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" चाहे गीता बाँचिए, या पढ़िए कुरान/ मेरा तेरा प्यार ही हर पुष्तक का ज्ञान।"
-निदा फाजली-
+LEKHNI+
Feburary-2008-Issue 12
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अपनी बात

तेरह-चौदह साल की किशोर व संवेदन-शील उम्र थी और बनारस से इलाहाबाद तक का लम्बा सफर। धूल-धक्के और भीड़-भाड़ से ऊबीं आँखें अचानक ही आगे-आगे चल रहे एक ट्रक पर लिखे शेर पर जा अटकीं। शेर था: " नशा शराब में नहीं मेरे खून में है साकी, होता जो नशा शराब में बोतल न झूम जाती।" ( कुछ साल बाद यही शेर प्रकाश मेहरा की फिल्म शराबी के एक गाने में भी सुनने को मिला)। उसी वक्त बुद्धि से लेकर मन तक बिजली-सी कौंध गयीं वे पंक्तियां। बात सही और सोचने लायक थी। बाहर जो चल रहा है, वह नहीं, अन्दर जो है, वही तो बदलता है हमें... हंसाता-रुलाता, झुमाता और नचाता है।
पहली बार समझ में आया कैसे सोच का दृष्टिकोण तक बदल सकते हैं ये शब्द। पहली बार पूरी तरह से अंतर्मुखी होकर मन की शक्ति से अवगत हो पाई। आज की पीढ़ी या मुन्नाभाई के शब्दों में कहूँ तो मष्तिष्क में चल रहे ' केमिकल लोचे' से वह मेरा पहला साक्षात्कार था। वैसे भी किसी भी बात या अहसास को पूरी तरह से अनुभव करने के दो ही तो तरीके होते हैं; या तो हम उसे मन की गहराई से समझ लें या फिर जी लें।
वो सूफी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान। जितनी बीते आप पर, उतना ही सच जान।।
-निदा फाजली
फुर्सत के पलों में थोड़ा और गहराई से सोचा तो पाया कि वाकई में जीवन में...इस आज और अभी में जो घट रहा है...हर सौभाग्य, दुर्भाग्य, सुखृ-दुख के 95 प्रतिशत से अधिक के कर्ता और कारक हम खुद ही तो हैं। मुश्किल से बचे पांच प्रतिशत ही तो प्रारब्ध या अनहोनी के हाथ होते हैं, जो बस में नही। ' मन हारे' की हार है 'मन जीते' की जीत।
मात्र इच्छा या कामना नहीं, वह एक दूसरे के प्रति उनका अदम्य और अपराजेय प्रेम ही तो था, जिसने राधेश्याम को आजतक अलग नहीं होने दिया। मीरा को जहर के प्याले के बाद भी जिन्दा रखा। पर इतना प्यार इतनी आस्था; इतना विश्वास भी तो साधारण जीवन में संभव नहीं। इतनी सच्चाई और इतना समर्पण भी तो होना चाहिए, साथ-साथ हिम्मत भी। यूँ तो प्रेम की निर्मल धारा युगों से अविरल बह रही है , पर उस निश्छलता में भीग पाना, उस अमृत को आत्मसात कर पाना विरलों की ही आ पाता है। इसी संदर्भ में याद आ रही है फैज साहब की एक मशहूर नज्म,
वो लोग बोहत खुश किस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया।
अधिकांशतः भृतहरि की नायिका जैसा ही तो हाल रहता है , जो यह तक न जान पायी कि जरूरी काम के लिए जाते नायक को किन शब्दों के साथ विदा दे । यदि वह ' जाओ' कहती है तो नायक सोचेगा कि वह उसे प्यार ही नहीं करती, इसीलिए तो झट से जाओ कह दिया। 'मत जाओ' कहने पर भी उसका ही नुकसान होगा और ' थोड़ा और रुककर जाओ' कहने पर काम भी बिगड़ेगा और साथ में जाने की घड़ी भी नहीं टलेगी। अन्त में वह हारकर नायक से ही पूछती है कि अब वही बताए कि ऐसे समय में वह उसे क्या कहकर विदा दे।
