|

भाग-4.

बाहर पैटियो पर सूखने और विलुप्त होने से पहले बूंदें आनन्दमग्न नाच रही थीं---अपनी सामर्थ से कई-कई गुना ऊपर उठ-उठकर। खुद उन्होंने भी इस सुख को भली-भांति जाना था कभी। बरसात शायद इसीलिए होती है कि पुरानी यादें रिमझिम बरसें। आजफिर पानी जमकर गिर रहा था। वैसे इंगलैंड में तो रोज ही बरसात होती है और शेखर सरकार आदी हो चुके हैं इस वक्त-बेवक्त की बरसात के...आखिर पिछले तीस साल से यूँ ही तो भीग रहे हैं। अब तो निमोनिया होने का भी डर नहीं लगता। कोई मां थोड़े ही है जो पूरे वक्त रोकती-टोकती रहे उन्हे-“ सुमी, यह मत खाओ, पेट खराब हो जाएगा। देखो फिर पानी में भीगे तुम। जाओ कपड़े बदल लो तुरंत। फेफड़े सरदी पकड़ लेते हैं, फिर बुढ़ापे तक खांसते रहना मेरी तरह।“ मुँह और बालों पर गिर आयी चन्द काल्पनिक ठंडी बूंदों को गीली कोट की बांहों से तुरंत ही पोंछने की कोशिश की उन्होंने। अंदर बैठे होने के बावजूद भी बाहर गिरती बूंदों की नमी और ठंडक, दोनों को ही पूरी तरह से महसूस कर पा रहे थे वह अब...कांपते पैरों के नीचे भी और ठंड से अकड़ते चेहरे पर भी।
हाथ की ऐंठती उंगलियों को गरमाहट के लिए आपस में रगड़ते-रगड़ते अबतक लाल कर डाला था उन्होंने और अब वे सूजी लाल उँगलियां मां के हाथों की याद दिला रही थीं-‘ तो क्या मां को भी आदत थी इन नम बूंदों को अंदर ही अंदर सोखते रहने की? क्या यही वे बूंदें थीं जिनके समंदर में डूबकर मां की आंखों की चमक हमेशा के लिए ही खो चुकी थी ! ‘
अकेलेपन और दुःख ने मां और बेटे के बीच एक बहुत ही करीब का और नाजुक सा रिश्ता कायम कर दिया था। एक दूसरे की तरफ देखते, जरूरतों को पढ़ते-समझते ही बीतते थे दोनों के दिन रात। बचपन से ही मां के माथे की हर शिकन को होठों की बस होठों की मुस्कान में ही तो बदलना चाहते थे। बिना बाप के बेटे की हर ज़रूरत के लिए जितना ही मां परेशान होती, उतनी ही उनकी परेशानी और कुछ न कर पाने की असमर्थता नन्हे शेखर को दुख देती-धिक्कारती। जल्दी-से बड़े होने के लिए वह बेचैन हो उठते। अपने अभाव का दुख नहीं था उन्हें, बस मां का दुःख बर्दाश्त नहीं होता था उनसे। यूँ तो मां की तरह ही जिन्दगी की हर बंदिश और सीमाओं से समझौता करते हुए ही बड़े हुए थे वे भी, परंतु मां का छोटा-बड़ा हर दुःख उन्हें पागलपन की हद तक विचलित कर देता था। माँ की आंख से टपका मात्र एक आंसू उनके मन में सैलाब ला सकता था। और सैलाबों से जूझना, तैरकर खुदको और माँ को बचाते हुए साहिल पर आ पाना कितना कठिन होता है, बचपन से ही भली-भांति जान गये थे शेखर सरकार। वैस भी माँ के बगैर तो कोई अस्तित्व ही नहीं था...जिन्दगी ही नहीं थी उनकी। माँ ने खाया या नहीं...माँ सोई या नहीं, मां की तबियत ठीक है या नहीं, कोई दर्द, तकलीफ तो नहीं, बस बचपन से यही तो थी पढ़ाई के अलावा उनकी एकमात्र दिनचर्या। और फिर तब कदिन पहले से ही कठिन जिन्दगी और उलझाती, मां अपनी बहू पिनाकी बोस को उनकी जिन्दगी में ले आई थीं।
