" पिचकारी यह रंग बिरंगी लाल गुलाबी प्यार भरी पीली एक उमंगों वाली और हरी हरियाली-सी महकी-महकी यादोंभीगी खुशियां बन तुमतक जाए!"
शैल अग्रवाल
(हास्य-व्यंग्य विशेषांक)
अंक-1-वर्ष-3 -2009
कविता आज और अभीः कुसुम सिन्हा, मीनू अग्रवाल शैल अग्रवाल, हुल्लड़ मुरादाबादी, त्रिशूल कार्तिकेय । माह के कविः अनिल जोशी। कविता धरोहरः काका हाथरसी। माह विशेषः डंडा बनारसी, त्रिशूल कार्तिकेय, चकाचौंध ज्ञानपुरी। बाल कविताः बालस्वरूप राही, योगेन्द्र कुमार लल्ला।
कहानीःशिव कुमार। उपन्यास का अंशः भाग 18। दो लघु कथाएँ: हरिशंकर परसाई, शैल अग्रवाल। मंथनःशेरजंग गर्ग। रागरंगः श्रीलाल शुक्ल। मुद्दाःअखतर अली। साक्षात्कारः नरेन्द्र कोहली।दृष्टिकोणः प्रेम जनमजेय। रपटः शैल अग्रवाल। परिचर्चाः वीरेन्द्र यादव। पडतालः अशोक आनन्द। होली-विशेषः महेन्द्र भटनागर, कवि कुलवंत, शैल अग्रवाल, रचना श्रीवास्तव और श्यामसुन्दर दुबे। चांद परियां और तितलीः अकबर और बीरबल की कहानी। व नई खबरों से भरपूर रंगारंग विविधा।
Discource: Mark Twain. Favourites Forever: Spike Milligan. Poetry Here & Now: Kopan Mahadeva. Story: Mark Twain, Wide Angle: S Mitra Kalita. Kids'Corner: Rachna Kilaru, Shail Agrawal, Shel Silverstein .
तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रही है लेखनी। तीसरा वर्ष जब तोतला ही सही, भाषा बोध होने लगता है। लेखनी भी मुखरित हो रही है! प्रयास यही रहा है कि अंतस् को छुआ जाए...पूजा-पाठ-सी निष्ठा के साथ। नए वर्ष का स्वागत करता हुआ लेखनी का यह पच्चीसवां अंक आपको कहकहों और मुस्कानों में डुबोना चाहता है। निदा फाजली के शब्दों में कहूं तो शायद ज्यादा सही होगा...घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें। किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाए॥ (बच्चा यानी पाठक, हमारे संदर्भ में तो... हर उम्र का।) होली और हास्य का चोली-दामन का साथ रहा है और शायद यही वजह है कि मीठी गुंजियों और मीठी गालियों व भांति-भांति की रंगीन छींटाकशी के साथ -साथ होली पर मूर्खाधिवेशन और हास्य कवि-सम्मेलनों की परम्परा भी उतनी ही पुरजोर और प्रचलित रही है जितना कि यह खुद होली का रंग-बिरंगा त्योहार। मेल-मिलाप और भाईचारे के इस पर्व के बारे में तो यहां तक कहा जाता रहा है कि इस दिन तो दुश्मन तक अपनी सारी रंजिशें भूल और भुला कर एक-दूसरे के गले मिलते हैं, गुलाल लगाते हैं।
भंग का रंग हो या उड़ते अबीर गुलाल का...गमकता केसर गुलाब और पारिजात हों या चटक पीला टेसू, हमारे यहां तो तबतक सरोबार किया जाता है, जबतक कि आदमी तन-मन सहित रंगों में डूब न ले। इससे भी बात न बने तो फिर न छूटने वाले पक्के रंगों का इस्तेमाल होता है, अड़ियलों के लिए...और तब तो कुछ भी और सबकुछ चलता है।...हरे, नीले, गुलाबी रंगों के साथ-साथ अल्मूनियम पेन्ट, रंगभरे गुब्बारे, जूतापॉलिश पेन्ट...सभी कुछ। हास-परिहास भी तो कुछ -कुछ ऐसा ही करता है समाज के साथ! समाज की, आसपास की विसंगतियों और कुरीतियों को पहचानकर, उन्हें इंगित करना, दूर करने के लिए कटिबद्ध होना, हर सजग का कर्तव्य है; आज के प्रणेता कवि श्री अशोक चक्रधर जी सुधी-समाज का आवाहन करते हुए, कुछ ऐसे ही सचेत करते हैं-
'' अरे ओ मूढ़मता!
शायद तुझे ये नहीं पता
कि इन गुदगुदी कुर्सियों पर
बैठकर ये लोग
सत्ता के नशे में झूल जाते हैं
और हम तुम जैसे
कुर्सियां बनानेवालों को
भूल जाते हैं
इसीलिए,
कुर्सियां गुदगुदी मत बना,
हो सके तो इनमें
खड़ी आलपिन लगा।''
-अशोक चक्रधर
रागरंग की तरह ही, हास-व्यंग्य भी, चाहें न चाहें, देखें या न देखें, कोने-कोने बिखरा है जीवन में, हमारे समाज में। हास्य-व्यंग्य से भरी टिप्पणियां कहीं भी पीछा नहीं छोड़तीं, क्योंकि जहाँ मुर्दों तक की जान खतरे में हो, वहां तो जो न पकड़ा जाए वही साधू है और चार अंधों में काने का राज्याभिषेक होगा ही। लोकोत्तियां, मुहावरे और नीतिकथाओं के रूप में हास्य- चित्रण व शब्दांकन, पग-पग और यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखता रहता है; चाहे वह बिल्लियों के झगड़े में बन्दर बांट की बातें हों, या फिर लोमड़ी के खट्टे अंगूरों की; चाहे हम 'आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी रहै न पूरी पावै,' की क्रिया-प्रक्रिया देख रहे हों, या ' अपना उल्लू सीधा करने के लिए ' ' गधे को बाप बनाने की ' या फिर मात्र ' टेढ़ी उँगली से घी निकालने की ' या 'नाच न आवै आंगन टेढ़ा ' की ही, क्यों नहीं।
' सैंया भए कोतवाल तो हमें डर काहे का ' जैसी हास्यास्पद कुसंगतियां और विसंगतियां तो समाज में सदैव से ही रही हैं और रहेंगी ही, क्योंकि ' पांचों उंगलियां तो भगवान ने भी बराबर की नहीं बनाई'। जब आज भी जाने कितनों ने ' अँधे के आगे रोकर' अपने 'नैन खोए' हैं तो हम आप कैसे अकेले-अकेले भाड़ फोड़ सकते हैं। विसंगतियों के साथ कैसे भी जीना सीख ही लेता है आदमी और उसका बनाया यह भद्र समाज। आजभी जाने कितने ' धोबी के कुत्ते, घर के न घाट के' बने दरदर भटक रहे हैं और आज भी न जाने कितने गधे इंसान के रूप में आखिरी सांस तक जीवन का बोझ ढोए जा रहे हैं, कोल्हू के बैल से पिस रहे हैं, जब कि उनके बगल में ही कहीं कोयल के अंडों को कौवे सींच रहे हैं तो कहीं पीतल पर सोने के मुलम्मे पर मुलम्मे चढ़ाकर असल रूप में बेचा जा रहा है।...' लाठी वाला ही' तो आज भी ' भैंस हांकता है' और हम सब जो 'आंख के अंधे हैं ', ' नाम नयनसुख ' पाकर ही खुश भी तो है।
पर, यही हास-परिहास, कहीं उपहास न बन जाए, यह एक व्यंग्यकार की बड़ी जिम्मेदारी होती है। ध्यान न दिया जाए तो आक्रामक या बेहद करुण या कठोर होते हुए भी इसे देर नहीं लगती ... कभी-न-कभी कुछ पढ़ते-लिखते, आम जिन्दगी से जीते- गुजरते हम सभी ने यह महसूस किया ही होगा।
पर, व्यक्तिगत चोट और तमाचे की तिलमिलहट नहीं है, हास-परिहास। उत्कृष्ठ साहित्य उठाता है, गिराता नहीं।...व्यक्ति को भी नहीं और मन को भी नहीं, चाहे वह हास्य व्यंग्य ही क्यों न हो! माना, सामाजिक और व्यक्तिगत दोनों ही परिस्तिथियों में हास्य की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता, परन्तु यह भी एक गंभीर दायित्व है और किसी भी अन्य सशक्त औजार की तरह ही, इसका भी सटीक उपयोग बेबजह और हर समय नहीं किया जा सकता है... और ना ही बिना सीखे और सोचे-समझे बगैर ही।
गुलाबी, नीला, काला कई-कई रंगों का हास्य आदि काल से ही हमारे बीच रहा है...एक-एक चुटकुले और कहकहे के बीच रचा-गुंथा, बात फिर अब चाहे किसी भी युग, या समय की क्यों न रही हो। एक सेव के स्वाद में भटक कर एडम और ईव का यूं स्वर्ग छोड़ आना, दशरथ की एक भूल का भुगतान पूरे परिवार को वन-वन भटक कर और उनके वंशजों द्वारा आजीवन भरते रह जाना, द्रोपदी की एक ठिठोली पर पूरा महाभारत मच जाना; और ट्विन टावर के उड़ते ही सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था का ताश के पत्ते-सा ढह जाना... सोचो तो हास्यास्पद ही परिणाम तो हैं जीवन के..'.कौमेडी ऑफ एरर ' ।
हास्य की जरूरत मानव समाज को सदा रहती है और रहेगी ही; इसीके सहारे तो चोटकर खाकर आदमी हो या समाज फिरसे उठने की शक्ति ढूंढ पाता है। आसपास का, बीच का कूड़ा साफ कर पाने का साहस जुटा पाता है...पीड़ा और अपमान को भूल पुनः संगठित होता है...मुहावरों के शब्दों में कहूं तो पुनः मुंह दिखा पाता है। हास्य का उपयोग मानसिक रोगियों के उपचार तक के लिए मध्यकालीन युग से ही किया जाता रहा है। कहते हैं आदमी जब हंसता है तो शरीर का एक-एक स्नायु तनावमुक्त हो जाता है और सारी थकी मांसपेशियां फिरसे आराम की स्थिति में आकर पुनः स्वस्थ व लचीली होने लगती हैं। आधुनिक जीवनशैली में तनाव से मुक्ति की कितनी जरूरत है, यह अब कोई कहने या लिखने की बात नहीं रह गई । मुश्किल तो बस इतनी-सी है कि अन्य संवेदनाओं की तरह ही हास्य भी एक व्यक्तिगत रुचि और अनुभव ही तो है। किसको किस बात से गुदगुदी होगी, कौन कब गमक उठेगा, यह कारक भी तो इतना ही विस्तृत और भिन्न है जितना कि खुद भिन्न-भिन्न रूप और स्वभाव वाला आदमी, या फिर उसके द्वारा संजोए रीति-रिवाज व मान्यताएं... संस्कृति और प्रचलन...विविध व बहुरूपी समाज ! इसी संदर्भ में याद आ रहा है काका हाथरसी का धमधूसर कव्वाल, जिसे स्टेशन से घर तक ले जाने के लिए तांगे वाले ने दुगने किराए की मांग की थी क्योंकि एक नहीं दो चक्करों में ही वह उसे घर ले जा पाता, या फिर सुरेन्द्र शर्मा का वह बच्चा जो बड़े के इतिहास और भूगोल के भारी-भारी प्रश्नों से तंग आकर, एक दिन उसी का ज्ञान जांचते-जांचते, उससे रामलाल के बारे में पूछ बैठता है। प्रस्तुत है ब्रिटेन के जाने माने कवि पद्मेशगुप्त का एक हंसाता चुटकी लेता दोहाः
'' सीता बोली राम से, अच्छा है यह बनवास
कौन भुगतता वहां भला, तीन-तीन थीं सास। ''
या फिर त्रिशूल कार्तिकेय की कविता ' कविता की स्वर्ण जयन्ती ' । जीवन में भी ऐसी स्वर्ण जयन्तियां आपने भी बहुत देखी, सुनी और मनाई होंगी-
'' एक तथाकथित
अखिल भारतीय कवि ने
अपनी इकलौती कविता
काव्य-मंच पर
पचासवीं बार सुनायी
श्रोताओं ने-
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ
कविता की 'स्वर्ण जयन्ती ' मनाई ''
कैसे भी आए हंसी, यदि एक भी उदास को हंसाया जा सके, उसकी भूल और कुरूपताओं का..विसंगतियों का अहसास दिलाया जा सके, तो यह एक बड़ी उपलब्धि है।
होली की अनेक शुभकामनाओं के साथ लेखनी ने आपके लिए एकबार फिर से कुछ ऐसे ही मन को छू लेने वाले उन्मादी और हर्षोल्लास भरे, हंसते-गुदगुदाते पल संजोए हैं; उम्मीद है हर रुचि के पाठक के होठों पर एक-न-एक तो अवश्य ही स्मिति रेखा बनकर खिलेगा ही।...
.... शिवरात्रि आपका जीवन भी शिवमय रखे, जीवन के सौंदर्य को अपनी पूरी सच्चाई के साथ कोमल और सुकुमार बनाए रखे व होली का पर्व शुभ व उल्लास...नित नए जोश में डूबा हो, फाग के इस रंगारंग महीने में मुठ्ठी भर गुलाल में लिपटी इन्ही इन्द्रधनुषी शुभकामनाओं के साथ आपसे विदा लेती हूं.।
हां,..अंक के बारे में प्रतिक्रिया देना मत भूलिएगा। सदैव की भांति ही, पत्र और प्रतिक्रियाओं का... आपके स्नेह,सहयोग व सुझाव का, बेसब्री से इन्तजार रहता है!