ठहर कर सोचा जाए तो प्रेम के ' पनघट' की 'डगर' वाकई में 'कठिन' है और आज भी झटपट 'गगरी' भर लाने का ना कोई सुगम पथ और ना ही मूलमंत्र। आज भी प्यार के हर प्रश्न का प्यार ही एक उत्तर है।यही वजह है कि प्रेम-प्यार का प्रसंग चलते ही आज भी आँखों में जो छवि सर्वोपरि उभरती है वह राधाकृष्ण की ही होती है। ऐसा नहीं कि बहुत धार्मिक हूँ, या भारतीय हूँ, इस वजह से ऐसा होता है... या फिर रोमियो जूलियट, हीर-राँझा, शीरी फरहाद और लैला मजनू, आदि की प्रेम कहानियों से परिचित नहीं।
रासरंग और मिलन व विछोह के अनगिनित प्रसंगों के बाद भी जो संयम और ठहराव...काल और स्थान की दूरियों को लांघता अभिन्न और अविच्छेद सामीप्य इस जोड़ी में दिखता है, वह और कहीं है ही नहीं...एक ऐसी अजेय ललकार है इनके प्यार में जो अलग या दूर होने की सोच तक को तुरंत ही धिक्कार देती है। शायद इसलिए कि कर्तव्य की मांग पर योगी-सा कृष्ण का राधा से अलग होने का फैसला खुद अपना था... निर्णय जो अपने लिए नहीं; सार्वजनिक हित में ... जन कल्याण के लिए लिया गया था ! विश्वास था उन्हें अपने प्रेम पर। समझ थी अपने कर्तव्य की। मीरा सी दीवानगी संभव है और समझ में भी आती है क्योंकि 'गिरधर गोपाल' के लिए उनका प्यार, साकार होकर भी अमूर्त था। भक्त और भगवान का रिश्ता था। परन्तु राधाकृष्ण तो युगल थे..मित्र थे। सदैव साथ-साथ थे। फिर भी समय की; कर्म की पुकार पर हर व्यक्तिगत सुख (बांसुरी और राधा) तकको छोड़ दिया कृष्ण ने। और राधा भी उनके निर्णय के आड़े नहीं आयी। यह इस युगल का त्याग ही तो है जिसने उनके प्यार को तप की ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। इस निर्वाह के लिए जो अदम्य साहस और संयम चाहिए, वह आसान नहीं, चाहे हम इन्सानों में ढूँढें या देवी-देवताओं में।
पर राधा-कृष्ण का तप हो या मीरा की दीवानगी और हट, दोनों ही वन्दनीय हैं। विशेषतः तब जब दोनों ही रिश्ते सांस और शरीर-से हैं... आस्था की उस दीवानगी को छूते हैं जो या तो प्रिय में लीन होकर एकाकर हो जाती है और मिलन या विछोह से ऊपर उठ जाती है या फिर पत्थर तक को भगवान बना देती है। वैसे भी इस ढाई आखर के शब्द के रहस्यों को समझना या इस चंचल मन को पूरी तरह से बस में कर पाना इतना आसान तो नहीं! जबकि इसकी हर बात ही निराली है । इस दरिया की धार तो सदैव ही उलटी बही हैः इसमें तो डूबकर ही उबरा जाता है।
खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार।
जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।
और इस उलझन को चतुर राधारानी ने समझा भी था और सुलझाया भी... जो कृष्णमय होकर अपना जीवन जिया उन्होने। यही वजह थी कि उनकी झलक मात्र कृष्ण को हर्षा देती है क्योंकि संसारिक सारी बाधाओं के बावजूद भी कृष्ण की सांस-सांस की जरूरत को समझा उन्होने...उनके मन की हर बात जानी और निबाही। तभी तो बिहारी ने कृष्ण की नहीं, राधा की प्रार्थना की। वे जानते थे , राधा हैं तो कृष्ण हैं।
" मेरी भवबाधा हरो राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय "
राधा वास्तव में चतुर थीं क्योंकि वे प्रेम में बाधा नहीं सहायक बनीं। और यही है प्रेम की वास्तविक परिभाषा; जो आज भी किताबों में नहीं, जीवन में ही मिलेगी। कब सोच और शरीर ही नहीं, जीवन तक प्रिय को समर्पित हो जाता है प्रेमी को पता ही नहीं चल पाता और यही 'स्व' का मिटना ही उनके अमर सुख का कारण बनता है। जीवन के कांटों पर फूल-सा रंग और खुशबू बिखेरता है। तभी तो कबीरदास कह गये कि "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।" यही कबीर एक दूसरे दोहे में लिखते हैं - "प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जेहि रुचै शीष देय लहि जाय " ऐसे प्रेम को पाने के लिए ' शीष' यानी अहं को, अस्तित्व के अलगाव को त्यागना ही पड़ेगा। और यह कितना कठिन है हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं।
