सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर

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January-2008-Issue-11

-LEKHNI-

In search of a better tomorrow...

"मत डर प्रलय झकोरों से तू/बढ़ आशा हलकोरों से तू

झण में यह अरि दल मिट जाएगा तेरे पंखों से पिसकर

खग उड़ते रहना जीवन भर"

-गोपालदास नीरज

 

 

 (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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     संरचना व संपादन:: शैल अग्रवाल. 

संपर्क -सूत्र-  editor@lekhni.net  ,  shailagrawal@hotmail.com

    पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

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        -शैल अग्रवाल 

पेड़ 

 

हवा चली

चलती रही

मुझे गिराने को

पानी बरसा

बरसता रहा

मुझे मिटाने को

 

पर मैंने की शिकायत

न हवा से

न पानी से

 

मैंने अपनी जड़ों की पकड़

को मजबूत किया है

उनसे जो कुछ लेना था

चुपचाप लिया है

और भरा-पूरा जीवन जिया है ।

 

*

जीवन क्षितिज की निर्णायक रेखा माना धुँधली है  पर रही हमेशा से मनभावन ही। प्रो० योगेश अटल जी जो अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के  समाजशास्त्री और  मानव-विज्ञानी हैं तथा यूनेस्को के रीज़नल ऐडवाइज़र भी रह चुके हैं, उनकी यह अनूठी  कविता  पढ़ते ही मन में पैठ गयी, दोस्त बन गयी। सीधी सरल और जीने के उत्साह...एक जिजीविषा से भरपूर कविता। न सिर्फ  यह स्वावलंबी कविता  जीने की  विधा से परिचित कराती है, अपितु उसका भरपूर आनंद भी देती है। न जाने क्यों यह कविता मुझे  विश्व के कोने-कोन में बिखरे भारतीय (भारतीय ही क्यों; जीवन में डूबे सफल, असफल , नामी , बेनामी हर आदमी) की याद दिला जाती है जिसने यह जीवन जिया है या जो जीने की आस रखता है। जो निराशावादी या कुंठित नहीं हुआ है। यही नहीं मानवता की आस्था और  अमरत्व का संदेश भी देती है यह कविता। 

कभी किसी से सुना या पढ़ा था कि हम भारतीय रेत में से तेल निकालने वाले हैं...कि आलू और प्याज के बाद भारत सबसे ज्यादा असंख्य भारतीयों का ही उत्पादन और  निर्यात करता है। बात कैसे भी कही गयी हो पर मन साल गयी। पल भर को अपना अस्तित्व तक अनचाहा, बेमानी और इफरात लगा।प्रियजनों तक के लिए भी आलू,प्याज-सा 'डिसपेन्सिबिल' लगा और अचानक ही दुनिया के कोने-कोने में बसे हर प्रवासी का दर्द हृदय में उठते धुँए सा आंखों तक उमड़ आया...एक ठंडी अवहेलित भाप सा जमा पलकों को नम और बोझिल कर गया। 

सोचती हूँ पर आज इन्ही आलू प्याजों ने ही तो  विश्व को एकबार फिर अपने उसी पुराने गौरवमय भारत से परिचित कराया है। इस नयी इक्कीसवीं सदी की नित नयी समस्याओं को परंपरागत चले आ रहे अपने पुराने भारतीय ठोस समाधान देने की भरपूर कोशिश की है । एक समझदार, ब्याही बेटी-सी दोनों देशों (कुलों) की साख बढ़ायी है । विश्व की नजर में भारत को एकबार फिर उसका गौरवमय स्थान और  इतिहास दोनों ही वापस मिल पाए हैं। आज भारतीय खाना-पीना ही नहीं, भारतीय पहनावा ही नहीं, भारतीय सोच तक को यथोचित सम्मान मिल रहा है, चाहे वह तनाव का उपचार हो या फिर व्यापार का। हो सकता है इसमें हम भारतीयों की बढ़ती संपन्नता का भी स्पष्ट और बढ़ता हाथ हो  ...पर सफलता ही तो सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।( दलाल स्ट्रीट के उछाल के साथ आज अम्बानी बंधु विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति हैं और लक्ष्मी मित्तल , हिन्दूजा बन्धु ही नहीं, सबीर भाटिटा( हौटमेल के संस्थापक) जैसे अनेक व्यक्ति मिल जाएँगे जिन्होंने भारतीय सोच और दर्शन को ही नहीं, व्यावहारिकता तक को अग्रणीय पंक्ति में ला खड़ा किया है।) श्री कमलेश शर्मा को य़ूनाइटेड नेशन्स का सचिव चुने जाना कहीं-न-कहीं तो एकबार फिर इस तथ्य की पुष्टि करता ही है कि भारत को एकबार फिर से अपना खोया सम्मान वापस मिल रहा है!