राधाकृष्ण के जनकपुरी, दिल्ली में डुप्लेक्स मकान खरीदे जाने हेतु किए जा रहे निवेष को बड़ी बारीकी से मुआयना करने के बाद टेक्स कंसल्टेंट ने कहा,”कम से कम दस हजार रुपया मासिक किराए की अपेक्षा तो की जा सकती है।“ अपनी संपत्ति का समुचित रिटर्न पाने के लिए ‘ हिन्दुस्तान टाइम्स ‘ में कतिपय विज्ञापन भी देने की सलाह दी गई।
पर जब उसका पुराना कॉलेज का साथी प्रेम, एक किराएदार को ले आया, तो उसकी सारी योजना बिखर गयी। वह आदमी अपनी पत्नी के साथ आया था-जो बड़ी आकर्षक लग रही थी-जिसके होंठ ट्यूलिप जैसे थे और आँखें किसी को भी समर्पण के लिए बाध्य कर सकती थीं। एक क्षण के लिए तो राधाकृष्ण को लगा कि प्रेम यह सब उस महिला की कृपादृष्टि पाने के लिए कर रहा है। प्रेम कॉलेज के दिनों से ही अपनी चंचल दृष्टि के लिए जाना जाता था। पर जब संगीता ने सम्मोहन भरी नजरों से राधाकृष्ण की ओर देखा तो उसे अपना रक्षा कवच टूटता-सा लगा।
जब किराए की शर्तों की बातें होने लगी तो सारी बातचीत संगीता ने ही की। उसका पति डमी की तरह एक कोने में बैठा रहा।
‘‘ ऐसी डीलिंग्स में पैसा ही एकमात्र क्राइटेरिया नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसे में दूसरी बातें भी महत्वपूर्ण होती हैः जैसे संपत्ति की देखरेख तथा मकान मालिक व किराएदार के बीच के आत्मीय संबंध वगैरह।‘‘ संगीता मुस्कुराकर बोली।
अपनी आँखें संगीता के चेहरे पर घुमाते हुए राधाकृष्ण बोला, ‘‘ बिल्कुल ठीक कहा आपने। ‘‘
किसी संगीत रचना के आरंभिक स्वरों जैसे लगे राधाकृष्ण को उसके शब्द।
‘‘ क्या आप सात हजार रुपया किराए पर मानने की उदारता दिखलाएँगे? ” उसने बड़ी नम्रता से पूछा! वह आगे की ओर झुकी और होंठ ऐसे बनाए मानो वह उसका चुंबन लेना चाहती हो। ‘‘ और मत भूलना, मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी यदि आप पधारतें रहेंगे, किसी भी समय।‘‘ इस बात का समर्थन करते हुए प्रेम बोला ‘‘ मुझे यह बात जरूर कहनी चाहिए, वह बड़ी मेजबान हैं। क्योंकि ऐसे समय में किसी तरह की आनाकानी संभ्रांत नहीं लगेगी।‘‘ राधाकृष्ण ने मकान की चाबियां उस महिला के हाथों में थमा दीं। ‘‘ यह डुप्लेक्स अब आपका हुआ।‘‘ उसके चेहरे पर आंखें गड़ाए हुए राधाकृष्ण बोला।
‘ शायद यह डील मैने जल्दी में की ‘ उसने सोचा। एक क्षण के लिए उसे लगा, यदि उसका पुत्र स्वराज साथ होता तो निर्णय लेने में उसकी सहायता करता, लेकिन वह बिजनेस ट्रिप पर कानपुर गया हुआ था।
पहले तीन महीने उसे किराए के चक समय पर मिलते रहे, लेकिन इसके बाद अदृश्य स्याही के कुछ धब्बे दिखाई देने लगे। चौथा चेक न सिर्फ बाउंस हो गया, बल्कि किराएदार औरमालिक मकान मालिक के बीच का संपर्क भी टूटता-सा लगा। ‘ अब किराएदार से संपर्क करने का समय आ गया है‘, राधाकृष्ण ने सोचा।
उसने पन्नालाल को मिलने के समय हेतु फोन किया तो संगीता ने फोन उठाया।
अपनी आवाज में प्यार की चाशनी घोलते हुए संगीता ने कहा, ‘‘ दरअसल मैं आपसे मिलने को बड़ी आतुर हो रही हूं, शायद हम अपने बीच की गलतफहमी इससे दूर कर सकें, आज शाम को कैसा रहेगा ? ”
जब उसने दरवाजे की घंटी बजाई तो खूबसूरत मुस्कान के साथ संगीता ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। उसके पास ही एक बीस वर्षीय सुंदर युवा लड़की खड़ी थी।
‘‘मेरी बेटी शर्मीला ‘‘, उसने परिचय कराते हुए कहा, लड़की के होंठ मुस्कान से खिल उठे। शर्मीला ठीक अपनी माँ का प्रतिरूप थी। वही आँखें, वैसे ही होंठ, वैसी ही आकर्षक मुस्कान।
अपनी इंद्रधनुषी रेशमी साड़ी और कंधे पर झूलते मखमली घने बालों को संवारते हुए संगीता ने राधाकृष्ण को सोफे पर बैठने का इशारा किया। वह सौम्यतापूर्वक बैठ गया। ‘ उसे परिस्थिति के अनुकूल व्यवहार करना चाहिए‘, राधाकृष्ण ने सोचा।
‘‘ मेरे पति ने आपसे हार्दिक क्षमा मांगी है कि वे आज घर पर उपस्थित नहीं रह सके। उन्हें अचानक अपने एक दोस्त को देखने सफदरजंग अस्पताल जाना पड़ा, उसे दिल का दौरा पड़ा है‘‘, संगीता ने बात शुरू करते हुए कहा।
‘‘यह सुनकर बड़ा दुख हुआ‘‘, राधाकृष्ण ने कहा।
संगीता ने तब औपचारिकता निभाते हुए पूछा, “ वह क्या पसंद करेंगे स्कॉच या जिन ? “
“ नहीं कुछ नहीं, बस एक कप कॉफी“, उसने अचकचाते हुए उत्तर दिया।
“यह तो नीचे उतरना हुआ “, संगीता ने मुस्कुराते हुए कहा।
उसने शर्मीला से एक कप कॉफी बनाने को कहा और स्वयं उसके पास सोफे पर बैठ गई। राधाकृष्ण को लगा, वह एक तूफानी लहर में डूबने-उतराने लगा है।
आखिर यह क्या प्रभाव है, उसकी लहराती रेशमी साड़ी का, या किसी सुगंधित इत्र का? वह समझ न सका।
‘‘मुझे बड़ा खेद है, चेक के बाउंस होने का, और किराया देने में हुई देरी का ‘‘, उसने विनम्रतापूर्वक कहा।
‘‘क्या कहें, जर्मनी में हमारे व्यापार में साझेदार मित्रों ने हमें कहीं का न रखा। मुझे लगता है, उन्होंने जब हमारे माल का निर्यात किया तो हमारा पैसा चुकाने का ध्यान नहीं रखा। ‘‘ संगीता ने जब इस धोखाधड़ी के काग़ज़ दिखाने का प्रयत्न किया तो राधाकृष्ण अपना सिर हिलाता रहा।
इतनी उदारता और समझदारी के लिए राधाकृष्ण का धन्यवाद देते हुए संगीता ने उसका हाथ गर्मजोशी से अपने हाथ में लेकर दबाया तो राधाकृष्ण को अपने समग्र स्नायु तंत्र में बिजली दौड़ती-सी महसूस हुई। ‘‘मैं आपके साथ घटी अप्रत्याशित घटना के प्रति पूरी सहानुभूति महसूस करता हूँ, श्रीमती पन्नालाल...मैं प्रतीक्षा करूंगा... ‘‘
‘‘ मुझे संगीता ही बुलाइये, प्लीज‘‘, उसने नखरे दिखाते हुए कहा।
पाँच महीने के अंतराल के बाद राधाकृष्ण को बिजली विभाग से बकाया बिल तुरंत चुकाने का नोटिस मिला।वह तब अचानक इस बात से अवगत हुआ कि अंततः बिजली और पानी जैसी सेवाओं के बिल के भुगतान की जिम्मेदारी मकान मालिक की होती है।
राधाकृष्ण को अब यह आभास हुआ कि किराएदार की पत्नी ने उसे अपने रूपजाल में बांधकर, बाकी किराया चुकाए जाने के लिए अनंत काल की प्रतीक्षा के लिए बाध्य कर दिया है।
ऐसे में अपने बेटे को इस प्रकरण में ले आना एकमात्र विकल्प लगा उसे। उसके एकमात्र पुत्र स्वराज ने व्यापार संबंधी अनेक गुत्थियां सुलझाकर अपनी क्षमता का परिटय दिया था। उसे याद आया कैसे स्वराज ने एक बदमाश की पिटाई की थी जो पूर्वी दिल्ली स्थित प्लॉट पर राधाकृष्ण द्वारा कॉम्प्लेक्स बनाए जाने की योजना में रोड़े अटका रहा था। स्वराज ने उसे सारी शर्तें मानने को मजबूर कर दिया था।
एक दिन अचानक बिना सूचना दिए, जब स्वराज डुप्लेक्स पहुंचा तो उसने पिछले दरवाजे से एक आदमी को छोटी-सी गली में चुपचाप दुबकते देखा। बरामदे में खड़ी एक महिला को अपना परिचय देते हुए, कि वह राधाकृष्ण का बेटा है, उसने पन्नालाल के विषय में जानना चाहा।
‘‘मैं संगीता हूं, पन्नालाल की पत्नी‘‘, उसने कहा और बतलाया कि उसके पति भयंकर सिरदर्द के कारण डॉक्टर के पास गए हैं।
‘‘वैसे मैने तुम्हें गेट पर ही देख लिया था और तुरंत पहचान लिया था, तुम राधाकृष्ण के बेटे ही हो सकते हो, वैसे ही खूबसूरत दिखाई देते हो।‘‘
पर स्वराज के चेहरे की कठोरता वैसी ही बनी रही, क्योंकि वह अपना काम निकालने आया था, प्रशंसा की बाढ़ में बह जाने के लिए नहीं।
‘‘देखिए श्रीमती पन्नालाल, अब और इंतजार नहीं कर सकते हम। मेरे पिताजी कोई धर्मशाला नहीं चला रहे हैं।‘‘ वह सहज लहजे में बोला।
‘‘मैं समझती हूँ।‘‘ वह बोली, यह समझते हुए कि उसका पाला एक मजबूत आदमी से पड़ा है उसने धैर्यपूर्वक सोचते हुए कहा, ‘‘ ठीक है लेकिन पहले एकाध ड्रिंक तो लो, जॉनी वाकर या नेपोलियन कोनेक। हमें मेहमान नवाजी का मौका तो दो।‘‘
‘‘नहीं, धन्यवाद। अगर आप इतने कीमती ड्रिंक्स ऑफर कर सकती हैं, तो आपको अपना वादा भी निभाना चाहिए। ‘‘ स्वराज बोला।
‘‘ मैं वादा करती हूं। हम अपना वादा जरूर निभाएँगे। लेकिन आप इस विषय पर मेरी बेटी शर्मीला से बात करेंगे, प्लीज...?” वह नम्रतापूर्वक बोली। तब उसने अपनी बेटी को आवाज दी जो एक मोरनी की तरह पंख फैलाए फुदकती हुई कमरे में दाखिल हुई।
एक छोटा-सा ब्लाउज तथा स्कर्ट धारण किए हुए, जिसमें से उसकी सारी गोलाइयां झलक रही थीं, घुटने और पिंडलियां दिखाई पड़ रही थीं, वह स्वराज के निकट सोफे पर बैठ गई।
जैसे ही स्वराज की आंखों ने उसकी एक झलक पाई, उसे लगा उसका बदन उसे घूर रहा है।
स्वराज के कुछ कहने के पहले ही वह कामुक आवाज में बोली, ‘‘ हम लोग सारा बक़ाया इस माह के अंत तक चुका देंगे...। ‘‘
स्वराज उसके प्रभाव में बहने लगा। ‘ विशिष्ट रूप से सुन्दर और प्रभावशाली है यह ‘, उसने सोचा। शायद उसके मुकाबले में कुछ बढ़कर ही।
‘‘ अब चूंकि हमने अपनी मुख्य समस्या सुलझा ली है, आओ, हम कुछ और बातें करें।‘‘
‘‘ आपने प्लाजा में चल रही ‘ थ्री इज ए क्राउड ‘ देखी है। यह एक बड़े टिकून के बारे में है।‘‘ उसकी आँखों में सीधे देखते हुए वह बोली, ‘‘मैं आपको वहाँ ले जाऊँगी।‘‘
स्वराज को लगा, वह उसके जादू में बंध गया है। उसने मुस्कुराते हुए अपना सिर स्वीकृति से हिलाया।
फिल्म देखने के बाद दोनों ने ओबेरॉय में दोपहर का लेट खाना खाया। स्वराज ने उसे अपनी कार में उसके मकान पर छोड़ा और चला गया।
उसने अपने पिता को बतलाया कि उसका अभियान बड़ा सफल रहा। किराएदार ने सारा बकाया माह के अंत में चुका देने का वादा किया है।
अब स्वराज और शर्मीला अपनी शामें साथ-साथ बिताने लगे, कभी फिल्म देखकर, कभी रेस्त्रां में या कभी डिस्कोथेक में...।
एक शाम शर्मीला ने लोदी गार्डेन में घूमने का प्रस्ताव रखा। स्वराज वहां कभी नहीं गया था, अतः उसने स्वीकृति दे दी।
स्वराज ने गेट के निकट अपनी कार पार्क कर दी। उन्होंने देखा, प्रेमियों के कई जोड़े हाथों में हाथ डाले बैठे थे। वे दोनों भी आराम से फूलों की क्यारियों के बीच रास्ते में टहलने लगे। वह एक खुशनुमा शाम थी। गुलाब और मोगरे के फूलों से भरी महकती-चहकती शाम। अचानक, वह गुनगुनाने लगी, पर स्वराज को उसके बोल स्पष्ट नहीं हुए।
“क्या तुम मुझे गीत के बोल नहीं बताओगी ?“ उसने पूछा। “ओह, यह एक फिल्मी गीत है “, उसने कहा। “ इसका अर्थ है प्यार स्वर्ग का एक पंछी है, जो रात में सी मनुज के हृदय में विश्रांति पाता है...जबकि दिन आपाधापी के लिए है, रात प्रियतम की बांहों में विश्राम के लिए बनी है... “
“यहां तो मैं भी रात में विश्राम करना चाहता हूं “, उसने लम्बी सांस लेते हुए कहा।
तभी एक नौजवान सामने की ओर से आया। उसने शर्मीला का अभिनन्दन किया और उसके कान में कुछ कहा। स्वराज ईर्षा से जल उठा। उसकी आँखें शोले जैसी लाल हो गईं।
स्वराज की मनःस्थिति को समझते हुए शर्मीला ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा, “इस आदमी ने एक बार विवाह का प्रस्ताव रखा था, लेकिन पिता ने उसे ठुकरा दिया, हालांकि यह व्यक्ति काफी धनवान है। मेरे पिता ऐसे व्यक्ति को नहीं चाहते जो सिफ पैसों के लिए जीता हो, न मेरी मां ऐसा चाहती हैं। वह बड़ी संतोषी और भगवान से डरने वाली महिला हैं। “
“तुम्हारे माता-पिता बड़े अच्छे लगते हैं “ शांत होते हुए स्वराज ने कहा।
एक शनिवार के दिन, जबकि स्वराज ने ओबेरॉय में नीट व्हिस्की के चार जाम चढ़ा लिए, शर्मीला ने टेबल के नीचे से उसका हाथ पकड़ लिया और फुसफुसाई “ क्यों न हम यह रात इस होटल में गुजारें, ताकि तुम्हारे भीतर के बेचैन थके हुए पंछी को मेरे हृदय में विश्राम मिले...हम इस होटल में नव-विवाहित के रूप में अपने आपको दर्ज करा सकते हैं।“ यह कहकर वह मुस्कराई तो मोती से उसके दाँत चमक उठे।
“हाँ, क्यों नहीं मैं अपने पंखों पर बहुत लंबे समय से उड़ता रहा हूं और अब मुझे किसी घोंसले में विश्राम की जरूरत है “, वह बोला।
“मैं अपनी माँ को कह दूंगी कि मैं अपनी सहेली सुप्रिया के साथ रह गई थी।‘‘ उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा।
उन्होंने अपना भोजन और ड्रिंक्स कमरे में ही मंगवा लिया।
जैसे ही उन्होंने ड्रिंक्स लेना शुरु किया, दरवाजे की घंटी बजी और बैरा फूलों के एक गुलदस्ते के साथ एक कार्ड ले आया, ‘‘ मैनेजमेंट की ओर से हेप्पी हनीमून और ढेरों शुभकामनाएँ।‘‘
‘‘तो यह शुरु हो गया‘‘, शर्मीला मुस्कुराते हुए बोली।
‘‘सही है‘‘
नीचे कोर्टयार्ड में, स्विमिंग पूल के पास, एक पार्टी चल रही थी। नाच-गाना जारी था।
तब उन्होंने वही गीत सुना जिसकी धुन शर्मीला लोदी गर्डेन में टहलती हुई गुनगुना रही थी।
‘‘सारी चीजें ठीक ढंग से चल रही हैं‘‘, स्वराज बोला।
वहाँ वह गायक उत्साहपूर्ण दमकते चेहरे से गा रहा था। स्वराज ने दरवाजे पर ‘ डिस्टर्ब न करें ‘ की स्लिप लगाई। फिर शर्मीला से बोला, ‘‘ अब वक्त है स्वर्ग के पंछी के पंखों को घोसले में समेट लेने का।‘‘ दूसरे दिन स्वराज अपने चेहरे पर आत्मविश्वास लिए पिता के ऑफिस जा पहुँचा, और बोला, ‘‘ पिता जी, मैं पन्नालाल जी की बेटी से विवाह करना चाहता हूँ।
राधाकृष्ण को लगा जैसे उनके सिर पर बिजली गिर पड़ी हो, आश्चर्य चकित होकर वह बोला, ‘‘ तुम अपने होश में तो हो?”
‘‘ मैं पूरी तरह होश में हूँ “, उसने उत्तर दिया। “ वे लोग बड़े अच्छे हैं और मुझे अपने सपनों की रानी मिल गई है। आप और मम्मी दोनों निचले तल्ले पर रहेंगे, हम दोनों पहले तल्ले पर रह लेंगे। “
राधाकृष्ण छत की ओर देखता रह गया, उसकी आँखें फटी रह गईं, एक शव की तरह।
एक बार फिर से काँपते हाथों से वह तुड़ी मुड़ी स्क्रिप्ट शेखर सरकार ने कोट की ज़ेब से बाहर निकाली और धुंधलाए चश्मे को साफ़ किए बग़ैर ही पढ़ने लगे, आंखें जब पूरी तरह से भर आईं और एक-एक शब्द धुंधला गया, चश्मा तो तब बाद में ही साफ करके लगा पाए थे वे...
