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                                              सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर



                                                     " तुम्हें खोजता था मैं,
                                                           पा नहीं सका,
                                                       हवा बन बहीं तुम, जब
                                                            मैं थका, रुका ।"
                                                         

                                                    -सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला '


                                                        " फुरसत का एक दिन" 

                                                (लेखनी-जून-2009-वर्ष-3-अंक 28)

                                                               - इस अँक में- 

माह विशेषः निदा फाजली,  पूर्णिमा बर्मन, शैल अग्रवाल। कविता धरोहरः त्रिलोचन। माह के कविः  अशोक गुप्ता ।  कविता आज और अभीः सुजय पाल, संजीव निगम, ब्रज श्रीवास्तव, सुरेश पंड्या, राजेन्द्र शर्मा ।  बाल कविताः श्याम सुशील। 

मंथनःडॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी । आकलनः प्रतिभा मुदलियार।  कहानी-देशः वीना विज उदित।।कहानी-विदेशः शैल अग्रवाल। दो लघुकथाएँ: अशोक वर्मा ।  हास्य व्यंग्यः प्रेम जनमेजय । परिदृश्यः दिनेश ध्यानी। बाल कहानीः शमशेर अहमद खान। व खबरों से भरपूर विविधा।

                                                                 ( सर्वाधिकार सुरक्षित) 


                                                         संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल

                                                             
                          
                                      संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

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                                                                                                                                                    अपनी बात
 

बरसों पुरानी-सी बात है...एक कलम थी,  ' लकी कलम ', जो सिर्फ परीक्षा या खास मौकों पर ही निकलती थी। हाई स्कूल के बाद से ( शायद उसके पहले इतनी सोच नहीं थी कि अंधविश्वास जन्म ले पाएँ) सारी परीक्षाएं उसी से दी गईं। एक महत्वपूर्ण परीक्षा का दिन था और वह भी सबसे कठिन विषय गणित की परीक्षा का। 'लकी कलम' का होना अनिवार्य था। कमरे का कोना-कोना ढूंढ डाला परन्तु कलम नहीं मिली। मां के पास हर समस्या का हल था ।   हताश, रूँआसी दौड़ी-दौड़ी तुरंत ही जा पहुँची उनके पास , -' तुमने कहीं मेरी कलम तो नहीं देखी ? देर हो रही है और कहीं पर मुझे मिल ही नहीं रही !'                                             मां  एक तरफ तो मेरी हर बात बहुत ध्यान-से सुन रही थीं  और दूसरी तरफ  लगातार एक मनोरंजक और कौतुक भरी मुस्कराहट के साथ मुस्कुराए जा रही थीं...। बात खतम होते ही  जोर-से हंस पड़ीं ,  'बाबरी, हाथ में कलम लेकर, कलम ढूंढ रही है। '                                                

झेंप से पानी-पानी थी - कलम बांए हाथ में किताब कौपियों के साथ पकड़े कलम को कैसे ढूंढे जा रही थी मैं अबतक... ऐसा कैसे हो सकता था...!. पर, अक्सर ऐसा ही तो होता रहता है...जब हम बहुत जल्दी में होते हैं या किसी चीज का महत्व बहुत ज्यादा होता है हमारे लिए  और तब धुन के आवेग पर सवार थम जो नहीं पाते ..पीछे हटकर,  कटकर एक समग्र दृष्टि जो नहीं ले पाते।   

मन की बेचैन व्यग्रता के साथ हम, जिसे भी ढूँढते हैं, अक्सर ही वो हमारे साथ या हमारे बेहद पास होकर भी मिल नहीं पाता हमें। इस ' न  मिल पाने के ' कई कारण हो सकते हैं; हमारी अपनी लापरवाही...अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाना, या फिर जीवन की व्यस्तता में थमना ही भूल जाना। या फिर हमारी उसके प्रति इतनी आसक्ति कि कभी या किसी भी हालत में खोना ही न चाहें हम उसे।

हम सभी ने कभी-न-कभी अवश्य ही महसूस किया होगा पेट में खलबली मचाती और हदय को डुबोती इस काली-चुभती भावना को... अक्सर एक  भय जो बना रहता है कि हमसे  हमारी प्रिय चीज खो जाएगी या कोई छीन लेगा इसे हमसे । मांओं के संदर्भ में तो यह बात और भी ज्यादा खरी उतरती है और यही वजह है कि  आए दिन ही वे बच्चे की सुरक्षा और सही सलामती को लेकर भगवान से दुआ-प्रार्थना करती रहती हैं।


...जो प्रिय है उसके तो विछोह की कल्पना तक पीड़ादायक होती है।  प्रियजन के जरा भी देर से लौटने पर मन बेचैन हो उठता है और खराब से खराब ... अनहोनी बातों  की ही संभावना मन में सबसे पहले आती हैं और तुरंत ही अबूझ अनिष्ट की आशंका से मन कांपने लग जाता है। 

यह तीव्र लगाव जरूरी नहीं कि व्यक्तिओं से ही हो...जीवन, वस्तु, जगह, अनुभव, स्वाद, मात्र यादें या एक बलवती इच्छा, कुछ भी तो हो सकती है यह, इस रूप में हमारे साथ। हमारे जीवन ही नहीं, अस्तित्व तक में रची गुंथी। और इसी    ' कुछ ' से कटकर, थमकर उसी  को पकड़ने की कोशिश की है हमने ' लेखनी ' के इस अंक में ...। '  कुछ '  जो सदा-से हमारे आसपास है, हमारे साथ है, आंसू और मुस्कान, खिलते फूल, सूरज की एक किरन... आम दिन की छोटी-छोटी घटनाएं बना, पर घटनाएं और अनुभव जिन्हें हम जीवन की व्यस्तता से गुजरते  न तो ध्यान दे पाते हैं और ना ही वक्त दे पाते हैं।  


 पाने के लिए थमना पड़ता है....अक्सर व्यग्र नहीं, समग्र दृष्टि की जरूरत होती है।  सफलता-असफलता , प्राप्ति और उपलब्धियों का आकलन हमारे लिए दूसरे नहीं अंततः स्वयं हमें ही तो करना होता है, तभी तो संतुष्टि मिल पाती है और बात समझ में आती  है । फिर सब कुछ वही तो नहीं जो इन्द्रियों से दिखे, बहुत कुछ महसूस भी तो कर लेते हैं हम, कर सकते हैं...यदि चाहें तो।


जिसका कोई स्थूल अस्तित्व नहीं वह भी तो है ही  हमारे आस पास...शायद ज्यादा बड़ा सच बनकर, ईश्वर की तरह... यादों में बसे नश्वर हमारे अपने बेहद निजी संसार की तरह...।..बाहर ही नहीं, अन्दर झांककर भी मिलता है जीवन में बहुत कुछ...फिर सबकुछ हमेशा के लिए कब  और कहां है यहां पर...हम खुद भी तो नहीं, शायद... ? फिर यह व्यग्रता और बेचैनी क्यों ?

कौन जाने, शायद रह ही जाता हो सब यहीं आसपास बिखरा और उळझा । बहती हवा-सा...डूबते-उगते दिनों के निरंतर इस एक क्रम-सा।...


लेखनी शुरू हुए दो साल से ऊपर हो चुके हैं और गुजरे कुछ इन दिनों, महीने, वर्षों में, जिया ही नहीं, ओढ़ा-बिछाया और सोया है इसे। व्यस्त जीवन से पल-पल  चुराते...' जो कुछ उतना जरूरी नहीं ' को   जानबूझकर अपने से परे धकेलते । कभी-कभी तो अपनों की बेवजह नाराजगी तक झेलते। अब तो यह मासूम आदत लत बन चुकी  है; सच कहूं  तो क्या समस्त जीवन ही बस  आदतों में फंसा एक क्रम नहीं, जो जाने अनजाने खुद-ब-खुद उंगली पकड़कर ले चलता है हमें,  बिना रुके, बिना सोचे...ध्रुवतारे-सा गाइड और मंजिल दोनों ही बना। 


प्रस्तुत है आपके लिए आपका अपना ही " एक दिन " दिन जो खुद ही उग आता है...दिन.. जिसे हम एक बेपरवाह मस्ती से जीते  और झरजाने देते हैं।  ' दिन ' जो एक जबरदस्त अधिकार के साथ खुद ही  मन की दीवार पर तस्बीर-सा आ जड़ता  है। 


झरबेरी हैं यादों के दिन


फूल बने, कभी शूल बने


बिखरे ही रहे


अड़े खड़े सच्चे-झूठे


ये जज़बातो दिन....


... हैप्पी रीडिंग!


                                                                                                                                 शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                            माह विशेष



   एक दिन










सूरज एक नटखट बालक सा

दिन भर शोर मचाए

इधर उधर चिड़ियों को बिखेरे

किरणों को छितराये

कलम, दरांती, बुरुश, हथोड़ा

जगह जगह फैलाये

शाम

थकी हारी मां जैसी

एक दिया मलकाए

धीरे धीरे सारी

बिखरी चीजें चुनती जाये।


              - निदा फाजली











             
 
     दिन





       





रात की गोदी से
मचल-मचल
क्यारी-क्यारी 
किलका है दिन
घर-आँगन 
दे दे फेरी
हँसा-रोया और
चहका है दिन 
तारों की माला पिरोए
जाने किस इन्तजार में
रातभर बैठा  है दिन
उँची मुँडेर पे
उड़ने को आतुर
मुझसा-तुमसा-
जीवन-सा, देखो
अब कभी ना
लौटेगा 
यह दिन


- शैल अग्रवाल 














आज दिन






 




आज दिन
फिर ठंडा था।

सागर तटपर सजी सजाई
चमकी दमकी
नन्ही नन्ही दुकानों में
धंधा कुछ मंदा था।

सैलानी जत्थों की कोई
भीड़ नही थी
मछुआरों को भी दिन से
उम्मीद नही थी

सर्द हवा के झोंके
पन्नों से उड़ते थे
नये नये अनुबन्धों छंदों
को बुनते थे

हल्की हल्की बौझारों में
मन खोया था
शोर भरी इस नगरी में
सब कुछ सोया था

चलो कीमती इस दिन को
बटुए में रख लें
पढ़ा करेंगे फिर फुर्सत में
धीरे धीरे-------


-पूर्णिमा बर्मन

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                                                                                                                                              कविता आज और अभी











वह आदमी


वह आदमी


सारी खिड़कियां बंद रखता है।


आखिर कभी भी


खिड़की पर आकर


बैठ सकता है कोई घायल कपोत।


गिर सकती है टप से


खून की एक बूँद


झक्क सफेद मेजपोश पर।





खिड़की से कभी भी


प्रवेश कर सकती है


कोई बारूदी गंध या विद्रोही आवाज़


बिना इजाज़त लिए





खिड़की से घुस आए


कहीं किसी बच्चे की


उद्दंड गेंद तो





खिड़की का खुला रहना


खतरे से खाली नहीं है।


खिड़की दीवार और


दिमाग में पाई जाती है।


         -सुजय पाल 














चिट्ठियां









चिट्ठियां तो अब भी आती हैं ,
आँगन में बरसाती बूंदों की तरह,
पर अब पहले की तरह
भीगी मिटटी की सोंधी खुशबु साथ
नहीं लाती हैं.
चिट्ठियां तो अब भी आती हैं ,
दीवार फांद कर शैतान बच्चों की तरह,
पर साथ में शरारत के ख़ुशी भरे क्षण ,
फुदकते दिखाई नहीं देते हैं.
दरवाज़े की सेंध में से कोई चुपके से
भीतर बढा देता है चिट्ठियां
तो साथ में फिर मिलने का
ताजगी भरा पैगाम नहीं होता .
चिट्ठियां अब राज़ी ख़ुशी का समाचार
नहीं देतीं हैं .
न ही, हम राज़ी ख़ुशी होंगे यह
मान कर चलती हैं .
चिट्ठियां अब आती हैं
सूदखोर महाजन की तरह .
संबंधों के कर्जों की उगाही करने.
-


                    -संजीव निगम

















पर एक उमाशंकर है








हम किसी को नहीं रहे इतने याद


कोई अँदर से मजबूर हो जाए और


भेज दे एक अदद पोस्टकार्ड हमारे नाम





उहापोहों में कैद होकर रह गई हैं उनकी भावनाएँ


दोस्तों ने निराशा के चलते बंद कर दिया है


खतों से चलकर आना हम तक,


कुछ तो दूर के संबंधों को मानते होंगे फालतू की चीज़





पर एक उमाशंकर है जो


चला आता है हर तीसरे दिन पोस्टकार्ड में बैठकर


वह संबंधों की मार से हुआ इतना जख्मी


उसे याद ही नहीं रही कोई तरतीब सी भाषा


बिखरा हुआ ही आता है वह अपनी हस्तलीपि के भीतर





घर में सब उसकी चिट्ठी से बौखलाते हैं


पढ़ते हैं उसका पागलपन और निकम्मी हरकत


थोड़ा खीझकर फिर तरस खाकर रह जाते हैं


कहते हैं कितनी अभागिन है उसकी बीवी





और न जाने कहाँ-कहाँ जाता होगा वह ऐसे ही चलकर


और न जाने कहाँ कहाँ समझा जाता होगा उसे पागल


                               -ब्रज श्रीवास्तव


















मेरी शुरू से ही...








मेरी शुरू से ही


यह आकांक्षा रही है


कि तुम ऊँची उड़ानें भरो


तुम्हें जिज्ञासा और उत्सुकता से निहारें


कोई ऐसा अद्भुत काम करो।


मगर दोस्त! तुम ने यह क्या किया ?


तुमने ऊँचाइयों तक उड़ान तो ली


लेकिन ऊँचाइयों को छूने से पहले


यह भूल गई


कि तुम किसी स्वतंत्र पक्षी की तरह नहीं उड़ पायी


पक्षी को तो आकाश में उड़ने पर भी


अपने नीड़ का ध्यान रहता है


और इसलिए वह लौट आता


संध्या के आगमन पर अपने नीड़ में


अपनों के बीच,


और खट्टी-मीठी अनुभूतियाँ बाँटता है


अपनों के साथ


इसीलिए नयी उर्जा पा, वह फिर से


बुलन्दियों को छूने निकल पड़ता है


लेकिन दोस्त! तुम उड़े तो जरूर


लेकिन ?


स्वच्छन्द हृदया पक्षी की तरह नहीं


एक पतंग की तरह


जिस की डोर किसी दूसरे के हाथ में रहती है


और तुम यह भी नहीं जान पाईं


रंगीन पतंग की तरह उड़ते समय,


कि पतंग टूटकर या कट कर जमीन पर वापस आती है


तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।


पुर्जा-पुर्जा हो बिखर जाती है


मेरे दोस्त। समझो इस यथार्थ को।


                         -अमर साहनी


   





 









फिर क्यों









अचानक ही
किसी लम्बे समय के बाद की मुलाकात की तरह
तुम्हें अपने पास पाने की तमाम कोशिशें
सडक की नुकीली  गिट्टियों से शुरू होती है
बार बार लगता है
किसी जुलूश में शामिल हो गया हूँ
वही लोग, वही नारे और तुम्हारे संग
बीती संध्या को
बार बार दुहराने में
कितनी समानता है
कितना अजीब लगता है
जब तुम्हारा उस दिन का चेहरा
रंग बिरंगी टोपियों की झालरें पहन लेता है ।

झालरें
जिसके पीछे
नवजात शिशु के से तुम्हारे होंठ नहीं होते
बिखरी लटों के पीछे से झांकती
छोटी ऑंखों के नुकीले कोण नहीं होते
फिर में क्यों याद करूँ तुम्हें
रायफल की ठंडी बैरलों
माईक के ठूठे स्पर्श
आश्वासनों को
फिर से दुहराना होगा
तुम्हारे और अपने बीच
निरोध और बुलेटस् और माईक और नींद की गोलियॉं
एक लम्बी कतार सी बिछानी होगी
“ कितना बुरा समय आ गया है”
पूरे वर्तमान पर टिप्पणी करना फैशन है
पर में क्यों याद करूँ
कि पतली पतली उँगलियों से
चेहरे पर फैल आई लटें समेटना
तुम्हें अलग करता है
फैशन परेद में शामिल
तुम्हारी पतली उँगलियॉं
मोटी जिल्द बंधी किताबें
याद आती हैं
दीमक लगे कागज की खूशबू
दीमक , खूशबू, तुम
कहीं कुछ नहीं होता है
फिर में क्यों याद करूँ तुम्हें
किताब है , दीमक है , खूशबू है , निरोध है
रायफल की गोलियॉं हैं
और
रंग बदलती टोपियॉं हैं

-सुरेश कुमार पण्डा




















टेसू फूलेगा










जंगल की इस हरियाली का


उत्सव मनाते हुए


टेसू पर हँसना मत


अपने नंगे शरीर की ख़ामोशी में


वह फागुन का इन्तज़ार कर रहा है





जिस दिन फूलेगा


आग लग जाएगी


             -राजेन्द्र शर्मा

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                                                                                                                                         कविता धरोहर





                                                                                                                                                त्रिलोचन



हंस के समान दिन










हंस के समान
दिन उड़ कर चला गया
अभी उड़ कर चला गया

पृथ्वी आकाश
डूबे स्वर्ण की तरंगों में
गूँजे स्वर
ध्यान-हरण मन की उमंगों में
बंदी कर मन को वह खग चला गया
अभी उड़ कर चला गया


कोयल-सी श्यामा-सी
रात निविड़ मौन पास
आई जैसे बँध कर
बिखर रहा शिशिर-श्वास
प्रिय संगी मन का वह खग चला गया
अभी उड़ कर चला गया











अगर चाँद मर जाता









अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब?

खोजते सौन्दर्य नया?
देखते क्या दुनिया को?
रहते क्या, रहते हैं
जैसे मनुष्य सब?
क्या करते कविगण तब?

प्रेमियों का नया मान
उनका तन-मन होता
अथवा टकराते रहते वे सदा
चाँद से, तारों से, चातक से, चकोर से
कमल से, सागर से, सरिता से
सबसे
क्या करते कविगण तब?
आँसुओं में बूड़-बूड़
साँसों में उड़-उड़कर
मनमानी कर- धर के
क्या करते कविगण तब
अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब
क्या करते कविगण तब
 













कोइलिया न बोली









मंजर गए आम
कोइलिया न बोली

बूटों के अपने
हाथ उठाए
धरती
वसंती-सखी को बुलाए
पड़े हैं सब काम
कोइलिया न बोली

मंजर गए आम
कोइलिया न बोली

पाकर नीम ने
पात गिराए
बात अपत की
हवा फैलाए
कहाँ गए श्याम
कोइलिया न बोली।

मंजर गए आम
कोइलिया न बोली










परिचय की वो गाँठ










यों ही कुछ
मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गाँठ लगा दी!

था पथ पर मैं
भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला
जाने कौन
लहर थी उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!

कभी-कभी
यों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!

जड़ता है
जीवन की पीड़ा
निष् तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने
अनजाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!













दुनिया का सपना










तुम, जो मुझ से दूर, कहीं हो, सोच रहा हूँ,
और सोचना ही यह, जीवन है इस पल का,
अब जो कुछ है, वह कल के प्याले से छलका,
गतप्राय है। किसी लहर में मौन बहा हूँ,

अपना बस क्या। जीवन है दुनिया का सपना,
जब तक आँखों में है तब तक ज्योति बना है।
अलग हुआ तो आँसू है या तिमिर घना है।
बने ठीकरा तो भी मिट्टी को है तपना।

कल छू दी जो धूल आज वह फूल हो गई,
चमत्कार जिन हाथों में चुपचाप बसा है,
ऐसा हो ही जाता है। यह सत्य कसा है
सोना, जिस पर जमे मैल की पर्त खो गई।

पथ का वह रजकण हूँ जिस पर छाप पगों की
यहाँ वहाँ है; मूक कहानी सहज डगों की। 














उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा है






 




उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है,

नंगा है, अनजान है, कला–नहीं जानता
कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है
उसके जीवन का सोता, इतिहास ही बता
सकता है। वह उदासीन बिलकुल अपने से,
अपने समाज से है; दुनिया को सपने से
अलग नहीं मानता, उसे कुछ भी नहीं पता
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची; अब समाज में
वे विचार रह गये नही हैं जिन को ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़ कर, जपता है                                                                                                                                                        नारायण नारायण करता है













हमको भी बहुत कुछ याद था










कोई दिन था जबकि हमको भी बहुत कुछ याद था
आज वीराना हुआ है, पहले दिल आबाद था।

अपनी चर्चा से शुरू करते हैं अब तो बात सब,
और पहले यह विषय आया जो सबके बाद था।

गुल गया, गुलशन गया, बुलबुल गया, फिर क्या रहा
पूछते हैं अब वो ठहरा किस जगह सैयाद था।

मारे-मारे फिरते हैं उस्ताद अब तो देख लो,
मर्म जो समझे कहे पहले वही उस्ताद था।

मन मिला तो मिल गए और मन हटा तो हट गए,
मन की इन मौजों पे कोई भी नहीं मतवाद था।

रंग कुछ ऐसा रहा और मौज कुछ ऐसी रही,
आपबीती भी मेरी वह समझे कोई वाद था।

अन्न-जल की बात है, हमने त्रिलोचन को सुना,
आजकल काशी में हैं, कुछ दिन इलाहाबाद था। 

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                                                                                                                                                       माह के कवि





                                                                                                                                                     

                                                                                                                                                 -अशोक गुप्ता





वह एक पल










वह एक पल है
जो कभी
आँखों से ओझल नहीं होता.

