ये अलंकृत हवेलियां शेखावाटी की शान हैं। 

ये हवेलियां जो अधिकांशतः 1800 और 1930 के मध्यकाल के दौरान निर्मित हुई थीं समस्त शेखावाटी में तब फली फूलीं जब व्यापारियों में विशालतम, सबसे अलंकृत हवेलियों के निर्माण के लिए होड़ लग गई। एक विशाल मुख्य प्रवेश द्वार जिससे एक छोटा प्रवेश द्वार निकलता है, भीतरी ड्योढ़ी में ले जाता है जिसे मरदाना कहते हैं और जहां आगंतुकों का बैठक में स्वागत किया जाता है। मरदाना वह स्थान है जहां घर के पुरुष अपना अधिकांश समय बिताते हैं। 

मरदाना के बाद एक दीवार और छोटे गलियारे से अलग हुआ जनाना या भीतरी ड्योढ़ी होती है जहां पर घर की महिलाएँ रहती हैं। व्यापारी की धन-दौलत के अनुसार घर में अतिरिक्त ड्योढ़ियां भी हो सकती हैं। ड्योढ़ियों के चारो ओर बने कमरे आम तौर पर दो से तीन मंजिलों में होते हैं। 

शेखावाटी हवेलियों में प्रचुर चित्रकारी की गयी होती है। भवनों के बाह्य भाग, ड्योढ़ियों की भीतरी दीवारें, कमरे, भीतरी छतें और महराबों पर भी चित्रकारी की गयी होती है। सतहों पर प्लास्टर लगाया जाता है और जब उसकी ऊपरी परत अभी गीली ही होती है उस पर रंग लगाया जाता है जिससे भित्ति चित्र बनते हैं। प्रयुक्त रंग चटख और शोख होते हैं। 19 वीं शताब्दी के अंत तक आते आते प्राकृतिक वनस्पति रंगों का स्थान धीरे धीरे कृतिम रंगों ने ले लिया था। 

इन सतहों पर क्या चित्रित किया जाता था, लगभग हर कुछ-पुष्पीय और अरबी डिजाइन जिन पर मुगलों का प्रभाव पड़ा था, जिन्होंने अधिकांश उत्तर भारत पर लगभग 200 वर्षों (1526-1707) तक राज्य किया था, लोक कथाओं के दृश्य और हिन्दु पौराणिक प्रसंग या केवल साधारण चित्र। लेकिन इनमें वास्तव में अनूठे चित्र उन नयी खोजों के हैं जिनको ब्रिटिश लोग लेकर आये थे जैसे स्टीमशिप, ट्रेन, कारें, ग्रामोफोन और आरंभिक हवाई जहाज। इन्हें बड़ी संख्या में चित्रित किया गया है। 

शेखावाटी के केन्द्रीय भाग में जो एक त्रिकोण के समान है और जिसके तीन सिरों पर जयपुर, दिल्ली व बीकानेर  है -मांडवा है जो दिल्ली से 150 मील पश्चिम में एक व्यस्त भीड़ भाड़ वाला नगर है। मांडवा के केन्द्र में मांडवा किला है। 1755 में निर्मित यह एक सुदृढ़ किला है जिसमें एक प्रासाद होटल है जो इस नगर के संस्थापक नवल सिंह के वंशजों द्वारा चलाया जा रहा है। शेखावाटी के कुछ प्राचीनतम भित्ति चित्र-200 वर्षों से भी प्राचीन- इस दुर्ग के कक्ष की दीवारों को अलंकृत करते हैं। 

मांडवा में दर्जनों चित्रित हवेलियां हैं। सीमित समय के लिए भी आए यात्री यहां कुछ उत्कृष्ट हवेलियां देख सकते हैं। यहां गोयनका हवेली (निर्मित 1890) है जिसके बाह्य भाग में हाथियों और घोड़ों के विशाल भित्ति चित्र हैं। गुलाब राय लाडिया( 1870) की हवेली के बाह्य भाग पर हाथी और ऊँट चित्रित हैं। नंदलाल मुरमुरिया ( 1935) की हवेली में भित्ति चित्रों का अजीबोगरीब संग्रह देखने को मिलता हैः घोड़े पर सवार नेहरू, इंगलैंड के सम्राट जार्ज पंचम और गंडोला के साथ वेनिस। बन्सीधर नेवटिया (1921) में घोड़ों और हाथियों के पारंपरिक भित्ति चित्रों के साथ फोन पर बात करता तरुण बालक, सुख सुविधाओं से सज्जित यात्रा वाहन और राइट ब्रदर्स का हवाई जहाज। मांडवा दुर्ग से पैदल यात्रा करके कई अन्य हवेलियों को देखा जा सकता है। यहां की सर्वाधिक जानी पहचानी हवेलियों को देखना अच्छा लगता है लेकिन इस छोटे से शहर के अनेक आनंदों में से एक है वैसे ही टहलना और अनायास छोटी मोटी खोजें करना। आप दोनों ही कर सकते हैं यदि आप कुछ दिन यहां ठहरें।