सेंध (एक बदलती कहानी)
घर में चार कमरे हैं-- खाने का, पकाने का, बैठने का और सोने का। सब कुछ सुनिश्चित और सुनियोजित। बँटे इन कमरों सी ज़िंदगी भी बँट गई है। बैठने और सोने वाला कमरा आदमी के हिस्से में आता है जहाँ बैठा-बैठा वह व्हिस्की के गिलास के साथ ताश के पत्तों को एक ख़ास अंदाज़ से बिछाता और उठाता रहता है----क्रम से ---सब कुछ सुनिश्चित और सुनियोजित।
खाने और पकाने वाले बचे दोनों कमरों में अकेली औरत बेचैन-सी दिनभर घूमती रहती है--आदमी वहाँ सिर्फ़ खाना खाने आता है और वह भी जब खाना मेज़ पर लग जाए तब, वरना उसके मुँह और दिमाग़ दोनों का ही ज़ायक़ा ख़राब हो जाता है। औरत को लगता रहता है कि घड़ी और आदमी के दिमाग़ ने एक मिला जुला षड़यंत्र रच रखा है उसके ख़िलाफ़। औरत जल्दी जल्दी घर के सब काम निबटाने की कोशिश में लगी रहती है जिससे कि थोड़ा वक्त मिल जाए उसे भी और वह भी घर के उन दूसरे कमरों में आ-जा सके पर मन के अंदर गुड़ुप-गुड़ुप उठती-डूबती आवाज़ों से कभी उबर नहीं पाती औरत--- द्रौपदी के चीर सा कामों का छोर ही कभी नहीं मिल पाता उसे।
जब बहुत थक जाती है तो मछली सी थुथने उठाकर गहरी साँस लेने लगती है औरत, मानो अगले दो तीन घंटों की औक्सीजन एक साथ ही फेफड़ों में भर लेगी। झूठे बरतनों को धोती-उठाती, साफ़-सुथरे बरतनों को झूठा करवाने के लिए मेज़ पर फिर से सजाते हुए, उसे वक्त ही नहीं मिल पाता कि इस समन्दर से बाहर आ पाए या बाहर की दुनिया को देख तक पाए। उस अजेलिया के पेड़ तक भी नहीं जा पाती वह तो, जो उसकी अपनी खिड़की के पास खिला झूमता रहता है। सर में गूंजती आवाज़ों का समन्दर जब असह्र हो जाता है तो कभी-कभी उन लहरों को काग़ज़ पर उतारकर मन हलका कर लेती है औरत -- बस यही खेल है उसका अपना और यही एकमात्र मनोरंजन भी। कौन सा समंदर ज़्यादा बड़ा और गहरा है-- आँख के आगे बिखरा काम का या अंदर मथते शोर का, कभी यह जान नहीं पाई है औरत।
सब्ज़ियाँ काटते-काटते आज फिर से उसने वही आवाज़ें सुनी हैं --कुतुर--कुतुर--कट-कट। क्या है जो उसे और उसके पिंजर को काटे जा रहा है-- आवाज़ उसके अपने अंदर से आती हैं या इन कटती सब्ज़ियों से या फिर बाहर कहीं दूर से-- किसी अनजानी जगह, अनजाने वतन से--क्या पता? पकड़ नहीं पाती कुछ भी वह, न उस खिलखिलाती किशोरी को जो दुनिया बदलना चाहती थी और ना ही बाहर उड़ते उन रंग-बिरंगे बादलों को, जो कभी-कभी आज भी पास आने का दूर कहीं उड़ चलने का वक्त-बेवक्त इशारा करते रहते हैं। चार कमरों के इस बंद मकान में गूंजते रहना, मानो आदत-सी हो गई है उसकी और जब आदत पुरानी हो जाए तो असल नक़ल का भेद भी तो मिटा ही देती है।
आदमी ख़रीददारी करके लाया है और दरवाज़े की घंटी बेतहाशा बजाए जा रहा है। हाथ की अध कटी सब्ज़ी वहीं छोड़, औरत दौड़ती है और सामान से भरे थैले ले लेती है। आदमी के आते ही घर की हर चीज़ में एक करेंट सा लग जाता है। एक व्यस्तता और तुरंतता व्याप जाती है चारों तरफ़। आदमी की आँखों में जीत और मालिकाना कड़क है और औरत की आँखों में असंतोष---अभी लगा दो वरना खराब हो जाएगा। मैं ले तो आया हूँ । आगे का अब सब काम तुम्हारा, मुझसे किसी मदद की उम्मीद मत करना।
सड़ाक-सड़ाक पीठ पर पड़ते कोडों की आवाज़ मिल चुकी है उस धीमी-धीमी कुतुर-कुतुर में अब।--क्या यह कहना ज़रूरी था, प्यार-से भी तो कही जा सकती थी यही बात? हताश् औरत वहीं बैठी रह जाती है। आदमी लाल आँखों से गुर्राता है अब यह भी मैं ही करूँ क्या ? तुम दिन भर घर में बैठी आराम फ़रमाती रहा करो, बस। बाहर जाओ चार पैसे कमाओ तो समझ में आएगा सब कुछ। औरत को कुछ सुनाई नहीं दे रहा बस वह याद करने की कोशिश कर रही है कि कब और कितने साल पहले यह आदमी प्यार से या सहज होकर बोला है उससे ?
दुखती पीठ और कंधों के दर्द को अनसुना करती औरत हड़बड़ा कर उठ जाती है, पर मन का दर्द लाख दबाने पर भी बूंद-बूँद छलक ही पड़ता है। आँखें पोंछते देख, आदमी एकबार फिर ग़ुस्से से आग बबूला हो उठा है और सामान उठाकर एक एक करके बाहर फेंकने लग जाता है। खेल अब ख़तरनाक मोड़ ले चुका है। औरत झपटती है, हाथ से सामान ले लेती है और वहीं ज़मीन पर पटक देती है। शेरनी सी बिफर जाती है--क्या चाहते हो आखिर तुम --क्या बिगाड़ा है मैं ने तुम्हारा--क्यों इतना तिरस्कार करते हो --कभी-कभी तो मशीन भी रुक ही जाती है। आदमी के होंठ व्यंग में तिरछे हो जाते हैं मुझे पता है कितना काम करती हो तुम-- बैठी-बैठी ही थक जाती होगी, शायद।---
औरत रोना नहीं चाहती, ना ही बतलाना चाहती कि सुबह से काम करते-करते कितना थक गई है वह। वैसे भी अब और बोलना या सोचना कुछ भी संभव नहीं उसके लिए। बस्स् आदमी ही बोले जा रहा है-- मैं कुछ नहीं करूँगा, सुना तुमने। ख़रीदकर भी नहीं लाऊँगा। खुद ही लाना--दो ही दिन में ही सारी अक़्ल---यह कड़क ठिकाने लग जाएगी।
एक भय अब औरत को जकड़ने लगता है ---भूख का भय, तिरस्कार का भय --कर्तव्य में असफल होने का भय। उसके पास तो पैसे भी नहीं हैं -- किससे माँगेगी--माना इससे ही माँग ले, पर गाड़ी भी तो नहीं, कैसे ला पाएगी वह यह सब। सामान से भरे बैग ढोते-ढोते पूरी जवानी निकाल दी है उसने। इन्हीं बाँहों से कंधों पर अकेले ही तो ढोया है सब कुछ--- बच्चे, यह आदमी, घर का इंट-गारा सभी कुछ --- बिना किसी सहायता के। पर अब यह संभव नहीं। दुखते कंधे को सहलाती हताश् औरत आदमी को तोलती नज़रों से देखने लग जाती है पर आदमी अब दूसरी तरफ़ देखने लगा है। औरत के अंदर का विवेक फिर से जाग उठता है परंतु वह आदमी अबतक अपना सारा विवेक खो चुका है-- कसकर मेज़ पर हाथ मारता है ---मेरी तरफ़ यूँ मत देखो, कोई ग़लत बात नहीं कह रहा हूँ मैं।---रोटी प्लेट से उछलकर मेज़ पर जा गिरती है ---गंदी हो गई यह-- नहीं खा सकता इसे, मैं अब ।--- आदमी एक बार फिर से गुर्राता है ।
सारी ग़ुस्सा को शांत आवाज़ में समेटे औरत रोटी उठाकर अपनी प्लेट में रख लेती है--- कोई बात नहीं मैं खा लूँगी, तुम दूसरी ले लो। आदमी हार नहीं मानता। बड़ा नहीं महसूस होने दे सकता वह इस औरत को -- और तुरंत ही वही रोटी उसके हाथ से छीनकर खाने लग जाता है। गड़े नाखूनों की जलन अब जलती आँखों में घुलकर और भी तेज महसूस होने लगी है औरत को। बंद कुहनियों में सर छुपाए वह औरत अब सब कुछ भूल जाना चाहती है---छुप जाना चाहती है इन अनुभवों से--- इस आदमी से, ज़िल्लत की इस ज़िंदगी से--- खुद अपने ही अंदर उफनती नफ़रत की एक नज़र से।
मंहगी सिल्क की साड़ी से आँसू पोंछती औरत को अब बरसों पुरानी वह माँ की नौकरानी याद आ रही है ---- अनपढ़ पति उसे भी तो ऐसे ही शराब पीकर पीटता था-- पर सामने बैठा आदमी तो बहुत पढ़ा लिखा और ऊँचे ओहदे पर है। शायद ताक़त का नशा शराब से भी तेज हो? आदमी खाना खा लेता है और तश्तरी सिंक में पटक देता है। हर झूठन को उठाना यही अब उसकी सजा है, मानो वह घर में क़ैद उस औरत से कहना चाह रहा हो।
बाहर बैठने वाले कमरे में बैठा आदमी फिर से आवाज़ें देने लगता है। थकी औरत सब कुछ भूलकर दौड़ती है। पड़ोसी आया है, आदमी कहता है- चाय लगा दो, समोसे बना लो। पड़ोसी आदमी से कहता है- कितने भाग्यशाली हो तुम जो आज के जमाने में ऐसी बीबी मिली है तुम्हे। मुझे तो सब काम खुद ही करने पड़ते हैं। समोसे की कौन कहे दफ़्तर से थककर लौटी बीबी को भी खुद ही खाना बनाकर खिलाना पड़ता है। -बाहर काम करने वाली, मर्दों की बराबरी करने वाली औरतें मुझे कतई पसंद नहीं-- मूछों पर ताव देता आदमी तलख आवाज़ में गूंज उठता है। पड़ोसी की गरदन झुक जाती है मानो सामने बैठा वह आदमी उसके आदमी होने का सर्टिफ़िकेट माँग रहा हो।
ठंडेपानी के नीचे सिर डाले खड़ी औरतअब सारा कूड़ा बाहर फेंकने को बेचैन हो उठती है। कभी वह भी बहुत ही समर्थ और क़ाबिल थी। याद आता है कि मिलने वाला हर शख़्स यही तो कहा करता था कभी--पर यह बात तो बहुत पुरानी है, आज तो थके मन और लिजलिजे हाथों से वह कुछ भी नहीं सँभाल पाती--ख़ाली तश्तरी तक झनझना कर छिटक जाती है अक्सर ही उसके हाथों से।
बिन के अंदर बैठा भूरी आँखों से कुतुर-कुतुर करता वह सहमा चूहा तक अविश्वास से घूर रहा है उसे। दोनों में से कौन ज़्यादा डरा है वह या चूहा---किसकी ज़िंदगी ज़्यादा बेईमानी है, औरत के लिए निश्चय कर पाना मुश्किल हो चला है अब तो?
झूठे बरतनों को समेटती औरत फिर से पकाने वाले कमरे में उबलने को लौट आती है। वह रोना नहीं चाहती---हारना भी नहीं चाहती, मुश्किल से घर बनाया है उसने। पर कुतरे जाना ही क्यों लिखा है औरतों की किस्मत में ?
विधाता पर, खुद पर-- औरत को खीज आने लगती है-- गलती कहाँ हुई और किससे हुई?---माँ से दादी से या फिर खुद उससे ही—या फिर शायद पूरी इस औरत जात से ही? पर घर तो किला है --उसका खुद का बनाया हुआ अपना सुरक्षित किला और वही तो इसकी महारानी है--- औरत यह बात अच्छी तरह से जानती है। माँ ने बार बार यही समझाया था उसे। उसके पहले नानी ने माँ को, और शायद उसके भी पहले नानी को उनकी माँ ने ।----कुतुर कुतुर फिर सुनाई देने लगती है। वही तेज होती आवाज़ें--- और अब तो इनके संग बाहर और अंदर गिरते पानी की आवाज़ें भी आ मिली हैं। इन सारी आवाज़ों से बचने के लिए औरत कानों को कसकर पल्लू से ढाँप लेती है।
कौन ज़्यादा असुरक्षित है वह या चूहा, नहीं जानती वह, परंतु थकना नहीं चाहती औरत। लड़ाई चाहे कितनी भी असह्र हो, हारना नहीं चाहती वह। आँसू पोंछती औरत फिर से झूठे बरतन धोने में लग जाती है। क्योंकि साफ़ बरतनों को एकबार फिर से झूठे होने के लिए सजाना ही होगा--यही तो कहानी है जिन्दगी की---सच पूछो तो पूरे नारी संसार की--पर क़िलों में ही तो सेंध लगती है--और रानी हो या नौकरानी--अच्छा हो या बुरा, यह क़िला उसका अपना ही तो है जैसे कि वह बद्मिजाज आदमी ?
इतने सारे क्योंकि से घबराई औरत सोचती है चूहा ही सही है-- उसे उठाकर बाहर नहीं फेंक पाएगी वह। सेंध तो खुद उसके अपने अंदर तक लग चुकी है --अब कुछ भी अलग कर पाना संभव नहीं। खुद को बहुत गंदा और लाचार महसूस करती है वह औरत।
बस वही दिन-रात, लगातार सेंध भरने की एक और नाकाम कोशिश में एकबार फिर से जुट जाती है औरत---- यह जानते हुए भी कि सेंध भरते ही वह कुतुर-कुतुर कहीं और से शुरू हो जाएगी।
ऊपर सोने के कमरे से आवाज़ें आ रही हैं, अभी काम ख़त्म नहीं हुआ क्या तुम्हारा, सोना नहीं आज? आओ तो मेरे लिए कौफी लेती आना!
---अभी आई। कौफी बनाते-बनाते औरत जबाव देती है। औरत जानती है कि थका हारा सिपाही जंग नहीं जीत पाता, किले नहीं बना पाता----और औरतों को तो हारना आता ही नहीं।
औरत अपनी सारी थकान सारी तलखी भूलकर, वापस अपने काम में व्यस्त हो चुकी है जैसे कि टुकुर-टुकुर उसे देखता वह चूहा। "-
आदमी सड़क किनारे कराह रहा था । एक दयालु आदमी रोटी लेकर उसके पास पहँचा और उसे दे ही रहा था कि एक-दूसरे आदमी ने उसका हाथ खींच लिया । वह आदमी बड़ा रंगीन था ।
पहले आदमी ने पूछा, "क्यों भाई, भूखे को भोजन क्यों नहीं देने देते ?"
रंगीन आदमी बोला, "ठहरो, तुम इस प्रकार उसका हित नहीं कर सकते । तुम केवल उसके तन की भूख समझ पाते हो, मैं उसकी आत्मा की भूख जानता हूँ । देखते नहीं हो, मनुष्य-शरीर में पेट नीचे है और हृदय ऊपर । हृदय की अधिक महत्ता है ।"
पहला आदमी बोला, "लेकिन उसका हृदय पेट पर ही टिका हुआ है । अगर पेट में भोजन नहीं गया तो हृदय की टिक-टिक बंद नहीं हो जायेगी !"
रंगीन आदमी हँसा, फिर बोला, "देखो, मैं बतलाता हूँ कि उसकी भूख कैसे बुझेगी !"
यह कहकर वह उस भूखे के सामने बाँसुरी बजाने लगा । दूसरे ने पूछा, "यह तुम क्या कर रहे हो, इससे क्या होगा ?"
रंगीन आदमी बोला, "मैं उसे संस्कृति का राग सुना रहा हूँ । तुम्हारी रोटी से तो एक दिन के लिए ही उसकी भूख भागेगी, संस्कृति के राम से उसकी जनम-जनम की भूख भागेगी ।"
वह फिर बाँसूरी बजाने लगा ।
और तब वह भूखा उठा और बाँसूरी झपटकर पास की नाली में फेंक दी ।
हरिशंकर परसाई
गुलाम
हफ्ते में एकदिन, इतवार-की इतवार घरों और मन्दिरों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी की वर्णमाला का अभ्यास करते हुए सात साल की बेटी ने पूछा- " पापा हम हिन्दी क्यों पढ़ते हैं ?" " क्योंकि यह हमारी मातृभाषा है।" " मातृभाषा क्या होती है?" " मां की बोली- हमारी अपनी बोली ; जो हम अपने घरों में बोलते हैं।"
" फिर अंग्रेजी..?".बेटी की अगली जिज्ञासा थी। " पर हम तो घर में अंग्रेजी बोलते हैं...?"
" अंग्रेजी, अंग्रेजों की भाषा है, जिसे वह अपने साथ हिन्दुस्तान... हमारे घरों और विद्यालयों में ले आए थे। जहाँ-जहां अंग्रेज गए, वहीं अंग्रेजी भी गई। सैकड़ों साल हिन्दुस्तान अंग्रेजों का गुलाम रहा। कई-कई लड़ाइयां हुईं, लोगों ने बड़ी-बड़ी कुर्बानियां कीं, तब कहीं जाकर बड़ी मुश्किल से हिन्दुस्तान से अंग्रेजों को खदेड़कर इंगलैंड वापस भेजा जा सका। तुम्हारे दादा जी ने भी यह लड़ाई लड़ी थी।"- मैने उसे गर्व से बताया।
" अच्छा। ... तो क्या हम अभी भी इनके गुलाम हैं और ये हमें पकड़कर अपने साथ यहां ले आए!"
बेटी की बालसुलभ जिज्ञासा और निष्कर्ष पर मैं निरुत्तर था।...
