"घुमती हूं अपने पिंजर में बिना खटखटाए दरवाजा उगती हूँ अपनी आँखों में आप ही चुपचाप कहती हूँ आप-आप से रब्बा! मैंने देखी है उसकी आँखों में अपने लिए नमी।"
-जया जादवानी
(अँक 27)
लेखनी-मई-2009
इस अँक में- कविता धरोहरः भवानी प्रसाद मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, जयशंकर प्रसाद। माह विशेषः शीला सिद्धांतकर, हरिओम, जैन मुनि क्षमासागर, सुधीर सक्सेना सुधि, दिलीप दास। कविता आज और अभीः मंजू श्रीवास्तव, कुसुम भट्ट, सुरंजन, बीना त्रिपाठी, वंदना मिश्रा, शीला सिद्धांतकर, ऋषभ देव शर्मा। माह की कवियत्रीः सुजाता चौधरी । नारी मनः वन्दना केंगरानी। बाल कविताः रचना श्रीवास्तव।
मंथनः शिव कुमार मिश्र। परिचर्चाः शैल अग्रवाल। कहानीः महेन्द्र दवेसर।शेष अशेषः अंतिम भाग। दो लघुकथाएँ: आलोक कुमार सातपुते, अश्विनी कुमार आलोक। सरोकारः दिनेश ध्यानी। मुद्दाः संतोष श्रीवास्तव। हास्य व्यंग्यः हरिशंकर परसाई। बाल कहानीः रचना श्रीवास्तव। व खबरों से भरपूर विविधा।
बाग-बगीचे हों या घर आंगन, चिड़िया शब्द मात्र ही कई-कई बिम्ब और कई चित्र...कई-कई संदर्भों को आँखों के आगे उकेर देता है...सुबह से ही हमारे साथ-ही आम दिनचर्या की लय पर आँगन में फुदकती गौरैया...या फिर उमसती दोपहर में नीम और पीपल के पेड़ों में तो कभी सूखी व धूल भरी क्यारियों में चोंच से मिट्टी कुरेदती गौरैया...निरीह भोली पर स्वछंद और खिलवाड़ी चिड़िया। सावन की उमड़ती बदलियों-सी डाल-डाल फुदकती और गाना गातीं चिड़िया। घोंसले के लिए तिनके बटोरती, बच्चों की चोंच में चोंच डाले दाना देती चिड़िया, तो कहीं क्यारियों में तेजी और फुर्ती से कीड़ों का शिकार करती चिड़िया... जाल में बिछे दानों के लालच में कभी खुद ही शिकार हो जाती चिड़िया ।
एक अपना संसार होता है इनका भी , काफी कुछ हमारे जैसा ही। बस, एक बात समझ में नहीं आती कि निरीह और लाचार शिकारी के पंजे में फंसी चिड़िया को देखकर कवि और दार्शनिक... सभी विचारकों को बस, औरतों का ही, भोली-भाली बेटियों का ही ख्याल क्यों आता है?...फिर एक शिकारी ही शिकार के बारे में सोचे...है न कुछ अज़ीब सी बात!
वैसे भी आज जब घर-घर से आंगन ही गायब होते जा रहे हैं तो आंगन की चिड़िया को, उसके उस भोलेभाले, फुदकते अस्तित्व को कैसे बचा कर रखा जा सकता है...आज जब बेटियाँ भी बेटों की हर क्षेत्र में बराबरी कर रही हैं तब उनसे इस तरह के समर्पित और निस्वार्थ चरित्र और स्वभाव की कैसे अपेक्षा की जा सकती है...या करनी चाहिए? कहाँ तक सही है यह बात, जो गिरीश पंकज जी ने अपनी कविता में लिखी है...क्या आज भी सभी पिता ( जिनके मन-मष्तिष्क पर बेटी पैदा होते ही एक बोझ बनकर बैठ जाती है) ऐसा ही महसूस करते हैं !
बेटी मन की पीर भुला दे बेटी जो बस प्रीत जगा दे बेटी है चंदन की खुशबू बेटी घर भर को महका दे बेटे जैसे भटके राही बेटी सच्ची राह दिखा दे बेटी है लक्ष्मीबाई-सी हिम्मत का जो पाठ पढ़ा दे बेटी क्या है शीतल छँया, धरती पर ही स्वर्ग बना दे बेटी जिसका तन-मन कोमल जो कोयल-सा गान सुना दे बेटी जिसको देख समूचा- घर अपना दुख दर्द भुला दे बेटी कभी सजा न देती बेटी घर को सदा सजा दे बेटी तो एक सुंदर पुल है बेटी सबका मिलन करा दे बेटा-बेटी सभी बराबर बेटी इसका फर्क मिटा दे। गिरीश पंकज
अपेक्षाएँ कुछ भी हों...जमाना और तारीखें भी चाहे कितनी ही बदल चुकी हों, साथ में चाहे खुद हमारा अपना सोचने का तरीका भी बदल चुका हो, पर समाज में...मानव रचित इस समाज में आज भी बहुत कुछ है जो अपरिवर्तनीय ही है। वैसे ही चलता आ रहा है और चलता रहेगा। पिछले महीने की ही कड़ी को आगे बढ़ाते हुए लेखनी का यह अंक उसी चिरपरिचित ‘आंगन की चिड़िया’ यानी कि बेटियों को समर्पित है...बेटियां जिन्हें पैदा होते ही सिखाया जाता है कि उन्हें पराए घर जाना है। पग-पग पर उनसे संयम और त्याग की अपेक्षा की जाती है, क्योंकि उन्हें दो कुलों की लाज निभानी होगी। जो आज भी मां-बाप का दुःख-दर्द महसूस करती हैं, उनपर कुर्बान होने का हौसला ही नहीं, जरूरत पड़ने पर, अपने हर सुख को त्याग उनकी और परिवार की देखभाल में जीवन निकाल देती हैं परन्तु आज भी दान की ही वस्तु हैं, व्यापार तक होता है इनका। घर परिवार ही नहीं, खुद अपने जीवन पर, जीवन के अहम् फैसलों पर मात्र कहने भर का ही अधिकार होता है इनका । ...अच्छी हैं ये, जबतक पालतू बनी रहें...पंख न निकालें...आकाश न नापें...पर क्या चिड़िया के लिए संभव है यह... !
मैं देव-सृष्टि की रति-रानी निज पंचबाण से वंचित हो, बन आवर्जना-मूर्ति दीना अपनी अतृप्ति-सी संचित हो, अवशिष्ट रह गईं अनुभव में अपनी अतीत असफलता-सी, लीला विलास की खेद-भरी अवसादमयी श्रम-दलिता-सी, मैं रति की प्रतिकृति लज्जा हूँ मैं शालीनता सिखाती हूँ, मतवाली सुन्दरता पग में नूपुर सी लिपट मनाती हूँ, लाली बन सरल कपोलों में आँखों में अंजन सी लगती, कुंचित अलकों सी घुँघराली मन की मरोर बनकर जगती, चंचल किशोर सुन्दरता की मैं करती रहती रखवाली, मैं वह हलकी सी मसलन हूँ जो बनती कानों की लाली।"
"हाँ, ठीक, परन्तु बताओगी मेरे जीवन का पथ क्या है? इस निविड़ निशा में संसृति की आलोकमयी रेखा क्या है? यह आज समझ तो पाई हूँ मैं दुर्बलता में नारी हूँ, अवयव की सुन्दर कोमलता लेकर मैं सबसे हारी हूँ। पर मन भी क्यों इतना ढीला अपने ही होता जाता है, घनश्याम-खंड-सी आँखों में क्यों सहसा जल भर आता है? सर्वस्व-समर्पण करने की विश्वास-महा-तरु-छाया में, चुपचाप पड़ी रहने की क्यों ममता जगती हैं माया में? छायापथ में तारक-द्युति सी झिलमिल करने की मधु-लीला, अभिनय करती क्यों इस मन में कोमल निरीहता श्रम-शीला? निस्संबल होकर तिरती हूँ इस मानस की गहराई में, चाहती नहीं जागरण कभी सपने की इस सुघराई में। नारी जीवन की चित्र यही क्या? विकल रंग भर देती हो, अस्फुट रेखा की सीमा में आकार कला को देती हो। रुकती हूँ और ठहरती हूँ पर सोच-विचार न कर सकती, पगली-सी कोई अंतर में बैठी जैसे अनुदित बकती। मैं जभी तोलने का करती उपचार स्वयं तुल जाती हूँ, भुजलता फँसा कर नर-तरु से झूले-सी झोंके खाती हूँ। इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है, मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूँ, इतना ही सरल झलकता है। "क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प-अश्रु जल से अपने - तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने-से सपने। नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में, पीयूष-स्रोत बहा करो जीवन के सुंदर समतल में। देवों की विजय, दानवों की हारों का होता युद्ध रहा, संघर्ष सदा उर-अंतर में जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा। आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा - तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।"
कल चिड़िया ने घोंसले बनाये थे आज भी बनाये हैं, मैं सोचता हूँ कि चिड़ियाँ जब तक रहेंगी घोंसले बनाती रहेंगी. चिड़ियों के लिए; और शायद, हम सभी के लिए अतीत अनागत और वर्तमान का इतना ही अर्थ है कि हमें हर बार रहने केलिए एक घर बनाना है
जैन मुनि क्षमासागर
चुटकी भर धूप
चुटकी भर धूप के लिए तरसती है नन्ही चिड़िया. आँगन भर धूप के लिए तरसते हैं घर के लोग. दादा-दादी, बड़की-छुटकी बहुएँ और सबसे छोटा चुन्नू. शेष लोग घर से बाहर गए हैं पढ़ने, रोटी कमाने के लिए. वे शायद बाहर ही अपने हिस्से की धूप भीतलाश लेते होंगे. सोचती है चिड़िया- 'मैं भी बाहर जाऊं?' अपने आप से सवाल करती है चिड़िया और जवाब भी ख़ुद ही देती है- 'ऊंह क्यों जाऊं मैं बाहर....?ये लोग भी कहाँ जा पाते हैं बाहर...' अरे! आज तो धूप निकली है चिड़िया के लिए भी और घर के लोगों के लिए भी. तभी तो सभी आँगन-भर धूप में बैठे हैं आपस में हँसी-मजाक भी हो रहा है. सभी कुछ खा-पी भी रहे हैं. तभी नन्हा चुन्नू बोल उठता है-'चिरिया...' 'हाँ बेटा चिड़िया...' कहते हैं दादाजी और थोड़ा चुग्गा चिड़िया के लिए भी डाला जाता है. चिड़िया खुशी-खुशी चुग्गा चुगती है. आँगन-भर की धूप में सभी आनंद से भरे हैं. 'मैं न कहती थी... क्यों जाऊं मैं बाहर' सोचती हुई चिड़िया भी चुटकी-भर धूप का आनंद ले रही है. -सुधीर सक्सेना 'सुधि'
नारी अस्मिता के संघर्ष का इतिहासः अतीत से आज तक की यात्रामें‘
नारी अस्मिता के लिए चल रहे संघर्ष और उसके समक्ष विद्यमान चुनौतियों की चर्चा हम कुछ ठहर कर करेंगे, पहले चली आ रही सामाजिक संरचना और पुरुष वर्चस्ववाले समाज में नारी के स्वत्व की स्थिति और उसके बीच में उभरते पुरुष और नारी-मन के कुछ बिंबों को, तथा समाज के किसी भी वर्ग में क्यों न सही, नारी के रूप में जन्म पाने की नियति और उसकी फलिताओं को देखें, नारी की अस्मिता के संघर्ष में जिन संभावित चुनौतियों की बात हमने ऊपर की है और जो हमेशा विध्यमान रही हैं, उन चुनौतियों का रूप भी इन्ही बिंबों और इन्ही फलिताओं के बीच से उजागर होगा। उदाहरण सब जाने-पहचाने ही हैं, जरूरत उन्हें बारबार जानने-समझने की, इन्हें बारबार गुनने और याद रखने की है-
प्रख्यातस्यात्म वंशस्य न्यर्गं च परिमार्जता
प्राप्त चरित्र संदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रविकूलासि मे हठा
तद्गच्छत्वानुजानेद्य यचेष्टे जनकात्मजे
एता दश दिशोभद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया
कः पुंमास्तु कुले जातः स्त्रियं परगृहोपिताम्।
अर्थात् ' अपने अपवाद मिटाने तथा अपने कुल की कीर्ति रखने के लिए भी मैने उसे मारा है। रावण के यहां बहुत दिन रहने से मुझमें तुम्हारे आचार के बारे में संदेह है। इनसे जैसे नेत्रों में पीड़ावाले को दीपक नहीं अच्छा लगता है वैसे ही तुम मुझको अच्छी नहीं लगती। इससे हे सीते ! जहां चाहो, वहां चली जाओ। तुमसे मेरा कोई संबंध नहीं है। क्योंकि ऐसा कौन होगा, जो उच्च कुल में उत्पन्न होकर अन्य के घर में रही हुई स्त्री को फिर से ग्रहण कर ले। '
वाल्मीकी रामायणः युद्ध कांडः पंचदशाधिक सततम्, 16-18
इसी प्रकरण को महाभारतकार इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं---
' हे भद्रे! मुझ जैसे पति को पाकर भी तुम कहीं राक्षस के घर में ही बूढ़ी न हो जाओ, ऐसा विचारकर ही इस रावण तो मैने मारा है। .......हे मिथिलेश पुत्री ! चाहे तुम अच्छे चरित्रवाली हो , चाहे बुरे चरित्रवाली, मैं अब तुम्हारा उपभोग ( परिभोगाय) उसी तरह नहीं कर सकता, जिस प्रकार कुत्ते की चाटी खीर का कोई उपयोग नहीं करता।'
रावण का वध करने के उपरान्त, अपनी सेना और सेनानायकों के समक्ष सीता से कहे गए राम के ये वचन हैं। सीता की मुक्ति के दो कारण यहां राम ने बताए हैं, वे दृष्टव्य हैं। राम पराए घर में रही सीता को अपने भोग के अनुकूल नहीं पाते। राम अयोध्यापति और सीतापति होने के साथ-साथ पुरुष भी हैं, पुरुषोत्म, मर्यादा पुरुषोत्तम। उनके एकडएक वचन पर देवतागण पुष्प वर्षा करते हैं। ऋषि धन्य-धन्य का समवेत स्वर उच्चारित करते हैं। राम के सारे कार्य धर्म के अनुरूप, धर्म की रक्षा के लिए किए गए सारे कार्य हैं।
बाद का सारा वृतांत सर्वविदित है। अब सीता के पक्ष में एक उदाहरण देखें---
' राम के सिवाय मैंने यदि अन्य पुरुष का चिंतन मन में न किया हो, तो विष्णु पत्नी, भू देवी मुझे विवर देंगी। मन, काया, तथा वाचा से यदि मैं राम की ही अराधना करती हूं, तो वह विष्णु पत्नी भूमाता मुझे द्वार देगी। '
सीता के मुख से निकले ये अंतिम शब्द हैं जो उन्होंने वाल्मीकि के आश्रम में ऋषियों, देवों, राम उनकी सेना तथा अयोध्या से बुलाए गए हर वर्ग के नागरिकों के समक्ष राम द्वारा उनसे अपनी पवित्रता की शपथ सबके समक्ष लेने के आग्रह के तहत अपने मुख से उच्चारित किए हैं। एक अग्निपरीक्षा के उपरान्त पवित्रता साबित करने के हेतु यह उनसे दूसरी बार राम द्वारा किया गया आग्रह है। वाल्मीकि इससे पहले शपथ लेकर सीता की पवित्रता का बयान कर चुके हैं। विष्णु पत्नी भूमाता, सीता की प्रार्थना को सुनती हैं। भूमि से आसन निकलता है और सबके देखते-देखते सीता भूमि में समा जाती हैं। सब लोग आश्चर्यचकित और स्तब्ध हैं। राम द्वारा सीता से शपथ लेने को कहने पर और सीता के भूमि में समा जाने पर भी ऋषिगण धन्य-धन्य कहते हैं। और देवतागण पुष्पों की वर्षा करते हैं।
जिस तरह सीतापति, अयोध्यापति होने पर भी राम पुरुष हैं, रामायण, महाभारत के रचयिता भी ऋषि-महर्षि होने के अलावा पुरुष हैं। राम के एक-एक वचन पर, एक-एक कृत्य पर यह जो ऋषियों की जय-जयकार और देवताओं का पुष्प वर्षण है, उसका कारण उनके अनुसार राम का धर्म और धर्मशास्त्रों के अनुरूप आचरण है। इन धर्मशास्त्रों के रचयिता और धर्म के व्यवस्थापक भी पुरुष ही हैं। एक पुरुष मानस के कुछ और विचार देखें, साथ ही में उनमें नारी की अस्मिता के यथार्थ को भी अपनी निगाह में लाएं-
' मां आज यह भिक्षा मिली है ' कुंती तब कुटी के भीतर थी। कुछ न देखकर ही पुत्रों से बोली- ' भुंध्वम्इ समेत्व सर्वे- तुम सब मिलकर भोगो ' (यहां भी ' भुंध्वम् ' क्रिया पर ध्यान दें)। वास्तविकता जानने के उपरान्त कुंती युधिष्ठिर से कोई ऐसा उपाय खोजने को कहती है कि उसकी बात भी झूठी न हो और द्रौपदी अधर्म से बच जाए। युधिष्ठिर पहले अर्जुन से कहते हैं चूंकि द्रौपदी को उसने स्वयंबर में जीता है, अतएव अग्नि की साक्षी में वह द्रौपदी से विधिवत विवाह कर ले, किंतु बड़े भाइयों के रहते अपना विवाह कर लेने के अधर्म से बचने के लिए अर्जुन इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता। युधिष्ठिर अपने भाइयों को देखते हैं कि किस प्रकार उनकी आंखें द्रौपदी के रूप से प्रभावित हैं और मन काम के मंथन से। वे निर्णय सुनाते हैं---' शुभ लक्षणों से युक्त यह द्रौपदी हम सभी की भार्या होगी---सर्वेषां द्रौपदी भार्या भविष्यति हि नः शुभाः' ।
द्रौपदी जिसके मन पर अब तक केवल अर्जुन का बिंब था, इस बंटवारे को धर्म की रक्षा के नाते मानने को विवश होती है। आजीवन वह पांच पतियों का भार वहन करती है। सत्यभामा के यह पूछने पर कि पांच पतियों को अपने वश में वह कैसे कर सकी, द्रौपदी का उत्तर था-' पति एवं नौकरों का भोजन समाप्त होने तक मैं आहार ग्रहण नहीं करती। उनके स्नान कर लेने पर ही मैं स्नान करती हूं। उनके न बैठने पर मैं नहीं बैठती, पति हीदेवता है, पति ही गति है। मैं पतियों से अधिक शयन, भोजन और अलंकरण नहीं करती। '
---महाभारतः 20-23-28-35