एक नया रंग और नया ही मौसम लेकर आयी थी पिनाकी काली बाड़ी में। कितने अरमान और ज़िद से लाई थीं मां पिनाकी को घर में बहू बनाकर। कुम्हलाने और कलुछाने से पहले कितना झूमकर कहती थीं – ‘ हमारे तो दरिद्दर ही दूर हो गए। लक्ष्मी सा रूप और सरस्वती के गुण लेकर आयी है बहू। सच कहूं तो भगवती खुद ही चलकर आयी है काली बाड़ी में।‘
शेखर सरकार मां के चेहरे पर आयी इस नयी संतुष्ट मुस्कान पर न्योछावर थे और मां अपनी बहू पर। तभी तो बिना कुछ कहे और जान-समझे ही वरण कर लिया था पिनाकी का। काली बाड़ी की नयी मालकिन के स्वागत में क्या-क्या पापड़ बेलने होंगे, यह तब न शेखर ने ही सोचा था और ना ही खुशियों के सातवें आसमान पर बैठी श्रीमना ने। उसके लिए तो उनकी पिनाकी बहू नहीं, खुशियों का समन्दर थी...हजारों रतन गर्भ में छुपाए, उनकी अपनी रत्नगर्भा।
पिनाकी के घर ट्यूशन करके ही शेखर सरकार ने अपनी केमिकल इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और पहले दिन से ही, उन्हें देखते ही पिनाकी के पिता कार्तिक बाबू अपनी केमिकल्स की फैक्टरी वाला अपना सपना जीने लग गये थे। इस होनहार युवक में न सिर्फ उन्हें एक योग्य और संस्कारी जंवाई दिख रहा था अपितु वह अजन्मा बेटा भी जो उनकी स्वर्गीय पत्नी अपनी कोख से उन्हें न दे पायी थी। वे जान गये थे कि कुशाग्र बुद्धि शेखर सरकार उनके व्यापार और सपने, दोनों को ही नई बुलन्दियों पर ले जाने में सक्षम हैं। सूझबूझभरी और पैनी आंखों में वही लगन और कर्मठता दिखी उन्हें जो कभी खुद उनके अपने पास थी। युवा पंखों में वही आतुर फड़फडाहट थी जो किसी भी ऊंचाई को नाप-तौल सकती थी। फिर बेटी के चेहरे पर भी तो एक गुलाबी आभा दिखती थी उन्हं शेखर के सानिध्य में। और इस तरह से शीघ्र ही नियति के सारे निर्णय खुद अपने हाथों में ले लिए कार्तिक बाबू ने। और तब खुद उनकी अपनी जिन्दगी भी कार्तिक बाबू के सपनों के ताने-बानों में उलझकर हमेशा के लिए ही बदल गयी। परन्तु किसी को भी तो कुछ हासिल नहीं हुआ इन सपनों के जाल से...ना तो कार्तिक बाबू के घर जमाई के सपने को उनके स्वाभिमान ने पूरा होने दिया और ना ही अम्मा की आदर्श बहू के सपने को पिनाकी ने। ‘क्या हर रिश्ते का जन्म सिर्फ जरूरतों से ही होता है? ‘
शेखर सरकार अपने इस प्रश्न का उत्तर तो आज तक नहीं ढूँढ पाए क्योंकि जीवन की तरह ही, रिश्तों को भी तो नफे-नुकसान के तराजू में तौलना उन्हें आया ही नहीं! हां याद आते ही एक मलिन अवसाद की परछांई जरूर शाम के बढ़ते अंधेरे से भी ज्यादा उनकी आँखों को गहरा जाती है।
अगर बस यही जीवन है तो इन रिश्तों में अपनी जरूरतों को, खुद को ढूंढ क्यों नहीं पा रहे वह-आकंठ बस डूबे ही क्यों रह जाते हैं ? छोटे-बड़े अतृप्त और असमर्थ इन अहसासों का कौनसा किनारा अब उन्हं डूबने से बचा पाएगा, यह तक तो कभी जान नहीं पाए वे।
पर एक शेखर के रूप और गुणों को देखकर ही तो रिश्ता मांगा था कार्तिक बाबू ने और बस इतना ही सुख काफी था श्रीमना के एकाकी अस्तित्व और मान सम्मान के लिए भी। हाथ जोड़कर कहा था तब-“ शेखर से अच्छा दामाद और बेटा मुझे और कहां मिलेगा बोहू दी...आप बस ‘हां’ कर दो, बाकी सब मैं संभाल लूंगा। आपकी सेवा करती, आपके चरणों में बैठी बेटी आंखों के आगे ही जीवन निकाल दे, इससे बड़ा सुख मेरे लिए भला और क्या हो सकता है?”