हिन्दी में पिछली शताब्दी से लिखे जा रहे व्यंग्य पर समीक्षात्मक दृष्टि से अत्यंत सटीक, वांछित और विस्तृत समीक्षात्मक ग्रन्थ की कमी महसूस की जाती रही है। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा कबीर, विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी का तो थोड़ा-बहुत समीक्षात्मक मूल्यांकन हुआ भी, मगर इस पीढ़ी से किंचित पहले की पीढ़ी, यथा-बेढब बनारसी, राधाकृष्ण, रामनरायण उपाध्याय, आदि एवं इनके लगभग समकालीनों, जैसे कि शंकर पुण्तांबेकर, लतीफ घोंघी, मनोहर श्याम जोशी, आबिद सुरती का अपेक्षित मूल्यांकन नहीं हुआ। फिर इसके बाद की पीढ़ी का मूल्यांकन कैसे संभव था? हां, इतना जरूर हुआ कि ज्ञान चतुर्वेदी नरक यात्रा और बारहमासी के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा गए।
यह तो तय है कि इधर के उभरते हुए व्यंग्यकारों, यथा-गोपाल चतुर्वेदी, नरेन्द्र कोहली, हरीश नवल, अलका पाठक, प्रेम जनमेजय, विनोद शंकर शुक्ल, संतोष दीक्षित, अमर गोस्वामी, गिरीष पंकज आदि को निश्चय ही मूल्यांकन की प्रतीक्षा है। हिंदी में व्यंग्य रचनाओं की दृष्टि से गद्य और पद्य में भी एक विभाजन रेखा है। काव्य मंचों का व्यंग्य (?) इधर आलोचकों की दृष्टि में कोई बहुत कुलीन व्यंग्य नहीं समझा जा रहा है। काव्य मंचों पर परोसे जाने वाले व्यंग्य को फूहड़ हास्य, असह्य नाटकबाजी और छिछली मानसिकता के पर्याय के रूप में ग्रहण किया गया।
कहना होगा कि नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और गिरिजा कुमार माथुर का व्यंग्य उच्चकोटि का था। इन कवियों ने काव्य मंच की उपेक्षा भी नहीं की। इन कवियों का मूल्यांकन इनके द्वारा रचित समग्र काव्य-लेखन की दृष्टि से हुआ, मात्र व्यंग्य के कारण नहीं। राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त की भारत भारती में प्रहारक व्यंग्य के अनेक उदाहरण मिल जाते हैं, मगर उन्हें मूल्यतः व्यंग्य का कवि नहीं माना गया। मधुशाला के गायक बच्चन में अनेक स्थलों पर व्यंग्य के छींटे मिलते हैं, तो दिनकर की कृति नीम के पत्ते श्रेष्ठ व्यंग्य कविताओं का संकलन है।
यह लगभग ध्रुव सत्य है कि कोई भी कृति समय की शिलाओं पर अपने पदचिन्ह तभी छोड़ पाती है जब उसे पाठकों अथवा साहित्य प्रेमियों द्वारा सर्वकालिक स्वीकृति मिल जाती है। कबीर, भारतेन्दु, निराला, नागार्जुन, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल प्रभृति अनेक व्यंग्य मनीषियों को दीर्घ अवधि के पश्चात धीरे-धीरे स्वीकृति मिली। कबीर को कहां मालूम था कि बीसवीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी होंगे और उनके काव्य का मूल्यांकन करके उन्हें सदा-सदा के लिए अमरता प्रदान कर देंगे। ऐसी ही बात अनेक महान रचनाकारों अथवा कालजयी कृतियों के बारे में कही जा सकती है।
हाल ही में गाजियाबाद से प्रकाशित यूएसएम पत्रिका द्वारा अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की एक गोष्ठी व्यंग्य आलोचना को केन्द्र में रखकर आयोजित की गई थी। मूल विषय था- ‘ व्यंग्य आलोचना का व्यंग्य ‘। विषय-चयन के पीछे, आलोचना में व्यंग्य को अपेक्षित महत्व न दिया जाना अवश्य रहा होगा। वक्ताओं ने इस ओर इशारे भी दिए। संचालक प्रेम जनमेजय ने कहा -‘‘ गद्य को कवियों की कसौटी माना जाता है। यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो व्यंग्य गद्य की कसौटी है। कविता को अपना रूप निखारने हेतु वर्षों का समय मिला है। इसके विपरीत गद्य को, व्यंग्य को अल्पकाल में ही बहुर्मुखी विकास करने में सफलता प्राप्त हुई है।‘‘
युवा व्यंग्य समीक्षक सुभाष चंदर ने कुछ अलग ढंग से अपनी बात दर्ज की-‘‘ रचनाकारों को आलोचक का मुंह नहीं देखना चाहिए। किसी बड़े आलोचक ने कभी किसी एक विधा के लिए काम नहीं किया है।‘‘
प्रसिद्ध कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने चुटकी लेते हुए कहा-‘‘ हम कथाकार जिस आलोचक से परेशान हैं, व्यंग्य वाले कहते हैं कि वह हमारेयहां क्यों नहीं है। आलोचक कभी रचनाकार से श्रेष्ठ नहीं हो सकता और लेखकों को उसकी परवाह करनी भी नहीं चाहिए।‘‘
युवा व्यंग्यकार हरीश नवल का मंतव्य था-‘‘ यह सही है कि आलोचक रचनाकार से बड़ा नहीं होता, पर जब रचनाकार को उसका सही मूल्यांकन करने वाला मिल जाता है तो रचनाकार पाठकों के समक्ष सही रूप में आ जाता है।‘‘
इस परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए इन पंक्तियों के लेखक ने अपना मत व्यक्त करते हुए ये शब्द कहे-‘‘कोई भी बड़ा रचनाकार आलोचकों की राय की परवाह किए बगैर लिखता चला जाता है। उसकी वैचारिक और संवेदनात्मक परिपक्वता रचनाकार से श्रेष्ठतम लिखवा लेती है। शायद इसी कारण कोई भी शिखर रचनाकार किसी आलोचक का पिछलग्गू नहीं बनना चाहता। हां, यदि कोई अध्येता विद्वान उसकी कृति पर सकारात्मक टिप्पणी करे अथवा उसके गुण-दोषों को गिनाए तो रचनाकार को प्रसन्नता ही होती है।‘‘
इधर साहित्य के प्रति मुग्ध भाव के अभाव ने पुष्तक-संस्कृति के प्रसार को व्यापक क्षति पहुंचाई है। जीवन की आपाधापी, भागदौड़ और उठापटक ने शिक्षा क्षेत्र के व्यक्तिओं, शिक्षकों-छात्रों को भी साहित्य से विमुख करके उन्हें अपेक्षित आत्मीयता से वंचित कर दिया है। फिर भी, रेगिस्तान में नखलिस्तान की तरह संवेदना के दीप अभी भी जगमगा रहे हैं और यत्र-तत्र अपना प्रकाश फैला रहे हैं।
आज की परिस्थितियों के अनुसार व्यंग्य रचनाओं में समय और समाज की धड़कनों को, कुंठाओं की जकड़नों को बयान करने का सिलसिला आज भी जारी है। जिन्दगी की तल्खियों, कुसंगतियों और दुर्गतियों से उभरने वाला व्यंग्य बड़ी मात्रा में सामने आ रहा है। थोड़े में कहूं तो आज का साहित्य व्यंग्य प्रधान है और जीवन के असीम फलक पर व्यंग्य की गहरी-मुखर रेखाएँ चीख-चीखकर अपने अस्तित्व की घोषणा कर रही है।
इसमेंसंदेह नहीं कि आज हिंदी में, खासकर हिंदी गद्य में, व्यंग्य के अनेक सशक्त हस्ताक्षर सक्रिय हैं औ अनेक व्यंग्य-कृतियां विशिष्ट उल्लेख की अधिकारी हैं। मनोहर श्याम जोशी ( कुरु कुरु स्वाहा, नेताजी कहिन, टाटा प्रोफेसर, हरिया हरक्यूलिस की हैरानी), शंकर पुण्तांबेकर( गुलेल के कई खंड, मेरी फांसी, कट आउट, तेरहवां डिनर, गिद्ध मंडरा रहा है आदि), केशवचन्द्र वर्मा ( आंसू की मशीन आदि,), लतीफ घोंघी ( तिकोने चेहरे, उड़ते उल्लू के पंख, मृतक से क्षमा याचना सहित), बृह्मदेव ( भगवान को आगाम करने दो), गोपाल चतुर्वेदी ( फार्म हाउस के लोग, अफसर की मौत, खंभों के खेल, आजाद भारत में कालू, दुम की वापसी, दांत में फंसी कुरसी, गंगा से गटर तक), रवीन्द्र कालिया, नरेन्द्र कोहली ( मेरे मोहल्ले के फूल), विनोद शंकर शुक्ल, ज्ञान चतुर्वेदी ( नरक यात्रा, बारहमासी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ) के.पी. सक्सेना, अश्विनी कुमार दूबे, प्रदीप पंत(महामहिम, मैं गुट निरपेक्ष हूं, प्राइवेट सेक्टर का व्यंग्यकार, मीडियाकार होने के मजे), पूर्ण सिंह डबास (कुर्सी प्रधान देश), गिरीश पांडे ( कुछ माटी की-कुछ कुम्हार की), सूर्यबाला, अलका पाठक आदि अनेक श्रेष्ठ व्यंग्य कृतियों की रचना कर चुके हैं।
यह भी एक सच्चाई है कि व्यंग्यकारों को यदा-कदा अपना समुचित मूल्यांकन होने का दर्द सालता रहा है। पर दूसरी सच्चाई यह है कि हिंदी के विशाल पाठक वर्ग में श्रेष्ठ व्यंग्य के प्रति गहरा लगाव देखने में आया है। व्यंग्य की पुष्तकें सामान्य पुष्तकों की तुलना में बहुत ज्यादा पढ़ी जाती हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्यंग्य की अनेक कृतियों पर, उत्कृष्ट व्यंग्यकारों पर लघु शोध प्रबंध, शोध प्रबंध लिखे जा रहे हैं। यह भी एक अर्थ में व्यंग्य की समीक्षा ही है, जिसे नजरन्दाज नहीं किया जा सकता। ज्यों-ज्यों हिन्दी के पाठक समुदाय में वृद्धि होगी, जिन्दगी की विषम सच्चाई को उगाड़ने वाले, मानवीय करुणा को के विभिन्न बिन्दुओं को उभारने वाले, सार्थक और जरूरी प्रश्नों को उठाने वाले व्यंग्य के प्रति गहरे सम्मान का भाव जागना निश्चित है।
कहना होगाकि व्यंग्य आलोचना के अभाव पर हम चिंतन तो अवश्य कर सकते हैं। मगर इन संदर्भों में चिंता की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि दिलों में घर कर जाने वाला, दिमाग पर दस्तक देने वाला, चेतना को आंदोलित करने वाला श्रेष्ठ और सत्यवादी व्यंग्य कभी भी उपेक्षा का शिकार नहीं हो सकता।
यादें और आदतें, दोनों से ही छुटकारा ले पाना आसान नहीं, चाहे हम राग-दरबारी अलाप रहे हों या भीमपलासी। स्मृतियां मादक होती हैं विशेषतः अपनों की, देश-समाज-परिचित-मित्र-परिवार की। रागरंग में इस बार चलते हैं भारत के एक गांव की ओर, वह भी श्रीलाल शुक्ल जी के बहु चर्चित उपन्यास 'राग दरबारी' में बसे थाने पर....
रागरंग
-श्रीलाल शुक्ल
थाना शिवपालगंज में एक आदमी ने हाथ जोड़कर दारोग़ाजी से कहा, '' आजकल होते-होते कई महीने बीत गये। अब हुजूर हमारा चालान करने में देर न करें। ''
मध्यकाल का कोई सिंहासन रहा होगा जो अब घिसकर आरामकुर्सी बन गया था। दारोग़ाजी उस पर बैठे भी थे, लेटे भी थे। यह निवेदन सुना तो सिर उठाकर बोले, '' चालान भी हो जायेगा। जल्दी क्या है? कौन-सी आफत आ रही है ? ''
वह आदमी आरामकुर्सी के पास पड़े हुए एक प्रागैतिहासिक मोढ़े पर बैठ गया और कहने लगा, '' मेरे लिए तो आफत ही है। आप चालान कर दें तो झंझट मिटे।''
दारोग़ाजी भुनभुनाते हुए किसी को गाली देने लगे। थोड़ी देर में उसका यह मतलब निकला कि काम के मारे नाक में दम है। इतना काम है कि अपराधों की जांच नहीं हो पाती, मुकदमों का चालान नहीं हो पाता, अदालतों में गवाही नहीं हो पाती। इतना काम है कि सारा काम ठप्प है।
मोढ़ा आरामकुर्सी के पास खिसक आया। उसने कहा, हुजूर दुश्मनों ने कहना शुरु कर दिया है कि शिवपालगंज में दिन-दहाड़े जुआ होता है। कप्तान के पास एक गुमनाम शिकायत गयी है। वैसे भी, समझौता साल में एक बार चालान करने का है। इस साल का चालान होने में देर हो रही है। इसी वक्त हो जाये तो लोगों की शिकायत भी खत्म हो जायेगी।''
आरामकुर्सी ही नहीं, सभी कुछ मध्यकालीन था। तख्त, उसके ऊपर पड़ा हुआ दरी का चीथड़ा, कलमदान, सूखी हुई स्याही की दबातें, मुड़े हुए कोनोंवाले मटमैले रजिस्टर-सभी कुछ कई शताब्दी पुराने दिख रहे थे।
यहाँ बैठकर अगर कोई चारों ओर निगाह दौड़ाता तो उसे मालूम होता, वह इतिहास के किसी कोने में खड़ा है। अभी इस थाने के लिए फाउन्टेनपेन नहीं बना था, उस दिशा में कुल इतनी तरक्की हुई थी कि कलम सरकण्डे का नहीं था। यहाँ के लिए अभी टेलीफोन की ईज़ाद नहीं हुई थी। हथियारों में कुछ प्राचीन राइफलें थीं जो, लगता था, गदर के दिनों में इस्तेमाल हुई होंगी। वैसे, सिपाहियों के साधारण प्रयोग के लिए बाँस की लाठी थी, जिसके बारे में एक कवि ने बताया है कि वह नदी-नाले पार करने में और झपटकर कुत्ते को मारने में उपयोगी साबित होती है। यहाँ के लिए अभी जीप का अस्तित्व नहीं था। उसका काम करने के लिए दो-तीन चौकीदारों के प्यार की छाँव में पलनेवाली घोड़ा नाम की एक सवारी थी, जो शेरशाह के जमाने में भी हुआ करती थी। थाने के अन्दर आते ही आदमी को लगता था कि उसे किसी ने उठाकर कई सौ साल पहले फेंक दिया है। अगर उसने अमरीकी जासूसी उपन्यास पढ़े हों, तो वह बिलबिलाकर देखना चाहता है कि उँगलियों का निशान देखनेवाले शीशे, कैमरे वायरलेस लगी हुई गाड़ियां-ये सब कहां हैं? बदले में उसे सिर्फ़ वह दिखता जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। साथ ही, एक नंग-धड़ंग लंगोटबंद आदमी दिखता जो सामने इमली के पेड़ के नीचे भंग घोट रहा होता। बाद में पता चलता कि वह अकेला आदमी बीस गांवों की सुरक्षा के लिए तैनात है और जिस हालत में जहां है, वहाँ से उसी हालत में वह बीस गाँवों में अपराध रोक सकता है, अपराध हो गया हो तो उसका पता लगा सकता है और अपराध न हुआ हो, तो उसे करा सकता है। कैमरा, शीशा, कुत्ते, वायरलेस उसके लिए वर्जित हैं। इस तरह थाने का वातावरण बड़ा ही रमणीक और बीते दिनों के गौरव के अनुकूल था। जिन रोमांटिक कवियों को बीते दिनों की याद सताती है, उन्हें कुछ दिन रोके रखने के लिए यह थाना आदर्श स्थान था।
जनता को दारोग़ाजी और थाने के दस-बारह सिपाहियों से बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं। ढाई-तीन सौ गाँवों के उस थाने में अगर आठ मील दूर किसी गाँव में नक़ब लगे तो विश्वास किया जाता था कि इनमें से कोई-न-कोई उसे देख जरूर लेगा। बारह मील की दूरी पर अगर रात के वक्त डाका पड़े, तो इनसे उम्मीद थी कि ये वहाँ डाकुओं से पहले ही पहुँच जायेंगे। इसी विश्वास पर किसी भी गाँव में इक्का-दुक्का बन्दूकों को छोड़कर हथियार नहीं दिए गये थे। हथियार देने से डर था कि गाँव में रहने वाले असभ्य और बर्बर आदमी बन्दूकों का इस्तेमाल सीख जाएँगे, जिससे वे एक दूसरे की हत्या करने लगेंगे, खून की नदियाँ बहने लगेगीं। जहाँ तक डाकुओं से उनकी सुरक्षा का सवाल था, वह दारोग़ाजी और उनके दस-बारह आदमियों की जादूगरी पर छोड़ दिया गया था।