विदेशी कम्पनियों का भारत की तरफ मुड़ना भारत को एकबार फिर लैंड औफ औपर्चुनिटी तो दर्शाता ही है , खुद भारत में भी आत्म विश्वास और खुशी की एक नयी लहर-सी उमड़ आई है। पर अभी भी सोने या भूलने का वक्त नहीं; अभी तो बस हम जमीन तैयार कर रहे हैं... भविष्य की उस स्वप्निल और संपन्न इमारत की ठोस नींव उठना तो दूर अभी तो  ठीक से खुदी तक नहीं  है!    

माना एक और नयी सुबह, एक और नये वर्ष की एकबार और आ गयी है... नए स्वप्नों के नए पंखों सहारे मानवता नयी दिशा की ओर उड़ने को अग्रसर और बेचैन है। ज्ञान-विज्ञान के ये नए-नए क्षितिज, अपनी सुनहरी आभा से मंडित अवसाद को तोड़ने की ज़िद पर तो हैं पर यह कालिमा इतनी घटाघोप है कि रौशनी की लकीर फ़क उजाला नहीं बन पाती। कहीं जर्जर धरती की फिक्र है, तो कहीं टूटते-बिखरते समाज के ढांचे को संभालने की जिम्मेदारी। पश्चिम के व्यस्त समाज की  परेशानियां (बुराईयां  कहूं तो शायद अतिशयोक्ति न होगी) अब पूरब तक फैल चुकी है; पूरब जो कि उगते सूरज का प्रतीक था अब पश्चिम की नकल करते-करते पश्चिम से ही जा मिला है (विश्वीकरण का एक अनचाहा हरजाना ही समझ लें इसे।) ...वैसे ही विवेक के सूरज की पूर्ण अवहेलना कर...पूरी तरह से ढांप-निगलकर।

भौतिकता की अंधी दौड़ में आज जो संग नहीं दौड़ पाते उन्हें मात्र पीछे ही नहीं छोड़ा जाता, कुचलकर आगे बढ़ना भी आम बात हो गयी है। फिर भी बुराई नहीं, अब व्यवहारिकता या वक्त की मांग ही दिखती है इसमें। पश्चिम की तरह अब भारत में भी बुझी आँखों वाले बृद्ध मां-बाप और मां-बाप का इन्तजार करते छोटे बच्चे घर-घर में दिख जाएंगे। वृद्ध-आश्रमों की जरूरत अब भारत को भी उतनी ही महसूस होने लगी है जितनी कि अंधी दौड़ में फंसे पश्चिम को होती रही है। समाज का ढांचा भारत में भी बदल रहा है। विश्वीकरण के इस युग में जीने का तरीका ही नहीं सोच तक बदल रही है...कैसा है यह इक्कीसवीं सदी का भारत और उससे भी ज्यादा कैसा रखना चाहते हैं हम आप अपने इस देश को, खुद अपने आपको...अपनी सोच और अस्मिता को,यही सब समझने और इन्ही यक्ष प्रश्नों से जूझने का प्रयास है लेखनी। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि हमारे इस अभियान में आप ऐसे ही हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलते रहेंगे, एक अंतहीन, आनंदमयी अंतर्यात्रा और सानिध्य का सुख लेते और देते रहेंगे!...

अमा को चीरती स्वर्णिम किरणों-सा आपका आगामी जीवन ही नहीं, हर दिन, हर पल, जीवन दृष्टि तक सफल, सार्थक व विषाद और विकारों से दूर रहे, इन्ही अशेष शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है आपकी अपनी लेखनी-2008।...    

