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लेखराम चिले निःशंक
मन की अटक जहां, रूप को विचार कहां?

इस विचित्र दुनिया का सबसे विचित्र प्राणी है-मनुष्य। इस चमत्कारी मनुष्य के पास सबसे विस्मयकारी वस्तु है-मन। इस कल्पनाशील और तड़ित वेग से गमन करने वाले मन की सबसे आश्चक्यजनक देन है-प्रेम। इसे चाहे इश्क कह लो, प्यार, मोहब्बत या स्नेह कह लो-इसका काम एक-नाम अनेक। कमबख्त, इस प्रेम में अनेक हैरत अंगेज करिश्मे हैं। उनमें से एक है-उसकी लचीली तबियत। ठीक रबर जैसी तासीर पायी है इसने-तनने और सिकुड़ने वाली।
एक लफ्ज 'मुहब्बत' का, इतना सा फसाना है
सिमटे तो दिले आशिक, फैले तो जमाना है।
प्रेम का अक्ल से ज्यादा सरोकार नहीं है, जबकि बुद्धि, मनुष्य को मिला श्रेष्ठतम उपहार है। प्रेम अक्ल के झमेले में नहीं पड़ता। प्रेम की इसी खासियत पर अकबर इलाहाबादी का कलाम देखिए-
इश्क नाजुक मिजाज है बेहद
अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता।
तो, आइये इस फागुनी रंग में हम इस 'बेअक्ल' इश्क की कुछ खास लतों और उसकी अटपटी किन्तु चटपटी हरकतों का जायका ही ले लें। प्रेम के चस्के तो इन्सान सहित हर पशु-पक्षी लेता है, इसलिए कविवर बिहारी कह गए हैं-
बहे सदा पशु-नरनि कहें, प्रेम-पयोधि-पगार।
किंतु इश्क के कूचे में, कुछ ज्यादा ही भटककर, कवि और शायरों ने खट्टे, मीठे और तीते अनुभव बटोरे और उन्हें वाणी दी है। यहां कुछ पेश हैं। कबीर साहब के अनुसार यह 'ढाई अक्षर' का प्रेम, न तो खरबूजे की तरह किसी बाड़ी में पैदा होता है, न 'बाटा' और 'लखानी' की चप्पलों की तरह बाजार में ही बिकता है। उसकी कीमत भी बड़ी अजीब है। रुपया-पैसा नहीं, केवल एक अदद सिर-
प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय
राजा-परजा जेहि रुचे शीश देह लै जाय।।
इन्ही कबीर साहब के अनुसार ' प्रेम का पथ' सरकस के झूले वाले करतब से भी अधिक खतरनाक है। सर्कस में झूले से गिर जाने पर नीचे लगी वाली (नेट) कुछ रक्षा कर सकती है, किन्तु 'प्रेम के खजूर' से टपकने पर कोई साबुत नहीं बच सकता-
प्रेम-पंथ अति कठिन है, जैसे ताड़ खजूर।
चढ़े सो चाखे प्रेम-रस, गिरे तो चकनाचूर।।
ग़ालिब साहब तो इश्क को आग मानकर भी उसके लगने बुझने से इंकार करते हैं, जबकि कबीरदास इसको ऐसी बुरी बला मानते हैं, जो लगते ही आर-पार हो जाती है-
इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
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लागी-लागी क्या करे, लागी बुरी बलाय
लागी सोई जानिए, जो आर-पार हुइ जाय। -कबीर
' प्रेम के कूचे से बेआबरू' होकर निकलने की बात तो हम सबने खूब सुनी है किन्तु कबीर को तो प्रेम में केवल बेइज्जती ही दिखाई पड़ती है-
पीया चाहे प्रेम-रस, राखा चाहे मान।
एक म्यान में दो खड़ग, देखा सुना न कान।।
यही नहीं, नेह के निर्वाह में भी कठिनाइयां ही कठिनाइयां हैं-
अगिन आंच सहना सुगम, सुगम खड्ग की धार।
नेह-निभावन एक रस, महा कठिन व्यवहार।।
कुछ भुक्तभोगी कवि-शायरों ने अपने अनुभव के आधार पर प्रेम को परिभाषित कर उसक लक्षण भी बताए हैं-
अति सूक्षम, कोमल अतिहि, अति पतरो, अति दूर।
प्रेम कठिन सबसे सदा, नित इक रस भरपूर।।
...