यह उस द्रौपदी उत्तर है कौरवों से जिसका प्रतिशोध ही महाभारत के युद्ध का कारण बना और यही द्रौपदी अपने पतियों द्वारा द्यूत-क्रीड़ा में दांव पर लगाई जाती है, हारी जाती है। दुःशासन एकवस्त्रा, रजस्वला इस द्रौपदी को बालों से घसीटता हुआ, सभा भवन में लाता है और उसे निर्वस्त्र करना चाहता है। शोक संतप्त, असहाय और जुए में जीती जा चुकी द्रौपदी सभाभवन में उपस्थित पुरुषजनों से, भद्रजनों से, अपने श्वसुर, पितामह भीष्म, विदुर, द्रोण आदि आचार्यों तथा बड़े-बड़े नीतिज्ञों, वीरों, धर्म धुरंधरों से प्रश्न करती है कि जो पांडव अपने को जुए में हारकर दास बन गए हैं, उन्हें मुझे दांव पर लगाने का क्या अधिकार है ? सभा निर्णय दे। उसके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिलता...सकारात्मक या नकारात्मक कोई उत्तर नहीं मिलता। न्याय, धर्म, राजा, सब मौन धारण कर लेते हैं। उसका प्रश्न सभाभवन में गूंजता रहता है---' इस सभा में जितने कुरु वंशी बैठे हुए हैं, वह पुत्र और बंधुओं के पालक हैं।' मेरी बातों पर अच्छी तरह विचार करके मेरे प्रश्न का योग्य उत्तर दें---' समीक्ष्य सर्वे मम चापि वाक्यं विब्रूत मे प्रशनमियं यथावत।'
---महाभारत-सभापर्व, साठवां अध्यायः45
और तो और, महाभारत के रचनाकार भी इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं देते, कोई टिप्पणी नहीं करते। वास्तविकता यह है कि द्रौपदी के प्रश्न का सकारात्मक या नकारात्मक कोई भी उत्तर पुरुष के अपने हित के अनुरूप नहीं था।
स्वर्गारोहण करते समय हिमपथ पर द्रौपदी सबसे पहले गिरती है। भीम युधिष्ठिर से द्रौपदी के गिरने का कारण पूछता है। धर्मराज युधिष्ठिर उत्तर देते हैं---
पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनंजये
तस्यै तत्फलम द्यैषा भूड़न्ते पुरुष सत्तम।
अर्थात हे पुरुषोत्तम ! हम सब लोगों के तुल्य होने पर भी अर्जुन के ऊपर विशेष रीति से इसका पक्षपात था। यह आज उसी का फल भोग रही है। ' इससे आगे है- ' धर्मात्मा, धीमान, पुरुषपुंगव, धर्मपुत्र, युधिष्ठिर इतनी बात कहकर द्रौपदी की ओर देखे बिना ही एकाग्र चित्त करके आगे चलने लगे।'
महाभारत; महाप्रस्थान पर्वः दूसरा अध्यायः6-7
द्रौपदी को यह अधिकार भी नहीं था कि अर्जुन के प्रति कोई विशिष्ट भाव अपने मन में वह रख सके। गांधारी, अपने अंधे पति के नाते आजीवन अपनी आंखों में पट्टी बांधकर अपने पतिव्रत का निर्वाह करती है। उसका यह कार्य धर्म के अनुरूप के नाते ही उसे सराहना और यश का पात्र बताता है।
बार-बार आहत और अपमानित की जाती सीता की आत्महत्या समूचे भारतीय साहित्य में वर्णित, किसी स्त्री की पहली आत्महत्या है। वाल्मीकि कवि कवि हैं। आदि कवि की एकमात्र रचना में स्त्री की आत्महत्या दर्ज होती है। द्रौपदी, गांधारी, अहल्या आदि आदि के वृतांत भी हैं जो सीता के अपने त्रासद आख्यान से कम त्रासद औररोमांचक नहीं हैं। पुरुष वर्चस्व वाले समाज और इस वर्चस्व को न्याय और धर्म के कवच में सदा सदा के लिए संरक्षित और सुरक्षित रखनेवाले धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा दीगर प्रमाणों के बीच से जो पुरुष-मानस उभरता है, उसकी वास्तविकता को पढ़ना बहुत कठिन नहीं है, ऋषियों की इस पुरुष पुंगवों पर के कृत्यों पर होनेवाली जयजयकार तथा देवताओं का पुष्प वर्षण भी आश्चर्य का विषय नहीं बनना चाहिए। इस सारी लीला के केन्द्र में और उसके इधर-उधर, सब ओर केवल पुरुष ही हैं। ---देवता, ऋषि, मनुष्य---सब पुरुष। स्त्रियां पुरुषोंके इन कुकृत्यों की महज दृष्टा हैं या भोक्ता---वे सीता, गांधारी, द्रौपदी, अहल्या कोई भी हों, अधिक से अधिक वे रो सकती हैं---चीख सकती हैं, जैसे निर्वस्त्र किए जाने के प्रयास से जूझ रही द्रौपदी की दशा को देखकर सभाभवन में उपस्थित स्त्रियां रोई-चिल्लाई थीं। अपमानित सीता की यातना से मुक्ति भी कोई पुरुष नहीं दिलाता, भूमाता उसे अपनी गोद में लेकर उसे यातना से मुक्त करती हैं।
अतीत के ही एकाध उदाहरण और देखें---अपने गौरवशाली देश के गौरवशाली अतीत के।
गौतमबुद्ध संघ में स्त्री-प्रवेश के पक्ष में नहीं थे। आनंद के अतिशय आग्रह के नाते बड़ी अनिक्षा से उन्होंने संघ में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति दी, परंतु आनंद से उन्होंने कहा---' आनंद, संघ निःसंदेह सहस्त्र वर्षों तक जीवित रहता, किंतु नारी प्रवेश से उसकी आयु क्षीण हो जाएगी। अब केवल पांच सौ वर्षों तक ही चल सकेगा। '--- भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषणः भ.श. उपाध्याय।
यही नहीं भिक्षुणनों के लिए बुद्ध ने जो आठ गुरु धर्म निर्धारित किए, उनमें से कुछ ये हैं---
. सौ वर्षों से भी संघ में दीक्षित भिक्षुणी को भी आज ही संघ में दीक्षित बिक्षु केचरण अपने मष्तिष्क से स्पर्श करने होंगे।
. भोजन, वस्त्रादि, आवास, भिक्षुओं द्वारा पहले प्राप्त कर लिए जाने के बाद ही भिक्षुणिओं को प्राप्त होंगे।
. क्या सत्य है, क्या असत्य है, इस संबंध में भिक्षुणियों का भिक्षुओं से बात करना वर्जित है।
. भिक्षुणिओं के लिए यह उचित नहीं है कि वे बरसात में वहां ठहरें जहां कोई भिक्षु न हो-आदि-आदि।
यही गौतम या सिद्धार्थ, अपनी पत्नी को बिना बताए, जब वह अपने नवजात शिशु के साथ सोई हुई थी, संसाक के कल्याण हेतु गृह त्याग करते हैं।
अपने प्रसिद्ध बौद्ध कालीन उपन्यास ' दिव्या' में यशपाल ने पिता, पति या पुत्र की अनुमति के बिना संघ में स्त्री को शरण न दिए जाने के नियम का उल्लेख किया है। दिव्या के महास्थविरसे यह कहने पर कि तथागत ने तो वेश्या आम्रपाली को संघ में शरण दी थी, महास्थविर का उत्तर था---' वेश्या स्वतंत्र नारी है देवि ! ' कम से कम सामंती व्यवस्था में वेश्या होकर नारी अपनी स्वतंत्रता पा सकती थी, आधुनिक पूंजीवादी समाज में वेश्या होकर भी वह स्वतंत्र नहीं है, वेश्यावृत्ति इस व्यवस्था में एक व्यवसाय हो गया है-
बहरहाल, बौद्ध संघ का आचरण उसके अपने धर्म के अनुकूल तो था ही, वैदिक धर्म के भी अनुकूल था। मनुस्मृति में कहा गया है-
' पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने,
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यहंति।
मनुस्मृतिः अध्याय-7-93
एक उदाहरण कालिदास से देकर अतीत के प्रकरणों से आगे के समयों में हम जाएँगे।
कालिदास की शंकुतला को संस्कृत बोलने का अधिकार---नारी होने के नाते ही---नहीं है। ' अभिज्ञान शाकुन्तलम्' के सारे पुरुष-पात्र संस्कृत में बात करते हैं और शकुन्तला समेत दीगर सारी स्त्रियां प्राकृत बोलती हैं। ऋषि कण्व शकुंतला को पति के घर विदा करते समय तमाम बातों के साथ यह उपदेश भी देते हैं कि वहसपत्नियों के साथ वहां प्रेमपूर्वक रहे।
न तो कण्व के मन में इस बात को लेकर कोई दुविधा है, और ना ही शकुंतला के मन में कि उसके पति गृह में उसकी तमाम सौतें भी हैं। ऐसी कोई दुविधा कालीदास के मन में भी नहीं है, कारण पुरुष का बहु-विवाह धर्म और धर्मशास्त्र सम्मत है। एक विवाह और पतिव्रत्य की शर्तें नारी के लिए हैं---एक पति, वह कैसा भी हो, उसके प्रति तन-मन-प्राण से समर्पण ही नारी का धर्म है। यह धर्म और धर्मशास्त्रों द्वारा नारी को दी गई नियति है, जिसे स्वीकार करने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं है। इसे न स्वीकार कर पानेवाली को बड़े भद्दे और अश्लील विश्लेषणों से पुकारा गया है। उसे भयानक दुष्फल भोगने की चेतावनी भी दी गई है।
उपर्युक्त उदाहरणों के भीतर से पुरुष-मानस के जो बिंब उभऱे हैं, वे इस नाते बहुत विस्मयकारी नहीं हैं कि पुरुष-वर्चस्ववाले समाज में सामान्यतः पुरुष मानस की ऐसी ही अभिव्यक्ति स्वाभाविक मानी जाएगी। इन उदाहरणों में यदि कुछ विस्मयजनक और त्रासद है तो वह उसके बीच से प्रतिबिंबित होने वाला नारी मन है, उस नारी का मन, जिसकी अस्मिता का संघर्ष आज हमारे विमर्ष के केन्द्र में है। आहत और अपमानित सीता का, हजारों लोगों के समक्ष, अपनी निषकलंकता साबित करने के लिए बार-बार, कभी अग्नि-परीक्षा और कभी शपथ उठाने के लिए, सिर नीचा किए, हाथ जोड़े प्रस्तुत होना; यही नहीं अगले तमाम जन्मों में पति के रूप में राम को ही पाने की आकांक्षा करना, हमें परेशान करता है। इसी तरह गहरे अपमान तथा अर्जुन के प्रति अपनी एकचित्तता को बांट दिए जाने के बावजूद स्वाभिमानी द्रौपदी का आजीवन अपने पतियों की छाया बनकर चलना तथा स्वेच्छा से वरण किया गया गांधारी का अंधत्व भी हमें विचलित करता है। ये बातें नारी-मन की जिस संस्कार बद्धता तथा पुरुष-वर्चस्ववाले समाज में पुरुषों द्वारा रचित धर्म-शास्त्रों में दिए गए निर्देशों के प्रति नारी-मन के जिस अनुकूलन को उजागर करती है, वह भी अपने में कम रोमांचक नहीं है। सीता, द्रौपदी, गांधारी सभी प्रसिद्ध नारियां हैं---साहसी, प्रबुद्ध साधन तथा शक्ति-संपन्न नारियां। संस्कार जब इनके मानस पर इस कदर हावी हैं तो साधारण नारियों की बात ही क्या? अब तक के समाजेतिहासा पर निगाह डालें और अब तक के भारतीय साहित्य पर गौर करें तो उनके भीतर के महानगरों, नगरों, कस्बों और गंवई-गांव की साधारण नारियों का ऐसा भरा-पूरा-संसार सामने आएगा जिसमें स्त्री अपमानित, तिरस्कृत और दंडित होते हुए भी न केवल धर्म और धर्मशास्त्रों के अनुकूल आचरण करती दिखाई देगी, पति के कंधों पर चढ़कर परमगति पाने की आकांक्षा में अपने स्त्री जीवन को नाना व्रत-उपवासों से सार्थक करती हुई मिलेगी।
नारी का यह वह संसार है जिसमें साधारण ही नहीं, संभ्रान्त नारियों की भी बराबर की उपस्थिति है। हर वर्ग और हर स्तर की नारी यहां मौजूद है। साधारण मानी जानेवाली ऐसी नारियों की इस संसार में बहुलता है जिनका त्याग, जिनकी सहनशीलता और जिनकी पति-परायणता किसी भी कदर सीताओं, द्रौपदियों और गांधारियों से कम नहीं है। शायद उनसे ज्यादा और बहुत ज्यादा है। ये वे नारियां हैं जिनके मन ही नहीं, जिनके शरीर तक उनकी पति-परायणता के गवाह हैं। इन शरीरों पर उनके धर्मपतियों द्वारा उकेरे गए गहरे निशानों को आसानी से देखा जा सकता है। नारी अस्मिता के संघर्ष में पुरुष-मानस के साथ इस नारी मानस को भी समझने और गुनने की जरूरत है।
एक संक्षिप्त टिप्पणी अपने समाज और साहित्य के मध्यकाल पर करें जिसमें गणिकाओं, वेश्याओं , देवदासियों तथा घर-परिवार की चौहद्दी में गृहस्थ धर्म का पालन करने वाली नारियों और उनके मन के बरक पुरुष मानस के अध्ययन विश्लेषण की पर्याप्त सामग्री हैं। अपने को साहित्य तक ही सीमित रखें तो हिंदी के आदिकालीन साहित्य में एक ओर सिद्ध और दूसरी ओर उन्हें उनके आराध्य तक पहुंचाने में निमित्त बनतीं, पंच मकारों में एक की पात्र उनकी योगनियां हैं। एक ओर चारण और दूसरी ओर सामंतों की हवस का शिकार बनतीं, तमाम-तमाम युद्धों को जन्म देतीं, युद्धों में हारी और जीती जाती हुई संयोगिता हैं; नाथों और निर्गुनियों के यहां वे त्याज्य हैं, साधना पथ की बाधा हैं, माया की ठगनी हैं, तो सगुण सूर के यहां वे अल्हण और उन्मादी प्रेमिकाओं के रूप में सामने आई हैं---लीलानायक के रास की सहचरी बनकर, एकनिष्ठ प्रेम में जलती-सुलगती हुई, तुलसी के यहां उनके द्वारा रचे धर्म और धर्मशास्त्र-विहित मोहक संसार में, उस संसार के निर्देशों का पालन करती हुई यदि वे गृहस्वामिनियां हैं, आदर और सम्मान की पात्र हैं तो उस संसार के दायरे से रंचमात्र भी हटने पर भर्त्सनाऔर निंदा की पात्र , उनसे आगे के समय में वे नायिका भेद की चौहद्दियों में नायक की कामकेलि में बराबर की शिरकत करती हुई रूप की पुतलियां हैं।
समूचे मध्यकाल में मीरा के रूप में नारी और नारी मानस का एक बेधक और व्यंजक बिंब जरूर उभरा है, किंतु अपनी तमाम सीमाओं के साथ। मीरा के पद पुरुष-प्रधान समाज में पुरुष-मानस की क्रूरता के साथ नारी-मानस के उद्वेलन को सामने लाते हैं। नारी यहां आक्रान्त होते हुए भी मीरा के रूप में कुछ सुलगते-दहकते सवालों के साथ सामने आई है। घर-परिवार और महल की चारदीवारी से विद्रोह कर वह चौराहे पर भी खड़ी होने का साहस जुटा सकी है। किंतु उसके इस विद्रोह की सीमाएं भी हैं। अंततः वह समर्पित होकर ही त्राण पाती है। भले ही कृष्ण के प्रति, कृष्ण में अपने को घुलाकर ही वह अपने को सार्थक कर पाती है। इसे मीरा के बाल-वैधव्य की क्षतिपूर्ति कहा जाए अथवा पुरुष-वर्चस्ववाले समाज में कहीं तो भी सुरक्षित रह पाने का प्रयास, भले ही कृष्ण के प्रति सही, मीरा को अपने को निछावर ही करनापड़ता है---म्हाणे चाकर राखो जी। (साभार-कहानीकार)'
पिछले दिनों एक खबर पर आंखें पड़ी तो जमी ही रह गईं। अखबार पर छपे शब्द आग की लपट से झुलसा रहे थे। बचने के प्रयास में और भी जलती ही चली गई। किसी भी प्रतिक्रिया का कारण होता है और फिर कोई भी प्रतिक्रिया समान और प्रतिलोम दोनों ही तरह से तो हो सकती है। महर्षि दयानंद सरस्वती ने कहीं लिखा था - हर मानव को कुछ करने से पहले सोचना चाहिए कि उसके इस कर्म का उसके आसपास और समाज पर क्या असर होगा। यदि कर्म का सिर्फ उससे संबंध है तो उसे निर्णय की पूर्ण स्वतंत्रता है, वरना नहीं - पर क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है - रहती है क्या मानव के पास जरा भी स्वतंत्रता? मन अगर एक यंत्र हैं तो हमारे लिए यह जानना संभव ही नहीं, जरूरी भी है कि आखिर यह यंत्र चलता कैसे है और क्या-क्या कर सकता है - आसान शब्दों में इससे क्या क्या काम लिया जा सकता है, अच्छे से अच्छा, भरपूर सामर्थ्य और उपयोगिता के अनुरूप? परन्तु समस्या तब आती है जब आज के इस यंत्रीकरण के युग में भी मन यंत्र बनने से इंकार कर देता है और सारे उर्जे पुर्जे खोलने के बाद भी बस एक आंतरिक बेचैनी और तनाव ही हाथ लग पाता है।
आप सोच रहे होंगे कि क्या थी वह खबर जिससे इतनी उथल-पुथल मचाई -- एक गंभीर चिंतन की कालकोठरी में ला खड़ा किया मुझे।
