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भव्य-भारती

लक्ष्य से जीत तक
-कवि कुलवंत सिंह
जीवन अनमोल है। आधुनिक युग में हर व्यक्ति बेहतर भविष्य, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं अच्छे जीवन के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है। आपको भी यदि सफल होना है; जीवन में कुछ पाना है; महान बनना है; तो निम्न बातों को जीवन में अपना लीजिए ।
1. लक्ष्य निर्धारण - सर्व प्रथम हमें अपने जीवन में लक्ष्य का निर्धारण करना है। एक लक्ष्य - बिलकुल
निशाना साध कर। अजनु की चिड़िया की आँख की तरह। स्वामी विवेकानंद ने कहा था - जीवन में
एक ही लक्ष्य साधो और दिन-रात उसी लक्ष्य के बारे में सोचो । स्वप्न में भी तुम्हें वह लक्ष्य दिखाई
देना चाहिए । और फिर जुट जाओ, उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए - धुन सवार हो जानी चाहिए
आपको । सफलता अवश्य आपके कदम चूमेगी । लेकिन एकबात का हमें ध्यान रखना है। हमारे
लक्ष्य एवं कार्य के पीछे शुभ उद्देश्य होना चाहिए। पोप ने कहा था - शुभ कार्य के बना हासिल
किया गया ज्ञान पाप हो जाता है। जैसे परमाणु ज्ञन - ऊर्जा के रूप में समाज के लिए लाभकार है
तो वही बम के रूप में विनाशकारी भी ।
2. कर्म - लक्ष्य निर्धारण के बाद आता है कर्म । गीता का सार है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
कदाचन । कम में जुट जाओ। उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, जो आपने चुना है। हर पल । बिना कोई
वक्त खोए। गांधी जी ने कहा था - अपने काम खदु करो, कभी दूसूरों से मत करवाओ। गांधी जी खदु
भी अपने सभी कार्य खदु करते थे। दसूरी बात जो गांधी जी ने कही थी - जो भी कार्य करो, विश्वास
और आस्था के साथ, नहीं तो बिना धरातल के रसातल में डूब जाओगे। यह अति आवश्यक है कि
हम अपने आप पर विश्वास और आस्था रखें , यदि हमें अपने आप पर ही विश्वास नहीं है तो हमारे
कार्य किस प्रकार सफल होंगे? जरूरी है- अपने आप पर मान करना, स्वाभिमान रखना । विश्वास
और लगन के साथ जुटे रहना । हमारे कार्य से हमेशा एक संदेश मिलना चाहिए । नेहरू जी से
एकबार एक राजदतू , एक सैनिक एवं एक नवयुवक मिलने आए । तो नेहरू जी ने सबसे
पहले नवयुवकों को मिलने के लिए बुलाया, फिर सैनिक को एवं सबसे बाद में विदेशी राजदतू को ।
बाद में सचिव के पूछने पर बताया कि नवयुवक हमारे देश के कर्णधार हैं , सैनिक देश के रक्षक;
उनको सही संदेश मिलना चाहिए । बिना बोले हमारे काम से समाज को संदेश मिलना चाहिए ।
3. अवसर - हर अवसर का उपयोग कीजिए। कोई भी मौका हाथ से न जाने दीजिए । स्वेट मार्टेन ने
कहा था - अवसर छोटे बड़े नहीं होते; छोटे-से-छोटे अवसर का उपयोग करना चाहिए। चैपिन ने तो
यहां तक कहा कि जो अवसर कि राह देखते हैं , साधारण मनुष्य होते हैं ; असाधारण मनुष्य तो
अवसर पैदा कर लेते हैं । कई लोग छॊटे-छॊटे अवसर यूं ही खॊ देते हैं कि कोई बड़ा मौका हाथ में
आएगा, तब देखेंगे। यह मूर्खता की निशानी है।
4. आशा / निराशा - आप काम करेंगे तो जरूरी नहीं कि सफलता मिल ही जाए। लेकिन आपको
घबराना नहीं है। अगर बार बार भी हताशा हाथ आती है, तो भी आपको निराश नहीं होना है।
मार्टन ने ही कहा था - सफलता आत्मविश्वास की कुंजी है। ग्रेविल ने कहा था - निराशा मस्तिष्क के
के लिए पक्षाघात (Paralysis) के समान है| कभी निराशा को अपने पर हावी मत होने दो ।
विवेकानंद ने कहा था - 1000 बार प्रयत्न करने के बाद यदि आप हार कर गिर पड़े हैं तो एकबार
फिर से उठो और प्रयत्न करो । अब्राहम लिंकन तो 100 में से 99 बार असफल रहे। जिस कार्य को भी
हाथ में लेते असफलता ही हाथ लगती । लेकिन सतत प्रयत्नशील रहे। और अमेरिका के राष्ट्रपति
पद तक जा पँहुचे। कुरान में भी लिखा है- मुसीबत टूट पड़े, हाल बेहाल हो जाए, तब भी जो लोग
निश्चय से नहीं डिगते, धीरज रखकर चलते रहते है, वे ही लक्ष्य तक पहुँचते है।
5. आलस्य - आलस्य को कभी अपने ऊपर हावी मत होने दो । कबीर की यह पंक्तियां तो हम सभी