इक अंगी बिनु कार नहीं, एक रस सदा समान।
गुने प्रियहिं सर्वस्व जो, सोई प्रेम प्रमान।।
...
डरे सदा, चाहे न कछु, सहै सब जो होय।
रहे एक रस चाहिके, प्रेम बखाने सोय।।
प्रेम मन पटे का सौदा है। इसलिए नागरीदास जी कहते हैं-
दो मन को करि एक मन, भाव देत ठहराय।
शेख आशी साहब तो मन के अटकाव को ही प्रेम का कारण बताते हैं। उनके अनुसार प्रेम में कभी रूप-रंग का कोई विचार नहीं होता-
मन की अटक जहां, रूप को विचार कहां।
रीझिब को पैड़ो, तहां बूझ कछु न्यारी है।।
रसनिधि भी 'रूप-लिप्सा' को प्रेम का कारक नहीं मानते। उनकी दलील है-
जे चेतन क्यों तजें, जाको जा सों मोह।
चुंबक के पीछे लग्यो फिरत, अचेतन लोह।।
प्रेम का चश्मा चढ़ जाए तो प्रेमिका या प्रिया कैसी भी कुरूप क्यों न हो-बस 'हूर' नजर आती है। इसलिए कविवर रसनिधि लोगों को हिदायत देते हैं-
चसमन चस्मा प्रेम को पहिले लेहु लगाई।
सुंदर मुख वह मीत को, तव अवलोको जाइ।।
प्रेम के कूचे में अलख जगाने वाले कवि-शायरों का अनुभव है कि प्रेम-राग का पहला लक्षण है-दृष्टि-दोष और दूसरा पागल हो जाना। इस असाध्य रोग की चरम परिणति मृत्यु तक हो सकती है। नागरीदास और सहजोबाई की कविता में इन स्थितियों का निरूपण इस प्रकार हुआ है-
इश्क, चमन महबूब का बिरला जावे कोय।
जावे सो जीवे नहीं, जिये सो बौरा होय।। ...
प्रेम दीवाने जो भये, पलट गये सब रूप।
सहजो दृष्टि न आवई, कहा रंक, कहा भूप।।
अनुभव से कहा जा सकता है कि प्रेम और बिजली के करेंट में केवल दो विषमताएँ हैं और शेष सभी समानताएँ हैं। पहली विषमता यह है कि प्रेम में ' फ्लक्चुएशन' नहीं होता और दूसरा यह कि उसका वाल्टेज भी कम-बढ़ नहीं होता-
छिनहि चढ़ै छिन उतरै, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजर बसे, प्रेम कहावै सोय।।
प्रेम के कैंडे से प्राप्त अनुभव यही निष्कर्ष दे रहे हैं कि प्रेम 'मन पटे का सौदा है। उसमें केवल 'अटकाव' की जरूरत है। 'अटकाव', आकर्षण से होता है। आकर्षण कोई भी हो सकता है-रूप का, रंग का, नयन-नक्श का, चाल-ढाल का, बोल-चाल और किसी 'अदा' विशेष का। रंग मात्र ही किसी लावण्य का बयान नहीं होता। राधा पर कृष्ण का रीझने का कारण केवल उसका गोरा-चिट्टा होना नहीं है। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें भी एक कारण थीं। 'दीरघ-अनियारे नयनों' पर रीझने की बात तो कवि बिहारी भी बता गये हैं। राधा-कृष्ण के 'प्रथम-दर्शन में प्रेम' के भी सूरदास ने दो कारण बताए हैं-
गए स्याम, रवि-तनया के तट, अंग लसति चंदन की खोरी।
औचक ही देखी तहं राधा, नैन-विशाल भाल दिए रोरी।
'सूर' स्याम देखत ही रीझे, नैन-नैन मिली परी ठगोरी।।
आकर्षण का कारण सौंदर्य होता है। सुंदरता केवल रंग नहीं होती, शारीरिक सौष्ठव भी उसका एक घटक होता है। अंग्रेजी के एक लेखक का कथन है कि 'ब्यूटी डिपेंड्स आन कट, नाट आन कलर'। शारीरिक सौंदर्य ही केवल सौंदर्य नहीं। इसके अतिरिक्त आचार-व्यवहार, गुण, शालीनता, चतुराई, प्रागल्भता आदि अनेक बातें सुन्दरता प्रदायक होती हैं। ऐसे ही किसी एक या अनेक गुण के कारण, एक गोरी-चिट्टी गोपी, प्रथम दर्शन में ही काले-कलूटे कृष्ण पर रीझ गयी। और ऐसी रीझी कि उसकी आंखों से कृष्ण की छवि निकल ही नहीं रही है। देखिए-