एशियन मूल की एक मां ने अपनी वयस्क बेटी को सुयोग्य परन्तु द्विजातीय प्रेमी से शादी करने के लिए न सिर्फ प्रोत्साहित किया वरन् मदद भी की और परिवार की नजर में किए गए इस अपराध के लिए शादी के तुरंत बाद ही उसे जला कर मार दिया गया - सोते हुए बेटी और उसके समस्त परिवार के साथ। इन निर्मम हत्याओं के लिए अब खुद उसके अपने पति और बेटे को स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यहां ध्यान रखना होगा कि वह औरत तलाकशुदा थी और इस घटना के पहले उसके पति या बेटे ने कभी यह जानने की भी कोशिश नहीं की थी कि वे मां बेटी जिन्दा हैं या मर गईं। फिर अचानक जिम्मेदारी और अपनापन का इतना जघन्य और तीव्र अहसास क्यों - घटना भारत की नहीं इंग्लैंड की ही है और अठ्ठारहवीं सदी की भी नहीं, आजकी इसी इक्कीसवीं सदी की है। मौत को प्रेयसी या सम्मान की तरह गले लगा लेना आज भी इस निराशा वादी समाज का (विशेषत: भारतीय नारी के संदर्भ में) एक विलक्षण गुण है। परन्तु जब भी समाज या इसके ठेकेदारों ने अपनी सफेद चादर में लपेटकर एक स्पंदित हृदय जलाया है या फिर एक ज्वलंत चेतना को विस्मृति की धार में अस्तित्वहीन कर के बहाया है तब तब हजारों प्रश्नों के प्रेतों ने समाज को जकड़ा है - मूल्यों और विचारों के चेहरों पर कई असह्य और भद्दे प्रश्नचिन्ह खरोंचते हुए। कहां खतम होती है यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कहां शुरू होनी चाहिए समाज की जिम्मेदारी? औरतों के संदर्भ में तो सवाल और भी मुखरित हो उठता है क्योंकि आज भी सारी लगाम पुरूषों के हाथ में ही है और सब जानते समझते हुए भी कोई इन सवालों के जवाब जानना ही नहीं चाहता, खुद औरतें भी नहीं।
फूल सी कोमल बेटियों, बहनों, प्रेयसियों और पत्नियों को आज भी लोग यशोधरा की तरह त्याग देते हैं, अनुसूया की तरह छलते हैं और द्रौपदी की तरह दांव पर लगाकर हार जाते हैं। क्योंकि आज भी (समस्त सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के बाद भी) वह उनकी संपत्ति ही हैं। और आज भी उनमें इतनी बुद्धि नहीं है या चरित्र में दृढ़ता नहीं है, इसलिए सीता की तरह अग्नि परीक्षा लेते हैं और मीरा की तरह विषपान कराते हैं। कितनी भी समर्थ और विलक्षण हो आज की नारी परन्तु पुरूषप्रधान इस समाज में तो उसे संपत्ति की तरह आरक्षण और सुरक्षा में ही रहना चाहिए - सौ सौ तालों के पीछे।
क्यों होता आया है ऐसा - क्यों इतनी अबला है आज भी आजकी यह सबला नारी - क्या हमेशा से नारी के बारे में समाज और पुरूषों की सोच ऐसी ही रहेगी - शक और अविश्वास से ओत-प्रोत, प्रश्न पर प्रश्न उठाती? हम सभी जानते हैं कि जीवन के अहं मूल्यों का जन्म जीवन के सुख-दुख, संयोग-वियोग, सफलता-असफलता जैसे विरोधी तत्वों के टकराव से ही होता है परन्तु जीवन में तो सम की अपेक्षा ही की जाती है और इसके लिए आवश्यक है कि जरूरतों और समाधानों को समझा जाए। क्या हमारे ऋषि मुनि हजारों साल पहले ही इसे समझ और जान चुके थे? आइए देखें क्या कहते हैं हमारे भारतीय ग्रन्थ और विद्वान इस विषय पर।
उनकी नजर में स्त्रियां दासी या तुच्छ नहीं पुरूषों की पूरक और पूज्य थीं और एक निश्चित कर्तव्य के लिए ही वह इस धरती पर आई थीं जैसे कि पुरूषों का भी एक निश्चित उत्तरदायित्व था। 'प्रजनार्थ स्त्रैय: सृष्टा: सन्तान कार्य: मानवत्।' स्त्रियों की रचना गर्भाधान के लिए और पुरूषों की गर्भाधान कराने के लिए की गई है। जरूरतें साधारण थीं तो समाज के नियम भी साधारण ही थे उस वक्त। परन्तु प्रत्येक कार्य में पति पत्नि साथ थे। वेदों में साधारण धर्म कार्य का अनुष्ठान भी पत्नी के साथ ही करने का विधान है। आगे चलकर वेद यह भी कहते हैं जहां भार्या से भर्ता और पत्नी से पति एक दूसरे से बहुभांति खुश रहते हैं उसी कुल में सब सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते हैं।
अब इस समस्त कलाओं से युक्त कामिनी को वश में रखने का ऋग्वेद में बस एक ही उपाय बताया गया है 'हृदय की शुद्धि'। जो मन में हो वही व्यवहार में हो और जो व्यवहार हो वह मन से हो। अन्यथा स्त्रियों का मन नाना रूप वाला है और विविध बातों को सोचने के लिए विवश हो जाता है। छत्तीसवें श्लोक में कहा गया है कि नारी के हित के लिए आवश्यक है कि वह ओजस्विनी हो और उसमें अपने चरित्र की रक्षा करने की सामर्थ्य हो। वह समाज में अपने अधिकार स्थापित कर सके। ५१ - नारी को अजेय और शत्रु विजयिनी बताया गया है। उसके लिए सहस्त्र वीर्या शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात वह एक नहीं सहस्त्र सामर्थ्य वाली है। ४१ - ऐसी नारी संकोच छोड़कर आगे बढ़ती है और अज्ञान रूपी अंधकार दूर करती है। ५० - नारी के शील की रक्षा को राष्ट्र का उत्तरदायित्व बताया गया है। जहां नारी के चरित्र की पूर्ण रक्षा होती है वही राष्ट्र सुरक्षित कहा जाता है। यानी कि चरित्र के परिष्करण और दृढ़ता से ही सुरक्षित समाज की रचना हो सकती है यह नियम तब भी लागू था और आज भी।
एक मंत्र में कलाओं की शिक्षा का भी संकेत है। वह नृत्यकला आदि सीखती है। उषा देवी को एक कुशल नर्तकी की तरह नृत्य करते प्रस्तुत किया गया है। २२ - नारी के श्रंगार का भी जिक्र है। वह सुन्दर वस्त्र और स्वर्णाभूषण धारण करती है। ३१ - पलंग पर सोती है और इत्र आदि सुगन्ध लगाती है। अर्थात वैदिक नारी तिरस्कृत और उपेक्षत कदापि नहीं थी। ऋग्वेद में गृहलक्ष्मी के रूप में चित्रित करते हुए नारी को 'कल्याणी जया' अर्थात मंगल कारिणी और 'कुलपा' कहा गया है यानि की कुल का पालनपोषण करने वाली। अन्यत्र गृहणी ही गृह है ऐसा भी कहा गया है। उसके गुणों में लज्जाशील, मधुर भाषिणी और प्रसन्न चित्ता होने को प्रमुखता दी गई है। उसे प्रेम या स्वयंवर विवाह का अधिकार है। विवाह प्रेम या योग्यता के आधार पर होना चाहिए और यही विवाह उचित व श्रेष्ठ है। बाल विवाह का विरोध है। मनु स्मृति में कन्या के रजस्वला होने के तीन शरद बाद ही विवाह का विधान है इस तरह से बाल विवाह वर्जित हुआ। आत्म रूपी पुत्र पुत्री समान हैं।' यथैव आत्मा तथा पुत्र:, पुत्रेण दुहिता सम:। पुत्र न होने पर पुत्री समस्त संपति की अधिकारी है और अविवहिता कन्या पुत्र के समान ही दया की भागी है। ८३ - स्त्री अपहरण राष्ट्र कलंक है। स्त्री हरण इतना बड़ा महापाप है कि पापी को इस लोक में क्या परलोक में भी कष्ट सहना पड़ता है। लगता है स्त्रीयों के हितों के प्रति हमारे ऋषि मुनि आज के समाज से ज्यादा सजग और सचेत थे। आज का समाज कहने को तो बराबर का दर्जा देता है परन्तु सबकुछ नियंत्रण में रखकर, अपने पूर्ण हस्तक्षेप के बाद और उनकी हर कोमल भावनाओं की पूर्ण अवहेलना करके।
८७ - स्त्रियों की कमियों की तरफ भी उल्लेख किया गया है। ३६० - न समाधि स्त्रीषु लोकाज्ञता चा। अर्थात औरतों में समझदारी और सांसारिक अनुभव नहीं होता। ३५७ - दुष्कलत्रं मनस्विनां शरीरकर्शनम् - दुष्ट स्त्री मनस्वी पुरूष को कृष बना डालती है। ३५१ - स्त्रीषु किंचिदपि न विश्वसेत् - औरतों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। ३४८ - स्त्रीणां अतिसंगां दोषामुत्पादयति - स्त्रियों का अति सहवास दोष उत्पन्न करता है। दुराचारी स्त्री को स्वान की भी उपाधि दी गई। और व्यभिचारी पुरूष को सियार और भेड़िया। पुरूषों की आचारसंहिता पर विचार करते हुए यह भी लिखा गया है कि स्वदासी परिग्रहो हि स्वदास भाव, अपनी दासी के साथ संभोग करना अपने को दास बनाना है। परदारान् न गच्छते - पराई स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए। और स्त्रीणां न भर्तु:पर दैवतम् - पति से बड़ा कोई देवता स्त्रियों के लिए नहीं है। वाल्मीकि की रामायण में आदर्श पत्नी सीता वैसा ही करेगी जैसा कि राम चाहेंगे। और एक पूर्ण नारी के रूप में कौशल्या के लिए विलाप करते हुए दशरथ ने कैकयी से कहा था कि कौशल्या जो सेवा करने में दासी के समान, रहस्य में सखी के समान, धर्म कृत्यों में स्त्री के समान, हितैषियों में बहन के समान, आग्रह पूर्वक भोजन कराने में मां के समान, सदा कामना करने वाली (भला चाहने वाली) और सभी पुत्रों से स्नेह करने वाली - समय समय पर जो उपस्थित होती रही पर सत्कार के योग्य होते हुए भी मैंने तेरे कारण उसका समुचित सत्कार नहीं किया - यह सोचकर कि कहीं तू यह न समझ बैठे कि मैं तुझे प्यार नहीं करता या तुझसे कौशल्या की अपेक्षा कम करता हूं। इस वार्तालाप से हम जान सकते हैं कि स्त्रीयोजित कोमल गुण तब भी वैसे ही लागू थे जैसे कि आज होते हैं। संरक्षण और शौर्य यदि पुरूषोचित गुण हैं तो सृजन और भरण पोषण स्त्रीयोचित। और जीवन में दोनों का ही महत्व बराबर का है।
तुलसीदास रामायण में कहते हैं,
१ - जिय बिनु देह नदी बिनु बारी तैसि अनाथ पुरूष बिन नारी।
२ - धीरज धर्म मित्र अरू नारी आपद काल परिखिअहीं चारी।
३ - एकई धर्म एक व्रत नेमा कायं बचन मन पतिपद प्रेमा।
४ - और अंत में - मातृ पित्राचार्यतिथिय: भार्याया: भर्ता मनुश्च भार्येति मूर्तिमन्तो देवा:
अर्थात माता पिता, आचार्य, अतिथि स्त्री के लिए, पति और पुरूष के लिए पत्नी और नारी ये पांच मूर्तिमान देव हैं। इनकी पूजा ही सच्ची पंचायतन और वेदानुकूल देव पूजा और मूर्ति पूजा है।
नारी पुरूषों के पारस्परिक संबंध, आचार संहिता आदि का जितना व्यावहारिक और सैधान्तिक वर्णन हमारे वेदों और ग्रन्थों में हैं शायद आज भी कहीं और नहीं। आज समाज बदल चुका है। आज की जरूरतों के मुताबिक सुधार करके आज भी इन मूल्यों पर चला जा सकता है। अपनी कुंठाओं और व्यसनों से ग्रसित मानव को अपने मुखौटे उतारने ही होंगे। नारी की जरूरत और उपादेयता दोनों को भी समझना होगा। आज जब सिद्धान्त कपड़ों की तरह बदले जाते हैं और स्वार्थ का इत्र सर्व व्यापी है शायद यह सब इतना आसान न भी हो। समाज से क्या, परिवार से भी जुड़ पाना आज एक कठिन काम है। परन्तु परिवार ही तो वह मुख्य इकाई है जिसकी आचारसंहिता समाज और बाद में पूरा देश व्यवस्थित रखती है। सभ्यता का प्रतीक बनकर उबरती है। जब तक परिवार का हर सदस्य जीवन के तृण मूलों को और पारस्पारिक जरूरतों को नहीं समझेगा - असुरक्षित महसूस करेगा, और ऐसी अवस्था में व्यक्ति और समाज, दोनों ही के हित में गलत और असभ्य निर्णय होते ही रहेंगे... इनमें से कुछ को तो हम-आप और हमारा समाज अपराध भी कहेगा।...
कहां आकर ठहर गई है उसकी ज़िन्दगी? कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसके अपने अब्बा उसके लिये मौत का सामान कर देंगे। लेकिन उस दिन उन्हीं के ब्रीफ़केस में उसके लिये ख़रीदा गया ज़हर देख लिया समीना अख़तर ने! यदि यह ज़हर न देखा होता, तो उसे आज की यह रात देखने को न मिलती! . . . रात जो समीना को उसकी उम्र से भी लम्बी हो गयी लगती है। सुबह होने तक न जाने वह कहां होगी? शायद ठंड से अकड़ी उसकी लाश यहीं मिले . . .लंडन के पिकेडिली सर्कस की इस दुकान की पोर्च तले! अब्बा और अम्मी के बीच हो रही खुसर-पुसर सुन ली थी समीना ने ! सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में उसकी फूफी – अब्बा की सैयदा आपा – अपने पचास वर्षीय तलाक़शुदा देवर अर्शद के साथ उसके निकाह के लिये हाथ धोकर पीछे पड़ी हुई थी। अभी तो समीना ने स्कूल में ‘ओ’ लेवल की – दसवीं की - परीक्षा दी ही थी और परिणाम की प्रतीक्षा चल रही थी। वह तो कॉलेज और यूनिवर्सिटी के सपने देख रही थी।
इधर अर्शद तो कुल छ: जमाअतें पास है . . . बस उर्दू पढ़, लिख लेता है। लाहौर के पास ख़ैरिया गांव में कोई तीस एकड़ ज़मीन है उसकी ! दो बच्चों का बाप है। उसका बड़ा लड़का नजम तो समीना से दो ही साल छोटा है और नजम की छोटी बहन यासमीन अभी बारह की हुई है। तो क्या यह दोनों उसे ‘अम्मी’ कहकर पुकारा करेंगे? क्या उसे इंग्लैंड के खुले वातवरण को छोड़कर ख़ैरिया नाम के उस पाकिस्तानी गांव की घुटन में उस बूढ़े किसान के साथ बाक़ी ज़िन्दगी गुज़ारनी होगी?? फिर उसकी आंखों के सामने तैर गयी अपने भविष्य की तस्वीर। अजनबियों के बीच वे लगेंगे बाप-बेटी . . . लेकिन वह होगी तो अर्शद की बीवी ही। . . . और फिर उम्र में इतना फ़र्क़? वह तो ‘अब्बा बुज़ुर्गवार’ की तरह हुक्म चलायेगा और यह चुपचाप सुनती, तड़पती, फड़फड़ाती रहेगी! नहीं, उसे हर्गिज़ मंज़ूर नहीं यह ज़िन्दगी!!!
लेकिन वह करे भी तो क्या? अब्बा के ब्रीफ़केस में उसने अपनी मौत देख ली थी। नहीं, वह ज़हर नहीं था। था तो वह काग़ज़ का ही टुकड़ा, लेकिन था वह घातक से घातक ज़हर सा ख़तरनाक! पाकिस्तान के लिये तीन हवाई टिकट थे। अब्बा, अम्मी के तो वापसी टिकट थे, मगर उसके अपने टिकट में वापसी दर्ज नहीं थी। आख़िर फूफी की साज़िश चल ही गयी। उन्होंने अब्बा, अम्मी से अपनी बात मनवा ही ली।
उसने अम्मी से शिकायत की, “इस रिश्ते से तो अच्छा होगा कि आप मुझे ज़हर पिलादो। मैं हंसते हंसते पी लूंगी।”
दीवारों के कान होते होंगे, लेकिन समीना की अम्मी के तो जैसे कान ही नहीं थे। उन्होंने तो बेटी की बात अनसुनी करदी। वह चीख़ी, चिल्लाई। उसने अपनी बात दोहराई तो वे बोलीं, “तू तो पागल हो गयी है। हमारे यहां शादियां योंही नहीं हो जाती हैं। दामाद ख़रीदने पड़ते हैं। लाखों का दहेज देना पड़ता है। दहेज देना तो क्या, शादी के बाद तू उस घर में इतनी अमीर हो जायेगी कि एक दिन हमें भी ख़रीद सकेगी। कल को जब हम बूढ़े हो जायेंगे तो तेरे सिवा हमारा ध्यान रखने वाला कौन होगा?”
“यह कैसी तिजारत है? कैसी सोच है?? दहेज से भी बच जाओ. . . दामाद ख़रीदो नहीं . . . किश्तों पर ही सही, मगर बेटी बेच दो! वसूली का क्या, बाद में होती रहेगी!! अम्मी, मैंने कहा न मुझे ज़हर पिलादो।”
वह सिसकियां भरती, पैर पटकती अपने कमरे में चली गयी।
समीना ने ज़हर नहीं पिया। वह दौड़ी दौड़ी गयी अपनी सबसे प्यारी सहेली बल्ली को अपना दुखड़ा सुनाने। बलजीत कौर समीना से दो साल बड़ी है। हंस दी बलजीत-
“यार, तेरा फ़्यूचर तो बड़ा ब्राईट है। तीस साल की उम्र तक तो छ: बच्चों की अमीर बेवा ज़मींदारनी होगी . . . सब पर हकूमत करेगी।”
“मेरी जान पर बनी है और तुझे मज़ाक़ सूझ रहा है।”
तब बलजीत ने उसे समझाया कि एक ही आग में जल रही हैं वे दोनों। उसे भी तो दार जी ने अल्टीमेटम दे रखा था, “जे मैं तैन्नूं फ़ेर ओस मुंडे नाल वेख लित्ता, ते दोनां नूं वड्ड दवांगा।”
बलजीत को भी यों क़त्ल होना मंज़ूर नहीं था। वह ‘मुंडा’ था, जगी –
जगदेव सिंह। दिखाई देना तो क्या, वह तो उसके साथ जीने, मरने को तैयार थी !
फ़ैसला हुआ कि दोनों घर से भाग चलें। समीना अकेली होती तो शायद यह हिम्मत न कर पाती। बलजीत ने उसका हौसला बढ़ा दिया। घर छोड़ने से पहले उसने बलजीत से पूछा भी, “बल्ली, तू तो जा रहेगी अपने यार के साथ। मेरा क्या होगा? मैं क्या करूंगी? कहां रहूंगी?”
उसने विश्वास दिलाया, “सिम्मी डार्लिंग, घबराती क्यों हो? जहां हम दोनों रहेंगे, तू भी साथ रह लेना।”
भोली सिम्मी सहेली के चक्कर में आ गयी . . . चक्कर में आ गयी, और फिर पछताई! अगले ही सप्ताह बलजीत और जग्गी का तो हो गया गुरुद्वारे में ‘आनन्द कारज’ और उन्होंने स्पेन में हनीमून की तैयारी भी कर ली। अब सिम्मी का क्या हो? जग्गी ने तो साफ़ कह दिया-
“हम हनीमून पर होंगे, इसे कहां साथ में ढोते फिरेंगे?”
तब उसकी सबसे प्यारी सहेली ने धीमे से कह दिया, “सॉरी” और ‘ सिम्मी डार्लिंग ’ अकेली टापती रह गयी!