वह एक पल है
रचता जाता है एक दुर्ग
मुझे घेरता हुआ
कैद रखता हुआ
मुझे अपनी दीवारों में.

वह एक पल है
जो दुर्ग है समूचा
खींचता जाता है मुझे भीतर ही भीतर
न जाने कितने कपाटों का
दुर्ग है यह
कि
कोई भी दरवाज़ा मुझे अंतिम नहीं लगता
जैसे जाऊंगा मैं अभी और गहरे
अभी और गहरे
जहां कोई नहीं पहुंचा है
अब तक, शायद.

यह कैसा दुर्ग है
विस्मित हूं मैं
ठहरा हूं मैं दुर्ग के उस दरवाजे के पार
जहां पहुंचना अविलंब नहीं होता
और
जिसके चारों ओर अभेद्य दीवारें हैं.

ओह, क्या अचंभा है,
मैं
यहां से भी
देख सकता हूं आकाश
आकाश मे चांद
चांद में बैठी हुई बुढ़िया का चरखा
चरखे के आस-पास
सफ़ेद खरगोश सा रूई का फाहा
और तकली में लिपटता हुआ
महीन सा सूत.


यह कैसा सूत है, हे मेरे ईश्वर
जो मुझे
तकली बना रहा है
दुर्ग होता जा रहा है
मेरे चारों ओर.

यह
एक पल है
जो कभी आँखों से
ओझल नहीं होता.
                      











बड़ा विनिमय







                                     



दो व्यक्तियों के बीच में
कुछ
न्यूनतम दूरी
तय करने वाला एक शब्द है
आप.

बस,
सरसरी निगाह से देखने की अनुमति है
छूना इसमे मना है
छू कर भीगना असंभव...

मैने आजीवन
अपने पिता को आप कहा
और करता रहा यह प्रण सदा अपने आप से
कि
मेरे बच्चे हमेशा मुझे तुमही कहेंगे
तुम ही कहेगी
मुझसे मेरी पत्नी
ठीक वैसे ही
जैसे आजन्म मैं कहता रहा अपनी मां को
तुम,
छूता रहा उसे
और भीगता रहा
उसके ले जाने के बरसों बाद भी.

मेरा एक मित्र है
मैं पढ़ता हूं उसके चेहरे पर
अक्सर
एक अस्वीकार उसे तुम कहे जाने पर
लेकिन मैं क्या करूं
एक दोस्त गंवा कर एक काम की शह जुटाना
मुझे घाटा लगता है.
आखिर
काम बन जाने पर
मैं किस से ठठाऊंगा
अभी
काम न बनने पर
मैं रो तो सकता हूं उस तुम की परिधि में...

 

 

आप कह कर
शब्द विनिमय कर लेने के बाद
पलट कर चल देना
न कोई हर्ष
न विषाद,
तुम कह कर तुम सुनने में
बड़ा विनिमय होता है.

                    

 

 

 

 

 

 मेरा तुम तक आना

 


                   




मै 
तुम तक आता हूं
पैदल
और नंगे पांव.

वैसे तो मैं ले सकता हूं
रिक्शा या ऑटो
या फिर उठा सकता हूं
अपनी ही कार
लेकिन नहीं
ऐसा नहीं करता हूं मैं.

दरअसल
जब मैं पैदल चलता हूं
मेरे साथ चलती हैं
मेरी स्मृतियां
मुझे
उठा कर रखती हैं
इस लोक से उस लोक
मुझे
तैयार करती रहतीं है
पहुंचने के लिये
तुम तक,
और स्मृतियां हमेशा
यथार्थ में जिये हुए का सच नहीं होतीं
वह
अंतस् मे जिया हुआ
कोई सपना भी होतीं है.

मैं जब चलता हूं सवारी पर
मेरे साथ संग संग
मेरी योजनाएं चलती हैं
रणनीतियां
दांव-पेंच
बोले जाने वाली बातों के
तयशुदा वाक्यांश
सयानापन लगातार
कि
क्या छुपाना है बोलते हुए
क्या दिखाना है कि जैसे,
 विस्मृत हो गया है.

मैं वाहन में बैठ कर
अपने प्रकल्प ढोता हूं,
अपने
दो टूक अभीष्ट
मुझे सिर्फ़ सूझती है तब
चिड़िया की आँख.

मेरा तुम तक आना
मेरा जीना होता है
देख लेना होता है
मेरा
तुम्हारे साथ
पूरा ब्राहृाण्ड
उकेर देना होता है
सब कुछ
अविस्मृत.

मेरा
तुम तक आना
ऐसे ही होता है
पैदल
नंगे पांव.....
                      
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                                                                                                                                                                  मंथन


                                                                                                                                           -विश्वनाथ प्रसाद तिवारी






कवि का आत्मसंघर्ष

ऐसा क्यों होता है कि रचनाकार रचना में तो अपराजेय पात्रों की सृष्टि करते हैं लेकिन स्वयं आत्महत्या कर लेते हैं। रचना में तो उद्दाम जिजीविषा, अदम्य साहस और किसी से न डरने की सलाह देते हैं लेकिन जीवन में समझौते कर लेते हैं। रचना में तो स्वतंत्रता को चरम मूल्य स्वीकार करते हैं पर खुद तानाशाही का समर्थन कर देते हैं। रचना को तो शोषण विरोधी मानव मुक्ति का घोषणापत्र कहते हैं पर खुद सुवर्ण सिंहासन का वरण कर लेते हैं। ऐसा क्यों होता है, यह सवाल मुझे बहुत बार परेशान करता रहा। मैने सबके लिए तो नहीं, पर अपने लिए इसका एक उत्तर ढूँढ लिया और वह यह कि केवल रचना का क्षण ऐसा होता है जिसमें रचनाकार वही होता है जो कि वह अपनी रचना में होता हैः

जिस समय वह लिख रहा होगा

सबसे अच्छी कविता

जरूर होगा उस समय वह

सबसे अच्छा आदमी 

वह रचना का क्षण होता है जिसे महिम भट्ट ने ‘ अपूर्व दीप्ति‘  का क्षण कहा है। इस क्षण में चीजें जितनी साफ दिखाई देती हैं उतनी कभी नहीं दिखाई देतीं। इसी क्षण में वह संघर्ष शुरु और खत्म होता है जिसे कविता रचते हुए कवि का आत्मसंघर्ष कहा जा सकता है।

क्योंकि अभिव्यक्ति व्यक्ति के माध्यम से ही संभव होती है अतः कवि अपनी सृष्टि का प्रजापति है। किंतु जैसा कि आचार्य शुक्ल ने कहा है – ‘ मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। उसकी अपनी सत्ता का ज्ञान तक लोकबद्ध है...संसार-सागर की रूप-तरंगों से ही मनुष्य की कल्पना का निर्माण और उसके भीतर विविध भावों या मनोविकारों का विधान हुआ है। प्रत्यक्ष अनुभव किए हुए बाहरी रूप-विधान से ही स्मृत रूप-विधान और कल्पित रूप-विधान की योजना होती है।‘  अतः काव्य रचना में जो अनिवार्य स्थिति कवि की है वही उस अनंत रूपात्मक जगत की जिसके बीच वह रहता और लिखता है। कविता कवि की अत्यंत वैयक्तिक और अत्यंत सामाजिक क्रिया है। कविता में कवि ही समाज और समाज ही कवि हो जाता है। जिस क्षण में अनंत रूपात्मक जगत कवि में सिमट जाता है और कवि अनंत रूपात्मक जगत में लय  हो जाता है, वही कविता रचते हुए कवि के आत्मसंघर्ष का क्षण होता है।

‘ रचना‘  या ‘ सृजन‘  शब्द का प्रयोग हम तबी करते हैं जब कोई नई और भिन्न चीज जन्म लेती दिखाई देती हो। कारखाने में यदि कोई मशीन एक प्रकार की घड़ियां या साबुन आदि ढाल रही हो, जिनके स्वरूप, गुण आदि में कोई अंतर न हो तो हम उसे ‘ रचना‘  नहीं कहेंगे। ‘ रचना‘  के लिए ‘ नया‘  और ‘ भिन्न‘ होना शायद अनिवार्य शर्त है। काव्य-संसार वह संसार होता है जिसे कवि असली संसार के बीच भाषा में रचता है-अपनी उद्भावना शक्ति, कल्पना शक्ति, अपनी दृष्टि और अपने कौशल द्वारा। कवि असली संसार को कुछ तराशता है, कुछ छांटता है, कुछ जोड़ता है। चीजों को अपना एक क्रम और संदर्भ देता है। कभी कोई शब्द बदलता है, कभी कोई वाक्य, कभी कोई मुहावरा। वह शब्द को व्याप्ति देता है, संकोच देता है, उत्कर्ष देता है और अपकर्ष भी देता है। पानी पानी मांग रहा है हिन्दुस्तानी (रघुवीर सहाय) में ‘ पानी‘  जैसा साधारण शब्द भी कितनी व्याप्ति लिए हुए है। सब आँखों के आँसू उजले, सबके सपनों में सत्य पला ( महादेवी वर्मा) में ‘ उजला‘ शब्द अपने भीतर कितनी आभा छिपाए है। इसी को कहते हैं कि कवि शब्दों को ‘चार्ज‘ करता है, जैसे बैटरी चार्ज की जाती है, और उन्हें नई अर्थवत्ता के साथ समाज को लौटा देता है। हम जिस संसार में रहते हैं उसमें भाषा परंपरा से मिली हुई है और सबको समान रूप से मिली हुई है लेकिन कवि उस भाषा का शोभन करता है, उसमें प्राण और उर्जा फूंकता है। यह मात्र भाषा का शोध या कवि का आत्मसंघर्ष नहीं, बल्कि कवि का मोक्ष भी है। इसे प्राप्त करने के लिए कवि को असंख्य बार रोना पड़ता है- कालिदास सच सच बतलाना, अज रोया या तुम रोए थे ( नागार्जुन) एक रचनाकार हजार रूपों में हजार बार मरता है- मरा हूँ हजार मरण ( निराला)। तभी वह लिख पाता है- रवि हुआ अस्त। ज्योति के पथ पर लिखा अमर। रह गया राम-रावण का अपराजय समर। इस कविता के शब्द , उनके विन्यास, तुक, लय- किसी में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते आप। कवि के आत्ममंथन से निकले हुए रत्न हैं ये।

अपनी मां की मृत्यु पर मैं एक कविता लिख रहा था। चिता पर मां की काया जल रही है, पैर जल गए हैं मां के, हाथ और सिर जल गया है मगर अभी उसके स्तन नहीं जले हैं। अब मेरे समस्या है--‘ स्तन ‘ के लिए कौन-सा शब्द रखूँ ? यह शब्द मुझे बार-बार खटक रहा है। मुझे कविगुरू कालिदास की याद आती है। रघुवंश के राजा दिलीप का प्रसंग है। सिंह कहता है - ‘ ये जो सामने देवदारु दिखाई दे रहा है, इसे शिव अपने पुत्र के समान मानते हैं और इसे स्वयं मां पार्वती ने अपने सोने के घट रूपी स्तनों के दूध से सींच-सींचकर इतना बड़ा किया है।‘ ‘ अद्भुत श्लोक है। सारी दुनिया के साहित्य में मनुष्य और प्रकृति का इससे प्रगाढ़ और पवित्र संबंध नहीं मिलेगा। हेम कुंभस्तन निःसृतानां। इतना सुंदर उपमान! लेकिन मेरे लिए व्यर्थ। मुझे मां के लिए ‘स्तन‘  शब्द फिर भी अपने काम का नहीं लगता। एक वर्ष तक मन में निरंतर खटकते रहने के बाद एक दिन एक दूसरा शब्द दरवाजा खटखटाता है जिससे मुझे अद्भुत संतोष मिलता है और मैं लिखता हूः

सबसे पहले पैर जले मां के

फिर सिर जला

जल नहीं रहे थे मां के

अमृत पयोधर।  

‘ स्तन ‘ की जगह ‘ अमृत पयोधर ‘। भीतर का कवि जो बंधन में छटपटा रहा था, मुक्त हो जाता है और तब मुझे आचार्य आनंदवर्धन और कुंतक की याद आती है। आनंदवर्धन ने सटीक शब्द को, जिसका कोई पर्याय न हो, ‘ ध्वनि काव्य ‘ कहा है। कुंतक कहते हैं कि किसी अर्थ का वाचक कोई एक ही शब्द होता है। कवि को ऐसे ही शब्द की तलाश करनी चाहिए।

कवि अपने अनुभव को नया, वास्तविक, जीवंत और प्रासंगिक बनाना चाहता है। वह जो अनुभव करता है उसे स्वयं ठीक-ठीक पकड़ना चाहता है। इसी को टी.एस. इलियट ने यों कहा है कि कवि के भीतर एक रचना-भ्रूण पल रहा होता है जिसके लिए उसे शब्द-संधान करना होता है। कविता रचते हुए कवि को बराबर लगता है कि कुछ छूट रहा है जिसे भाषा देना जरूरी है। यह भाषा और अनुभव का द्वंद्व है- कवि की अभिव्यक्ति का संकट। सूरदास ने अपने एक पद में इस संकट को बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया हैः

अलि हौं कैसे कहौं हरि के रूप रसहिं।

अपने तन में भेद बहुत विधि, रसना न जानै नैन की दसहिं।

जिन देखे  ते आहि वचन बिनु, जिनहिं बचन दरसन न तिसहिं।

कैसे कहौं हरि के रूप रसहिं । यह ‘ कैसे कहने का संकट‘ ही कवि की अभिव्यक्ति का संकट है। अभिव्यक्ति की खोज कवि कर्म है और कविता अभिव्यक्त करने की क्रिया। कवि मुक्तिबोध इसी परम अभिव्यक्ति अनिवार/ आत्म संभवा की खोज में ‘  अभिव्यक्ति के सारे खतरे ‘  उठाने को तैयार हैं। कवि इसी अर्थ में अन्य मनुष्यों से विशिष्ट होता है कि ‘  वह न केवल अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष करता है बल्कि अभिव्यक्त करने की समस्या को सुलझा लेता है- अपनी अभिव्यक्ति को पा लेता है। महसूस तो सब करते हैं पर जितनी समर्थ अभिव्यक्ति कवि या रचनाकार दे पाता है, उतनी सामान्य व्यक्ति नहीं। बल्कि सामान्य श्रोता या पाठक कवि की अभिव्यक्ति को सुन या पढ़कर स्वयं अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है। यह कवि और कविता की सफलता है। कोलरिज ने सही कहा है कि हम किसी व्यक्ति को कवि इस तथ्य से समझते हैं कि वह हमें भी कवि बना देता है। कवि उस दुनिया का साक्षात्कार करता है जो पाठक या श्रोता के चारो ओर है पर उनकी दृष्टि से ओझल है। चीजें जो अर्थहीन लगती हैं, रचना में उजागर होकर एक नया अर्थ देने लगती हैं। कवि अर्थहीन को अर्थ देता है, शब्दहीन को शब्द देता है, मौन को मुखर करता है। कविता शब्द और अर्थ की साधना है।

भाषा की एक सीमा होती है। जैसा कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है, भाषा मनुष्य की संपूर्ण इच्छाशक्ति को उसके संपूर्ण रूप में कभी संप्रेषित नहीं कर पाती। कवि अपनी विशिष् अनुभूतियों का साधारणीकृत करना चाहता है किंतु पाठक उसके सामान्य अर्थ ही गृहण कर पाता है। शब्दों की यह सीमा है। भाषा समाज स्वीकृत होती है। उसमें जो व्यक्त होता है वह सामान्य अर्थ का ही बोध करा पाता है। सेव भी मीठा होता है और केला भी। दोनों की मिठास में निश्चय ही अंतर है पर दोनों के लिए हमारे पास एक ही शब्द है ‘  मीठा‘ । यह हमारी भाषा की सीमा है। कवि भाषा की इस सीमा से टकराता है। इसी को भाषा और अनुभव का द्वन्द्व कहते हैं। द्विवेदी जी के अनुसार , भाषा की सीमा को तोड़ने के लिए ही कवि अप्रस्तुतों का विधान करता है, उपमा, उत्प्रेक्षा, काकुओं और वक्रोक्तियों का सहारा लेता है। वह नए शब्दों की रचना न भी कर सके तो शब्दोंमें नया अर्थ भरना चाहता है। रचनाकार के पास भाषा के अलावा कोई दूसरा औजार नहीं होता। भाषा ही उसकी सिद्धि है। मीर अपनी वसीयत में कहते हैं - ‘  बेटा, हमारे पास माल व मताए दुनिया में कोई चीज नहीं है जो आइंदा तुम्हारे काम आए लेकिन हमारा सरमाए–नाज कानूने जबां है जिस पर हमारी जिंदगी और इज्जत दारोमदार रहा, जिसने हमको खाके-जिल्लत से आसमाने शोहरत तक पहुँचा दिया। इस दौलत के आगे हम सल्तनते आलम को हेच समझते रहे। ‘ यह है भाषा के प्रति उस कवि की श्रद्धांजलि जो उर्दू शायरी का खुदा माना जाता है।

काव्य-रचना में कवि के मनोजगत की बुनावट, उसके संस्कार, उसकी कल्पनाशक्ति और उसकी दृष्टि का बहुत योग होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक परिवेश में रहने वाले रचनाकारों की रचनाएँ भी एक जैसी होतीं। लेकिन हम पाते हैं कि एक ही समय में और एक ही शहर में रहने वाले रचनाकारों की रचनाओं में न केवल अंतर होता है बल्कि प्रायः विरोध भी होता है। प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद की तुलना इस प्रसंग में की जा सकती है। कवि अपने संस्कार और मनोजगत के अनुकूल परिवेश में से अपनी प्रवृत्ति की चीजें पकड़ लेता है। रचना और यथार्थ के संबंध में ध्यान रखना होगा कि यथार्थ एक दृष्टि है जो रचनाकार में होती है। इसलिए रचना का यथार्थ वह है जो रचनाकार उसे देता है अर्थात कविता की महानता इस बात पर निर्भर है कि उसे रचता हुआ कवि कितना महान है यानी कि वह अपनी कविता को कितना महान बनाना चाहता है। तुलसी जब रामकथा लिख रहे थे तो केवल राम की कथा, जो कि निश्चय ही बहुत मार्मिक है, कहना मात्र उनका लक्ष्य नहीं था। उन्हें एक और बड़ी पीड़ा मथ रही थी जो अपने समय की पीड़ा थीः

हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहि पंथ।

जिमि पाखंड विचार तें, लुप्त होइं सद्ग्रन्थ।

समुझि परहिं नहिं पंथ-कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। तृणाच्छादित भूमि पर उन्हें लोगों के चलने के लिए एक पगडंडी बनानी थी और यह एक कठिन कर्म होता है। निराला भी ठीक यही महसूस करते हैं-गहन है यह अंध कारा । और आगे – खड़ी है दीवार जड़ को घेरकर। बड़ा कवि हमेशा अपने को एक प्रकार के बंधन में पाता है। वह अपने शब्दों से ‘ अँधकार की जड़ता‘  की दीवार को तोड़ना चाहता है। एक बेहतर दुनिया का सपना देखता है। ‘  सपना ‘  शब्द से चौंकने की जरूरत नहीं है। जिसके भीतर सपना नहीं है, वह कविता नहीं लिख सकता। हर बड़े कवि और विचारक के भीतर एक सपना होता है । मार्क्स के भीतर राज्यविहीन शोषणमुक्त समाज का सपना था, तो तुलसी और गांधी के भीतर रामराज्य का।