जमला ऐसी प्रीत कर जैसे निसि औ चन्द्। चन्दा बिन निसि फीकरी निसि बिन चन्दो मन्द।।
और एकबार यदि ऐसा प्रेम मिल भी जाए तो उसे संभालकर रखना भी तो आना ही चाहिए।
" रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।"
कितना भी हम तौलें परखें, यह तो मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर की तरह प्रेम आज भी जिन्दा है। शाश्वत है। सार्वभौमिक है। तभी तो हजार उत्तेजक खबरों के धमाकों के बीच बैठे हम आप आज भी इसकी बातें कर रहे हैं। इसमें रुचि ले रहे हैं। इसके बारे में लिख-पढ़ रहे हैं।
हर युग में नई पीढी इसे अपने एक नये ढंग से महसूस करेगी और पाएगी। वक्त के साथ प्रेमियों के नए-नए स्वरूप और नए-नए प्रतिमान उभरकर आयेंगे... प्रतिमान जो प्यार और त्याग की उद्दाम ऊंचाइयों को छूते रहे हैं, छूते रहेंगे। क्योंकि प्रेम का वास्ता आज भी मन से ज्यादा, बुद्धि से कम है। आजभी प्रेम ही इस सृष्टि का आधार है। यह वही खुशबू और रंग है जिसे जीवन की धूप और हवा उड़ाती भी है और बढ़ाती भी है। इसी दुरुह पर असंभव नहीं, प्रेम-भाव का उत्सव मनाने का प्रयास किया है लेखनी के इस वर्षान्त के अंक ने।
इन्द्रधनुषी इस अहसास की सतरंगी परछांई को संजोने का एक लघु प्रयास है यह; किस रंग ने आपको छुआ, रचा और समेटा , बांटेंगे तो अच्छा लगेगा!...
-शैल अग्रवाल
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"नैनन अंतर आव तू, नयन झाँप तोहि लेऊँ
ना में देखूँ और कूँ, ना तोहे देखन देऊँ।।"
सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।
दुर्योधन को मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर पाई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।
जूठे फल सबरी के खाये, बहु बिधि प्रेम लगाई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।
प्रेम के बस नृप सेवा कीन्ही, आप बने हरि नाई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई।
राजसुय यज्ञ युधिष्ठिर कीनो, तामै जूठा उठाई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई ।
प्रेम के बस अर्जुन रथ हाँख्यो, भूल गये ठकुराई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई।
ऐसी प्रीति बढी वृन्दावन, गोपिन नाच नचाई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई।
सूर क्रूर इस लायक नाही, कह लग करउ बढाई ॥ सबसे ऊँची प्रेम सगाई।
-सूरदास

कागा सब तन खाइयो, मेरा चुनचुन खाइयो मांस।
दो नैना मत खाइहो मोहे पिया मिलन की आस।।
नी मैं जाना जाना जाना, जाना जोगी दे नाल नी
राँझा राँझा कर दी नी मैं आपै राँझा होई।
राँझा मैं विच मैं राँझा विच होर खयाल न कोई।। नी मैं जाना जाना जाना, जाना जोगी दे नाल नी
-कैलासा

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई छांड़ी दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई मोती मूंगे उतार बनमाला पोई अंसुवन जल सीचि सीचि प्रेम बेलि बोई अब तो बेल फैल गई आंनद फल होई दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही
-मीराबाई

एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब मांझी की रुसवाई भी
दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आइने में
मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी
खामोशी का हासिल भी इक लंबी खामोशी है
उनकी बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी
-गुलजार

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते
जिसकी आवाज में सिल्वट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते
शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिए दिल नहीं तोड़ा करते
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी ऱुख नहीं मोड़ा करते
-गुलजार
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कहत, नटत, रीझत, खीजत, मिलत, खिलत, लजात।
भरी भंवन बिच करत है नयनन ही सों बात।।
-बिहारी

डॉ. सुभाषिनी आर्या
भारतीय चित्रकारी में अष्ट नायिका
भारतीय कला में नायिका शब्द का प्रयोग शाब्दिक अर्थ, यानी अंग्रेजी के ' हीरोइन' शब्द या वीरांगना के रूप में नहीं हुआ है, बल्कि एक प्रेमिका या प्रेमरत नारी के रूप में उसे देखा गया है। अधिसंख्य भारतीय लघुचित्रों (मिनिएचर्स) और भित्ति चित्रों में नारी का यह रूप मध्यवर्ती स्थान प्राप्त किए हुए है। इनमें से अधिकतर चित्रकारी 17 शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल तक की है। ये चित्रकारियां उत्तर भारत, मुख्य रूप से मालवा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू, बासोहली, और गढ़वाल से मिली है।
' नायिका' की परिकल्पना संस्कृत साहित्य, विशेषकर भरतमुनि की देन है, जो नाट्यशास्त्र के रचयिता और भारतीय शास्त्रीय नृत्य और नाटक को अनुशाषित करने वाले सिद्धान्तों के प्रतिपालक थे। भरत ने पुरुष और महिलाओँ का वर्गीकरण किया, जिन्हें नायक और नायिका, यानी क्रमशः प्रेमी और प्रेमिका कहा गया। यह वर्गीकरण उनकी शारीरिक और मानसिक विशेषताओं, गुणों, मनोदशाओं, स्वभाव और भावात्मक अवस्थाओं और स्थितियों के अनुसार किया गया। इसके अंतर्गत नारी के मनोभावों का और उसके प्रेम क विभिन्न चरणों का वर्गीकरण बड़े उत्साह और सूक्ष्मता से किया है। वास्तव में, प्रणय के दौरान पुरुष और नारी की मनोदशाओं का विश्लेषण और वर्गीकरण करने की साहित्यिक परम्परा की आधारशिला भरत ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ रखी और उनके परवर्तियों ने उसे सुपरिभाषित आलंकारिक रूप में आगे बढ़ाया। भरत ने जहां नायक के चौदह भेद किए हैं-प्रेमी और परमप्रिय, सौम्य, निरंकुश, स्वत्वबोधक, जोशपूर्ण, प्रीतिकर, भावप्रवण, बदमाश, दुष्ट, मिथ्यावादी, जिद्दी, शेखीबाज, बेशरम और क्रूर, वहीं नायिका को आठ श्रेणइयों में ही रखा और नाट्यशास्त्रीय एवं श्रंगारिक साहित्य में उसे नायक की तुलना में काफी स्थान दिया। इसी वर्गीकरण को उनके परवर्ती रचनाकारों ने जारी रखा, जैसा वात्सायन के 'कामसूत्र', 'साहित्य दर्पण', बिहारी की 'सतसई', जसवंत सिंह की ' भाषा भूषण', भानुदत्त की 'रसमंजरी' और केशवदास की 'रसिक प्रिया' और 'कविप्रिया' में इसी वर्गीकरण का अनुसरण किया गया। इनमें रसिक प्रिया देशी भाषा साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण रचना है और इसके अनेक छन्दों को राजस्थानी और पहाड़ी लघुचित्रों में दर्शाया गया है। यह पुष्तक संस्कृत और हिन्दी में प्रेम-काव्य की सदियों पुरानी उस परंपरा पर प्रकाश डालती है जो कालीदास की कृतियों, खासकर 'ऋतुसंहार', 'मेघदूतम्' और 'कुमारसंभव' में अपनी पराकाष्ठा पर थी। 