इस अँक में- माह विशेषः सुमित्रा नन्दन पंत, वाल्मीकि। कविता धरोहरः धर्मवीर भारती। कविता आज और अभीः अशोक गुप्ता, रामदरश मिश्र, पंकज मिश्र अटल,नलिनी पुरोहित। माह के कविः सुशील कुमार। बाल कविताः भवानी प्रसाद मिश्र।
सन 2008; एक सिंहावलोकन: शैल अग्रवाल । कहानीः पूस की रात-मुंशी प्रेमचन्द। मंथनः खरी-खरी बात- रमणीका गुप्ता। उपन्यासः शेष-अशेष- भाग-16। दो लघु कथाएः प्रेम विज, प्रतापसिंह सोढ़ी। परिचर्चाः लघु कथाओं की प्रासंगिकता और उपादेयता- डॉ. वीरेन्द्र प्रसाद सिंह। स्मृतिशेषः पड़ाव- दिनेश चन्द्र द्यानी।हास्य-व्यंग्यः भारत महान का अंगूठा प्रधान- गोपाल चतुर्वेदी। रागरंग- विदेशियों को भाता है भारत का ग्रामीण जीवन-अमृता मौर्य। दृष्टिकोणः आतंकवादी अड्डों की शल्यक्रिया जरूरी-वेद प्रकाश वैदिक। बाल कहानी-दो ग्राम कथाएँ-व खबरों से भरपूर विविधा।
वर्ष पर वर्ष क्या, छह दशक बीत गए देश को स्वाधीन हुए परन्तु भारत के गांवों की अधिकांशतः अनप़ढ़ और गंवार जनता आज भी अज्ञान और गरीबी का वैसा ही अंधकारमय जीवन जी रही है जैसा कि देश की आजादी के पहले जीते थी। इसी परिस्थिति को समझते हुए गांधी जी ने आजादी के तुरंत बाद ही कहा था कि यदि हमें भारत का सार्वंगिक विकास करना है तो भारत को गांवों की तरफ मुड़ना होगा क्योंकि भारत की अधिकांशतः आबादी या आत्मा आजभी गांवों में ही बसती है। परन्तु आत्मा किसे दिखती है और शायद यही वजह है कि अमूमन गांव का नाम लेते ही या तो लोग अमराई और खेतों की गमकती- हुलसती मीठी-मीठी यादों में डूब जाते है या फिर शब्द से ही नफरत करने वाले -' गाय गोबर और गन्दगी के अलावा वहां रखा ही क्या है',' कहकर कन्धे उचका देते हैं और गांव के अस्तित्व तक को चेतना से नकार देते हैं। उन्हें वहां उड़ती धूल और मच्छरों से ही परेशानी नहीं, वहां की उत्तेजना और गति रहित शान्ति तक रास नहीं आती उन्हें। फिर इक्कीसवीं सदी की गांवों में बढ़ती नई पौध ने भी खुद दूरदर्शन और अन्य संचार मीडिया पर आज का तेजी से आगे बढ़ता और बदलता संसार भलीभांति देख और समझ लिया है और अब उन्हें भी आंख बन्द करके कोल्हू के बैल की तरह और नहीं घुमाया जा सकता। वैभव और फैशन के विविध और अनहोने अंतर्राष्ट्रीय रूप उन्होंने भी देखे हैं और अब उन्हें भी अपना मचान और चौपाल वाला गांव बेहद बेजान और फीका-सा लगने लगा है। वे खुद भी अपनी जिन्दगी को ' टाइम कैपसूल' में बन्द जैसा महसूस करते हैं और पहला मौका मिलते ही शहर की तरफ भागने को तैयार रहते हैं। पर क्या हम पूरी तरह से उन्हें इस सोच के लिए कटघरे में खड़ा कर सकते हैं...शायद नहीं।
नौस्टैलजिया या मीठी यादों से मन तो भरता है परन्तु पेट नहीं। आज भी भारत में हजारों ऐसे गांव मिल जाएंगे, जहाँ जीवन की बुनियादी जरूरतें तक पूरी नहीं हो पातीं। यथोचित शिक्षा के अभाव में न तो उन्हें ही ऐसा करना आता है और ना ही उनके पास कोई सहारा या सुविधा है। ना ही सरकार और ना ही ग्रामवासी खुद अपनी जरूरतों के प्रति सचेत हैं। शहरवासियों की सोच में भले ही थोड़ा बहुत बदलाव आ गया हो पर गांवों को तो अभी भी वही रूढ़िवादी और सामंतवादी सोच की जंजीरें ही जकड़े हुए हैं। पीढ़ियों से नौकर, नौकर ही, और साहूकार, साहूकार ही है। कर्ज में डूबों के पास आत्महत्या के अलावा उबरने का आज भी कोई और अन्य रास्ता नहीं। आजतक ऐसा ही चलता आ रहा है और चलता भी रहेगा यदि सोच और प्रणाली वक्त के हिसाब से नहीं बदली गई, तो।
वजह कई हो सकती हैं इस निष्कर्मणता और अपरिवर्तन की... टूटा आत्मबल, निरर्थक परिश्रम और भयावह गरीबी, पर शायद शिक्षा की कमी ही इसकी सबसे बड़ी वजह है। अच्छे अस्पताल, स्कूल और दैनिक जरूरतों की चीजों की आवश्यकता गांवों में भी उतनी ही है जितनी कि शहरों में है। किसी भी सभ्य और विकसित देश के गांव और शहरों की सुविधाओं में इतना फर्क नहीं होता जितना कि हमारे देश में है। विदोशों में जो फर्क होता है वह बस जीवन शैली में ही होता है। आदमी स्वच्छंद होता है चुनने के लिए कि वह गांव में रहेगा या शहर में और जहां भी रहता है अपनी खुशी से रहता है, मजबूरी से नहीं। जिन्हें उत्तेजित और आपाधापी भरी तेज जिन्दगी की चाह है वे शहरों में रहते हैं और जो शान्त और प्रकृति के बीच हरी भरी जिन्दगी जीना चाहते हैं वे गांवों में अपना घर बनाते हैं। इन देशों में गांवों में रहना पिछड़ेपन की निशानी नहीं, वरन संपन्नता ही को दर्शाता है। यहां किसान भी संपन्न और संतुष्ट हैं। हमारे यहां की तरह जैसे-तैसे जिन्दगी से जूझते और निराश नहीं। आश्चर्य नहीं कि युवा ही नहीं, बूढ़े मां-बाप भी अपने बच्चों के लिए पढ़-लिखकर शहर में बसने का सपना देखा करते हैं। महानगरों में बढ़ती दिन प्रतिदिन की भीड़ गवाह है इसकी। आस-पास उभरते स्लम गवाह हैं इसके।
पर शहर के तेज प्रवाह के साथ चल पाना हरेक के बस की बात नहीं । अधिकांश हाथ पैर मारते या तो डूब जाते हैं या फिर इर्दगिर्द की गन्दी बस्तियों और टूटे-फूटे मलवों में या फिर फुटपाथों पर ही, बेजान कूड़े-करकट से बिखरे दम तोड़ देते हैं । आज जरूरत है कि जो जहां है, वहीं एक खुशहाल वातावरण पैदा किया जाए। लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया जाए। श्रम की महत्ता समझाई जाए। बताया जाए कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। योग्यता अनुसार काम करने से ही फल और सफलता दोनों मिलते हैं...हर आदमी देश का प्रधान मंत्री नहीं बन सकता और ना ही हर आदमी देश को साफ-सुथरा रख सकता है, गौरव पद में नहीं, काम में है-हां पारिश्रमिक कामके हिसाब से अधिक नहीं तो परिवार का भरण-पोषण करने लायक तो होना ही चाहिए ।
सूची अंतहीन हो सकती है, क्योंकि सुधार और सफलता दोनों ही अंतहीन हैं। पर हां संक्षेप में कबीर के शब्दों में कहूं तो हरेक को कम से कम - " मालिक इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय/मैं भी भूखा ना रहूं, साधू ना भूखा जाए।"
गांवों की तरफ भी ध्यान देना ही होगा और उन्हें भी आर्थिक समृद्धि से जोड़ना ही होगा ...मात्र चन्द सड़कें बनाकर ही नहीं बल्कि रोजगार और नौकरी की नई-नई सुविधाएं बढाकर। नई कम्पनियां और कारखाने खोलकर ही शहरों की ओर बेताहाशा दौडती इस भगदड़ को रोका जा सकता है। गांधी जी के- गांव चलो-नारे को आज एक नए जोश से अपनाने की जरूरत है। कुटीर उद्योगों को आज भी उतना ही बढावा देने की जरूरत है जितनी कि गान्धी जी के समय में थी। उनकी सोच आदर्शवादी नहीं थी जैसा कि अधिकांश लोग समझते हैं, अपितु भारतीय संस्कारों की वैदिक काल से चली आ रही एक बेहद व्यावहारिक और सुलझी सोच थी, जिसमें असंतोष और भेदभाव की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि कोई बेरोजगार नहीं था। सोए गांवों को जगाना है तो उनमें आशा और उत्साह, एक हलचल भरनी ही होगी। गति ही तो जीवन है और जहां इसके लिए कोई प्रेरणा या जगह ही न हो वहां क्या और कैसी अपेक्षा...कैसा जीवन?
एक ऐसे शहर में पलने बढ़ने के कारण जिसे आसपास के गांववाले एक बड़ा शहर और महानगर वाले एक बड़ा गांव समझते थे, पर भारत ही क्या विश्व के पुरातम् शहर होने की वजह से जो आज भी गांव और शहर दोनों ही की जीवन शैली को बड़ी सहजता से समेटे खड़ा है। आज भी जहां की भीड़भाड़ का पचास प्रतिशत आस पास के गांव के मृत और उनके सगे संबंधी ही होते हैं, शहर और गांव दोनों ही के जीवन को बहुत करीब और ध्यान से देखने का मौका मिला है और अक्सर ही बचपन से ही बहुत दुख और आश्चर्य भी हुआ है यह देखकर कि एक ही देश में मात्र चन्द मीलों की दूरी पर जीवन में इतनी विषमता क्यों और कैसे... क्यों अधिकांश गांव के आदमी अपनी खटिया और चौखट पर ही बैठे रह जाते हैं और क्यों शहर का आदमी भागते-भागते भी नहीं थकता। क्यों हम और हमारे नेता आज भी नहीं समझ पाए कि गांधी जी ने आजादी के तुरंत बाद सही ही कहा था कि यदि हमें देश की सर्वांगणीय उन्नति करनी है तो गांवों को भी विकसित करना ही होगा। भारत की पिचहत्तर प्रतिशत से ज्यादा जनता आज भी गांवों में ही रहती है किन्तु आज भी हमारे यहां गांव और शहरों के जीवन में ही नहीं, सोच तक में बहुत फरक है; पढ़ाई-लिखाई, रहन-सहन, सुख-सुविधा और संपत्ति व संपदा सबमें फरक है। कृषि प्रधान संस्कृति के इस देश में खेतीबारी और पशुपालन आदि व्यवसाय गांवों तक ही सिमट कर रह गए है और गरीबी व गंवारपन का पर्याय बने ये गांव शहरों की अपेक्षा बहुत अधिक पिछड़ गए है।
लिखने को तो बहुत कुछ अच्छा और सरस भी लिखा जा सकता है गांवों के बारे में , जहां अधिकांशतः जीवनशैली सहज और आज भी बनावट से दूर है। आखिर यहीं पर तो आज भी हमारे देश की आत्मा और संस्कार बसते हैं। परन्तु जब बात दुख-दर्द या बीमारी की हो तो इलाज के लिए सबसे पहले जो कुछ गलत है या हो रहा है वही बतलाना पड़ता है। आज हर तरह की आर्थिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक उन्नति के बाद भी भारत के गांव एक जड़ जीवन ही तो जी रहे हैं। प्रस्तुत है एक विदेशी कवि की नजर में भारत के गांव जहां,
(गांव)
समय पत्थर है
हवा
शताब्दियां हवा की
पेड़ है समय
लोग पत्त्थर हैं
हवा बहती है अपने ऊपर और
डूब जाती है पत्थर-दिवस में
इसकी आंखों की बेचैन प्यास के लिए
कतरा भर पानी नहीं है यहां !
ऑक्तोवियो पॉज ( अंग्रेजी से अनुवादः अंजलि सिंहा।
गत वर्ष की सारी उथल-पुथल को पीछे छोड़ते हुए आप गाव में हों या शहर में, देश में या विदेश में, भारतवासी हों या भारतवंशी, नया वर्ष सभी के जीवन को एक नई आस, नई रौशनी दे, इन्ही शुभकामनाओं के साथ, शैल अग्रवाल
बढ़ती ही जाती हैं अंधेरे में अतल गहराईयों में अपने आस-पास सदैव मिट्टियों को थामे हुए।
जड़ें बेख़बर हैं बसंत से पतझड़ तक पृथ्वी की उपरी सतह के हर मौसम से।
जड़ें तो तल्लीन होकर सोखती रही हैं धरती का सत्वजल और फैलाती रही हैं निरंतर उसे शाखाओं-प्रशाखाओं से, लताओं-गुल्मों-फुनगियों-कल्लों तक।
जड़ें टकरा रही हैं पृथ्वी के गर्भ में चट्टानों से गर्म तैलीय लावा से उफनते धुँओं से भी आघात से जिसके नित टूटते-फूट रहे हैं जड़ों के असंख्य रोएँदार कोमल रोम।
जड़ें चाहे जितनी बेचैन रही हों दुख:कातर और निस्सहाय भी, पर भेदती रही हैं सतत धरती का सीना, सहती जा रही हैं धरती की सीलन-तपिश, फिर भी आकुल रहती हैं हरदम भीतर धँसने को।
पेड़ों को क्या मालूम कि इस कठिन यात्रा में जड़ें मर रही हैं, सड़ रही हैं फ़िर भी हर क्षण लड़ रही हैं हर विघ्न-रोड़ों से पेड़ों के जीवन के वास्ते।
जड़ों की चिंता वाज़िब है, उस पर गर्व होता होगा पेड़ों को ! हॉलाकि पता है सबको कि जंगल बचे हैं जड़ों से ही पूरी दुनिया में।
सच है कि जड़ों ने वन्य-संसार में श्रम की संस्कृति रच रखी है और खड़े किये हैं अपने कंधों पर जंगलों का गौरवमय इतिहास, फिर भी मजलूम है हमारे समाज में जड़ें जैसे दुनियाभर के इतिहास में मेहनतकश घट्ठाये हमारे हाथ मजलूम हैं जिसने सिरजा है बड़े जतन से विश्व में पूरी मानवता।
फिर भी यह सोचना कितना हैरत-अंगेज है कि तख़त-ए-ताऊसों से इमारतों तक जड़ों के कहीं नाम नहीं!