एक बात और। कवि का आत्मसंघर्ष इस बात पर मुनहसर है कि वह जिस दुनिया को रच रहा है या कि जिस अनुभव को शब्द दे रहा है, उसके प्रति उसकी संलग्नता, उसकी प्रतिबद्धता या कि उसकी आस्था कितनी गहरी है। तुलसी की कविता प्रमाण है कि श्रद्धा या आस्था अर्थात् पूज्य बुद्धि किस प्रकार कवि के अहंकार को गला देती है और उसकी वाणी निर्झर की तरह निर्मल तरल और शीतल हो जाती है। कोई जरूरी नहीं कि आपकी आस्था राम में हो, वह सांप्रदायिक सद्भाव में या दलित जीवन या वर्ग संघर्ष या राजनीतिक पाखंड के चित्रण में या और कहीं भी हो सकती है। मगर होनी चाहिए। दूसरों के दुख को अपना बनाने की कोशिश बहुत की , मगर न हुआ (श्रीकांत वर्मा) यदि बाहर का यथार्थ कवि की भीतरी वेदना न बन सका तो कविता में जीवन संभव नहीं है। कविता में प्राण प्रतिष्ठा बाहरी यथार्थ नहीं करता, स्वयं कवि करता है। इसलिए कविता वही होती है जो कि कवि स्वं होता है। सच्ची कविता आंतरिक विवशता में लिखी जाती है। एक ऐसी विवशता में जिससे कवि, बिना लिखे मुक्त नहीं हो सकता। इस प्रकार की विवशता यदि नहीं है तो कवि का आत्मसंघर्ष शुरू ही नहीं होगा। वह केवल जगत के संघर्ष का निर्जीव चित्रण करके रह जाएगा। यदि कविता कवि की आत्मसंभवा न बन सकी तो अनेक ज्ञानपीठ पुरस्कार, व्यास सम्मान, साहित्य अकादमी आदि के पदक-अलंकरण तथा मीडिया या पार्टी के भोंपू उसे आयुष्य नहीं दे सकते। कवि ही कविता का जीवन है और कविता ही कवि का ।      

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                                                                                                                                                                 आकलन


                                                                                                                                                  - प्रतिभा मुदलियार


त्रिलोचन की कविताः ठेठ का ठाठ

 

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कठघरा चिरानी पट्टी में जगरदेव सिंह के घर 20 अगस्त 1917 को जन्मे त्रिलोचन शास्त्री का मूल नाम वासुदेव सिंह था। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम. ए. अंग्रेजी की एवं लाहौर से संस्कृत में शास्त्री की डिग्री प्राप्त की थी। उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव से बनारस विश्वविद्यालय तक अपने सफर में उन्होंने दर्जनों पुस्तकें लिखीं और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। शास्त्री बाजारवाद के घोर विरोधी थे। हालाँकि उन्होंने हिंदी में प्रयोगधर्मिता का समर्थन किया। उनका कहना था, भाषा में जितने प्रयोग होंगे वह उतनी ही समृद्ध होगी। शास्त्री ने हमेशा ही नवसृजन को बढ़ावा दिया। वह नए लेखकों के लिए उत्प्रेरक थे। सागर के मुक्तिबोध सृजन पीठ पर भी वे कुछ साल रहे। 9 दिसंबर 2007 को ग़ाजियाबाद में उनका निधन हो गया।

 

प्रगतिशील धारा के कवि होने के कारण त्रिलोचन मार्क्सवादी चेतना से संपन्न थे। लेकिन इस चेतना का उपयोग उन्होंने अपने ढंग से किया। प्रकट रूप में उनकी कविताएँ वाम विचारधारा के बारे में उस तरह नहीं कहतीं, जिस तरह नागार्जुन या केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं कहती हैं। त्रिलोचन के भीतर विचारों को लेकर कोई बड़बोलापन नहीं है। उनके लेखन में एक विश्वास हर जगह तैरता है और वह विश्वास है परिवर्तन की क्रांतिकारी भूमिका का।

 

वास्तव में प्रगतिशील काव्यधारा में व्यापकता बहुत है। रचनाशीलता की दृष्टि से प्रगतिवादियों में विविधता हैं और साथ ही एक दूसरे से परस्पर अलग भी हैं। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, शमशेर और त्रिलोचन की रचनाशीलता को साथ-साथ और समग्रता में देखने पर उनमें व्यापकता और विविधता का बोध होता है। इन कवियों में रचनात्मक सरोकार की एकता है पर प्रत्येक की काव्य रचना का निजी रुप-रंग भी है। त्रिलोचन की कविता को सरसरी तौर पर देखना कविता के  साथ अन्याय करना है। इससे कविता में निहित वह परतें नज़र नहीं आती जो काव्य वस्तु के  भीतर सहेजी होती हैं। त्रिलोचन की काविता की सहजता ही उनके काव्य को असाधारणता का स्पर्श करा देती है । इसीलिए भी कहा गया कि, उनकी ‘कविता को पढना सृजनशील होने का खतरा उठाना है’। ( साक्षात त्रिलोचन)

 

त्रिलोचन इतने लंबे रचनाकाल से जुड़े रहकर भी किसी भी आन्दोलन, यहाँ तक कि प्रगतिशील कविता-आंदोलन के भी केंद्र में कभी नहीं रहे हैं। वे अपने समानधर्मा कवियों से अलग हटकर सतत रचते रहे हैं।  

दरअसल, प्रत्येक कवि अपनी-अपनी रुचि और संस्कारों से काव्य में अपनी एक निजी भूमिका निभाता है साथ ही अपना दर्शन भी विकसित करता है। यह उसके अपने जीवनबोध तथा परिवेश से निर्धारित होता है। अतः जाहिर है कि यही जीवन-बोध एक कवि को समानधर्माओं से अलग पहचान भी देता है।

 

त्रिलोचन की रचनाशीलता की ताज़गी, उर्जा और अनुभव को केवल प्रगतिशील कविता के निश्चित परिपाटी में नहीं देखा जा सकता है। कारण त्रिलोचन का काव्य कहीं उससे भी परे का है। त्रिलोचन की कविता का पाठ करते समय मुझे लगा कि उनकी कविता विस्फोटों से भरी हिन्दी कविता के शोर से दूर ले जाती है। घोर एकांतिक अनुभूतियों से उपजी निराशा, घुटन, टूटन जैसी चिंताओं और चिंतनों से भरी कविताओं की भीड़ में, कभी त्रिलोचन ने स्वयं को डूबने ही नहीं दिया और एक स्थिर-चित्त कवि के समान अपने भीतर के संसार में डूब कर जो अनुभूति  वे पाते गये,  उसी के अनुसार उन्होंने कविताएँ लिखीं। आत्मालोचन में उन्होने लिखा है,

 

'पहले मैं सोचता था। उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए। किंतु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा, लिखा कर, तेरा आत्म विश्लेषण क्या जाने कब तुझे, एक साथ सत्य, शिव, सुंदर को दिखा जाए, अब मैं लिखा करता हूँ। अपने अंतर की अनुभूति बिना रंग चुने, कागज़ पर बस उतार देता हूं।'

(आत्मलोचन, तुम्हें सौंपता हूं, पृ.-44)

 

समकालीन कविता के प्रमुख प्रगतिशील कवि – मुक्तिबोध, नागार्जून, केदार और शमशेर के साथ त्रिलोचन प्रथम पंक्ति के कवि हैं । इन पाँच शीर्षस्थ कवियों की अपनी-अपनी विशिष्टतायें हैं। जहाँतक त्रिलोचन की कविता की विशेषता है वे सीधे लोक से जुडे हैं उनमें कोई ढोंग नहीं है उनमें है तो बस एक सहजता, एक सच्ची अनुभूति की अभिव्यक्ति। उन्होंने जो लिखा वह ठेठ भारत का ठेठ चित्र था...उसी ठेठपन के कुछ पहलू यहाँ प्रस्तुत हैं। मैंने इस ठेठ भाव को केवल लोक, प्रकृति और भाषा संरचना तक ही सीमित रखा। और एक बात यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि ठेठपन से मैंने अपनी सुविधा के लिए जो अर्थ ग्रहण किया है वह केवल और केवल लोक की सीमा में है।

 

लोक का ठेठपन

 

त्रिलोचन का साहित्य मानवीय संवेदनाओं का अक्षय कोश है। वे समाज के उपेक्षितों, मानवाधिकार से वंचित जनता के सच्चे पैरोकार हैं। वे ग्राम्य-जीवन के अद्भुत चितेरे हैं। त्रिलोचन ने गाँव को निकट से जिया और लिखा भी। उनकी वाणी में गहन बोध, पैनी एवं दूरदृष्टि तथा स्षष्ट एवं सुलझी विवेचना झलकती है। वे बहुत ऊँचा हो जाने के बावजूद अपने गाँव कटघरा चिरानी पट्टी से जुड़े रहें। त्रिलोचन  ने प्रगतिशील कविता में भारत के ग्रामीण जनता का प्रतिनिधित्व किया। त्रिलोचन जैसे साधक और सिद्ध कवि अपनी अनुभूति और साधना के बल पर ग्राम का जो दृश्य प्रस्तुत करते हैं वह हिन्दी कविता की उपलब्धी है। त्रिलोचन ने वही लिखा जो कमज़ोर के पक्ष में था। वे मेहनतकश और दबे कुचले समाज की एक दूर से आती आवाज़ थे। उनकी कविता भारत के ग्राम के उस वर्ग को संबोधित करती है जो कहीं दबा है, कहीँ जग रहा है, कहीं संकोच में पड़ा है। वे उन्हीं के कवि है। ठेठ जन के ठेठ कवि--- तभी ते वे स्वयं कहते हैं

उस जनपद का कवि हूँ
जो भूखा दूखा है
नंगा है अनजान है कला नहीं जानता
कैसी होती है वह क्या है वह नहीं मानता

त्रिलोचन की कविता में चित्रित ग्राम का ठेठपन उनकी कई कविताओं में झलकता है, पर इसकी प्रतिनिधि कविता को देखना हो तो उदाहरण के स्वरूप उनकी ‘फैरु’, ‘परदेसी के नाम पत्र’, ‘नगही महरा’, ‘चंपा काले -काले अच्छर नहीं चीन्हती’, ‘बैठ धूप में’, ‘दुपहरी थी जेठ की’, ‘गाय’, ‘ईख पकने पर’ आदि आदि देखी जा सकती हैं। कवि अक्सर अपने अंतरंग अनुभवों का सादा बयान देते है जिसमें व्यवस्था के प्रति अराजक विद्रोही स्वर नहीं है। ऐसे अनुभवों को त्रिलोचन बिना अलंकार, बिंब, प्रतीक, जैसे काव्य उपादानों के कविता में रखते है पर लोक की अटूट धारा के चलते कविता दमकने लगती है- द्रष्टव्य है ‘चंपा काले -काले अच्छर नहीं चीन्हती’ की कुछ पंक्तियाँ-


मैंने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम सँग साथ रह, चला जायेगा कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!
चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुँगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकत्ता पर बजर गिरे
     कितना सादा, किंतु अर्थपूर्ण बयान है! यहाँ शब्दों का चमत्कार देखिए...चम्पा खुद ब्याह नहीं करेगी...पक्की है अपनी बात पर......पर अगर हो जाय तो....ब्याह के करने और होने में अंतर होता है, यह बात बडी़ सूक्ष्मता से कवि कह जाते हैं और दूसरी ओर चम्पा को यह विश्वास है कि उसको अपने बालम से अलग रहना ही नहीं पडेगा, इसलिए कलकत्ते जाने की आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि वह चाहती हैं कि कलकत्ते पर ‘बजर गिरे’...ताकि बलम के जाने की नौबत ही न आये। यहाँ कवि एक साधारण लडकी के माध्यम से महानगरीय व्यस्त जीवन कितनी बड़ी बात कितनी आसानी से कह जाते है....’बरज गिरे’ में जो ठेठपन है उसमें ह्र्दय की जो सादगी है वह बस यही मिलेगी। इसी प्रकार ‘गाय’ कविता की पंक्तियाँ देखिए-

 

गाय जुगाली करती हो चाहे खड़ी खड़ी
या लेटी अधलेटी अपने खूंटे पर हो
या चरने के लिए खुली होकर बाहर हो
खोज खोज कर घास पर रही हो, जरा बड़ी
चक्कत्तियाँ पाकर थोड़ी सी देर को अड़ी
हो, आगे ही बढ़ते चारों पैर, पंवर हो
पूंछ डांस, कुकुरौछी, इधर उधर हो
तो कौवा भी आता है इसी घड़ी
पूंछ चलाती है गैया तो उसे बचाकर
वह शरीर से लिपके कीड़े चुन लेता है
खा जाता है, और मैल भी आँख कान के
हर लेता है गैया के, कितना संभाल कर
यह संबंध मुझे चुपके से जो देता है
वह संभाल लेता हूँ मन में, निजी मान के”
        त्रिलोचन इस कविता में अपने आसपास के परिवेश का चित्र कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करते हैं, इसमें कोई विचार नहीं है, ना ही कल्पना की ऊँची उड़ान ही है। यह शुध्द पर्यवेक्षण की कविता है। जो जिस रुप में देखा, हू-ब-हू वैसा ही रच दिया। अपनी ओर से जोड़-तोड़ नहीं किया। यही लोक का स्वभाव भी है, यानि खरा, पवित्र। यहाँ भावना प्रधान होती है, न कि कला। अर्थात वे हृदय से लिखते थे, बल्कि कविता को अपना हृदय ही देना चाहते हैं। कलम की दिमागी कसरत नहीं करते थे। मुझे लगता है कि यह कविता वर्णन की अद्भुतता के कारण ही संभव हुई है। ‘गाय’ कविता की अंतिम दो पंक्तियाँ – 'यह संबंध मुझे चुपके से जो देता है। वह संभाल लेता हूँ मन में, निजी मान के’।कविता को एक भिन्न केनवास पर ले जाती हैं। कवि समाप्त होती हुई कविता में लगभग अंत में अपनी बात गहरे अर्थों में सम्पन्न कर देते हैं। ‘गाय और कौवे’ का संबंध केवल त्रिलोचन ही देख सकते हैं और उसे सहेज भी सकते हैं। इसी क्रम में एक अन्य कविता ‘परदेसी के नाम पत्र’ में गाँव के जीवन का, वहाँ के विषयों का जिक्र करते हैं जहाँ लोक का सहज भावबोध व्यक्त हुआ है,

वह जो अमोला तुम ने धरा था द्वार पर,

अब बड़ा हो गया है। खूब घनी

छाया है। मौंरों की बहार है। सुकाल

ऐसा ही रहा तो फल अच्छे आयेंगे

कविता में और आगे बछिया की बात, मन्नु बाबा की भैंस का ब्यायना आदि मजमुन पत्र में है। यूँ है तो यह एक मामुली सा पत्र,  पर यही पत्र गाँव की भावधारा का जीवंत मानचित्र खड़ा कर देता है। त्रिलोचन का यही विशेष व निजी स्वभाव है कि वे बिलकुल जनमानस से जुड़ जाते हैं।

जो कवि धरती से जुड़ा है उसकी कविता घर परवेश से दूर तो रह ही नहीं सकती। ‘दिगंत’ तथा ‘धरती’ में त्रिलोचन घर परवेश के कवि हो जाते हैं। मुलतः घर त्रिलोचन की कविता का स्थायी धरातल  है। यह अनुभव भरा घर उनकी कविता की बनावट भी है और बुनियाद भी।

अपना ही घर

महल खड़ा करने की इच्छा है शब्दों का

जिसमें सब रह सकें, रम सकें,

सांचा ईंट बनाने का मिला नहीं है, अब्दों का

समय लग गया, कवेल कामचलाऊ

ढांचा किसी तरह तैयार किया है.

 

इसीतरह एक अन्य कविता में कवि कहते हैं,

 

जब जब बाहर से आया तब तब मेरा घर

अपने अपनेपन से अधिकाधिक अपनाता

मुझे मिला। आवाजों से ही जान बचाता

किसी तरह घर आता हूँ, इसमें अपने स्वर

सुनता हूँ, गुनता हूँ, बार बार भी सुनकर

तृप्ति नहीं पाता। अपने मन को समझाता

हूँ, जीवन भी बन्दी स्वर है, स्वर का नाता

कहाँ छोड पाता है जीवन, जग में जग कर

 

अपनी धरती की सोंधी गंध से गहरे जुड़े त्रिलोचन की कविता लोक जीवन से सीधा साक्षात्कार करती है। प्रखर लोक चेतना कवि की कविता का सशक्त पक्ष है। कवि की कविता में देसीपन है, गाँव का खाटी संस्कार है। लोक संवेदना, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं, लोक ध्वनियों, बोलियों को कवि की कविता शब्दबद्ध करती है। कविने एक बातचीत में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि ‘उन्होंने कविता लोक से सीखी है, पुस्तक से नहीं’। 'लोक' समकालीन कवियों की कविताओं में अपनी समग्र प्राणवत्ता, जीवंतता के साथ उपस्थित हुआ है। त्रिलोचन की कविता में लोक का समूचा परिदृश्य उभरा है। कवि की कविता के महत्वपूर्ण पात्र ‘भोरई केवट’, ‘नगई महरा’, ‘चंपा’, ‘चित्रा’, ‘परमानंद’ आदि सीधे-सीधे लोक से ही लिए गए हैं। त्रिलोचन का गाँव से गहरा रिश्ता है। उनकी कविता में लोक जीवन के उनके अनुभव, स्मृतियाँ दिखाई देती हैं-यह अनुभूति देखिए.

घमा गए थे हम
फिर नंगे पाँव भी जले थे
मगर गया पसीना, जी भर बैठे जुड़ाए
लोटा-डोर फाँसकर जल काढ़ा
पिया
भले चंगे हुए
हवा ने जब तब वस्त्र उड़ाए

 

भारतीय किसान की निश्छल, भोली-भाली दुनिया कवि की वास्तविक दुनिया है। भारतीय किसानों की मानसिकता, उनके मनोविज्ञान की बड़ी सूक्ष्म पकड़ कवि को है।

 

वह उदासीन बिल्कुल अपने से,
अपने समाज से है, दुनिया को सपने से अलग नहीं मानता
उसे कुछ भी नहीं पता दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँची, अब समाज में
वे विचार रह गए वहीं हैं जिनको ढोता
चला जा रहा है वह, अपने आँसू बोता
विफल मनोरथ होने पर अथवा अकाज में।
धरम कमाता है वह तुलसीकृत रामायण
सुन पढ़कर, जपता है नारायण नारायण।

 

डॉ.कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने अपने एक लेख में त्रिलोचन के काव्य का सही आकलन किया है उनके ही शब्दों में, ‘त्रिलोचन को पढ़कर कभी मन उमगता है, कभी कलेजा मसोसने लगता है, देश का पूरा अतीत बाँह पकड़कर अपनी ओर खींचने लगता है । एक पूरा राष्ट्र शरीर धारण कर सामने खड़ा हो जाता है, कहीं उसकी सिहरन और रोमाँच, कहीं बुद्धि का तज़ुर्बा और अनुभव दूर-दूर प्रवेशों के दृश्यों की पेंटिंग, कालिदास और देव के अभिसार ही नहीं, कबीर का फक्कड़पन, तुलसी का स्वाभिमान, घाघ और भड्डरी का लोक चातुर्य और लोक अनुभव, सेनापति और पंत का प्रकृति-निरीक्षण और निराला की शिल्प चेतना आदि कितनी ही चीज़ें एक साथ मिलेंगी’। ( सृजनगाथा )

 

उनकी कविता का जनमानस में देर तक बने रहने की वज़ह है उनका लोकसंस्कारी स्वभाव और गाँव के कृषक-समाज से समीपता, जो उन्हें चिरानीपट्टी गाँव और काशी में मिली थी। चिरानीपट्टी ने उनको लोक की समझ दी और काशी ने काव्य- चिंतन की। उनका लोक जिन तत्वों से बना है, उसमें बडी़-बडी़ बातों के लिये जगह नहीं। हम नगरवासी संभवतः त्रिलोचन के उस गहन अनुभूति को समझने में छोटे पड़ सकते हैं कारण हमारे अनुभव का दायरा कमरों-गलियारों तक ही सीमित हैं .....वहाँ वह नहीं जो गाँव की खुली हवा में महसूसा जाता है। मुझे त्रिलोचन की कविता की नब्ज पकडने में बडी मुश्किल लग रही थी इसका प्रमुख कारण उनकी वस्तु और भाषा का ठेठपन। उनकी वस्तु को समझने के लिए गाँव देहात की समीपता आवश्यक है...जहाँ मुझ जैसी की अपनी सीमा भी एक अड़चन है।

 

प्रकृति की लीला और सौन्दर्य

 