अब वह क्या करे, कहां जाये? देर तक बर्मिंघम में रही तो किसी न किसी की नज़र में आ जायेगी। घर से भाग कर उसने पूरे परिवार की नाक कटवा दी थी और परिवार की नाक के बदले में उसकी अपनी गर्दन पर छुरी चल सकती थी। उसने सोच लिया अब वह वहां नहीं रहेगी। वह लंडन की भीड़ में खो जायेगी। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि लड़की कहां गुम हो गयी। उसने अपना बड़ा सा एयरबैग उठाया और लंडन की गाड़ी चढ़ गयी और पहुंच गयी पिकेडिली सर्कस। बचपन में वह कभी यहां आई थी। अभी भी बच्ची ही तो थी वह! यहां की चमक दमक उसे दोबारा यहीं खींच लाई। अब आगे अल्लाह की मर्ज़ी!
हर शहर में कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहां माना जाता है कि उनका दिल धड़कता है, जैसे लंडन में ट्राफ़ाल्गर स्कुएयर या पिकेडिली सर्कस! पिकेडिली सर्कस तो बस दिल ही दिल है। यहां पर स्थापित है सौ साल से भी पुरानी युनानी कामदेव – इरॉस - की मूर्ति जिसकी छाया तले आज के प्रेमी, प्रेमिकायें मिलते हैं। यहां पर चौबीसों घंटे जलती बुझती, धड़कती नियॉन की बत्तियों की तरह दिलों से दिल मिल कर धड़कते हैं। शाम होते होते इन दिलों की भीड़ लग जाती है और धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। दुकानों की रौनक़ भी बढ़ जाती है और वहां होते हैं करोड़ों के सौदे।
दुकानें यहां और भी हैं . . . चलती फिरती, बेबस, मजबूर दुकानें ! सिम्मी बिकाऊ नहीं थी मगर बाज़ार में तो थी! ग्राहकों के इशारे हुए और बहुत हुए!! पिकेडिली की उस बन्द दुकान की उस पोर्च तले सिमटी, सिकुड़ी, ख़ामोश वह सब देखती, सुनती, सहती रही।
जिस अल्लाह की मर्ज़ी के हाथों में उसने अपनी ज़िन्दगी की डोर सौंपी थी, वह ख़ामोश नहीं है। उसने सोच लिया था कि जनवरी का महीना आ गया है। अब इंग्लैंड वासियों को साईबेरिया की तेज़, तुंद हवाओं का मज़ा चखाया जाये। जब उन हवाओं ने इधर का रुख़ किया, तो वे दुनिया भर के बादल भी साथ समेट लाईं। सिम्मी जब घर से निकली थी तो उसके पास लगभग डेढ़ सौ पाउंड थे।
पचास का तोहफ़ा तो उसने अपनी बेवफ़ा सहेली के विवाह पर दे डाला। सहेली की शादी के लिये कुछ अपने नये कपड़े ख़रीद लिये। अब उसे ध्यान आया कि लंडन आने के लिये ट्रेन का बहुत ज़्यादा भाड़ा दे बैठी थी। कोच में आती तो बहुत सस्ता पड़ता। पैसे बचे थे बहुत कम, मगर उसने सुन लिया था कि शाम को कड़ाके की सर्दी पड़ने वाली है । उसने ‘सेल’ में आधी क़ीमत पर एक कम्बल मोल ले लिया – मूल्य, केवल अठारह पाउंड । उसके पास तो अब एक पूरा पाउंड भी नहीं रहा था।
दूर बिग बेन के घड़ियाल ने अभी बारह का घंटा बजाया है। अभी तो बस आधी रात हुई है। थोड़ी देर पहले एक कॉन्स्टेबल वहां से गुज़रा था और समीना को वहां से हटने के लिये कह गया। अब यहां से हटकर वह कहां जाये? नाम की सही, पर सिर पर छत तो है! लेकिन यह छत भी किस काम की? तेज़, तिरछी हवा में, पानी में सने बर्फ़ के छींटे तीरों की तरह चुभ रहे हैं और अठारह पाउंड का यह कम्बल झीना, काग़ज़ी लगता है। अब यदि वह कॉन्स्टेबल फिर से आ जाये, तो वह उस से फ़रियाद करेगी, ‘मुझे रात भर के लिये बंद कर दो।’ कम से कम सिर पर ढंग की छत तो होगी। बारिश तो नहीं पड़ेगी और शायद पेट भरने को भी कुछ मिल जाये।
. . . लेकिन वह कॉन्स्टेबल फिर नहीं आया। वहां पहुंच गया योगेश चोपड़ा। वह यहां के एक अख़बार में छोटा मोटा पत्रकार है। आज ही बॉलीवुड की एक नयी फ़िल्म रिलीज़ हुई है और पास के एक होटल में उसके अभिनेता, अभिनेत्रियों का स्वागत समारोह चल रहा था। कॉकटेल पार्टी के बाद डिनर भी हुआ। डिनर के बाद योगेश घर लौट रहा था। इतने ख़राब मौसम में उसकी कार धीरे धीरे खिसक रही थी। तभी उसकी नज़र समीना पर पड़ गयी। उसके भीगे कपोलों में अब आंखों के आंसू भी शामिल हो रहे थे। योगेश ने गाड़ी रोकी और उसपर सवालों की बौछार कर दी, “कौन हो तुम? कौन हैं तुम्हारे मां बाप? घर से भाग कर आयी हो? कहां से आई हो?”
उसने अपना नाम बता दिया, सिम्मी।
“हां, मैं घर से भाग कर आई हूं। मर जाऊंगी, अपना पता-वता कुछ नहीं बताऊंगी। वो पचास साल के बूढ़े से मेरी शादी कर रहे हैं। वहां भी मरना था, अब यहां भी मर रही हूं . . . ओके?”
इन गिने चुने शब्दों में रोते रोते वह अपनी बात कह गयी और योगेश का दिल दहला गयी।
“जो मौसम का हाल है, यहां तो तुम सचमुच मर जाओगी। कुछ खाया पिया भी है कि अभी तक भूखी हो?”
वह चुप रही। उसकी नज़रें साफ़ कह रही थीं, पेट भी ख़ाली, जेब भी ख़ाली! योगेश ने अपने बटुए में झांका। उसके पास बीस पाउंड से छोटा कोई नोट ही नहीं था। उसने एक नोट उसके हाथों में थमा दिया।
“देखो, तुम जैसी बेसहारा लड़कियों और औरतों कि सहायता के लिये ‘शेल्टर’ नाम की एक संस्था ने जगह जगह होस्टल स्थापित कर रखे हैं। वहां की निवासी लड़कियों की सुरक्षा के लिये, इन स्थानों के पते पुरुषों को बिलकुल नहीं दिये जाते। मैं एक जर्नलिस्ट हूं और आम लोग जो नहीं जानते, हम जर्नलिस्ट लोग जानते हैं। ऐसे ही एक होस्टल का पता तुम्हें देता हूं। जैसे भी हो सके अपना पेट भरो और फिर वहां चली जाओ। सहारा मिल जायेगा। ”
योगेश ने अपना विज़िटिंग कार्ड निकाला और उस पर वह पता लिख दिया। अब वह चलने को हुआ। तभी पीछे से आवाज़ आई, “सर, मैं इस शहर में बिलकुल नयी हूं। इस वक्त रात में और इस मौसम में कहां भटकती फिरूंगी? आप ही अपने घर ले चलिये।”
“ ना बाबा ना! मैं तुम्हें अपने साथ कैसे लेजा सकता हूं। मैं शादीशुदा हूं। घर में बीवी है, मेरे दो बच्चे हैं। वे सब क्या समझेंगे?”
वह गिड़गिड़ाई, “ मैं भी ऐसी वैसी लड़की नहीं हूं। आपके परिवार में जाऊंगी तो ठीक रहूंगी। आप नहीं ले जायेंगे तो सुबह तक तो शायद मैं बचूंगी भी नहीं। बच भी गयी तो सुबह तक न जाने मेरा क्या हश्र हो . . . मौसम ख़राब, सुनसान रात और मैं एक अकेली लड़की!”
योगेश पल भर को रुका, सोच में पड़ गया।
“प्लीज़, सर! आपकी कोई बहन तो होगी। आप ही ले चलिये ना अपने घर। भाभी जी ठीक समझ जायेंगी। मुझे छोड़ कर मत जाईये. . . प्लीज़, प्लीज़!”
कुछ ही मिनट पहले मिली, सड़क पर पड़ी इस अपरिचित और अज्ञात लड़की ने उसके साथ यह कौनसा रिश्ता जोड़ लिया था? वह इन्कार न कर सका और उसे अपनी कार में बिठा लिया। जो बीस पाऊंड उसे दिये थे, दे दिये। अब उन्हें वापस मांगना तो बेढब और बेतुका होता!
योगेश की गाड़ी के घर पहुंचते पहुंचते रात के दो बज चुके थे। उसने अपनी चाबी से घर का दरवाज़ा खोला। उसकी पत्नी प्रीति अभी तक उसका इंतिज़ार कर रही थी। पति के साथ एक अजनबी लड़की को देख कर वह चौंक गयी। योगेश ने परिचय
कराया –
“यह सिम्मी है। बेचारी बेघर है। रात भर हमारे यहां रहेगी। सुबह उठकर ‘शेल्टर’
के एक होस्टल में चली जायेगी।”
प्रीति ने एक नज़र सिम्मी को देखा, गर्दन झटक कर मुंह मोड़ा और बेडरूम में जा घुसी। यह योगेश ही था जिसने उसके लिये सैंडविच बनाये, चाय बनाई। फिर बैठक में ही क़ालीन पर उसका बिस्तर लगा कर ‘गुडनाईट’ कहकर वह भी बेडरूम में चला गया।
प्रीति अभी तक जाग रही थी। न तो वह स्वयं सोई, न उसने योगेश को सोने दिया। बहुत देर तक झगड़ते रहे वे दोनों। प्रीति ने इल्ज़ामों और सवालों की बारिश करदी।
‘तुम नहीं सुधरोगे। तुम्हारी नज़रें तो एक जगह टिक ही नहीं सकतीं, भटकती रहती हैं। जहां भी कोई लड़की देखी, मचल गये। पार्टियों में तुम मुझे छोड़कर दूसरी लड़कियों के साथ डांस करते हो। कुछ तो शर्म करो। दो दो बच्चों के बाप हो। एक तो यह मुआ जर्नलिज़्म! इसकी ओट में न जाने कहां कहां भटकते हो तुम! कई कई रातें घर से बाहर बिताते हो। ऊपर से इस मुई सरकार ने चौबीसों घंटे के लिये खुले छोड़ दिये हैं बदमाशियों के अड्डे, यह पब !’
जैसे तीखे प्रीति के इलज़ाम थे, वैसे ही थे उसके सवाल!
‘डिनर तो रात बारह बजे तक ख़त्म हो गया होगा। दो बजे तक कहां थे तुम? यह लड़की तुम्हें कब मिली, कहां मिली? न जान, न पहचान . . . यहां घर में क्यों उठा लाये इसे? सैंकड़ों, हज़ारों आवारा लड़के, लड़कियां घूमते हैं शहर में! क्या सभी को यहां ले आओगे? ’
इस झगड़े के दौरान योगेश के मुंह से कहीं निकल गया कि उसने सिम्मी को बीस
पाउंड भी दिये थे। इस बात ने तो जलती पर तेल छिड़क दिया-
“यह तो बड़ा अच्छा हुआ। सस्ते में सौदा हो गया! लड़की सुन्दर भी है, जवान भी। यहां लाने से पहले इसे कहां कहां लेकर गये थे?”
. . . और फिर उसने अपना फ़तवा सुना दिया, “मैं अपने घर को रंडियों का रैन बसेरा नहीं बनने दूंगी। ”
बेडरूम के बंद दरवाज़े की दूसरी तरफ़ बैठक में पड़ी सिम्मी भी कहां सो सकी? अंदर से आ रही आवाज़ें उसे साफ़ सुनाई दे रही थीं। प्रीति के ‘सस्ते में सौदा’, ‘रंडियों का रैन बसेरा’ जैसे शब्द समीना के गले में तेज़ाब की तरह उतर गये! उसके अन्तर में भी बहुत से सवाल मचल रहे थे। यह उसके साथ क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है? क्यों उसके अपने मां बाप उसकी जान के दुश्मन बन गये? क्यों उसकी सबसे प्यारी सहेली उसे दग़ा दे गयी? यह एक भला आदमी इस घर में उसे सहारा देने को तैयार हो गया था, क्यों उसपर बिजलियां बरस रही हैं? पति को सामने बिठा कर चोट तो उसपर भी की जा रही है। उसने इन मैडम का क्या बिगाड़ा है? क्यों औरत ही औरत की दुश्मन हो जाती है?
इन सवालों के जवाब नहीं थे समीना के पास! जवाब थे तो बस उसकी ग़रीब आंखों में जमे ठहरे आंसू!! वे भी अब पिघल कर उसके चेहरे पर उतर आये थे। रात अभी बाक़ी है भी तो क्या हुआ? अब वह और नहीं सुनेगी, और नहीं सहेगी !
कमरे की कॉफ़ी टेबल पर पड़े थे, एक फूलदान और एक मैगेज़ीन, ‘एशियन वोमन’। उसने उसके एक पन्ने का कोरा हिस्सा फाड़ कर उस पर लिखा,
“थैंक यू, ब्रदर। मेरे लिये आपको बहुत कुछ सुनना पड़ा। मैं छोड़ रही हूं
यह ‘रैन बसेरा’! काग़ज़ का वह टुकड़ा और योगेश का दिया हुआ वह बीस पाउंड का नोट उसने फूलदान के नीचे टिकाये और चुपचाप उस तूफ़ानी रात के अंधेरे में कहीं दूर निकल गयी।
कुछ ही देर बाद योगेश टॉयलेट जाने के लिये उठा जो कि बैठक के साथ जुड़ा हुआ था। सिम्मी कहीं दिखाई नहीं दी। शायद बाथरूम में होगी। लेकिन बाथरूम तो ख़ाली था। लड़की घर से ग़ायब थी। कॉफ़ी टेबल पर फूलदान के नीचे रखे मिले -उसका दिया वही बीस पाउंड का नोट और सिम्मी के हाथ की लिखी वह स्लिप। कलेजे पर हथौड़ा सा लगा! सुबह सवेरे उसने वह स्लिप और बीस पाउंड का वह नोट प्रीति को दिखाये लेकिन उसने तो फिर मुंह फेर लिया-
मनु ने एक बार फिर बाबा को सिर से पैर तक गौर से देखा।मात्र तीन दिनों में ही बाबा बेहद कमज़ोर दिख रहे थे, परन्तु अभी भी चाहे आत्मबल कहो या कुछ और-- कुछ था, जो उन्हें संभाले हुए था, बिखरने और टूटने नही दे रहा था। ह्रदय में छुपा बैठा वह सुकुमार कवि जाने कबसे अकेला ही आँसू भीगी आवाज में गा-गाकर बहलाए और फुसलाए जा रहा था खुद को, दीन-दुनिया से बेखबर नए नए गीत और दोहे रच रहा था,
धूप किनारे पेड़ खड़े हैं, साए के नीचे सड़कें कितने हैं जो यूँ दुख सह औरों को सुख देते?