दक्षिण में पन्द्रह मील आगे नवलगढ़ है, शेखावाटी के सबसे महत्वपूर्ण चित्रित नगरों में से एक। ऐसा अनुमान है कि इस छोटे से नगर में 100 से अधिक चित्रित हवेलियां हैं। यदि आप कोई अन्य हवेली न देख पाये तो कम से कम आनंदीलाल पोद्दार हवेली ( 1920) देखिये जो एक भलीभांति संरक्षित हवेली है जिसकी बाहरी और भीतरी दीवारों पर सज्जित भित्ति चित्र शोख और सजीव हैं। पोद्दार परिवार मुंबई के एक धनाढ्य उद्योगपति हैं जो शेखावाटी और समस्त भारत में स्कूलों का निर्माण करवाने में सक्रिय हैं। कभी यह उनका घर हुआ करता था। 

मांडवा और नवलगढ़ के बीच मुकुन्दगढ़ और डुंडलोड है जहां अनेक विशाल चित्रित हवेलियां हैं। डुंडलोड में 250 वर्ष पुराना किला है जिसमें मुगल और हिन्दु वास्तुशिल्पीय शैली का मेल देखने को मिलता है( अब एक होटल है)।

लगभग प्रत्येक शेखावाटी नगर में कम से कम एक चित्रित हवेली तो है ही लेकिन जिन नगरों में सर्वोत्तम अलंकृत हवेलियां देखने को मिलती हैं वे हैं फतेहपुर, झुंझनु और रायगढ़-सभी मांडवा के समीप हैं और हां नवलगढ़ व मांडवा भी इस सूची शामिल हैं।

हवलियों को देखने के लिये कुछ सुझावः

समय का पूरा पूरा उपभोग करने और जितनी अधिक संभव हो सकें उतनी हवेलियां देख पाने के लिए आपको एक गाइड कर लेना चाहिये जिससे आपउन हवेलियों को आसानी से ढूंढ सकें। 

शेखावाटी भ्रमण तो मेरी भारत यात्रा का एक महत्वपूर्ण भाग था लेकिन दो सप्ताह के मेरे राजस्थान भ्रमण में और भी बहुत कुछ शामिल था। भारत के श्रेष्ठतम जैन मन्दिरों में गिने जाने वाले रणकपुर (जैनी पुनर्जन्म पर विश्वास करते हैं और शुद्ध शाकाहारी होते हैं): उदयपुर का भव्य सिटी पैलेस, जयपुर स्थित 300 वर्ष प्राचीन खगोलीय वैधशाला जन्तर-मंतर; विश्नोइयों के गांव जिसे हम रोहेत के राजकुमार सिद्धार्थ सिंह के साथ देखने गये थे; जैसलमेर और जोधपुर की गलियां जहां कारीगर और व्यापारीजन लगभग उसी प्रकार से अपने अपने व्यवसायों में व्यस्त हैं जैसा सैकड़ों वर्ष पूर्व हुआ करते थे। 

इसके अलावा हमने अनेक भव्य किले भी देखेः बीकानेर का जूनागढ़, जैसलमेर, जोधपुर का मेहरानगढ़, जयपुर के उपनगरीय क्षेत्र में बना आमेर और मेरा पसंदीदा मध्ययुगीन उजाड़ पड़ा कुंभल गढ़ जो उदयपुर के उत्तर में पर्वतों में शान से खड़ा है।

राजस्थान से दिल्ली लौटते हुए हमने अपने पिछले भ्रमण के दो पसंदीदा स्थान देखे-16 वीं शताब्दी की अल्पकालीन मुगल राजधानी फतेहपुर सीकरी और भव्य ताजमहल। 

इस उत्कृष्ट यात्रा को और भी अधिक यादगार बनाने के लिए हम जिन नौ होटलों में ठहरे थे उनमें से पांच पैलेस होटल थे। प्रत्येक होटल अद्भुत थाः मांडवा, बीकानेर के समीप गजनेर पैलेस, जोधपुर का उमेद भवन पैलेस, उदयपुर का शिव निवास पैलेस और जयपुर का राज विलास। इनमें प्रवास ने हमारी यात्रा के आनंद को और अधिक बढ़ा दिया। हम स्वयं को कम से कम कुछ दिनों तक तो महाराजा समझ सके थे।                                 