'ऋतुसंहार' में, ऋतुओं के सजीव वर्णन के अलावा उन मनोभावों का भी भावपूर्ण वर्णन किया गया है जो बदलती ऋतुओं के साथ प्रेमी हृदयों में पैदा होते हैं। चांद का प्रकट होना उन स्त्रियों के दिल में प्रेम का स्फुरण करता है जो अपने प्रेमियों की बाट जोहती हैं। आम का विकसित होना उस प्रेमी को दुःखी करता है जो अपने घर से दूर है और वह अपनी प्रेमिका की याद में आँसू बहाता है। बादलों को घिरते देख मोर खुशी से नाचने लगता है और क्रीड़ारत लोगों का आमोद प्रमोद बढ़ जाता है। ' कुमार संभव' में, वसंत के सौंदर्य और विवाहित जीवन के प्रेम की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति हुई है।
जयदेव के ' गीत गोविन्द' में कृष्ण नाटकीय हीरो, यानी नायक हैं, और वह श्रंगार भावना का प्रतीक है, जबकि राधा नाटकीय हीरोइन, यानी नायिका है और उसकी पहचान प्रेम से होती है। वह नायक के साथ अंतर-संबंद्धता की सात शैलीगत मनोदशाओं में चित्रित की गई है, जिनकी पहचान भारतीय नाट्य सिद्धान्तों में की गई है। जयदेव ने अपनी रचना में तकनीकी नाम या उसके चारित्रिक संकेत या प्रतीक के साथ प्रत्येक अवस्था की पहचान की है।
भानुदत्त की रसमंजरी में पहली बार नायिका की विभिन्न नित परिवर्तित मनोदशाओं के बारे में प्रकाश डाला गया है। भानुदत्त बिहार में तिरुहत से सम्बद्ध थे और उनका काल 15 वीं सदी के अन्त में माना गया है।रसमंजरी के अंतिम छंद में भानुदत्त ने उल्लेख किया है कि वे कवि गणेश्वर के पुत्र थे। भानुदत्त ने जिन स्थितियों का चित्रण किया उनमें सर्वाधिक दिलचस्प स्थितियां वे हैं जिनमें नायक अपनी प्रेमपात्र पत्नी के साथ, अन्य लोगों की ईर्ष्या का पात्र बने बिना, प्रेम करने की कोशिश करता है। इस कृति के आधार पर बनाए गए चित्रों के कई समूह बासोहली चित्रकारी केन्द्र में उपलब्ध हैं, जो सत्रहवीं सदी से सम्बद्ध है।
बिहारी द्वारा रचित सतसई में सात सौ दोहे हैं, जिनमें नायिका-भेद को उत्कृष्ट ढंग से पेश किया गया है। इन सभी कृतियों में श्रंगार रस पर जोर दिया गया है, जिसका आंतरिक संबंध प्रेम में एकात्मकता के साथ है। भारतीय चित्रकारी के विभिन्न घरानों जैसे मुगल, राजस्थानी, पहाड़ी, मालवा, दक्कनी और कई अन्य जो 17वीं सदी से 20वीं सदी तक सक्रिय थे, पर कृ,ण सम्प्रदाय की लोकप्रियता का गहरा प्रभाव पड़ा था, जिसने 12वीं से 16वीं सदी तक एक स्वच्छंद रहस्यवादी साहित्यधारा को प्रेरित किया।
नायिका-भेद विषय को और भी व्यापक रूप दिया केशवदास(1520-1601) ने, जो ओरछा नरेश मधुकर शाह के दरबारी कवि थे। उनकी रसिकप्रया छन्दों में संगीतमय शैली में लिखा गया हिन्दी का एक तरह का शोध-प्रबन्ध है जिसमें आलंकारिक और साहित्यिक विश्लेषण किया गया है। इसका समुचित काव्य शास्त्रीय महत्व है। इसका विषय प्रेम है , जिसमें अरक्तक (सूक्ष्म या भावुक) प्रेम नहीं है बल्कि पूर्ण शारीरिक प्रेम का चित्रण है। केशव के नायक और नायिका कृष्ण और राधा हैं। आदर्श प्रेमियों और स्थितियों का वर्णन करते हुए उसमें भगवान और भगत का संबन्ध आरोपित किया गया है।