 

 

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सन 2007: एक सिंहावलोकन 

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एक बार फिर हम वक्त के उस मोड़ पर खड़े हैं जब अलविदा कहने से पहले मुड़कर देखने को मन करता है।

हर जाते वर्ष की तरह सन 2007 के भी अपने अलग और कई-कई तेवर रहे, कुछ सही गलत फैसले...उपलब्धियां और असफलताएँ भी रहीं जिसने इसे अन्य वर्षों से अलग अपनी एक पहचान और यादें दीं।

विश्व के फलक पर देखें तो ईराक, अफगानिस्तान और अमेरिका ...  पैलेस्टाइन और इजराइल के साथ एकबार फिर खबरों में छाए रहे।

ईराक से सैनिक कब वापस बुलाए जाएँ, बुलाए जाएं भी या नहीं, अमेरिका और इंगलैंड के लिए सरदर्द ही बना रहा। एक ऐसा सरदर्द जिसके रहते प्रसिडेन्ट बुश और उनकी पार्टी के खिलाफ उन्ही के देशवासियों ने मत दिए। विश्व-पटल पर भी बुश-नीतियों के समर्थक दिन-प्रतिदिन कम होते ही नजर आ रहे हैं। पर अभी भी इन निरर्थक और खोखली लड़ाइयों का कोई अंत हमें नजर नहीं आता। दस बिलियन डॉलर प्रति माह के खर्चे पर बुश अपनी 1, 70,000 सैनिकों की सेना को सन 2009 तक ईराक में ही रखना चाहते हैं।  इस फैसले  से वहां के नागरिकों में काफी असंतोष है। पर्यावरण से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों के लिए गृह-निर्माण आदि कई ऐसी आंतरिक और विश्व की समस्याएँ हैं जिनपर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है।

गरम होते पृथ्वी के तापमान को नीचे लाने के प्रयास में और कुछ हो न हो अमेरिका के वाइस प्रेसिडंट  अलगोर को इस साल का सम्मानजनक नोबल पुरुष्कार अवश्य मिल गया...वह भी विश्व में शांति के लिए पर्यावरण की तरफ किए गये प्रयासों के लिए।

मलेशिया में भी एक नया इतिहास रचा गया जब 25 नवंबर को हजारों भारतीयों की रैली को कोलालंपुर में कुचल दिया गया। लाठी चार्ज के साथ-साथ पुलिस ने भीड़ पर अश्रु-गैस के गोले बरसाए...बेरहमी से उनके साथ कड़ा व्यवहार किया गया । भारतीय मूल के नागरिकों ने ब्रिटिश सरकार से एक बड़ी रकम (4 ट्रिलियन डालर) के हरजाने की मांग की है, क्योंकि उन्होंने ही उनके पूर्वजों को श्रमिकों की तरह लाकर वहां बसाया था और मलेशिया की स्थानीय सरकार मुख्यतः दूसरे धर्म की होने के कारण उनके साथ भेदभाव का बर्ताव करती है और भारतीय मूल के लोगों को अब मलेशिया में वे अवसर नहीं मिल रहे, जो मिलने चाहिएँ।       

दूसरी तरफ ईरान की आणविक गतिविधियों पर अमेरिका काफी समय से असंतुष्ट रहा है। हारकर अब ईरान ने भी 2007 में अमेरिका को जांच की अनुमति दे ही दी है और अबसे अमरीका ईरान की आणविक गतिविधियों पर आँख रख पाएगा। ध्यान रहे कि जनवरी में ईरान ने अपनी 41 आणविक भट्टी और यूरेनियम कोषों की अमेरिका द्वारा जांच के लिए मना कर दिया था। ईरानी सरकार का कहना था कि वे सिर्फ संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधियों को ही यह अधिकार देंगे। ईरानी सरकार के अनुसार उनके आणविक प्रयोग औध्योगीकरम के लिए है। अब निरीक्षण के बाद अमेरिका ने भी उनके इस दावे को सही मान लिया है।

चीन,रूस, जापान, अमेरिका, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया इन छह देशों के संयुक्त प्रयासों और संयुक्त ट्रीटी के तहत नौर्थ कोरिया की आणविक भट्टियों को नष्ट करने का काम भी नवंबर में शुरु कर दिया गया है। नोर्थ कोरिया इतना यूरेनियम पैदा कर रही थी कि आराम से एटम बम बना सके।

भारत में आंतरिक विरोधों के कारण , भारत अमरीका की न्यूक्लीयर पावर पर संयुक्त हस्ताक्षर भी अभी टलते से ही नजर आ रहे हैं।

   लड़ाई, हिंसा और अनचाही बाढ़ और तबाही की खबरों के अलावा पाकिस्तानी मंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या दूसरी अंतर्राष्ट्रीय दिल दहला देने वाली 2007 की घटना रही।