  

 

 

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चाँद परियाँ और तितली

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एक हास्य, एक स्पर्श

(मराठी लोककथा पर आधारित)

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-दीपिका जोशी

गणेश एक छोटा-सा बच्चा है। अपने माँ पिताजी से भगवान के बारे में बहुत कुछ बार-बार सुन चुका है। इसलिए उसे एक दिन भगवान जी से मिलने की इच्छा हुई। उसने सुना था कि भगवान जी को मिलने उसे बहुत दूर तक जाना होगा। क्योंकि उसका घर तो बहुत दूर है। वहाँ पहुँचने तक उसे भूख लगेगी, प्यास लगेगी। उसने माँ  ने बना कर रखी घी-शक्कर लगी रोटियाँ साथ में रख लीं और मीठी लस्सी भी लेना न भूला। पानी की बोतल के साथ सभी चीज़ें रख कर बॅग तैयार कर ली और निकल पड़ा भगवान जी से मिलने।

आधा घंटा चलता चला गया, उसे प्यास लगी। सामने ही एक हरा-भरा बगीचा था। छाया में थोड़ी देर आराम करने का सोच कर उसके कदम बगीचे की तरफ़ बढ़े। वहाँ एक बूढ़ी औरत बैठी थी। बेचारी अकेली थी, अकेली, दाना चुगते कबूतरों को देखती हुई। गणेश उसके पास जा कर बैठ गया। अपनी बॅग खोली। पानी पीने लगा तभी उसे ऐसे लगा कि वह बूढ़ी औरत भूखी है और उसकी तरफ़ आशाभरी निगाहों से देख रही है। गणेश ने उसे एक रोटी दी। खुश हो कर उसने वह रोटी ली और दिल से हँसी। उसकी हँसी गणेश को इतनी पसंद आई कि वह ऐसी एक बार और हँसे, वह आनंदित हो जाए इसलिए उसने बुढ़ी औरत को मीठी लस्सी भी पीने को दी। वह दुबारा उसी तरह मुस्कुराई। गणेश भी मुस्कुराया। दोपहर का पूरा समय इस तरह कुछ खाने में और दिलखुलास मनभावन हँसी में गणेश और उस बूढ़ी औरत ने बिताया, एक शब्द ही कहे-बोले बिना।

शाम हो गई, सूरज डूबने लगा वैसे गणेश को घर की याद आने लगी और वो वापस लौट चला। दो कदम ही बढ़ाए थे उसने, पीछे मुड़कर देखा, बूढ़ी औरत की तरफ़ भागा, और उससे लिपट गया। एक बार फिर बूढ़ी औरत हँसी। सबसे सुंदर हँसी थी वह उसकी, प्यार भरी, ममता भरी।
गणेश घर लौटा, उल्हासभरा, कुछ पाने की खुशी में। उसकी माँ ने पूछा, "कितने खुश नज़र आ रहे हो गणेश! लगता है भगवान से मिल कर आ रहे हो ?"
कहने लगा, "माँ, आज मैंने भगवान जी के साथ खाना खाया।" माँ को कुछ कहने ही नहीं दिया उसने, कहने लगा, "तुम्हें पता है, भगवान जी की हँसी दुनिया में सबसे अच्छी थी।"

उसी दरम्यान वह बूढ़ी औरत भी अपने घर पहुँची। उसके चेहरे पर अजीब तरह का तेज देखकर उसका बेटा पूछने लगा, "आज किस बात से इतनी खुश हो माँ?"
"
मैंने आज बगीचे में भगवान ने दी हुई रोटी खाई। मैं धन्य हो गई। और एक बात बताऊँ, जैसा मैंने सोचा था, जो मेरी भगवान जी के बारे में अपेक्षा थी उससे वह बहुत ही छोटा है।"
हलका-सा स्पर्श, सादगी भरा हास्य, ममतापूर्ण एक शब्द, सुननेवाले कान, प्रामाणिक प्रतिक्रिया या कोई छोटी-सी ही मदद, इसका महत्व हम इस भाग-दौड़ वाली दुनिया में भूल से जाते हैं। सही मायने में देखा जाय ते उसमें जग बदलने की ताकत समाई हुई मिलेगी। इसलिए हमारी ज़िंदगी में किसी बहाने से आनेवाले, कभी-कभार आनेवाले या ज़िंदगीभर के लिए आनेवाले लोगों का मन से स्वीकार करना चाहिए, उन्हें अपना बना लेना चाहिए।