उनकी जादूगरी का सबसे बड़ा प्रदर्शन खून के मामले में होने की आशा की जाती थी, क्योंकि समझा जाता था कि इन तीन सौ गाँवों में रहनेवालों के मन में किसके लिए घृणा है, किससे दुश्मनी है, किसको कच्चा चबा जाने का उत्साह है, इसका वे पूरा-पूरा ब्यौरा रखेंगे; और पहले से ही कुछ ऐसी तरकीब करेंगे कि कोई किसी को मार न सके ; और अगर कोई किसी को मार दे तो वे हवा की तरह मौके पर जाकर मारनेवाले को पकड़ लेंगे, मरे हुए को कब्जे में कर लेंगे, उसके खून से तर मिट्टी को हाँडी में भर लेंगे और उसके मरने का दृश्य देखनेवालों को दिव्य दृष्टि देंगे ताकि वे किसी भी अदालत में, जो कुछ हुआ है, उसका महाभारत के संजय की तरह आँखों-देखा हाल बता सकें। संक्षेप में, दारोग़ाजी और उनके सिपाहियों को वहाँ पर मनुष्य नहीं, बल्कि अलादीन के चिराग से निकलनेवाला दैत्य समझकर रखा गया था। उन्हें इस तरह रखकर 1947 में अंग्रेज अपने देश चले गए थे और उसके बाद ही धीरे-धीरे लोगों पर यह राज़ खुलने लगा था कि ये लोग दैत्य नहीं हैं, बल्कि मनुष्य हैं; और उसके बाद ही धीरे-धीरे लोगों पर यह राज खुलने लगा था कि ये लोग दैत्य नहीं हैं, बल्कि मनुष्य हैं; और ऐसे मनुष्य हैं जो खुद दैत्य निकालने की उम्मीद में दिन-रात अपना-अपना चिराग घिसते रहते हैं।
शिवपालगंज के जुआरी-संघ के मैनेजिंग डाइरेक्टर के चले जाने पर दारोग़ाजी ने एक बार सिर उठाकर चारों ओर देखा। सब तरफ़ अमन था। इमली के पेड़ के नीचे भंग घोटनेवाला लंगोटबन्द सिपाही नजदीक रखे हुए शिवलिंग पर भंग चढ़ा रहा था, घोड़े के पुठ्टों पर एक चौकीदार खरहरा कर रहा था, हवालात में बैठा हुआ एक डकैत ज़ोर-ज़ोर से हनुमान-चालीसा पढ़ रहा था, बाहर फाटक पर ड्यूटी देनेवाला सिपाही-निश्चय ही रात को मुस्तैदी से जागने के लिए –एक खंभे के सहारे टिककर सो रहा था।
दारोग़ाजी ने ऊँघने के लिए पलक बन्द करना चाहा, पर तभी उनको रुप्पन बाबू आते हुए दिखायी पड़े। वे भुनभुनाए कि पलक मारने की फुरसत नहीं है। रुप्पन बाबू के आते ही वे कुर्सी से खड़े हो गए और विनम्रता-सप्ताह बहुत पहले बीत जाने के बावजूद, उन्होंने विनम्रता के साथ हाथ मिलाया। रुप्पन बाबू ने बैठते ही कहा, '' रामाधीन के यहां लाल स्याही से लिखी हुई एक चिठ्ठी आयी है। डाकुओं ने पाँच हजार रुपया माँगा है। लिखा है अमावस की रात को दक्खिनवाले टीले पर...। ''
दारोग़ाजी मुस्कुराकर बोले, ''यह तो साहब बड़ी ज्यादती है। कहाँ तो पहले के डाकू नदी-पहाड़ लाँघकर घर पर रुपया लेने आते थे, अब वे चाहते हैं कि कोई उन्हीं के घर जाकर रुपया दे आवे।''
रुप्पन बाबू ने कहा, '' जी हाँ। वह तो देख रहा हूँ। डकैती न हुई, रिश्वत हो गयी।''
दारोग़ाजी ने भी उसी लहजे में कहा, '' रिश्वत, चोरी, डकैती-अब तो सब एक हो गया है-पूरा साम्यवाद है।''
रुप्पन बाबू बोले, '' पिताजी भी यही कहते हैं।''
'' वे क्या कहते हैं? ”
“ ...यही कि पूरा साम्यवाद है। “
दोनों हँसे। रुप्पन बाबू ने कहा, '' नहीं। मैं मज़ाक नहीं करता। रामाधीन के यहाँ सचमुच ही ऐसी चिठ्ठी आयी है। पिताजी ने मुझे इसीलिए भेजा है। वे कहते हैं कि रामाधीन हमारा विरोधी है तो क्या हुआ, उसे इस तरह न सताया जाये।''
“ बहुत अच्छी बात कहते हैं। जिससे बताइए उससे कह दूं।“
रुप्पन बाबू ने अपनी गढ्ढे में धँसी हुई आँखों को सिकोड़कर दारोग़ाजी की ओर देखा। दारोग़ाजी ने भी उन्हें घूरकर देखा और मुस्कुरा दिए। बोले, “ घबराइये नहीं, मेरे यहां होते हुए डाका नहीं पड़ेगा। “
रुप्पन बाबू धीरे से बोले, “ सो तो मैं जानता हूं। यह चिठ्ठी जाली है। जरा अपने सिपाहियों से ही पुछवा लीजिए। शायद उन्ही में से किसी ने लिख मारी हो।“
“ ऐसा नहीं हो सकता। मेरे सिपाही लिखना नहीं जानते। एकाध हैं जो दस्खत-भर करते हैं। “
आत्महत्या का समाचार मृतका की फोटो सहित समाचार पत्र मे जब से छपा है हमारी पत्नी को उसकी लोकप्रियता देखी नही जा रही है । चारो तरफ मरने वाली महिला की ही चर्चा देख मेरी पत्नी मचल उठी और उसने भी तय कर लिया कि वह भी आत्महत्या करेगी । उसने अपनी मंशा मेरे को बताई । मैने कहा - यह संभव ही नही । क्योकि जब तक कोई खास कारण न हो आत्महत्या की ही नही जा सकती । इस देश मे बेवजह मारे जाने के अनेक अवसर आते है , लेकिन - - - - मेरी बात सुनते ही पत्नी आग बबूला हो गई , कहने लगी - मै पहले ही जानती थी कि तुम ऐसा ही बोलोगे , मेरी कोई बात तुम्हे पसंद आती ही कहां है ? मेरे हर काम मे रूकावट ड़ालना तुम्हारी पुरानी आदत है । अब मै भी कहां चुप रहने वाला था । मैने भी यही आरोप उसके उपर लगाया कि मेरा भी कोई काम तुम्हे भी फूटी आख नही सुहाता । तुरंत मेरे काम मे मीन मेख निकालना शुरू कर देती हो । यदि मै ही आत्म्हत्या का विचार करू तो तुम इसमें मेरी ज़रा भी मदद नही करोगी और तुरन्त मेरे से किनारा कर लोगी । मेरी इस बात से पत्नी सहमत नही हुई । वह पत्नी ही क्या जो पति से सहमत हो जाये । वह भावुक होकर कहने लगी- मैं तो गणित का वह सवाल हूँ जो आज तक तुम्हारी समझ मे नही आया । तुम एक बार मरने की ख्वाहिश तो जाहिर करो फिर देखो मै तुम्हारी तमन्ना मे कैसे अपनी मोहब्बत का रंग भरती हूं । इस संबंध मे तुम्हे कुछ नही करना होगा , सारा इंतज़ाम मेरे मायके वाले ही कर देगे । उन्हे दामाद बहुत अज़ीज़ है । एक बार अपने लड़के को नही मरने देगे लेकिन दामाद का जरूर मारेगे । मैने उसे बीच मे टोकते हुए कहा - लेकिन फिलहाल मरने का इरादा मेरा नही तुम्हारा है । मेरे बदल गये इरादे को जान पत्नी मायूस हो गई , कहने लगी इरादा क्यो बदलते हो , जब मूड़ कर ही लिया है तो मर ही जाओ । एक पत्नी की हैसियत से मैं तुम्हे इस काम को पूरा करने मे पूरा सहयोग करूगी । मैने उसे समझाया कि मुझे तुम्हारी मोहब्बत पर पूरा यकीन है लेकिन मेरा फिलहाल आत्महत्या करने का कोई इरादा नही है । मेरा बयान सुनकर जो पत्नी थी वह प्रेमिका की तरह रूठ गई । कहने लगी - तुम्हारी ज़ुबान का कोई भरोसा नही , बोल कर पलट जाते हो और शर्म तक नही आती । तुम्हे तो सियासत मे होना था । कुर्सी से शादी कर संसद मे सोते । मैने कहा - यह सब तो दिगर बात है । मुख्य बात यह है कि एक उचित कारण के अभाव मे तुम्हारा आत्महत्या का प्रोग्राम खटाई मे पड़ गया है । पत्नी विचलित हो गई और नीचे स्वर मे उँचे स्तर की बात करने लगी । कहने लगी - यह कहां का इंसाफ है ? बिना कारण दंगे भड़क सकते है, बेगुनाह मारे जा सकते है, सरकारें बदल सकती हैं ,लेकिन एक अबला आत्महत्या नही कर सकती । मै खूब जानती हू तुम मर्द जात को , तुम लोग औरत को कभी भी मरने नही दोगे बल्कि शोशण करने के लिये उसे ज़िन्दा रखोगे । इतना कह कर वह फफक फफक कर रोने लगी । बच्चे के सोने और औरत के रोने का कोई वक्त निश्चित नही होता । एक तो औरत भाब्द मे ही सम्मोहन होता है ,उस आंसू मे तो और धांसू दिखाई देती है । नतीजन आंसुओ की धार मे हमारी कठोरता धुल गई और हमने फैसला कर लिया कि हम पत्नी की हर इच्छा पूरी करेगे । क्योकि मै समझ गया था कि अब ये मरे बिना चैन से जियेगी नही । मैने उसे समझाया - तुम्हारे मरने के रास्ते मे कारण बाधा बन कर खड़ा है। एक उचित कारण खोज के ले आओ फिर देखो मेरा काम , तुम्हारे मरने का इतना बढ़िया बंदोबस्त करूगा कि बार बार मरने का मन करेगा । मेरी बात सुनकर पत्नी चुप हो गई । कुछ सोचने लगी, फिर चहक उठी, कहने लगी - मेरे मरने का सबसे बड़ा और उचित कारण तो तुम स्वयं हो । वाह रे मेरी अक्ल । आंखो के सामने पहाड़ बराबर कारण है और मैं उसे राई आकार मे ढूंढ रही थी । इसे कहते है बगल मे छोरा नगर मे ढिंढ़ोरा । मेरा सीना गर्व से फूल गया । चलो मेरा जीना किसी के मरने के काम तो आया । आज मेरा जीना सार्थक हुआ । पत्नी ने मेरे गले में अपनी बाहें ड़ाल दी और बोली - तुम कितने अच्छे हो । फिर पूछने लगी मेरे मरने के बाद क्या करोगे ? मैने कहा - तुम्हारी याद मे रो रो के पागल हो जाउँगा । पत्नी ने पूछा - क्या दूसरी शादी करोगे ? मैने कहा - इतना भी पागल नही हो जाउँगा । पत्नी मरने की कल्पना मे खो गई तो मैं उसकी आंखो के सामने चुटकी बजाते हुए उसे वर्तमान मे लौटा लाया और वह कारण पूछा जिससे वह मर जाने की अधिकारी हो जाती है । पत्नी रूआसी मुद्रा मे बोली - इस महंगाई और प्रतिस्पर्धा के दौर मे जिस का पति साहित्यकार हो जाये उस औरत का जीवन भी कोई जीवन है ? ऐसे जीने से तो मर जाना बेहतर है । इतना कह कर पत्नी मरने के इंतज़ाम में कमरे से बाहर निकल गई और मै - - - मेरी स्थति तो पूछिये नही शायद इसी स्थति को कहते है - कांटो तो खून नही ।
रामलुभाया, महबूबा का साक्षात्कार लेने के लिए श्रीनगर जा पहुंचा।
''आपने मुझे ही इंटरव्यू के लिए क्यों चुना ?'' पहला प्रश्न महबूबा ने ही किया।
''आपके समान सौभाग्यशालिनी महिला भारत में दूसरी कोई नहीं है।''
''यह आप कैसे कह सकते हैं ?'' महबूबा ने आपत्ति की, '' मैं तो अभी प्रधानमंत्री भी नहीं बनी और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति हैं, सोनिया गांधी राजमाता हैं ...। मैं उन लोगों से अधिक भाग्यशाली तो नहीं हूं।''
''वह सब ठीक है।'' रामलुभाया ने कहा, ''किंतु आप पर कितने-कितने आतंकवादी आक्रमण हुए और आपका बाल भी बांका नहीं हुआ। इंदिरा गांधी का क्या है, एक ही आक्रमण में स्वर्ग सिधार गईं।''
''आप ठीक कह रहे हैं।'' महबूबा बहुत मधुर ढंग से मुस्कराई, '' इंदिरा गांधी पर आक्रमण उनके अपने अंगरक्षकों ने किया, तो वे मारी गईं। मेरे समान स्वयं योजना बना कर आक्रमण करवातीं तो घायल भी न होतीं और उनके वे अंगरक्षक भी मारे जाते।''
''सब लोग तो आपके समान चतुर नहीं होते न।''
''तभी तो एक गोली भी झेल नहीं पाते।'' महबूबा परम प्रसन्न थी, '' हमारे परिवार में तो यह परंपरा ही है। मेरे पिता देश के गृह मंत्री थे, तो मेरी बहन को पड़ौस की मसजिद में बैठा कर उसके अपहरण की घोषणा करवा दी। बस, बड़ी सरलता से जिस जिस आतंकवादी को छोड़ना था, उसे छोड़ दिया। अब वे पाकिस्तानी करंसी कश्मीर में चलवाना चाहते हैं।''
''पर वे ऐसा क्यों करना चाहते हैं ?''
''जो पैसा पाकिस्तान से मिला है, उसे खर्च करने के लिए हम कराची या लाहौर तो नहीं जा सकते न। यहां ही चलने लगे तो हमें ही नहीं, बहुत सारे कश्मीरी नेताओं को सुविधा हो जाएगी।'' सहसा उसने विषय बदला, ''वह सब छोडि़ए, यह बताइए कि आप का आना कैसे हआ।''
''फिर ग्रीष्म ऋतु आई है।'' रामलुभाया ने कहा, ''फिर डंका बजा है। फिर बाबा अमरनाथ के दर्शन के लिए, भक्तों ने यात्रा की तैयारी की है।''
''मुझे यह सब पसंद नहीं है।'' महबूबा ने कहा, ''मैं पर्यावरण से बहुत प्यार करती हूं और कश्मीर के पर्यावरण के लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकती हूं।''
''यह तो अच्छी बात है। '' रामलुभाया ने कहा।
''पर वे लोग तो अमरनाथ के दर्शन करने आते हैं, उनके लिए मार्ग में स्थान-स्थान पर शिविर लगाने पड़ते हैं, उससे कश्मीर का पर्यावरण दूषित ही नहीं, प्रदूषित होता है।''
''और मैं सोचता हूं कि आपके हिंदू-द्वेष, आपके पिता मुफती के पाकिस्तान-प्रेम, गिलानी के देशद्रोह ने कश्मीर की वायु में इतना विष घोला है कि यहां कोई हिंदू सांस भी नहीं ले सकता। जीवित रहने के लिए उन कश्मीरी हिंदुओं ने अपने श्रीनगर के बंगलों के बदले, दिल्ली के फुटपाथ पसंद किए हैं।''
''हम तो उन्हें बुला रहे हैं, पर वे आते ही नहीं हैं।''
''आप उनकी संपत्ति की वापसी, उनके प्राणों की रक्षा और उनकी स्त्रियों के सम्मान की रक्षा का आश्वासन दे सकती हैं ?'' रामलुभाया ने बहुत साहस किया।
''उसमें तो कोई कठिनाई ही नहीं है।'' महबूबा हंस रही थी, ''वे मूर्ख इस समस्या का सरल सा समाधान नहीं समझ पा रहे हैं।''
''अच्छा, आपके पास इस का कोई समाधान है ?'' रामलुभाया प्रसन्न हो गया।
''क्यों नहीं ।''
''आपने बताया नहीं।''
''बताया नहीं, पर समझाया तो है। वे समझे ही नहीं। उठकर चल दिए।''
''क्या समाधान है ?'' रामलुभाया ने पूछा।
''बस कलमा पढ़ लें।'' वह बोली, '' देखिए, इतने लोग हज के लिए जाते हैं। पर किसी ने आज तक कहा कि उतने लोगों के एक साथ एक स्थान पर इकट्ठे होने से किसी प्रकार का कोई प्रदूषण होता है ?''
''नहीं। किसी ने नहीं कहा।''
''तो मेरी बात की सच्चाई प्रमाणित हो गई न ?''
''कश्मीर में मुसलमान सुरक्षित हैं ?''