यहां इंगलैंड में जे. के. रुलिंग द्वारा सुविख्यात हैरी पौर्टर सीरीज के अन्त की घोषणा और 3 साल की बच्ची मैडलिन मकान का स्पेन में गायब हो जाना और खुद उसके मां बाप का ही शक के घेरे में आ जाना पूरे 2007 की खबरों में रहे बिव्कुल वैसे ही जैसे कि इंगलैंड के बाजारों में भारतीय सामान छाया रहा और ब्रिटिश टेलीविजन की सीरीज बिग ब्रदर की वजह से ब्रिटिश टेलीविजन पर भारतीय फिल्म अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी छाई रही । अपने संतुलित व गरिमामय व्यवहार व सोच की वजह से सीरीज के साथ-साथ ब्रिटेन वासियों का भी मन उन्होंने जीता।

30 जून को ग्लास्को एयरपोर्ट पर हुए आतंकवादी हमले ने भारत की शांतिप्रिय छवि को भी थोड़ा बहुत दागी किया। अपराधी कफील मोहम्मद, एरोनौटिक इन्जीनियर और डॉ बिलाल अब्दुल्ला ने विष्फोटक पदार्थों से भरी जीप को ग्लास्को के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की मुख्य इमारत में ले जाकर दे मारा। जलती जीप के साथ कफील भी लपटों में फूट पड़ा था और तुरंत उपचार के बाद भी अगस्त के पहले हफ्ते में उसकी मौत भी हो गयी थी। भीड़भाड़ भरे हवाई अड्डे पर इस घटना से जो डर और चीख-पुकार का माहौल बना होगा उसकी कल्पना मुश्किल नहीं है। पुलिस ने इस सिलसिले में बाद में कुछ और लोगों ( डॉ सबील अहमद, कफील के भाई और आस्ट्रेलिया में ड़ां मोहम्मद हनीफ) को भी गिरफ्तार किया। डॉ हनीफ ने राजीव गांधी यूनिवर्सिटी , बंगलौर से पढ़ाई की थी और जब उन्हें ब्रिसबन एयरपोर्ट आस्ट्रेलिया  में गिरफ्तार किया गया, तो वह बंगलौर अपनी पत्नी से मिलने जा रहे थे। उनके यहां हाल में ही बच्चा पैदा हुआ था। उनपर आतंकवाद को शह देने का आरोप लगा ( उनका सिम कार्ड आतंक वादियों ने इस्तेमाल किया था।)जो बाद में खारिज़ भी कर दिया गया और वे भारत अपनी पत्नी और बच्चे क पास वापस लौट भी पाए। कुल मिलाकर आठ लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।

दूसरी तरफ भारतीय मूल के पीयूष बॉबी जिन्दल पहले अश्वेत नागरिक थे जो अमेरिका में कंजरवेटिव लूजियाना के 20 अक्टूबर को गवर्नर नियुक्त किए गये। वह जनवरी 2008 में अपना कार्यभार संभालेंगे।

एक लेखिका (तस्लीमा नसरीन) मात्र अपने विचार व्यक्त करने के लिए आज भी, इस इक्कीसवीं सदी में भी दर दर भटके, यह हम सबकी...गुजरे वर्ष की क बड़ी हार ही कही जाएगी।         

यह बात दूसरी है कि भारत के सेनसेक्स के उछाल ने इस साल भारत के अम्बानी ब्रदर्स को दुनिया के सर्वाधिक धनाढ्य लोगों की पदवी पर ला बिठाया है। लक्ष्मी मित्तल के अलावा, टाटा का ब्रिटिश कोरस (स्टील) ग्रूप का टेकओवर एक ऐसी दूसरी घटना है जिससे तेजी से आर्थिक शक्ति की तरह उभरते भारत की छवि को कुछ और चमकाया है।

यूँ तो सोनिया गांधी के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी भी हमेशा भारतीय खबरों में बने रहे। पर राम-सेतु जिसे अंग्रेज एडम्स ब्रिज भी कहते हैं, 2007 का भारत का सबसे बड़ा विवादास्पद मुद्दा रहा। व्यापारिक मार्ग (सेतु सुन्दरम) की सहूलियत के लिए प्रशस्त मार्ग करने के लिए इसे तोड़े जाने का विचार था। परन्तु सरकार के इस व्यावहारिक विचार को लोगों ने हिन्दुत्व और धर्म का एक बड़ा मुद्दा बना लिया है।