 

 

तोता-तोता

 

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तोता, तोता, बोली  मैना

सच्ची सच्ची ही कहना

रहता कहां तुम्हारा ध्यान

दोहराओ तो अब यह गान

चार और चार होते हैं आठ

थकी पढ़ाती  तुमको मैं पाठ

फुदक-फुदक बस उड़ते-फिरते

रह- रहके मिर्ची  क्यों कुतरते।

              -शैल अग्रवाल

 

 

 

 

 

 खरगोश

 दरवाज़े में ताला
खरगोश गया शाला
ज़ोर ज़ोर नगाड़ा
खरगोश पढ़े पहाड़ा
दो एकम दो दो दुनी चार
बड़ी ज़ोर से गुज़री कार
दो तिया छे दो चौके आठ
पूरा कर लो अपना पाठ
जल्दी जल्दी पढ़ी कहानी
एक था राजा एक थी रानी
गुरूजी हँस बोले शाब्बाश
खरगोश बोला कर दो पास

          -दीपिका जोशी

 

 

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साहित्य-समाचार

नई दिल्ली, भारत

नई दिल्ली। बीती 15-16 दिसम्बर 2007 को स्वाधीनता संग़्राम की 150 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक अनूठे कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। नई दिल्ली के छतरपुर, महरौली स्थित अध्यात्म साधना केन्द्र में आयोजित इस कवि सम्मेलन में देश के साढ़े तीन सौ जाने-माने कवियों ने हिस्सा लिया। देश के सभी प्रान्तों से आये इन कवियों ने दो दर्जन से भी ज्यादा भाषाओं और बोलियों में काव्य-पाठ करके लोगों का मन मोह लिया। विशेष रूप से जम्मू कश्मीर, सिक्किम, आसाम, कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश जैसे सीमावर्ती प्रदेशों से आये कवियों को लोगों ने खूब पसन्द किया। इस दो दिवसीय कवि सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रीय कवि संगम के बैनर तले ‘राष्ट्र जागरण-धर्म हमारा’ शीर्षक के तहत किया गया।
 कार्यक्रम में स्वाधीनता संग्राम में कवियों और कविताओं के योगदान पर भी सारगर्भित चर्चा की गई। कार्यक्रम का शुभारम्भ अध्यात्म साधना केन्द्र के निदेशक स्वामी धर्मानन्द, आयोजन के मार्गदर्शक श्री इन्द्रेश कुमार, कार्यक्रम के संयोजक श्री जगदीश मित्तल, सहसंयोजक श्री मनमोहन गुप्ता, श्री अशोक गोयल, श्री गजेन्द्र सोलंकी, मोहम्मद अफजाल और राजेश चेतन ने दीप प्रज्जवलित कर किया। इस मौके पर कवि चिराग जैन द्वारा सम्पादित स्मारिका “जागो फिर एक बार” का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम में आचार्य देवेन्द्र देव ने अपने सुमधुर कण्ठ से माँ सरस्वती की वन्दना प्रस्तुत की तथा कवि श्री नरेश नाज ने अपना गीत ‘आजादी के उन्ही पुराने गानों की पहले से भी आज जरुरत ज्यादा हैं’ प्रस्तुत कर उदघाटन समारोह को गरिमा प्रदान की। जबकि प्रसिद्ध फिल्मी गीतकार व संगीतकार रवीन्द्र जैन ने कई फिल्मों के चुने हुए देशभक्ति के गीत गाये। जिनमें शहीद पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ का गीत ‘सरफरोशी की तमन्ना’ प्रमुख रहा।