त्रिलोचन के कविता का एक अन्य महत्वपूर्ण विषय प्रकृति है । त्रिलोचन जितने मानव-संघर्ष के कवि हैं, उतने ही प्रकृति की लीला और सौन्दर्य के भी। इसीलिए प्रकृति बहुत गहराई तक उनकी कविता में रची-बसी है। उनकी कविता में प्रकृति भी आती है तो वह मनुष्य के साथ कोई न कोई रिश्ता लेकर आती है। त्रिलोचन प्रकृति को देखकर मौन नहीं हो जाते हैं। वे उसमें जीवन देखते हैं। अपने मन की अनुभूतियाँ और मनुष्य के प्रकृति के साथ बनते-बदलते संबंधों और मनुष्य के प्रकृति के साथ लंबे संघर्ष को देखते हैं जैसे – ‘पृथ्वी गल गई है, पेड़ों की पकड़ ढीली हो गई है’। प्रकृति के बारे में त्रिलोचन का दृष्टिकोण बहुत कुछ उस ठेठ भारतीय किसान के दृष्टिकोण जैसा है जो कठिन श्रम के बीच भी उगते हुए पौधों की हरियाली को देखकर रोमांचित होता है। निराला की तरह त्रिलोचन ने भी वर्षा के अनेक चित्र अंकित किये हैं।(उदा. भादों की रात, उड़ते है पारावात, कृष्ण मेघों से, निझरे झीने झीने बादल) और बादलों के कठोर संगीत  को अपनी अनेक कविताओं में पकड़ने की कोशिश की है। परन्तु ऐसा करते हुए वे किसी विलक्षण सौन्दर्य-लोक का निर्माण नहीं करते, बल्कि अपनी चेतना के किसी कोने में दबे हुए किसान का मानो आह्वान करते हैं – ’उठ किसान ओ, उठ किसान ओ, बादल घिर आये।’ प्रकृति और जीवन के प्रति यह किसान-सुलभ दृष्टि त्रिलोचन की एक ऐसी विशेषता है, जो सिर्फ़ उनकी अलग पहचान ही नहीं बनाती, बल्कि उनकी विश्व-दृष्टि को समझने की कुंजी भी हमें देती है।

 

उनकी कविताओं में बड़ी मात्रा में लोक-चित्र  मिलते हैं। वे अपने आस-पास की प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, उनकी बारीक गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर कविता की सुन्दर माला रच देते हैं। इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों से न्यस्त होकर उनकी कविता में कला का स्वत: प्रस्फूटन हो जाता है । इसलिये उनकी कविता में वक्रता और गूढ़ता की जगह आत्मीयता और सरलता का बोध होता है।

आज पवन शांत नहीं है श्यामा / देखो शांत खड़े उन आमों को / हिलाए दे रहा है/ उस नीम को / झकझोर रहा है /और देखो तो / तुम्हारी कभी साड़ी खींचता है / कभी ब्लाउज़ /कभी बाल /धूल को उड़ाता है /बग़ीचों और खेतों के/ सूखे तृण-पात नहीं छोड़ता है/ कितना अधीर है /तुम्हारे वस्त्र बार बार खींचता है/ और तुम्हें बार बार आग्रह से/छूता है /यौवन का ऎसा ही प्रभाव है /सभी को यह उद्वेलित करता है
आओ ज़रा देर और घूमें फिरें /पवन आज उद्धत है /वृक्ष-लता-तृण-वीरुध नाचते हैं/ चौपाए कुलेल करते हैं /और चिड़ियाँ बोलती हैं।

 

‘वातावरण’ की यह पक्तियाँ भी देखिए

 

सांझ गुलाबी काँप रही है ठण्ड से

उधर गुलाबों के पौधे लाचार हैं

झूल झूल कर फूल हवा से कह रहे

हैं यह, इतनी छेडछाड़ अच्छी नहीं

 

कवि ने प्रकृति के उपादानों के साथ एक रिश्ता कायम किया है, वे उनके जीवन के संगी साथी है, सेमल का वृक्ष इसका एक अच्छा उदाहरण है, “साथी है मेरा एक, सेमल का पेड़, जो पुराना है”। इस पेड़ ने कई पतझरों पर अपने पत्त्ते लुटा दिये हैं, दिशाओं को रंग दिये है, जिसकी खाल अब काली हो चुकी है, चिडिया आकर किलकिलाती है, जानवर छाँह के लिए आ जाते हैं, अपने इस साथी का परस पाकर सिराओं में नई रवानी आती है....पर सेमल में सुगंध नहीं...उससे कवि को कोई शिकायत नहीं है वे कहते हैं.

 

मुझ को शिकायत नहीं कभी

क्यों नहीं सुगन्ध कभी देता वह

फूलों में जो कुछ भी देता है

वही कौन कम है

 

प्रकृति तो उनमें रची बसी है। उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है। मधुमक्खियाँ, गौरेया, कठफोड़ा, धूप ,हवा, पानी, फल, फूल बादल, चाँद, सूरज, बसंत, शरद, बरसात, सुबह ,शाम रात, तमाम प्राकृतिक उपादान उनकी कविता में आ जाते हैं, पर उनकी ओर देखने का कवि का दृष्टिकोण भिन्न है। प्रकृति के साथ रहनेवाले त्रिलोचन की निरिक्षण क्षमता पर मुग्ध हुए बिना रहा नहीं जा सकता। ‘बेले के पत्ते’ कविता देखिए या फिर इन पंक्तिय़ों को ही दिखिए-

 

बादलों ने ली अंगडाई

एक ओर ज़रा चमक बढ गई

हवा नए अंखुओं से यों ही बतियाती है

उनका सिर हिलता है

फूल खिलखिलाते हैं

 

पर एक बात और कि त्रिलोचन केवल प्रकृति का रसास्वादन ही नहीं करते बल्कि उनके सामने एक सवाल भी आता है, 'अगर चाँद मर जाता, झर जाते तारे सब, क्या करते कविगण तब? खोजते सौन्दर्य नया? देखते क्या दुनिया को? रहते क्या, रहते हैं, जैसे मनुष्य सब? क्या करते कविगण तब? ' त्रिलोचन प्रकृति को देखकर मौन नहीं हो जाते हैं। वे उसमें जीवन देखते हैं। अपने मन की अनुभूतियों के साथ साथ वे मनुष्य के प्रकृति के साथ  बनते-बदलते संबंध और संघर्ष को भी देखते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में यही तो बातें रूपाकार पा जाती हैं, इतना ही नहीं प्रकृति के विनाशक रूप में भी उनका भावबोध एक भिन्न अनुभूति दे जाता है, इस संदर्भ में ‘आँधी औऱ चारों और बाढ आई है’, कविता को लिया जा सकता है। जिसमें कविने बाढग्रस्त प्रकृति को शब्दबद्ध किया है जैसे – ‘पृथ्वी गल गई है, पेड़ों की पकड़ ढीली हो गई है, आज ककरिहवा आम सो गया’।

 

इसी प्रकार जेठ की दूपहरी कविता है। इस सॉनेट में शुरू में कवि कहानी सा कहता जाता है, लेकिन इनके तीन पक्ष स्पष्ट हैं, एक- जेठ की दुपहरी का प्रकोप, दो- उस प्रकोप को सहने की दृठता और तीन- एक अंधविश्वास का मखौल..

 

हम तुम समय नहीं मुहूर्त देख चले थे।

पंखे लू के मारूत ने अमिराम झले थे

 

इन अंतिम पंक्तियों को समझना भी ज़रूरी है। यहाँ जेठ की दुपहरी का एक अन्य अर्थ जीवन से जुड़ जाता है। वस्तु, वस्तु ही बनी रहे और पूरा चित्र जीवन से जुड़ जाय यह त्रिलोचन की लेखनी का ही कमाल है। 

 

भाषिक संरचना

 

भाषा के प्रति त्रिलोचन सजग हैं। उनकी भाषा सबसे अलग, अनूठी और कला की ही तरह सरल है जिसका ठेठ देशज जातीय रुप ही उनकी पहचान भी है और महानता भी। त्रिलोचन ने भाषा शैली और विषयवस्तु सभी में अपनी अलग छाप छोड़ी है। त्रिलोचन ने लोक भाषा अवधी और प्राचीन संस्कृत से प्रेरणा ली। इसलिए उनकी विशिष्टता हिंदी कविता की परंपरागत धारा से जुड़ी हुई है। मज़ेदार बात यह है कि अपनी परंपरा से इतने नजदीक से जुड़े रहने के कारण ही उनमें आधुनिकता की सुंदरता और सुगंध है।

त्रिलोचन अपनी कविता की शब्दावली लोकजीवन से ग्रहण करते हैं। छुट्टा, ग्वैड़े, थेथर, हरहा, पलिहर, बारी, इनार, जैवरी, बकैंया, मड़ई, सीवान जैसे लोक के जाने बूझे खाँटी शब्द कवि की कविता के सौंदर्य में वृद्धि करते हैं। ऐसे शब्दों का प्रयोग लोकजीवन से गहरे जुड़ा कवि ही कर सकता है। बोली, भाषा के साथ यहाँ इतनी रची-बसी हैं कि इसका संश्लेषण इतने व्यापक रुप में किसी अन्य कवि की रचना में दृष्टिगोचर नहीं होता। त्रिलोचन जी का कथन है कि, कविता में बोलचाल की भाषा आनी चाहिए। जो शब्द खपते हो उन्हें लेने में संकोच नहीं होना चाहिए।.....जीवन्त भाषा किताबों से नहीं आती। अपनी भाषा के इस प्रकृत गुण को त्रिलोचन ने सदैव बनाए रखा।

यथार्थवादी शैली और बातचीतवाली भाषा ने त्रिलोचन की कविता को एक नया आयाम दिया है। कविता में छोटी बड़ी कहानी एक संश्लिष्ट काव्य रूप है। गंभीरता विचारशील भाव, अनुभूति की गहन एकाग्रता और कसी हुई भाषा के साथ ही चौदह पंक्तियों का अनुशासन, जो सॉनेट की विशिष्टता है, त्रिलोचन की मनोभूमि के अनुसार है। कला या रूप की दृष्टि से तो यह सर्वमान्य तथ्य है कि सॉनेट के क्षेत्र में त्रिलोचन का काम अद्वितीय है। हिंदी में सॉनेट को विजातीय माना जाता था। लेकिन त्रिलोचन ने इसका भारतीयकरण किया। इसके लिए उन्होंने रोला छंद को आधार बनाया तथा बोलचाल की भाषा और लय का प्रयोग करते हुए चतुष्पदी को लोकरंग में रंगने का काम किया। इस छंद में उन्होंने जितनी रचनाएँ कीं, संभवत: स्पेंसर, मिल्टन और शेक्सपीयर जैसे कवियों ने भी नहीं कीं होगी। सॉनेट के जितने भी रूप-भेद साहित्य में किए गए हैं, उन सभी को त्रिलोचन ने अजमाया। फ्री वर्स के ज़माने में एक बंधन लेकर चलनेवाला यह ठेठ भारतीय किसानी मन का कवि अपनेआप में अनोखा है।
त्रिलोचन की कविताओं में अभिव्यक्ति की सहजता भी इतनी अलग है कि एक नये काव्य-सौंदर्य की अनुभुति कराती है जिसका पाठक के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह सहजता मात्र लोक की बानगी के कारण नहीं है, अपितु भाषा की तरलता, हृदय-तत्व का समावेश लोक-स्पर्श का परिणाम है जो मात्र त्रिलोचन में ही देखा जा सकता है। इसलिये यह अद्भुत है, और इसका विशेष महत्व है। दूसरी ओर वे ठेठ अवध के कवि हैं फलतः अवधी बोली का सर्जनात्मक क्षमता से खडी बोली को अधिक आत्मीय और व्यंजनाक्षम बनाने के आग्रही है। अवध अपनी सारी प्राकृतिक और सांस्कृतिक गरिमा के साथ त्रिलोचन की कविता में अवतरित हुआ है।

 

लोक, जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण और प्रकृति ही स्वयं त्रिलोचन की कविता की कला का रुपाधार हैं। प्रेम, प्रकृति, सौंदर्य और लोक की प्रामाणिक उपस्थिति के साथ आम जनता के संघर्ष, उसकी वेदना को सशक्त शब्दों में अभिव्यक्त करने वाली इस कवि की कविता अपना विशेष स्थान रखती है। संस्कृत की प्राचीनतम परंपरा से लेकर हिंदी की ठेठ जनपदीय बोली तक प्रभाव ग्रहण करते हुए त्रिलोचन की काव्य वस्तु और भाषा मौलिक है, जो अपना गंभीर, संयत प्रभाव डालती है।

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                                                                                                                                                    कहानी समकालीन




                                                                                                                                                    

                                                                                                                                                      वीना विज ' उदित'