जिनके पांच मंजिले मकान की सीढ़ियां चढ़ने की श्रीमना के कमजोर घुटने हिम्मत तक नहीं जुटा पाए थे वही कार्तिक बाबू उसके सामने घुटने टेके बैठे थे। खुद चलकर आए थे उसके पास....श्रीमना बारबार सोचती और फूली न समाती। जिन कार्तिक बाबू के सहारे वह पिछले दस वर्षों तक अपनी गृहस्थी चला रही थी, जिन कार्तिक बाबू के यहां एक-एक करके वह अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रख आयी थी, उसी कार्तिक बाबू की बेटी थी पिनाकी और सब जानते थे कि रंगरेजी टोला में बसने वाला हर व्यक्ति बस कार्तिक बाबू के लिए ही काम करता है---कैसे मना कर पाती श्रीमना कार्तिक बाबू को!
और आखिर क्यों नहीं, क्या कमी थी उनके श्रवण कुमार जैसे समझदार और होनहार बेटे में? इतना समझदार कि बिना कहे ही हर बात, हर दर्द समझ ले ...प्यार करे तो खुशियों से झोली भर दे। दूसरा कोई और कहां मिलेगा उन्हें शेखर जैसा? बड़े पुण्य प्रताप से जनमते हैं ऐसे बेटे। हर धूप छांव में बरगद के पेड़ सा ही तो खड़ा रहता है उनके आंगन में। कई-कई जन्मों के आशीर्वादों के बाद किसी-किसी को ही मिल पात होंगे ऐसे बेटे ? कितनी जिम्मेदारियां और तकलीफें उठाई हैं पर इसने भी इस छोटी सी उम्र मं ! श्रीमना ने भर आई आंखें पोंछ डालीं---परेशान होने की जरूरत नहीं पर अब। बहू के आते ही घर से खोई सारी खुशियां खुद ही लौट आएँगी...मंगलसूत्र, चंदनहार, कंगन, सभी कुछ। भगवान ने जब खुशियां लौटाई हैं तो पूरी तरह से ही जिएगी अब वह...बहू-बेटे की हर खुशी बांटती, पोते-पोतियों को खिलाती, मगन हंसती-गाती।
और तब बहुत सोच-विचारकर श्रीमना ने ‘हां’ कर दी। बेटे को संभालने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी थी। श्रवण कुमार जैसे शेखर के लिए मां की ही ‘ हां’ काफी थी। परन्तु पिनाकी के लिए बस इतना काफी नहीं था, बहुत कुछ चाहिए था उसे जिन्दगी से ---और भी कई सपने थे उसके बेहद अपने, जिनमें श्रीमना के लिए कोई जगह नहीं थी। ...
क्या वाकई में पिनाकी इतनी गलत थी, जितना कि वे समझते थे या थोड़ी गलती कहीं उऩसे भी हुई थी ? क्या वाकई में पिंकी ही जिम्मेदार थी इस प्रलय की, उनकी अपनी सोच और परिस्थियों का कोई योगदान नहीं था क्या....क्या जीवन की विषमताओं और जरूरतों ने कुछ ज्यादा ही सख्त नहीं कर दिया था उन्हें? वैसे भी कौन खुश रह पाया---वह, मां, मनु---या फिर खुद पिंकी ही!