 कवि संगम के मार्गदर्शक इन्द्रेश कुमार ने अपने उदबोधन में कहा कुछ लोग और आन्दोलन वक्त के सांचे में ढल जाते हैं, पर राष्ट्रीय कवि संगम के कवि राष्ट्र जागरण की कविताओं के द्वारा वक्त के सांचे बदलने में सफल होंगे। उन्होंने कवित्व को प्रभु का वरदान और कविता को उस वरदान से निकली हुई गंगा बताया। 16 दिसम्बर बंगलादेश विजय दिवस की याद दिलाते हुए कहा कि कवियों के गीत सीमा पर बैठे जवानों को देश पर मर मिटने की भावना जगाने का काम करती हैं।
 राष्ट्रीय स्तर पर साढ़े तीन सौ कवियों का काव्य-पाठ अपने आप में ऐतिहासिक और राजधानी में अब तक का सबसे बड़ा साहित्यिक आयोजन था। देश-विदेश से आये कवियों ने आजादी के नायकों को कविताओं से याद किया। 1857 के बाद आजादी के परवानों को याद करने की यह अनुपम और अनूठी पहल थी।
 कार्यक्रम के संयोजक जगदीश मित्तल ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में कवियों और कविताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1857 से अब तक के डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास साक्षी है कि क्रान्तिकारियों के साथ-साथ कवियों ने अपनी लेखनी एवं ओजस्वी स्वर के माध्यम से न केवल देश भर में आजादी की अलख जगाई अपितु जन-जन में क्रान्ति का संचार किया। यह कविताओं की ही शक्ति थी कि बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित “वन्दे मातरम्” गीत आजादी के दीवानों का मंत्र बन गया। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी”, क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल का गीत “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” आदि गीत इस आहुति के बेमिसाल उदाहरण है। वर्तमान परिवेश में भी युवा पीढ़ी को राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने कर्तव्य और दायित्व का बोध कराने के लिये कवियों की कलम, राष्ट्र जागरण एवं निर्माण में आज भी महत्वपूर्ण योगदान कर सकती हैं।
 सांसद और कवि श्री सत्यनारायण जटिया और कविवर श्री छैल बिहारी वाजपेयी ‘बाण’ तथा कवि कमलेश मौर्य मृदु ने भी श्रोताओं की तालियाँ बटोरी। राष्ट्रीय कवि संगम की भावनाओं को उल्लेखित करने वाली कमलेश मौर्य ‘मृदु’ की पंक्तियों को लोगों ने खूब सराहा –

जीवन मूल्यों को जो अपनी रचना का आधार बनायेगा
भारत के जीवन दर्शन को लेखन में अपनायेगा
मानवतावादी चिन्तन दे राष्ट्रीय भाव पनपायेगा
वह कलाकार कवि लेखक आराधक ही पूजा जायेगा।

 

साहित्य समाचार, नेपाल।

प्रिय मित्र और साहित्य-सरिता के संपादक कुमुद अधिकारी जी को उनके सम्मान के लिए बहुत -बहुत बधाइयां और वर्ष 2008 में भी उनकी कलम इसी उर्जा के साथ चले इन्ही अशेश शुभकामनाओं के साथ , सम्मान की विस्तृत खबर, 

श्रद्धेय मान्यजन,

सादर नमन।

 

आप सब की दुआओं और सदिच्छा से मुझे नेपाल में रहकर हिंदी भाषा की सेवा और इंटरनेट पर हिंदी को प्रमोट करने के लिए लगुकथा गौरव-07 से सम्मानित किया गया है। सम्मान छठवें अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव, 16/17 फरवरी को रायपुर में दिया जाएगा। आप सब का हौशला और सहयोग नहीं होता तो यह संभव नहीं होता। आप सब का हार्दिक आभार।

वर्ष 2008 के लिए ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ

स्नेहापेक्षी

आपका

कुमुद अधिकारी, नेपाल।

 

 

World's Leading Ladies

The world currently boasts a bumper crop of woman leaders, Including,

 

Pratibha Patil-India

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First ever female president of India.

 

Gloria Macapagal-Arryo,The Phylippines

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" GMA", as some know her, is the nation's second women president, after Maria Coarazon Aquino.

 

Michelle Bachelet- Chile 

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Michelle Bachellet (First left) With Cristina Kerchner Of Argentina in the middle & other digniteres

Santiego-born Bachelet won last year's election to become the first female president in chilean history.

 

Helen Clark-New Zealand

In her third term as prime minister, Clark is New Zealand's second female premier, after Jenny Shipley.

 

Louisa Diogo-Mozambique

The First woman to become prime minister of the African republic, hasbeen in power for nearly four years.

 

Tarja Halonen-Finland

A popular Finnish figure, the pioneering female president was elected for a second term last year.

 

Angela Merkel-Germany 

Modern Germany's First woman leader, and its youngest chancellor since the second world war.

 

Ellen Johnson-Sirleaf- Liberia 

Not only Liberia's first elected woman president, but also Africa's first elected female head of state.

 

Cristina Kirchner-Argentina

Queen Cristina as many Argentinian refer her to, is the new president of Argentina. The first lady has been voted into her husband's shoes.

 

 

* * *

 

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 21June 1953-27 Dec. 2007

"I don't fear death... I don't think it can happen unless God wants it to happen because so many people have tried to kill me"

Pakistan's self exiled leader of the opposition Benazeer Bhutto has been shot dead in barely two months of her return to the motherland. A Howard and Oxford educated Benazeer was disltked by the hardliners and extremists of the country.     