''आपकी फौज खड़ी है। सुरक्षित ही हैं।'' महबूबा ने कहा, '' बस कभी कभी किसी मुजाहिद का मन कर आता है, तो वह अपनी पसंद की लड़की के साथ कुछ देर रह लेता है। कभी कोई अच्छा न लगा, तो उसे गोली मार देता है। बाकी सब तो अमन अमान ही है।''
''भारतीय फौज हट जाए तो कश्मीर की क्या स्थिति होगी ?''
''वही जो अफगानिस्तान की है। आखिर वहां भी तो किसी समय उन्नत सभ्यता और संस्कृति थी। वही कश्मीर का होगा। लोग कबीलों में रहेंगे और ठायं-ठायं करते रहेंगे। न पाकिस्तान उन्हें रोक पाएगा, न चीन।'' वह हंसी, ''इसी लिए हम चाहते हैं कि हिंदुस्तानी फौज यहां रहे, पर हमारे कहने में रहे। हमें भारत का अंग न माना जाए, पर सारे भारत में हमें भारतीय नागरिक के अधिकार मिले रहें। हम भारत को कोई टैक्स न दें, पर भारत से हमें पैसा मिलता रहे। हम भारत को गालियां देते रहें और भारत मुस्कराता रहे ...।
''अच्छा चलता हूं।'' रामलुभाया उठ खड़ा हुआ।
''आपको शायद बुरा लगा, पर कोई बात नहीं। चलते चलते यह भी सुनते जाइए।'' महबूबा ने कहा, '' आपकी सरकार भी एकदम यही चाहती है।''
रालुभाया को लगा, उसके कान के नीचे तोप का गोला फटा है। पर मर ही मन वह जानता था कि महबूबा सत्य कह रही थी...
हम निंदा करते हैं हमने निंदा की है, हम निंदा कर रहे हैं और हम निंदा करते रहेंगें । जैसे-जैसे जब-जब धर्म की हानि होती है और प्रभु जन्म लेते हैं वैसे ही जब- जब इस देश में बम-विस्फोट होता है, हममें निंदा जन्म लेती है और उसे हम करते हैं । हम कड़े स्वर में निंदा करते हैं, हम अति कड़े स्वर में निंदा करते हैं और हम अति अति कड़े स्वर में निंदा करते हैं । जितना बड़ा ब्लास्ट होता है हमारी निंदा उतनी ही कड़ी होती है। हम चाहे कोई और कदम उठाने में कितनी ही देर कर लें पर निंदा करने में देरी नहीं करते हैं। आपने देखा ही होगा कि उधर ब्लास्ट हुआ और हमारी निंदा ब्रेकिंग न्यूज में चमकने लगती है। इधर लोगों के घायल होने के समाचार, उनके मरने के समाचार फ्लैश कर रहे होते हैं और उधर हमारी सरकार के अति विशिष्ट लोगों द्वारा की गई निंदा चमक रही होती है। आप जानते नहीं हैं कि यह निंदा बड़ा ही महरम का काम करती है। जनता को लगता है कि सरकार खाली नहीं बैठी है, तत्काल कुछ तो कर रही है। हम केवल निंदा नहीं करते हैं अपितु निंदा के साथ मुआवजा भी बांटते हैं। हम हर मरने वाले के परिवार को कम से कम एक लाख की रक्म भी देते हैं। हमारी निंदा में कोरे शब्द नहीं हैं। अगली बार वोट हमें ही देना मेरे आका ! निंदा करने में हम उंच-नीच का ध्यान नहीं करते हैं, जिसे भी अवसर मिलता है वो निंदा करने को स्वतंत्र है। कुछ भी और करने से पहले हाई कमांड की इजाजत की आवश्यक्ता होती है पर निंदा करने के लिए हमें किसी की इजाजत की आवश्यक्ता नहीं पड़ती है। निंदा करने के लिए हम स्वतंत्र हैं। हम व्यक्तिगत रूप से निंदा करते हैं और कैबिनेट की मीटिंग बुलाकर सामूहिक रूप से भी निंदा करते हैं। जब भी ब्लास्ट होता है हम निंदा करते ही हैं । इस निंदा में यू टर्न लेने की आवश्यक्ता नहीं है। आप तो जानते ही हैं कि राजनीति में कितनी बार थूक कर चाटना होता है और गलती से हाई कमांड की निंदा हो जाए तो... राम राम । हम निंदा करते हैं क्योंकि इतनी जल्दी हम कुछ और नहीं कर सकते। वैसे इस मामले में कोई कर भी क्या सकता है। अब तो हमारे पड़ोसी राज्य में प्रजातंत्र आ गया है और वो भी आतंकवाद से पीडि़त है। ऐसे में कोई क्या कर सकता है? अब अमेरिका की बात और है। उसे हमारी तरह पड़ोस- धर्म थोड़े ही निभाना है। हम तो भारतीय हैं, शांति और अहिंसा के पुजारी, हम कोई अमेरिका की तरह गुंडे थोड़े ही हैं जो वहां बैठा हमारे पड़ोस के आतंकवादियों पर आक्रमण करता करवाता रहता है। चीन को जरा हाथ लगाकर दिखाए। वैसे आप यह तो जानते ही हैं कि चीन भी निंदा करने में कम ही विश्वास करता है। आप का जनरल नालेज इतना तो होगा ही कि हम विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र हैं और हमे प्रजातांत्रिक मूल्यों का ख्याल रखना होता है। हम पर बहुत जिम्मेदारी है। अब अमेरिका को देखिए , कहने को तो स्वयं को प्रजातांत्रिक मूल्यों का रक्षक कहता है पर आतंकवादियों को समाप्त करने के नाम पर विश्व में कहीं भी आक्रमण कर देता है। वो तो डरपोक है। आपने देखा ही होगा कि 11 सितम्बर के धमाकों से वो कितना डर गया था। आज तक डरा हुआ है। उसके बाद से उसके यहां कुछ हुआ ? नहीं हुआ न? फिर भी डरा हुआ है। बिना कुछ हुए डरता है। जो डर गया समझो मर गया। हम तो बिल्कुल नहीं डरते। उसके बाद से हमारे यहां कितने धमाके हो गए। हर बार हमने धमाकों की कड़े शब्दों में निंदा की है। ऐसे समय में हमारी देखा-देखी अमेरिका भी निंदा कर देता है। धमाके हमारे यहां होते हैं, निंदा वो करता है। इस मामले में वो हमारा पिछ्छलग्गू है ... खी... खी...खी अमेरिका डर जाता है और कार्रवाई करता है, हम डरते नहीं हैं इसलिए निंदा करते हैं। निंदा करना अत्यध्कि ही साहस का काम है जनाब। अच्छे- अच्छों को टैं बोल जाती है। अपनी आत्मा को कितना मारना पड़ता है! अपने नपुंसक होने का अहसास... हम स्वार्थी नहीं हैं, हम समानता के सिद्धांत में विश्वास करते हैं इसलिए खुद तो निंदा करते ही हैं, दूसरों को भी निंदा करने का भरपूर अवसर देते हैं। जिन राज्यों में हमारी सरकार नहीं होती हैं वहां हम उस राज्य सरकार की भी लगे हाथ निंदा कर लेते हैं और उसे भी अवसर देते हैं कि वह केंद्र की निंदा करे। ऐसा करने से मतदाता भ्रम में रहता है। प्रजातंत्र के स्वास्थ्य के लिए परम् आवश्यक है कि मतदाता भ्रम में रहे। न्यूकलर डील होने का भ्रम, सरकार को बाहर से समर्थन देने का भ्रम, महंगाई पर काबू पाने का भ्रम, जी डी पी का भ्रम आदि आदि भ्रम बने रहने चाहिएं। हम निंदा के लिए समुचित अवसर और पूरा समय प्रदान करते हैं। हमारी पकड़ में जो अपराधी आ जाते हैं, चाहें उन्हें फांसी की सजा घोषित हो चुकी हो, पर हम उसे समय पर समय देते जाते हैं कि जिसका जितना भी मन चाहे, जितना भी समय चाहिए, उसकी निंदा कर ले। आप तो जानते ही है जितनी अधिक निंदा होती है, पाप भी उतने ही धुलते हैं। कबीर के आंगन में तो एक निंदक रहा होगा, हमारे आंगन में तो कई निंदक अपनी कुटिया छवाए मुटियाते रहते हैं। हमें कभी राष्ट्रीय स्तर पर, कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा जो करनी होती है। वैसे हे मतदाता तूं घबरा मत, तूं चाहेगा तो इस निंदा के अतिरिक्त हम कुछ और भी कर देंगें। चुनाव आने दे, तू जो चाहेगा वो करने का आश्वासन तो हम दे ही देंगें । तू कहेगा तो हम ढेर-सारी इंक्वारी करवा देंगें। प्रजातंत्र है, तेरा जितना मन चाहे, हमारी निंदा करता रह, बस वोट हमें देना मत भूलना। चाहे शासक दल हो चाहे विरोधी, निंदा करने का अधिकार सबका है। कोई घटना की निंदा करता है तो कोई सरकार की। सबकी अपनी-अपनी रोटियां हैं जो जनता के जलते तवे पर सेंकी जाती हैं।
कहते है कि प्रोफेसर समाज को आदर्श एवं मूल्यों की प्रेरणा की दावत सदैव देता रहता है। इन्हीं आदर्श एवं मूल्यों की दावत देते-देते वह अपना जीवन समाज की सेवा में गुजार देता है। अब देखिये कल की ही बात है ब्रजेश जी ने कहा कि बीरू जी कुछ भी हो नकुल अंकल के यहां वर्थ-डे पार्टी पर आपको अवश्य चलना है। ब्रजेश जी की यह महान विशेषता है कि वे ऐसे महान आदेश देकर दूसरे शिकार की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे लिये तो ब्रजेश इस अजनबी शहर में माझी की तरह हैं । फिलहाल मजबूरी का दूसरा नाम डी. वी. महाविद्यालय में नयी नियुक्ति।फिलहाल अक्सर ऐसे संकट के दौर में मैं अपने संकट मोचक प्रोफेसर चमन जी का सहारा लेना नहीं भूलता। अत: मैं इस दावत की सूचना संकट मोचक जी के यहां ले गया। सूर्यास्त होने में अभी समय था कि मैं संकट मोचक के घर लपक पड़ा। इन बरखुद्दार मैं यूं तो बारहोमास भैरव का भूत (गुटका की लत) ही लगा रहता है। लेकिन आज साहब जी का रूप एकदम बदला हुआ था। चाय की चुस्कियों के दौर में हमने पूछा भाई साहब सब कुछ मंगल तो है? कहीं घर में या बाहर लपटा झपटी तो नहीं हुई? भाई साहब ने मुंह की गुल्लक सचिन के बल्ले की तरह खोली और खन्न से गुटका थूकते हुये नहीं का छक्का लगा दिया। तभी मैंने अचानक गुगली फेंकते हुए पूंछा 'क्यों सिंगनल की तरह मुंह लटकाये इस तरह शाम को बैठे हुये हैं। इतना सुनकर मित्र महोदय बाथरूम में चले गये और हाथ मुंह धोकर लगभग पांच मिनट बाद लौटे और कपिलदेव की स्टाइल में बोले, क्या बताऊं जो ससुराल से सफेद सूट मिला था शादी के ठीक तीन साल बाद कल पहली बार मेरे शरीर पर उसका लोकर्पण हुआ और कल ही उसकी ये हालत हो गयी, जैसे कि दस्तर खान (खाना परोसने) वाला। हमने कहा भाई जी न्यूज रील मत दिखाओ। पूरी बात स्पष्ट कीजिए कि आखिर माजरा क्या है ? वह उवाचे-कल वाइफ को लेकर मुझे राम बाबू भाई साहब के जाना था। जिद्द करके उसने वही सूट पहनवा दिया। कुर्ते पैजामंे वाले आदमी के जैसे सारे शरीर में प्लास्टर बांध दिया गया हो। चलते समय सारे रास्ते कुत्ते सोहर गाते रहे। जैसे तैसे हम मियां बीबी मौके वारदात पहंुच गये। भीड़ तो बहुत थी। पहुंचते ही श्रीमती जी ने काफी की फरमाइश कर दी। काउण्टर पर तैंतीस प्रतिशत पुरुषों के अलावा स्त्री और बच्चों का ही महासम्मेलन चल रहा था। सूट और इज्जत दोनों बेदाग भी रहे और काफी भी मिल जाए, इसी जुगाड़ में काफी समय निकल गया। काफी न मिलने पर गृह मंत्रालय से जबाव तलब का भयंकर भय ? वहीं दूसरी ओर काफी मशीनें भी अब तरल के बजाय भाप ही उगल रही थीं। जैसे-तैसे दो प्याले लेकर मैं वहां से बच निकला। एक प्याला जैसे ही श्रीमती जी को सुपुर्द किया ही था कि वह जामें से बाहर हो गयीं। बोली 'अन्धे हो क्या ? इतना भी नहीं दिखाई देता। खाली कप लेकर चले आये। शर्म नहीं आती !अपना सूट देख रहे हो ऐसा लग रहा है जैसे होली का त्यौहार।`` मैंने स्थिति की गम्भीरता को देखते हुये मन ही मन भूमिका बनाते हुये इस नाजुक वक्त को टालना चाहा और अपने मंतव्य को व्यक्त किया। भाईसाहब यह सब छोड़िये, रोना-धोना आज मैं आपको ऐसी दावत में ले चल रहे हैं जहां भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को ताक पर नहीं रखा जायेगा और आपकी अस्मिता को कोई खतरा भी नहीं रहेगा। क्या हुआ बफर सिस्टम ही तो है परन्तु अपने कालेज के सभी प्रोफेसर लोग भी तो आयेंगे। डी. वी. कालेज के प्रोफेसर ? भाईसाहब ने भृकुटी तानते हुये मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं आईएसआई का एजेन्ट हूं और हमारे भोलेपन पर वे मोनालिसा जैसी मुस्कान बिखेर दिये। साथ ही कहा कि ठीक है वीरू मामा माहिल की नगरी में तुम्हारा स्वागत है। चूंकि भाईजी को मनाने में काफी समय हो गया था और इधर भूख के मारे पेट की हालत राशन कार्ड की तरह चिथड़े-चिथड़े हो रही थी हम लोगों ने परिवार सहित महाप्रस्थान किया। शरीफों की पार्टी थी, सो पहले खा भी नहीं सकता था, तभी आर्केस्ट्रा मंच से लफ्फाजी हुई ''सभी मेहमानों से गुजारिश है कि वे बगल के पण्डाल में जाकर भोजन गृहण कर लें। इतना सुनते ही पण्डाल की तरफ भीड़ का काफिला बढ़ा। भूख का प्रश्न था वह क्या न करवाये ? मैंने अपने बेगम का हाथ पकड़ा और कहा चलो भोज के लुटेरों में शामिल हो जायें। यह वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि एक भारी भरकम नारी का कंठ फूटा ''शर्म नहीं आती, इतनी जोर से हाथ पकड़ते हुये किसी अजनबी का।`` क्षमा मांगकर मैं अपनी वाइफ की खोज में निकल पड़ा। यहां भी बड़े बफर सिस्टम का खेल चल रहा था जैसे भारतीय राजनीति चलता रहता है, अब मेरा पूरा ध्यान सूट को कलंकित होने से बचाने में लगा हुआ था क्योंकि यहां हमारे सूट की अस्मिता का खतरा वैसे ही मंडरा रहा था जैसे बेमेल गठबन्धन सरकार के भविष्य पर। उधर भोज के लुटेरों में आर-पार का संग्राम चल रहा था। प्लेटों की ढाल और चम्मचों की तलवारों के घमासान में कई योद्धा विजयी हो चुके थे। उनके कपड़ों पर सब्जी, चटनी, रायता आदि इस बात की गवाही थी कि वे खानदानी पार्टियों के प्रतियोगी हैं। मैंने इस बीच अपनी बगल में झांक ताक की तो पत्नी एवं प्रोफेसर मित्र गायब/नदारत थे कही अर्थात नजदीक फटक नहीं रहे थे। हालांकि मैं अपनी पत्नी के बारे में मैं पूरी तरह से संतुष्ट था क्योंकि खाने पीने के मामले में उसकी उदारता से मैं भलीभांति परिचित था तभी सामने मैंने देखा कि चाऊमीन वाले मोर्चे पर हमारी पत्नी 'खूब लड़ी मर्दानी झांसी की रानी` की तरह चौकड़ी भर रही थी, उनके इस अदम्य और ऐतिहासिक साहस को देखकर मेरा पुरुषार्थ हिलोरें मारने लगा। कॉलेज में पढ़ते समय अक्सर में क्लास को बंक करता था और गोरिल्ला तकनीक अपनाता था यहां भी मैंने पुरानी तकनीक का सहारा लिया और मैंने गोरिल्ला युद्ध अपनाया। आधुनिक सुष्मिताओं, ऐश्वराओं एवं कैटरीनाओं की आड़ लेता हुआ मैं प्लेट और चम्मचों के बिल्कुल नजदीक आ गया। प्लेट और चम्मचों की संख्या भीड़ के अनुपात में भारत की विदेशी मुद्रा भण्डार की भांति नगण्य थी। इसी समय पाण्डाल के पीछे से नयी रसद भी आतंकियों की तरह आ गयी। प्लेटों की सफेदी पर सब्जी, रायता, चटनी आदि जख्मों के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे। हमारे पूरे होशोहवास में सूट अभी तक कुंआरा था। चम्मच और प्लेट पर हाथ लगते ही मेरे आत्मविश्वास का पेट्रोमेक्स रोशन हो उठा। अभी आगे की रणनीति बना ही रहा था कि भोज के लुटेरों की रिफाइण्ड खेप आ गयी। एक ही धक्के में मैं सलाद के मोर्चे पर तैनात हो गया। टमाटर और मूली के चंद टुकड़े ताज होटल की तरह घायलावस्था में इधर-उधर पड़े थे। डूबते को तिनके का सहारा। मैंने उन्हें नोबेल पुरस्कार की तरह बटोर लिया। मैं रेंगते-रेंगते जब सब्जी वाले मोर्चे पर पहुंचा तो वहां युद्ध विराम घोषित हो चुका था। सभी कटोरे सोने की चिड़ियां वाले राष्ट्र का वर्तमान बन चुके थे। कुछ चावल एक कटोरे की धाल से चिपके मिले। कृष्ण द्रौपदी प्रकरण को याद करते हुये इस अक्षय पत्र की ओर आहिस्ता-आहिस्ता मैंने उसे उधेड़ा। मूली और चावल की अजीबो गरीब काम्बिनेशन को आधुनिकता का पैमाना मानकर मैंने उदरस्थ कर लिया और फिर एक बार पत्नी एवं प्रोफेसर मित्र की तलाश मेंं निकल पड़ा। पार्टी के इस महासंग्राम में हमारी प्यास देवी जाग्रत हो गयीं। पानीपत का यह महासंग्राम ठीक सामने वसूली काउण्डटर के बगल में छिड़ा हुआ था। मैं जिस गिलास को उठाता वह धक्के खाकर अपने मूल रूप में आ जाता तभी मैं देखता क्या हूं कि एक वीरांगना हाथों में दो गिलास लिये प्रकट हुयी। उसने उदारता का परिचय दिया। एक गिलास मुझे हैंडओवर किया। हमने गौर फरमाया तो पता चला कि यह तो मेरी ही पत्नी है। मैंने पूछा ये क्या हालत बना रखी बेगम साहिबा। वह बोली बफर सिस्टम है भारतीय संसद की तरह है, जो जीता वही सिकन्दर।`` यह फरमाकर वह अगले शिकार के लिये निकल पड़ी। मैंने कुशल पत्नी धर्म का निर्वहन करते हुये उनका पीछा किया। किन्तु वह गायब हो चुकी थीं और यह मोर्चा मेरे सूट के लिये काफी संवेदनशील था। बच्चे, बूढ़े, औरतें सभी के सभी आइसक्रीम-आइसक्रीम चिल्ला रहे थे। हमारी पत्नी साहिबा ने यहां भी सफलता प्राप्त की। जैसे उन्होंने हमें आइसक्रीम की कागज वाली प्लेट वह पकड़ाई उछल पड़ी। बोली सत्यानाश कर दिया ! ये सूट है या सब्जी का बाजार। पास में खड़े हमारे मित्र प्रोफेसर इस नजारे को देखकर कुटिल मुस्कान बिखेर रहे थे, उनसे रहा नहीं गया और बोले यार ऐसी आधुनिकता किस काम की जो आदमी को बहसी बना दें ? मैंने भी उन्हीं की कपिल देव वाली स्टाइल में मुस्करा कर कहा कि मित्र देवता बफर सिस्टम आधुनिकता ही नहीं है बल्कि यह समूचे भारतीय लोकतंत्र की हकीकत है, रोटी के लिये लड़ते हुये इंसान की जीती जागती यह तस्वीर है ?