एकै संग धाये नंदलाल और गुलाल दोऊ,
दुगन गए जु भरि, आनंद मढ़ै नहीं।
धोई-धोई हारी, पद्माकर तिहारी सौं,
अब तो उपाय एकौ चित पै चढ़ै नहीं।
कैसी करूं, कहां जाऊं, का सों कहों, कौन सुने,
काऊ सो निकासों जा सों दरद बढै नहीं।
ऐसे मेरी बीर, जैसे-तैसे इन आँखिन तें
कढ़ि गौ अबीर पै, अहीर तो कढ़ै नहीं।।
कजरारी आंखें भी प्रेम का दरिया होती हैं जिसमें उतराया और डूबा जाता है-
काजर-सी कारी आंखों में बहा और डूब गया।
केवल महबूबा की 'चाल' पर भी मर-मिटने वाले बहुतेरे हैं। 'गजगामिनी' की चाल पर फिदा होने के कहानी-किस्से पढ़े-सुने थे, किन्तु आजकल तो सिलाई-मशीन (सिंगर) की चाल प्रेम में चलने लगी है-
क्या गजब की चाल है मिस साहिबा।
गोया बखिया कर रही सिंगर मशीन।।
सारांश यह कि 'इश्क' में-' जो जेहि भाव, नीक सोइ तेही' का सूत्र काम करता है। प्रेम-संबन्धों में 'पसंद अपनी-अपनी' के आधार पर जोड़ियां बनती हैं। मिस्टर 'टब' की युगल बंदी मैडम 'स्वीमिंग पूल' से हो जाती है। हल्की-फुल्की, किसी पोर्टेबल व्यक्तित्व की प्रेमिका किसी भारी-भरकम जंगम वस्तु के गले पड़ सकती है। लंदन की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री ने, जो अपने रूप-रंग , नाक-नक्श और सुडौल शरीर और आनुपातिक कद के कारण फिल्म जगत की मलिका मानी जाती है, एक बौने दुबले-पतले और अत्यंत साधारण व्यक्तित्व के धनी टेलर-मास्टर से प्रेम विवाह रचा डाला। पश्रकारों ने जब उनसे इस बेमोल गठजोड़ का कारण पूछा तो अभिनत्री का उत्तर था- " उसकी ऊँचाई मेरे हृदय को छूती है। और कीमती वस्तु छोटी पैकिंग में ही होती है।"
यही नहीं. हमारे देश के एक चोटी के धनी उद्योगपति ने जब एक श्यामा युवती को अपनी जीवन-संगिनी बनाया तब उनसे भी कारण पूछा गया तो उनका उत्तर था-" पहला कारण तो यह कि मेरी पत्नी 'घूरने' से बची रहेगी। दूसरा कारण यह कि काले कोयले के गर्भ में ही हीरा होता है।"
(साभार आजकल)
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अमृता प्रीतमः एक कालजयी व्यक्तित्व

कृष्ण कुमार यादव
वह दिसंबर की कड़कड़ाती सर्दियों की रात थी। इलाहाबाद विश्वविध्यालय से उस समय मैं बी.ए. कर रहा था कि अचानक दिल्ली से आए मेरे एक मित्र कमरे पर पधारे। छोटा सा कमरा और एक ही बेड ... सो संकोचवश मैने मित्र से कहा कि-आप आराम से सो जाइये, क्योंकि मेरी रात को पढ़ने की आदत है। कुछ ही देर में वे खर्राटे लेते नजर आये और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा सोच रहा था कि आखिर रात कैसे गुजारूँ क्योंकि रात में पढ़ने का तो एक बहाना मात्र था। इसी उधेड़बुन में मेरी निगाह मित्र के बैग से झांकती एक किताब पर पड़ी तो मैने उसे बाहर निकाल लिया और यह किताब थी-अमृता प्रीतम का आत्मकथात्मक उपन्यास 'रसीदी टिकट'। 'रसीदी टिकट' को पढ़ते हुए कब आँखों ही आँखों में रात गुजर गयी, पता ही नहीं चला। ईमानदारी के साथ स्वीकरोक्ति करूँ तो फिर 'रसीदी टिकट' मरी सहचरी बन गयी। तब से आजतक का सफर न जाने जिन्दगी कहाँ से कहाँ पहुँच गयी, पर 'रसीदी टिकट' अभी भी मेरी अमानत में सुरक्षित है।