रिश्तों की उस रेशमी उलझी डोर को एक बार फिर से उठा लिया था शेखर सरकार ने और असफल व नामुमकिन वह प्रयास---पिनाकी बोस, एक हठी नाम...उस हठी लड़की सा ही, पानी पर लिखे होने के बावजूद भी, बारबार और धीरे-धीरे उनकी आँखों में तैरने लग जाता...बेचैन अहसास क्या, खुद बेचैनी बनकर। चाहे-अनचाहे उन्हें डुबोने और भिगोने लग जाता...अस्तित्व और उनकी जिन्दगी का दुःखदायी हिस्सा, क नासूर बनकर।
पिंकी यानी कि पिनाकी बोस, गोरी-चिट्टी, तीखे नाक-नक्शों वाली पिंकी...बी.ए. तक पढ़ी-लिखी, सुरुचिपूर्ण और गृहकार्य में दक्ष, सुगढ़ उनकी पत्नी पिंकी। जिसकी कोख से कभी उनकी मनु का जन्म हुआ था। परन्तु दोस्त, दुश्मन रिश्तेदारों की तरह नामों का भी तो एक खास चेहरा होता है, खास जगह और पहचान होती है जिन्दगी में, फिर पिनाकी क्यों उनकी यादों और पहचानों में...जिन्दगी में अपनी सही जगह नहीं ढूँढ पाई...एक भग्न प्रतिमा-सी भटकती और भटकाती ही रही! क्यों आजतक नहीं जान पाए वे कि पिनाकी उनकी, उनके परिवार की...मां की दोस्त है या दुश्मन ! क्यों आजभी शीशे में बाल संवारते, चलते-फिरते, अपनी शकल की जगह उन्हें पिनाकी ही दिखने लग जाती है...बेवजह ही उनकी तरफ प्यार से देखती, मुस्कुराती...उनका घर-संसार संवारती। कभी-कभी तो उलाहने तक देती। अपनी बड़ी-बड़ी भूरी आँखों से एकटक बस उन्हें ही घूरती, जाने क्या-क्या कह जाती है पिनाकी उनसे। पर उन्होंने तो बरसों पहले ही पिनाकी यादों को विस्मृति की संदूकची में रखकर संयम के ताले लगा दिए थे...ताली रखकर भूलतक गए हैं अब तो वे। पर क्या सही था यह कदम उनका...क्या हर लड़की की बस यही इच्छा नहीं होती कि उसका, सिर्फ उसका अपना एक घर हो, जहां वह अपने पति और बच्चों के साथ मनमानी जिन्दगी जी सके...पटरानी बनी राज कर सके?कई दूसरों के साथ रह पाती हैं, कई नहीं। परन्तु पिनाकी को यह नहीं भूलना चाहिए था कि मां कोई दूसरी नहीं, सबसे ज्यादा अपनी है...शेखर से भी ज्यादा। क्यों शेखर की पत्नी पिनाकी के लिए इस अभद्र अपराध की कोई माफी नहीं थी शेखर की आँखों में, क्यों नहीं समझ पायी उनकी अपनी पत्नी पिनाकी इतनी जरा-सी इस बात को ! सामने हवा में उड़ता वह पत्ता भी उनके मन-सा ही एक सूखी और कटीली डाल पर जा अटका था और बर्फीली हवाओं में फंसा बेचैन कांप रहा था। नम हो आई आँखें पोंछ डाली उन्होंने। कौन सी नयी बात है इसमें, जीवन के झंझावत में तो हर पल ही ऐसा होता रहता है...कहीं से उड़कर कहीं भी अटक जाते हैं हम भी तो किसी एक ही पल की डाल पर!...
---------------------------------------------------------------------------------------------
दो लघु कथाएँ

शैल अग्रवाल
गेंद

बच्चों को पिता बहुत ही समझ और निष्ठा से बड़ा कर रहे थे। समझ और निष्ठा जो प्यार और सम्मान पैदा करती है।
' हमेशा एक दूसरे का ध्यान रखोगे, लड़ोगे नहीं कभी,' अक्सर ही वे समझाते। बच्चे भी उन्हं देखते ही लड़ाई और बहस बीच में छोड़ देते । 'कट्टी' भूलकर दोस्त बन जाते और साथ-साथ खेलने लगते। पिता भी हरदम ध्यान रखते कि घर में बच्चों के लिए हर चीज बराबर की और एक सी ही हो पाए। खिलौने तक बराबर के और एक से आते। हां खिलौनों के रंग जरूर बदल जाता। एक के लाल होते तो दूसरे के नीले। बेटा साल भर छोटा होने की वजह से ज्यादा लाडला और नटखट था। पिता के कहने से पहले ही, बहन छोटे भाई से ही रंग पसंद करवाती और छांटने के बाद तुरंत ही भाई अपने हिस्से के खिलौने अलमारी में रख आता। बहन के खिलौनों से ही खोलता और टूटने या खराब होने के बाद ही अपने निकालकर लाता। फिर दीदी को छूने तक न देता। "तुम्हारा तो लाल था ना!और लाल तो टूट गया। यह तो नीला है। और नीला तो मेरा है।" समझदार बड़ी बहन कुछ न कह पाती। |