असल में नेता जी जबसे कवि बने हैं; समस्या बढ़ती ही जा रही है। अक्सर ही पार्लियामेंट में बजट पेश करते-करते भावविभोर होकर कविता सुनाने लग जाते हैं और कवि सम्मेलनों में बढ़ती मंहगाई और देश के आर्थिक संकट पर भाषण दे आते हैं।
कल की ही बात ले लीजिए, एक अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में प्रसिद्ध हास्य कवि श्रोताओं को गुदगुदाते हुए सुना रहे थे- पत्नी बोली –ए जी, अमेरिका के कवि सम्मेलन से मेरे लिए के लेके लौट्ये? मै बोल्यो- डेढ़ लाख जूते मिले हैं, कहे तो थारे लिए भी ले आऊँ !
अभी वे अपनी हंसिका सुना भी न पाए थे कि आयोजक दौड़े-दौड़े आए और हंसी के फव्वारों बीच धीरे से कान में फुसफुसाए- अब आप बैठ जाइए श्रीमान। नेताजी, खजूरी मल हो चुके हैं विद्यमान। अपनी नवी पुष्तक ‘रूप के जाल ’ संग, चढावेंगे अब वो ही चोखो-चोखो आपणो रंग।‘
लार-सी बह आई कविता को रूमाल से पोंछते, चुपचाप कोने में जा बैठे, सभी कवि बेचारे।
श्रोताओं की वाहवाही से गमकता माइक अब था छप्पन भोग का थाल, जिसको भिनभिनाती मक्खियों की निगाहों से बचाकर, बड़ी सुघड़ता से नेताजी ने लिया था अपने हाथों में संभाल।
अब वे थे और था विशाल जन समुदाय। देख और न कोई उपाय, खरहरा हाथ में लेकर बुदबुदाए कविवर नेताराम ‘कविता सुन्दरी मुझे लुभा रही है। ओजस्वी धारा यह बही जा रही है। कभी उबारती तो कभी डुबोती, नित नए करतब दिखलाए जा रही है।‘
दर्शकों को समझ नहीं आया, नेताजी भाषण दे रहे हैं या कविता पढ़ रहे हैं।...कुछ उचके-बिचके, कुछ ने इधर-उधर ताका-झांका, पर कोई करतब नजर नहीं आया बांका। सच कहें तो क्या कहना चाह रहे हैं यह तक नहीं जान पाए बेचारे। बढ़ती खामोश उलझन को भांप, नेताजी काल्पनिक आंसुओं को रूमाल से पोंछते पुनः मुस्कुराए और हाथ जोड़कर कविता पसंद करने के लिए धन्यवाद परोस लाए।...
अब ह़ाल तालियों की गड़गड़ाहट से लगा गूंजने। आगे वे क्या बोले, किसी को सुनाई नहीं देता था। सच कहें तो, वैसे भी फरक नहीं था पड़ता था। अधिकांश की समझ को कविता और भाषण का भेद दुरूह था। नेताजी सामने हैं, बस यही बहुत था। चारो तरफ मदहोशी का आलम था। लच्छेदार शब्दों का जाम लबालब बहे जा रहा था। सेठ-साहूकार, लुच्चे-लफंगे, छोटे-बड़े, विद्वान-मूर्ख, भांति-भांति रूपी कवियों को संग बहाती, न्यूयार्क, पैरिस, लंदन घुमाती काव्य-धारा में एकत्रित हर व्यक्ति हाथ धोने को तैयार था और चुटकुले व फिल्मी गाने याद कर-करके कविता पर हाथ-पे-हाथ अजमाता जा रहा था। विश्वास था सबको कि आज जो ये छोटे-बड़े नेता मंच से कविता सुनते-सुनाते जा रहे हैं, उसका असली राज अब उनके भी हाथ आ लगा है। यूं तो ये काव्य आयोजन वे भी आराम से कर सकते थे और नेताजी जैसी कविताएँ भी थोक में सुना सकते थे, बस वह दूसरी शर्त ही थी, जो परेशान कर रही थी। वाक् चातुर्य के साथ-साथ चंदा लेने और देने की की सामर्थ और नेतागिरी की चतुराई किस दुकान में मिलती थी। कविताई के आड़े आ जाती थी जब जब यह बात, कवि बनने के बन्द कर देती थी सारे द्वार। वरना, लक्ष्मी की कृपा से तो कल्लू हलवाई भी कुछ रबड़ी, कुछ जलेबी खिलाकर और पांच हजार रुपए का चंदा देकर ही बनजाता है शिरोमणि कविभूषण कल्लू राम। अब इस बात को उलटकर ऐसे भी समझा जा सके है कि आज के जमाने में कविता लिखना-पढ़ना भी नेतागिरी से कम जोखिम भरा काम नहीं। शौक यह राजसी है कोई आम नहीं। हां, हो भी क्यों न, दोनों को ही तो लाइट में रहना होगा, जरा भी बेवक्त की बूंदाबांदी हुई नहीं कि बेजोड़ के तारों से करेंट सहना होगा। चारो तरफ रिपोर्टर जासूसों का पहरा है और चतुर्मुखी राज्य करना...चौबीसों घंटे हंसी के गोलगप्पे तो कहीं वाहवाही खाना और परोसते जाना, बड़ों-बड़ों का हाजमा बिगाड़ने के लिए काफी है।
पर, हम ज्यादा इस फेर में न पड़कर जो सहज समानताएँ हैं एक नेता-अभिनेता और कवि में उन्ही पर नजर डालते हैं ताकि नेता-अभिनेता और समाजप्रणेता सभी की समझ में बात जरा और अच्छी तरह से आ जाए और कवि-समुदाय के सागर किनारे बैठकर लहरें गिनना भूल जाएँ। अब विदेशों में ही नहीं, भारत के तटों पर भी तो चढ़ते-गिरते शेयर बाजार की तरह सुनामी वक्त-वेवक्त आता-जाता रहता है।
हाँ, तो जब-जब ये हाथ उठाकर, मुठ्ठी बांधे जोशीली कविता सुनाते हैं और तदुपरान्त चुपचाप पीछे के दरवाजे से सटक जाते हैं, कभी सड़े टमाटर तो कभी जूतों की माला से डर जाते हैं, तो आम आदमी को तो निश्चय ही कवि में नेता और नेता में कवि या अभिनेता नजर आने लग जाते है। वैसे भी भगवान के सिवा यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रकट हो जाना फिर तुरंत ही अंतर्ध्यान भी हो जाना, गुर भी तो बस इन्हें ही आता है। सभी का मंच, माइक और माला का प्यार इतना गहरा है कि जनता जनार्दन के इर्द-गिर्द ही इनकी किस्मत का फेरा है। फिर भीगे जूतों और सड़े टमाटरों के हार से जो डर जाए वह कैसा नेता, कैसा अभिनेता और कवि तो हरगिज ही नहीं होता।...घड़ियाल की चमड़ी और घोड़े का जिगर, ये गुर तो घुट्टी मे ही सीखकर आना है। जीना-मरना वक्त-बेवक्त का गाना है। निरर्थक शब्दों के बुने जाल पर ही जीवन ठहरा है। हरेक के मन पर तारीफों का सदा रहता पहरा है। मनाना और मुकरना, वक्त पड़ने पर गधे को बाप बनाना भलीभांति इन्हें आता है। कोई सुने या न सुने, अपना ही गाना गाना है। शब्दों की ही तो ये खाते हैं। शब्दों को ओढ़ते-बिछाते हैं और थकें तो इन्ही पर सो तक जाते हैं। शब्द ही तो हैं इनके जो आम जनता को डुबाते और बहकाते हैं, दिन-रात सब्ज बाग दिखलाते हैं।
हां, तो कहाँ बहक गए हम आप, बात नेता-अभिनेता या कवि की नहीं, नेता जी की किताब की हो रही थी आज, उसकी मुंह दिखाई की हो रही थी। भूलना ही होगा कि कैसे ये शब्दों को थोक भाव से खरीदते और बिकवाते हैं और फिर कैसे-कैसे उन्हें दुकानों पर सजाते हैं।... खुद लिखते हैं, कुछ दूसरों से लिखवाते हैं। तो जनाब वक्तव्य खतम होते ही नेता जी के पी.ए. ने दुल्हन-सी लाल चुनरी और कई -कई की खरीदी तारीफों के वक्तव्य में लिपटी किताब निकाली और मेज पर मुंह दिखाई के लिए जमा दी। लोगों को पहले से ही खबर लग चुकी थी कि आज आम नहीं, नेताजी की पुष्तक के लोकार्पण की दावत थी। सो कवि सम्मेलन तो आने का मात्र एक बहाना था, कम-से-कम चार मिठाई और चार नमकीन गरमागरम चाय के साथ होंगे, हर व्यक्ति ने जाना-माना था।
चारो तरफ किताब का जोरदार प्रचार था। नेता-अभिनेता, सब्जी वाले, रिक्शेवाले सबके हाथ में एक प्रति किताब की और साथ में खड़े, मुस्कुराते नेता जी की छवि थी। हर अखबार और चौराहे पर, मोटर और बसों के पीछे यह छपी थी। कोने-कोने मुफ्त बांटी जा रही थी। जाहिर है कि कवि सम्मेलन पर भी छायी रही। कितने कविता के लिए, कितने चायपानी को पहुंचे, कहना मुश्किल था, पर वहां पर बड़ी भीड़ थी!
नेताजी ने चारो तरफ संतुष्ट नजर डाली। अब नेताजी के नाम के और कुछ नेताजी के काम के नारे लगा रहे थे। कुछ सिरफिरे तो एक दूसरे को एक-एक नारे के मिलते दाम भी खुश हो-होकर बतलाए जा रहे थे। पर, नेता जी, ठहरे नेताजी, धन्यवाद एक बार और जोर से देकर बात संभाल ली और उछलती पगड़ी ‘ चलता हूं। अभी शहर में किताब के दस बारह और लोकार्पण होने हैं’ कहकर तुरंत ही वापस भीड़ की बागडोर संभाल ली। पास के दरवाजे से बाहर की राह वे लेनेवाले ही थे, कि एक तख्ती पर लिखा नजर आया- ‘ गली-गली में शोर है, नेता हमारा चोर है।‘ नेताजी का माथा ठनका, तुरंत ही सीक्योरिटी को अलर्ट कर डाला- ‘ अब यह आत्मघाती कैसे आ धमका, सी.बी.आई की तो पहुंच नहीं यहां ? क्या पाकिस्तान का इसमें हाथ है, या फिर किसी बड़ी ताकत ने दिया साथ है? ‘
सीक्योरिटी ने तुरंत ड्यूटी कांस्टेबल से कम्प्लेन दर्ज करवाई और जल्द-से-जल्द आपतकालीन एक सुरक्षा मीटिंग बुलवाई।
‘घबराएं नहीं आप ‘- तसल्ली देता वह नेताजी से बोला- ‘ देखिए, अब इससे क्या? कार्यक्रम में बहुत फरक तो नहीं पड़ता। भारत है यह, यहां हर मिनट पर पचासों आदमी हादसे से है मरता। फिर यहां तो बस फोटो पर फोटो हैं और बातों पर बातें हैं। गरम-गरम चुस्कियां और चटखारे लेती चाटें हैं।‘
हर व्यक्ति अब फोटो खिंचवाए जा रहा था, कहकहे और यादों के बीच, परिचित-अपरिचितों को अजीबो-गरीब किस्से पर किस्से सुनाए जा रहा था। कहीं अंग्रेजों के जमाने की बातें थीं तो कहीं इमरजेन्सी की रातें थीं। कहीं ‘हलो माई डियर था ’ तो कहीं ‘ फीयर नौट, एवरी थिंग विल बी क्लीयर ’ था। कविता गवास की बदहजमी से परेशान कवियों के लिए अब वहां चारो तरफ वहां सुख-सरिता थी। कविता...और बस कविता थीं। न कोई बंदिश, न घंटी, और न घड़ी, मजे की बात तो यह कि- एक सुनाओ और सैंकड़ों की फरमाइश थीं।
शेर पर शेर चुटकुले पर चुटकुले बरसाती नदी से बहने लगे और आते-जाते छपाछप हाथ-पैर धोने लगे। देखकर इतना बहका-बहका आलम, एक मौकापरस्त नेता जी ने लपक कर नेताजी का पीछे-से पकड़ लिया दामन ... ‘कहां चल दिए आप श्रीमान, अभी तो किताब को सम्मान भी नहीं दिलवा पाया। आपके उपकार का पाई-पाई कर्ज चुकाऊंगा। कुछ आपको और कुछ खुद को, नित नए सम्मान दिलवाऊंगा।‘
नेताजी सुनते ही दरवाजे से पलट आए और दीवानों की महफिल में किताब की तारीफ में नए-नए कलमे पढ़वाए। उपस्थित जनों ने भी रुंधे गले से खूब सुना और सुनाया-‘ श्रीमान, रिधिमान हैं। अन्नदाता और नेता महान हैं। बरसों-से देश का भार उठाया है, निरक्षर हैं तो क्या, अब जब कलम आपने उठाई है। हमारी किस्मत भी तो संग-संग चमक आई है। देश-विदेश भ्रमण के किस्सों पर लिखी आपकी यह कविता की किताब, निश्चय ही, प्रेरणा ही नहीं हमारे लिए, संजीवनी बूटी और सपनों की एक खान है। थोड़े को ही बहुत समझिएगा, श्रीमान। जान लीजिए आप हमारी इस बात में कितना खम है, किताब की क्या कहें, जब कवर तक में दिखता इतना दम है।‘
कबूतर की तरह छाती फुलाकर नेता जी ने इधर-उधर देखा और गुटरगूं, गुटरगूं वाले भाव-विभोर अन्दाज में तुरंत ही संरक्षण का भरपूर दाना दे डाला।
अब सभी चौबीसों घंटे नेता जी के साथ ही रहते हैं। दिन-रात चुगाली करते हैं और सपनों की चारी खा-खाकर गुटुरगूं करते हैं। सुबह उठते ही तोते-सा दोहराते हैं... ‘श्रीमानजी आप महान हैं....वगैरह-वगैरह।‘ और कविता की अपच से परेशान हैं। खाना-पीना तो दूर रहा, नेता जी की किताब से कविता सुनकर ही चाय की प्याली तक पी पाते हैं। नए-नए शौक की जो खुमारी है, नेता जी अब दिनरात उसी में डूबे रहते हैं और वे बेचारे बगल में बैठे-बैठे मन ही मन उस दिन को रोते हैं, जब मुफ्त के रसगुल्ले और समोसों का ध्यान आया था और अखबार में किताब के लोकार्पण की खबर पढ़कर नेताजी के साथ दोस्ती का पेंग बढ़ाया था।
परेशान हैं बेचारे कल जब एक महीना बीत जाएगा, तब तो होने ही होंगे सारे-के-सारे वारे-न्यारे। आखिरी कविता सुनते ही वह निर्णायक दिन भी आ जाएगा, जो उन्हें आजीवन कारावास की राह दिखलाएगा। वे मंत्री जी का भला कैसे सामना कर पाएंगे... किताब की शान में सच कहें या अपनी जान बचाएँ , निर्णय यह कैसे ले पाएंगे! हो, या न हो, ढूंढना ही होगा अब तो उन्हें कि कौन सी कविता है किताब में, जो नेताजी को शीघ्र-ही श्रेष्ठ कवियों की कतार में पहुंचाएगी और सम्पूर्ण साहित्य की जान बन जाएगी।
उसदिन से आजतक वे दिनरात नेताजी की किताब के पन्ने पलट रहे हैं और शब्दों के एक बीहड़ जंगल में भटक रहे हैं। फिर भी लगे पड़े हैं बेचारे मिलजुलकर, शायद कोई हीरा छुपा ही हो कोयले की खान में। तो जान गए न बुद्धिमान, क्यों नेता जी और कवि, दो शरीर होकर, आज तक भी हैं एक जान।...