जहाँ भी जड़ें साबूत बची हैं (ठूँठ बादिय़ों में भी,) जीवन के फ़िर से लौट आने की वहाँ संभावना अभी अशेष है किंतु जड़ों के नसीब में बदा है सिर्फ़ रात की सियाही हर क्षण नहीं प्रकाश का एक कण।
पेड़ों को देखकर लगता है कि जब हम भी अपनी जड़ों से कटने लगते हैं, पेड़ों की तरह ही सूखने लगते हैं तड़पने लगते हैं, जिजीविषा बेचैन हो उठती हैं हममें भी ।
जड़ें मरकर भी हमारी मिट्टी को पकड़े रहती हैं और हमारी नीवों को स्खलन से बचाती हैं, हमारे पुरखों के किये-धरे की तरह। किसको पता नहीं कि जिसकी जड़ में रोगाणु लग जाते हैं उनके साबूत बचने के आसार कम ही रहते, उन वृक्षों को भी घुन लग जाते है।
नंगे होते लोग-बाग
जैसे ही परदा उठेगा, काली रात लाँघकर तुम्हारी नज़र इतिहास के नेपथ्य में जा अटकेंगी जहाँ नंगेपन के खिलाफ़ लड़ते पत्तों और खालों से अपनी देह ढकते पाओगे तुम आदिमानवों को सभ्यता की दहलीज़ पर अपना पहला क़दम रखते ।
घनघोर जंगलों का अंधेरा पसरा होगा तब सब ओर पृथ्वी पर ।
कभी शिकारी जानवरों की नीली गुर्राहटों से तो कभी तड़ित-झंझा की कौंध और आग़ की उठती लपटों से भगदड़-सी मची होगी जंगल में ।
प्रकृति की हलचल और वीभत्स आदिम संघर्ष से डरकर जब तुम लौट आना चाहोगे अपने समय में वापस, रंगमंच पर दृश्य ही बदल दिया जायेगा -- 'कलकल गाती नदियाँ और इन्द्रधनुषी आकाश की धूप में प्रकृति खिली होगी उपवन की तरह जिसके सुवास से महमहा उठोगे तुम और उसके संगीत से तुम्हारे अंतस् के नूपुर खनकने लगेंगे।'
इस श्रव्य-दृश्य माधुर्य से ही कुछ रंग, चित्र, और ध्वनियाँ चुन लिये होंगे हमारे पुरखों ने अपने हृदय को पूरा करने के लिये और उसके भीतर आलोड़ती कुछ नि:शब्द अनुभूतियाँ फूट पड़ी होंगी बरबस गीत-कवितायें बनकर पहली बार उसके होंठों पर कभी, --
यह सब सोचते हुये गहरे चिंतन में डूब जाओगे तुम कि अपनी पूँछ और पशुता से विद्रोह करता हुआ हज़ारो सालों तक दिमाग़ की भट्ठियों में सीझता हुआ एक आदमी की तरह तनकर किस तरह खड़ा हुआ होगा बानर-मानव ।
तभी मैं चिढ़कर तुम से एक सवाल पुँछूँगा - 'आदमी को नंगेपन की ओर लौटने में कितने संयम की जरुरत है ? ' -- और फ़िर रंगमंच का परदा गिर जायेगा। (और लोग तालियाँ बजाकर लौट आयेंगे अपने-अपने घर।)
पर यह सवाल तुमको मथती हुई ले चलेगी दिन-दिन विकास की सीढ़ियाँ चढ़ रहे आदमी के जंगल में जहाँ देखोगे, लड़कियों की अनगिन परछाईयाँ अपने तन से किमरिक* उतार रात को अपनी बाँहों में भर रही होंगी और अपने पीछे उन कितने उजले-धुले 'हिपॉक्रिटीक' चेहरों को नंगे कर रही होंगी जो दिन में 'ग्लोबल-विलेज' के मसौदे को अपनी बहस की प्याली में उबालते हैं, पर रात गये अपने मुखौटे शताब्दी की चोर-गलियों में फेंक 'पब' की धूम-धड़ाकों में 'रॉक' धूनों की धमक़ पर उन दिगम्बराओं की बाँहों में झूलते हैं।
सभ्यता की धूसरित दीवार पर समय के खूँटों से टंगे चौरसिया की बाँसूरी में अल्लारक्खा की संगत में लता की आवाज़ में बिस्मिल्लाह की नौबत में पंडित जसराज और भीमसेन की स्वर-लहरियों में....... लोक-नृत्य की ठुमक में भी ढूंढ़ते फिरोगे तुम हलकान होकर अपनी खोयी आवाज़ें पर हर ज़गह उघाड़ होती संस्कृति के चित्र-विचित्र देख अपनी पीढ़ियों के नंगेपन चुपचाप सहते हुये लज्जा से अपनी आँखें मीच लोगे।
किमरिक = एक प्रकार का महीन चिकना वस्त्र (केम्ब्रिक का अपभ्रंश)
तमस के साये में
अन्यमनस्कता नहीं क्योंकि हत्यारे. विचार अब नये मुहावरों के साथ भाषा की नई तमीज में शताब्दी के चोर दरवाजों से हमारे यहां घुसपैठ करते हैं जहां निशाने पर ज्यादातर नई पौध होती हैं जिनके कल्लों से जड़ों के अंतिम रंध्र तक वे फैल जाते हैं और सिर्फ़ इनकी संवेदी शिराओं पर वार करते हैं
यह कितना कठिन समय है कि टीवी स्क्रीनों और कंप्यूटर मॉनीटरों से अपनी जादुई भाषा की तमक़ वे सीधे हमारे बिस्तरों पर फेंकते हैं और लानतों के बाज़ार में नई पीढ़ियों को ला खड़े करते हैं जहां अपनी अक्लें और नस्लें खोकर ये पीढ़ियां शरीर में ज़िन्दा पर दिमाग से पंगु बन जाती हैं और कृत्रिम सभ्यता के मकड़जाल में फंस जाती हैं।
'विकासवाद उपभोक्तावाद उदारीकरण वैश्वीकरण विश्व अब एक ग्राम है ' - और न जाने कितनी ही भद्रगालियों के कनफोड़ शोर हैं इस सभ्यता के बाजार में जहां फैशन की ओट में आधुनिकता के अनगिनत मुखौटे पहन अपने भीतर के घावों को हम हँसकर सालते रहते हैं क्योंकि उन्होंने हमें मातहत और पालतू बनाये रखने के नये-नये सुघड़ तरीके ईज़ाद किये हैं जिनमें सबसे नायाब है - आदमीपन मारना ! (वे अब आदमी नहीं मारते !)
दरअस्ल हत्यारे विचारों के अलबम से निकलकर वही पुराने नायक (बीसवीं सदी के) इस सदी की सुबह की धूप में हमारे चौबारों में उतर आये हैं जिनकी काली करतूतों की भनक़ पहले-पहल कविताओं को लगी है जैसे धरती के अन्दर हलचल की खबरें बिलों में चूहों और आकाश में परिन्दों को पहले हुआ करती हैं।
लेकिन उनको मालूम पड़ गया है कि कवितायें मकान होती हैं जहां आदमी संजीदा और पूरा ज़िन्दा होता है और कविताएं वक़्त की सियाही भी काटती हैं इस वजह से बाज़ार में जगह-जगह सलीबें खड़ी की गई हैं और कविताओं के खिलाफ़ तरह-तरह की साज़िशें चल रही हैं।
कविताएँ नई पीढ़ियों के हश्र पर बिसूरती हैं कि समय के इस पड़ाव के आगे धरती नहीं बची है पर बेताबी के पर अपनी बांहों में बांध वे उड़ रहे हैं नई सभ्यता के 'मॉड'.. बन तमस के साये में।
जब तुम रेलगाड़ी से उतरो तो रामधुन रिक्शावाले को पूछना, कहना कि तुम्हें चौक जाना है, उसको दो स्र्पये देना, ज़्यादा नहीं। जब तुम नदी पर पहुंचो अपने जूते हाथ में ले लेना, पेड़ के तने के पुल पर रस्सी पकड़कर रखना, नहीं तो भीग जाओगे। कुछ दूर पगडंडी पर चलकर तुम गांव के चौक पहुंचोगे। वैद्यजी को पूछना, उन्हें सब जानते हैं क्योंकि वे सबको दवाई देते हैं । गांव के लड़के तुम्हारे पीछे आएंगे क्योंकि तुम्हारे शहर के कपड़े उन्हें अजीब लगेंगे, उन्हें आने देना। यदि तुम मुझे अन्य लड़कियों के साथ खेलते, या कुछ काम करते देखो, तो न घूरना, न ही नाम से पुकारना, वो चौंक जाएंगीं। बस नज़र झुकाकर तेज चाल से घर की तरफ बढ़ जाना, मैं पीछे से आऊंगी। जब बाबा से मिलो तो कुछ और बातें करना, हमारे बारे में नहीं, नहीं तो वे तुम्हें उदंड समझेंगे। जब वे अग्रंज़ों के ज़माने की बात करें, तो प्रभावित दिखना, और उन्हें और बताने को कहना। यदि तुम यह सब करोगे, और गलती नही करोगे, तो वे तुम्हें मेरा हाथ विवाह में दे देंगे।
अशोक गुप्ता
गांव बचपन का
गांव बचपन का मुझको बुलाता सदा मुस्कराता हुआ
रंग-बिरंगी शहरी तनहाइयों बीच आता हुआ
तंग गलियां, खुले रास्ते, खेत खलिहान, अमराइयां
मैं गुजरता था हमजोलियों संग हंसता-हंसाता हुआ
जब कभी भी अकेला हुआ तो लगा, मैं अकेला नहीं
अपनी फसल से था बात करता उन्ही में नहाता हुआ
पेट खाली थे लेकिन दिलों में उमंगों की थी आंधियां
हर महीना था साथी-सा चलता हमें थपथपाता हुआ
रूठ जाते थे हम खेल ही खेल में साधकर चुप्पियां
प्यार फिर-फिर बुलाता था हमको खुशी से रुलाता हुआ
भूख थी प्यास थी जाने कितनी मगर कोई दहशत न थी
वक्त चलता था सबको समेटे हुए, गीत गाता हुआ
मां की आंखों में ख्वाब कितने उमड़ते हमारे लिए
कंठ में था पिता के, कोई दर्द-सा थरथराता हुआ
कितनी खुशबू थी मिट्टी की, गाती बगीचे के बाजार में
उसमें हंसता था घर अपने आंगन का उत्सव मनाता हुआ
पूछता था कुशल क्षेम घर का ठहरकर समय राह में
दीखता था अगर कोई भटका मुसाफिर-सा जाता हुआ
रंग फैले थे कितने फिजाओं के, घर से मदरसे तलक
घाम में छांह थी, छांह में घाम था गुनगुनाता हुआ
मानता हूं कि अब वो नहीं है, न जाने कहां खो गया
फिर भी लगता मेरी चेतना में सदा महमहाता हुआ
-रामदरश मिश्र
उन दिनों
जब हम राख से मलकर हाथ धोते थे, कोयले ओर नमक से दांत मांजते थे,
जब हम एक गुट मे रसोई मे बैठे, चमचों से थालियां पीटकर, अम्मां की गालियों के बीच खाने का इन्तजार करते थे,
जब हम नंगे पैर धूल भरी सडकों पर बैलगाड़ियों और तांगों के पीछे दौड़ते थे, नन्हे थिरकते पांव गोबर से बचाते हुए, या मेंढक और भैसों के बीच तालाब मे कूद जाते थे, हम खुश थे।
2008: आखिर एक और साल अतीत की किताब में पन्ने बनकर सिमट ही गया...परन्तु चुपचाप तो नहीं। जाते-बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसने सुरक्षा और शान्ति जैसे शब्द ही शब्दकोष से हटा दिए। कल तक भाई-भाई की तरह वर्षों से बगल-बगल में चैन से रहने वाले पड़ौसी तक एक दूसरे के शक के दायरे में आ गए। अब चारो तरफ हैवान थे या फिर भगवान, इन्सानों का तो कहीं पता ही नहीं अब। जाने कब कौन किसका दुश्मन व एजेंट निकल आए ...इस बर्फीले मौसम में कुछ भी तो नहीं कहा जा सकता। किसी पर भी विश्वास करना दुर्लभ है। चन्द लोगों के हाथ मानो मुम्बई ही नहीं पूरी मानवता बन्दी बन चुकी है... 26 नवंबर को शुरू हुई और तीन दिन तक लगातार चली बे सिर-पैर की उन आकस्मिक घटनाओं का क्रम ही कुछ ऐसा विध्वंसक, डरावना और अमानवीय था। बहुत कुछ तहस-नहस और उलट पुलट हुआ...इतना अधिक कि कब सच्चाई देखते–देखते ही डरावनी और भयानक फिल्म में तब्दील हो गई हमें पता तक नहीं चल पाया।
पर 2008 की शुरुवात एक आम और कई-कई संभावनाओं के साथ ही हुई थी, चाहे हम भारत की पृष्ठभूमि में देखें या फिर विश्व के। इतिहास रचा गया और कई-कई प्रतिमान टूटे व नए कीर्तिमान स्थापित हुए, बात चाहे खेल की हो, राजनीति की हो, ज्ञान-विज्ञान की हो या फिर सामाजिक मूल्यों की। अमेरिका में ओबामा का राष्ट्रपति की तरह आना और चीन की बहुत ही सुन्दर व कलात्मक ढंग से औलोम्पिक खेलों की विश्व को प्रस्तुति व भरपूर प्रसारण एक बेहद खुली और स्वस्थ नई सदी के परिचायक थे। महेन्द्रसिंह ढोंढी के नेतृत्व में भारत ने भी पहली बार एक दिवसीय मैच का विश्वकप जीता और भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए। यही नहीं चन्द्रयान छोड़कर भारत ने विज्ञान में भी अपनी सशक्त स्थिति दर्ज कराई और भारत भी चन्द विलक्षण व सशक्त आधुनिक देशों की कतार में आ ख़ड़ा हुआ। इतनी तेजी से हुआ यह सब कि फैशन की दुनिया भी अछूती न रह पाई। फ्रान्स के राष्ट्रपति का अपनी तत्कालीन महिला मित्र के साथ विदेशी यात्राओं पर जाना और थोड़ी बहुत ना नुकुर के बाद सभी राष्ट्रों का उन रिश्तों को न सिर्फ मान्यता देना वरन् उनका स्वागत भी करना एक और ऐसी घटना थी जिसने नई सदी के नए मूल्यों का पुरजोर एलान किया। पर शायद सर्वाधिक स्तंभित करने वाली तारीख 16 सितंबर ही थी, जब पूरे ही विश्व के स्टौक एक्सचेंज से एक तिहाई कीमत गायब हो गई । जाने कितने धक्के को बर्दाश्त नहीं कर पाए और आत्महत्या तक कर बैठे और कितने ही विश्वपटल पर ऊंची पायदानों पर च़ढ़ते रईस लुढ़ककर एक बार फिर वापस नीचे उसी जगह पर पहुंच गए, जहां से उन्होंने अपनी यात्रा शुरू की थी। सांप-सीढ़ी के इस खेल ने कइयों को समझा दिया कि मात्र यह एक खेल ही है, इसके सहारे और भरोसे जीवन-यापन नहीं किया जा सकता।
विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में पहली बार एक नए चेहरे को मानव धड़ के ऊपर सफलता के साथ प्रस्थापित किया गया और पहली बार ही स्टेमसेल से नई कौरनिया व लंग ही नहीं, शरीर के हर जर्जर अंग को पुनः विकसित करने की संभावना वैज्ञानिकों के हाथ लगी। पर बात यहीं तो खतम नहीं होती, संभावनाओं का अंत नहीं, अभी तो बस शुरुआत है...चांद तारों से परे भी जहां और हैं। नजरें जहां तक जाएँ, उससे भी आगे भी नजारे और हैं। कौन जाने 2009 की कोख में मानवता और विश्व के हित में कितने और कैसे कैसे अनमोल रतन व उपलब्धियाँ छुपी हों। इसी विश्वास और शुभकामना के साथ पुनः लेखनी के पाठकों को नववर्ष की अशेष शुभकामनाएँ।
किसी एक भाषा विशेष का आधिपत्य एक विविध भाषा और परम्पराओं के देश में होना भी चाहिए या नहीं, और यदि हो भी तो राष्ट्रभाषा के हित में कितना और किस हद तक होना चाहिए और इस भाषाई समन्वय के लिए क्या किया जा सकता है ; सवाल जटिल ही नहीं, संवेदनशील भी है । कुछ वक्त पहले " संघर्षरत आम आदमी '' में खरी-खरी बात के अंतर्गत रमणीका गुप्ता को पढ़ा। साभार प्रस्तुत है लेखनी के पाठकों के मंथन के लिए उसी आलेख का एक अंश ; मंथन
रमणीका गुप्ता
खरी-खरी बात
...आगरा में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा भाषायी साम्राज्यवाद पर एक बहुत सार्थक चर्चा हुई। यह चर्चा देश के पैमाने पर खासकर अप्रगणित भाषाओं के क्षेत्र में भी होनी चाहिए ताकि कुछ जमीनी सच्चाइयां उभर सकें। केवल अंग्रेजी ही का साम्राज्य खतरनाक नहीं है, कोई भी बहुसंख्यक आबादी वाली भाषा भी साम्राज्यवादी हो जाती है। अपनी जनसंख्या के कारण बहुसंख्यकों की और सत्ता के कारण अल्पसंख्यकों की भाषाएं भी दूसरी भाषाओं को हड़पती रही हैं। अंग्रेजी अल्पसंख्यकों की भाषा है, जो दुनिया भर पर राज कर रही है। मैक्सिको या क्यूबा में स्पैनिश भाषा सत्ता के कारण सब की भाषा बन गई। भारत की हिन्दी पट्टी की भाषा हिन्दी ने बृज, अवधी, भोजपुरी, खोतवा या अन्य बोलियों के विकास पर रोक लगा दी। भारत के दक्षिण के सभी राज्यों की भाषाओं ने जनजातियों की भाषा को हड़प लिया।