                                                       सन सन अस्सी की बात है| अमेरिका से पीटर, उसकी पत्नी कैरोलीना एवम क्रमशः बारह और दस वर्ष की आयु के उनके दो पुत्र जैक व जैरी कश्मीर आए थे | श्री नगर हवाई अडडे पर पहुँचते ही कश्मीर की ठंडी हवाओं ने उनके तन का स्पर्श किया, तो दिल्ली के तपते जून की तपिश का रोष उनके मन से जाता रहा |
अमेरिकी परिवार को बाहर आते देखकर एक आकर्षक कश्मीरी युवक एक हाथ में उनके नाम की तख्ती पकड़े हुए , दूसरा हाथ हिलाते हुए उनके सम्मुख जा पहुँचा | उसे देखते ही वे मुस्कुरा उठे और निश्चिंत हो उसके साथ निकल पड़े अपने अभियान पर |  कश्मीरी उच्चारण की अंग्रेज़ी बोलते हुए उस युवक ने बताया कि उसका नाम इकबाल है | वह ही ‘आल्प्स’ हाऊसबोट का गाईड है, जहाँ उनकी बुकिंग हुई थी|
एयरपोर्ट से शहर जाते हुए मार्ग के दोनो ओर गगनचुंबी पाँपलर वृक्षों की कतारें देखकर वे आनंदित हो उठे |अन्ततः वे एक नीले फ़िरोज़ी नग जैसी झील के किनारे पहुँचे, जिसके किनारे वर्तुलाकार सड़क साँप की तरह दौड़ रही थी |यही उनकी विराम-स्थली ‘डल -झील′ थी| झील के अतुलित सौन्दर्य से सम्मोहित हो वे सब विदेशी झट कारों से उतरकर फोटो खींचने लगे |सामने झील में रंगीन हाऊसबोटों की कतारें विभिन्न नामों से सजी खड़ी थीं–जैसे प्रिंसेस आँफ लेक, ब्राईट क्वीन, राजा, हुंज़ा, पम्पोश,विएना आदि |हाऊस-बोटस के ऊपर रंग- बिरंगी छतरियाँ सजी थीं| जैक व जैरी बाल-सुलभ उत्साह से भरकर ‘वाओ-वाओ’ चिल्ला उठे |उनके मन को लुभा रहे थे-झील में तैरते शिकारे, जो लाल-पीले, नीले-हरे, सफेद-नारंगी रंगों के कपड़ों की छींट की छतों व पर्दों से सुसज्जित थे | किसी शिकारे में फूलवाला फूल सजाए था तो किसी में कश्मीरी नक्काशी का सामान था | किसी में ताजी सब्जियों की दूकान थी तो किसी में गहनों की, या फिर केसर बेचनेवाले थे| चलती -फिरती दूकानें झील में तैर रही थीं |ऍसा बाज़ार उन्होंने न कभी देखा था, न कभी सुना था | शिकारे चलानेवालों के चप्पू चलाने से छपाक -छपाक की जो ध्वनि सुनाई दे रही थी, उससे झील का वातावरण संगीतमय हो रहा था |
इस बीच इकबाल ने उनका सारा सामान एक शिकारे पर रखवाया व उन्हें भी उसी शिकारे में बिछी रंग-बिरंगी गद्दियों पर बैठाकर ले चला उनके स्वप्नलोक में -झील के भीतर की ओर |झील में तैरते फूल-पत्तों को हाथ से छूने की चाह लिए वे डीलक्स हाऊसबोट की कालोनी में पहुँचे | यहाँ सब हाऊसबोट्स को जोड़ता एक गलियारा था |इस जगह से झील के किनारे की सड़क दिखाई नहीं देती थी |यहाँ गहन शांति थी |चारों ओर से केवल चप्पुओं की आवाज़ सुनाई देती थी |सम्मुख था उनका पड़ाव’ आल्प्स’ हाऊसबोट | बेहद सुन्दर!!!लकड़ी की दो -ढाई इंच गहरी नक्काशी के काम से उसकी हर दीवार सजी थी |दूर से ही उसे देखकर सब की बाँछे खिल गईं |बहुत सँभालकर पकड़-पकड़कर इकबाल ने बारी-बारी से सभी को शिकारे से किनारे पर उतारा | हर बार शिकारा पानी में डोल जाता व लगता गये सब पानी में |कैरोलीना इसी पर खिलखिलाते हुए पैंतीस की आयु में भी बीस की ही लग रही थी | तभी वो किनारे उतरने को उछली, जिससे शिकारे का संतुलन बिगड़ गया और उसकी एक टाँग गई पानी में |पलक झपकते ही इकबाल ने एक हाथ से उसकी कमर व दूसरे से गलियारे की डंडी पकड़ ली |अपनी बलिष्ठ बाजू से उसे उठाकर उसने फूल की तरह गलियारे पर रख दिया| कृतज्ञ दृष्टि से उसने इकबाल के दोनो हाथों को पकड़कर चूम लिया |पीटर के कैमरे ने उस रोमांचक घटना को कैद कर लिया |
‘आल्प्स’ की बालकनी में पहुँचकर सभी ने जूते वहीं बाहर उतार दिये |भीतर के कश्मीरी कालीन पर जूते ले जाने का साहस कोई नहीं जुटा पाया |बोट की भीतरी साज-सज्जा, अखरोट की लकड़ी का आरामदेह फर्नीचर, जो नक्काशी के बेहतरीन नमूने थे, छत से लटकते काँच के झूमर, रंगीन ऊन से कढ़ाई किए हुए रंगीन कुशन व पर्दे इसके अलावा काँच के आकर्षक बर्तन एवम कटलरी, जो काँच की पारदर्शक अल्मारियों में सजी थी —यह सब देखकर वे एकबारग़ी स्तंभित रह गये | भीतर की ओर तीनों बैडरूम थे, जो अंग्रेज़ी व कश्मीरी सभ्यता का मिला-जुला स्वरूप थे |
कैरोलीना सारा मुआईना करके मंत्रमुग्ध सी जाकर बालकनी के झरोखों के मध्य बैठ गई |झील की निस्तब्धता भंग करती दूर से आती चप्पू की आवाज़ उस पर जादू सा असर कर रही थी | झील के गहरे नीलेपन को वो अपने नीलाभ नयनों में भर रही थी | जगह-जगह छितराए कमल के पत्तों के बीच खिले कमलिनी व कमल के फूल उसे अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे | शांत-संयत बहती मीठी बयार साँझ ढलने का आभास दे रही थी | ऍसी भाव-विभोर वह पहले कभी नहीं हुई थी |वह धीरे-धीरे कुछ गुनगुनाने लगी | घिरती आती साँझ में चारों ओर जगमग जगमग करते रोशनी के बिन्दु जल उठे | झील का जल गहराकर कालिमा का रूप ले चला था | जगमगाती रोशनी के बिन्दुओं की परछाईं जल के भीतर व बाहर दोहरी रोशनी का प्रकाश बिखेरे रही थी, तभी बोट के मालिक अब्दुल रहीम ने आकर कैरोलीना की तंद्रा भंग की | कुशल-क्षेम व कुछ जलपान के पश्चात उनके कश्मीर-भ्रमण का पूरा विवरण तभी बना दिया गया |
अगली सुबह पीटर परिवार इकबाल के साथ निशात बाग,शालीमार बाग और चश्मे शाही बाग की सैर करने गए | रात ढलते ही निशात बाग़ में’ लाईट एंड साउंड’ प्रोग्राम था | वृक्ष पर पड़ती हल्की नीली- पीली रोशनी व उसी क्षण घुंघरुओं की छन-छन मधुर ध्वनि किसी के चलने का अहसास देती थी | साथ ही साथ अंग्रेज़ी में कमैंट्री भी चल रही थी |यूं महसूस हो रहा था, जैसे बेग़म नूरजहाँ वहीं कहीं थी |एक घंटे का शो देखने के बाद सब उसी शो की ख़ुमारी में गुम चुपचाप वापिस आ गए |खाने के बाद कैरोलीना चुपचाप हाऊसबोट की छत पर जाकर लेटके खुले आसमाँ को निहार रही थी कि उसे ढूँढता हुआ पीटर हाथ में व्हिस्की का गिलास लिए आ पहुँचा | कैरोलीना को बात करने के मूड में न देखकर, वह वापिस नीचे चला गया | थोड़ी देर बाद इकबाल यूँ ही ऊपर आया |उसे वहाँ लेटे देखकर वह जैसे ही वापिस जाने को मुड़ा, कैरोलीना ने उसे बुलाकर बैठने को कहा |वह थोड़ा हिचकिचाया तो कैरोलीना ने उसे समझाया कि वह तो दोस्त की तरह पूरे भ्रमण में उनके साथ रहेगा —तो दोस्त ही हुआ न! इसलिए वह कैरोलीना को ‘दोस्त’ कहकर ही बुलाए |इकबाल को बात जँच गई, वह वहीं बैठ गया |चाँद के धवल प्रकाश में वह इकबाल की मोटी-मोटी बोलती आँखों को पढ रही थी, जिनमें वही सम्मोहन था जो बला की खूबसूरत कश्मीर की वादियों में था |इस पर वह अचकचा गया | बढ़ती ठंडक को महसूसते हुए इकबाल ने कहा, ‘फ्रेंड ! नीचे चलें, कल फिर सुबह घूमने जाना है | न जाने क्यों एक आज्ञाकारी बालक की भांति वो उसकी बात मानकर नीचे चल पड़ी |
दूसरे दिन इकबाल पीटर परिवार को ‘वेरीनाग़ ‘ और ‘जवाहर टनल′(सुरंग) दिखाने ले गया |वेरीनाग के बाग़ के बीचों-बीच एक चबूतरा बना था, उसके भीतर से एक चश्मा (spring ) निकल रहा था, ये झेलम दरिया का स्त्रोत है-इकबाल ने बताया | फिर वे सुरंग देख्नने गए, जिसे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान-मंत्री ने ढाई किलो मीटर चौड़े पर्वत के अंदर से निकलवाया था, जिससे सारे भारत के लोग व कश्मीर के लोग आपस में आ जा सके |उन्हीं के नाम से इसका नाम जवाहर टनल पड़ा |ये दो सुरंगें हैं |एक आने की व दूसरी जाने की | सुरंग से बाहर घाटी में आते ही वहाँ से पूरी घाटी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है |जिसकी सुन्दरता अवर्णनीय है |यह सब देखते हुए साँझ ढल आई, तो वापसी में सब ने श्रीनगर के बाज़ार की रौनक देखी | दुकानों पर कश्मीरी कढाई, पेपरमशी व लकड़ी की नक्काशी का आकर्षक सामान देखकर वे परदेसी कुछ भी न खरीदने का मोह संवरण नहीं कर पाए |सो छुट पुट सामान खरीद ही लाए |
रात को नींद न आने के कारण कैरोलीना आ कर बैठक में बैठ गई | इकबाल सोने जाने से पहले रोशनी बुझाने आया तो कैरोलीना ने उसे कहा कि वो चाँदनी रात में शिकारे पर झील में सैर करना चाहती है | इकबाल ने उसी पल बाहर गलियारे पर जाकर किसी को जोर की आवाज़ दी , प्रत्युत्तर में अँधेरे को चीरता हुआ एक सुन्दर सा शिकारा लेकर एक हाँजी (शिकारा चलाने वाले को कहते हैं) वहाँ आ पहुँचा | कैरोलीना के आग्रह पर इकबाल वहीं उसके सामने गद्दे पर बैठ गया |बाकि परिवार सो चुका था |सो, धीरे- धीरे चन्द्रकिरणों को झील की लहरों पर चीरता शिकारा बढ चला, ‘चार चिनार’ की ओर | धरती के पचास फीट लम्बे व चौड़े टुकड़े के चारों कोनों पर चार चिनार के पेड़ झील के मध्य में खड़े हैं|साथ ही ढेरों दुधिया सफेद रोशनी के बिन्दु वहाँ सारी रात जगमगाते रहते हैं |करीब दो घंटों के सफ़र के बाद ये वहाँ पहुँचे | झील के भीतर पानी की परछाँई में भी एक चार चिनार दिखाई दे रहा था |कुछ परी-लोक सा नज़ारा था |कैरोलीना ने इकबाल को हाथ पकड़कर अपने पास ही बैठा लिया |वापसी में नीरव रात्रि की निस्तब्धता में वह इकबाल से सटकर वहीं गाव -तकिये पर आँखे मूँदे झील में चलते चप्पू की संगीतमय लय में शिकारे की सैर का आनन्द लेने लगी | धीरे- धीरे उसका सिर इकबाल के कंधे से आ लगा | पहले तो इकबाल घबरा गया , लेकिन कहीं मैडम की नींद न खुल जाए -इस विचार से वह वैसा ही बैठा रहा | रात्रि के पिछले पहर में तो रोगी की आँख भी झपक जाती है, फिर यह तो मदमस्ती का आलम था, सो उसकी आँखे भी मुँद गईं |इस ह्क़ीकत को वह मीठे ख़्वाब की तरह बंद आँखों में कैद किए रहा | आधी रात को हाऊसबोट के पास पहुँचने पर ही वे जागे |कैरोलीना भीतर सोने चली गई, परंतु पच्चीस बरस के जवां मर्द इकबाल की आँखों से नींद कोसों दूर जा चुकी थी |
सुबह नाश्ता लगने के बाद कैरोलीना नींद से उठी, सबको ‘गुड मार्निंग’ कह वह इकबाल की ओर देखकर अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराई| इकबाल का चेहरा रक्ताभ हो उठा| आज गुलमर्ग जाने का प्रोग्राम था |जैक व जैरी घुड़सवारी करने के ख़्याल से अति उत्साहित थे | टनमर्ग होते हुए सब कार में ही गुलमर्ग पहुँचे|उसके बाद वहाँ घोड़े वालों ने उन्हें घेर लिया | जिन्हें कश्मीरी भाषा में इकबाल ने सँभाला व रेट बनाया |सब पोनी ( घोड़ों) की पीठ पर बैठ कर खिलनमर्ग की चढ़ाई चढने लगे | वैसे लोग खिलनमर्ग की चढाई पैदल या गंडोले (रोप वे) पर भी करते हैं|इकबाल ने साफ़ सुथरे हरे घास के मैदान दिखाते हुए उन्हें अठारह होल्स वाले विश्व में सबसे ऊँचे ‘गौल्फ-ग्राऊण्ड’ की जानकारी रटी रटाई अंग्रेज़ी में दी |वह जब भी बोलता ,उसकी मोटी-मोटी आँखें संग बोलती थीं| श्रोता उनके सम्मोहन में बँधा रह जाता था |थोड़ी और ऊपर की चढाई के बाद ‘अलपत्थर’ यानि कि पर्वत पर ऊँचा धरातल था| वहाँ केवल एक ही चाय की दुकान ,वही ढाबा भी था , उन दिनों | अब यह लोग पहाड़ों के इतने करीब थे कि वहाँ ऍसा आभास होता था , मानो हिम से ढँकी ऊंची पर्वत श्रंखलाओं को वे आगे बढकर बाहों में भर लेंगे| इकबाल ने बताया कि यही हिमालय पर्वत है |इतना सुनते ही उन्हें अपना कश्मीर आना सार्थक लगा | बादलों के झुंड के झुंड आकर उन्हें भिगो जाते व पुनः पर्वतों की गोद में अठखेलियाँ करने चले जाते थे |ऍसे छुआ- छुअल्ली के खेल की तो परिकल्पना भी नहीं थी उन्हें |हिमालय पर्वत से मेघ आकर उनके तन को छूते हैं, इस विचार मात्र से वे रोमांचित हो उठे |मूवी कैमरे में वो मानो स्वर्ग को कैद कर रहे थे|ऍसे आलौकिक सौन्दर्य की साक्षी बनी कैरोलीना ने अचानक इकबाल की आँखों में खोकर उसे ‘थैन्कयू फ्रैंड’ कहा और बढकर उसके दोनों हाथों को चूम लिया | माँ की देखादेखी हर्ष विभोर जैक व जैरी ने भी इकबाल को ‘थैंक्स’ कहा व उसके हाथों को बार-बार चूमा |इस सबसे इकबाल भी बहुत प्रसन्न था |
आज सब बहुत थक गये थे | खाने के बाद बच्चों ने भी ब्रांडी पी व जल्दी ही नींद की आग़ोश में सब गुम हो गये |लेकिन कैरोलीना के पैरों व टाँगों में थकावट से दर्द हो रहा था, उसने इकबाल को बुलवा भेजा |इकबाल आया तो उसने कहा कि किसी मालिशवाले को बुलवा दे| इकबाल गया और ऑलिव-आयल की शीशी लेकर स्वयं ही आ गया, क्योंकि इतनी रात को कोई मालिशवाला नहीं मिल सकता था |उसने कैरोलीना की पिंडलियों पर मालिश करनी शुरू की, तो इकबाल के हाथों की तपिश से कैरोलीना का तन उद्वेलित हो उठा |वह एकटक इकबाल की मदभरी आँखों में डूबकर उसकी ओर खिंची हुई आगे बढी कि अचानक इकबाल उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘फ्रैंड! अब हम जाएगा’ और उबासी लेता आगे बढ गया |
अगली सुबह आकाश में बदली छाई थी |शिकारे में बैठकर वो सब इकबाल के साथ ‘नगीन लेक’ की सैर को निकले | लगातार तीन घंटे वे सब तैराकी व पानी के साथ खेल में मग्न रहे | वहीं झील के किनारे रेस्तरां में सबने खाना खाया | सांझ ढले झील में डूबते सूर्य को कैमरे में कैद कर वे हर्ष में डूबे वापिस लौटे | तैराकी के वस्त्रों में कैरोलीना बेहद सुंदर लग रही थी | आज तो इकबाल को उसके सम्मोहन ने बाँध लिया था |
इनका अगला पड़ाव था ‘पहलगाम’, जिसे ‘वैली ऑफ़ शैफर्ड्स’ यानी कि ‘गड़रियों की घाटी’ कहते हैं |सो, अगले दिन एक बड़ी वैन में सब पहलगाम के लिए निकल पड़े| वहाँ पर पहाड़ी नदी में ट्राउट् फिशिंग  करने को सब उतावले थे | इकबाल ने उन्हें बताया कि ऊचे पहाड़ों में तेरह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित ‘शेषनाग झील′ का जल सुदूर पर्वतीय मार्गों से कल-कल नाद करता, राह में पिघली हिम का जल संग समेटता हुआ ‘चंदन वाड़ी’ के बर्फ़ानी पुल के नीचे से बहता हुआ पहलगाम में पधारता है | इसे ‘लिद्दर’ कहते हैं| ऍसा स्वर्गीय सौन्दर्य व प्रकृति की अनुपम छटाँएं - एक ओर पहाड़ी नदी का बहता स्वच्छ जल व चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियों से घिरा स्थल !!सब मूक दृष्टेता बने निहारे जा रहे थे केवल |राह में भेड़्-बकरियों के झुंड बार- बार वैन के सामने आ जाते , जिन्हें उनके गड़रिये अज़ीब सी सीटी बजाकर एक ओर करते, जिससे सड़क खाली हो जाए ट्रैफिक के लिए |राह भर पीटर का मूवी कैमरा चलता ही रहा |पहलगाम पहुँचने के एक मील पहले ही ‘नुनवन’ में इकबाल ने दरिया किनारे डेरा डाला| वहाँ तीन टैंट गाड़ दिये | उनमें सामान टिकाकर वे सब पहलगाम बाज़ार, क्लब, चर्च, मन्दिर व टूरिस्ट सैंटर वगैरह घूमने गए, व वहाँ सारा दिन घूमते रहे | साढे सात हजार फीट की ऊँचाई पर कड़ाके की ठंड थी | रात को पीटर ने व्हिस्की के पैग़ चढाए व दोनों बच्चों ने ब्रांडी से कँपकँपाहट मिटाई, फिर सब सो गए |इधर इकबाल भी सब काम निपटाकर लिद्दर किनारे पड़ी विशालकाय शिलाओं के दामन में एक ठंडी शिला पर बैठकर सिगरेट के कश लेता हुआ ठंड से लड़ने का यत्न कर रहा था कि उसे लगा चांद के धवल प्रकाश में नहाई कोई परी उसकी ओर चली आ रही है | कैरोलीना!!! वह आई और वहीं पर उससे सटकर बैठ गई |इकबाल उठने लगा तो उसने उसे रोक लिया हाथ पकड़कर | बर्फीली ठंड बदन में नश्तर की तरह चुभ रही थी | कैरोलीना ने इकबाल को कसकर पकड़ लिया व बोली, ‘मुझे गोदी में उठाकर अपने टैंट में ले चलो, तुम मेरे दोस्त हो न! आज मुझे सुला दो| बेहद ठंड के कारण मैं सो नहीं पा रही हूं, प्लीज़!!’
कैरोलीना पहले दिन से ही इकबाल की आँखों के सम्मोहन से बँध चुकी थी | दिन भर साथ -साथ घूमना, और रात गए तक एक-दूसरे का साथ—इन सब से ही उसका चेहरा अनोखी चमक से भर उठा था | सारा-सारा दिन ‘ट्राउट फ़िश पकड़ना, उसे पकाना और खाना | ऍसे मौज भरे दिन उन्हें कभी फिर मिलें या न मिलें, इसलिए वे सब वहीं पर तीन दिन और रुकना चाहते थे | भला कैरोलीना को क्यूं एतराज़ होता? इस तरह सात दिनों तक पहलगाम में रुकने के पश्चात श्रीनगर वापिस आकर वे केवल एक दिन ही वहाँ रुक सके |पीटर ने अब्दुल रहीम से इकबाल की बढ-चढ कर प्रशंसा की |इकबाल को अच्छा ख़ासा ईनाम भी दिया | बिछुड़ने की घड़ी समीप जानकर कैरोलीना ने इकबाल से वादा किया कि वह जल्दी ही उसके पास फिर आ रही है | शाहीन और इकबाल का निकाह होना लगभग तय हो चुका था |लेकिन इकबाल पर तो कैरोलीना का नशा छाया हुआ था |उसने अंग्रेज़ी की पढाई करनी शुरू कर दी , फिलहाल निकाह टाल दिया | मन ही मन उसे कैरोलीना का हर पल इंतज़ार था |
अभी चार महीने ही बीते थे कि अचानक ही कैरोलीना पुनः इकबाल के बेसब्र इंतज़ार को मिटा, उसके सूने जीवन में रंग भरने आ पहुँची | अब्दुल रर्हीम से उसके गाईड इकबाल को साथ लेकर वह पुनः पहलगाम की हसीन वादियों में चल पड़ी | पहलगाम से ऊपर बायीं ओर ग्यारह मील पर ‘आहड़ू’ नामक रमणीक स्थल पर एक टैंट गाडकर अपने बीते जीवन के अनूठे दिनों की अविस्मरणीय यादों के नवीन परिच्छेद बनाने में वे जुट गए |दोनों आशिक सुध-बुध खोए घंटों एक- दूसरे की बाहों में खोए रहते |उम्र की सीमाएं बाँध तोड़ चुकी थीं |भाषा, देश , जाति-धर्म किसी का भी बंधन नहीं था वहाँ |कभी कुछ खाया, कभी कुछ नहीं |कब रात ढली- कब दिन चढा, उन्हें कुछ ख़बर नहीं थी |बारह दिनों का कोई हिसाब -किताब नहीं था उनके पास |बिछुड़ने की घड़ी आई , तो दोनों तड़प उठे |कैरोलीना के पास पति तो था, लेकिन उससे बेपरवाह |अपनी पी.एच.डी की पढाई में सदा व्यस्त |बच्चे दोनो अब इतने बड़े हो गए थे कि अपने दोस्तों व अपने खेलों में व्यस्त रहते थे, किसी के पास उसके लिए समय नहीं था |सो, उसने इकबाल से कहा कि वह अपना पासपोर्ट तैयार करवाए, वह जाकर पुनः उसे लेने शीध्र ही अएगी |
उसके विदा होते ही इकबाल पासपोर्ट की तैयारी में जुट गया |अब्बा ने निकाह की बावत बात की , तो उसने अगले साल पर बात टाल दी | तीन महीनों में पासपोर्ट बन कर आ गया | घाटी में लगातार बर्फ़बारी हो रही थी | डल झील भी इस बार जगह-जगह पर जम गई थी |इतनी कड़ाके की सर्दी में हाँजी लोग हाऊसबोट बंद करके ,उससे संलग्न अपने डूंगों (लकड़ी की छोटी घर नुमा नाव)में काँगड़ी हाथ में पकड़, लिहाफ़ ओढकर चिलम फूँकने में मशगूल थे|घाटी ने बर्फीली श्वेत चादर का परिधान ओढ लिया था |ऍसी ही एक दोपहर को एक टैक्सी डल झील के किनारे आकर रुकी |झील पार सड़क से बर्फानी हवा को चीरती एक आवाज़ सन्नाटे में गूँजी,’ रहीमा! ओ रहीमा! वला यूरे, मेमसाब शू आमुत |’(आओ, मेमसाब आई है)यह सुनकर सभी डूंगों से सिर बाहर निकले और नज़रें उधर घूम गईं| खुसर्-पुसर शुरू हो गई कि इतनी बर्फीली ठंड, और ऍसे में मेमसाब क्यूं आ गई |रहीम भी हैरतंगेज़ डूंगे का शिकारा लेकर ही जल्दी से किनारे की ओर चल पड़ा |आदर सहित मेमसाब को ला कर हऊसबोट में ले गया, जहाँ बुख़ारी अर्थात अंगीठी जलाकर कमरा गर्म किया जा रहा था | कैरोलीना के आने की खबर झील में आग की तरह फैल गई थी | इकबाल भी अपने डूंगे से भागा चला आ रहा था |उसके इंतज़ार की घड़ियाँ चुक गईं थीं |सामने होते ही दोनो के चेहरे खिल उठे | उसने सबके सामने कहा कि वह इकबाल को लेने आई है |अपने पति व बच्चों का उसने त्याग कर दिया है |उसके पास बहुत अच्छी नौकरी है, वह इकबाल को भी काम पर लगा देगी |इतना सुनते ही इकबाल के अब्बा और अम्मी चिल्ला उठे | कैरोलीना को इस बात का पहले से ही अंदेशा था, सो उसने उनके सामने डालरों का ढेर लगा कर उनकी ज़ुबान बन्द करवा दी | भविष्य में भी भेजने का वादा किया |उसी पल इकबाल आज़ाद था, शाहीन से भी उसका रिश्ता बनने से पहले ही टूट गया था | अब वह कैरोलीना का था | वह उसके सम्मोहन में ऍसा बँधा कि तमाम उम्र के लिए उसके संग हो लिया |

हजारों मील दूर से एक प्यार की प्यासी आत्मा अपनी प्यास बुझाने कश्मीर घाटी में आई और झील में डूबकर प्यास बुझाने की अपेक्षा वह झील को ही संग ले गई–झील में सदा डूबे रहने के लिए |कश्मीर का सम्मोहन इकबाल के रूप में उसके साथ था | घाटी में कड़कड़ाती ठंड व बर्फानी हवा के चलते लोग ठिठुर रहे थे, किन्तु हर डूंगे में एक उष्मा थी, होठों पर इक अफ़साना था–कैरोलीना और इकबाल  का!!  