 

* * *

teji

Talking about leading ladies, Amitabh Bachchan's mother Teji Bachchan passed away on Friday the 21 December. She was 93.

She had been ailing for over a year, and was admitted at Lilavati hospital in Bandra, a western suburb of Mumbai. In November, she was shifted to the Intensive Care Unit of the hospital after her condition became serious.

Amitabh was very close to his mother and she was a pillar of support for the Bachchan family. One of the first things Abhishek Bachchan and Aishwarya Rai did after they got married was visit her at the hospital.

Teji Bachchan was an important part of the Big B's professional life as well. For instance, in the original script of Coolie, Amitabh's character was supposed to die. But she requested director Manmohan Desai to change the ending.

The second wife of Harivansh Rai Bachchan, Teji was an amatuer actor as well as a singer. Harivansh Rai, himself a renowned Hindi poet, died in 2003 at the age of 96.

Born as Teji Suri to Punjabi parents, she married Bachchan in 1941 after the death of his first wife. She was also close to the Nehru-Gandhi family while the Bachchan family was living in Delhi in the late 1950s.

Teji's illness had resulted in the Bachchan family curtailing celebrations at their Juhu residence for the past few years on occasions like Holi and Diwali.

All major family events were usually conducted after seeking her blessings.

 

 ***

 

अरुणा सितेश

 

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31 Oct 1945- 17 Nov. 2007 

Education M. A. English Literature from Prayag University in 1965 with gold medal, Ph.D. from Prayag University in 1970
Profession Firstly Lecturer, Then Reader and presently Principal in Indraprastha College, Delhi 
Books Authored Chand Bhi Akela Hai, Vahi Sapney, Koi Ek Adhoorapan, Lakshmanrekha, Chhalang
Translation American Writers, Modern Stories, 60 Contemporary Poetesses, Masterpieces of Indian Literature, English translation of plays by Mohan Rakesh & Vishnu Prabhakar.   
Awards Akhil Bhartiya Sahitya Parishad, Delhi Govt., Mahadevi Verma Award by Uttar Pradesh Hindi Sansthan, Brahmi Sundari Alankaran Award etc.

 

 

  2007 ने जिन्हें हमसे छीना उन सभी दिवगंत आत्माओं को लेखनी की  भावभीनी श्रद्धांजली !

 

 

To wrap up 2007 on a lighter note and laugh off all the worrie & troubles, I will like to share this greeting e. mail of good will from Mr.Tejendra Sharma, received literally hours ago,  

Dear Friends!!!


May you get a clean bill of health from your dentist,
your cardiologist, your gastro-enterologist, your
urologist, your proctologist, your podiatrist, your
psychiatrist, your plumber and the I.R.S.


May your hair, your teeth, your face-lift, your abs
and your stocks not fall; and may your blood pressure,
your triglycerides, your cholesterol, your white blood
count and your mortgage interest not rise.


May New Year's Eve find you seated around the table,
together with your beloved family and cherished
friends. May you find the food better, the environment
quieter, the cost much cheaper, and the pleasure much
more fulfilling than anything else you might
ordinarily do that night.


May what you see in the mirror delight you, and what
others see in you delight them. May someone love you
enough to forgive your faults, be blind to your
blemishes, and tell the world about your virtues.


May the telemarketers wait to make their sales calls
until you finish dinner, may the commercials on TV not
be louder than the program you have been watching, and
may your check book and your budget balance - and
include generous amounts for charity.


May you remember to say "I love you" at least once a
day to your spouse, your child, your parent, your
siblings; but not to your secretary, your nurse, your
masseuse, your hairdresser or your tennis instructor.



And may we live in a world at peace and with the
awareness of God's love in every sunset, every
flower's unfolding petals, every baby's smile, every
lover's kiss, and every wonderful, astonishing,
miraculous beat of our heart.

Happy New 2008!!

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:Shail Agrawal.