दरअसल भाषाएँ मरा नहीं करतीं बल्कि मार दी जाती हैं तवा मरने को मजबूर की जाती हैं या हो जाती हैं। जहां एक ओर भाषायी साम्राज्यवाद अपना वर्चस्व बढाने हेतु भाषाओं को मारने का षडयंत्र रचते हैं, वहीं दूसरी ओर स्वयं अपने ही भाषा-भाषियों की उपेक्षा भी भाषाओं को मरने को मजबूर कर देती है। एक तीसरा तरीका है-समायोजन, जिसके माध्यम से बड़ी भाषाएं छोटी भाषाओं को हजम कर जाती हैं। हालांकि इतना सब होने पर भी कतिपय छोटी भाषाएँ अपने पीछे अपने होने के कुछ सुराग छोड़ ही जाती हैं, जो समायोजित भाषाओं में शहीद की तरह नजर आते रहते हैं।
भाषायी साम्राज्यवाद तोपों या बन्दूकों के माध्यम से नहीं आता। न्गुगी व व्योंगो के अनुसार- “ भाषा सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन है, जिसके जरिए आत्मा को वश में किया गया और उसे बन्दी बना लिया गया।“ शारीरिक गुलामी के लिए गोलियों को साधन बनाया गया लेकिन मानसिक और आत्मिक गुलामी भाषा के जरिए थोपी गयी। सारी औपनिवेशिक शक्तियों ने गुलाम देशों पर गुलामी थोपी ही नहीं, बल्कि उन देशों से लौट आने के बाद भी गुलामी को बरकरार रखा।
दरअसल युद्ध की भौतिक हिंसा के बाद स्कूल-कालेजों में मनोवैज्ञानिक हिंसा शुरू होती है, जो शारीरिक हिंसा से अधिक बर्बर होती है। भारत में भी अंग्रेजों ने हमारे मानस पर कब्जा किया और अपनी भाषा हम पर लाद गये। आज भी अंग्रेजीदा होना आम भारतीय जन के लिए गौरव की बात है। इसका सटीक उदाहरण है चन्द्रभान जी द्वारा राष्ट्रीय सहारा में छपा बयान, जिसमें उन्होंने सभी भारतीय भाषाओं की छुट्टी करके अंग्रेजी अपनाने का सुझाव दिया है और उनके द्वारा हाल ही में मैकाले का जन्मदिन मनाना जाना।
भारत के ठीक विपरीत अफ्रीका के किसानों ने अपनी भाषा को केवल जिन्दा ही नहीं रखा, बल्कि उसे अंग्रेजी के बरस्क खड़ा कर दिया, जबकि वहां के बुद्धिजीवी वर्ग ने अंग्रेजी में लिखना ही नहीं शुरू कर दिया था बल्कि वे अंग्रेजी के पक्ष में तर्क भी देने लगे थे। यह वर्ग अपनी भाषा में लिखने और बोलने वालों को हेय मानने लगा और अफ्रीकी भाषा बोलने वाले को दण्ड दिया जाने लगा। यह तो 1977 में न्यूगी व व्योंगो ने अपनी भाषा
“ गीकियू“ में लिखने का संकल्प किया और हर विधा में लिखा और यह सिद्ध कर दिया कि अफ्रीकी साहित्य केवल यहां के किसानों-मजदूरों की भाषा में ही लिखा जा सकता है। अपनी भाषा में लिखना वहां आत्मसम्मान और आजादी का पर्याय बन गया। इस प्रकार भाषाएँ कैसे विदेशी भाषा-भाषी सत्ता को अपने देश से निकाल बाहर फेंकने में सक्षम हो सकती हैं, यह हम व्योंगों के संकल्प से सीख सकते हैं। उन्होंने अपने देश में भाषायी वर्चस्व कायम नहीं होने दिया।
न्गुगा व व्योंगों ने अपने इस संघर्ष में उपन्यास, कहानी, नाटक लिखने के अतिरिक्त आम आदमी की संघर्ष में भागीदारी करने के लिए छोटे-छोटे पम्पलेट, पोस्टर और लघु-पत्रिकाओं का सहारा लिया। उन्होंने स्वयं भी लिखा और अन्य लोगों को लिखने के लिए प्रेरित भी किया। डॉ. अमेबेदकर ने भी भारत के जब दलित प्रश्नों को उभारा और दलित की अस्मिता, पहचान, आत्मसम्मान और उच्च व जातीय लोगों के वर्चस्वाद से उनकी मुक्ति की लड़ाई छेड़ी तो उन्होंने अखबार और लघु-पत्रिकाएं निकालीं और भारतीय मानसिकता यानी हिन्दूवाद या कहें मनुवाद के मुकाबिल अपना छांचा खड़ा किया। उन्होंने सभी को अपनी भाषा में लिखने को प्रेरित किया ताकि आम जन में उनकी बात जा सके। सत्ता की भाषा तो सदैव आमजन विरोधी होती है। यह दलित विरोधी भी थी। उनसे प्रेरित होकर दलितों ने अपनी ग्रामीण मराठी और ऊबड़-खाबड़ बोलियों में ही अपना लेखन शुरू किया। उन्होंने कई नई पत्रिकाएँ भी निकालीं जैसे-अम्ही, निकाय, जातक, कोंडी, सिंहगर्जन, दलित क्रांति, संसद, समाज, विद्रोह, अस्तित्व, प्रमेय, समुचित और हिन्दी में भीम, प्रज्ञा और दलित टु डे, अंगुत्तर पूर्व देवा आदि।
दरअसल, सदियों से शासक वर्ग भाषा के माध्यम से ही अपनी सत्ता कायम रखता रहा है। सत्ता की भाषा सदैव अवाम की भाषा से भिन्न होती रही है। ये भी भाषाई साम्राज्य का एक रूप है। आर्यों ने जिस तरह यहां की भाषाओं को नकार कर, संस्कृत के माध्यम से भारत पर राज्य किया, वैसे ही मुग़लों ने फारसी के माध्यम से और अंग्रेजों ने अंग्रेजी के माध्यम से शासन चलाया और आज आज़ाद होने के बाद हम भी अंग्रेजी में ही राज चला रहे हैं।
साहित्य भी चूंकि दरबारों और राजघरों से पोषित रहता था, इसलिए साहित्यकारों ने भी सत्ता का अनुकरण किया। रुतबा, सम्मान और पुरस्कार वहीं मिलता था न! हालांकि इसके विपरीत लोक-साहित्य, भक्ति-साहित्य भाषाओं और बोलियों में बोला और लिखा जाता था, सो वह पनपता रहा। जन भाषाएं तो अपने बल पर समृद्द होती रहीं, पर विडंबना यह है कि धर्मशास्त्र भी सत्ता की भाषा में ही लिखे जाते रहे हैं। तुलसी ने जब अवधी में ‘रामचरित मानस‘ लिखी तो उसका विरोध ही नहीं हुआ बल्कि उनकी पाणडुलीपि ही गायब कर दी गयी।
आज भी हमारे भारत के साहित्यकार नोबेल पुरुष्कार पाने के लिए अपनी भाषा की बजाय अंग्रेजी में लिखने की आकांक्षा पाल रहे हैं। कई लेखक तो लिखने का प्रयास भी कर रहे हैं। यह टिप्पणी अनुवादकों के लिए नहीं है। अनुवाद तो साहित्यिक आदान प्रदान के लिए व्यक्तिगत तौर पर एक सार्थक कदम या प्रयास होता है।
आज बाज़ारवाद और वैश्वीकरण की अवधारणा भाषाओं एवं बोलियों को समृद्ध करने की बजाय, उन्हें विकृत कर रही है। यह सही है कि बाज़ार बढ़ाने के लिए अब विदेशी और देशी मीडिया हिन्दी को अपना रहा ह, जिससे हिन्दी की व्यापकता कुछ बढ़ रही है, पर उससे हिन्दी ‘ हिंगलिश‘ भी बन रही है। दूसरी भाषाओं के शब्द हमारी भाषाओं में आएँ, इससे किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इसके पीछे मंशा भाषा के विकास की होनी चाहिए, न कि उसे विकृत करके बाज़ारू व बाज़ार के लिए लाभप्रद औजार बनाने या हड़पने की। इससे भाषा की गरिमा और गंभीरता तो कम होती ही है बल्कि उसका अस्तित्व भी कतरे में पड़ जाता है। ये बड़ी एक चुनौती है लघु पत्रिकाओं के समक्ष कि वे अपनी परम्पराओं को विकृत और बाजारू होने से बचाएं क्योंकि अन्ततः इन्ही विकृतियों द्वारा मूल भाषा को हड़प या हजम करने का खतरा होता है।
सम्मान और पुरस्कार के अतिरिक्त, भाषायी वचर्स्ववाद का एक और हथियार है-रोज़गार। खासकर विकासशील देशों में रोज़गार की कमी युवकों को किसी भी हद तक जाने के लिए उकसाती है। अंग्रेजीदां लोगों को रोज़गार मिलता है, इससे लोग अंग्रेजी पढ़ने लगे हैं और अपनी भाषा छोड़ रहे हैं। हिन्दी में भी रोज़गार की कुछ गुंजाइश है तो अहिन्दी भाषी भी हिन्दी पढ़ रहा है। वे हिन्दी या ग्रेजी पढ़ें इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं पर मज़बूरीवश पढ़ना ही वर्चस्ववाद है। सरकार चाहे तो उनकी भाषाओं को भी रोजगारमुखी बना सकती है।
दरअसल जनता के बहुत ही कम हिस्से की पहुंच शासकीय भाषाओं तक होती है, इसी कारण इन भाषाओं का जानकार वर्ग उसका पूरा लाभ उठा लेता है। आम अवाम या बहुसंख्यक जनता अपनी ही भाषा, बोली तक सीमित होती है। स्कूलों तक भी उसकी पहुंच नहीं होती लेकिन उसी हिस्से के लोग अंग्रेजी या देश की राजभाषा हिन्दी जानने की आकांक्षा पालने लगते हैं ताकि उन्हें रोजगार और प्रतिष्ठा मिल सके। दरअसल हम लोगों ने अपनी मानसिक गुलामी के चलते अंग्रेजों को प्रतिष्ठा का आसन व रुतबा तो दे ही दिया है पर साथ-साथ उसे इज्जत और शासकीय रुआब से भी लैस कर दिया है। जैसे-दरोगा का डण्डा न चलने पर भी एक शक्ति का प्रतीक होता है और मन में भय पैदा करता है। उसी तरीके से अंग्रेजी का ज्ञान आम जनता पर एक रौब गालिब करता है और जिन्हें अंग्रेजी की कतई दरकार नहीं या जहां अंग्रेजी की कतई जरूरत नहीं, वे अंग्रेजी के शब्द बोलने में अपने को गौरवान्वित समझते हैं। उदाहरण स्वरूप पढ़े-लिखे पति-पत्नी जब झगड़ते हैं तो वे अंग्रेजी में झगड़ने लगते हैं।
दरअसल, किसी भी भाषा के साथ सीधे-सीधे किसी समूह या क्षेत्र विशेष की अस्मिता जुड़ी होती है, संस्कृति जुड़ी होती, बूगोल जुड़ा होता है, उसका संघर्ष और इतिहास-शौर्य और विद्रोह, जो उन्ही भाषाओं में प्रकट हो सकता है। वे वहां के भूगोल और इतिहास के ताने-बाने से बुनी होती हैं। उनमें रसी-बसी होती हैं वहां की ऋतुएं , रस-रंग, वेष भूषाएं, स्वास्थ व प्रकृति, विश्वास, मिथक, मुहावरे व किंवदंतियां! इन सूक्ष्मताओं का जल्दी ही किसी दूसरी भाषा में समायोजन इतना आसान नहीं होता, चूंकि उनमें सदियों का अन्तराल भी निहित होता है. वर्चस्ववादी भाषाएँ जो आमतौर से सत्ता और शासन की हथियार होती हैं, इन भाषाओं को हड़प लेती हैं या खत्म कर देती हैं। ये क्षेत्रीय बोली / भाषाएं लोकतांत्रिक होती हैं और सभी भाषाओं और बोलियों से परस्पर आदान-प्रदान करते हुए जिंदा रहती हैं। ‘ कोस-कोस पर पानी बदले, पांच कोस पर वाणी‘ की कहावत के अनुरूप ये भिन्न तो होती हैं पर नदी की तरह सतत बहती भी रहती हैं।
आज जब शासन या सत्ता की गलत नीतियों, वर्चस्ववादी रुझान, वैश्वीकरण, बाज़ारवाद एवं शक्तिशाली भाषा-भाषी समाज के भाषायी साम्राज्यवाद के कारण या रोजगार की खोज में पलायन कर लोगों को दूसरे क्षेत्र में जाना पड़ता है, तो सर्वाधिक चोट भाषा पर ही पड़ती है। न्हें दूसरे स्थान की भाषा सीखनी ही पड़ती है, चूंकि उनकी अपनी बोली या भाषा रोजगार हेतु या जिन्दा रहने के लिए न तो उनके अपने गृह क्षेत्र में और न ही बाहर सहायक हो पाती है। फलतः वे अपनी भाषा को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं और भूलने लगते हैं। इस प्रकार रोजगार देने वाली भाषा या भाषाएं भी इनकी बोलियों को हड़प लेती हैं।
लघुपत्रिका यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं या निभाती हैं चूंकि वे स्थानीय या क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित होती हैं और प्रायः आम जन और उनके मुद्दों से जुड़ी होती हैं। क्षेत्र के नए लेखक भी इन पत्रिकाओं में स्थान पाते हैं। इस प्रकार वे अपनी भाषाओं को लघुपत्रिका के माध्यम से जिंदा तो रखते ही हैं, उसके विकास में भी मददगार होते हैं। खुद अपना भी विकास करते हैं। इस प्रकार मुख्य भाषाओं या अन्य वर्चस्ववादी भाषाओं से भी वे कुछ न कुच ग्रहण कर लेते हैं। ये स्थानीय लघुपत्रिकाएँ कापी हद तक स्तानीय बोली-भाषाओं को जिन्दा रखने में मददगार सिद्ध होती हैं। हालांकि ये सब निजी स्तर के प्रयास होते हैं। सरकार अगर सही नीतियां बनाए और लघु पत्रिकाओं को प्रोत्साहित करे तो कोई भी भाषा न तो मरेगी और न ही लुप्त होगी।
साम्राज्यवादी सोच वर्चस्ववादी होती है जो भाषाओं को न केवल हड़पती है बल्कि एक दूसरे का दुश्मन भी बनाती है। सभी भाषाएँ पनपें और भाषायी साम्राज्यवाद टूटे इसके लिए जरूरी शर्त है अनुवाद, ताकि सभी भाषाएँ जुड़ सकें और एक-दूसरे को जान सकें और किसी भी भाषा के वर्चस्व के मुकाबिल मिल कर खड़ी हो सकें।
मैं नहीं कह सकती कि अकेला लघुपत्रिका आन्दोलन ही भाषायी साम्राज्यवाद को रोक सकता है पर यह जरूर कहा जा सकता है कि ये भाषाओं को मरने से रोक सकता है। कुछ लोग कह सकते हैं कि ये चींटी द्वारा हाथी मारने का प्रयास है। पर ये भी तो सच है कि कभी-कभी छोटे-छोटे कद की शार्क मछलियां भी व्हेल मछली का जीना मुहाल कर देती हैं। जब लड़ाई अस्तित्व की हो, वजूद की हो---तो सामने तो आना ही पड़ता है। मिटकर भी अगर कुछ बचाया जा सके---तो कदम बड़ाने ही पड़ते हैं।
नुकीले पंजों की पकड़ को / ढीला करने के लिए / जरूरी है
पंख खोलना / तो खोलूंगी मैं/ विकल्प उड़ना ही है तो/
उड़ूंगी मैं। / मेरे होने के इजहार के लिए / विकल्प / वजूद का
मिटना है/ तो मिटूंगी मैं/ पर चाकूओं को हवा में तैरने से /
रोकूंगी मैं, रोकूंगी मैं।
हर पत्रिका यदि कम से कम किसी एक अपरिगणित भाषा के लिए अनुवाद के लिए कुछ पन्ने दे दे, तो भाषायी बहनापा कायम हो सकता है। वर्चस्ववादी साम्राज्यवादी रुझान भाषाओं में शत्रुता कायम करता है चूंकि अपनी भाषा को थोपकर, दूसरी भाषा पर हावी होकर उसे हड़प लेना चाहता है, जबकि भाषाई बहनापा एक-दूसरे से कुछ ग्रहण करता है, जिसमें सबको जीने और विकसित होने का अधिकार होता है। लघुपत्रिकाएं अनुवाद के माद्यम से उस भाषायी बहनापे का वातावरण निर्मित कर सकती है---उन्हें जोड़ सकती है।
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा-सहना आया है। लाओं, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे। मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहॉँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगें। अभी नहीं । हल्कू एक क्षण अनिशिचत दशा में खड़ा रहा। पूस सिर पर आ गया, कम्बल के बिना हार मे रात को वह किसी तरह सो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियॉं देगा। बला से जाड़ों मे मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी। यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिध्द करता था ) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला-दे दे, गला तो छूटे। कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचँगा। मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और ऑंखें तरेरती हुई बोली-कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे? कोई खैरात दे देगा कम्मल? न जान कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती। मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते? मर-मर काम करों, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई। बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ हैं। पेट के लिए मजूरी करों। ऐसी खेती से बाज आयें। मैं रुपयें न दूँगी, न दूँगी। हल्कू उदास होकर बोला-तो क्या गाली खाऊँ? मुन्नी ने तड़पकर कहा-गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है? मगर यह कहने के साथ् ही उसकी तनी हुई भौहें ढ़ीली पड़ गई। हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भॉँति उसे घूर रहा था। उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली-तुम छोड़ दो अबकी से खेती। मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी। किसी की धौंस तो न रहेगी। अच्छी खेती है! मजूरी करके लाओं, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस। हल्कू ने रुपयें लिये और इस तरह बाहर चला, मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हों। उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-काटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किए थें। वह आज निकले जा रहे थे। एक-एक पग के साथ उसका मस्तक मानो दीनता के भार से दबा जा रहा था।
