कीर्ति-स्तंभ

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जयशंकर प्रसाद

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(30-1-1889-to-14-1-1937)

वाराणसी-उत्तर प्रदेश।

भारतीय हिन्दी साहित्य में जयशंकर प्रसाद अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। श्रेष्ठ कवि और श्रेष्ठ नाटककार होने के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार भी थे। इनके पांच कहानी संग्रहों में सत्तर कहानियां प्रकाशित हुईं। कोमल और सूक्ष्म भावनाओं की पकड़ प्रसाद की अनोखी थी और क्षमा, शान्ति, धैर्य, अक्रोध, आत्म-संयम, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, सत्य सदाचार, जातीय सम्मान, राष्ट्र-रक्षा आतिथ्य त्याग, दानशीलता, परोपकार, आज्ञापालिता आदि गुणों से भरपूर इनकी कहानियों को अगर हम भारतीय संस्कृति की मूल धारा की अभिव्यक्ति कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

कहानी-घीसू--(लेखनी-मई-2007)

 

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जैनेन्द्र कुमार

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स्मृति-शेष

संस्मरण लेख (प्रेमचन्द) - एक शांत नास्तिक संत-(लेखनी-अंक11-जनवरी 2008)

 

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धनपत राय 'प्रेमचन्द'

31-7-1880 to 8-10-1936

जन्मः पाण्डेपुर (जिला वाराणसी)

कहानी सम्राट प्रेमचन्द का साहित्य में विशिष्ट स्थान है। आजीवन विषम आर्थिक कठिनाओं से जूझते प्रेमचन्द ने मानो कभी जीवन से हार ही नहीं मानी थी। विचारों से प्रगतिशील, मानव संवेदनाओं से भरपूर और देशभक्त प्रेमचन्द यथार्थ के हिमायती थे। राजारानी की कहानियों के देश में उन्होंने आम आदमी की कहानी लिखी वह भी बिना किसी लाग-लगाव के। कहानी हों या उपन्यास, सुगढ़ शिल्पी की तरह एक ऐसा अप्रतिम साहित्य सृजन किया जो आज भी अविस्मरणीय है।  इनकी सभी कृतियां कालजयी हैं और कथ्य आज के संदर्भ में भी उतने ही खरे हैं, जैसे कि तब थे, जब इन्हें लिखा गया था। उपन्यास ही नहीं, कोई भी कहानी भी ऐसी नहीं जो हृदय में पैठकर विचारों को मथे न और समाज की कुरीतियों मनव मन की जटिलता के बारे में सोचने के लिए विवश न करे। 

कहानी-बूढ़ी काकी (लेखनी-अँक-5-जुलाई-2007)

हिंसा परमो धर्मः ( लेखनी-अँक-8-अक्टूबर-2007)

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यशपाल

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3-12-1903-26-12-1976

फ़िरोज़पुर छावनी पंजाब में जन्मे यशपाल का नाम प्रेमचंद के बाद के हिंदी कहानीकारों में अग्रणीय है। स्वतंत्रता-सेनानी और क्रान्तिकारी, विद्यार्थी जीवन से ही भारतीय क्रान्तिकारी दल के सक्रिय सदस्य। वर्षों विप्लव नामक पत्र का सम्पादन और संचालन। देशप्रेम और लेखन की दोहरी राह पर चले यशपाल ने समाज की खोखली मान्यताओं और नैतिकताओं पर अपनी रचनाओं में करारी चोट की है। इनकी रचनाओं में शोषित समाज के प्रति आत्मीयता के साथ-साथ परिस्थितियों के बेहतर बदलाव की चाह है और पात्र प्रायः प्रगतिशील परन्तु संवेदनशील हैं। कई रचनाओं का देश विदेश की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद और मेरी तेरी उसकी बात के लिए साहित्य अकादमी पुरष्कार।    

कृतियां
उपन्यास-दिव्या, देशद्रोही, झूठा सच, दादा कामरेड, अनीता, मनुष्य के रूप, तेरी मेरी उसकी बात।

कहानी संग्रह-पिंजरे की उड़ान, फूलों का कुर्ता, धर्मयुद्ध, सच बोलने की भूल, भस्मावृत चिंगारी।

व्यंग्य संग्रह-चक्कर क्लब

 

कहानी-करवा का व्रत (लेखनी-नवंबर-2007) 

 

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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

7-3-19911-1987

 कुशीनगर देवरिया में जन्मे अज्ञेय का अपनी मौलिक व प्रगतिशील सोच और संवेदनशील शैली की वजह से साहित्य में अनूठा स्थान है। एक गहरी और विचारोत्तेजक सोच के बाबजूद भी अज्ञेय जी की भाषा बहुत ही सहज थी और मन को छूती थी। 

 कुछ प्रमुख कृतियां---हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार।

कितनी नावों में कितनी बार- नामक काव्य संग्रह के लिए 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित। आंगन के पार द्वार- के लिए 1964 का साहित्य अकादमी पुरस्कार।

 

लेख-पतझर का एक पात (लेखनी-नवंबर-2007)

 

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शरद जोशी

21 -5-1931-to- 5-9-1991.