अमावस पूर्व 31 अक्टूबर, 2005 की शाम...पटाखों के शोर बीच अचानक टी. वी. पर खबर देखी कि- अमृता प्रीतम नहीं रहीं। ऐसा लगा मानो कोई अपना नजदीकी बिछुड़ गया हो। दूसरे कमरे में जाकर देखा तो मानो ' रसीदी टिकट' को भी अमृता जी के न रहने का आभास हो गया हो...स्याह, दास व गमगीन उस 'रसीदी टिकट' पर कब आँसू की एक बूँद गिरी, पता ही नहीं चला। ऐसा लगा मानो हम दोनों ही एक दूसरे को ढाढस बँधाने की कोशिश कर रहे हों।
1919 का दौर...गाँधी जी के नेतृत्व में इस देश ने अँग्रेजों के दमनकारी रौलेट एक्ट का विरोध आरंभ कर दिया था. ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलती नजर आ रही थीं। इसी दौर में उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द ने, जो कि उससमय गोरखपुर में एक स्कूल में अध्यापक थे, एक अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर को अपने घर के सामने सलाम करने से मना कर दिया। उनका तर्क था - " मैं जब स्कूल में रहता हूँ तब मैं नौकर हूँ, बाद में अपने घर का बादशाह हूँ।" ऐसे ही क्रांतिकारी दिनों में पंजाब के गुँजरावाला (अब पाकिस्तान में ) में 31 अगस्त 1919 को अमृता प्रीतम का जन्म हुआ था। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में, जबकि उन्होंने दुनिया को अपनी नजरों से समझा भी नहीं था, माँ का देहावसान हो गया। कड़क स्वभाव के लेखक पिता के सानिध्य में अमृता का बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई। लेखन के प्रति तो उनका आकर्षण बचपन से ही था पर माँ की असमय की मौत ने उसमें और भी धार ला दी। अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में उन्होंने माँ के अभाव को जिया है- "सोलहवाँ साल आया-एक अजनबी की तरह। घर में पिताजी के सिवाय कोई नहीं था-वह भी लेखक जो सारी रात जागते थे, लिखते थे और सारे दिन सोते थे। माँ जीवित होतीं तो शायद सोलहवाँ साल और तरह से आता-परिचितों की तरह, सगे-संबंधियों की तरह, पर माँ की गैरहाजिरी के कारण जिन्दगी में से बहुत कुछ गैरहाजिर हो गया था। आसपास के अच्छे-बुरे प्रभावों से बचाने के लिए पिताजी को इसीमें सुरक्षा समझ में आयी कि मेरा कोई परिचित न हो। न स्कूल में कोई लड़की, न पड़ोस का कोई लड़का।"