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पूस की अँधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बॉस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कॉप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था। दोनों मे से एक को भी नींद नहीं आ रही थी। हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा-क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहॉँ क्या लेने आये थें? अब खाओं ठंड, मै क्या करूँ? जानते थें, मै यहॉँ हलुआ-पूरी खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये। अब रोओ नानी के नाम को। जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ कहा-कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे । यह रांड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही हैं। उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ। किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पी चुका। यह खेती का मजा हैं! और एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा आए तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गददे, लिहाफ, कम्बल। मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाए। जकदीर की खूबी! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें! हल्कू उठा, गड्ढ़े मे से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी। जबरा भी उठ बैठा। हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता हैं, हॉँ जरा, मन बदल जाता है। जबरा ने उसके मुँह की ओर प्रेम से छलकती हुई ऑंखों से देखा । हल्कू-आज और जाड़ा खा ले। कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा। उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा। जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया। हल्कू को उसकी गर्म सॉस लगी। चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा। कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भॉँति उसकी छाती को दबाए हुए था। जब किसी तरह न रहा गया, उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसके सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया। कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था। जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न ,थी। अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता। वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा को पहुंचा दिया। नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था । सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई। इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी। वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा। हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया। हार मे चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता। कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था।
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एक घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई, ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया हैं, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहीं है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े। ऊपर आ जाऍंगे तब कहीं सबेरा होगा। अभी पहर से ऊपर रात हैं। हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था। पतझड़ शुरु हो गई थी। बाग में पत्तियो का ढेर लगा हुआ था। हल्कू ने सोचा, चलकर पत्तियों बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ। रात को कोई मुझें पत्तियों बटारते देखे तो समझे, कोई भूत है। कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रहा जाता। उसने पास के अरहर के खेत मे जाकर कई पौधें उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला। जबरा ने उसे आते देखा, पास आया और दुम हिलाने लगा। हल्कू ने कहा-अब तो नहीं रहा जाता जबरू। चलो बगीचे में पत्तियों बटोरकर तापें। टॉटे हो जाऍंगे, तो फिर आकर सोऍंगें। अभी तो बहुत रात है। जबरा ने कूँ-कूँ कर सहमति प्रकट की और आगे बगीचे की ओर चला। बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था। वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं। एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया। हल्कू ने कहा-कैसी अच्छी महक आई जबरू! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही हैं? जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गई थी। उसे चिंचोड़ रहा था। हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियों बठारने लगा। जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया था। हाथ ठिठुरे जाते थें। नगें पांव गले जाते थें। और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था। इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा। थोड़ी देर में अलावा जल उठा। उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी। उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थें, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों। अन्धकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था। हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था। एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पॉवं फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में आए सो कर। ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था। उसने जबरा से कहा-क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है? जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा-अब क्या ठंड लगती ही रहेगी? ‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खातें।’ जब्बर ने पूँछ हिलायी। अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें। देखें, कौन निकल जाता है।अगर जल गए बच्चा, तो मैं दवा न करूँगा। जब्बर ने उस अग्नि-राशि की ओर कातर नेत्रों से देखा ! मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी। यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ निकल गया।पैरों में जरा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी। जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ । हल्कू ने कहा-चलो-चलो ऐसे सही नहीं ! ऊपर से कूदकर आओ। वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया।
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पत्तियॉँ जल चुकी थीं। बगीचे में फिर अँधेरा छा गया था। राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर ऑंखे बन्द कर लेती थी! हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा। उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था। जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड था। उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी। फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं है। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी। उसने दिल में कहा-नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहॉँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ! उसने जोर से आवाज लगायी-जबरा, जबरा। जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया। फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दँदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला। उसने जोर से आवाज लगायी-हिलो! हिलो! हिलो! जबरा फिर भूँक उठा। जानवर खेत चर रहे थें। फसल तैयार हैं। कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते है। हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला, पर एकाएक हवा का ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा। जबरा अपना गला फाड़े डालता था, नील गाये खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था। अकर्मण्यता ने रस्सियों की भॉति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था। उसी राख के पस गर्म जमीन पर वहीं चादर ओढ़ कर सो गया। सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी कह रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया। हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ? मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत का सत्यनाश हो गया। भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ? हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै नहीं जानता हूँ ! दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें। देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों ।
दोनों खेत की दशा देख रहे थें। मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था। मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।
बंगाली मोशाय ने लड़के को एयर होस्टेस को पकड़ाया और खुद कहीं ग़ायब हो गए---अकेले ही शायद कोई दूसरी उड़ान ले ली थी उन्होंने। अब लड़का जिए या मरे यह उसका सर दर्द नहीं था। उसके साथ दुबारा कहीं जाने की या उससे कोई वास्ता रखने की उस कायर में अब न हिम्मत थी और ना ही चाह। अकेला बच्चा अँगूठा मुँह में लगाए, आँसू भीगी आँखों से चारों तरफ़ टुकुर टुकुर देख रहा था। उस युगल को भी जो अपनी चार-चार बाहों से नन्ही बच्ची को गोद में उठाए, "माइ एपल, माइ स्ठ्राबेरी, वी लव यू वेरी मच।" कह कहकर हंसे और रोए जा रहे थे। बेटी पर चुंबनों की बौछार कर रहे थे। बार बार आकाश की तरफ़ देखते हुए, पूरे परिवार को इस धरती पर सही सलामत उतारने के लिए भगवान के बेहद शुक्र गुज़ार थे वे। परंतु वह बालक नहीं जानता था कि वह किसके पास जाए, उसकी उँगली पकड़ने वाला वहाँ सैकड़ों की भीड़ में एक न था।
मनु ने उदास बालक की आँखों का सूनापन देखा और तुरंत ही ममता भरा अपना हाथ उसकी पीठ पर रख दिया। यूं तो अंतर्राष्ट्रीय कई कड़े नियमों से गुजरना होगा मनु को उस परित्यक्त बच्चे को अपनाने के लिए परन्तु न जाने उसकी अनाथ आंखों की उदासी ने मनु से प्यार की कैसी करुण गुहार की थी कि मनु ने उसी पल निश्चय कर लिया कि आज से यही केसर का बड़ा भाई है। मनु जानती थी कि उसके जोनुस का मन भी उसके घर सा ही बड़ा है, और वहाँ एक और मेहमान घर का सदस्य बनकर आराम से आजीवन रह सकता है--- इस अभागे अनाथ को भी तो एक मौक़ा प्यार का, खुशहाल ज़िंदगी का मिलना ही चाहिए। नम हो आई आँखों को मनु ने हंस कर पोंछ डाला और प्यार से बच्चे का सर सहलाते हुए उसे अपनी गोदी में ले लिया।
मनु का मोबाइल एक ज़िद्दी बच्चे सा शोर पर शोर किए जा रहा था। रात के दस बज चुके थे और फ़ोन पर रेशमा ही थी। " हलो मनु। कहाँ हो तुम, सब ठीक तो है ना?" और फिर मनु ने सहेली को पूरी दिन भर की कहानी और अपनी मजबूरी ज्यों की त्यों सुना दी। " अब तो हम लक्सौर में ही मिल पाएँगे रेशमा। तुम्हें उस अनाथालाय में एक और लावारिस बच्चे का इंतज़ाम करना होगा, जिसे मैं अपने साथ इंग्लैंड ले जाना चाहती हूँ---गोद लेना चाहती हूँ इसे।" अनजान बालक की सूनी आँखें मनु के मन की गहराइयों तक उतर चुकी थीं और अब मनु उनमें ढेर सारा आत्मविश्वास और किलकती हँसी देखना चाहती थी।
जिसका अभी तक वह नाम भी नहीं जानती थी उसी से एक बहुत क़रीब का रिश्ता जुड़ गया था मनु का। "ठीक है मनु, सब कुछ ठीक रहा तो कल वहीं लक्सौर में मिलते हैं। " मनु की हिम्मत और लगन से अभिभूत रेशमा ने भी झट से फ़ोन रख दिया। लक्सौर पहुँचकर उसे भी तो अभी बहुत सारे इंतज़ाम करने थे---कमरा तैयार करवाना था---पेपर तैयार करवाने थे और अपने नन्हे मेहमान का जी भरकर भरपूर स्वागत भी करना था।
मनु के स्वागत में सामने लक्सौर का एयरपोर्ट और सहेली रेशमा दोनों ही बाँहें फैलाए खड़ी थीं। भाग्य सा पत्थरों में लिखा इतिहास और इतिहास में जीता आज--लक्सौर भी मनु के आज की तरह ही विरोधाभासों से भरपूर था। मनु नहीं जानती थी आने वाले इस नए कल का कैसे स्वागत कर पाएगी वह ! अनगिनित उन खंडहरों में जीवन-सा ही बहुत कुछ बिखरा, बेतरतीब पर मूल्यवान दिख रहा था मनु को! अतीत में साँस लेते इस शहर और इसकी संस्कृति में एक अजीब-सा बेचैन ठहराव था, मानो सूखी धूल उड़ाती धरती के नीचे घटनाओं और दास्तानों का कभी न बुझने वाला एक लावा सुलग रहा हो?