जन्मः21 मई 1931 उज्जैन मध्यप्रदेश

मृत्यु 5 सितम्बर 1991.

शिक्षा होल्कर कॉलेज इन्दौर से स्नातक

हरिशंकर परसाई के साथ आज भी व्यंग दुनिया के चंद अति प्रिय व चर्चित हस्ताक्षर। 

व्यंग्य-छाता हाथ में लेकर (लेखनी-अंक 5-जुलाई-2007)

 

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शरद चन्द चटोपाध्याय

15-9-1876 -16-1-1938 

देवनन्दपुर, हुगली, कलकत्ता

कहानियां हों या उपन्यास, शरदचन्द मानवीय संवेदनाओं के अद्बुत चितेरे हैं। अपनी पैनी कलम से संवेदनाओं को शब्दों में उकेरकर वे बहुत ही सहजता से पाठक के हृदय में पैठ जाते हैं। उनके देवदास, श्रीकांत, आदि आजभी बेहद ही लोकप्रिय व साहित्य के धाती उपन्यास हैं। बंगाली जन-जीवन का बेहद सजीव व संवेदनशाल मनोवैज्ञानिक चित्रण, और समाज की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उनकी लेखनी की विशेषता रही है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद वह बंगाल के आज भी सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं। 

अनुपमा का प्रेम ( लेखनी-अंक-1-मार्च-2007)

 

 

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हजारी प्रसाद द्विवेदी 

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19-8-1907-19-5-1979

 

१९३० में ज्योतिष विषय लेकर शास्राचार्य की उपाधि पाई।

८ नवंबर, १९३० को हिन्दी शिक्षक के रुप में शांतिनिकेतन में कार्यरंभ। वहीं अध्यापन १९३० से १९५० तक। अभिनव भारती ग्रंथमाला का संपादन, कलकत्ता १९४०-४६। विश्वभारती पत्रिका का संपादन, १९४१-४७। हिंदी भवन, विश्वभारती, के संचालक १९४५-५०। लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्मानार्थ डॉक्टर आॅफ लिट्रेचर की उपाधि, १९४९। सन् १९५० में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर और हिंदी विभागध्यक्ष के पद पर नियुक्ति। विश्वभारती विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव कांउसिल के सदस्य, १९५०-५३। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष, १९५२-५३। साहित्य अकादमी दिल्ली की साधारण सभा और प्रबंध-समिति के सदस्य। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, के हस्तलेखों की खोज (१९५२) तथा साहित्य अकादमी से प्रकाशित नेशनल बिब्लियोग्रैफी (१९५४) के निरिक्षक। राजभाषा आयोग के राष्ट्रपति-मनोनीत सदस्य, १९५५ ई.। सन् १९५७ में राष्ट्रपति द्वारा पद्मभूषण उपाधि से सम्मानित। १९६०-६७ के दोरान, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, में हिंदी प्रोफेसर और विभागध्यक्ष। सन् १९६२ में पश्चिम बंग साहित्य अकादमी द्वारा टैगोर पुरस्कार। १९६७ के बाद पुन: काशी हिंदू विश्वविद्यालय में, जहाँ कुछ समय तक रैक्टर के पद पर भी रहे। १९७३ साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत। जीवन के अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष रहे।

 

आपका हिन्दी निबंध और आलोचनाक्मक क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान व योगदान है। हिन्दी संस्कृत और बांगला के विद्वान द्विवेदी जी की सभी रचनाओं में उनके मौलिक चिंतन व गहन ज्ञान की छाप है। भारतीय संस्कृति और धर्म में इनकी गहन रुचि थी और इन्होंने सूर, कबीर, और तुलसी पर गहन और सारगर्भित आलचना की हैं। द्विवेदी जी का निबंध-साहित्य हिन्दी की अनमोल धरो हर है।  

लेखः आलोक पर्व की ज्योतिर्मय देवी (लेखनी-अंक-9-2007)  

 

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