के मुंह पर रहती हैं - काल करे सो आजकर ।और यह मत सोचो कि आपका काम कोई दूसरा कर
देगा । राबट कैलियर ने कहा था - मनुष्य के सर्वोत्तम मित्र उसके दो हाथ हैं । अपने इन हाथ पर
भरोसा रखो एवं सतत प्रयत्नशील रहो ।
6. निंदा/ बुराई - जब हमने लक्ष्य ठान लिया है, काम कर रहे हैं, अवसर का उपयोग कर रहे हैं ,
निराशा से बच रहे हैं , सतत आगे बढ़ रहे हैं तो राह में हमें कई प्रकार के लोग मिलते हैं । हमारे
विचार , दृष्टिकोण, लक्ष्य परष्पर टकराते हैं । लेकिन हमें एक चीज से बचना है। दूसरे की बुराई से,
उनकी निंदा से। रिचड निक्सन ने कहा था - निंदा से तीन हत्याएं होती हैं ; करने वाले की , सुनने
वाले की और जिसकी निंदा की जा रही है। स्विफ्ट ने कहा था - आदमी को बदमाशियां करते देखकर मुझे हैरानी नहीं होती है, उसे शर्मिंदा न देखकर मुझे हैरानी होती है। इसिलए आवश्यक है कि
हम अपनी गलितयों को सहर्ष कबूलें। हम इंसान हैं , हमसे गलितयां भी होंगी। लेकिन गलती को
मान लेना सबसे बड़ा बड़प्पन है।और इन गलितयों से सीख लेते हुए हमें आगे बढ़ना है।
7. परोपकार - हमारे लक्ष्य, हमारे कर्मों में कहीं-न-कहीं परोपकार की भावना अवश्य होनी चाहिए।
चाहे वह हमारे समाज, जाति, देश, धर्म , परिवार, गरीबों के लिए हो । परोपकार की भावना जितने
बड़े तबके के लिए होगी आप उतने ही महानतम श्रेणी में गिने जाएंगे। गांधी जी ने कहा था - जिस
देश में आप जन्म लेते हैं, उसके खुश हो कर सेवा करनी चाहिए। तुलसीदास जी ने कहा है-
पर हित सरस धरम नहिं भाई । नेहजी ने भी कहा था - कार्य महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण
होता है - उद्देश्य; हमारे उद्देश्य एवं कर्म के पीछे परोपकार की भावना निहित होनी चाहिए।
8. जीत - आपने लक्ष्य ठाना; काम कर रहे हैं; अवसर का उपयोग कर रहे हैं; निराशा, आलस्य और
निंदा से बच रहे हैं ; परोपकार की भावना से निहित हैं । बस एक ही चीज अब बचती है। जीत ।
जीत निश्चित ही आप की है। ऋगवेद में भी लिखा है- जो व्यक्ति कर्म करते हैं , लक्ष्मी स्वयं उनके
पास आती है, जैसे सागर में नदियां।
जो इन सब पर चलते हैं, असाध्य कार्य भी संभव हो जाते हैं । दो उदाहरण देना चाहता हूँ-
1. एक गुरु ने अपने शिष्य को बांस की टोकरियां दीं और कहा कि इनमें पानी भर कर लाओ। सभी
शिष्य हैरान थे, यह कैसा असंभव कार्य गुरुजी ने दे दिया। सब तालाब के पास गए। किसी ने एक
बार, किसी ने दो बार और किसी ने दस-बीस बार प्रयत्न किया । कुछने तो प्रयत्न ही नहीं किया।
क्योंकि पानी टोकरी में डालते ही निकल कर बह जाता था। लेकिन एक शिष्य को गुरू पर बहुत
आस्था थी, वह सुबह से शाम तक लगातार लगा रहा। प्रयत्न करता रहा। शाम होते-होते धीरे-धीरे
बांस की लकड़ी फूलने लगी और टोकर में छिद्र छोटे होते गए और धीरे-धीरे बंद हो गए। इस तरह
टोकर में पानी भरना संभव हो सका।
2. 1940 के ओलंपिक खेल में शूटिंग के लिए सभी की नजरें हंगरी के कार्ली टैकास पर टिकी थीं;
क्योंकि वह बहुत अच्छा निशानेबाज था । लेकिन विश्वयुद्ध छिड़ गया। 1944 में भी विश्वयुद्ध के
चलते ओलंपिक खेल नहीं हो पाए । विश्वयुद्ध तो समाप्त हो गया लेकिन 1946 में एक दुर्घुटना में
कार्ली का दायां हाथ कट गया । जब हाथ ही नहीं तो शूटिंग भला कैसी ? कार्ली ने घर छोड़ दिया।
सबने सोचा निराशा के कारण कार्ली ने घर छोड़ दिया है। लेकिन जब 1948 में लंदन में ओलंपिक
खेल हुए तो सबने हैरानी से देखा कि शूटिंग का गोल्ड-मैडल लिए कार्ली खड़ा है। बाएं हाथ से गोल्ड-मैडल जीता ।
9. अहंकार - जीत आपने कर ली । अब एक बात का और ध्यान रखना है। कभी अहंकार को
अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है। अहंकार मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। सहजता और
सौम्यता बड़प्पन के गुण हैं । शेक्सपीयर ने कहा था - अहंकार स्वयं को खा जाता है। अपनी दो
पंक्तियों के साथ -
हिम बन चढ़ो शिखर पर या मेघ बन के छाओ ,
रखना है याद तुम्हे, सागर में तुमको मिलना।
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