मनु जानती थी कि यादों के कई-कई कटे सिरों से पटा यह जीवन भी तो इतिहास की तरह बस एक रणक्षेत्र ही है, जहाँ विजेता दूसरों की मजबूरियों पर, उनके अतीत पर एक नए भविष्य की नींव रखता है। परंतु मनु उस बच्चे से या उसके अतीत से कुछ भी नहीं जानना चाहती थी। वह जानती थी कि कुरेदने से या ढूँढ़ने की कोशिश में किसी पल भी विष्फोट हो सकता है और वह ही क्या, इस विष्फोट में तो उन दोनों का हर सपना भस्म हो जाएगा--एयर कन्डीशन कार के शीशे से सड़क पर धूल में लिपटे आधे-नंगे और बड़े पेट वाले बच्चों की तकलीफ़ का अन्दाजा कब लगाया जा सकता है, जानती थी मनु। वैसे भी दिन भर की थकी मनु अब कुछ और ज्यादा सोचने या करने की मन:स्थिति से दूर नींद की गोदी में कब लुढ़क गयी, खुद उसे ही पता नहीं चल पाया।
अनाथालय पहुंचते ही नन्हे नन्हे बच्चों ने मुस्कुराकर एक अभूतपूर्व ललक के साथ उसका स्वागत किया। उन्हें इन्तजार रहता था मनु का। मनु जब भी आती थी बच्चों के लिए चौकलेट, क्रेयौन और किताबों से लदी-फंदी ही आती थी। कभी कभी अगर उसके पास कुछ पैसे बच जाते थे तो बच्चों के लिए कुछ नए कपड़े और खिलौने भी रहते थे मनु के पास। हमेशा की तरह इसबार भी फूल-से बच्चों की तृप्त मुस्कान देखते ही मनु की सारी थकान रफूचक्कर हो गई। तुरंत ही एक प्याला चाय और दो बिस्कुट से ही मनु को अपनी सारी खोई उर्जा वापस मिल चुकी थी। कई नए मेहमान दिखे उसे वहाँ पर। मनु जानती थी कि कुछ और नए जूते, नए कपड़े, किताबें, साबुन शैम्पू की जरूरत थी उन्हें। बहुत कुछ और करा जा सकता था उनके लिए, चाहिए था उन्हें और मनु करना भी चाहती थी पर हर इरादे के आगे आर्थिक परेशानियां अजगर-सी मुंह खोले खड़ी रहतीं। पर यूँ हिम्मत नहीं हारेगी मनु। अभी तो उसके मिशन की शुरूवात ही है। अपने प्रयास में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी मनु ने। रोज ही नए नए लोग जुड़ रहे हैं उसके इस अभियान से। कल ही औक्सफोम ने भी एक बड़ा सा कपड़ों से भरा बक्सा भेजा है। कुछ एयरलाइन्स ने भी मनु के अनुरोध पर लौटते सैलानियों से अपनी दैनिक प्रसाधन सामग्री जैसे कि बचे हुए साबुन शैम्पू जैसी चीजों की आधी भरी बोतलों को दान करने का अनुरोध भी शुरू कर दिया है। सैलानियों का उत्साह और जबाव अच्छा तो है पर उतना नहीं, जितना कि होना चाहिए था। ‘ होगा धीरे-धीरे सबकुछ होगा! ‘ मनु ने एक ठंडी साँस ली और अपने विचारों के दौड़ते घोड़ों को एक बार फिर से संयम की रस्सी से कस लिया।
अब उसका ध्यान विश्वास पर था जो अपने हम उम्र बच्चों में ऐसा घुलमिल गया था मानो उन्हें बरसों से जानता हो। ‘ अगर कुछ नहीं हो पाया तो यहां तो विश्वास आराम से रह ही सकता है।‘ पलटकर उसने रेशमा से कहा। होठ कुछ भी कहें, मनु की आँखों की हसरत रेशमा की अनुभवी आँखों से छुपी न रह सकी।
‘ ऐसा क्यों सोचती हो?’, रेशमा बीच में ही उसे टोकती हुई वह बोली, ‘ बहुत भागदौड़ की है मैने। विश्वास मानो मनु, रात तक सरकारी काग़ज़ और तुम्हारा विश्वास दोनों ही तुम्हारे साथ जाने के लिए तैयार होंगे।‘
मनु की खुशी अब छुपाए नहीं छुप रही थी। असली नाम जो भी हो आज से वह इसी नाम से पुकारेगी अपने नन्हे मेहमान--नहीं-नहीं, अपने परिवार के इस नन्हे विशिष्ट और प्रिय सदस्य को। यही तो वह मसीहा है जो मानवता, इंसान के अंदर छुपी अच्छाइयों में, उसका खोया विश्वास वापस ला पाएगा---उसका अपना विश्वास! मनु ने एक नए, और हाल ही में पाए प्यार और भरोसे से विश्वास की तरफ़ देखा और ममतामयी माँ की तरह उसका सर अपने वक्ष से लगा लिया। विश्वास ने भी अबतक मनु को पहचान लिया था, तभी तो वह भी बिना कुछ कहे या पूछे चुपचाप यूँ उँगली पकड़े-पकड़े उसके साथ-साथ चला जा रहा था। अभी भी तो एकटक उसी की तरफ़ देखे जा रहा था, मानो पूछ रहा हो, आश्वासन माँग रहा हो कि " कहीं तुम भी तो मुझे वैसे ही अकेला छोड़ कर, कहीं चली तो नहीं जाओगी? "
मनु ने अनाथ पर प्यार की बौछार कर दी--आइसक्रीम खिलाई, सोडा पिलाया और दिन भर जी भरकर कपड़े, खिलौने, सभी ख़रीदे उसके लिए---काली रिमोट कन्ट्रोल वाली रेसिंग कार, क्रिकेट और टेनिस सैट ही नहीं, बॉल, पेÏन्टग सैट किताबें और स्क्रैबल सभी कुछ। धीरे धीरे अब विश्वास को भी पूरा भरोसा हो चला था मनु के ऊपर। मनु जानती थी कि अब वह और उसका विश्वास वाकई में घर लौटने को तैयार थे।
फ्लाइट में बैठते ही मनु ने अपना लैपटौप वापस निकाल लिया था। आश्वस्त विस्वास उसके साथ था और बगल की सीट पर खर्राटे लेकर सो रहा था। उसके होठों पर एक संतुष्ट मुस्कान थी और घुंघराले बालों से भरा नन्हा सिर एक भरोसे के साथ मनु के कन्धे पर टिका हुआ था। इसके पहले कि अपने इन खट्टे मीठे अनुभव, इनकी तीव्रता को, इस यादगार और ऐतिहासिक दिन के छोटे-बड़े विवरणों को भूले, मनु अपनी स्क्रिप्ट एकबार फिर से लिख लेना चाहती थी। इस बार पापा या दुनिया के मर्दों के लिए नहीं, दुनिया के हर इंसान के लिए, खुद अपने लिए भी। शायद खुद ये औरतें और असहाय बच्चे ही नहीं, जुर्म करने वाले आतंकी भी इस ज़रूरत, इस दर्द को... उसकी बात को समझ पाएँ? उसने कंप्यूटर निकाला और सबसे पहले तो अपनी नाटिका का शीर्षक ही बदल डाला, अब सेंध एक बदलती कहानी न होकर, सेंध एक नई कहानी थी, जहाँ सेंध लगाने वाले तकलीफ़ देह या खलनायक नहीं, बुराइयों को उजागर करने वाले उसके जैसे, इधर उधर बिखरे चंद चौकन्ने और दूसरों के सुख-दुख के प्रति जागरूक और ज़िम्मेदार नागरिक थे। बगावती नहीं थी मनु पर हमेशा से ही अपनी बात कहना भलीभाँति जानती थी वह।
उड़ान के रास्ते में तूफ़ान आ गया था और बग़ल में बैठे सहयात्रियों में से एक के नन्हे हाथों से फिसलकर संतरे का रस मनु के वक्षस्थल पर लुढ़कता कपड़े और उसे ही क्या. कंप्यूटर स्क्रीन व की-पैड सबको ही चिपचिप कर चुका था। अभी तक आराम से घूँट घूँट पीती, आनंद लेती वह लड़की अब बुरी तरह से सहम चुकी थी और दयनीय सी मनु की तरफ़ देख रही थी। कोई बात नहीं, देखो कैसे मैं अभी इसे साफ़ कर देती हूँ, कहकर मनु ने लड़की को तुरंत ही सांत्वना दी और फिर सबसे पहले कम्यूटर को साफ़ करके केस में सुरक्षित वापस रख दिया।
इसके साथ वह कोई लापरवाही या नादानी नहीं कर सकती थी वह, इसीलिए तो खुद को साफ़ करने की बात भी वह कम्प्यूटर को सुरक्षित ऊपर रखने के बाद ही सोच पाई। लड़की पर उसे जरा भी क्रोध नहीं आया, यह देखकर वह नन्ही लड़की और उसकी माँ ही नहीं, बग़ल में बैठा विश्वास तक आश्चर्य चकित था। प्यार से बच्चों का सर थपथपाती, खुद को व्यवस्थित करती बाथरूम की तरफ उठ चली वह ---रस ही नहीं बहुत कुछ ऐसा था, जो उसे अंदर तक भिगोए जा रहा था। गीले-सूखे में मुस्कुराकर रहना आता था मनु को। वैसे भी उसे जीवन में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं लगा कभी। हर सुबह एक नई चुनौती लेकर आई। नटी-सी ही तो जिन्दगी जी है उसने बचपन से लेकर आजतक... आंखें लक्ष पर और टेढ़ी-मेड़ी रस्सियों-सी राहों को पार करते, आगे बढ़ते उसके स्वावलंबी कदम।
पड़ावकाफी काफी वर्षों बाद रामनगर आना हुआ। सोच रहा था कि शायद रामनगर भी दिल्ली की तरह काफी बदल गया होगा लेकिन रामनगर तो वही पुराना रामनगर है। सड़क के किनारे वही लम्बी कतार में होटल तथा वही फल, चना, बेचने वालों की आवाजें उसका स्वागत कर रहे थे। हां सड़क के किनारे कोसी की ओर जाने वाली सड़क पर जो रोड़वेज का पुराना कार्यालय था वहां एक विशाल भवन जरूर बन गया है, रोड़बेज का नया बस अड्डा भी बाजार से तनिक हटकर पुराने कॉलेज वाले ग्राउंड़ के पास बन गया था। बाकी कुछ खास बदलाव रामनगर में नही दिखा। बस से उतरकर सारांश टिकट बुकिंग के पुराने कार्यालय की ओर बढ़ा वहां भी कुछ खास नही बदला, गढ़वाल मोटर यूजर्स का कार्यालय उसी भवन में आज भी चल रहा है। बस की टिकट खिड़की उसी जगह है, उसमें न कोई बदलाव हुआ और न कोई नयापन, सामने मोटर मार्ग तथा बसों का रूट चार्ट को दर्शाता बोऱ्ड नया सा जरूर दिखता है। टिकट खिड़की पर उसी तरह धूल व मैल जमा है लगता है वर्षों से इस पर सफेदी भी नही हुई। टिकट खिड़की की ओर बढ़ते हुए टिकट बाबू को पांच सौ का नोट थमाते हुए खाल्ूयंखेत की एक टिकट मांगी।
टिकट बाबू ने कहा बस अब खाल्यूंखेत नही भौन, मुस्याखांद जाती है बोलो कहां का टिकट दूं?
एक मुस्याखांद का देदो।
मुस्याखांद उतरोगे या भौन जाओगे?
भैया मुझे पड़खण्डाई जाना है।
फिर मुस्याखांद ही उतरना ठीक रहेगा।
ठीक है एक मुस्याखांद का ही दे दो।