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                                                                                                                                                कहानी समकालीन





                                                                                                                                                         

                                                                                                                                                            शैल अग्रवाल




 यूँ तो यहाँ भी वही धरती, आकाश, हवा, पानी सब कुछ वही हैं, बस रंग ही कुछ और ज्यादा शोख और चटक हो जाते हैं  --आदमियों के ही नहीं---- धरती, आकाश, पशु-पंछी, सभी के। घास कुछ और ज्यादा हरी दिखने लगती है और आसमान व समन्दर बेहद गहरे और नीले। गरमियों के चन्द इन दो तीन महीनों के लिए डाल-डाल फूल पत्तियों से गदराया, पूरा-का पूरा यूरोप ही, नई-नवेली  दुल्हन-सा सज-संवरकर निखर जाता है...एक नया ही रूप ले लेता है।  फिर वैनिस तो एक रूमानी शहर है। आकाश चुम्बी इमारतों की गोदी में इठला-इठलाकर बहती नदी और मैन्डेलिन व बैन्जो की सुरीली धुनों पर हंसों से गर्दन उटाए बहते गन्डोले-- नवविवाहिता रेशमा की यह पहली मुलाकात थी यूरोप से।


       मन्त्रमुग्धा, वह खुद भी तो नदी सी बही जा रही थी---मचल रही थी मोहित की बांहों में सिमटने को, परन्तु मोहित तो उड़ते बादलों सा उसकी पहुंच से दूर कहीं और जा छिटका था, अपने ही ख्यालों में खोया-डूबा।


' कैसा होता अगर आज रेशमा की जगह स्पंदन होती बगल में, पत्नी के रूप में मुस्कुराती--!' सोच की पुलक तक ने सिहरा दिया उसे। स्पंदन, जिसके कमरे मात्र में आ जाने से मन शान्ति, आत्मीयता और ठहराव के शिखर पर जा बैठता था, आज  कितनी दूर चला आया है वह उससे ?  मोहित ने न सिर्फ अब आंखें बन्द करली थीं, अपितु रेशमा की गोदी में सर रखकर पसर भी चुका था वह। रेशमी साड़ी की सरसरहाट बादलों से कम रोमांचक नही थी और आंचल से उठती रात की वह महक नशे-सी  अभीतक उसके आसपास ही बहक रही थी; महक जो मन के किसी चोर कोने को उद्वेलित तो कर रही थी परन्तु बांध नही पा रही थी उसे। " सर दबा दूं"--शरमाती सकुचाती पत्नी ने धड़कते दिल से माथे को सहलाया और पति की बेचैनी को पढ़ते हुए बेहद प्यार से पूछा ? मोहित ने जबाव दिए बगैर ही, कुहनियों के नीचे से, पत्नी को चोर नजर  देखा और घूमकर सो गया। ' कितने गहरे रंग के कपड़े पहनती है यह। ---और उफ् यह माँग--- कितनी लम्बी और लाल भरती है, मानो ऐसा न करे तो मेरी बगल से कोई उठा ही ले जाएगा इसे, अभी तुरंत... इसी वक्त।  अब न तो उसकी कोई बात सुनने का मन था उसका और ना ही जबाव देने का। यही नही, तुरंत ही, मन ही मन उसने तो रेशमा की तुलना स्पंदन से कर ली थी और निष्कर्ष पर भी पहुँच गया था ' --नहीं कोई तुलना नही दोनों में, कहां वो सुर्ख रसीले होठों पर रम्भा सी चपल मुस्कान और कहां यह -"-जी मैं अब आपके लिए क्या कर सकती हूं " वाला आदर्श पत्नी का वही घिसा-पिटा भारतीय अन्दाज-- जो शायद प्रेमवश नही, कर्तव्यवश ही ज्यादा है--फिर जो उसकी ही है, जिसे कभी भी हासिल किया जा सकता है, उसके साथ कैसा रोमांस ? ' मोहित होंठ बिचकाते हुए सोचने पर मज़बूर था कि असल में तो वैनिस पत्नी के साथ आने की जगह ही नहीं है। महकती हवा में बादलों सा आवारा उड़ता खो चुका था वह औफिस के उन दिनों में जब वह और स्पंदन पूरे-पूरे दिन साथ हुआ करते थे। नहीं, यह स्पंदन की बराबरी नही कर सकती। ऊब चुका था वह विलासपुर की इस रेशमा से-- आया ही क्यों वह यहाँ पर आखिर -- असल में तो शादी ही क्यों की उसने इससे और अगर कर भी ली थी तो क्या जरूरत थी इतने पैसे खर्च करने की और हनीमून के इस फालतू लफड़े में पड़ने की ? हैरान था वह अपनी जिन्दगी पर --- कथित इस हनी-मून पर--जिसमें मून तो था पर हनी बूंद भर भी नही।  


     पति की ठंडी आह से रेशमा का उत्साह और उमड़ता स्नेह, दोनों ही भाप-भाप तिरोहित हो चले---' क्या यही वह व्यक्ति है जिसके भरोसे अकेली ही सबको छोड़कर परदेश में, इतनी दूर चली आई है वह? क्या यही वह व्यक्ति है जिसके साथ आजीवन रहना है उसे-? -आशंकित और उद्वेलित थी वह अपने भविष्य को लेकर---पति की अनमयस्कता को लेकर? क्या कुछ खुद उसमें या उसके व्यवहार में कोई कमी रह गई ---या फिर उसके रूप या माता पिता द्वारा दिए गए ढेर सारे दान-दहेज में? ऐसा तो नही लगता इनका स्वभाव कि सिर्फ इस वजह से इतने उदासीन हों ये उसके प्रति? कहीं बेमेल शादी तो नहीं है उसकी !---क्या वह छोटे शहर में पली बढ़ी रेशमा सिकंद, इस लायक नही कि इंगलैंड में बसे मोहित कपूर को खुश रखपाए? छोटे शहर में पली-बढ़ी थी तो क्या, अच्छी शिक्षा दी है माँ बाप ने। अच्छे संस्कार भी दिए हैं। और यह रूप, इसे देखकर ही तो मोहित की मां खुद ही रिश्ता लेकर पहुंची थी उसके घर पर। --- फिर पति का यह रूखापन--यह अनमयस्कता क्यों-?--हैरान थी रेशमा खुदपर। उसे लगने लगा कि कहीं यह खुशी भी तो उसके बहुत ही पास आकर दूर तो नही हो जाएगी उससे, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि नदी के किनारे खड़ी वे कलात्मक इमारतें, उसकी तरफ देखकर पलभर को मुस्कुराती और ललचातीं तो हैं उसे पर फिर अगले पल ही आंखों से ओझल भी तो हो जाती हैं। ...पर पति एक अनजान इमारत तो नही, जो चुपचाप यूँ आखों से ओझल हो जाने दे उसे? मन में अनायास ही हिलोर लेती, हर अच्छी बुरी सोच को काबू में करके एकबार फिरसे रेशमा ने अपना सारा ध्यान वैनिस की उस खूबसूरत शाम की तरफ मोड़ लिया। '  फालतू में ही जाने क्या-क्या सोचने लग जाती है वह भी --वही जाने पहचाने फूल पक्षी धरती आकाश ही तो हैं यहाँ भी--- क्या नही है उसके पास---कितनी लड़कियाँ इतनी सौभाग्यशाली होती हैं जो पति के साथ इन सुन्दर देश और शहरों में घूम पाती हैं? बहती पनीली हवा और उस सौंदर्य को अपनी उनीदी आँखों में समेटे-सम्भाले रात के अंधेरे से भी ज्यादा रोमांचक गहरे नीले स्नो ड्राप्स में डूब जाना चाहती थी रेशमा अब। अचानक ही सामने खड़ी लाल पत्थर की भव्य इमारत के तिकोने कंगूरे पर आंखें जा अटकीं उसकी। '  कोई म्यूजियम ही होगा जरूर।'  रेशमा ने सोचा और बड़ी हसरत से एक-एक चीज को मन में उतारने लगी। कितना शौक है उसे म्यूजियम और आर्ट गैलरियों में घूमने का--पापा होते तो जिद भी करती पर मोहित से कैसे कहे? वह तो चलने से पहले ही सचेत कर चुका था " बस तीन दिन के लिए ही जा रहे हैं हम, म्यूजियम और आर्ट गैलरी वगैरह के चक्कर में मत पड़ना, कोई शौक नहीं मुझे इन जगहों का --टोटल वेस्ट औफ टाइम।" पूरी की पूरी पिछली दो रातें कसीनो और नाइट क्लब में जाग-जागकर निकालने के बाद, वैसे भी उत्साह और मनोबल दोनों ही तो नहीं बचे थे अब रेशमा के पास। बस यूँ ही चुपचाप  गंडोले पर लेटकर वैनिस घूमने की ही शक्ति रह गई थी अब तो  उसके थके तन और मन में। अपने ही खयालों में डूबा मोहित पास होकर भी उसके साथ नही था, रेशमा यह बात अच्छी तरह से जान चुकी थी।


    जिरेमियम, नैस्ट्रेशियम पुटेनिया, बिजी लिजी--चारो तरफ दमकती नियोन लाइट से स्पर्धा करते  महकते दमकते वे फूल सीधे आँखों से मन में उतरे जा रहे थे परन्तु मोहित तो उन्हें देख-देखकर और भी उद्वेलित हो रहा था। इन फूलों के बीच में भी तो वही बैठी मुस्कुरा रही थी---हाँ वही, स्पंदन। कहीं कुछ बिखर टूट न जाए, इसलिए पलकों में समेटकर एकबार फिरसे आंखें बन्द कर ली थीं अब उसने।  
      बहती हवा सुरों की बौछार करती गंडोले को दूर बहाए ले जा रही थी, वैसे ही जैसे कि विन्डो बौक्स से झांकते वे रंग-बिरंगे फूल मुस्कुरा- मुस्कुराकर उसके पास आते और तुरंत ही पक़ड़ से दूर भी हो जाते। वैसे ही, जैसे कि स्पंदन मोहित के जीवन में आई औरफिर दूर बहुत दूर चली गई। उसे अब यूं भुला पाना, ठहराव की उस चोटी से उतरकर बेचैन इन तरंगों में डूबना--- आसान नहीं था मोहित के लिए। वह तो यह तक नही जानता कि स्पंदन अब कहाँ पर और कैसी है और उसे कभी याद भी करती है या नहीं, या फिर उसके बारे में क्या सोचती है? पर करे भी तो क्या करे ? माँ का यूँ तुरंत ही बीमारी का बहाना कर उसे अचानक ही दिल्ली वापस बुला लेना, फिर उसके वहाँ पहुँचते ही मरने से पहले बहू को देखने की ख्वाइश में लगातार रोते ही रह जाना.... गिन गिनकर दूर दराज़ के रिश्ते नाते वालों के और पास पड़ौस के हर लायक बेटे की, सोते जागते दिनरात दुहाई देते रहना---बारबार ही उसे बतलाना, याद दिलाना कि कैसे माँ-बाप की खुशी के लिए चुपचाप शादी कर ली थी उन्होंने, बिना किसी विरोध या मीन-मेख के। कोई कम पढ़े लिखे तो नही थे वे भी, बस मा बाप की इज्जत करना जानते थे। वक्त की कीमत जानते थे। यह शादी व्याह बगैरह, उम्र के होते ही अच्छे लगते हैं--- तीस के पेठे में आ गया है वह भी तो अब--- क्या अधबूढ़ा होकर, उनके मरने के बाद ही शादी के लिए हाँ कहेगा? क्या उनकी किस्मत में बहू का सुख नहीं ? पोते पोतियों का सुख नहीं?जैसा माँ बाप और बड़ों ने कहा, वैसा ही कर लेना, यही तो एक लायक औलाद की पहचान है। उसे भी अब मान जाना चाहिए। विरोध नही करना चाहिए । माँ है आखिर वे उसकी,  दुश्मन तो नही। क्यों आखिर मोहित विश्वास नहीं करता उन पर...उनकी पसंद पर!'  रोज ही ये और अन्य कई इसी तरह के मां के  सवाल और सुझावों का पिटारा खुला ही रहता मोहित के आगे। 
     सोचने और समझने का वक्त ही कहाँ दिया था माँ ने फिर तो उसे।  दिनरात के कलपने और उलाहनों से घबराकर---निरंतर बहते आँसुओं में डूबकर, तंग मोहित ने हथियार डाल दिए थे और  ' हाँ ' कर दी थी चुपचाप। मां के उत्साह के आगे....अपनी पसंदीदा स्पंदन का तो नाम तक लेने का साहस जुटा नहीं पाया था वह। भुला दिया था स्पंदन को और उसके साथ देखे मदमस्त भविष्य के हर सपने को। ले आया था पत्नी बनाकर मां की पसंद की बिलासपुर की रेशमा को। पर आजतक तो इसके साथ उसका कोई मानसिक या हार्दिक तारतम्य बैठ नही पाया है वह। दोष नही दे रहा वह । लड़की अच्छी है और उसका हर तरह से ध्यान भी रखती है। यह बात तो वह महीने भर में ही जान गया है --बस स्पंदन को ही नही भूल पा रहा है वह। उसकी जगह नही दे पा रहा इसे अपने मन में और जीवन में। माँ ने भी तो हद कर दी थी जल्दबाजी में। आनन-फानन ही सारे इन्तज़ाम कर डाले थे ---लड़की शादी, घोड़ा, बैंडबाजा सब। और दर्जनों दूर पास से जुटाए वे रिश्तेदार---पूरा ही जुलूस निकाल दिया था उसका तो उन सबने मिलकर। ऐसा नही कि उसे अच्छा नही लगा था वह सब--कुछ दिन के लिए तो वाकई में भूल भी गया था वह स्पंदन को--- स्पंदन जो दिन रात उसके साथ रहती थी,यादों में ही सही, आज भी उसकी बेहद अपनी थी।
    सुर्ख दहकते उन फूलों को देखकर एकबार फिरसे स्पंदन ही तो याद आ रही थी उसे। याद आ रहा था कि यही तो था उसका मनपसंदीदा रंग और फबता भी खूब था उसके गोरे गुलाबी अंगों पर। खो चुका था वह उस महकती हवा में बादलों सा आवारा उड़ता-- बहती पानीली यादों को, उस सौंदर्य को अपनी ऊदी-ऊदी आँखों में समेटता सहेजता --पता नही अब आंसुओं का धुँधलापन था या आक्रोष की अग्नि, आकाश ही नहीं पूरा वैनिस ही कलुछाया और मटमैला लग रहा था अब तो उसे।
     पर रेशमा की खुली और विस्मित आँखों के सामने तो एक नया और आकर्षक संसार बाहें फैलाए खड़ा था--यूरोप और वैनिस, दोनों से ही पहली-पहली पहचान थी यह उसकी। एक-एक दृष्य को बड़ी ही तत्परता और संलग्नता के साथ मानस पटल पर और कैमरे में सहेज-सहेजकर रखती जा रही थी वह। अचानक ही एक कबूतरी जाने कहाँ से उड़ती हुई आई और नदी के किनारे खड़ी भव्य पथरीली उस इमारत के एक बेहद आकर्षक और घुमावदार कंगूरे पर जा बैठी। पीछे पीछे उड़ता कबूतर भी वहीं आ गया और मादा के इर्द गिर्द ही मंडराने लगा--बेचैन और फड़कता हुआ। पर इतनी दूर से कैसे पहचान लिया उसने कि जो पहले आई वह कबूतरी थी और जो गुटरगूँ करता, आगे पीछे '  शो औफ '  किए जा रहा है, वह कबूतर है। -- उलटा भी तो हो सकता है? नहीं यही कबूतर है और जो शान्त चुपचाप बैठी है, वही कबूतरी है। रेशमा ने अपनी अनायास उठती जिज्ञासा का बड़ी ही सहजता से समाधान कर लिया था। क्या क्या सोचने लगी है वह भी--- हंसी आ रही थी उसे अपनी बेतुकी सोच पर। माना विद्यार्थी जीवन में आमूमन ऐसा ही होता था कि लड़के ही लड़कियों का पीछा करते थे पर जरूरी तो नहीं कि हमेशा ही ऐसे ही होता हो, सभी नर मादा तो ऐसे नही होते , उसके मोहित को ही ले लो कितना शान्त और तटस्थ है, कभी ऐसे बेचैन होकर नही मचलता, गुटरगूँ नही करता। गुलाबी पड़ते गालों को हथेलियों से छुपाए रेशमा जाने कहाँ से कहाँ भटक रही थी। कबूतर युगल से ध्यान हठाकर एकबार फिर पति को देखा जो उससे और उसके खयालों से पूरी तरह से निरासक्त अभी भी अपनी ही दुनिया में विचर रहा था। न रेशमा का साथ लुभा पा रहा था उसे और न ही वैनिस का वह अल्हड़ छलकता यौवन। सामने गन्डोलों पर , पुलिया के नीचे और पुलों के ऊपर, हाथ में हाथ डाले मादक नजरों से एक दूसरे को देखते, एक-दूसरे  में खोए युगल घूम रहे थे। --- आलिंगन बद्ध युगल। --गोरी टाँगें, गुलाबी होठ और नशीली आँखें झिलमिल। सबकुछ ही एक दूसरे में गुँथा और गडमड। सकरी पथरीली गलियाँ और उनसे आते वे कहकहे और उल्लास के सुर.... मन सा ही आँख मिचौली खेलता, फूलों सा ही नाजुक और सुन्दर माहौल था चारो तरफ। फिर वह नटखट सूरज भी तो मदिर मन्थर इठलाती नदी के सुनहरे वक्षस्थल को दहकाता खुदभी डूब चुका था उसी में अब तक।
    खुद अपनी ही सोच का मज़ाक उड़ाते ढीठ आंसू को चोर उंगली से पोंछती रेशमा नही चाहती थी कि पति के आगे कमजोर पडे। नई नवेली दुल्हन के भर-भर हाथ चूड़ों को अनमयस्क हाथों से यूँ ही आगे पीछे घुमाती, एकबार फिर सामने खड़ी इमारत को देखने लगी। तीन खूबसूरत मूर्तियाँ कंगूरे के अगल बगल खड़ी बहुत ही मोहक अन्दाज से उसे ही देखे जा रही थीं। एक के हाथ में कलश था, दूसरे के कन्धे पर बालक और तीसरी आगे छुककर गिरता हुआ आंचल सम्भाल रही थी। तीनों ही मूर्तियों का अन्दाज बेहद सधा, तराशा हुआ व आकर्षक था।  पत्थर में भी मांसल शरीर पे लिपटे पतले कपड़े की  एक-एक बेचैन सलवट को बहुत ही खूबसूरती से तराशा था कलाकार ने।


   '  जरूर ही म्यूजियम होगा यह।'  रेशमा ने एकबार फिरसे सोचा। मन म्यूजियम के अन्दर जाने को मचलने लगा। परन्तु कैसे कहे मोहित से वह --- मोहित तो पहले ही मना कर चुका है, बारबार समझा चुका है। " मुझे इन आर्ट गैलरियों और म्यूजियम में कोई रुचि नहीं। यूँ वक्त और पैसा बरवाद करना बिल्कुल ही अच्छा नही लगता, परन्तु तुम्हे नही रोकूँगा मैं। अगर तुम जाना ही चाहती हो तो जा सकती हो। मैं यही इन्तजार करता हूँ।"  रेशमा को याद था कि कल भी तो मोरैलो ग्लास फैक्टरी के शो रूम में अकेली ही घूमी थी वह। एक से एक आकर्षक चीजों को देखती, पर बिना किसी के साथ सुख, विस्मय-- या उस सौंदर्य और कला को बांटे बगैर, किसी से कुछ कहे या बताए बगैर। अजनबियों के इस शहर में नितांत अकेली पड़ गई थी वह---खुद अपना ही रास्ता ढूँढती और भटकती। वैसे भी थके शरीर और मन में शक्ति ही कहाँ थी, जो कुछ घूम या देख पाए और वह भी एकबार फिर वैसे ही अकेले-अकेले तो हरगिज ही नही। अब तो यह सब उसके थके-टूटे मन के लिए संभव ही नही था।
       निढाल रेशमा ने भी मोहित की तरह ही घुटनों पर सर रखकर खुद को ढीला छोड़ दिया। बह जाने दिया खुद को  और अपने विचारों को भी, धीमे धीमे बहते उस गंडोले के साथ। मैन्डलिन की लहरियों पर तैरते सुरों का जादू उसके अभिसारित मन को और भी आलोड़ित कर रहा था पर मोहित की कोहिनी के नीचे दबा रेशमी आँचल मन सा ही,  क्रश होता गया, मुड़ता और तुड़ता रहा।
     वैनिस की एक और रोमाँचक व रंगीन शाम सामने बाँहें फैलाए खड़ी थी पर वह इन स्थानीय युवतियों की तरह दौड़कर पति की बांहों में सिमटने का साहस नहीं कर पा रही थी। शर्म और संस्कार की पायलों में जकड़ी नवविवाहिता रेशमा, प्यार को तरसती, पति के बगल में चुपचाप बैठी रही--मांग में खिंची सिन्दूर की रेखा और माथे की बिन्दिया सभी की परछाई देख पा रही थी वह अपने इर्द गिर्द ही क्या, चारो तरफ भी। कभी किसी खिड़की के शीशे में, तो कभी उबाल खाती लहरों के ठहराव में। बस यही समझ नही पा रही थीं कि अब यह दूरी क्यों और किसलिए--यह कोई और नही, उसका और सिर्फ उसका अपना पति मोहित है, जो उसके साथ है। जिसकी सेहत और सलामती के लिए वह सोलह साल की उम्र से ही, उसे मिले या जाने बगैर ही, हर सोमवार को व्रत और पूजा करती आई है। आज भी तो सोमवार है और आजभी तो मोहित के बारबार कहने पर भी उसने कुछ नही खाया है।
     पिछले दो घंटों से मंथर मंथर तैरता गंडोला एकबार फिरसे अपनी उसी आखिरी पडाव, लूडो कसीनो तक पहुँच चुका था और सामने कसीनो की जलती -बुझती हजारों रौशनियों ने अन्य सैलानियों की तरह उन दोनों को भी एकबार फिरसे चकाचौंध कर ही दिया था।