अमृता जी की प्रथम कविता इंडिया किरण में छपी तो प्रथम कहानी 1943 में कुंजियों में। इस बीच जीवनयापन हेतु 1937 में उन्होंने रेडियो ज्वाइन कर लिया। जब देश आजाद हुआ तो उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष थी। वक्त के हाथों मजबूर हो वो उस पार से इस पार आयीं व देहरादून में पनाह ली। इस बीच 1948 में वे उद्घोषिता के रूप मं ऑल इंडिया रेडियो से जुड़ गयीं। पर विभाजन के जिस दर्द को अमृता जी ने इतने करीब से देखा था, उसकी टीस सदैव स्मृति पटल पर बनी रही और रचनाओं में भी प्रतिबिंबित हुयी। बंटवार पर उन्होंने लिखा-" पुराने इतिहास के भीषण अत्याचारी कांड हम लोगों ने भले ही पढ़े हुए थे, पर फिर तब भी हमारे देश के बंटवारे के समय जो कुछ हुआ, किसी की कल्पना में भी उस जैसा खूनी कांड नहीं आ सकता...मैने लाशें देखी थीं लाशों जैसे लोग देखे थे।" बंटवारे की टीस और क्रंदन वो कभी भी बुला नहीं पायीं। जिस प्रकार प्रणय क्रीड़ा में रत क्रौच पक्षी को व्याघ्र द्वारा बाण से बींधने पर क्रौंची के करुण शब्द सुन विचलित वाल्मीकि अपने को रोक न पाए थे व बहेलिये को शाप दे दिया था, जो कि भारतीय संस्कृति का आदि श्लोक बना, ठीक वैसे ही पंजाब की इस बेटी की आत्मा लाखों बेटियों की क्रंदन सुनकर बार-बार द्रवित होती जाती थी। ...और फिर यूँ ही ट्रेन यात्रा के दौरान उनके जेहन में वारिस शाह की ये पंत्तियां गूंज उठीं-भला मोए ते, बिछड़े कौन मेले...। अमृता को लगा कि वारिस शाह ने तो हीर के दुःख को गा दिया पर बंटवारे के समय लाखों बेटियों के साथ जो हुआ, उसे कौन गायेगा। फिर उसी रात चलती हुई ट्रेन में उन्होंने यह कविता लिखी-
अज्ज आखयां वारिस शाह नूँ, किते कवरां बिच्चों बोल
ते अज्ज किताबे-इश्क दा कोई अलगा वरका खोल।
इक रोई-सी धी पंजाब दी, तू लिख-लिख मारे बैन
अज्ज लक्खां धीया रोदियां, नैनूं वारिस शाह नू कहा।
यह कविता जब छपी तो पाकिस्तान में भी पढ़ी गयी। उस दौर में इसका इतना मार्मिक असर पड़ा कि लोग इस कविता को अपनी जेबों में रखकर चलते व एकांत मिलते ही निकालकर पढ़ते और रोते...मानो यह उनपर गुजरी दास्तां को सहलाकर उन्हें हल्का करने की कोशिश करती। विभाजन के दर्द पर उन्होंने 'पिंजर' नामक एक उपन्यास भी लिखा, जिस पर कालांतर में फिल्म भी बनी।
अमृता फ्रीतम ने करीब 100 रचनायें रचीं, जिनमें कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा संस्मरण व आत्मकथा शामिल थी। इनमें कोरे कागज, रंग का पता, उन्चास दिन, सागर और सीपियां, एक सवाल, एक थी अनिता, एरियल, आक के पत्ते, यह सच है, एक लड़कीःएक जाम, पांच बरस लम्बी सड़क, पिंजर, अदालत, तेरहवां सूरज, डॉ देव, नागमणि, दिल्ली की गलियां, एक थी सारा, रसीदी टिकट इत्यादि प्रमुख थीं। उन्होंने पंजाबी कविता की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान कायम की पर इसके बावजूद वे पंजाबी से ज्यादा हिन्दी लेखिका के रूप में जानी जाती थीं। यहाँ तक कि विदेशों में भी उनकी रचनाएं उतने ही मनोयोग से पढ़ी जाती थीं। एक समय में तो राजकपूर की फिल्में देखना व अमृता प्रीतम की कविता पढ़ना सोवियत संघ के लोगों का शगल बन गया था। अमृता जी की रचनाओं में साँझी संस्कृति की विरासत को आगे बढ़ाने व समृद्ध करने का पुट शामिल था। 