As I am writing this, Year 2008 is easing in with a beautiful display of fireworks all around me… from the garden's of quite a few neighbors. public parks and night clubs. This is a wealthy nation and almost every other house have a party on New Year's eve either in their own house or in a hired hall or pre booked club; if not they gather in local parks or city squares where some sort of band invariably creates the party magic.  Cultural programmed is arranged by city volunteers and people gather around in laugh and merriment and dance the night away. A free firework display is also arranged by the city council. They all wait till midnight and then at the stroke of the 12 New Year is greeted with a bubbling glasses of champagne and hugs and kisses. Scotland's Hegemony (New Year Celebration with haggis and guitar is famous for its atmosphere all over the world) To celebrate New Year With this joy and gusto has almost become a habit of the west; All the city squares become full of music and merriment and celebrating teen agers ... young and old also gather around to have an open party. Surrounding streets become an overflow of half-drunk laughing and singing people. Biggest party of this kind is thrown on London's Trafalgar Square, where thousands of people gather and with the stroke of midnight at the big Ben , whole sky around the central Thames lit up with the fountains of light and crackers... ear deafening cheers of Happy New Year.  Flowing champagne in Bars & clubs and casinos all around the nation creates an unrivalled atmosphere of merriment and joy.  

Whatever is the way of Celebration in this worry torn world happiness is always welcome because it kindles the ray of hope . I hope with this departure of the old , we all are ready to welcome the new and year 2008 will be lot easier and happier than 2007.  Lekhni will like to wish all its reader with this new issue a very happy, healthy and successful New Year! 

 

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 Favourites Forever

scanning

W.H.Davies, John Masefield.

Leisure

miles

 W. H. Davies. 

 

What is life if, full of care,

We have no time to stand and stare?

No time to stand beneath the boughs

And stare as long as sheep or cows.

 

No time to see, when woods we pass,

Where squirrels hide their nuts in grass.

 

Np time to see in broad day-light,

Streams full of stars, like stars at night.

 

No time to turn at Beauty's glance,

And watch her feet, how they can dance.

 

No time to wait till her mouth can

Enrich that smile her eyes began.

 

A poor life this if, full of care,

We have no time to stand and stare.

 

 

 Sea Fever

miles

John Masefield

 

I must down to the seas again, to the lonely sea abd the sky,

And all I ask is a tall ship and a star to steer her by,

And the wheel's kick and the wind's song and the white sail's shaking,

And a grey mist on the sea's face and a grey dawn breaking.

 

I must down to the seas again, for the call of running tide

Is a wild call and a clear call that may not be denied.

And all I ask is a windy day with the white clouds flying.

And the flung spray and the blown spume, and the sea-gulls crying.

 

I must down to the seas again, to the vagrant gypsy life,

To the gull's way and the whale's way where the wind's like a whetted knife;

And all I ask is a merry yarn from a laughing fellow-rover,

And quiet sleep and a sweet dream when the long trick's over. 

   

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Portry Here And Now

 

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       Introducing

-Mahendra Bhatnagar 

 

 

 

 

 

 

 

THE TREMOR OF TRAMPLING FEET

 

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When the dormant ocean of humanity

Was stirred to life at the beckoning call

Everyone  thought —

There struck the thunder bolt

But lo!

That was the  thunderous noise

Of the downtrodden!

 

When the thick walls of  the exploiters' citadels

Cracked with the reverberating  sounds

Everyone  thought —

There rocked the earthquake

But lo!

That was the  tremor of  the trampling feet,

Of the down trodden!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

WHAT IS THE SECRET?

 

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The wind is cold !

The night is still

Listless like your lips !

What the matter is ?

What the mystery is ?

That asleep is each ripple !

Slumber keeps vigil,

Harrowing darkness deep,

Shooting pain is afoot !

The wind is cold !

 

 

 

 

 

 

 

 

THROUGH THE UNWANTED MOMENTS

 

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O giver of life,

Give me love,

If you have given me thirst

Give me nectar to drink.

 

When the soul is blessed

With a physical mould,

Give it shape, give it beauty;

And fill the heart

With the tidal waves of feeling!

 

Oh, deny me not the natural emotions,

For, that would make a hell of life,

Or, mean the passing of years without a song

Of love or beauty.

 

Oh, deny me not the happy Savan !

If you have opened up the eyes to light

Let them rock the countless dreams;

Let my consciousness enjoy

A whit

Freedom from pain or sighs.

 

 

  

 

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Intoduction To the Comets

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Few facts and truths about Comets!

 

 

 

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The Sun · Mercury · Venus · Earth · Mars · Ceres · Jupiter · Saturn · Uranus · Neptune · Pluto  these are  the ten planets of our solar system. ( ceres is a recent addition to the list ) But the comets are among the most brilliant, and most rare objects in the night sky. These soaring beacons with their beautiful tails come from the outer realms of the Solar System.

Unlike the other small bodies in the solar system, comets have been known since antiquity. There are Chinese records of Comet Halley going back to at least 240 BC. The famous Bayeux Tapestry, which commemorates the Norman Conquest of England in 1066, depicts an apparition of Comet Halley.