टिकट खिड़की पर खड़े खड़े ही उसे याद आया वर्षों पहले वह बाबू जी के साथ जब भी वह गांव आता था तो इसी खिड़की पर खड़े होकर बाबू जी ने टिकट लेते थे। आज वर्षों बाद इस खिड़की को छूकर उसे ऐसा लगा जैसे बाबू जी का स्पर्श कर रहा हो। उसके रोम-रोम में पुरानी यादें जागृत हो गईं, आंखें गमगीन हुई जाती थीं लेकिन उसने अपने आप को संभाला। समय कैसे बीत जाता है मानो कल ही की तो बात हो, एक-एक घटनाक्रम चलचित्र की भांति उसके सामने घूम रहा था। एक बार जब बाबू जी टिकट लाईन में लगे थे तब उसे कहा था कि सामान के सामने रहे। लेकिन वह थोड़ी देर में ही बाबू जी के पास चला आया था। बाबू जी ने तब उसे वहीं से ड़ंाटा था। तुम्हें मैने सामान के सामने बैठने को कहा था तुम क्यांे इधर चले आये? तुम्हें पता नही यहां पलक झपकते ही चोर सामान उड़ा लेते हैं, जाओ तुरन्त सामान के पास खडे रहो, मैं आ रहा हूँ। रामनगर में तब सामान उठाने वाले चोरों का गिरोह सक्रिय था। लोगों की आंख हटी नही कि सामान गायब। बाबू जी ने बस में बताया था कि कैसे यहां चोर सामान तथा लोगों की जेबें काटते हैं। रामनगर से मरचूला में पहुँचने तक बाबू जी ने उसे काफी बातें बताई थीं। बस की आवाज तथा सफर की थकान में उसे कुछ बातें सुनाईं दी, कुछ वह नही सुन सका था। मरचुला में अक्सर बाबू जी उसे घर जाते हुए पकोडे व चाय दिलाते व रामनगर आते समय चाय व छोले दिलाते थे। बाबू जी के साथ आते-जाते उसे किसी प्रकार की जिद या अपनी मर्जी की चीज मांगने में संकोच होता था। इसलिए जो भी चीज बाबू जी दिलायें उसे खाने या लेने में ही भलाई थी। अधिकार स्वरूप वह कभी भी कुछ बाबू जी से नही मांगता था। उसे संकोच भी होता तथा बाबू जी का भय भी रहता कि न जाने क्या कहेंगे। कभी-कभार बाबू जी स्वयं ही नमकीन या बिस्कुट, टाफी आदि दिला देते थे। रामनगर से अक्सर घर जाते समय वे लोग चने, मीठे खील, कुंजे, गट्टे तथा मौसमी फल आदि खरीदते थे। बाबू जी कभी भी रामनगर से मिठाई नही खरीदते थे वे कहते थे कि रामनगर की मिठाई खराब होती है, इसलिए मिठाई दिल्ली से ही ले जाते थे। गांव पहुंचकर छोटे-बड़े सभी मिलने आते थे असल-कुशल पूछने के बाद दादी सबको चने, कुंजे व टाफियां आदि बांटती थी कुछ बड़े लोगों को पिताजी अन्दर कमरे में बिठाते और उन्हें चाय आदि पिलाते। रात को घर-घर जाकर चने, मिठाई आदि बांटने की ड्यूटी सारांश तथा उसके भाई पंकज व बहन स्वाति की होती थी। तब वे तीनों घर-घर जाकर चने आदि देकर आते। कई बार पंकज शरारत कर देता किसी के लिए दिया गया कुंजा या गट्टा वह चुपके से मुँह में ड़ालकर खा लेता। तब लोगों में आपस में प्यार-मोहब्बत थी आज की तरह नही कि कब आदमी गांव गया और कब वापस आ गया किसी को न खबर होती है और न कोई किसी से मतलब रखते हैं। अब और तब के माहौल में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है।
वह बाबू जी के साथ दिल्ली में ही रहता था। गांव में उसकी मां- दादी तथा एक बहन स्वाती व छोटा भाई पंकज रहते थे। वह अक्सर गर्मियों की छुटि्टयों में बाबू जी के साथ गांव आता था, स्कूल खुलने से पहले ही दिल्ली लौट जाता। उसका मन करता कि वह भी गांव मंे ही रहे लेकिन स्कूल के लिए उसे दिल्ली लौटना पड़ता। फिर अगले साल गर्मियों की छुटि्टयों की प्रतीक्षा लम्बी प्रतीक्षा करो। गांव आकर वह दिल्ली की भीड़-भाड़ तथा भाग-दौड़ की जिन्दगी को भूल सा जाता। गांव का शान्त माहौल, प्रकृति के नजारे उसे अधिक प्रिय लगते। गर्मियों में जंगलों में काफल व किनगोड़ें, हिंसर आदि पके होते, वह गांव के बच्चों के साथ अक्सर जंगल में जाता तथा काफल, किनगोड़े व हिंसर खाता। दिन रात कल-कल बहती नदियों तथा पहाड़ों को देखकर उसे लगता कि काश वह यहीं रहता तो कितना अच्छा होता? जब वह पांचवी कक्षा में था तो छुटि्टयां बिताकर दिल्ली जाते समय वह काफी रोया था अपनी मां व दादी पर चिपटकर वह काफी देर तक रोता रहा। उसने अपनी मां से कहा कि मां मैं भी यहीं गांव में पढ़ूंगा तथा यहीं बच्चों के साथ खेलूगा। यहां भी तो स्कूल हैं? मैं यहीं पढ़ूंगा मैं दिल्ली नही जाना चाहता।
तब मां ने उसे बड़े लाड़ से समझाया था। उसे रोता देखकर तब मां की ऑंखें भी छलक आईं थी। मां को रोता देख न जाने क्या हुआ वह भी चुप हो गया व चुपचाप अपने पिताजी के पीछे चल पड़ा। दिल्ली आते समय मां उन्हें बस में बिठाने खाल्यूखेत तक आती, मां अक्सर उसको गले से लगाकर काफी रोती थी तथा अपने आंसुओं को अपनी शाल से छुपाने का प्रयास करती। उसके गालों को बार-बार चूमती व उसके सिर पर हाथ फेरते हुए अक्सर मां की आंख से एकाध आंसू उसके सिर या हाथ पर पड़ जाता तब उसे लगता कि मां रो रही है। मां कहती थी बेटा दिल्ली में खूब पढ़ना लिखना। किसी के साथ इधर-उधर मत घूमना तथा अपने पिता का कहना मानना। जब तू पढ़-लिख जायेगा तो तब तू बड़ा आदमी बन जायेगा। तब पता नही था कि मुझे बड़ा आदमी बनाने के लिए ही दिल्ली भेजा गया था। आज मैं अपनी जगह बड़ा आदमी तो नही लेकिन अपनी उम्र के लड़कों में से ठीक ही हूूं लेकिन मेरी तरक्की चाहने वाले मेरे मां-बाप आज मेरे साथ नही हैं। दादी का तो पहले ही इन्तकाल हो गया था लेकिन जिन्हौंने मुझे बड़ा किया और जो मेरे बड़ा आदमी बनने के ख्वाब देख रहे थे काश वे आज अगर जिन्दा होते तो कितने खुश होते। उसके दिल्ली आने से काफी पहले से ही दादी उसके लिए अलग से थैले में अखरोट, भंगजीरा तथा घी, शहद आदि कई दिनों से जोड़-जोड़कर रखती। दादी बाबू जी से अक्सर कहती मेरे नत्या को किसी प्रकार से ड़ांटना मत। उसे किसी प्रकार की कमी मत होने देना,अगर उसके लिए किसी प्रकार की कमी हुई तो देखना मैं तेरी पिटाई करूंगी। तब पिताजी धीरे से मुस्करा देते। दादी मुझे व पिताजी को आशीष देकर विदा करती। पिताजी जब दादी के पांव छूते तो दादी की ऑंखें नम हो जाती। दादी तब कहती बेटा परदेश में संभलकर रहना, हमारा सहारा तुम्ही हो। किसी प्रकार की चिन्ता न करना घर-गांव में हम जैसे तैसे कर चला ही लेंगे लेकिन तुम दोनों बाप-बेटे अपनी शरीरों का ध्यान रखना। दादी अक्सर इसी प्रकार की नसीहतें हमें देती। बस अड्डे पर मां तब तक बस को देखती रहती जब तक बस आंखों से ओझल नही हो जाती। मां हाथ हिलाकर कुछ कहती थी एक हाथ से अपने आंसुओं की अविरल धारा को पोंछती।
पांच बजे प्रात: रामनगर से बस चल पड़ी है। सारांश अपने गांव जा रहा है। मरचुला में बस रूकी लेकिन वह बस में ही बैठा रहा। धुमाकोट में वह फ्रेश होने के लिए उतरा। अपना जानने वाला उसे कोई भी नही दिखा। हाथ मुंह धोकर वह चुपचाप से बस में बैठ गया। उसे याद आया पहले जब वह गांव जाता था तो किस गर्मजोशी से उसकी दादी, मां तथा भाई-बहन उसका स्वागत करते। दादी उसे दूध, घी, दही आदि सब एक ही दिन खिला देना चाहती। मां उसे अपने अंक में भरकर काफी देर तक रोती रहती। उसे समझ नही आता कि जब गांव आओ तब भी मां रोती है और जब गांव से दिल्ली वापस आओ तब भी मां रोती ही है ऐसा क्यों? तब समझ नही आता था लेकिन आज वह समझता है कि गांव जाने से मां अपनी खुद बिसराने का प्रयास करती तथा जब मैं दिल्ली को आता तो मां सोचती होंगी कि आज से एक साल बाद ही अपने बेटे को देख पाने का सौभाग्य मिलेगा इसलिए मां की ममता रो पड़ती थी। आज वर्षों बाद गांव जाना हो रहा है लेकिन न तो उसके स्वागत करने के लिए मां है न दादी, गांव का उनका मकान टूट चुका है। उसका भाई पंकज मुम्बई में स्यटल है और बहन स्वाति की शादी हो चुकी है वह अपने परिवार के साथ बड़ौदा में रहती है। दादी को गये हुए लगभग पच्चीस बरस हो गये हैं और बाबू जी व मां को गये आठ साल हो गये हैं। दादी तो उम्रदराज हो चुकीं थी लेकिन मां व बाबू जी को तो अभी जीना था। उन्हें अब अपने बच्चों का सुख देखना था लेकिन काल के क्रूर हाथों ने उन्हें असमय ही हमसे छीन लिया। समय किस तरह से करवट लेता है उसने कभी सोचा भी नही था कि एक दिन उसे इस प्रकार से भी गांव आना होगा जब गांव में उसका अपना कोई भी नही होगा। दूर के रिश्ते के एक चाचा हैं जिनके पास उनकी जमीन-जायदाद है, उन्हीं के पास रूककर वह वापस आ जायेगा। बस अभी सरांईखेत पहंुची थी कि जोरदार बारिश शुरू हो गई। बस का आगे का रास्ता काफी कठिन है। सड़क काफी संकरी तथा घुमावदार है। सड़क पक्की तो बन गयी है लेकिन चौड़ाई में तो वेसे ही है। उसे लगा कि आगे का सफर काफी खतरनाक होगा। उसका मन करा कि यहां से पैदल ही चले लेकिन जंगली जानवरों का ड़र तथा रास्ता भटकने के खतरे को भांपकर वह बस में ही बैठा रहा। बस से कई सवारियां अपने स्टेशनों पर उतर गई थीं काफी सामान भी उतारा जा चुका है, अब बस में काफी खुली जगह है। पूरी बस में उसने नजर दौड़ाई लेकिन अपना जानने वाला कोई भी नही दिखा। उसने अपना सामान एक सीट पर रखा तथा खाली सीट पर लम्बा होकर लेट गया। खाल्यूखेत के मोड़ पर बस रूकी तो उसकी तन्द्रा टूटी। सामन खाल्यूखेत दिख रहा था। सवारियां उतरीं और बस आगे चायखेत होते हुए मुस्याखांद की ओर बढ़ने लगी। चायखेत में उसने अपने पैतृक खेतों को देखा तो उसका मन भारी हो गया। उनके खेत आज बंजर पड़े हैं बीच वाले खेत में बच्चे शायद क्रिकेट खेलते हैं बीच में पिच सी बनी है। आगे की धार से उसकी नजर अपने गांव पर पड़ी वहां सीमेंट के काफी नये मकान दिखाई दिये। लगा जैसे इन बीस सालों में यहां काफी कुछ बदल गया है। घूम-घूमकर बस एक कोने से दूसरे कोने में जाती और फिर उसी कोने में आती प्रतीत होती। आखिर मुस्याखांद आ ही गया। सवारियां यहां उतरी वह भी अपना सामान लेकर उतर गया। उसे ध्यान आया सड़क से नीचे का रास्ता ही पड़खण्डाई जाता है। वह बस से उतरकर सामने की ओर बढ़ ही रहा था कि एक बुजुर्ग आदमी ने उसे देखते ही पहचान लिया। ये दादा-दादा.... करते हुए उसने सारांश का बैग पकड़ लिया और सामने शिशुपाल के होटल में रखकर वहां बैठ गया। सारांश को बैठने का इशारा करते हुए होटल में बैठे एक बालक को दो चाय बनाने का इशारा किया।
फिर वह इशारों में कहने लगा
ये दा...दा ....?