अचानक अपनी ही आवाज में आ मिली बच्चे-सी किलक सुनकर कानों पर विश्वास नहीं हुआ शेखर सरकार को। कौन आएगा यहाँ इस वक्त, वह भी इतनी सुबह-सुबह और इस वीराने में--- ज़रूर ही भ्रम है यह पागल मन का सारा! शेखर सरकार ने करवट बदली और फिर से गाना शुरू कर दिया---
गांव गांव का पानी लेकर बादल जो जा बरसें दूजे गांव
ना ये किसी का नाम पूछें, ना ही देखें जेब में रखे दाम।।
फिर वही हँसी--- निश्चय ही केसर की ही आवाज़ है...फिर वही जानी-पहचानी किलक। बहते आँसू थम गए। कहीं यह भी तो एक सपना, मात्र एक याद ही तो नहीं--- खुद को बहलाने का एक और असफल प्रयास ही तो नहीं? क्या थके और निराश मन ने यूँ, इस तरह से छलना और भरमाना शुरू कर दिया है उन्हें-- या फिर सच में ही केसर ही है कहीं आसपास उनके! एक बार फिर उन्होंने आँसू भीगी आँखें पोंछ डालीं --और सबकुछ साफ-साफ देखने की कोशिश की।... हाँ, सामने मनु ही तो खड़ी थी केसर को गोदी में लिए, और जाने कब से उन्हें ही तो पुकारे जा रही थी।
शेखर सरकार की निराश आँखों में एकबार फिर से भटकी आस आंसू बनकर चमक उठी। 'जिसकी बाट जोहती, थकी बोझिल पलकें सोना तक भूल गई थीं, जिसका रास्ता निहारतीं आँखें पिछले तीन दिनों से झपक तक नहीं पाई थीं, उसी मनु को वह सुन तक नहीं पाए... कैसे सुन नहीं पाए वे मनु की गुहार को!' आश्चर्य चकित थे शेखर सरकार खुद पर। " बाबा, बाबा---यहाँ, इधर देखो, मैं यहीं पर हूँ, तुम्हारी मनु.... ठीक तुम्हारे सामने।", रोती मनु जाने कबसे पुकारे जा रही थी उन्हें। पश्चात्ताप में डूबी और आँसू भरी उदास आँखों से, बाँहें फैलाए।
बाबा के सामने आते ही मानो मन की उछाल खाती लहरों ने किनारा पा लिया और दोनों के ही मन में तनी खड़ी, ग़ुस्से और ग्लानि की वे अडिग दीवारें चरमरा उठीं। दोनों के लिए ही अब उस अनुराग भरे आग्रह की अवहेलना कर पाना संभव नहीं था। मनुश्री ही नहीं श्रीमना भी तो दिख रही थी शेखर सरकार को सामने।
"नहीं जा सकती माँ कहीं भी," विवश थे, वे सोचने पर--" जब तक मनु है यहाँ...इस दुनिया में। वही आँखें और आँखों में वही अथाह स्नेह और वही जीवन के प्रति, उनके प्रति, अटूट आस्था और वही अपराजेय विश्वास। वही बर्फ़ की तहों में डूबी पहाड़ की चोटियों-सी अडिग," मैं हूँ ना --क्या सिर्फ़ मेरे लिए भी नहीं", की निरंतर स्नेहसिक्त और अथक वो पुकार।"
यह हठ और यह आग्रह तो, उन्हें बंद पिंजरे क्या, मौत तक से बाहर खींच लाने की सामर्थ रखता है। फिर कैसे मुँह फेर पाते शेखर सरकार इस आग्रह, इस पुकार से--- मात्र इसी एक पुकार के लिए तो जीवित हैं वह? शेखर सरकार और मनुश्री अब्राहम, दो बाप-बेटी, जो सारी शिकायतों के बावजूद भी, टूटते-बिखरते, एक दूसरे का दर्द भलीभाति समझते और महसूस करते, एक दूसरे के आँसू पोंछने तक को तरस रहे थे...जड़वत् खड़े निष्पलक अब एक दूसरे को देखे जा रहे थे।
अँधेरा टूटने लगा और उगते दिन की हलचल में स्पष्ट सुनाई देने लगा उन्हें मनु का मूक क्रंदन। मनु की वह ह्मदय भेदती मनुहार, अब निःशब्द सिसकियाँ बनी मन की निरासक्त दीवार को तहस नहस किए जा रही थी और उन्हें उन्हीं से जीतती, अंदर ही अंदर चल रही घमासान में नहीं, जीवन की ओर वापस खींच रही थी एकबार फिर से। कितना और भटकते या भागते शेखर सरकार आखिर, जबकि भटकते मन का चैन, आश्रय, सब कुछ वहीं पर तो था--- उनके अपने पास और सामने।
जीवन के हर गाए-अनगाए सुर से शेखर सरकार, श्रीमना और मनु, आज भी तो एक ही लय, एक ही निरंतरता के तीन नाम हैं। एक ही गीत के अलाप और अंतरा की तरह, दूर दूर होकर भी पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़े हैं। फिर हाहाकारी क्रंदन करता, ज़िद्दी मन भी तो यही चाहता था---बार बार लाड़ली मनु के पास ही लौटने को तो ललक रहा था। वह यह भी जानते थे कि सामने खड़ी बेटी ही उनके जीवन की नियति भी है और निर्वाण भी। फिर भला कैसे अपनी नियति, अपने चैन से लड़ पाते शेखर सरकार
तीन दिनों से लगातार आंखों के पानी में कांपता वह सपना, साकार सामने ख़ड़ा था। ...यूं.मनचाही मंज़िल से भाग पाना आसान तो नहीं किसी के लिए भी; सारा शहर और शहर का पूरा-का-पूरा पुलिस-विभाग जो काम घंटों क्या, पिछले कई दिनों की लगातार कोशिश के बावजूद भी न कर पाया, मनु की उपस्थिति ने मिनटों में ही कर डाला। भूख प्यास और निराशा से लड़खड़ाते शेखर सरकार डगमग क़दमों से उठे और तीन दिन से बंद किया सूना पिंजरा चुपचाप खोल दिया--वैसे ही जैसे कि बंद किया था उन्होंने, मानो पचास घंटे पहले नहीं, बस चन्द मिनट पहले की, बस, अभी-अभी की ही बात हो सारी।–
बाहर आते ही भूखों जैसी बेताबी से मनु और केसर को सीने से लगा लिया उन्होंने। बहते आँसुओं को बेटी ने भी तो माँ की तरह ही आगे बढ़कर आँचल से पोंछा था और तीन दिन से बेतरतीब रूखे, उलझे बाबा के बालों पर हाथ फेरने लगी थी। वे खुद भी तो अब मगन, उसी तन्मयता से मनु और केसर को बारबार दुलराए जा रहे थे। माँ से बचपन में सुना और आत्मा तक में रचा-बसा गीत पुलक-पुलक कर गा रहे थे। बच्चों से ही नहीं, खुद से भी तो बातें कर रहे थे आज शेखर सरकार,
" आँचल में भर लूँ/ आँचल तो छोटा है / आ मन में बिठलाऊँ तुझे/ सुन, लाल मेरे। '
कभी बच्चों को देखते तो कभी शून्य आकाश की तरफ़, मानो इस आशीष, इस दुआ के लिए धन्यवाद दे रहे हों। एक बार फिर बच्चों सी ही ललक थी मन में और बच्चों से ही चहक भी रहे थे वह। एक बार फिर संसार धुंधलाए और आँसू-भीगे चश्मे के पीछे से भी साफ़-साफ़ और हरा-भरा ही दिख रहा था उन्हे।
मनु बैसाखी की तरह कब गिरते बाबा और बेटी को सँभाल ले गई, न शेखर सरकार को ही पता चल पाया और ना ही सुख के ज्वार में डूबती-उतराती मनु को। इसके पहले कि वह मनु और केसर को जी भरकर प्यार तक कर पाएँ, आँखें बग़ल में खड़े सहमे-सहमे और कुछ-कुछ भ्रमित-से विश्वास पर जा अटकीं। मनु के घुटनों से लिपटा, आँचल की ओट में छुपा, टकटकी बाँधे, वह एकटक उन्हें ही तो देखे जा रहा था। सब सुनने और समझने की असफल कोशिश में बेचैनी से धीरे-धीरे हिलता डुलता, पैर के अँगूठे से ज़मीन पर उन्हीं की तरह कई-कई आड़ी तिरछी लकीरें खींचे जा रहा था। शेखर सरकार चौंक गए –यह कौन है...इतना जाना-पहचाना ? तुरंत ही जानना चाहा उन्होंने,' - कौन है यह अजनबी और क्यों चुपचाप जाने कबसे वहीं, उनके बीच मूक दर्शक-सा खड़ा है, वह भी बड़े ही धैर्य से, आखिर क्या रिश्ता है उनका और इसका? कौन है यह आखिर इतना अपना-सा लगता ? पहले तो कभी नहीं देखा उन्होंने मनु के साथ इसे!
" यह कौन है मनु," प्रश्न-भरी आँखों से उन्होंने मनु की तरफ़ पुनः देखा?
इसके पहले कि वह कुछ और सोचें या पूछ पाएँ, हर्षातिरेक से छलकती आँखों को पोंछकर, मनु ने चहक कर खुद ही जवाब दिया- " यह विश्वास है बाबा---अपना विश्वास। अपने साथ ही रहेगा अब यह यहां पर; जैसे कि माँ, दादी और दादी की देवी माँ, सब अब अपने पास ही रहा करेंगी। कल ही दादीमां के फूल और दुर्गा व काली माँ की मूर्तियों लेकर जोनुस भारत से लौट रहा है। याद है बाबा, कैसे बचपन में एक फूल की पत्ती तक झर जाने पर जब मैं घंटों रोती रह जाती थी, दादी से फूल वापस जोड़ने की ज़िद करने लग जाती थी--- तब दादी कैसे मुझे गोदी में उठाकर इसी क्यारी तक वापस ले आया करती थीं-- नई कलियाँ दिखला-दिखलाकर समझाने लग जाती थीं, "देख, एक और नई कली निकल आई है। सुबह तक इंतज़ार कर ले, कल वही फूल फिरसे वापस खिल आएगा।" और तब गोदी में लेकर घंटों बहलाती और फुसलाती दादी मेरे न मानने पर, ज़िद करने पर, बेहद झुँझला कर कहा करती थीं, " अच्छा तो मत मान। मत मान एक भी बात तू मेरी।---खूब जी भरकर रो ले। कोई बात ही नही समझना चाहती कभी--- इन्हीं फूलों के नीचे गाड़ देना एक दिन मुझे भी यहीं पर फिर मैं भी नहीं जा पाऊंगी कहीं और।"
मनु की आंसू भरी आँखें मुस्कुरा पड़ीं, " और जानते हो बाबा, एक बार फिर दादी ने यही चाहा है ---वह भी दुखी होकर या झुंझलाकर नहीं, दिल से---- हरिद्वार, प्रयाग या काशी की गंगा में नहीं, यहीं अपने पास, -हमारे हाथों से लगाए गए इन्हीं गुलाब के पौधों के नीचे ही हमेशा के लिए विसर्जित होना चाहा है दादी ने।''
छलक आई आँखें पोंछकर मनु उठ खड़ी हुई और यादों भरी, एक रहस्यमय और करुण मुस्कुराहट के साथ बाबा को निष्पलक देखने लगी, मानो पूछ रही हो, क्या मेरे लिए, दादी के लिए भी आप घर वापस नहीं चलोगे?
सहारा देने की अब शेखर सरकार की बारी थी आगे बढ़कर उन्होंने वापस मनु को अपने सीने में छुपा लिया।
तो, एकबार फिर याद कर ही लिया था वक्त की गोद में ओझल दादी को उनकी मनु ने...और उन्हीकी तरह बिल्कुल अकेली थी वह भी, अपनों के बिना। शेखर सरकार देख ही नहीं, महसूस भी कर पा रहे थे कि कैसे अद्भुत दुख और सामीप्य के उस एक पल में मनु और वे, दोनों ही वापस मां की गोदी में जा बैठे थे।
सामने मनु नहीं, अब एकबार फिरसे वही, उनकी अपनी लाडली चुम्मू खड़ी थी--सारी दुनिया से बेखबर, उसी फूलों की महकती क्यारी में हंसती किलकती--- माँ की गोदी में बैठी--वहीं, जहाँ कभी वह खुद भी तो चौबीसों घंटे रमे रह जाते थे। आसपास चारों तरफ़ अब यादों की सुहानी महक थी---पैरों के नीचे बिछे सूखे पत्तों सी चरमराती और कुरकुरी --पुलक-पुलककर थके हारे मनों को गुदगुदाती और सिहराती-सहलाती-सी। सूखी मेपल और ओक की पत्तियों के ढेर के नीचे दबे वे सैकड़ों फूल तक अब तो मन में छुपी हजारों छोटी-बड़ी उमंगों से किलक-किलक कर बाहर आने को बेताब हो चुके थे। सूखी पत्तियों के ढेरों के बीच बीच से झाँकते वे गुलाबी, नीले, पीले फूल, अब आशा और उमंग का एक नया संदेश दे रहे थे और ओस में भीगे क्रोकस और डैफोडिल्स की तरह ही शेखर और मनु का चेहरा भी ऊदा-ऊदा और नम था अब, एक नयी सुहानी चमक के साथ। उगते सूरज की पहली किरन ने डडली शहर पर ही नही, उनके मुँह पर भी तो अपनी स्वर्णिम आभा बिखेर दी थी।
" और जानते हो बाबा दादी ने ऐसा क्यों चाहा? '', मनु अभी भी अपनी उसी रौ में बोले जा रही थी, '' ताकि फूलों की ख़ुशबू-सी हमारे मन में, हमारे साथ, हमारे बीच में ही रह पाएँ वह सदा के लिए। कहीं नहीं गईं दीदा। यहीं हैं हमारे पास। उनके दुख सुख, अकेलापन सभी कुछ हमसे बांटती---हमारे अपने पास--हमारी यादों में, बस यहीं पर हैं वह। आप तो जानते ही हो बाबा, सूखे फूलों की खुशबू भले ही खतम हो जाए बाबा, पर यादों की महक कभी नहीं जाती। "
आँसू पोंछती मुस्कुराती मनु ने एकबार फिर से खुदको और बाबा को तसल्ली दे ही दी थी, आखिर।
"और अब तो माँ भी राज़ी हो गई हैं घर वापस आने के लिए-- हमारे साथ ही रहकर, हम सबकी देखभाल और देवी माँ की पूजा-पाठ करने के लिए---एकबार आकर तो देखो बाबा, कैसा रूप आ गया है दादी की देवी माँ पर माँ की पूजा भाव और सेवा से-- मानो दादी खुद ही आ बैठी हैं प्रतिमा में। "
स्तब्ध खड़े बाबा प्रतिक्रिया में कुछ भी तो नही कह पा रहे थे--- उमड़ते आवेग की बाढ़ में हँसना रोना सब भूल चुके थे वह। हाथ-पैर मारता मन, जैसे तैसे एक एक शब्द को पकड़-पकड़कर अर्थों और संदर्भों के किनारे पहुँचने की निष्फल कोशिश किए जा रहा था। और तब प्यार से विश्वास का हाथ शेखर को पकड़ाते हुए मनु ने खुद को और उन्हे एक बार फिर से संभाल ही लिया।
" अब रोना मत बाबा। सब ठीक है और ठीक ही रहेगा। बस आप हिम्मत मत हारना। मैं लौट आई हूँ ना। देखो अब हम साथ-साथ ही रहेंगे। दादी की भी तो आखिर यही इच्छा थी।"
और तब बहुत ही धीरज और प्यार से, बारबार ही, बाबा के मन को संभालते, टटोलते, करुण विनती की थी मनु ने, " सबकुछ ठीक रहेगा बाबा। एकबार--बस एक बार घर लौट आओ। कहीं किसी तरह की कोई ग़लतफ़हमी, मान- अपमान, क्लेश और तकलीफ़, कुछ नहीं होने दूँगी मैं आपको। साथ ही रहेंगे हम सब। वादा है यह मेरा आपसे।"
बेहद रुँधे गले से मनु ने बाबा से बारबार बिनती करते हुए विश्वास को उनके चरणों में डाल दिया-- 'विश्वास, नानाजी को प्रणाम करो।"
केसर तो जाने कबसे नाना की गोदी में चढ़ी खेल रही थी। किलक-किलक होठ, आँख, नाक, और बालों को खींच रही थी। नन्ही नन्ही उंगलियों से अनियंत्रित बहते आँसू पोंछ रही थी। कितनी शिद्दत से विश्वास भावनाओं के इस उमड़ते आवेग, इस प्यार को समझ पाया, यह तो भविष्य ही बतलाएगा, परंतु उस मन मोहिनी मुस्कान और शर्मीली, तोतली नमस्ते ने एक बार फिर से शेखर सरकार के थके-बूढ़े हाथ पैरों में अभूतपूर्व शक्ति का संचार कर दिया था। पूरे परिवार को गले लगाकर मानो उन्होंने अपना वर्षों से धूलधूसरित, सुखी परिवार वाला सपना बाहों में समेट लिया था।
दो थकी असमर्थ बाँहें और इतना सुख--- तीन दिन के भूखे प्यासे और भ्रमित शेखर सरकार अब प्यार की इस आकस्मिक बाढ़ में डूबे स्तब्ध बहे चले जा रहे थे और बग़ल में खड़ा नन्हा विश्वास तक रिश्तों की इस बौछार में पूरा-का पूरा सरोबार था। बगल में खड़ी समझदार-सी दिखती मनु भी तो अब पूरी तरह से बच्चा बन चुकी थी। कभी रोती, कभी हंसती बच्चों का सर सहलाती, तो कभी खुद ही बच्चों-सी अपने बाबा से लिपटकर रोने लग जाती।
भूख प्यास और परिस्थितिओं से अभिभूत शेखर सरकार नहीं जानते थे कि मनु का वह 'सब ठीक रहेगा' वाला आश्वासन वक्त की कसौटी पर कितना ठीक और सही उतर पाएगा, परंतु अब यह सब जानने की ज़रूरत नहीं थी उन्हें। मन तो बस इसी आज और अभी में डूब जाना चाहता था। अंजुरी में ले-लेकर बूँद-बूँद पीना चाहता था बचे एक -एक पल को। बरसों बाद मन अंधी-गली नहीं, एक खुली सड़क था, जहाँ मनमानी रफ़्तार से पुलक-पुलक दौड़ते शेखर सरकार एक बार फिरसे वापस वहीं पहुँच गए थे, जहाँ कभी बचपन में वह बेफ़िक्र घूमा करते थे --वहीं, जहाँ कमल और गुलाबों से महकती हवा में मदमस्त उड़ती तितलियाँ दिन-रात पीछा किया करती थीं उनका---वहीं जहाँ पक्षी दिन-रात मधुर और अनमोल राग-रागिनी गाया करते थे।
विश्वास और केसर को भाँति-भाँति की रंग-बिरंगी चिड़िया दिखला-दिखलाकर, अब कभी शेखर सरकार उन्मुक्त अट्टाहास कर रहे थे, तो कभी कसकर सीने से लगाकर खड़े रह जाते। आवेगी मन आँखों से बह निकला था। बीच गले में रुँधा कराह और थरथरा रहा था। कभी शेखर सरकार शिशु गीत गाते तो कभी सूर-कबीर और तुलसी। कभी वहाँ मीरा थी तो कभी टैगोर। जानी-अनजानी और जाने कैसी-कैसी मधुर और आल्हादित स्वर लहरियों से आसपास का वीराना तक गूंज उठा। केसर विश्वास या मनु किसी ने भी पायल नही पहन रखी थी और बाँहें फैलाए, भाव विभोर शेखर बाबू गा रहे थे,'ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनिया।'
मनु को बाबा की आँखों में अब आँसू नहीं, पूरा का पूरा समुन्दर हिलोरें लेता दिख रहा था --- समुन्दर जिसमें सीप मोती और मछलियाँ तैरती हैं, समुन्दर जिसकी थाह पाना संभव नहीं, समुन्दर, जिसके अछोह और शीतल विस्तार में डूब जाने को खुद उसका मन भी तो ललक ही रहा था। उसके अपने मस्तिष्क में भी ऊदे-ऊदे बादल उमड़ आए थे और उन बादलों में अब बेतहाशा बिजलियाँ कड़क रही थीं, रिमझिम-रिमझिम बेपनाह बरसात हो रही थी।
"बाबा अपनी वही तितली वाली कविता सुनाओ ना मुझे--- वही जो आप बचपन में, जब मैं बेचैन हो जाती थी, तो गा-गाकर सुनाया करते थे आप---- और जिसे सुनते ही मैं तुरंत ही चुप भी हो जाती थी... सो जाया करती थी। सुनाओ ना बाबा, सुनाओ बाबा, बस वही गीत। "
बच्चों-सी ठमकती मनु की आवाज अतीत की जाने किन किन सुरम्य वादियों की गूँज लिए हुए थी--- सुखतंद्रा में डूबी मनु बाबा से जिद पर जिद किए जा रही थी और अगले पल ही, बूढ़े बाबा के काँपते काँधों से टिकी, जबाव का इन्तजार किए बगैर ही, बहते आँसूओं को पोंछकर, खुद ही झूम-झूमकर बेहद धीमी और डूबी आवाज़ में गाने भी लगती --
"खुशी एक तितली मन ललचाती, ख़ुशी एक तितली मेरे हाथ ना आती। '
सँभल पाना अब दोनों के लिए ही असंभव हो चला था। मनु के आँसू पोंछते शेखर सरकार को खुद अपने बहते आँसुओं का भी तो होश नहीं रह गया था। रुँधा गला खँखारकर, अगली दो पंक्तियाँ खुद उठा लीं उन्होंने ,
" थककर बंद कर लूँ पर जब मैं ये आँखें, पलकों पर बैठी चंचल मुस्काती। "
मानो शीशे सा नाज़ुक और जगमग वह गीत, गीत नहीं एक उड़ता-बहता पल हो, ज़मीन पर गिरते ही जो चकनाचूर हो जाएगा---उन्हें दूर छोड़ जाएगा।