आयु अनुभव, शारीरिक और मानसिक स्थितियों, मनोदशाओं और संवेगों के आधार पर नारी के वर्गीकरण से चित्रकार को विभिन्न विषय मिल गए हैं। रसिकप्रिया में नायिका के आठ प्रकारों का उल्लेख किया गया है--स्वाधीनपतिका, उत्का या उत्कंठिका, वासकसैया, अभिसंधिता, खंडिता, प्रोसिताप्रेयसी, विप्रलब्धा और अभिसारिका।
स्वाधीनपातिका वह नायिका है, जिसका सतीत्व अपने प्रेमी के प्रति समर्पित हो और जिसे उसका पति प्रेम करने के लिए बाध्य हो और निरंतर उसका साथ दे। चित्रकारी में उसे राधा के रूप में दर्शाया गया है जो चौकी (स्टूल) पर बैठी है जबकि कृष्ण उसके पैर धोते या दबाते हैं। उन्हें राधा के चरणों में महावर लगाते हुए भी दिखाया गया है। नायिका गर्व और स्वाभिमान के साथ कृष्ण की ओर देखती है जो उसके प्रति पूर्ण वशीभूत या विनीत दर्शाया गया है।
उत्का एक चिंतित या बेचैन नायिका है जिसका प्रेमी वायदे के अनुसार मिलन स्थल पर पहुंचने में विफल रहा है। उसका शरीर चंदन की तरह सफेद, उसकी दीप्ति दिए के समान और परिधान कोमल, सुकुमार अंगों के चारो ओर अस्त-व्यस्त हैं। पशु-पक्षिओं की हल्की सी आहट से वह चौंक पड़ती है। वह मृदुभाषी है और अपनी अंतरंग सखी से मनोभाव छिपाती है क्योंकि उसके चौंकने से सखी को कुछ आभास होता है। इस नायिका को चित्रों में शयनकक्ष के द्वार पर बैठे या खड़े हुए, प्रसन्न किंतु प्रेमी के आगमन की प्रत्याशा में चिंतित दर्शाया गया है। कुछ चित्रों में परिवार में नायक के स्वागत की व्यापक तैयारियां चित्रित की गयी हैं-एक महिला आंगण बुहारती है, दूसरी पात्र से पानी उड़ेलती है और शयनकक्ष को सुव्यवस्थित किया जा रहा है। प्रेमी नदी के दूसरी ओर नौका में बैठा है, सारस के एक जोड़े के करीब।
वासकसैया नायिका अपने प्रेमी से एकात्म होने के लिए उसका इन्तजार कर रही है। उसे चमेली के फूलों के साथ नदी के किनारे पेड़ के नीचे बैठा दिखाया गया है। उसने पेड़ के तने को मालाओं से सजा रखा है। भारी, घने बादलों के बीच बिजली चमकती है। कभी-कभी मिलन-स्थल के निकट हरिण दर्शाए गए हैं, जो हवा में सुगंध ले रहे होते हैं या कमल के तालाब से पानी पी रहे होते हैं।
अभिसंधिता ऐसी नायिका है जो अपने प्रेमी की अनुरक्ति की अवमानना करती है, किंतु उसकी अनुपस्थिति में पश्चाताप से ग्रस्त है, और इससे उसे अलगाव की पीड़ा सालती रहती है। चित्रकारी में प्रेमियों को झगड़ते हुए दर्शाया गया है। कृष्ण पीली धोती में, मोर पंख और मुकुट पहने रवाना होने की स्थिति में हैं। राधा के चेहरे पर घना रोष और उदासी का भाव है। कृष्ण उसका रोष शान्त करते दिखते हैं, राधा अपने रोष के कारण द्रवित नहीं होती और उसे अस्वीकार कर भगा देती है। किंतु जैसे ही कृष्ण जाने को उद्धत होते हैं, तो वह अपनी निष्ठुरता के कारण अनुताप से भर उठती है।
खंडिता ऐसी प्रेमिका है जिसका प्रेमी रात के समय मिलने का वायदा नहीं निभा पाया, किंतु किसी अन्य महिला के रात बिताकर अगली सुबह घर लौटा है। नायिका प्रेमी की भत्स्रना करती है। चित्रों में खंडिता नायिका को क्रुद्ध और आवेशित प्रेमिका के रूप में दर्शाया गया है जो अपने नायक को उलाहने दे रही है और नायक लज्जित और दोषित चेहरे के साथ उसके आंगण में प्रवेश करता है।
प्रोसिताप्रेयसी ऐसी नायिका है जिसका पति व्यापार के कारण कुछ समय से घर से बाहर गया हुआ है। एक चित्र में उसे बादलों की गरज सुनने के लिए बालकनी से बाहर आते दिखाया गया है। उसने दुपट्टा ओढ़ रखा है और वह उड़ते हुए सारस की जोड़ी को बड़ी उत्सु |