मुम्बई बम ब्लास्ट के अन्दर सौ लोगों की गिरफ्तारी, 12 को मौत की सजा और बीस को उम्र कैद की सजा देकर टाडा केस के जज ने आतंकवादियों को निश्चय ही अपनी दृढ़ता का भलीभांति परिचय दिया है । यह वही जज थे जिन्होंने मशहूर अभिनेता संजय दत्त को इस साल दो बार जेल भेजा और उनकी दिवाली तक जेल में निकलवायी परन्तु निसंदेह इस साल की सबसे बड़ी और दहला देने वाली घटना बेनजीर की हत्या थी । महीने भर  पहले  भी एक असफल  प्रयास में 150 निर्दोषों ने अपनी जान गंवाई थी। और अभी भी असंतुष्ट और क्रोधित पाकिस्तानी अवाम के बीच तोड़फोड़ और मारा-मारी का सिलसिला कायम ही है।  भारत के फिल्मी संसार में संजय दत्त के साथ-साथ सलमान खान भी अपने चिंकारा हिरण के शिकार के चक्कर में, तो कभी कटरीना कैफ से रोमांस की वजह से खबरों में बने रहे।  सबकुछ खराब ही खराब नहीं था। 2007 में बाली में पर्यावरण के हित में अमरीका का आनाकानी के बाद हस्ताक्षर कर देना, निश्चय ही आक्रान्त पृथ्वी के हित में एक अच्छी घटना थी। और भारतीय फिल्म जगत के राजकुमार अभिषेक बच्चन का रूप की राजकुमारी ऐश्वर्य रॉय से शादी ने 2007 में काफी हलचल मचाई और सभी देश विदेश की पत्रिकाओं ने इसे कवरेज भी दी । ज्ञान-विज्ञान में भी कई-कई नई और अद्भुत उपलब्धियां हुईं विशेशतः जीव कोष विज्ञान में अब शायद नली के अन्दर ही नहीं बिना पिता के भी जीव निर्माण संभव हो। कहा जाता है कि मादा के स्टेम सेल से वीर्य रचना करके नव मानव का निर्माण अब संभव है। कुल मिलाजुलाकर 2007 भी अन्य सालों की तरह एक मिलाजुला साल था जिसने हम पृथ्वी वासियों को संतोष असंतोष, सफलता-आपदा...सूखा-बाढ़ सभी कुछ दिए।     

आंसू और मुस्कानों में लिपटा 2007 विदा लेने को तैयार खड़ा है और 2008 बांहें फैलाए सामने। आइये इस नए साल का आशा सद्भाव और सुसंकल्पों से स्वागत करें!     

 

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नया वर्ष द्वार पर खड़ा है नई आशाओं और अनदेखे भविष्य का तोहफ़ा लेकर।

आखिर क्यों रहती हैं ये आँखें इतनी उत्सुक भविष्य के इस जादुई शीशे में झांकने को!

क्या जो दिखता है वह इतना मनोहारी है... 

 प्रस्तुत है मंथन में इसबार इक्कीसवीं सदी की पूर्व संध्या पर लिखा आलेख!

  युग कगार पर

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         उत्सुकता अधीरता में बदलती जा रही थी। वर्षों, महीनों, दिनों का इन्तजार अब कुछ घंटों का ही रह गया था। टकटकी बांधे बैठी शाम की बेचैन आँखों में अँधेरा भरने लगा। समय जो सर्व शक्तिमान है, सबकुछ अतीत में बदलने की ताकत रखता है, आज उसी समय के इस संधि-बिन्दु पर बैठकर समय को आँखों के आगे पलटता देखना महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक लग रहा था। कैसी होगी वह कल की सुबह? क्या सच में सबकुछ नया-नया होगा, नई सदी के उल्लास में डूबा ...कबूतर के पंखों सा उजला और उड़ने को आतुर। नयी उमंगों में नहाया हुआ, दूध से धुले बादलों सा बेदाग और साफ-सुथरा। शायद आसमान से बरसती खुशी को पेड़ सुनहरी किरणों के संग सोने-सा अपनी फुनगियों में समेट लेंगे, हर आते-जाते राही के पैरों के नीचे बिछाने के लिए; बिल्कुल वैसे ही जैसे अमलतास और पलाश के फूल चटकती धूप में चुपचाप जलते हुए पैरों के नीचे आ गिरते हैं। जाने क्यों मन मानना चाह रहा था कि कल की सुबह कुछ विशेष होगी। सुबह होते-होते पक्षी घोसलों से उड़कर आकाश में जा पहुँचेंगे और मंगल-गीत गाने लगेंगे, कुशल कलाबाजों की तरह भांति-भांति के करतब दिखाएँगे। आखिर रोज-रोज तो सदी नहीं बदलती। युग नहीं बदलता। हजारों साल इंतजार करना पड़ता है, कई जन्म लेने पड़ते हैं; तब जाकर सहस्त्राब्दि आती है! उत्साह समेटे नहीं सिमट रहा था। आँखें सपने बुनती, बड़े जोश से रात निकालने को तैयार थीं। हृदय, अपने समस्त सहवासियों की तरफ से इस आल्हादित पल को, इस धरती को, आकाश को, पेड़, पर्वत, नदी-नाले, छोटे-बड़े सभी जीव-जन्तुओं को बधाई देना चाहता था। इस पल को यादों की तह में तराश लेना चाहता था।