       अपनी-अपनी तंद्रा से जागते जाने किस सम्मोहन की अदृश्य डोर से बँधे, अगले पल ही वे कसीनो के मुख्य हॉल में खड़े थे। अबतो रेशमा भी अभ्यस्त हो चली थी इस माहौल की। रूलेट की घूमती बौल ज्यादा चक्कर देती है या हारे हुए काउन्टर्स की गिरती खनक, कहना मुश्किल था परन्तु तीन दिन से लगातार रोज ही आने के बावजूद भी, एकबार फिर विस्मित और कौतुहल मय आँखों से देखरही थी वह कि कैसे गड्डियों नोट जेबों से निकलते हैं और अगले पल ही एक गढ्ढे में गुम भी हो जाते हैं ---इतने नोट कि उसके भारत में चार जनों का परिवार महीने भर भरपेट खा और रह ले, यहाँ पल भर में ही गायब और वह भी बस एक नन्ही सी बौल के घूमते इशारे पर। अगले पल ही टेबल फिरसे भर भी जाती थी उन्ही रंग-बिरंगे काउन्टर्स से और साँस रोके लोग फिरसे इन्तजार करने लगजाते अपने अपने नम्बरों का, जीतने या हारने का। हारे जीते सभी, गरीब, अमीर सभी, एक से थे इस छत के नीचे लालच के इस खेल में। जो नफा नुकसान बर्दाश्त कर सकते थे वे भी और जो नही कर सकते थे वे भी। सिगरेट के धुँए फेंकते ये लोग दीन दुनिया से बेखबर बच्चों से लगे रेशमा को---, वही उत्सुकता और आतुरता, वही बेचैन खुशी और निराशा। वही बेपरवाह और मस्त कर्तव्यहीन बेफिक्री और कहकहे। रेशमा देख पा रही थी कि कैसे और भी बहुत कुछ चलरहा था वहाँपर जो बतारहा था कि ये कहकहे बच्चों के नहीं बच्चे बने इन वयस्कों के हैं और हाथ में पकड़े वाइन के ग्लास ने न सिर्फ इनके मस्तिष्क से सही और गलत की परिभाषा मिटा दी है अपितु लालच की पट्टी बाँधकर अंधा भी कर दिया है। इनमें से कई तो बार बार जीतते और हारते, बस आखिरी बार जीतने की आस में मानसिक और शारीरिक, दोनों ही संतुलन खो चुके थे। फिर भी रोज आते थे। किसी की बाँहों में एक नही दो दो सुन्दरियाँ थीं तो कोई नितांत अकेला, पूरी ही तरह से टूटा और बिखरा हुआ, पर आता जरूर था, --अपना सबकुछ दाँव पे लगाकर बस एक आखिरी जीत के इन्तजार में जाने कबसे और कबतक यहीं बैठा रहजाता था। हाथ नोट और काउन्टर्स फेंकते रहते और आंखें अर्ध नग्न कूपियर के गोरे वक्षस्थल पे ही टिकी रहतीं। इतने सम्मोहित हो जाते वे कि हार-जीत तकका ध्यान नही रख पाते। रेशमा देख पा रही थी कि कैसे हारी गोटियों की भीड़ में कई जीती गोटियाँ भी समेट ली जाती थीं। उसका अपना मोहित भी तो डूब चुका था इन काले लाल खानों के अनूठे नम्बरी मायाजाल में। रेशमा के लिए भी उसने सैंडविच और कोक मंगवा दी थी और आज की शाम के लिए हर दायित्व से निवृत्त हो आराम से रातभर के लिए बैठ चुका था वह भी तो अपनी उसी लकी टेबल पर।
   अचानक ही सामने दरवाजे से एक लम्बी छरहरी और बेहद आकर्षक युवती ने चार युवकों के साथ प्रवेश किया और मोहित का दूर से ही बड़े जोरदार हाव-भाव से हाथ हिलाकर हिलाकर स्वागत किया मानो पुरानी और अच्छी जान पहचान हो। मोहित भी उतनी ही तत्परता से उठा और पाँचों को अपनी टेबल पर ले गया फिर तो वे सब ऐसे डूबे एक दूसरे में और उन काउन्टर्स की खनक में कि रेशमा उनके लिए अदृश्य हो गई---उनके बेहद पास खड़ी रेशमा---उनकी एक-एक बात सुनती और समझती  रेशमा--उनकी हमउम्र रेशमा। मोहित की नवविवाहिता पत्नी का कोई अस्तित्व नही था उस भीड़भाड़ भरी जुआ खेलती रात में--न किसी और की आंखों में और ना ही उसके अपने पति मोहित के लिए। रेशमी मँहगी कांजीवरम की साड़ी और सिन्दूर व बिन्दी से सजी सँवरी रेशमा एक अजूबा सा ही थी वहाँपर। चारो युवक और उसके पति, हरेक के मुँहपर बस एक ही नाम था स्पंदन और सभी बस उसी से बात कर रहे थे। दम घुटने लगा रेशमा का। उमड़ते आंसुओं का सैलाब बहुत ही मुश्किल से आँखों में ही रोककर जब वह निकलने को मुड़ी तो जाने किस धक्का मुक्की में बगल बगल ों खड़े आदमी के वाइन के गिलास से सर से पैर तक नहा गई। अभी अपने को संभाल तक पाए या कुछ समझपाए, इसके पहले ही, पीले दाँत और आवारा से लगते उस आदमी की सिगरेट भरी साँसों की दुर्गन्ध उसे अपने ऊपर महसूस हुई। इतने करीब कि दिन भर की थकी और नींद में डूबी रेशमा को उस भभके से ही उबकाई आने लगी। सड़ाँध भरी उस महक और गंदे उन हाथों से दूर भागने के लिए झटपटाती वह दरवाजे की तरफ लपकी। परन्तु "सौरी मैम" कहकर वाइन पोंछने के बहाने वह आदमी उसे बेधड़क छूए और टटोले जा रहा था और एक बेहद भोंडी और अश्लील मुस्कान बेवजह ही उसके होठों पर आ चिपकी थी।
      स्तब्ध रेशमा दुख और ग्लानि में सर से पैर तक डूब गई। स्वयँ को ही कोसने लगी क्या जरूरत थी यहाँ आने की, इस भीड़भाड़ में इन अनजान लोगों के बीच यूँ सटकर खड़े होने की? अभी जैसे तैसे वह अपने को तटस्थ करके जलती आँखों से उसे भस्म करते हुए दो कदम पीछे हट ही पाई थी कि वह धृष्ट आदमी उसे यूँ अकेली देखकर एक बार फिर आगे बढ़ा और बाँहों से पकड़कर अपनी तरफ खींचने लगा। कानों के पास धीरे से फुसफुसाकर बोला --" आओ मेरी गोदी में बैठ जाओ मैं तुम्हे अपने हाथों से साफ करदेता हूँ---क्या मेरा नम्बर चाहिए तुम्हे, वैसे भी मैने किसी भारतीय युवती को कभी अपनी गोदी में नही बिठलाया है।'
     बात आपे से बाहर होती जा रही थी--अभद्रता और मर्यादा की हद पार कर चुकी थी। आंसुओं को घोटती , थप्पड़ के लिए उठे हाथ को कैसे भी रोकती और उस अभद्र आदमी को गुस्से से परे धकेलती, दरवाजे की तरफ दौड़ पड़ी रेशमा। कितनी अनाथ और अकेली थी वह आज इस भीड़ में। इसके पहले कि पूरी तरह से टूटकर बिखर जाती, दो सशक्त बाहों ने समेट लिया उसे। प्यार से उसके आंसू पोंछता, उसके कपड़े और अस्त व्यस्त बालों को ठीक करता, उसे तसल्ली देता कोई और नही उसका अपना पति मोहित ही तो था, जो अब अपने दोस्तों से कहरहा था कि हमें चलना होगा। मेरी पत्नी की तबियत ज़रा ठीक नही है। हमलोग यहीं होटल रौयल में ही रुके हैं। स्पंदन, कल शाम तुम अपने साथियें के साथ डिनर हमारे साथ ही लो, अच्छा लगेगा हमें---क्यों ठीक है ना रेशमा--रेशमा का हाथ अपने हाथों से दबाते सहलाते बेहद प्यार से मोहित ने पूछा? इसके पहले कि रेशमा कुछ जबाव दे, वे विदा लेकर कसीनो के बाहर आ चुके थे। सड़क पर बहती मन्द मन्द हवा बालों से खेल रही थी और एक जानी पहचानी खुशबू मन को आल्हादित और उन्मादित कर रही थी। यादें पहचान देती हैं और पहचान ही प्यार और अपनापन। रेशमा ने देखा, सड़के के किनारे सर उठाए खड़े वे पेड़ वाकई में गुलमोहर के ही थे, वही गुलमोहर, जो बिलासपुर में उसके अपने घर के बाहर की सड़क पर भी यूँ ही पंक्तिबद्ध खड़े थे। अनायास ही रेशमा के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई । भारत में हो या यूरोप में, गुलमोहर तो बस गुलमोहर। घर ही जा रही थी वह आज। पहली बार पति की आँखों में बेगानापन नही बेपनाह प्यार था उसके लिए।
        रेशमा के मन मे बेहिसाब प्यार हिलोरें ले रहा था। मोहित भी तो कुछ ऐसी ही मन;स्थिति में था। कितनी ज्यादती की है इसके साथ --- अपनों से और जाने पहचाने परिवेश से दूर लाकर भी इतनी अवहेलना की। वैनिस लाकर भी दूर दूर और अनाथ ही छोड़ दिया अकेले अकेले ही भटकने और धक्के खाने को ? स्पंदन-- एक याद में ही डूबा रहा----प्यासा प्यासा, जबकि उसकी अपनी सुख और सपनों की खान बगल में खड़ी उपेक्षित और अवहेलित, इन्तजार कररही थी उसका ? अब हर जिम्मेदारी और जिन्दगी बहुत ध्यान से और खुशी खुशी ही जिएगा वह। जो अपनी है, बस वही अपनी है। स्पंदन मित्र थी और मित्र ही रहेगी। पर रेशमा उसकी पत्नी है---- सहचरी और संगिनी है। कैसे नही समझ पाया इतनी स्पष्ट और जरा सी बात को वह? कहते हैं जब जगो तभी सबेरा है। कल सुबह ही रेशमा को लेकर म्यूजियम घूमने जाएगा, अच्छी से अच्छी चीज भी तो अपनों के संग ही आनंद देती है।
 फूलों से लदे फंदे पेड़ के नीचे टेक लगाए खड़ी, नींद से बोझिल और थकी रेशमा मोहित को एक तस्बीर सी ही सुन्दर लगी। मात्र सपना नही, रेशम सी ही कोमल और सामने थी उसकी अपनी रेशमा --प्यार और यौवन की खुशबू में महकती-गमकती। पहली बार मोहित ने ध्यान से देखा और जाना था कि वाकई में कितनी सुन्दर है रेशमा, तन से भी और मन से भी। कितनी इस उम्र की लड़कियाँ होती हैं जो जटिल और दुरूह परिस्थिति में भी इतनी शांत और नियंत्रित रह पाएं? जल्दी में ही सही, शादी के जोड़े में लपेटकर माँ ने हीरा ही भेंट किया है उसे --माँ तो कुछ उलटा सीधा तो दे ही नही सकती थी उसे, फिर कैसे वही माँ के निर्णय को  हठ के साथ अस्वीकारता रहा ? लाल साड़ी में बीरबहूटी बनी और सुर्ख फूलों के नीचे खड़ी रेशमा आज वाकई में दुल्हन ही तो लग रही थी।  काँपती नाजुक नुकीली पत्तियों से छन-छनकर आती चाँदनी और बादलों से फूटती सिन्दूरी भोर, अनूठी धूपछाँवी आभा थी उनके चारोतरफ जो अब गुलमोहर के उन नटखट गुच्छों को ही नहीं, उन दोनों के मन को भी अपने रूप से चुनौती दे रही थी।
        पिछले तीन दिन से असंख्य सुख के पल इन फूलों से यूँ ङी झरगए और वह जाने किस उन्माद में डूबा, पैरों तले सब रौंदता बेमतलब ही भटकता रहा। मोहित आगे बढ़ा और बाहों में लेकर चूमने लगा , प्यार से बहुत ही धीरे धीरे मानो रेशमा खुद एक फूलों की डाली हो। पर मचलते-फिसलते वे फूल भला कैसे और कबतक रुक पाते--- झरझर दामन खुशियों से भर दिया। बाल बाल में गुँथकर अनूठा श्रँगार कर दिया। सुख में डूबती उबरती रेशमा ने आँखें खोलीं तो मोहित अभी भी प्यार से उसे ही देखे जा रहा था, मानो पहले देखा ही न हो, आँखों आँखों में दुलराता और अंग अंग सराहता। शरमाती सकुचाती रेशमा बालों से गुलमोहर के फूल और पंखुरियों को झारते-हटाते बादलों पर चल रही थी---एकबार फिरसे सात फेरे ले रही थी पति के साथ। जाने किस सुख तंद्रा में डूबी उसकी तरफ देखती, शरमाती यूँ ही बोल पड़ी," यह फूल रात में तो यूँ नही झरते, फिर यह आज क्या हो गया है इन्हे?" " कुछ नही रेशमा, गुलमोहर भी मुस्कुरा रहा है, जैसे कि तुम मुस्कुरा रही हो।"

रेशमा ने पलटकर देखा गुलमोहर मुस्कुरा ही नही, जी खोलकर हँस रहा था उनके साथ, तभी तो झरती उन पंखुरियों का कालीन पैरों के नीचे बिछ गया था। मादक उस पल के पल- पल को पलकों में सजोती रेशमा ने तुरंत ही अपना सुर्ख पड़ता चेहरा पति के वक्ष स्थल में छुपा लिया। अभी भी विश्वाश नही हो पा रहा था  उसे कि यह सब सच है या फिर इन सोती-जागती आँखों का एक और दिवा स्वप्न----हाँ -मुस्कुराते होंठ और बन्द पलकों के पीछे छुपी चंचल आंखें जरूर ही सचेत किए जा रही थीं कि चाहे जो भी हो, इस जादू को बिखरने नही देना है --- आजीवन यूँ ही सहेजना होगा---- हमेशा के लिए। ----   मई-2006-  

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                                                                                                                                                           दो लघु कथाएँ


                                                                                                                                                        -अशोक वर्मा





धरती घूमती है

" परीक्षाएँ समाप्त हो गई हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि सारे दिन बाहर ही खेलते रहो। कुछ पढ़ा-लिखा भी करो...नालायक!"


" यह क्या, तुम तीसरी क्लास की किताब लेकर बैठे हो। तीसरी की परीक्षा तो इस बार दे ही दी है, फिर ये किताबें पढ़ने का क्या लाभ ?....बेशर्म कहीं के।"


" हाँ -हाँ ला देंगे चौथी क्लास की किताबें भी। परिणाम तो आने दो। जाओ, कुछ और पढ़ो।"


"अरे। सारा दिन कहानी किस्से पढ़ते तुम बोर नहीं होते। आँखों पर भी जोर पड़ता है, इस तरह। खुली हवा में सुबह-शाम बाहर खेल आया करो। यही तो उम्र है खेलने कूदने की। चलो उठो, जाओ...।"

















             पूर्ववत 


पिछले दिनों सरकार द्वारा भूमिहीन हरिजनों को खेती योग्य जमीन आबंटित करने की योजना बनाई गई। कार्यक्रम तेजी से लागू किया गया। गाँव के समस्त भूमिहीन हरिजनों ने आवेदन भी किया।


एक सप्ताह बाद कार्य-समाप्ति की घोषणा के साथ ही भूमि-आबंटन के आँकड़े संबंधित विभागों को भिजवा दिए गए।


पहली ही बारिश के बाद रामू , दीनू और भुलिया के साथ अनेक हरिजन अब भी पूर्ववत ग्राम सरपंच के खेतों में हलों की मूंठ पकड़े काम कर रहे थे।


हाँ, सरपंच को अपनी बढ़ी हुई जमीन के लिए कुछ और किसानों व मजदूरों की जरूरत थी।   

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                                                                                                                                                          परिदृश्य


                                                                                                                                                          - दिनेश ध्यानी


बदलती जीवनशैली: बढ़ते अपराध

कल ही की तो बात है अल सुबह चलती बस में कण्डैक्टर के साथ मिलकर लुटैरों ने बस में एक वृद्ध को सरेराह लूट लिया। हाल ही में पिछले दिनों दिल्ली के सुखदेव विहार में तीन लुटेरों ने एक घर में जबरन घुसकर वृद्ध दंपति पर जानलेवा हमला किया  घर के मालिक की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी तथा उसकी पत्नी को गंभीर रूप से घायल कर दिया जो कि जिन्दगी और मौत से जूझ रही है। वहीं हरियाणा के भिवानी में पुलिस ने एक बेगुनाह युवक को पीछे से गोली मारकर हत्या कर दी। उसी दिन तीसरी वारदात में दिल्ली  के महाराष्ट्र  भवन में कुछ युवकों ने तोड़फोड़ कर दी। आये दिन इस तरह की घटनायें आम हो चली हैं। यह हाल दिल्ली तथा उसके आसपास का हैं जो कि देश की राजधानी है। सवाल उठता है कि जब देश की राजधानी में आम आदमी सुरक्षित नही है अन्य नगरों या राज्यों का क्या होगा? आये दिन लूट और हत्या की घटनायें हमारे समाज के ताने-बाने पर एक प्रश्न चिन्ह लगा देती हैं।
आज हालात यह हो चुकी है कि आम आदमी के साथ कब क्या हो जाए किसी का पता नही है। लोग अपने घरों में सुरक्षित नही हैं तथा घर से बाहर गया आदमी जब तक घर वापस नही आ जाता तब तक घर वालों को बाहर गये आदमी की चिन्ता और बाहर गये को घरवालों की फिकर बराबर सताती रहती है। हाल ही के कुछ वर्षों में दिल्ली जैसे महानगर की जीवनशैली तथा रहन-सहन में जो परिर्वतन आया है तथा जिस प्रकार से लोगों के बीच पैसा कमाने की भूख तथा नशे का व्यापार बढ़ा है उसने सामाजिक सौहार्द तथा आपसी विश्वास को तोड़ दिया है। दो दशक पहले दिल्ली में न तो इतनी भीड़ थी न यहां का आदमी इतना स्वार्थी और खुदगर्ज था। तब आपसी सामंजस्य तथा आपसी सहयोग की भावना लोगों में थी लेकिन हाल के वर्षों में यहां के लोग मात्र एक मशीनी पुर्जा बनकर रह  गये हैं। आज हालात यह हैं कि आपके सामने आपके पड़ोसी को लूटा और पीटा जा रहा होता है लेकिन कोई उसके बचाव में नही आता है। किसी के घर कुछ हो जाये लेकिन आम आदमी को उससे कोई सरोकार नही है। सड़क हादसे में पीड़ित सड़क पर तड़पता रहता है लेकिन महानगर की गाड़ियों की रफ्तार उसे देखकर और तेज हो जाती हैं। शायद ही कोई भला मानुष होगा जो सड़क पर तड़पते पीड़ित को देखकर पसीजता हो अन्यथा आम शहरी ऐसा मुंह मोड़कर भागता है जैसे उसे कुछ न तो दिखा और न कुछ हुआ। असल में यह हमारी संज्ञाशून्यता की परिणीति है। इसके मूल में जहां हमारी आत्मकेन्द्रित स्वार्थपरता अधिक जिम्मेदार है वहीं पुलिस के लफड़े तथा समय के अभाव से भयभीत शहरी अपने रोजमर्रा के कामों में कोई व्यवधान नही चाहता है। आज के आदमी की सोच यह हो गई है कि इस शहर में तो यह रोज की बात है आखिर हम एड़जस्ट करें तो कहां तक करें?
घरों में कभी आपसी संबध तथा अपने-परायों पर हमारा अपने से अधिक विश्वास होता था। सामाजिक तथा पारिवारिक रिश्तेदारी की इतनी मजबूत कड़ी थी कि किसी प्रकार की असुरक्षा तथा अपनों पर किसी प्रकार का शक करने की गुंजाईश ही नही रहती थी लेकिन आज सबसे अधिक जो छल तथा ठगी हो रही है वह अपनों के द्वारा ही अधिक हो रही है। परिवारों में चाहे महिलाओं का शोषण हो या अपनों द्वारा लूटा जाना या चोरी आदि की वारदातें हो उनमें अपने ही परिवारों के लोगों का शामिल होना आम बात हो गई है। इसमें दूर के रिश्तेदार हो या चाहे अपने खून के रिश्ते सब आज तार-तार होते नजर आते हैं। सवाल उठता है कि जब हमारे घर में चोर तथा ठग भरे हुए हैं तथा समाज में किसी प्रकार की सुरक्षा नही है तो फिर विश्वास किस पर करें? भाजपा नेता प्रमोद महाजन की हत्या का आरोप उनके अपने छोटे भाई पर लगा है। इसी तरह आये दिन अखबारों व खबरों में देखने सुनने में आता है कि कई मामलों में मॉं ही अपने बच्चों की हत्या करा देती है, पत्नी अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या करा देती है। पैसे तथा सम्पति हड़पने के लिए बेटे अपने मां-बाप की हत्या कर देत हैं तथा उन्हें घर से बाहर निकाल देते हैं। इस तरह की घटनायें हमारे समाज में आम हो चली हैं। जो कि इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में सबकुछ ठीकठाक नही चल रहा है। यही हालात रही तो आने वाले समय में अपराध इस कदर बढ़ जायेंगे कि समाज की जो संरचना बनी है वह चूर-चूर हो जायेगी। जरा सोचिये जिन मां-बाप ने हमें पैदा किया लालन-पालन किया, पढ़ाया-लिखाया तथा हमें अपने पैरों पर खड़ा किया उन्हें बुढ़ापे में दर-दर की ठोकरें खाने को छोड़ देना क्या यही इंसानियत है? क्या उनका बुढ़ापे में तिरस्कार करना उचित है। अभी हाल ही में दिल्ली के रोहिणी इलाके में एक वृद्ध को उसका बेटा बस स्टेण्ड पर अभी आता हूँ, कह कर छोड़ गया और आज तक वापस नही लौटा। बेचार बूढा वहीं स्टैण्ड पर भीख मांगकर तथा लोगों की दया पर अपने दिन काट रहा है। क्या यही मानवता है? यह किसी एक परिवार तथा समाज की घटना हो सकती है कोई कह सकता है कि हमारे पारिवारिक मामले में किसी को बोलने की दखल नही लेकिन जो संज्ञाशून्यता हमारे समाज और संस्कारों में आ चुकी है क्या उसका प्रभाव हमारे समाज पर नही पड़ेगा? क्या इससे यह जाहिर नही होता है कि हमारी पौराणिक संस्कृति तथा हमारे रीति-रिवाजों तथा अपने से बड़ों के सम्मान की सीख कहीं न कहीं समाप्त होती जा रही है। क्या इससे यह जाहिर नही हो जाता है कि हम आज सिर्फ अपने स्वार्थ तथा कुंठा से इस तरह से पीड़ित हो चुके हैं कि अपनो के लिए भी हमारे मन में न तो मान है और न मानवीय संवेदनायें ही शेष बची हैं।
हमारे समाज में इस तरह की आत्म केन्द्रित मनोधारणा, हर आदमी की अपना निजी जीवन, परिवार से अलग अपनी पहचान की लालसा हमारे सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन पर हावी हो रहा है। इससे जहां परिवारों में आपसी सामंजस्य समाप्त हो रहा है वहीं एक दूसरे के पास एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद अपनों के लिए न तो समय है और न किसी प्रकार की सहानुभूति या अपनी समस्या को परिवार के साथ बांटने की सोच। इसका परिणाम यह है कि हर कोई अपने सुख और अपने दु:ख को अपने आप ही बांटने का प्रयास कर रहा है और इस आपाधापी में हम कुंठा तथा अविश्वास की भावना से ग्रस्त होते जा रहे हैं। दूसरी बात एकाकी परिवार की धारणा ने हमें अपनों से दूर कर दिया है व हमारी पारिवारिक सुरक्षा पर भी एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
 महानगरीय जीवनशैली में एकाकी परिवारों के पति-पत्नी का नौकरी पेशा होना तथा घर में बच्चों का अकेलापन उन्हें सालता रहता है तथा चोरों व अपराधियों को आसान शिकार मुहैया कराने में भी सहायक सिद्ध होता है। यह भी अपराध बढ़ने का एक कारण है। दूसरी ओर दिनभर अकेले घरों में व्यस्क होते अकेले बच्चे आधुनिक संचार सुविधाओं के चक्कर में जाने अनजाने में अपराध के शिकंजे में आ जाते हैं। नोएड़ा का चर्चित अरूषी हत्याकांड़ भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। कहीं न कहीं आधुनिक संचार माध्यमों चाहे वह मोबाईल है या कम्प्यूटर,नेट आदि का भी हमारी जीवनशैली पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
आज हमारे देश में अराजकता और अलगाव इस हद तक बढ़ गया है कि वह आतंकवाद का संगठित रूप लेकर हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ा है और हम उसे समाप्त करने की बजाय हर दुर्घटना या बम धमाके के बाद बयानबाजी करके अगले बम धमाके की प्रतीक्षा करते नजर आते हैं। आतंकवाद अब कश्मीर और पंजाब या असम व पूर्वोत्तर की सीमाओं से बाहर निकलकर समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की एक गंभीर समस्या बन गया है। इससे न तो दिल्ली सुरक्षित है और न देहात। यह अलगाव भी संगठित अपराध का एक घिनौना रूप है जिसे अगर समय रहते न कुचला गया तो आने वाले समय में धर्म व सम्प्रदायों के आधार पर बंटता हमारे समाज का आतंक की जद से बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा।
समाज में संचार माध्यमों तथा सिनेमा में जो नग्नता एकाएक उभरकर आई है उसने भी हमारे बच्चों के कोमल मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। नासमझ बच्चों को लगता है कि शायद जीवन की सच्चाई यही है और यह आम बात है। अभी हाल के वर्षों में भारतीय सिनेमें में मुम्बईया स्टाइल में जो नग्नता आई है लगता है फिल्मों की हीरोईनें तथा फैशनपरस्त महिलायें अपने सारे कपड़े उतारने पर आमादा हैं तथा हीरो भी अपने नंगे शरीर का उभार दिखाकर पैसा कमा तो रहे हैं लेकिन हमारे समाज को नकारात्मक तथा अपराध की प्रवृत्ति की ओर धकेल रहे हैं। आये दिन अश्लील सीड़ी तथा मोबाईल पर बन रहे स्कूली छात्र-छात्राओं के नग्न व अश्लील वीड़ियो फुटेज इस बात को समझने के लिए पर्याप्त हैं कि भारतीय जनजीवन को समझने तथा वर्तमान में हो रहे सामाजिक, पारिवारिक परिवर्तनों को समझ व परखकर हमें अपने समाज की मनोदशा तथा संरचना को समझना होगा। हमारे नीतिनियंताओं को इस प्रकार की फूहड़ता तथा मानव का मशीनी पुर्जा मात्र बनने की मानसिकता को झकझोरना होगा, अपनों के प्रति होते हमारे संज्ञाशून्य सरोकारों को पुन: स्थापित करना होगा, अपराधियों के प्रति कठार कदम उठाने होगें अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि पश्चिम की नग्नता तथा फूहड़ता की नकल करने वाला हमारा समाज अपराध और अराजकता की ऐसी जद में फंस जाये कि उसका फिर से उबरना मुश्किल हो जाये। समय रहते ही किसी भी रोग को नासूर बनने से पहले उसका कारगर तथा स्थाई इलाज किया जाना समाज व देश के हित में है। समय रहते उसका समाधान सही दिशा में किया जाना लाजमी है यही समय और परस्थितियों का तकाजा है। अन्यथा फूहड़ता तथा साधन जुटाने की होड़ व पैसे के चक्कर में अन्धें हो रहे आदमी की हसरत समाज के ताने बाने की हत्या न कर दें तथा समाज में मानवीय संबध की ड़ोर तार-तार न हो जाए।

