रागरंग (तीज-त्योहार) 

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शैल अग्रवाल

फागb_mholi3.jpg (होली)

 

वर्ष भर प्रकृति मंच तैयार करती है तब कहीं जाकर वसंत ऋतु अपने ही मोहक और अनूठे अंदाज में आ पाती है। प्रकृति और पुरुष, दोनों ही को पूरी तरह से लुभाती- रिझाती। ठंडी सिहरती हवा और गुलाबी गुनगुनी धूप। खेतों पर दूर तक फैली पीली सरसों की चादर और खिले-अधखिले रंग-बिरंगे फूलों से लंदी फंदी डालियां और.क्यारियां, वह भी साफ-सुथरे, चमकते नीले आकाश के नीचे...पूरी ही पृथ्वी एक आकर्षक तस्बीर सी सज उठती है...कुशल नृत्यांगना सी थिरकती और लरजती।...नाजुक कोपलें मन्द-मन्द हवा पर झूमती, मानो अपने ही रूप-रंग पर शरमा-शरमाकर इतरा रही हों। सिहरती पत्तियां और चटकती कलियां... सुर और लय के साथ ताल में थिरकती। धरती जाने कैसे दिव्य घुँघरू बांध चुकी होती है कि दादुर मोर पपीहे सभी वाहवाह कर उठते हैं। नन्हे नवजात पक्षियों का कलरव, एक नया उत्साह, नया संगीत देता हुआ सुरभित हवाओं में गूंजने लग जाता है। ताजा हवा के ये झोंके जब खुशबूओं के मस्त कलीन पर सवार हो कर बगल से गुजरते हैं तो उदास से उदास मन पंक्षियों की तरह खुले आकाश में विचरने लग जाता है,  लाचार और कमजोर पंख तक अपनी ताकत तौलने लग जाते हैं। शायद इसीलिए तो बसंत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है...सृजन और उल्लास की ऋतु माना जाता है। महकती-लहकती इस ऋतु को प्राचीन काल से ही भारत में एक उत्सव नहीं, महोत्सव की तरह मनाया जाता है। गीत-संगीत और भरपूर राग-रंग के साथ। भारत ही नहीं विश्व के कई विभिन्न भागों में भी थोड़े बहुत फर्क के साथ इस ऋतु का उत्सव मनाया जाता है। बड़ी सख्या में एकत्रित होकर लोग एक दूसरे को रंगों और खुशबुओं में भिंगोते-डुबोते हैं और आनन्द मनाते हैं। फ्रान्स, इटली आदि के साथ यूरोप और दक्षिणी अमेरिका के कुछ देशों में 'मार्डीग्रास' नामका एक उत्सव मनाया जाता है, जिसमें युवक, युवती कई-कई टन टमाटरों से एक दूसरे को रंग देते हैं और हंसी खुशी के माहौल में तरह तरह की झांकियों और नाच-गाने के साथ कार्निवाल के रूप में पूरा दिन गुजार दिया जाता हैं।    

हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी कई-कई नाम मिलते हैं इस पर्व के; होलाका, फागुनोत्सव, चैत्रोत्सव, फागु मधुत्सव, कामोत्सव, मदनोत्सव, काममहोत्सव, सिरापंचमी, यात्रामहोत्सव, मदनद्वादशी, मदनत्रयोदशी, अनंगोत्सव आदि। यदि हम इन नामों पर गौर करें तो पता चल जाएगा कि इस उत्सव की रूपरेखा क्या थी और भारत के विभिन्न भागों में आज भी है।

 

माघ की शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी) से आरंभ यह उत्सव अब भी कई-कई जगह होली तक मनाया जाता है। उत्तर भारत में आजभी बसंत पंचमी के दिन से ही होली आरंभ हो जाती है। सुबह सरस्वती पूजन और शाम को गुलाल उड़ाकर इसी दिन से होली की शुरुआत आज भी कई जगह एक प्रचलित प्रथा है और वह भी रात को मिलबैठकर होली और धमार गाते हुए लोगबाग एकदूसरे को गुलाल लगाते हैं। होली का नाम लेते ही ब्रज की होली सबसे पहले ध्यान में आती है जो भारत में ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यूँ तो राजस्थान में हाथियों की पीठपर बैठकर खेली गयी होली भी प्रसिद्ध हो चुकी है और बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी इसे देखने और हिस्सा लेने आते हैं। परन्तु ब्रज ,जो 'कान्हा बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ ‘फाग खेलन आए हैं नटवर नंद किशोरऔर उड़त गुलाल लाल भए बदराजैसे गीतों की मस्ती से झूम उठता है, में आज भी यही कहा जाता है कि- सब जग होरी, जा बृज होरा।

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ब्रज की लठ्ठमार होली ही नहीं, कोमल फूलों से राधाकृष्ण का नयनाभिराम श्रंगार भी दर्शनीय है जिससे ब्रज के हर मन्दिर का कोना-कोना सज और महक उठता है।  मन्दिरों में एक से एक सुन्दर फूलों के श्रंगार होते  हैं और होली के गीत-संगीत के साथसाथ कई जगहों पर फूल डोल के मेले भी लगाए जाते हैं। यहाँ आज भी रंगों के साथ साथ मुख्यतः फूलों से ही होली खेलने का रिवाज है, जिसमें टेसू और गुलाब के साथसाथ, केतकी, चम्पा, बेला और चमेली  का प्रयोग  अधिक किया जाता   है। फूल...जिनकी महक मन को और रंग त्वचा को निखारने और कोमल करने में मदद करते हैं। इस दौरान ब्रज में होली और रसिया जैसे मीठी छेड़छाड़ वाले गानों की ही नहीं, धुलंडी से लेकर कृष्ण दशमी तक जगह जगह चरकुला नृत्य, ङुक्का नृत्य, बेब नृत्य, तख्त नृत्य, चोचर नृत्य एवं झूला आदि मनोहारी नृत्य भी देखे जा सकते हैं।...   ब्रज की बरसाने और दाऊ जी की होली देखने आजभी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और मन्दिर के परिसर के कोने कोने से गूंजती आवाज में उनकी भी  मस्ती में डूबी आवाज गूंजने लग जाती  हैं ---' आज बिरज में होरी है रसिया/ होरी है रसिया, बरजोरी है रसिया।' 

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