उसने मुझे पहचान लिया था। वह इशारों में मेरे हाल-चाल पूछ रहा है। कह रहा था कि तुम गांव छोड़कर कहां चले गये हो? तुम्हारा मकान टूट गया है, खेत लोग कर रहे हैं। वह कह रहा था कि तुम्हारे मां-बाप बेचारे असमय ही काल के गाल में चले गये। वे बहुत अच्छे लोग थे। वह बार-बार मेरी पीठ थपका रहा है शायद कह रहा कि इतना सा था अब कितना बड़ा हो गया है। सामने बैठा बालक देखकर हंस रहा था।
मदन चाय पी चुका है। उसने मुझे इशारे से उठने के लिए कहा और मेरा बैग लेकर मेरे गांव की ओर चल पड़ा। मदन अब काफी बूढ़ा हो गया है। जब मैं पिताजी के साथ गांव आता था तो मद नही खाल्यूखेत से हमारा सामान लाता था। इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी मदन मुझे पहचान गया है न कमाल। गांव के नजदीक पहुंचकर कई चेहरे जानने वाले दिखे। कई मुझे पहचानने का प्रयास करते कईयों को मैं जानने की कोशिश करता।
मदन कहां से आया और कहां का रहने वाला है इस बात को कोई नही जानता लोग कहते हैं कि उन्हौंने मदन को ऐसे ही देखा। अब वह काफी बूढ़ा हो गया है चढ़ाई पर काफी धीरे चल रहा है। असल में उसकी उम्र भी तो काफी हो चुकी है। जब भी उसे देखा कुछ करते ही देखा उसे सदा ही दूसरों की खातिर खपते देखा है। जीवन पथ पर अनन्त सफर की ओर बढ़ते हुए कदमों के बारे में जैसे हम नही जानते हैं कि हमारा अगला पड़ाव क्या होगा कहां होगा? व इस यात्रा की समाप्ति कब व कैसे होगी? उसी प्रकार मदन के बारे में भी नही जानते हैं कि वह कहां से आया? किसका बेटा है? कौन से गांव का है? असल में यही हालात हमारी भी तो हैं। महानगरों में हम भी तो मदन ही तो हैं, हमें यहां कोई नही जानता हमारी पहचान भी सिर्फ एक मशीनी पुर्जे से अधिक नही है। न किसी को हमारे मूल के बारे में पता, न हमारे बारे में पता। किसी और की तो बात छोड़ दीजिए आगे आने वाले समय में हमारे अपने जिन्हें हम पाल रहे हैं जो हमारी सन्तानें हैं वे भी नही जान पायेंगे कि हमारा मूल कहां था? हम कहां से आये और हमारे पूवर्ज किस गांव, किस कस्बे के रहने वाले थे? यही नियति है और यही इस अनन्त सफर की सच्चाई। हम चले जा रहे हैं उनको हमने इन्हीं रास्तों पर चलते हुए देखा हम भी उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए चल रहे हैं पड़ाव दर पड़ाव ड़ालते हुए एक अनन्त यात्रा के लिए।
गांव समीप है। एक सफर को तो मंजिल मिलने ही वाली है लेकिन यहीं से एक दूसरा सफर शुरू होने वाला है। उसी सफर को अंजाम तक पहुँचाने की खातिर मैं इतने वर्षों बाद अपनी पितृ भूमि में आया हू और वह सफर है हमारे पितर देवताओं को बैकुण्ठ पहुंचाने का, हमारे पितरों के पिण्डदान और उनको हरिद्वार नहलाने का। इस उदे्श्य से गांव आना हुआ है। इस सफर का अगला पड़ाव भी समीप है और आगे का सफर भी लगभग तय सा है। इस सफर को भी हमने उन्हीं से सीखा और देखा है। इसे आप संस्कृति, रिवाज या पूर्वजों की मृगतृष्णा या पोंगापंथी कुछ भी नाम दे सकते हैं लेकिन यह जो सफर हमारे पितरों को तृप्ति देगा वह कुछ न कुछ मायने रखता है और उसने हमारे जीवन के सफर के पड़ावों पर हमें झकझोरा है तभी तो महानगरों में मशीनी जिन्दगी जीने के बाद भी इस पितृ कार्य के लिए आना पड़ा है। यही हमारी नियति है और यही सत्य कि अनन्त की ओर बढ़ना, देखे-अनदेखे सफर पर पड़ाव-दर-पड़ाव चलते रहना ही रहना जीवन है।
बेटे को ब्रेकफास्ट देकर नीरू उसके लिए दूघ लेने चली गई। बेटे ने जब ब्रेड खाने के लिए उठाई तो वह नीचे गिर गई। बेटा उसे यूँ ही उठाने लगा तो नीरू ने देख लिया।
“ बेटा, इसे रहने दो। “
“ क्यों मां? “
“ यह खराब हो गई है। “
“ कैसे? “
“ इसे मिट्टी लग गई है। मिट्टी में बहुत सारे हानिकारक कीटाणु होते हैं जो इन्सान को बीमार कर देते हैं। “
नीरू उस ब्रेड को एक तरफ रखकर दूसरी लेने के लिए चला गई। इतने में रिक्शावाला बेटे को लेने आ गया। नीरू ने बेटे को नई ब्रेड दी और जमीन पर गिरी ब्रैड रिक्शा वाले को खाने के लिए दे दी। बेटा तुरंत बोल उठा- “ भैया, यह ब्रेड मत खाना।“
“क्यो? “
“ तुम बीमार हो जाओगे। “
“ कैसे? “
“ इस पर मिट्टी लगी हुई है। मिट्टी वाली चीज खाने से आदमी बीमार हो जाता है। क्यों मां, ठीक है न ? “
मां चुप थीं, उसे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था।
प्रेम विज
सहनशीलता
तीसरे दिन भी जब वही ग्राहक चप्पल खरीदने आया तो हैरत भरी नजरों से से देखते हुए दुकानदार ने कहा-
‘ लगातार दो दिनों से आप मेरे यहां से नई चप्पल खरीदकर ले जा रहे हैं। क्या आपको नई-नई चप्पलें पहनने का शौक है। ‘
सहज भाव से ग्राहक ने उत्तर दिया- ‘ नहीं ऐसा नहीं है। मैं हर रोज मन्दिर जाता हूँ र भगवान के दर्शन कर जब लौटता हूं तो अपनी चप्पल को गायब पाता हूं। ‘
दुकानदार ने उसे मशवरा दिया- ‘ यदि आपकी कोई चप्पल चुरा ले जाता है तो आप भी किसी दूसरे की चप्पल पहन सकते थे।‘
‘ नहीं भाई मैं ऐसा नहीं कर सकता।‘
‘क्यों नहीं कर सकते? गजब की सहनशक्ति है आप में। ‘
अपने जूते उतार पाँवों के के तलवे में पड़े छालों की तरफ सारा करते हुए ग्राहक ने कहा- ‘ यदि मैं किसी की चप्पल पहन कर चला आता तो मेरी तरह ही उसे भी कष्ट भोगना पड़ता। रही सहनशीलता की बात तो प्रभु भक्ति और उसकी अनुकम्पा से ही मेरे भीतर उसका उदय हुआ है। ‘
ग्राहक के इस उत्तर को सुन ग्राहक ने फिर कोई सवाल नहीं किया। प्रसन्न हो वह ग्राहक को चप्पलें पहनाने लगा।
आर्थिक उदारीकरण, ग्लोबलाइजेशन अर्थात् एक ध्रुवीय होती दुनिया के इस वर्तमान भौतिकवादी युग में किश्त-किश्त जीवन जीता आदमी व्यक्तिगत जिजीविशा की पूर्ति हेतु दिनोंदिन आदमी नहीं, मशीन बनता जा रहा है। वह समय को अपना उत्पादक बनाकर बहुत ही चालाकी से उसका व्यापार कर रहा है, वास्तविकता यह है कि ऐसे समय में जब दुनियां की मण्डी में समय की कलाबाजी हो रही है, मनुश्य अपना समय नि:स्वार्थ नश्ट नहीं कर सकता। इसलिए पेशेवर साहित्यधर्मियों एवं पाठकों को छोड़कर लोग अपनी मानसिक थकान मिटाने हेतु कुछ ऐसा पढ़ना या समझना चाहते हैं, जिसमें समय कम लगे और उसका प्रतिफल पर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर सकें। साथ ही उसके ग्रहण करने एवं समझने का दायरा दर्पण की तस्वीर की तरह पारदर्षी भी हो। आज लघुकथाओं की यही सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता भी है।
लघुकथाकार अनावश्यक कथा विस्तार, वर्णनात्मक फैलाव और विलगाव से बचता हुआ जीवन के छोटे घटना प्रसंग संवेदनाओं के माध्यम से व्यक्त करता है। विधा के रूप में जिस तरह साहित्य के गद्य रूप की कथा विधाएं-उपन्यास एवं कहानी होती है, उसी तरह लघुकथा इन्हीं तत्वों के परिप्रेक्ष्य में लिखी जाती हैं। इन तीनो उपविधाओं में अन्तर मात्र कथानकों का होता है जिसके कारण इन तीनों में स्वत: ही आकारगत अन्तर आ जाना लाज़िमी है। प्रमुख बिन्दुओं पर इसका शिल्प केन्द्रित होता है, अब वह शिल्प चाहे पारम्पररिक हो, प्रयत्न साध्य हो या स्वयंभू हो। जहाँ तक लघुकथा की पृथक पहचान का सवाल है, एक तो कथानक को लेकर आकारगत इसकी अपनी पृथक पहचान हैं तो दूसरी ओर हृदय में गहरे पैठकर मार करने की इसकी क्षमता वि शेश पहचान रखती है। या यूँ कहा जाये कि ''लघु कथा युगबोध को अभिव्यक्त करती है और नैतिक जीवनमूल्यों को राख के अन्दर कुरेदती हे। वह आलपिन की चुभन भी है और गन्ध की छुअन भी है। दरअसल लघुकथा की अनिवार्यता रूप में न होकर गुण में है, शिक्षा में न होकर संस्कार में है दृश्य में न होकर प्रभाव में है, स्वास्थ्य में न होकर व्यक्तित्व में है और व्यक्तित्व कर्म से बनता है, कसरत से नहीं।``
लधुकथा अपनी वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा आश्रय के मन में एक भावनात्मक रूप ग्रहण करती है, जिसके भीतर उद्बोधित भाव गरीबी, उत्पीड़न, असहायता के प्रति करुणा अर्थात् मानव को त्रासद परिस्थितियो से मुक्त कराने के भाव से सराबोर हो उठता है, जिसके कारण आश्रय के मन में साहस का एक ऐसा नया भाव जागृत हो उठता है जो बुराईयों, अन्धविश्वासों, रूढ़ियों, साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध में संघर्श और चुनौती का वीरतापूर्वक परिचय देने लगता है। सही अर्थों में देखा जाये तो लघुकथा की यही सत्योन्मुखी संवेदनशीलता है, जो मंगलकारी तत्व की स्थापना करना चाहती है।
आकार की बात करें तो लघुकथा पंचतंत्र की बोधकथा की तरह आरम्भ होती है किन्तु बोध कथा का उद्देश्य केवल उपदेशात्मक होता था जबकि आधुनिक लघुकथा का लक्ष्य बहुआयामी है। तुलनात्मक दृश्टि से अवलोकन करें तो लघु कथा हास्य से थोड़ी दूरी बनाकर चलती है, वहीं दूसरी ओर व्यंग्य के प्रति इसका सम्बन्ध घनिश्ट होता है। क्योंकि आज के विसंगति प्रधान समाज पर यह करारा प्रहार करती है।
लघुकथा में व्यंग्य का होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु व्यंग्य की उपस्थिति से लघुकथा में रोचकता आ जाती है। लघुकथा अपनी विशेशता से पाठक के मूड में जबर्दस्त परिवर्तन कर दे, साथ ही उसके मानस को कुछ सोचने पर विवश कर दे, उसमें वैचारिक विद्रोह का बीज बो दे। यह भी कहा जा सकता है कि लघुकथा एक पृश्ठ की गद्य सीमा में पूर्वजों सा प्राचीन या नवजात शिशु-सा ताजा कथानक, प्रत्यंचा से कसे हुए शब्द-सा हो।
लघुकथाओं की सर्जनात्मक भाक्ति कहानी से किसी स्तर में कम नहीं मानी जा सकती है। समसामयिक जीवन की विसंगतियों के विरुद्ध लघुकथओं में जिस तीखेपन और वास्तविक रूप में विरोध/प्रतिरोध का स्वर गुंजित हुआ है, उससे इन लघुकथाओं की जीवन्तता की तस्वीर स्पश्ट दिखती है। इसके साथ ही अन्य सम्भावनाओं की आशा एवं प्रगति साफ दिखती है। वास्तव में मन के अंत:कोणों से लेकर विराट सामाजिक परिदृश्य को चित्रित करने में लघु कथाएं निश्चय ही अपने लघु रूपबन्ध में कहानी के अनुरूप दिखाई देती है।
लघुकथा सामाजिक विद्रूपताओं/विसंगतियों के विरुद्ध एक रचनात्मक आह्वान है। लघुकथा पाठकों को आज की आपा-धापी और समयाभाव के बीच जीवनानुभवों और यथार्थ के विविध सन्दर्भों आयामों का बोध कराती है। इन लघुकथाओं के माध्यम से रचनाकार उन जीवनपरिस्थितियों से परिचय कराता है जिनसे सम्पूर्ण मानवीय जीवन प्रभावित होता है। ये लघुकथाएँ कविता और गजलों की तरह सामाजिक, राजनीतिक और दैनिक जीवन की विसंगतियों/घटनाओं को विशिश्ट अन्दाज में वर्णन करती है। पढ़ने वाला इसके प्रति लगाव महसूस करने लगता है। वास्तविकता यह है कि लघुकथाओं में 'नावक` के मानक के समान सीमित भाब्दों में बहुत कुछ कहने की असीमित भाक्ति छिपी हुई है। उसमें व्यंग्य की पैनी धार है, आक्रोश के तीखे स्वर हैं, प्रतीकों और बिम्बों की सशक्त प्रयोगधर्मिता है, सारवाणी, है क्रान्तिधर्मी चेतना है, समूचे परिवेश को समेट लेने की अपरिमित क्षमता है।
आज बाजारवाद ने लोकतंत्र को अभिजात्य वर्ग तक सीमित कर दिया है। आधुनिक भारत में पूंजीवाद के विकास के असंगत गति के परिणामस्वरूप ही सामाजिक, राजनीतिक विशमताओं जन्म हुआ। आजादी के बाद हमारे देश में पूंजीवादी व्यवस्था का चक्र जिस तीव्रता के साथ हुआ है उससे हमारे सामाजिक जीवन में अजीबोगरीब परिवर्तन हुए हैं। वर्गवादी और स्वार्थी सत्ता की राजनीति ने अब तक मानवीय मूल्यों को अपूर्णीय क्षति पहुंचाई है, जिससे मानव अमानवीय जीवन जीने के लिए विवश हुआ है। भ्रश्टाचार, कालाबाजारी, स्मगलिंग, व्यक्तिवादी सोच को निरन्तर बढ़ावा मिलने के कारण सम्बन्धों में विघटन तेजी से आया है। व्यक्ति वर्गों और सम्प्रदायो में विभाजित हो गया है, वह उपभोक्ता संस्कृति का एक प्रोडक्ट बनकर रह गया है। साम्प्रदायिक, धार्मिक, आपराधिक राजनीति ने मनुश्य को असुरक्षा, भय और हिंसा के वातावरण में प्रवेश करने को मजबूर कर दिया है। अर्थशास्त्र की गणित के कारण रिश्वत्, हिसां, लूट, बलात्कार तथा हत्या आदि को निरन्तर प्रश्रय मिल रहा है। नेता, अधिकारियों और पुलिस के त्रिगुट ने जहाँ अपने स्वार्थों की पूर्ति की है, वहीं मानव जीवन को प्रभावित/आतंकित भी किया है। इस पूंजीवादी व्यवस्था के पतनशील मूल्यों के कुप्रभाव के परिणामस्वरूप राश्ट्रीय एकता और अखण्डता की समस्या उत्पन्न हो गयी है। सूचना संचार के माध्यमों-प्रेस, पत्र, रेडियो, टेलिविजन द्वारा निरन्तर साहित्य-संस्कृति को क्षग्रिस्त करने का सफल-असफल प्रयास किया जा रहा है। पुलिस और नौकरशाही से तालमेल के कारण समाज में ऐसी घृणित घटनाओं का सृजन हो रहा है कि शर्म से सिर नीचा हो जाता है। इस तथ्य को प्रेस भी स्वीकार करता है। वोट बैंक, जातिवाद और राजनीति के कारण मानव मन, परिवार, गांव, शहर और समूचे समाज में विघटन की सतत् प्रक्रिया जारी है। इक्कीसवीं सदी के हसीन सपनों में जीता हुआ व्यक्ति स्वतंत्रता, विकास, नई शिक्षा नीति के सुनहरे नारों के बीच आर्थिक संकट से उबरने के लिए भरपूर भाक्ति से प्रयास कर रहा है। व्यवस्था की इन विसंगतियों और कुरुपताओं को यथार्थ अभिव्यक्ति देने में इन लघुकथाओं ने सशक्त और जारूक पेशकश की है। इनके माध्यम से पाठक प्रतिदिन के वातावरण में होने वाली घटनाओं एवं कशमकश से वाकिफ और रू-ब-रू होता है। दूसरी ओर वह उन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार ताकतों/व्यक्तियों को पहचानने में सफल होता है, जिसकी वजह से व्यक्ति का जीवन विसंगतिपूर्ण और अमानवीयता की ओर अग्रसर होता चला आ रहा है। लघुकथा का मूल अर्थ/तेवर मानवीय सहानुभूति का भाव एवं व्यवस्था में होने वाली सड़ांध का विरोध करना रहा है, जो इसकी सार्थकता को सिद्ध करता है।
हिन्दी लघुकथाओं के विकास में लघु पत्र/पत्रिकाओं की विशिश्ट भूमिका रही है क्योंकि इन पत्रिकाओं के माध्यम से ही लघुकथाओं की पहचान स्पश्ट हो सकती है। वास्तविकता यह है कि इन पत्रिकाओं के माध्यम से अपनी विकास यात्रा के दौरान इन लघुकथाओं ने उन ऊँचे- ऊँचे सोपानों को स्पर्श किया जिनके आधार पर ही कहानी केन्द्रीय विधा के रूप में प्रतिश्ठित हुई। अपनी इस आत्मयात्रा में ही लघुकथाओं की लेखन परम्परा समृद्ध और प्रसिद्ध हुई है। सन् सत्तर के दशक में समकालीन विधाओं के बीच लघु कथा ने अपना एक स्वतंत्र वजूद बना दिया था। 'सारिका` जैसी महत्वपूर्ण कथापत्रिका ने लघुकथाओं के विशेशांक और महत्वपूर्ण अंकों को प्रकाशित कर लघुकथाओं के महत्व की स्वीकृति को सार्वजनिक किया है। वर्तमान समय में प्रत्येक पत्रिका में इस विधा के प्रति रुचि सम्पादकों का ध्यान आकृश्ट किए हुए हैं। हिन्दी आलोचकों ने अवश्य इस ओर अपनी उपेक्षा दृश्टि और संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। समय-समय पर लघुकथाओं के विशेशांक, प्रदर्शनी तथा सेमिनारों के बढ़ते प्रभाव ने इसकी प्रासंगिकता सिद्ध की है।
स्पश्ट है कि आकार, तकनीक एवं शैली के आधार पर लघुकथा की अपनी पृथक् पहचान बन चुकी है। लघुकथा का शिल्प परिणाम एवं विस्तार में प्रौढ़ता प्राप्त कर चुका है। इसलिए वर्तमान में लघुकथा के प्रति अनेक रचनाकारों का समर्थन और उत्साह अकारण नहीं है। जिस तीव्रता के साथ लघुकथा समृद्धता की ओर अग्रसर हो रही है, वह किसी भी साहित्य के लिए आश्चर्य का विशय हो सकता है। यह कहा जा सकता है कि लघुकथा विधा की स्थापना व्यावहारिक, भाषीय और सैद्धान्तिक दृश्टि से अपनी स्वाभाविक व सहज विकास यात्रा के प्रखर सोपान पर है, जो इसकी सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता को सिद्ध करता है।
पाकिस्तान ने युद्ध की पूरी तैयारी कर ली है। लाहौर, कराची और इस्लामाबाद पर उसके हवाई जहाजों ने पहरा देना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और सेनापति अशफाक परवेज कयानी ने खुले-आम घोषणा कर दी है कि वे किसी भी हमले का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। तालिबान और इस्लामी तत्वों ने भारत के विरूद्ध पाकिस्तान सरकार का साथ देने का एलान किया है। पाकिस्तान के सभी राजनीतिक दल मिलकर दुश्मन' के विरूद्ध एकजुट हो गए हैं। उन्हें आशंका है कि भारत हवाई हमला करेगा। आतंकवादी अड्डे जहाँ-जहाँ होंगे, भारत वहाँ मिसाइल और बम गिराएगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने तो घुमा-फिराकर यह भी कह दिया है कि यह मत भूलो कि पाकिस्तान के पास भी परमाणु बम है।
भारत के प्रधानमंत्री ने बार-बार कहा है कि हम युद्ध नहीं करना चाहते। इसके बावजूद पाकिस्तान में युद्व के नगाड़े क्यों बजने लगे हैं ? इसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला तो यह कि अगर पाकिस्तान में युद्ध का माहौल खड़ा नहीं किया गया तो फौज और आईएसआई को कौन पूछेगा ? लोगों का ध्यान आतंकवादियों पर केंद्रित हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकना पड़ेगा। गैर-फौजी सरकार का पलड़ा भारी हो जाएगा। आतंकवाद से त्रस्त पाकिस्तान की जनता आसिफ़ जरदारी जैसे नाम-मात्र के राष्ट्रपति को सचमुच इस लायक बना देगी कि वह अपने फैसले खुद कर सकें। युद्ध के नगाड़े बजते ही आतंकवाद का मुद्दा दरकिनार हो गया और राष्ट्ररक्षा मुख्य मुद्दा बन गया। लोकतांत्रिक सरकार नीचे चली गई और फौज दुबारा ऊपर आ गई। युद्ध के माहौल का दूसरा लाभ यह है कि अंतरराष्ट्रीय जगत को गुमराह किया जा सकता है। पाकिस्तान सारे संसार के सामने यह यक्ष-प्रश्न खड़ा करना चाहता है कि पहले आप परमाणु-युद्ध रोकेंगे या आतंकियों को पकड़ेंगे ? आतंकियों को तो हम पकड़ ही रहे हैं। आप पहले भारत को थामिए। युद्ध का खतरा दिखाकर पाकिस्तान सारे विश्व में भारत-विरोधी हवा फैलाना चाहता है। युद्ध के खतरे को भुनाने का एक तीसरा दांव भी है। वह यह कि यदि हमें भारत से लड़ना पड़ा तो अफगान-सीमांत पर डटी हमारी फौजों को भारतीय सीमांत पर तैनात करना होगा याने पिछले आठ साल से वहाँ अमेरिका की जो सेवा हो रही थी, वह बंद हो जाएगी। इसका कारण भारत की धमकी ही है। इसलिए, हे कृपानिधान, बुश महोदय, भारत को धमकाइए। हमारे खातिर नहीं, अमेरिका की खातिर धमकाइए !