1957 में साहित्य अकादमी पुरष्कार पाने वाली यह प्रथम महिला रचनाकार बनीं तो 1958 में उन्हें पंजाब सरकार ने पंजाब अकादमी पुरष्कार से सम्मानित किया। 1982 में 'कागज के केनवास' के लिए ज्ञानपीठ पुरष्कार से सम्मानित किया गया तो पद्मश्री व पद्मविभूषण जैसे सम्मान भी उनके आँचल में आये। विभाजन ने पंजाबी संस्कृति को बांटने की जो कोशिश की थी, वे उसके खिलाफ सदैव संघर्ष करती रहीं व उसे कभी भी विभाजित नहीं होने दिया। पंजाबी साहित्य को समृद्ध करने हेतु वे 'नागमणि' नामक एक पत्रिका भी निकालती थीं।
आज स्त्री विमर्श, महिला सशक्तिकरण, नारी स्वातंत्र्य व लिव इन रिलशनशिप जैसी जिन बातों को नारे बनाकर उछाला जा रहा है, अमृता जी की रचनाओं में वे काफी पहले ही स्थान पा चुकी थीं। शायद भारतीय भाषाओँ में यह प्रथम ऐसी जनप्रिय लेखिका थीं, जिन्होंने पिंजरे में कैद छटपटाहट की कलात्मक अभिव्यक्ति को मुखर किया। ज्वलंत मुद्दों पर जबरदस्त पकड़ के साथ-साथ उनके लेखन में विद्रोह का भी स्वर था। उन्होंने परंपराओं को जिया तो दकियानूसी से उन्हें निजात भी दिलायी। आधुनिकता उनके लिए फैशन नहीं जरूरत थी। यही कारण था कि वे समय से पूर्व ही आदुनिक समाज को रच पायीं। ऐसा नहीं है कि इन सबके पीछे मात्र लिखने का जुनून था वरन् बंटवारे के दर्द के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत जीवन की रुसवाइयों व तनहाइयों को भी अमृता जी ने इन रचनाओं में जिया। कभी-कभी तो उनकी रचनाओं को पढ़कर समझ में ही नहीं आता कि वे किसी पात्र को जी रही हैं या खुद को। उन्होंने खुद के बहाने औरत को जिया व उसे परिमार्जित भी किया। ठेठ पंजाबियत के साथ रोमांटिसिज्म का नया मुहावरा गढ़कर दर्द को भी दिलचस्प बना देने वाली अमृता कहीं न कहीं सूफी कवियों की कतार में खड़ी नजर आती हैं। उनकी रचना ' दिल्ली की गलियाँ' में जब कामिनी नासिर की पेंटिंग देखने जाती है तो कहती है -" तुमने वूमेन विद् फ्लावर, वूमेन विद् ब्यूटी या वूमेन विद् मिरर तो बड़ी खूबसूरती से बनाया पर वूमेन विद् माइंड बनाने से क्यों रह गये ।" निश्चिततः यह वाक्य पुरुष वर्ग की उस मानसिकता को दर्शाता है जो नारी को सिर्फ भावों का पुंज समझता है, एक समग्र व्यक्तित्व नहीं। सिमोन डी बुआ ने भी ' सेकन्ड सक्स' में इसी प्रश्न को उठाया है। 'लिव इन रिलेशनशिप' क ऐसा मुद्दा है जिसपर अमृता जी ने सिमोन से काफी पहले ही लेखनी चला दी थी। अपनी रचना 'नागमणि' में अलका व कुमार क बहाने उन्होंने खुद को ही जिया है, जो बिना विवाह के एक अनजान गांव में साथ रहते हैं और वह भी बिना किसी अतिरिक्त हक व अपराध बोध के। स्वयं अमृता जी का जीवन भी ऐसी ही दास्तां थी। वे प्रेम के मर्म को जीना चाहती थीं उसके बाहरी रूप को नहीं। इसीलिए तमाम आलोचनाओं की परवाह किये बिना उन्होंने अपनी परंपरागत पति प्रीतम सिंह को तिलांजली देकर चित्रकार इमरोज को अपना हमसफर बनाया पर इन आलोचनाओं का जवाब उन्होंने अपने लेखन को और भी धारदार बनाके दिया। नतीजन, भारत ही नहीं विश्व स्तर पर उनकी रचनाओं की मांग बढ़ने लगी।