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                                                                                                                                                                हास्य-व्यंग्य



                                                                                                                                                          -प्रेम जनमेजय


ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग



गर्मियों की इतवार की अलसाई सुबह का समय था और चढ़ती धूप, मक्खियों की भिन्न-भिन्न तथा चिडि़यों की चांय चांय मेरे जैसे अलसाए लोंगों को वैसे ही बेचैन कर रही थी जैसे बढ़ती हुई मुद्रास्पफीति की दर से आजकल भारत सरकार बेचैन है । सामने चुनाव की गर्मी-सा लंबा दिन था और उस दिन में कहीं अंधेरा भी दिखाई दे रहा था । ऐसे अंधेरे में किसी गलतफहमी-सा धर्मिक प्रवचन, बहुत सकून देता है ।
ऐसी ही अलसाई सुबह मेरी पत्नी धर्मिक चैनल देख रही थी और जैसे हाई कमान की बात को न चाहते हुए भी देखना-सुनना पड़ता है वैसे ही मुझे देखना - सुनना पड़ रहा था। प्रवचनकर्ता बाबाजी उंचे से आसन पर बैठे अपने सामने, नीचे, जमीन पर बैठे भक्तों को समझा रहे थे कि इस संसार में सभी जीव बराबर हैं। जैसे मेरी सरकार लोगों की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखती है, उसमें हस्तक्षेप नहीं करती है वैसे ही मैं भी अपनी पत्नी की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखता हूं । पर इधर मैं देख रहा हूं कि पत्नी मेरी भावनाओं का कम और बाबाजी की भावनाओं की अधिक कद्र कर रही है। इसी कद्र के चक्कर में बाबाजी का आसन उंचा होता जा रहा है और हमारे जैसे भक्तों का नीचे। हमारी बूंद-बूंद श्रद्धा से उनका सागर भर रहा है। अपने हर प्रवचन में वो दान की महिमा समझाते हैं एवं भगत भक्तिभाव से समझते हैं और भगतो की इसी समझ का परिणाम है कि आश्रम फल-फूल रहा है और अनेक फूल-सी बालाएं उसकी शोभा बढ़ा रही हैं। ये दीगर बात है कि बाबाजी अपने आश्रम द्वारा तैयार किए गए आयुर्र्वैदिक उत्पादों को दान में नहीं देते हैं, उन बहुमूल्य वस्तुओं का मूल्य लेते हैं। जैसे-जैसे भगतों की संख्या बढ़ रही है, दान-कोष बढ़ रहा है और बहुमूल्य वस्तुओं के दाम बहुमूल्य हो रहे हैं। बाबाजी को प्रवचनों से फुरसत नहीं मिल रही है। भगतजनों ने थैलियों के मुंह खोल दिए हैं। एक-एक सतसंग की लाखों रुपयो में बोली लग रही है ।
बाबाजी बता रहे हैं-- इस श्याम के रंग को कोई नहीं समझ सकता है। आप जैसे- जैसे इसके रंग में डूबते हैं वैसे वैसे उजले होते जाते हैं।' वे सोदाहरण समझा रहे थे कि उनके दरबार में अनेक श्यामवर्णी आए और उजले हो गए । आजकल बाबाजी की पहुंच बढ़ गई है और वे श्याम रंग में डूबे लोगों को उजला करने का परमार्थी -व्यवसाय कर हरे हैं। वो श्याम रंग में डूबे लोगों को उकसा रहे थे कि वे उनकी शरण में आएं और समाज में उजले होने का सम्मान प्राप्त करें। बाबाजी श्याम रंग में डूबे हुए भगतों को निर्भय कर रहे थे कि बाबाजी के होते वे निडर रहें और दान-दक्षिणा में अपनी श्रद्धा बनाए रखें। जितना वो दान-दक्षिणा में श्रद्धा रखेंगें उतने ही निर्भय हो सकेंगें। बिना हनुमान चालीसा का पाठ किए, भूत पिशाच उनके निकट नहीं आवेंगें। वैसे जब आप ही उजले भूत- पिशाच हो जाएं तो कौन आपके सामने आने का साहस करेगा।
ऐसी अलसाई सुबह और बाबाजी के प्रवचनों के बीच उन्होंने मेरी घंटी बजा दी। मैंनें दरवाजा खोला तो सामने उनको पाकर भयभीत मन मौन-भजन करने लगा -- भूत पिशाच निकट नहीं आवें, महावीर जब नाम सुनावें।' न न उस दिन न तो मंगलवार था, न ही मेरे सामने कोई रामभक्त या हनुमान भक्त खड़ा था और ना ही मैं पत्नी को दिखाने के लिए धार्मिक बना हुआ था। हमारे जनसेवक तो चुनाव के समय जनता के सामने धार्मिक हो जाते हैं मैं तो मात्र पत्नी के सामने होता हूं। मेरे सामने पुलिस-विभाग के 'कुशल' कर्मचारी और मेरे परम् 'मित्र' खड़े थे । मन ने मुझे चेताते हुए कहा, हे प्यारे सत्यवान, सावित्री को समाचार दे दे कि वह अपने सभी पतिव्रत गुणों को लॉकर से निकाल ले क्योंकि उसके सत्यवान पर संकट की आशंका है। संतो ने कहा भी है कि पुलिसवालों की न तो दुश्मनी अच्छी और न ही दोस्ती अच्छी, इनसे दूरी ही अच्छी।
उनके हाथ में पकड़ा मिठाई का डिब्बा लगातार चेतावनी दे रहा था कि प्यारे मुझे खा मत जाना वरना एक के चार चुकाने पड़ेंगें। उनके चेहरे पर खिली हुई प्रसन्नता ऐसी थी जैसी किसी वकील या पुलिसवाले को एक अमीर द्वारा किए गए कत्ल का केस मिलने पर होती है। वे वर्दी के बिना ऐसे लग रहे थे जैसे चुनाव के समय वोट-याचना करता नेता, सीता का अपहरण करता हुआ रावण अथवा मुंह में राम और बगल में छुरी रखने वाला धार्मिक।
उन्हें सामने देख पत्नी ने अपना धार्मिक कर्म स्विच आफ किया और भाई साहब के लिए चाय बनाने अंदर चली गई ।
मुझे देखते ही वो गले मिले और उनकी इस आत्मीयता से घबराकर मैंनें अपने पर्स को कसकर पकड़ लिया। मैं दूध का जला था और जानता था कि उनकी आत्मीयता की कीमत होती है जिसे वो किसी न किसी रूप में वसूल ही लेते हैं। वो सीधी, टेढ़ी, आड़ी-तिरछी सब प्रकार की अंगुलियों से घी निकालने में माहिर हैं। गले मिलने के बाद और उस मिलने से कुछ भी न मिलने के कारण मेरे इस मित्र ने बहुत जल्दी गले मिलो कार्यक्रम सम्पन्न कर लिया और शीघ्र ही मुद्दे पर आते हुए बोले-- प्रेम भाई आज बहुत अच्छा दिन है, आज मेरा तबादला हो गया है, लो मिठाई खाओ। मैंनें लोगों को तबादले से परेशान होते ही देखा है, पर मेरा मित्र तो प्रसन्न हो रहा था, जरूर दाल काली है।-- बधाई हो, कहां हो गया तबादला ?''-- वहीं जहां जवानी में मैं जाकर मजे करता था और तूं शर्म के मारे मुंह छिपाता था। वहीं जहां तेरे मन में तो लड्डू फूटते थे पर नैतिकता का मारा उनको चखता नहीं था। तूं डरता था कि जवानी में तेरे कदम फिसल गए तो इन चक्करों में पढ़-लिख नहीं पाएगा और अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी। ' इसके बाद उसने आंख मारते हुए कहा,' औरतों की मंडी में। अब तो दोनों हाथों में लड्डू होंगें।
''-- पर अभी तो आप बड़े ही पॉश इलाके में थे, दक्षिण दिल्ली के इज्जतदार इलाके में।'
-- इज्जतदार घंटु...' कहकर वो थोड़ी देर रुका और बोला,' पता नहीं क्यों तेरी सोहबत में आते ही दिमाग के घोड़े दौड़ने लगते हैं... सच कह रहा तू, इलाका साला इज्जतदार ही है, बड़ी इज्जत से जुर्म होता है, बड़ी इज्जत से रिश्वत मिलती है,  इज्जतदार घर की इज्जतदार औरतें जिस इज्जत के साथ इज्जत का जनाजा निकालती हैं... पर अप्पन को इतनी इज्जत की आदत नहीं है। साला डर ही लगा रहता है कि जिस साले से माल ले रहे हैं कहीं उस इज्जतदार की पहुंच उपर तक न हो और अपना स्टिंग ऑपरेशन ही न हो जाए। इज्जतदार इलाके में रिस्क ज्यादा है।
''-- पर औरतों की मंडी तो बहुत बदनाम जगह है... वहां क्या मिलेगा, नीचे गिरे लोग, बदनामी ही न...-- प्यारे जहां जितने नीचे - गिरे लोग होंगें वहां उतना ही उपर का माल बनेगा न। समुद्र में भी जितने नीचे जाओ उतने ही रत्न मिलते है नं... काले कोयले की खानों में ही तो हीरा मिलता है... अबे शरीफों के मोहल्ले में क्या मिलेगा, मैडल, साले जिसे बाजार में भी नहीं बेच सकते हैं, बेचने जाओ तो लोग टोकते हैं, क्यों, अपना सम्मान बेच रहे हो ? प्यारे बड़ी मुश्किल से ले- देकर ये ट्रांसफर करवाया है। जानता है इस थाने में ट्रांसफर का क्या रेट चल रहा है...
''-- रहने दो मित्र क्यों अपना ट्रेड सीक्रट बताते हो । -- पर तुम तो ट्रेड शुरु कर दो । तुम्हारे इलाके का एस। एच। ओ। अपना दोस्त है । मजे से पेपर लीक करो , तुम पर आंच नहीं आएगी । खाओं और खाने दो के सिद्धांत पर चलो जैसे तुम्हारा मित्र चोपड़ा चल रहा है । जानते हो कितनी इज्जत है उसकी । आई. ए. एस., बड़े-बड़े बिजनेसमैन,सांसद, एम एल ए -- कौन-कौन नहीं उसके दरवाजे पर आता है। सबको अपने बच्चों के बढि़या नम्बर चाहिए होते हैं और बच्चे तो देश का भविष्य होते हैं तथा ऐसे में भविष्य कम नम्बर वाले बच्चों का हो गया तो देश का क्या होगा । कितनी बड़ी देशसेवा कर रहा है चोपड़ा और इसके बदले में उसे पैसे का पैसा मिल रहा है और इज्जत की इज्जत । तुम्हें क्या मिल रहा है ?''
-- मुझे ... ''
-- लटके रहो नैतिकता की इन सूईयों को पकड़ कर । पालते रहो अपने उजले होने का भ्रम । प्यारे आजकल उजला वही है जो श्याम के रंग में डूबा है । आजकल उजला होना महत्वपूर्ण नहीं है उजला दिखना महत्वपूर्ण है । ' यह कहकर मुझे चिकना घड़ा मान वो देशसेवा के उच्च विचार धरण किए आगे बढ़ गया ।
शायद सच ही कहा उसने-- आजकल उजला वही हो जो श्याम के रंग में डूबा है और जितना डूब रहा उतना ही उजला हो रहा है । उजला होने से अधिक उजला दिखना महत्वपूर्ण है ।
तथास्तु ।

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                                                                                                                                                  चांद परियां तितली



                   


                               होती मैं भी चंचल तितली







                                  

                                   होती मैं भी चंचल तितली


                                         रंग-बिरंगे फूलों की


                                      दुनिया में उड़ती फिरती





                                        मम्मी होती फूल कोई तो


                                            मैं उन पर मँडराती


                                             पापा मुझे ढूँढते थकते


                                               उनके हाथ न आती





                                              भइया मेरा भौंरा होता


                                               उसके सँग मैं गाती


                                           दिन भर खेला कूदा करती


                                                 पढ़ने से बच जाती





                                                    हवा सहेली होती मेरी


                                                         उसके सँग मैं जाती


                                                     चाँद सितारों की दुनिया में


                                                          घूमघाम के आती





                                                       होती मैं भी चँचल  तितली...


                                                                      -श्याम सुशील














चांद पर प्लाट ले लो

घर के  सामने रिक्शा रुकते ही गोलू झट से रिक्शे से कूद पडा़।  वह जल्दी से जल्दी पापा के पास पहुंचकर जानकारी देना चाहता था जो उसने सहपाठी नितिन से सुनी थी। नितिन ने यह कहा था कि उसके पापा ने कहा है कि चांद पर प्लाट बिक रहा है।  गोलू ने चांद तो देखा था और उसे चांद अच्छा भी लगता है। वह मन ही मन सोचता रहा कि काश उसके पापा मान जाएं तो कितना अच्छा होगा। वह वहां से झांककर अपना स्कूल देखेगा। अपना घर देखेगा और नितिन से कहेगा कि मैं यहां चांद पर पहुंच गया हूं।  इन्हीं ख्यालों में डूबा हुआ वह घर की ओर बढ़ रहा था।

   गोलू के पापा ने अपने बेटे से सुना कि चांद पर प्लाट बिक रहे हैं।  गोलू के पापा ने चश्मे से झांककर देखा कि आठ वर्षीय गोलू के चेहरे पर भोलापन तैर रहा है।  उन्होंने मन ही मन सोचा कि बच्चों के मन कितने कोमल होते हैं।  हर बात को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। वह बच्चे का मन रखने के लिए यह भी कह सकते थे कि ठीक है मैं भी खरीद लूंगा। लेकिन उन्होंने सोचा कि क्यों न चंद्रमा की हकीक़त बयान कर दें।  उन्होंने पुचकारते हुए बेटे से कहा,” गोलू तुम चंद्रमा को देखते हो न।”


“हां पापा! रात को चमकता हुआ कितना अच्चा लगता है।”


“बिल्कुल ठीक. अब बताओ वह एक जैसा दिखता है।”

 “नहीं पापा, कभी वह पूरा दिखाई देता है तो कभी छोटा।”

“बिल्कुल ठीक, तुमने सही बताया। अब मैं तुम्हें इसके बारे में बताऊंगा, तब तुम स्वयं फैसला करना कि चंद्रमा पर प्लाट खरीदें या नहीं।”

“ठीक है पापा।”-गोलू बोला।

“ चांद जिसे हम चंद्रमा या मून कहते हैं. वहां न तो हवा होती है और न ही पानी। वहां न सुबह होती है न शाम। वहां धरती के पंद्रह दिन के बराबर एक दिन और पन्द्रह रात के बराबर एक रात होती है।  एकाएक होने वाले दिन की गर्मी इतनी कि पानी भाप बन जाए और ऐसे ही एकाएक होने वाली रात की ऐसी ठंडक कि कुल्फी बन जाए।  यहां तक कि वहां हम कुछ फसलें भी नहीं पैदा कर सकते। क्या यह सब जानकर तुम चांद पर जाना चाहोगे?”

गोलू ने तपाक से कहा, “पापा, पहले तो हम चांद पर जाना चाहेंगे और फिर उसे देखकर निर्णय लेंगे।”  


चांद पर जाना हो या न हो. गोलू की तुरंत बुद्धि पर गोलू के पापा की आंखों में एक अद्भुत सी चमक आ गई। 


   

  -- शमशेर अहमद खां