कहाँ से कहाँ आ गयी है हमारी सभ्यता! ...पर पाषाण-युग से लेकर आज अंतरीक्ष-यान तक का सफ़र आसान तो नहीं था। कल की तरह आज भी वही चारो तरफ बिखरा हुआ जंगल है। आज भी करीब-करीब वही जंगल के ही कानून चलते हैं। आज भी लाठीवाला ही भैंस हांकता है। शासन और शोषण करता है। यह बात और है कि अब लाठी या ताकत के नये-नये रूप उभरकर सामने आ रहे हैं। हाट और शॉपिंग-मालों से निकलकर हम ई.कामर्स के युग में जा पहुँचे हैं। अब लड़ाइयाँ सिर्फ रण-क्षेत्रों में ही नहीं, कॉमर्स-चेम्बरों में भी लड़ी जाती हैं। लड़ाइयाँ बदलीं, तो लड़ने के तरीके भी बदलने पड़े। आज किसी राष्ट्र पर आरोपित आर्थिक नियंत्रण और व्यापारिक क्षेत्र में विश्व समुदाय से बहिष्कार, उसके लिए परमाणु बम से भी ज्यादा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। निश्चय ही इस आपाधापी के दौर में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां भी हुईँ, कीर्तिमान भी स्थापित किए गए। इस मानव-जाति की आजकी  सहूलियतवादी सभ्यता ने वैज्ञानिक तकनीकियों से भौतिक दूरियां तो करीब-करीब मिटा ही दी हैं। समूचा विश्व आज हर मानव का क्रीडांगन और कर्मभूमि दोनों ही बन चुका है। इस नये सामीप्य के अनुभव में रिश्तों की परिभाषा बदलना भी  स्वाभाविक ही है। बदलती सुविधाओं के साथ सबकुछ सुविधानुसार बदल चुका है। आत्मिकता, भौतिकता के साथ गडमड हो चुकी है और सफ़ेद-काला सब ऐसा सलेटी हुआ है कि भावुकता और संवेदनशीलता आज कमजोरी और पिछड़ेपन का प्रतीक बनकर रह गयी है। राजा और प्रजा सबके ही मुखौटे एक हो गए हैं। क्षितिज की उस काल्पनिक रेखा की तरह कौन कहाँ  किससे  कैसे और कब मिला कहना जब दिन-प्रतिदिन मुश्किल से मुश्किलतर् होता जा रहा है, तो फिर हम इस बहुरँगी युग का सँधि-विच्छेद कैसे करें? इसके आदर्शों और प्रतिमानों को कैसे पहचानें?

काली रात की पिघलती नदी अलसाई चेतना को धीरे-धीरे जाने कब बहाती-भटकाती एक दूसरे ही जंगल में ले गयी, एक ऐसे घने जंगल में जहाँ पेड़ नहीं, जले हुए पेड़ों के ठूँठ खड़े हुए थे और जीव-जन्तुओं के अधमरे ढाँचे दम तोड़ते कराह रहे थे। वर्षों की लापरवाही और दुरुपयोग ने पृथ्वी को आकाश सहित उबलता हुआ लावा बना दिया था। सारी नदियाँ सूख चुकी थीं। जो थोड़ा बहुत पानी इधर-उधर बचा हुआ था वह आरसनिक और इँडस्ट्रियल कचरे की वजह से अब बस जहर था। समुद्र बेचारा तो कबका काली- महकती, सड़ी कीचड़ की खाइयों में पलट गया था। मौत की महकती चादर ने सबकुछ सड़ा-गला दिया था। जैनेटिकली मोटिवेटेड फसल और नसल दोनों ही जीवन से बहुत आगे जा चुकी थीं। संक्रमक और असह्य बीमारियों का गढ़ अपने साथ-साथ लिए हुए आगे बढ़ते इस प्रगतिवादी इंसान ने, उसके सभ्य समाज ने, अपनी बंद आँखों के आगे से अवांछनीय सबकुछ हटा-बढ़ा