इन दिनों चारों ओर होली की बहार है। साल भर मुखौटा लगाकर घूमने वाले इस फिराक में हैं, कि कम से कम एक दिन तो अपने ‘असली’ रूप में सांसरिक स्टेज पर अवतरित होकर, बिना हींग-फिटकरी के, चोखा रंग बिखेर सकें। बच्चों में बला का उत्साह है, जवानों में गज़ब का जोश है और ‘ सीनियर सिटीजन्स ‘ की लुप्त हसरतों की बासी कढ़ी उबलने को बेताब है-गोया तमन्नाएँ ‘ रॉक एंड रोल‘ करती फिरती हैं। जो बदनसीब ‘ वेलन्टाइन-डे‘ के खुले आमंत्रण के दौरान, नयनसुख उर्फ ‘ चक्षु व्यायाम‘ तक से वंचित रह गए थे, वे भी स्पर्श-कामना के दिवास्वप्नों में मग्न हैं।
टी.वी. के हर चैनेल पर, होली के चुनिन्दा मदमस्त गीत, जन-जन के तन-मन पर, बला की उर्जा बरसाते हुए, अज़ब की उष्मा का पलीता लगा रहे हैं।
यूँ तो उन पचास ‘ वसन्तों‘ की अपनी रंग-विहीन जिन्दगी में, हर साल ही अपने इर्द-गिर्द की होली देख पाने के अवसर मिलते ही रहे हैं, किन्तु इस बार दिल से तमन्ना की, कि कुछ खास लोगों की होली का अन्दरूनी ज़ायज़ा लिया जाये-सो सबसे पहले, हम एक मशहूर फिल्लम-अभिनेत्री के बदनाम सेक्रेट्री को किसी तरह पटाने के बाद, उनके ड्राइंगरूम में दाखिल होकर पूछ बैठे -‘‘ हां, तो सुश्री मुनमुन जी, आप होली कैसे मनाती हैं? “ उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा-‘‘ जी, आप तो जानते ही हैं, कि हमें तो साल के बारहों महीने मेकअप के रंगों को ओढ़ना-बिछाना पड़ता है और ‘ टेक-रिटेक‘ के चक्कर में जबरन की इतनी ‘ चिपटा-चिपटी ‘ हो जाती है , कि मैं तो होली के दिन, अज्ञातवास के बिस्तर पर, चादर तानकर चैन की नींद सोती हूँ। वैसे भी उन बेगेरतों से क्या होली खेलना, जो मुझ जैसी ‘सती-सावित्री‘ की ‘ पर्सनल लाइफ‘ के जीवन में सदा कीचड़ उछालते रहते हैं। हां, शाम को कुछ खास लोगों की महफिल में खा-पीकर दो-चार ठुमके लगा लेती हूँ।‘
किसी ‘हीरो नं. वन ‘ आतंकवादी के रूबरु होने का दुस्साहस तो अपने बस की बात है नहीं, अतः हमने एक खूंखार ‘ जालिम खां‘ को फोन करके पूछा- ‘ महामहिम जी, होली के शुभ दिन आप अपनी प्राणेश्वरी ए.के. 47 से जुदा होकर कुछ मौज-मस्ती करते हैं या.... ? ‘ उन्होने गर्जनापूर्ण वाणी में उचारा-‘‘ मां कसम! अगर हमसे देवर-भाभी और जीजा-साली की होली की बात कर रहे हो, तो फोन पर ही ‘ शूट‘ कर दूंगा। अरे ! हम मर्द हैं –हम तो ख़ून की होली खेलते हैं, जो साल के 365 दिन कभी भी और कहीं भी खेली जा सकती है । नामाकूल! गुलाल-अबीर में वह दमख़म कहां, जो हमारी ‘ इस्टाईल ‘में दूसरों के रंग में भंग कर सके। बाक़ी मौज-मस्ती तो हम किसी भी शरीफ या बदमाश की इज्जत की होली जलाते जब-तब करते ही रहते हैं।‘‘
कुछ देर बाजार में मटरगश्ती के दौरान, हम एक फुदकते हुए छात्र नेता से टकरा गये। लगे हाथों हमने उनसे भी पूछ ही लिया- ‘‘ इस बार होली पर जनाब के क्या इरादे हैं ? “ , उन्होंने अट्टाहास का रंग बिखेरते हुए फ़रमाया-‘‘ यू नो, होली मीन्स हो हुल्ला एंड हुड़दंग। सो हमारी स्टूडैंट-बिरादरी होली को बहुत ‘लाईक‘ करता है। पेड़ों कोकाटकर सड़कों पर ‘ले‘ करना और ड्राइवरों, सवारियों से चरस पीने के लिए ज़बरन चन्दा मांगना तो हमारा एनुअल प्लान है ही, इस बार भंग की तरंग में गली-गली घूमने के मुकाबले, हम होली को लार्ज-वाइड लेबल पर सेलिब्रेट करना मांगता है।‘‘
अभी हम छात्र-नेता के खयाली-पुलाव-कुंड में डुबकी लगा ही रहे थे, कि सामने चौधरी मिश्री लाल जी अपनी गद्दी पर विराजमान दिख गये। हमने उनसे हंसी-हंसी में पूछा, ‘‘नेता जी, क्या ठाठ हैं आपके। इस बार होली पर आपका क्या परोगराम है ?‘‘ उन्होंने नाक भौं सिकोड़ते हुए बताया- ‘‘ भैया हमें तो रंगों के नाम तक से एलर्जी हैगी, पर क्या करें -राजनीति में तो मन्दिर-मस्जिद के लिए एक साथ लड़ने के बाद भी, इफ़्तार पार्टी और होली-मिलन को एक ही तराजू पर तौलना पड़ता हैगा जी। कुछ दिन पहले सेवैयों का लुफ्त उठाया, अब गुँजिया गटकने के वास्ते हाज़मा दुरुस्त कर रहे हैंगे। ‘‘
तभी हमें अपने दोस्त हल्दीराम की याद आई, जिसके लिए होली मनाना किसी जुनून से कम नहीं हुआ करता था। उसके ड्राइंग-कम-डाइनिंग-कम-लिविंग-कम-बैडरूम रूपी इकलौते कमरे में दाखिल होते ही, उसने हमें गले लगाकर भींच डाला। हमने कहा- ‘‘ कहो प्यारे! तुम्हारा होली का बुखार बरकरार है या वक्त की रफ्तार ने उस बहार को बाहर का रास्ता दिखा दिया है? ‘‘, उसने ‘ छुटती नहीं है गालिब, यह मुँह से लगी हुई‘ के अन्दाज में बताया-‘‘ यार, हमें तो उन नामुरादों के साथ जबरन होली खेलने का शौक था, है और इंशाअल्लाह रहेगा भी- जो होली के नाम पर इस तरह बिदकते हैं, जैसे हजार दमड़े रोज झटकने वाला पनवाड़ी आयकर के नाम पर मुँह पिचकाता है। अहा! क्या सीन होता है-जब अपन किसी कोने में दुबके शिकार को पहले तो टनों पानी से नहलाते हैं, उसके बाद उसके अंग-अंग पर रंग ऐसा रंग पोतते हैं, कि पट्ठा जिन्दगी भर भूल नहीं पाता होगा। पिछली बार तो एक ऐसे ही डरपोक द्वारा दरवज्जा न खोलने पर, हमने उसकी छत की टंकी में थोक भाव से रंग घोल दिए थे।
अगली प्रातः मन्दिर के आहते में, शिव के अनन्य भक्त श्रीमान रिश्वत लाल के सुपुत्र श्री नटवर लाल के दर्शन हो गये। हमने उस हस्ती से करबद्ध निवेदन किया- ‘‘ महादेव, क्या आप बमभोले जी को साक्षी मानकर अपनी ‘अन्दरूनी‘ होली का खुलासा देने का कष्ट करेंगे? ‘‘, उन्होंने बेहिचक बता ही डाला ‘‘आप तो जानते ही हैं, कि जहां हमारे पिताश्री का मूल मंत्र रिश्वत लेकर भी काम न करना है, उसी परम्परा में हम भी गुलाल की बोरियों में और कुछ भले ही डालें, होली के रंग नहीं मिलाते। अन्यथा हमारे सड़े-गले पीतल पर मुनाफे का सुनहरा रंग कैसे चढ़ पाएगा? ‘‘
मन्दिर से घर की ओर आते समय, पड़ौस में देखा, कि मटरू राम उसी मुस्तैदी से ईंटे ठो रहा है। हमने उससे भी जानना चाहा-‘‘और मटरू, होली पर तुम का करत हो? ‘‘ बेचारे के बदरंग चेहरे पर, हल्की सी मुस्कान चली आयी। उसने ठंडी सांस लेकर कहा- ‘‘ बाबू जी, आप तो जानत हो, साल भर मुई मंहगाई अऊर ससुरी सरकार की वजह से, पल भर का चैन नाहीं मिलत। सो, होली के दिन हम सब दुःख-दर्द भुला के, अद्धे-पव्वे की तरंग मां मस्त हुई के, खूब होली खेलत रहिन।‘‘
मटरू की बेचारगी के मुक़ाबले, आसपास देखता हूं, तो लगता है, कई महानुभावों का तो हर दिन होली का दिन और हर रात दिवाली की रात होती है। उनका हर दिन किसी ना किसी को चूना लगाने में बीतता है, फलस्वरूप हर रात उनकी हवेलियों में घी के चिराग जगमग करते फिरते हैं। पता नहीं, इन लोगों की होली हो ली कब होगी?
बीरबल से ज्यादा हाजिरजबाव, जिन्दादिल और बुद्धिमान अकबर को पूरे दरबार में दूसरा न दिखता था। दिनरात वे उसकी तारीफ करते न थकते थे। बीरबल...बीरबल, बस यही सुन-सुनकर दूसरे सभी दरबारियों के मन में हीनता की भावना आने लगी और वे उससे जलने लगे । कैसे भी बीरबल से छुटकारा लेना होगा- तरह-तरह के उपाय सोचने लगे वे-कि अकबर भी नाराज न हों और बीरबल भी हट जाए। जल्दी ही सयाने नाऊ के सिर में एक विचार आया और उसने अन्य दरबारियों के संग बैठकर योजना बनाई फिर तुरंत ही उकसावे में आकर नाऊ अपनी योजना लेकर बादशाह के आगे हाजिर भी हो गया।
हुजूर जान बख्शें तो एक अर्ज करूं - अदाब फरमाते हुए वह बोला।
हां, हां, जान बख्शी। क्या कहना चाहते हो, तुम...कहो। - बादशाह ने भी वचन देते हुए जबाव दिया।
कल रात सपने में मुझे आपके पूर्वज बेहद उदास दिखे, हुजूर। हममें से एक किसी को परलोक जाकर उनके हालचाल ले आने चाहिएँ। और बीरबल के अलावा इस जोखिम भरे काम को कौन कुशलता से निपटा सकता है - मन-ही-मन खुश होते हुए नाऊ ने बादशाह के आगे अपनी बात रखी।
हां हां, क्यों नहीं, ख्याल तो नेक है-उन्होंने बीरबल की तरफ देखा।
जी हुजूर, यह कौन-सी बड़ी बात है, कल ही हो आता हूं-बीरबल ने भी मुस्कुराकर तुरंत ही जवाब दिया।
नाऊ की सफलता पर सभी दरबारी बहुत खुश थे-बीरबल तो गया परलोक, अब क्या लौटेगा।
बीरबल ने भी जाने की तैयारी में नए कपड़े, जूते, पगड़ी सब जरूरत की चीजें जी भर-भरकर खरीदीं और साथ में ढेरों फल मिठाई भी। तरह-तरह की सौगातों से लदा-फंदा अकबर के आगे अगले दिन ही हाजिर हो गया वह। हुजूर! बाकी तैयारियां तो हो गईं, एक नाऊ का इन्तजाम और हो जाए, तो मैं चलूं।
वह क्यों ? बादशाह के साथ-साथ सभी दरबारी भौंचक्के थे।
बात दरअसल यह है कि हुजूर के दादा-परदादा सैकड़ों साल से परलोक में बैठे हैं। वहां हूर और परियां, बाकी ये सब सुख सुविधा तो उपलब्ध हैं, पर एक नाऊ नहीं। अब तक तो उनकी दाढ़ी-मूछें घुटने तक आ गई होंगी। खाने-पीने तक में तकलीफ होती होगी उन्हें। नाऊ की सख्त जरूरत जान पड़ती है, वहाँ। मुझसे तो उनकी परेशानी सोची तक नहीं जाती। खिदमत में नाऊ भी ऐसा-वैसा नहीं, शाही ही होना चाहिए।
चतुर बीरबल की सारी बात समझ में आते ही अकबर खिलखिलाकर हंस पड़े पर नाऊ के तो काटो तो खून नहीं बचा था। डर के मारे घिग्घी बंध गई उसकी और बीरबल के साथ अपनी मौत भी साफ-साफ नजर आने लगी । बादशाह के पैरों पर गिरकर लगा जोरजोर से रोने। जान की भीख मांगने लगा। खुद को धिक्कारते हुए बोला- अकल मारी गई थी कि बीरबल से दुश्मनी ली और दूसरों की बातों में आ गया। उसने अपनी गलती कबूल कर ली कि सपने वाली बात मनगढ़ंत थी और बीरबल के खिलाफ उन सभी की मिलीजुली एक चाल थी।
बीरबल को दया आ गई और रोते नाऊ को माफ कर दिया उन्होंने । अकबर को भी याद दिलाया कि वे तो पहले ही इसकी जान बख्श चुके हैं और जहांतक बाकी दरबारियों का सवाल है उन्हें भी सबक मिल ही चुका है कि जो दूसरों के लिए गढ्ढा खोदते हैं वे खुद ही सबसे पहले उसमें गिरते हैं, और इनके लटके चेहरे बतला रहे हैं कि वे अपने किए पर शर्मिंदा हैं, अतः उन्हें अब माफ ही कर देना उचित है।
अकबर ने बीरबल के कहने पर सबको माफ कर दिया और अपने सबसे प्यारे मित्र, सलाहकार और दरबारी को गले लगा लिया। एकबार फिर वे उसकी अकल, सहृदयता औप हाजिरजवाबी के पूरी तरह से कायल थे।