ऐसा था अमृता जी का जीवन...एक ही साथ वे मानवतावादी, अस्तित्ववादी, स्त्रीवादी व आधुनिकतावादी थीं। जब विभाजन के दर्द को वे जीती हैं तो मानवतावादी, जब दुःखदर्दों व आलोचनाओं से परे स्वतः स्फूर्त वे स्व से उद्भूत होती हैं तो अस्तित्ववादी, जब पुरुष की दकियानूसी मानसिकता पर चोट कर उसे स्त्री को समग्र व्यक्तित्व रूप में अपनाने की बात कहती हैं तो स्त्रीवादी एवं जब समय से आगे परंपराओं के विपरीत अपने हमसफर को बिना किसी बंधन के समाज में स्वीकारती हैं तो आधुनिकतावादी रूप में उनका चेहरा सामने आता है। पर किसे पता था कि साहित्य की यह अनुपम दीपशिखा दीपावली की पूर्व संध्या पर अँधरे में गुम हो जायेगी और छोड़ जायेगी एक अलौकिक शमा, जिसकी रोशनी में आने वाली पीढ़ियां दैदीप्यमान होती रहंगी।
साभार 'अनुभूतियां और विमर्श '
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रागरंग (तीज-त्योहार)

सेंट वैलेंटाइन डे

-शैल अग्रवाल
अठ्ठारहवीं शताब्दी से ही फरवरी का महीना यूरोप में प्रेमियों को समर्पित रहा है। न जाने कितने कार्ड और उपहार इस महीने की 14 तारीख को लिए और दिए जाते रहे हैं...कभी प्रत्यक्ष तो कभी अपरोक्ष रूप से भी।
पाश्चात्य-प्रभाव के अधीन यह चलन अब भारत में भी जोर पकड़ चुका है और बड़े बच्चे सभी ' वैलेन्टाइन डे' की परंपराओं से भलीभांति परिचित हो चुके हैं। उपहारों की सूची में इस दिन कार्ड, फूल और चौकलेट (विशेषतः दिल के आकार में) सर्वोपरि रहते हैं...हो भी क्यों न आखिर दिल लेने और देने का मामला जो ठहरा। ' प्रीतम को पतियां लिखूं, जो कहुं होय विदेस/ तन में मन में नैन में, वाको का संदेस।' वाले हमारे भारत देश में युवा-युवतियों का यूं सार्वजनिक और खुले रूप में प्रेम-प्रदर्शन के रूप में मनाए जाने वाला यह त्योहार परंपरागतगत रुचि और रूढ़ियों से टकराया भी है और जगह जगह आए दिन ही इसके खिलाफ प्रदर्शन और भर्तस्ना भी हुई हैं, परन्तु हजार अवरोधों के बाद भी अब यह दिन भारत में भी बड़े जोर-शोर और उत्साह से मनाया जाने लगा है और युवा वर्ग में काफी प्रचलित भी हो गया है। अब सिर्फ उपहार के लेन-देन तक ही इसकी खुशियां सीमित नहीं रह गयी हैं अपितु छोट-बड़े सभी शहरों में पांचतारा होटलों के अन्दर वैलेंटाइन डे के डिनर व डिस्को का प्रचलन भी जोर पकड़ता जा रहा है और होली पे खेले जाने वाले रंगों की तरह या दिवाली पे जलाए जाने वाले दियों की तरह ही अवश्यंभावी सा होता जा रहा है। वैसे भी इस वसंत ऋतु को हमारे यहां भी तो कामदेव की ऋतु ही माना गया है, जब चितवन और स्पंदन ही नहीं प्रकृति तक में फूलों की खुशबू और भंवरों की गुनगुन भी बढ़ जाती है। पूरी धरती ही रूप और रंग की एक अद्भुत छटा से संवर उठती है।
आइये देखते हैं इस सेंट वैलेंटाइन डे की शुरुवात कब कैसे और कहां से हुई और तब से लेकर आजतक इसे कैसे-कैसे और किन-किन रूपों में मनाया जाता रहा है।
कहा जाता है कि रोमन सेंट वैलेंटाइन जिन्हें किर्स्चिë |