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As of 1995, 878 comets have been cataloged and their orbits at least roughly calculated. Of these 184 are periodic comets (orbital periods less than 200 years); some of the remainder are no doubt periodic as well, but their orbits have not been determined with sufficient accuracy to tell for sure.

Comets are sometimes called dirty snowballs or "icy mudballs". They are a mixture of ices (both water and frozen gases) and dust that for some reason didn't get incorporated into planets when the solar system was formed. This makes them very interesting as samples of the early history of the solar system.

When they are near the Sun and active, comets have several distinct parts:

  • nucleus: relatively solid and stable, mostly ice and gas with a small amount of dust and other solids;
  • coma: dense cloud of water, carbon dioxide and other neutral gases sublimed from the nucleus;
  • hydrogen cloud: huge (millions of km in diameter) but very sparse envelope of neutral hydrogen;
  • dust tail: up to 10 million km long composed of smoke-sized dust particles driven off the nucleus by escaping gases; this is the most prominent part of a comet to the unaided eye;
  • ion tail: as much as several hundred million km long composed of plasma and laced with rays and streamers caused by interactions with the solar wind.

Comets are invisible except when they are near the Sun. Most comets have highly eccentric orbits which take them far beyond the orbit of Pluto; these are seen once and then disappear for millennia. Only the short- and intermediate-period comets (like Comet Halley), stay within the orbit of Pluto for a significant fraction of their orbits.

After 500 or so passes near the Sun off most of a comet's ice and gas is lost leaving a rocky object very much like an asteroid in appearance. (Perhaps half of the near-Earth asteroids may be "dead" comets.) A comet whose orbit takes it near the Sun is also likely to either impact one of the planets or the Sun or to be ejected out of the solar system by a close encounter (esp. with Jupiter).

By far the most famous comet is Comet Halley but SL 9 was a "big hit" for a week in the summer of 1994.

Meteor shower sometimes occur when the Earth passes thru the orbit of a comet. Some occur with great regularity: the Perseid meteor shower occurs every year between August 9 and 13 when the Earth passes thru the orbit of Comet Swift-Tuttle. Comet Halley is the source of the Orionid shower in October.

Many comets are first discovered by amateur astronomers. Since comets are brightest when near the Sun, they are usually visible only at sunrise or sunset. Charts showing the positions in the sky of some comets can be created with a planetarium program

What are these comets

  • Dirty Ice Balls, Time Capsules, or Harbingers of Doom?
  • A Cosmic Snowball, small comets hitting Earth? (maybe not)

 

Open Issues

  • What happens to comets after they have lost their volatile materials?
  • What mechanism(s) perturb comets from their origin in the Oort cloud into orbits that take them into the inner solar system?
  • Was it a comet or something else that caused the Tunguska fireball over central Siberia in 1908?
  • Was it a comet or an asteroid that caused the Chicxulub crater in the Yucatan (and probably caused the extinction of the dinosaurs)?
  • The Stardust mission will return samples of a comet for study in earthly labs.

 

·         Before the invention of the telescope, comets seemed to appear out of nowhere in the sky and gradually vanish out of sight. They were usually considered bad omens of deaths of kings or noble men, or coming catastrophes, or even interpreted as attacks by heavenly beings against terrestrial inhabitants. From ancient sources, such as Chinese oracle bones, it is known that their appearances have been noticed by humans for millennia. Some authorities interpret references to "falling stars" in Gilgamesh, the Book of Revelation and the Book of Enoch as references to comets, or possibly bolides.

·         In the first book of his Meteorology, Aristotle propounded the view of comets that would hold sway in Western thought for nearly two thousand years. He rejected the ideas of several earlier philosophers that comets were planets, or at least a phenomenon related to the planets, on the grounds that while the planets confined their motion to the circle of the Zodiac, comets could appear in any part of the sky. Instead, he described comets as a phenomenon of the upper atmosphere, where hot, dry exhalations gathered and occasionally burst into flame. Aristotle held this mechanism responsible for not only comets, but also meteors, the aurora borealis, and even the Milky Way.

·         A few later classical philosophers did dispute this view of comets. Seneca the Younger, in his Natural Questions, observed that comets moved regularly through the sky and were undisturbed by the wind, behavior more typical of celestial than atmospheric phenomena. While he conceded that the other planets do not appear outside the Zodiac, he saw no reason that a planet-like object could not move through any part of the sky, humanity's knowledge of celestial things being very limited. However, the Aristotelian viewpoint proved more influential, and it was not until the 16th century that it was demonstrated that comets must exist outside the earth's atmosphere.