अब तो रोती-सुबकती मनु को सीने-से लगाए शेखर सरकार पूर्णतः ही डूब चुके थे अपनी ही गूंजती स्वर लहरियों में। वह गीत--- अब एक गीत नहीं, सहारा था दोनों का। दोनों की ही आंखों से भरपूर तृप्ति छलक रही थी। दुनिया क्या कहेगी इसका न कोई उन्हें होश था और ना ही फुरसत।
आँसू भीगी आँखों से दूर खड़ी पिंकी ने भी यह सब देखा। देखा, कि कैसे बाबा-सी-ही रुँधे गले से बाबा के संग-संग गाती मनु, खुशी और समझौते के उस पल में पूरी तरह से डूबकर आनन्द-हिलोरें ले रही थी। और फिर उनके उल्लासित मन-सा ही आकाश भी तो बरस-बरसकर पूरी तरह से साफ हो चुका था। सफेद उजले-धुले बादलों को गोदी में बिठाए, एकबार फिरसे शांत व स्थिर था। हां, मनमानी लय पर झूमते वे बादल जरूर अभी भी बेपनाह लाड़-दुलार से इतराए, निश्चिंत इधर-उधर मस्त दौड़ रहे थे। ख़ुशी में धूपछाँवी आँख-मिचौली खेल रहे थे—बिल्कुल विश्वास और केसर की तरह ही, ऊँची-ऊँची कुलाँचे ले-लेकर, किलक किलक किलकारियाँ मार रहे थे...दौड़ते-भागते फड़कती पलकों और कांधे पर जा बैठे थे । मिली-जुली उन सिसकियों और हर्षोल्लास से उमगती आवाजों से पूरा का पूरा हठी जंगल गूँज उठा।
एक बार फिर हर्ष और विषाद की अंधी गलियों में भटकता, दम तोड़ता जीवन पुन: स्पंदित था एकबार फिर आशा निराशा—हार-जीत, अंधेरा-उजाला सब गडमड थे। एकबार फिर रौशनी की उस पहली किरन के आगे आत्म समर्पित, किंकर्तव्य-विमूढ़ और नतमस्तक थे वे।...अब अकेलेपन और विषाद जैसे हारे शब्द अपने सारे अर्थ खो चुके थे उनके जीवन से। मात्र उस संधि- समझौते... सुख के एक अनहोने और अबूझ पल में किसी गिले-शिकवे, किसी दूरी की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी। हारकर भी जीतना जो सीख लिया था उन्होंने , वैसे ही, जैसे कि आँखों के आगे डूबता सूरज रोज़ ही अपने अँधेरों में तिल तिल शेष तो जरूर होता है , पर तुरंत ही अशेष भी हो जाता है... जानता जो है कि इसी अँधेरे से न सिर्फ रोज ही उसे लड़ना है...इससे ऊपर उठना है, अपितु इसे जीतना भी है.।---
" जी लड़का तो वैसे एक छोटी सी नौकरी में है पर है बड़ा प्रतिभावान। कला के सभी क्षेत्रों तथा मूर्तिशिल्प, रेखाचित्र, छायाचित्र, साहित्य व संगीत में पारंगत है वह...।" एक रिश्ता सुझाते हुए मध्यस्थ ने लड़की के पिता से कहा।
" अच्छा अपनी इन कथित कलाओं से वह कितना कमा लेता है ? " लड़की के पिता ने प्रश्न किया।
" जी उसने कला को कला ही रहने दिया है...पेशे के तौर पर नहीं अपनाया है। चूँकि ये सब उसके शौक मात्र हैं अतः वह इन कलाओं से कुछ भी उपार्जित नहीं करता है।" मध्यस्थ ने जवाब दिया।
" तो काहे का कलाकार है। ऐसी कलाओं को पालने का क्या औचित्य है जिसमें धनोपार्जन न हो... मेरा तो ये मानना है कि धनोपार्जन ही वस्तुतः कला है, बाकी सब बेकार की बातें हैं।"
" मैं अपनी पुत्री का ब्याह ऐसी जगह नहीं कर सकता।" लड़की के पिता ने सपाट उत्तर दिया।
बेटी
अश्विनी कुमार आलोक
देवेन्द्र से इसको लेकर छठीं बार ऐसे अपमानित हुये उमाकांत बाबू। बेटी न हुई कि माथे की पगड़ी सरेआम नीलाम हुई जाती है। कई कोसों तक फैले उमाकांत बाबू के नाम और शोहरत की यह दशा होगी, उन्हें इसका अहसास होता तो वह ऐसा कदापि न करते। उन्हें क्या पता था कि प्रेम का भूत इस कदर ताकतवर होता है कि पैसा भी उसके आगे निरर्थक हो जाता है। देवेन्द्र खाते-पीते घर का है, रेलवे की देवेन्द्र अच्छी नौकरी से भी लगा है, उनकी बेटी उसके साथ सुख से रहेगी; यही सोचकर उन्होंने देवेन्द्र को उठवाकर जबरदस्ती उसकी गाँठ अपनी बेटी से जोड़ दी थी। काफी हंगामा किया था लड़के ने, घूसे और लात भी चलाए थे, पुश्तों को गालियों से तर कर दिया था। पर पैसों से लाद देने के बाद सब ठीक हो जाएगा, उमाकांत बाबू को यह उम्मीद थी।
परन्तु आज छठी बार ऐसा अपमान उस साधारण से क्लर्क के बेटे ने किया उनका। जान-पहचान के कितने लोगों ने मनाया उसे। पर उसके सिर पर तो शहर की किसी बदजात लड़की के प्रेम का भूत चढ़ा था। देवेन्द्र ने अपने दरवाजे पर बैठने तक न दिया और जब जमीन पर बैठे उमाकांत बाबू तो उनकी पीठ पर जोर से लात दे मारी। थुलथुल देह। यदि लोग न पकड़े होते, तो उमाकांत बाबू सीढ़ियों से लुढ़क जाते।
वह कुछ निश्चय करके उठे और कार में आ बैठे। लग रहा था, जैसे उनका सिर अब फटा, तब फटा। देवेन्द्र की औकात और अपनी औकात की तुलना करते हुए जैसे उनके दिमाग में झुरझुरी-सी भर गई। अगर तथाकथित कुछ हितैषी उन्हें न उकसाते, तो ऐसे पकड़कर वह अपनी इकलौती बेटी से एक साधारण क्लर्क के लड़के को न ब्याहते।
मन में आया उनके कि देवेन्द्र के पूरे परिवार को गोलियों से भून दें। पर फिर सोचते, वह भी अपनी जगह ठीक है, किसी से प्रेम करता है, तो अपना वचन उसे निभाना ही चाहिये। फिर जी में आता कि खुद को गोली मार लें, पर सोचते, बेटी की भलाई के लिए ही तो अंधे बने।
ड्योढ़ी पर कार रुकी, तो वह उतरकर धम्म-से सोफे पर बैठ गये। फिर उठे और बंदूक उतारी। घर में जैसे मातम का माहौल था। कोई रोकता, इसके पहले ही दो धमाके हुये। बेटी थोड़ी देर खून से लथपथ जमीन पर तड़पती रही, फिर शांत हो गई, उसको उसका कसूर कबूल था।
देश में आज लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या में भारी कमी आ गई है। एक आकलन के अनुसार कई राज्यों में प्रति हजार लड़कों पर आठ सौ से कम लड़कियां ही रह गई हैं। समाज शास्त्रियों का आकलन है यदि यही रफ्तार रही तो आने वाले पच्चीस साल में हमें अपने बच्चों की शादी करने के लिए बहुयें विदेशों से मगानी पड़ेंगी। आज उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान सहित कई राज्यों में तो यह स्थिति आन पड़ी है। बंगाल तथा उड़ीसा से लोग लड़कियों को खरीद-फरोख्त करके ला रहे हैं और उनसे बेटे पैदा करने के बाद या तो उन्हें दलालों के हाथों बेच देते हैं या उन्हें उनके हाल पर छोड़ देते हैं। बेटों की चाह ने हमारे समाज के ताने-बाने को इस कदर झकझोर दिया है कि मानवीय संवेदना तथा समाजिक लोक-लाज समाप्त सी हो गई है। भारतीय समाज में आज भी लड़कों को लड़कियों की अपेक्षा काफी वरीयता दी जाती है। उन्हें कुलदीपक, वंश चलाने वाला और न जाने क्या-क्या नाम दिये जाते हैं वहीं लड़कियों को दोयम दर्जें की चीज समझता जाता है। यह किसी एक समाज या समुदाय की बात नही है अमूमन यह बात देश के प्रत्येक भाग और समुदाय पर लागू होती है। फर्क इतना है कि किसी परिवार में यह अधिक और कहीं कम हैं लेकिन है जरूर और यही सोच और संकुचित मानिसिकता के चलते लड़कियों की अवहेलना होती है। खाने में, कपड़े लत्ते हों या बाहर कहीं घूमने आदि जाने के मामलें में बंदिशों में जकड़ी जाती हैं बेचारी लड़कियां। बेटों को उदण्ड बनाने के लिए उनके सौ गुनाह भी सरेआम माफ कर दिये जाते हैं क्यों कि वह बेटा है। सीधे तौर पर देखें तो हमारे समाज में यह धारणा अभी भी विद्यमान है कि लड़का सक्षम होता है, वह हमारे बुढ़ापे का सहारा होता है। उसी के जहाज में बैठकर हम बैकुण्ठ पहुँचते हैं तथा उसी को हमारी चिता को मुखाग्नि देने का अधिकार है। उसे हमारी वंश बेल को चलाने का पट्टा मिला होता है। और बेटी पराया धन है उसे बेकार में पालो पढ़ाओ -लिखओ और कल शादी होकर उसे दूसरे के घर ही जाना है इसलिए उसकी ओर किसी का ध्यान नही जाता कि वह भी इंसान है, उसके भी कुछ अरमान और इच्छायें हैं। लड़की को हमेशा दोयम दर्जे की चीज माना जाता है और लड़के को हमेशा उससे उत्तम और लाड़ला। मां-बाप ही अपने बच्चों में लिंग के आधार पर भेद करते हैं जो कि आजीवन चलता है। एक आम आदमी की साचे होती है कि लड़का शादी करके बहू लायेगा तथा साथ में लाखों रूपये का दहेज मिलेगा जबकि लड़की पर पढ़ाई का खर्चा करो और शादी पर दहेज दो सो अलग इसलिए भी उसको उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय समाज में अधिकांश लोग बेटों को ही जन्म देना चाहते हैं। लड़कियों को अपने पर बोझ समझने वाले लोग इनसे मुक्ति का आसान और सही तरीका आधुनिक समय में विज्ञान की ममद से अल्ट्रासांउड़ के द्वारा लिंग जांच कराकर लड़की की गर्भ में ही हत्या कर रहे हैं। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। बेटी के गर्भ में ही मार दिये जाने से उसके जन्म लेने से लेकर पढ़ाई-लिखाई व शादी आदि पर होने वाले संभावित खर्चे तथा जीवन पर्यन्त परेशानी सबसे पल भर में ही मुक्ति मिल जाती है। किताना आसान है यह तरीका हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा। इस तरह की मानसिकता आज देश में कन्याभ्रूण हत्या को बढ़ावा दे रही है। आम या तथाकथित खास सभी घरों व वर्गों में अक्सर ऐसा हो रहा है। लोग सिर्फ अपने लिए बेटे चाहते हैं। बेटों की यह चाहत लगभग सभी वर्गों समुदायों में है। अमीर, गरीब, पढ़े-लिखे अधिकांश इसी मानसिकता के हैं चन्द लोग इसके अपवाद हो सकते हैं वे नगण्य हैं। आज भी अधिकांश गांव और कस्बे ऐसे हैं जहां लड़कियों को स्कूल नही भेजा जाता है। उनसे घर तथा खेतीपानी का काम लिया जाता है। घर में काम करने से लेकर चूल्हा चौका आदि में लड़कियां मॉं के साथ काम करती हैं। आज भी कई ऐसे परिवार हैं जहां बेटियों को अक्सर बचा-खुचा ही खाने को दिया जाता है तथा उन्हें पहनने के लिए भी मोटा ही दिया जाता है। वहीं बेटों को अच्छा खाना और पहनना दिया जाता है लड़कियों को दोयम दर्जे का समझा जाता है, इससे उनमें उपेक्षाभाव तथा कुंठा घर कर जाती है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर अगर नजर ड़ालें तो देखने में आता है कि देश में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या में काफी कमी आई है। राज्यवार ब्यौरे भी काफी निराशाजनक है। देश में केरल मात्र एक ऐसा राज्य है कि जहां लड़कियां लड़कों से अधिक हैं अन्यथा अन्य राज्यों की हालात काफी खराब है। खासकर उत्तर भारत के कई राज्यों में यह लिंगानुपान काफी विषम है। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब तथा दिल्ली आदि में लड़कियों संख्या प्रति हजार लड़कों के आठ सौं के करीब है। जो कि काफी सोचनीय स्थिति है। सवाल यह उठता है कि यदि यही हालात रही तो आने वाले समय में हम अपने लड़कों के लिए दुल्हनें कहां से लायेंगे? यह भयावह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा के कारण नही बल्कि मानव की लालची प्रवृत्ति तथा मानव से हैवानियत बनने के कारण है। असल में हम तथाकथित विकास के कितने भी सोपान गढ़ लें लेकिन जब तक हमारी सोच नही बदलती सारा विकास निरर्थक है। सबकुछ पाने की लालसा ने आदमी को हैवान बना दिया है और इसके कारण हमारा समाज तथा परिवारिक पृष्ठभूमि विखराव के कगार पर हैं। अपने ही परिवार व घरों में महिलायें सुरक्षित नही हैं घर में ही कौन कब उनके साथ अमानवीय कृत्य कर बैठै कुछ कहा नही जा सकता है। मानवीय संबधों की बेल पर स्वार्थपरकता का कीड़ा लग चुका है। हमारे शास्त्रों में नारी को शक्ति के रूप में माना गया है। उसे देवी, शक्ति स्वरूपा आदि नामों से पुकारा व पूजा जाता रहा है आज उसी शक्ति स्वरूपा का असत्वि आज अपनों के कारण ही खतरे में है। कहते हैं कि यत्र नारीणां पूजयन्ते रम्यन्ति तत्र देवता। अर्थात जहां नारी की पूजा होती है वहां देवाता निवास करते हैं। लेकिन कि आज स्थिति ठीक उलट हो गई है। आज नारी का अपमान करके तथा उसकी हत्या करके आदमी न जाने कौन सा पुण्य अर्जित कर रहा है? कन्या भू्रण हत्या का प्रचलन भारत में सामाजिक ताने-बाने को तार-तार कर रहा है। इससे से समाज खोखला हो गया है। जिस नारी के गर्भ से स्वयं पुरूष का जन्म हुआ है उसी की कोख में जन्म ले रही कन्याओं को मार दिया जाता है। कैसी मानसिकता है हमारी? हालात यदि ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में गली-मुहल्लों में कोई लड़की नही दिखाई देगी। बिना महिलाओं के क्या किसी समाज की कल्पना की जा सकती है? कदापि नही लेकिन यह सबकुछ जानते समझते हुए भी आज का मानव इतना स्वार्थी और अन्धा हो चुका है कि उसका विवके मर चुका है। मानवीय संवेदनायें अगर इसी तरह तार-तार होती रहीं तो फिर हमारे समाज को बचाने वालो कोई नही होगा। आज अपने ही अपनों के खून के प्यासे बन बैठे हैं और उसमें भी महिलायें अक्सर घरों में बेटों की चाह में अपनी बहू से बेटे जनने की मांग कर बैठती हैं अगर बेटी जन्मी तो न तो जन्म देने वाली मां की खैर न उस बेटी की। अगर लिंग जांच में बचकर किसी कन्या का जन्म हो जाता है तो कई ऐसे परिवार हैं जहां जन्म लेने के बाद भी कन्या का गला दबाकर हत्या की जाती है। यह इतना गुपचुप तथा संगठित रूप से होता है कि किसी को कानों कान खबर नही होती। असल में हमारी मुनाफाखोरी तथा स्वार्थ की भावना ने इस दरिंदगी को बढ़ावा दिया है। सरकारी स्तर पर इस हेतु कारगर उपाय न किया जाना भी एक वजह है। यद्यपि सरकार की ओर से कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए काफी प्रचार -प्रसार किया जा रहा है लेकिन जन्म पूर्व लिंग जांच कराने की व्यवस्था शहरों से होती हुई गांवों में भी फैल चुकी है। गांव से अनचाही बेटी से निजात पाने के लिए लोग अब शहरों में जाकर लिंग जांच करा रहे हैं और कन्या हो तो उसे मां के गर्भ में ही मार देते हैं। सरकारी उदासीनता तथा संगठित गिरोह के इस अपराध में सक्रिय होने के कारण लिंगानुपात बढ़ता ही जा रहा है। इसके दूरगामी प्रभाव होंगे जो कि अभी से देखने में आ रहे हैं। आने वाले दिनों में लड़कियां ढूढने से भी नही मिलेंगी आज भी कन्या पूजन आदि अवसरों पर कन्यायें नही मिलती है। वजह साफ है कि कन्याओं की हत्या किये जाने से सामाजिक संतुलन काफी गड़बड़ा गया है। इस कुकृत्य पर कड़ाई से अंकुश लगाने की जरूरत है। सिर्फ नियम बनाकर कुछ नही होने वाला है। हमें अगर अपना समाज बचाना है तो लड़कियों के बारे में अपने तंग नजरिये को बदलना ही न होगा बल्कि उनके मान व सम्मान की रक्षा भी सिद्दत से की जानी चाहिए, अन्यथा समाजिक स्वरूप तथा मानवता पूर्णत: नष्ट हो जायेगी। इसलिए सरकार के साथ-साथ समाज को भी इस ओर जागरूक होना होगा।
आज बेटियां किसी भी स्तर पर बेटों से कम नही हैं उनको दोयम दर्जे का समझना या बोझ समझना किसी प्रकार से उचित नही है। आज बेटियां बेटों से आगे हैं और वे सब कुछ कर सकती हैं जो बेटे करते हैं स्कूली शिक्षा तथा चुनौती पूर्ण कैरियार आदि में बेटियां बेटों से आगे बढ रही हैं आवश्यकता है उनके कोमल मन को समझने की तथा उनके प्रति समानता का व्यवहार करने की। हमें इस कुंठा से उबरना होगा कि बेटियां हम पर बोझ हैं। असल में बेटियां आज किसी भी प्रकार से बोझ नही हैं बोझ हैं हमारे तथाकथित संस्कार व दूषित विचार। बेटियां आज किसी से कम नही हैं बस आवश्यकता है उनको समझने व उचित अवसर प्रदान करने की। आज बेटियां किसी पर बोझ नही वे हमारे समाज का आलम्बन हैं।
लेखनी के पाठकों के लिए प्रस्तुत है औरतों की दशा और दिशा पर संतोष श्रीवास्तव की शशक्त कलम से लिखी कुछ बेबाक और विचारोत्तेजक टिप्पणियां, साभार ' समरलोक ' पत्रिका।
मुद्दा
संतोष श्रीवास्तव
लली तू जा, लला को भेजियो
सुबह की चाय पीते हुये टी.वी. चैनल पर नजर गई ही थी कि मैं दंग रह गई। पुलिस की गिरफ्त में आये मनिंदर पालसिंह नामक युवक ने बड़ी बेबाकी से बयान दिया है कि उसने ब्रिटिश किशोरी हन्ना फोस्टर के साथ पहले बलात्कार किया और फिर उसकी हत्या कर दी। 28 मार्च 2003 को ब्रिटेन में साउथएम्पटन स्थित अपने घर से सत्रह वर्षीय हन्ना फोस्टर स्कूल के लिए निकली थी। रास्ते में ही मनिंदर पालसिंह ने उसका अपहरण कर लिया और उसके साथ बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी। हन्ना के माता-पिता को हन्ना का शव उस दिन शाम को सड़क पर मिला। अपनी इकलौती बेटी के साथ किये गये दुष्कर्म और हत्या के आरोपी का जब उन्हें महीनों बाद पता चला तो उन्होने उसकी गिरफ्तारी पर पचास लाख रुपए का इनाम घोषित कर दिया और स्वयं उसकी खोज रते हुए भारत आ गये। फोस्टर दम्पत्ति ने राजधानी में एक संवाददाता सम्मेलन में अपनी बेटी के हत्यारे को पकड़वाने में उनकी मदद करने की मार्मिक अपील की। बोलते हुए वे कई बार रो पड़े और रुंधे गले से कहने लगे कि " वे चार हजार मील की दूरी तय करके यहां इसलिए आये हैं क्योंकि वे भारत की नैतिकता की भावना और न्याय प्रणाली में उनके गहरे विश्वास से वाकिफ हैं।" खैर... उनकी बेटी का हत्यारा तो पकड़ा गया, न्याय भी मिला उन्हें पर उन लोगों का क्या कीजै जो स्वयं ही अपनी बेटियों की हत्या कर देते हैं और यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
भिंड मुरैना जिले के गांवों में बेटी के पैदा होते ही घर की सबसे बुजुर्ग वृद्धा उस नवजात कन्या गले पर कपड़ा रखकर चारपाई के पाये से उसकी गर्दन दबा देती है। कन्या की सांसें घोंटते हुये वह कहती है - " लली तू जा (यानी मर जा) पर अपनी जगह अगली बार लला को भेजना।" इस कुप्रथा के चलते वहां नर-नारी का प्रतिशत इतना गड़बड़ा गया है कि तीन-तीन भाइयों में केवल सबसे बड़ा भाई ही विवाहित हो पाता है। क्या सरकार की नजर इस कुप्रथा पर नहीं जाती ? उन गांवों को जागरूक करने के लिये, कुप्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिये और ऐसा क्रूर कार्य करने वालों को हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर समुचित दंड देने के लिए क्या सरकार के विकास कार्यक्रम में कोई पैकेज नहीं है ? कन्या या तो मार दी जाती है या फिर पैदा होते ही नालाम कर दी जाती है। यह सनसनीखेज खबर बच्चों की अवैध बिक्री के खिलाफ अभियान चलाने वाली संस्था के संयोजक सी. नांबी ने दी। तामिलनाडु के कुन्नातुर गांव में गरीबी के कारण बच्ची के पैदा होते ही उसके माता-पिता उसके लालन-पालन में असमर्थता जताते हुये उसकी नीलामी लगा देते हैं। सी. नांबी ने राज्य सरकार से अपील की है कि वे नीलाम हुई बच्चियों को संरक्षण दें। वरना उन बच्चियों का भविष्य क्या होगा ये जग जाहिर है।
इन सब रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं कुप्रथा, बलात्कार, हत्या, यौन शोषण, बेघर भटकती औरत को देख तो लगने लगा है कि औरत का शरीर ही उसका शत्रु है। चाहे वो स्कूल, कालेज में पढ़ने वाली लड़की हो, दफ्तर या फैक्ट्री में दो-तीन हजार रुपये महीने पर नौकरी करने वाली कर्मचारी हो, पति या दोस्त के साथ सिनेमा देखने या पार्क में घूमने निकली गृहणी हो, रेलवे-स्टेशन या बस-अड्डे पर भटक रही दूसरे शहर से आई कोई अनजान औरत हो, सड़क पर घिसटती भीख पर गुजारा करती कोई विक्षिप्त हो, नर्सिंग होम में डॉक्टर के टेबल पर कराहती मरीज हो, रात को होटल की पार्टी से निकली कोई विदेशी पर्यटक या दूतावास की कर्मचारी हो या झुग्गियों में रहने वाली किसी जेबकतरे की बीबी हो, या फिर जेल में बंद कैदी...इनमें से कोई भी, कहीं भी , किसी-न-किसी बहाने बलात्कार का शिकार होती है। मानो शहर में भूखे भेड़िये घूम रहे हों। ये भेड़िये किसी भी शक्ल, किसी भी पद के हो सकते हैं ...आतंकवाद से मुक्त कराने आए किसी अन्य देश के सैनिक तक...ईराक की अबू गरीब जेल में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं ने पुरुष युद्धबंदियों के साथ जो हैवानियत भरा सुलूक किया वह तो अखबार की सुर्खियां बन गया लेकिन महिला युद्धबंदियों के साथ हुए बर्बर व्यवहार प्रकाश में अधिक नहीं आये। कोई भी जंग हो सबसे ज्यादा क्रूरता, बर्बरता औरतों को ही भुगतनी पड़ती है। कोई नहीं जानता कि अमेरिकी सेना की कैद में कितनी ईराकी महिलायें हैं और उन पर क्या बीत रही है ? लेकिन इन महिला कैदियों की ' अमालकदम स्वादी ' नामक महिला वकील ने जेलों में पहुँच बनायी तो वहां का हाल देखकर वे रो पड़ीं। अमेरिकी सैनिक इन महिलाओं को लगातार अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं....लेकिन वे नहीं चाहतीं कि उनके साथ होने वाले सुलूक की खबर उनके परिवार तक पहुंचे। एक घिनौनी शर्म का एहसास उन्हें अपने बच्चों और रिश्तेदारों तक इस अनाचार की खबर पहुंचाने से रोकता है। यही अमेरिकी गठबंधन सेना थी जिसने ईराक की महिलाओं को सद्दाम हुसैन के साशनकाल में उन पर किये गये अत्याचारों का हवाला दिया था कि किस तरह सद्दामहुसैन ने कानून बनाकर ' ऑनर किलिंग ' के नाम पर महिलाओं के कत्ल की ठूट दी थी। जब सत्ता बदल गयी है तो वही सेना उनका शोषण, अत्याचार करने में सद्दाम हुसैन से एक कदम आगे सिद्ध हो रही है। किस पर भरोसा करे औरत? कानून पर? धर्म पर? परिवार पर? या उन परंपराओं पर जो सदा औरत के खिलाफ ही रहीं फिर चाहे दुनिया का कोई भी देश हो क्या फर्क पड़ता है।
सरहद पार पाकिस्तान में औरतों को तलाक देकर या फिर उन्हें डरा धमकाकर, उन पर तरह-तरह के अत्याचार करके किसी भी समय घर से निकाल देने का आम चलन है। सूबा सरहद बलूचिस्तान और सिंध के कुछ इलाकों में तो बीबी से छुटकारा पाने के लिए उस पर बदचलनी का आरोप लगाकर जान से मार देना, खानदान, बिरादरी और परिवार की शान समझा जाता है। कानून हत्यारे को न तो पकड़ता है न सजा देता है क्योंकि यह तो उनका नितांत निजी मामला है । इस प्रथा को ' काकाकोरी ' की प्रथा कहा जाता है। यह ' काकाकोरी ' पुरुषों के लिए क्यों नहीं है? पत्नी के अतिरिक्त भी कइयों से शारीरिक संबंध रखने वाले पुरुष बदचलन क्यों नहीं माने जाते? क्यों तलाक के बाद औरत को घर छोड़ना पड़ता है? क्यों नहीं पुरुष घर छोड़ता? घर क्या उस अकेले का है? परिवार क्या उसके अकेले से चलता है ?
औरतों के साथ यौन शोषण हर उस क्षेत्र में विद्यमान है जहां औरत कुछ बनना चाहती है। उसके अंदर की किसी भी क्षेत्र की कला उसे सहज ही पुरुष के झांसे में ला पटकती है। पुरुषों के वादों पर यकीन करना उसका सहज गुण है और यहीं वह मात खा जाती है।
‘चांदनी बार ‘ फिल्म के निर्देशक मधुर भंडारकर ने प्रीति जैन के अनुसार “ उसका लगातार पाँच वर्षों तक यौन शोषण किया...शादी का वादा किया, अपनी फिल्म में हीरोइन बनाने का झांसा दिया और अब किसी और से शादी कर ली।“ प्रीति जैन ने हिम्मत दिखाई और मामला कर्ट तक पहुँचा। फिल्म लाइन में इस तरह की न जाने कितनी प्रीतियां फिल्म में रोल पाने के एवज में यौन शोषण काशिकार होती हैं। यह सच है कि सभी के साथ ऐसा नहीं होता...न ही सब निर्माता निर्देशक ऐसे होते हैं...लेकिन तराजू का पलड़ा प्रीतियों की तरफ का भारी होता है। और मजे की बात ये कि मधुर भंडारकर को निर्दोष साबित करते हुए उनके एक फिल्मी शुभचिंतक बयान देते हैं कि अगर मधुर भंडारकर ने ऐसा किया भी तो हम फिल्म वाले कोई देवता तो हैं नहीं...आखिर हैं तो इन्सान ही। मतलब इतना सब हो जाने केबाद भी मधुर भंडारकर हैं इन्सान ही? ऐसा क्यों नहीं हो जाता कि औरत को अपनी काबलियत, अपना हुनर बिना शारीरिक दंड भुगते दिखाने का मौका मिले? पर शायद वो जमाना कोई और ही होगा।
आज संचार क्रांति ने औरत को नई पश्चिम उपभोक्तावादी प्रणाली का शिकार बना दिया है। लोग दोस्ती और दरिंदगी में फर्क करना भूल गए हैं। औरत का इस्तेमाल धड़ल्ले से जीवन के हर क्षेत्र में किया जा रहा है। आतंकवादी भी भोली भाली औरतों की गरीबी का फायदा उठाकर उनका मनहूस इस्तेमाल कर रहे हैं। औरत की नियति ईश्वर ने न जाने किस कलम से लिखी थी जो टूटती ही नहीं जबकि मौत की सजा सुनाने के बाद न्यायाधीश अपनी कलम तोड़ देता है।
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मैं कमजोर लड़की नहीं हूँ।
युवा दिलों के आदर्श रोमियो का पूरा नाम रोमियो मोंटेग था। जूलियट ने आग्रह किया- “तुम अपने नाम के आगे मोंटेग क्यों लगाते हो। तुम सिर्फ रोमियो हो जिससे मैं प्रेम करती हूँ। गुलाब को गुलाब न कहकर किसी और नाम से पुकारा जाये तो क्या उसकी खुशबू बदल जायेगी? “ जूलियट की इस बात से रोमियो इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसी क्षण अपना सरनेम मोटेंग हटा दिया और कहा कि- “ आज से मुझे जूलियट्स लवर के नाम से ही जाना जायेगा। “
शेक्सपीयर के रोमियो एंड जूलिएट प्रेम नाटक की चाहे जितनी तारीफ हुई हो, ब्रिटेन के कंजरवेटिव समाज में आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई है कि वह प्रेयसी के नाम पर अपना नाम बदल ले। वहां आज भी ‘ माय गर्ल ‘ का कंसेप्ट बरकरार है...यानी जब तक लड़की कुंवारी है, नाम के साथ पिता का सरनेम रहेगा, शादी हो गई तो पति का सरनेम लग गया। यानी लड़की का कोई अपना वजूद ही नहीं। इधर कुछ महिलावादी संगठनों ने यह सवाल उठाना शुरू किया है कि बच्चे के साथ पिता का ही नाम क्यों, माँ का नाम क्यों न हो। लेकिन अभी इस विचार ने समाज पर अपना कोई असर नहीं दिखाया है। सिंगल पैरेंटिंग करने वाली कुछ महिलाएँ अपने बच्चों को अब अपना नाम जरूर देने लगी हैं, लेकिन सरनेम देने का सामाजिक अधिकार अभी भी उनके पास नहीं है। भारत में पहले औरतों को कोई नाम से जानता ही नहीं था। जब तक वे अविवाहित रहती थीं बस तभी तक नाम से जानी जाती थीं। ससुराल पहुँचते ही वे गजेन्द्र बाबू की बहू, बबली की अम्मा, गुड्डू की चाची, लल्लन की भाभी बन जाती थीं। इसके अलावा कई प्रदेशों में आज भी शादी के मंडप में ही दुलहन का नाम बदल दिया जाता है। महाराष्ट्र में तो यह प्रथा मैंने स्वयं देखी है, लेकिन ब्राजील में एक नया फेमिनिस्ट फैशन शुरु हुआ है। वहाँ पुरुष आजकल अपने सरनेम की जगह पत्नी का नाम या सरनेम लगाने लगे हैं। वहाँ के रजिस्ट्रार ऑफिस में पिछले तीन महीनों से 540 पुरुष अपनी पत्नी का सरनेम अपना चुके हैं।
और क्यों न हो, आज महिलाओं ने मुश्किलोंको चुनौती जो बना लिया है। क्या कोई कल्पना भी कर सकता था कि जिस मारवाड़ी समाज में बेटी अभिशाप मानी जाती है वहाँ जन्म से मोतियाबिन्द की शिकार आरती ने न केवल विजन स्क्रीन सौफ्टवेयर सीखाबल्कि नेत्रहीनों के लिये वाइस विजन कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र ही खोल डाला।
टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा ने क्रिकेट के दीवाने देश की दिलचस्पी टेनिस में जगाई। 19 साल की युवा सानिया विश्व टेनिस रेंकिंग में 37 वां स्थान हासिल कर शीर्षस्थ 50 टेनिस खिलाड़ियों में शामिल होने वाली पहली भारतीय बन गई। सानिया के खेल के दौरान पहनेजाने वाले कपड़ों पर एक धार्मिक नेता ने फतवा जारी किया- ” उसे मुस्लिम लड़की की तरह ही कपड़े पहनना चाहिए। “
सानिया का जवाब था-“ खेल के दौरान मुझे जो पहनना पड़ता है वह मेरी पसंद नहीं, बल्कि खेल की माँग है। मैं खुदा से डरती हूँ और रोज नियमित रूप से नमाज अदा करती हूँ। उसकी मुझ पर मेहरबानी है।“
लेकिन खुदा की मेहरबानी मालिनी पर नहीं थी। वह जन्म से विकलांग थी। एक तो लड़की, फिर विकलांग, समाज हाहाकार कर उठा। क्या होगा मालिनी का ? पर मालिनी की माँ डॉ. मीठू अलूर ने ऐसी हालत में भी जीवट से काम लिया। न तो आँसू बहाये, न बेटी के दुर्भाग्य को कोसा, न ईश्वर से कोई शिकायत की। उन्होंने विकलंग बेटी की बेहतरीन परवरिश के लिए प्रशिक्षण लिया और स्पास्टिक सोसायटी ऑफ इन्डिया की स्थापना करके दूसरों की मदद करनी शुरू कर दी। इस संस्था के अब 16 केन्द्र हो गये हैं। उन्होंने विकलांग बच्चों को मुख्य धारा के साथ रखने के संकल्प की शुरुआत बेटी मालिनी से ही की। मालिनी ने नॉर्मल विद्यार्थियों के साथ रहकर डबल एम.ए. और पी.एच.डी. तक की शिक्षा प्राप्त की। आज वह व्हील चेयर पर बैठकर सोसायटी के सेंटर संचालित करती है।
80 वर्षीया प्रेमा पुरव जब युवा थीं तो गोवा मुक्ति आंदोलन की सर्वेसर्वा थीं। यह वह समय था जब औरतों को घर की शोभा समझा जाता था, बाहर की दुनिया मर्दों की थी, लेकिन प्रेमा पुरव में गजब का आत्मविश्वास और जोश था। उनके कारनामों ने उन्हें पुलिस के आँखों की किरकिरी बना दिया। पुलिस ने उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन्हें बुरी तरह से टॉर्चर किया। यहाँ तक कि उनके पैर में गोली भी मार दी पर जिसके दिल में साहस का समुंदर ठाठें मार रहा हो वहाँ टटकी बंदूकों का क्या काम? उन्हें झुकाने में नाकामयाब प्रशासन ने उन्हें गोवा से निर्वासित कर दिया। प्रेमा पुरव ने निर्वासन के बाद मुंबई आकर देखा कि मिलें बन्द हो रही हैं, कारोबार ठप्प हो रहे हैं बेरोजगारी बढ़ रही है। उन्होने 14 महिलाओं को साथ लिया और बैंक ऋण दिलाकर अन्नपूर्णा महिला संगठन की स्थापना की। महिलाओं की यह संस्था आज देश की जानी-मानी संस्था है जिसने भोजन, इरेडियेटेड मसाले आदि बनाकर कई क्षेत्रों में काम का विस्तार किया। सतारा जिले में भी मंडल का एक ट्रेडिंग सेंटर चल रहा है। आज करीब 2 लाख महिलाएँ मंडल की सदस्य हैं। प्रेमा पुरव पद्मश्री सहित 40 पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी हैं।
ऐसी ही एक ‘मजलिश‘ नामक संस्था है, जिसकी स्थापना 1990 में फ्लेविया एग्नेस ने इस उद्देश्य से की थी कि यह संस्था घरेलू हिंसा, शोषण आदि से पीड़ित महिलाओं मदद करेगी। फ्लेविया एग्नेस खुद घरेलू हिंसा की शिकार थी। दिन-रात पति के द्वारा मारपीट और अपमान उसकी जिंदगी के अँग बन गये थे। आधी-आधी रात गये बच्चों के साथ घर से निकाल देना भी कोई नई बात न थी। 13 सालों तक अत्याचार सहने के बाद फ्लेविया के अंदर स्वाभिमान जागा। न ऊँची शिक्षा, न जेब में फूटी कौड़ी। सिर्फ और सिर्फ आत्मविश्वास की पूंजी लेकर कूद पड़ी कुछ करने को...अपनी पहचान बनाने को, स्वाभिमान से जीने को। उसने एम.एल. बी. किया और अपनी ही तरह पीड़ित महिलाओं को जगाने के लिए ‘मजलिस ‘ नामक संस्था की स्थापना की।
जहाँ आज भी रूढ़िवादी समाज में बेटी को बोझ समझा जात है...कहा जाता है कि बेटी का व्याह हो जाये तो समझो गंगा नहा ली...बचपन से उसके मन में कूट-कूट कर भरा जाता है कि उसका ठिकाना केवल पति का घर है, क्योंकि वह घर से बाहर की संघर्षमय जिन्दगी का मुकाबला नहीं कर सकती...क्योंकि वह शरीर से कोमल , नाजुक और लगभग कमजोर है अतः उसे पिता, भाई, पति, और बेटे के अधीन ही रहना होगा। ऐसे में जब उभरती हैं राजनीति, समाज, कानून, चिकित्सा, ज्ञान-विज्ञान, खेल, कला, संस्कृति, सौंदर्य, तकनीकि, अंतरिक्ष के क्षेत्र में महिलायें...यहाँ तक कि जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष, परिश्रम और गुणों के बल पर पहुंचकर सफलता के परचम लहराती हैं तो क्या तब भी समाज उन्हें बोझ समझेगा? तब तो समाज की मानसिकता ही बोझ है...बोझ है उसकी समझ, उसके विचार...स्वयं को उत्कृष्ट, सुपीरियर समझने की पुरुष की तंग सोच...तभी तो जेसिका लल जैसी निर्दोष युवती को गोली मार दी जाती है...गुनाह! बिगड़े रईसजादे को माँगने पर शराब नहीं परोसना क्योंकि नियमानुसार बार का समय खत्म हो चुका था। जिस पर ताकतवर हत्यारा पुरुष भन्नाया कि “ ऐ कमजोर लड़की, तेरी ये हिम्मत, ये अकड़, हमारी ऐसी तौहीन। नहीं देती तो ले खा गोली। जा...सो आराम से और उन तमाम लड़किओं को जगा, जो इस तरह रोजी-रोटी कमाती हैं कि वे कभी अपने जीवन में ऐसी जुर्रत न करें।“
लेकिन लड़कियों का हौसला देखिये कि वे ऐसी जुर्रत करती हैं बल्कि उससे भी बढ़कर...वे सेना में भर्ती होती हैं...नेपाल की शाही सेना में पहली बार योद्धाओं के रूप में लड़कियों को भरती करने का ऐतिहासिक कदम उठाया गया। वे लेफ्टिनेंट कमांडर के पद पर आसीन होती है और आतंकवादियों का मुकाबला करती हैं...एक पैर हादसे में खोकर भी अनवरत् नृत्य करने वाली नृत्यांगना सुधाचंद्रन को कौन नहीं जानता? और ये उँगलियों पर गिने जाने वाले चंद नाम नहीं हैं...इन क्षेत्रों में लगभग पुरुषों की बराबरी की है बल्कि कई क्षेत्रों में तो पुरुषों से भी बढ़कर गिनती है महिलाओं की। इसीलिए-
मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो।
पर वे बुजुर्ग कह रहे थे- आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी।
नाक उनकी काफी लंबी थी। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाजत सबसे ज्यादा इसी देश में होती है। और या तो नाक बहुत नर्म होती है या छुरा बहुत तेज, जिससे छोटी सी बात से भी नाक कट जाती है। छोटे आदमी की नाक बहुत नाजुक होती है। यह छोटा आदमी नाक को छिपाकर क्यों नहीं रखता?
कुछ बड़े आदमी, जिनकी हैसियत है, इस्पात की नाक लगवा लेते हैं और चमड़े का रंग चढ़वा लेते हैं। कालाबाजार में जेल हो आए हैं औरत खुलेआम दूसरे के साथ ‘बाक्स’ में सिनेमा देखती है, लड़की का सार्वजनिक गर्भपात हो चुका है। लोग उस्तरा लिए नाक काटने को घूम रहे हैं। मगर काटें कैसे? नाक तो स्टील की है। चेहरे पर पहले जैसी ही फिट है और शोभा बढ़ा रही है।
स्मगलिंग में पकड़े गये हैं। हथकड़ी पड़ी है। बाजार में से ले जाये जा रहे हैं। लोग नाक काटने को उत्सुक हैं। पर वे नाक को तिजोरी मे रखकर स्मगलिंग करने गये थे। पुलिस को खिला-पिलाकर बरी होकर लौटेंगे और फिर नाक पहन लेंगे।
जो बहुत होशियार हैं, वे नाक को तलवे में रखते हैं। तुम सारे शरीर में ढूंढ़ो, नाक ही नहीं मिलती। नातिन की उम्र की दो लड़कियों से बलात्कार कर चुके हैं। जालसाजी और बैंक को धोखा देने में पकड़े जा चुके हैं। लोग नाक काटने को उतावले हैं, पर नाक मिलती ही नहीं। वह तो तलवे में है। कोई जीवशास्त्री अगर नाक की तलाश भी कर दे तो तलवे की नाक काटने से क्या होता है? नाक तो चेहरे पर की कटे, तो कुछ मतलब होता है।
और जो लोग नाक रखते ही नहीं हैं, उन्हें तो कोई डर ही नहीं है। दो छेद हैं, जिनसे सांस ले लेते हैं।
कुछ नाकें गुलाब के पौधे की तरह होती हैं। कलम कर दो तो और अच्छी शाखा बढ़ती है और फूल भी बढि़या लगते हैं। मैंने ऐसी फूलवाली खुशबूदार नाकें बहुत देखीं हैं। जब खुशबू कम होने लगती है, ये फिर कलम करा लेते हैं, जैसे किसी औरत को छेड़ दिया और जूते खा गये।
‘जूते खा गये’ अजब मुहावरा है। जूते तो मारे जाते हैं। वे खाये कैसे जाते हैं? मगर भारतवासी इतना भुखमरा है कि जूते भी खा जाता है।
नाक और तरह से भी बढ़ती है। एक दिन एक सज्जन आये। बड़े दुखी थे। कहने लगे- हमारी तो नाक कट गयी। लड़की ने भागकर एक विजातीय से शादी कर ली। हम ब्राह्मण और लड़का कलाल! नाक कट गयी।
मैंने उन्हें समझाया कि कटी नहीं है, कलम हुई है। तीन-चार महीनों में और लंबी बढ़ जाएगी।
तीन-चार महीने बाद वे मिले तो खुश थे। नाक भी पहले से लंबी हो गयी थी। मैंने कहा- नाक तो पहले से लंबी मालूम होती है।
वे बोले- हां, कुछ बढ़ गयी है। काफी लोग कहते हैं, आपने बड़ा क्रांतिकारी काम किया। कुछ बिरादरी वाले भी कहते हैं। इसलिए नाक बढ़ गयी है।
कुछ लोग मैंने देखे हैं जो कई साल अपने शहर की नाक रहे हैं। उनकी नाक अगर कट जाए तो सारे शहर की नाक कट जाती है। अगर उन्हें संसद का टिकिट न मिले, तो सारा शहर नकटा हो जाता है। पर अभी मैं एक शहर गया तो लोगों ने पूछा- फलां साहब के क्या हाल हैं? वे इस शहर की नाक हैं। तभी एक मसखरे ने कहा- हां साहब, वे अभी भी शहर की नाक हैं, मगर छिनकी हुई।(यह वीभ्त्स रस है। रस सिद्धांत प्रेमियों को अच्छा लगेगा।)
मगर बात मैं उन सज्जन की कर रहा था जो मेरे सामने बैठे थे और लड़की की शादी पुराने ठाठ से ही करना चाहते थे। पहले वे रईस थे- याने मध्यम हैसियत के रईस। अब गरीब थे। बिगड़ा रईस और बिगड़ा घोड़ा एक तरह के होते हैं- दोनों बौखला जाते हैं। किससे उधार लेकर खा जाएं, ठिकाना नहीं। उधर बिगड़ा घोड़ा किसे कुचल दे, ठिकाना नहीं। आदमी को बिगड़े रईस और बिगड़े घोड़े, दोनों से दूर रहना चाहिए। मैं भरसक कोशिश करता हूं। मैं तो मस्ती से डोलते आते सांड को देखकर भी सड़क के किनारे की इमारत के बरामदे में चढ़ जाता हूं- बड़े भाईसाहब आ रहे हैं। इनका आदर करना चाहिए।
तो जो भूतपूर्व संपन्न बुजुर्ग मेरे सामने बैठे थे, वे प्रगतिशील थे। लड़की का अन्तरजातीय विवाह कर रहे थे। वे खत्री और लड़का शुद्ध कान्यकुब्ज। वे खुशी से शादी कर रहे थे। पर उसमें विरोधाभास यह था कि शादी ठाठ से करना चाहते थे। बहुत लोग एक परंपरा से छुटकारा पा लेते हैं, पर दूसरी से बंधे रहते हैं। रात को शराब की पार्टी से किसी ईसाई दोस्त के घर जा रहे हैं, मगर रास्ते में हनुमान का मंदिर दिख जाए तो थोड़ा तिलक भी सिंदूर का लगा लेंगे। मेरा एक घोर नास्तिक मित्र था। हम घूमने निकलते तो रास्ते में मंदिर देखकर वे कह उठते- हरे राम! बाद में पछताते भी थे।
तो मैं उन बुजुर्ग को समझा रहा था- आपके पास रुपये हैं नहीं। आप कर्ज लेकर शादी का ठाठ बनायेंगे। पर कर्ज चुकायेंगे कहां से? जब आपने इतना नया कदम उठाया है, कि अन्तरजातीय विवाह कर रहे हैं, तो विवाह भी नये ढंग से कीजिए। लड़का कान्यकुबज का है। बिरादरी में शादी करता तो कई हजार उसे मिलते। लड़के शादी के बाजार में मवेशी की तरह बिकते हैं। अच्छा मालवी बैल और हरयाणा की भैंस ऊंची कीमत पर बिकती हैं। लड़का इतना त्याग तो लड़की के प्रेम के लिए कर चुका। फिर भी वह कहता है- अदालत जाकर शादी कर लेते हैं। बाद में एक पार्टी कर देंगे। आप आर्य-समाजी हैं। घण्टे भर में रास्ते में आर्यसमाज मंदिर में वैदिक रीति से शादी कर डालिए। फिर तीन-चार सौ रुपयों की एक पार्टी दे डालिए। लड़के को एक पैसा भी नहीं चाहिए। लड़की के कपड़े वगैरह मिलाकर शादी हजार में हो जाएगी।
वे कहने लगे- बात आप ठीक कहते हैं। मगर रिश्तेदारों को तो बुलाना ही पड़ेगा। फिर जब वे आयेंगे तो इज्जत के ख्याल से सजावट, खाना, भेंट वगैरह देनी होगी।
मैंने कहा- आपका यहां तो कोई रिश्तेदार है नहीं। वे हैं कहां?
उन्होंने जवाब दिया- वे पंजाब में हैं। पटियाला में ही तीन करीबी रिश्तेदार हैं। कुछ दिल्ली में हैं। आगरा में हैं।
मैंने कहा- जब पटियाला वाले के पास आपका निमंत्रण-पत्र पहुचेगा, तो पहले तो वह आपको दस गालियां देगा- मई का यह मौसम, इतनी गर्मी। लोग तड़ातड़ लू से मर रहे हैं। ऐसे में इतना खर्च लगाकर जबलपुर जाओ। कोई बीमार हो जाए तो और मुसीबत। पटियाला या दिल्ली वाला आपका निमंत्रण पाकर खुश नहीं दुखी होगा। निमंत्रण-पत्र न मिला तो वह खुश होगा और बाद में बात बनायेगा। कहेगा- आजकल जी, डाक की इतनी गड़बड़ी हो गयी है कि निमंत्रण पत्र ही नहीं मिला। वरना ऐसा हो सकता था कि हम ना आते।
मैंने फिर कहा- मैं आपसे कहता हूं कि दूर से रिश्तेदार का निमंत्रण पत्र मुझे मिलता है, तो मैं घबरा उठता हूं।
सोचता हूं- जो ब्राह्मण ग्यारह रुपये में शनि को उतार दे, पच्चीस रुपयों में सगोत्र विवाह करा दे, मंगली लड़की का मंगल पंद्रह रुपयों में उठाकर शुक्र के दायरे में फेंक दे, वह लग्न सितंबर से लेकर मार्च तक सीमित क्यों नहीं कर देता ? मई और जून की भयंकर गर्मी की लग्नें गोल क्यों नहीं कर देता ? वह कर सकता है। और फिर ईसाई और मुसलमानों में जब बिना लग्न शादी होती है, तो क्या वर-वधू मर जाते हैं ? आठ प्रकार के विवाहों में जो ‘गंधर्व विवाह’ है वह क्या है ? वह यही शादी है जो आज होने लगा है, कि लड़का-लड़की भागकर कहीं शादी कर लेते हैं। इधर लड़की का बाप गुस्से में पुलिस में रिपोर्ट करता है कि अमुक लड़का हमारी ‘नाबालिग’ लड़की को भगा ले गया है। मगर कुछ नहीं होता; क्योंकि लड़की मैट्रिक का सर्टिफिकेट साथ ले जाती है जिसमें जन्म-तारीख होती है।
वे कहने लगे- नहीं जी, रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी।
मैंने कहा- पटियाला से इतना किराया लगाकर नाक काटने इधर कोई नहीं आयेगा। फिर पटियाला में कटी नाक को कौन इधर देखेगा। काट लें पटियाला में।
वे थोड़ी देर गुमसुम बैठे रहे।
मैंने कहा- देखिए जी, आप चाहें तो मैं पुरोहित हो जाता हूं और घण्टे भर में शादी करा देता हूं।
वे चौंके। कहने लगे- आपको शादी कराने की विधि आती है ?
मैंने कहा- हां, ब्राह्मण का बेटा हूं। बुजुर्गों ने सोचा होगा कि लड़का नालायक निकल जाए और किसी काम-धन्धे के लायक न रहे, तो इसे कम से कम सत्यनारायण की कथा और विवाह विधि सिखा दो। ये मैं बचपन में ही सीख गया था।
मैंने आगे कहा- और बात यह है कि आजकल कौन संस्कृत समझता है। और पण्डित क्या कह रहा है, इसे भी कौन सुनता है। वे तो ‘अम’ और ‘अह’ इतना ही जानते हैं। मैं इस तरह मंगल-श्लोक पढ़ दूं तो भी कोई ध्यान नहीं देगा-
ओम जेक एण्ड जिल वेंट अप दी हिल टु फेच ए पेल ऑफ वाटरम,
आफ्टर कुर्यात् सदा मंगलम्........इसे लोग वैदिक मंत्र समझेंगे।
वे हंसने लगे।
मैंने कहा- लड़का उत्तर प्रदेश का कान्यकुब्ज और आप पंजाब के खत्री- एक दूसरे के रिश्तेदारों को कोई नहीं जानता। आप एक सलाह मेरी मानिए। इससे कम में भी निपट जाएगा और नाक भी कटने से बच जाएगी। लड़के के पिता की मृत्यु हो चुकी है। आप घण्टे भर में शादी करवा दीजिए। फिर रिश्तेदारों को चिट्ठियां लिखिए- ‘इधर लड़के के पिता को दिल का तेज दौरा पड़ा। डाक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी। दो-तीन घंटे वे किसी तरह जी सकते थे। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि मृत्यु के पहले ही लड़के की शादी हो जाए तो मेरी आत्मा को शान्ति मिल जाएगी। लिहाजा उनकी भावना को देखते हुए हमने फौरन शादी कर दी। लड़का-लड़की वर-वधू के रूप में उनके सामने आये। उनसे चरणों पर सिर रखे। उन्होंने इतना ही कहा- सुखी रहो। और उनके प्राण-पखेरू उड़ गये। आप माफ करेंगे कि इसी मजबूरी के कारण हम आपको शादी में नहीं बुला सके। कौन जानता है आपके रिश्तेदारों में कि लडंके के पिता की मृत्यु कब हुई ?
उन्होंने सोचा। फिर बोले- तरकीब ठीक है ! पर इस तरह की धोखाधड़ी मुझे पसंद नहीं।
खैर मैं उन्हें काम का आदमी लगा नहीं।
दूसरे दिन मुझे बाहर जाना पड़ा। दो-तीन महीने बाद लौटा तो लोगों ने बताया कि उन्होंने सामान और नकद लेकर शादी कर डाली।
तीन-चार दिन बाद से ही साहूकार सवेरे से तकादा करने आने लगे।
रोज उनकी नाक थोड़ी-थोड़ी कटने लगी।
मैंने पूछा- अब क्या हाल हैं ?
लोग बोले- अब साहूकार आते हैं तो यह देखकर निराश लौट जाते हैं कि काटने को नाक ही नहीं बची।
मैंने मजाक में कहा- साहूकारों से कह दो कि इनकी दूसरी नाक पटियाला में पूरी रखी है। वहां जाकर काट लो।
एक छोटी सी लड़की है .उसका नाम है अन्वी .अन्वी छेः साल की है.अन्वी बहुत प्यारी लड़की है .अपने माँ पिता और भाई के साथ डेनटन में रहती है . उस की एक गन्दी आदत थी जब भी वो कंही अपने माँ पिता के साथ जाती थी तो पार्किग की जगह पर खेलने लगती थी माँ ने उसे बहुत बार समझाया कहा "अन्वी पार्किंग की जगह खेलने की नही होती है "पर वो मानती नही थी .एक दिन वो अपने पापा के साथ वालमार्ट गई सामान खरीदने के बाद उस की नजर एक बहुत सुंदर डॉल पे पड़ी उस ने पापा से कहा "पापा प्लीज ये मेरे लिए ले लीजिये " पापा ने वो डॉल ले ली अन्वी बहुत खुश थी। .सामान ले के अन्वी पापा के साथ .बाहर निकली पापा के साथ चलते चलते कार के पास आई ।.पापा कार में सामान रखने लगे और अन्वी अपनी आदत के अनुसार वंही पार्किंग की जगह में अपनी डॉल के साथ खेलने लगी । .पापा सामान रखने में लगे थे उन्होंने ध्यान नही दिया । .तभी एक कार ने जो की पीछे कर रहा था देखा नही। अन्वी को टक्कर मारी अन्वी गिर गई। उस को थोडी चोट लगी पर उस की डॉल टूट गई। .अन्वी को बहुत दुःख हुआ। पापा ने देखा और अन्वी को उठा लिया । प्यार किया अन्वी रो रही थी चोट से नही उस की डॉल जो टूट गई थी उस लिए । पापा ने कहा की देखो तुम को माँ ने कितनी बार समझाया है की पार्किंग में नही खेलते पर तुम समझती नही। अन्वी को अपनी गलती का अहसास हो गया था, उस ने कहा की अब वो ऐसा नही करेगी।
हे भगवान
तुमने प्यारी दुनिया बनाईं सुंदर रंगों से है सजाई मुझको तुम एक बात बता दो इतने रंग लाये कहाँ से उस दुकान का पता बतादो क्रेयौन्स है या वाटर कलर हम को बस इतना समझा दो कैसे रँगा फूलों को जिराफ, ज़ीब्रा चिड़ियों को मैं भी अच्छी पेंटर बन जाऊँ पेंटिंग के कुछ गुण सिखा दो ।
मुझ को पंख चाहिए
चिडिया रानी चिडिया रानी तुम रोज पेड़ पर आती हो पंचम सुर में न जाने ये गीत कौन से गाती हो दाना चुग के चुप के से फुर फुर कर उड़ जाती हो पास आओ एक बात बताओ न कहाँ से लाई ये सुन्दर पंख मुझको ये समझाओ न वालमार्ट है या टारगेट चिल्ड्रन्स प्लेस या टौय्स आर एस किस दुकान से पर लाती हो नाम उस का बताओ न मै भी खरीद के पंख लाऊंगा संग तेरे मै उड़ जाऊंगा दूर गगन की सैर कर के चाँद तारों के छू आऊंगा बात मेरी सुन के तुम क्यों इतना मुस्काती हो तुम्हारे पास हैं पंख इस लिए इतराती हो . बात नहीं है ये प्यारे दुकान पर मिलते नहीं है ये पंख हमारे ईश्वर की है देन ये कुदरत का ईनाम हम को दिए पंख तुम को बुद्धि ज्ञान
समझ गया मै बात तुम्हारी अलग अलग है पहचान हमारी मै धरा का राजा हूँ तुम हो गगन की रानी दोनों की उडान अलग बात यही है सयानी