पाकिस्तान की यह चाल सफल हुए बिना नहीं रहेगी। पाकिस्तानी नेताओं को यह पता है कि हिंदुस्तानी नेता कितने पानी में हैं। अमेरिका को नाराज करने की हिम्मत भारत के नेताओं में नहीं है। अमेरिका किसी भी क़ीमत पर भारत-पाक युद्ध नहीं चाहता है। भारत जब-जब भारी पड़ा, अमेरिका ने पाकिस्तान को टेका लगाया है। अब भी अमेरिका चाहेगा कि सिर्फ गीदड़भभकियों से काम चल जाए। अब मुंबई-हमले को एक माह हो रहा है, कौनसी धमकी काम आ रही है ? इस बीच अमेरिकी सेनापति मुलेन दो बार पाकिस्तान हो आए हैं। उनकी कौन सुन रहा है ? ओबामा, बुश, राइस - सबकी गुहार चिकने घड़े पर से फिसलती जा रही है। पाकिस्तान की सरकार ने सुरक्षा परिषद् को भी चकमा दे दिया है। आतंकवादी अड्डों को खत्म करने और चारों कुख्यात आतंकवादियों को पकड़ने की बजाय वह रोज आँख मिचौनी खेल रही है। जरदारी और गिलानी सारी दुनिया को बेवकूफ बनाने में लगे हुए हैं। दोनों की छवि मसखरों की-सी हो गई है। पाकिस्तानी जनता भी उन पर हँस रही है। वे दोनों भारत से अब भी प्रमाण माँग रहे हैं। उनके अपने अखबारों और चैनलों ने जो प्रमाण जग-जाहिर किए हैं, उन्हें भी वे झुठला रहे हैं। मियाँ नवाज शरीफ तक पल्टी खा गए हैं।
ऐसी स्थिति में भारत क्या करे ? क्या वह पाकिस्तान पर सीधा हमला बोल दे ? यदि भारत सरकार सिर्फ गीदड़भभकियाँ ही देती रही तो हमारे मंत्रियों और नेताओं का घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा। कुछ ही हतों में ऐसे हालात बन जाएँगे कि खाली-पीली बोम मारनेवाले नेताओं को जनता पकड़-पकड़कर मारेगी। नेताओं को यह पता है। इसीलिए वे गरम-नरम, दोनों धाराएँ साथ-साथ चलाते रहते हैं। वे स्वयं काफी दिग्भ्रमित मालूम पड़ते हैं। प्रधानमंत्री एक बात कहते हैं तो विदेश मंत्री दूसरी बात और रक्षा मंत्री तीसरी ! ये सब नेता यह क्यों नहीं कहते कि हमें पाकिस्तान से युद्ध नहीं करना है। हमें सिर्फ आतंकवाद से लड़ना है। पाकिस्तान हमारा साथ दे। भारत और पाकिस्तान, हम दोनों मिलकर आतंकवाद का सफाया करेंगे। वास्तव में प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे एक विशेष दूत पाकिस्तान भेजें, जो वहाँ के सभी प्रमुख नेताओं से मिले और उनके गले यह तर्क उतारे। आज टीवी चैनल ऐसे माध्यम हैं, जिनसे लाखों पाकिस्तानी घरों में सीधे पहुँचा जा सकता है। यदि भारत सरकार सचमुच आतंकवादी अड्डों पर शल्य-क्रिया करना चाहती है तो उसे विश्व जनमत के साथ-साथ पाकिस्तानी जनता और नेताओं को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। यदि पाकिस्तान की सरकार युद्ध का हौवा खड़ा करने में सफल हो गई तो आतंकवादियों के विरूद्ध की जानेवाली शल्य-क्रिया को लकवा लग सकता है और बाद में भारत को कूटनीतिक मात खाने के लिए भी तैयार रहना होगा।
फिलहाल आतंकवादी अड्डों पर शल्य-क्रिया करने के पहले भारत को पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद करना होगा। उससे सारे संबंध तोड़ने होंगे। उसे विश्व-समाज के सामने पाकिस्तानी सरकार और आतंकवादियों की मिलीभगत का भंडाफोड़ करना होगा। पाकिस्तान को आतंकवादी राज्य घोषित करवाना होगा। भारत को पाकिस्तान के विरूद्ध सुरक्षा परिषद से वैसे ही प्रतिबंधों की माँग करनी चाहिए, जैसे कि तालिबानी अफगानिस्तान, सद्दामी एराक और ईरान पर लगाए गए थे। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिका से मिलनेवाले अरबों डॉलरों की आवक जैसे ही बंद हुई, पाकिस्तान की फौज और सरकार, दोनों के होश फाख्ता हो जाएँगे। पाकिस्तान की बेकसूर जनता को कुछ तक्लीफ़ तो भुगतनी होगी लेकिन उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। निकम्मे नेताओं और निरंकुश फौज को अपनी छाती पर बिठाने का कुछ खामियाजा तो उसे भुगतना ही होगा।
पिछले एक माह का सबक यह है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। भारत की क्या, अमेरिकियों की बातों का भी कोई असर नहीं हो रहा है। यह भी ठीक से पता नहीं कि अमेरिकी नेता जो माइक पर बोलते हैं, वही बात क्या वे पाकिस्तानी नेताओं के कान में भी बोलते हैं ? अगर बोलते हैं तो उसका पालन न होने पर वे क्या कर रहे हैं ? अब उन्हें कुछ करने के लिए मजबूर किया जाए। पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद करने के लिए अगर वे तैयार न हों तो भारत अपना वक्त खराब क्यों करे ? भारत शल्य-क्रिया की तैयारी करे, कम से कम तथाकथित आजाद कश्मीर में तो करे ही, जिसे पाकिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र' कहता है। वह न राष्ट्र है, न राज्य है। वह संप्रभु क्षेत्र भी नहीं है। वह अराजक क्षेत्र है। वह आतंकवाद का विराट् अड्डा है।
सुकून और अपनापन शायद इन्सानी जीवन का सबसे अहम पहलू है, तभी तो पाश्चात्य संस्कृति में जीने वाले लोग भारत के गांवों में रम जाते हैं। जब भी त्योहार का मौका होता है, वे किसी गांव में डेरा जमा लेते हैं। वहां मेला लगा हो तो बस, मजा ही आ जाता है। राजस्थान में हर साल होने वाले पुष्कर मेले में ऐसे अनेक विदेशियों से मुलाकात हुई जो बारबार राजस्थान आते हैं उनका रंगढंग भी कुछकुछ भारतीय हो जाता है।
गुलाबी चोंगा, गले में रूद्राक्ष की माला, बांह में बाजूबंद, लंबे बाल, सिर पर कपड़े की टोपी, कंधे पर कंबल और झोली, हाथ में छड़ी, ये बखान हैं एक फ्रांसीसी जीन पॉल का। उस से अंगरेजी में नाम पूछो तो हिन्दी में जवाब मिला, ‘ अंग्रेजी नहीं आती।‘
हिन्दी बोला तो टूटीफूटी अंगरेजी में जवाब दिया, ‘मैं केवल जरमन बोलता हूँ। ‘ बात करने के मूड में भी लगा और मसखरी भी कर रहा था। तीन भाषाओं की खिच़ड़ी में उसने बताया कि वह 1971 से हर साल पुष्कर मेला देखने आता है। यह व्यक्ति 6 महीने भारत और 6 महीने फ्रांस में रहता है। वैसे तो जीन पौल ‘स्पेक्टेकल जवाटा ‘ नामक सर्कस में करतब दिखाता है लेकिन है जरा दार्शनिक मिजाज का। दूर आकाश में आंखें टिका कर बात करता है। शरारती बच्चों को भगाने के लिए जब ‘ ए बाबा चल ‘ की छिड़की दी ‘ तो आसपास ख़ड़े लोग चौंक गए।
जीन पौल ने अपनी झोली से निकाल कर अपने घर की तसबीर दिखाई। वह बस में रहता है। उसे आरामतलबी पसंद नहीं इसलिए गृहस्थी बहुत छोटी बना रखी है। घर में सिर्फ एक मां है। शादी करने का विचार नहीं, वैराग्य ले रखा है। फक्क़ड़ की तरह घूमता रहता है। यह मानना पड़ेगा कि भारत घूमने का अनुभव उसे हम से अधिक है।
जरमनी के वृद्ध शूश्टर दम्पति को हमारे गांव में परिवार जैसा माहौल लगता है। जब लोग उन्हें देखकर मुस्कुराते हैं तो वे अपने शहर को भूल जाते हैं क्योंकि वहां एक दूसरे को देखने की किसी को फुरसत नहीं है। आपुटेका में उनका फार्म हाउस है। उस में कुछ अच्छी नस्ल की गाएं हैं। घोड़े भी हैं लेकिन उन के घोड़े हमारे यहां के घोड़े जैसे नहीं हैं, इसलिए शूश्टर दम्पति हमारे घोड़ों को ललचाई नजरों से देखते रहे। उन्हें अफसोस था कि वे खरीद कर नहीं ले जा सकते।
शूश्टर महोदय को राजस्थानी वेशभूषा में सजी औरतें बहुत पसंद आईं। राजस्थानी ल़ड़कियों द्वारा फूलमालाओं से स्वागत की परंपरा भी उन्हें अच्छी लगी लेकिन वह भिखारियों को देख कर दुखी थे। उन के यहां भिखारी नहीं हैं। अमीरगरीब का जो अंतर हमारे यहां बहुत गहरा है, उन के यहां नहीं है। इसलिए हर मौके का आनंद शूटर दम्पति मिलकर लेते हैं।
डेनमार्क का जैकब बासवे अब विश्वविधालय में प्रवेश लेगा। उस से पहले भारत घूमने का सपना पूरा करना चाहता था, मौका निकाल कर आ गया। जैकब मिलटरी सर्विस में सिविल डिफेंस यानी अग्निशमन और बचाव दल का कर्मचारी है. वह अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालता है। उस के दोस्त भी ऐसा ही करते हैं। डेनमार्क से भारत आनेजाने का किराया 25 हजार रुपया भरना उसे मंहगा लगा लेकिन यहां रहना बहुत सस्ता लगा। डेनमार्क से इसकी कोई तुलना नहीं हो सकती।
जैकब की महिला दोस्त जूली सिमोनसेन ने भी अभी स्कूल की पढ़ाई पूरी की है। अब तक उस की दिनचर्या थी, सुबह 6 बजे उठना, तैयार होना, स्कूल जाना, वापस आ कर होमवर्क पूरा करना और फिर सो जाना। इस के साथ उस ने घुड़सवारी सीखी। अब यूनिवर्सिटी की पढ़ाई करेगी लेकिन नौकरी के साथ।
जूली घुड़सवारी की शिक्षिका है। हां, उस के पास अपना कोई घोड़ा नहीं है। जूली और जैकब ने बताया कि उन के यहां भी पशु मेला लगता है और लोग टेंट लगा कर रहते हैं लेकिन यह मेला बहुत छोटा है। यहां दूसरे लोग नहीं आते।
भारतीय संस्कृति में घुल कर जूली बहुत खुश थी। माथे पर लगी बिंदी दिखा कर उस ने बताया कि किसी महिला ने लगा दी है। लोगों के घूरने के कारण वह थोड़ा परेशान थी। जैकब का कहना था कि उन के यहां के लोग संकोची स्वभाव के होते हैं। जल्दी किसी से आमना-सामना नहीं करते। शादी के बारे में पूछने पर जूली ने कहा कि इतनी जल्दी सोच ही नहीं सकती। जब करनी होगी तब ल़ड़का देखेंगे। जैकब उस का दोस्त है और वहां दोस्तों के साथ रहने और घूमने पर कोई सामाजिक आपत्ति नहीं है।
भारत घूमने की शौकीन मीप एबलिंग हालैंड से महीने भर पहले आई थी। उस ने दिल्ली, जयपुर, जैसलमेर, जोधपुर, उदयपुर और फिर पुष्कर में पड़ाव डाला। पुष्कर आने का उस का कोई कार्यक्रम नहीं था। कुछ लोगों से सुना तो खुद को रोक नहीं सकी। गले में पारंपरिक राजस्थानी हार पहनकर इठलाती हुई मीप ने कहा कि उसके यहां अगस्त में ‘सैंड,पूल,सी फेस्टिव वीक ‘ उत्सव होता है। उस में भी वह खूब आनंद लेती है। खेल प्रतियोगिताएं, ऊंची कूद, बाधा दौड़, रिंग में भाला फेंकने जैसे खेल देखने में उसे मजा आता है। यध्यपि उस के यहां का मेला भी ग्रामीण मेला है पर लोगों की पोशाक फीकी होती है, राजस्थान की तरह रंगबिरंगी नहीं।
ऊंटगाड़ी पर घूम कर एनीमैकी एबलिंग बहुत खुश थी। उस के चेहरे पर बच्चों की सी चंचलता थी। आते ही उस ने मीप के गले में हाथ डाला और मुझ से ‘ हैलो ‘ किया। मीप ने बताया कि एनी ‘ वीकेंडिन ‘ पत्रिका की फोटो एडिटर है। ‘वीकेंडिन‘ का अर्थ है, ‘दोस्ती के लिए आगे बढ़ो।‘ एनी का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही था। पशु मेला, डांस, गाने, कोलाहल और उल्लास में वह खुद को भूल चुकी थी। 5 पैर वाले बछ़ड़े की तस्बीर खींच कर वह इतनी खुश थी जैसे कोई नायाब चीज मिल गई हो।
मेले का खानापीना भी उसे पसंद आया। हालैंड में उस का प्रिय भोजन है ‘स्टैंपीड‘ यानी उबले आलू में प्याज, गाजर और कई सब्जियों का मिश्रण और साथ में चटनी। उसे विश्वास है कि भारत के लोग इस भोजन को पसंद नहीं करेंगे। यहां मसाले बिना खाना पूरा नहीं होता।
एनी ने मेला घूमघूम कर हर चीज देखी। इतना बड़ा मेला, इतने सारे लोग, इतने बड़ेबड़े घर, सबकुछ उस के लिए आश्चर्यजनक था। उस के यहां छोटे घर, एकल परिवार और औपचारिक जिन्दगी है। यहां आकर उसे पहली बार खुल कर जीने का एहसास हुआ है। वह कुछ और बताती इस से पहले घुड़सवारी के लिए भाग निकली।
अकेली एनी नहीं बल्कि उस के जैसे हर पर्यटक के मन में उमंग थी। सभी मेले की भीड़ में खोने को उतावले थे। पता नहीं दोबारा मौका मिले न मिले।
कुछ नासमझ भारत को नेता प्रधान देश बताते हैं, कुछ कृषि प्रधान, कुछ का खयाल है कि हिन्दुस्तान नोट प्रधान देश है तो कुछ के हिसाब से कोर्ट प्रधान। कई भ्रष्ट महानुभाव अपने वतन को को करप्शन प्रधान मानते हैं तो कई स्वामी और साधू प्रधान। देश के प्रमुख विचारक आताताई ने इस बारे में गंभीरता से विचार किया है। ऐसे विद्वान हर विषय पर चाहे वह मच्छर के महत्व का हो या फिर कविता की कूड़ा विध्या का, गंभीरता से ही विचार करता है।
हर विद्वान की विचार करने की अपनी अनूठी मुद्रा है, कुछ आंख मींच कर विचार करते हैं तो कई अपने या दूसरे के बाल खींच कर। विद्वान शौच में हो या सोच में, पहले विचारकरता है फिर गंभीर हो जाता है। यह उसकी आदत है। गांभीर्य उसका गौरव है। वह दाढ़ी खुजला कर विचार करे या साड़ी सहला कर, हर हाल में विद्वान सिर्फ विचार करता है।
गंभीर विचार के बाद आतातायी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि भारत अंगूठा प्रधान देश है और हम उससे सहमत हैं, जो नहीं हैं वे पहले अपना विचारक लाएं, उसका नजरिया पेश करें। वैचारिक भिन्नता प्रजातंत्र का प्रमुख लक्षण है।
आखिर भारत अंगूठा प्रधान देश क्यों है? आतातायी ने पूरे देश में सर्वे कर पाया हैकि मुल्क के हर आदमी, औरत, पच्चे और हिजड़े के हाथ में अंगूठा है। जब अंगूठा हर इंसान यहां तक कि नेता तक के हात में मौजूद है तो स्पष्ट है कि भारत एक अंगूठा प्रधान देश है। इस मुल्क में जनता और सत्ता की, यानी आम आदमी और नेता, अफसर, तस्कर, धनपशु आदि के बीच की खाई दिनोदिन चौड़ी होती जा रही है, पर इन सबके बीच अंगूठे की समानता है। कई सिर्फ अंगूठा छाप हैं, कई अक्षर ज्ञान के बावजूद अंगूठा छाप हैं। एक-दूसरे को ठेंगा दिखाना देश का खास शौक है। अंगूठा लगाना और दिखाना आजाद भारत की प्रमुख गतिविधियों में शामिल है।
महाबारत काल से अंगूठा सुर्खियों में है। राजकीय धनुष प्रशिक्षण केन्द्र के गुरु द्रोणाचार्य थे। युद्धिष्ठिर, अर्जुन, दुर्योधन जैसे कौरव पाण्डव कुंवर, ज्ञानअर्जन और युद्धविध्या सीखने वहीं पधारे थे। आज के पब्लिक स्कूलों की तरह कुछ निर्धन पर कुशल और प्रतिभावान छात्रों को फ्री शिक्षा देकर अपना अपराधबोध मिटाने का प्रचलन तब बी था। इन वजीफा पाने वालों में एक एकलव्य भी थे।
बड़े लोगों द्वारा चमचे रखना भारतीय जीवन शैली की ल पहचान है। दुलहन वही जो पिया मन भाए और बड़ा वही जो चमचे को आगे बढ़ाए, अर्जुन गुरु के प्रिय शिष्य भी थे और धनुष बाण का निशाना भी साध लेते थे पर एकलव्य के बीस के सामने अर्जुन उन्नीस पड़ते। गुरु ने सोचा-विचारा-अर्जुन को अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी कैसे बनाएं, द्रोण गुरु दृढ़निश्चयी थे, जो तय किया कर दिखाया।
तब के चेलों में गुरु दक्षिणा देने का रिवाज था। आज भी है। आधुनिक क्षात्र अकसर अपने गुरुघंटालों को लालजूते व गाली जैसे तोहफे इनायत करते हैं। सीधेसादे एकलव्य अनुभवी और चालाक गुरु के जाल में फंस गए।
एकलव्य ने श्रद्धा आदर से नत हो कर द्रोण से निवेदन किया, ”गुरुदेव आपकी सेवा में क्या भेंट अर्पित करें?“
गुरुदेव ने मौका ताड़ा और एकलव्य से अंगूठे की फरमाइश कर दी। सच्चे और आज्ञाकारी शिष्य की तरह एकलव्य ने आव देखा न ताव और अपने दाहिने हाथ के अंगूठे की बलि चढ़ा दी।
इस प्रकार अर्जुन का असली प्रतिद्वंदी एकलव्य टापता रहा और वह धनुष चलाने का शिखर पुरस्कार पा गए।
इससे यह भी जाहिर होता है कि प्रतियोगिता का कोई भी पुरस्कार कांट-छांट से मुक्त नहीं। परीक्षा में नंबर, साहित्य में नाम और सरकार में इसी उसूल के तहत लोग नामा काटते हैं।
हमारे देश का दुर्भाग्य है कि देश के पहले पिछ़ड़े शहीद की याद में न कोई पार्क बना है न कोई निशाना अकादमी और ना ही उस त्यागी की कहीं स्टैचू लगी है।माया बहन ने कुछ नहीं किया तो मुलायम भाई ही कुछ करें? ऐसे अन्यायी गुरु की साजिश के भांडाफोड़ का केस लोकल पुलिस या सी.बी. आई को तो सौंपा ही जा सकता है। हमें यकीन है कि पुलिस द्रोणाचार्य को बख्शेगी नहीं। जमीन-आसमान के कुलाबे मिला कर चार्जशीट दाखिल करेगी और किसी न किसी द्रोमाचार्य को तो जेल भिजवा ही देगी।
इस से यह भी साबित होता है कि पिछ़ड़ों का उत्पीड़न और शोषण महाभारत काल से चालू है और आज भी जारी है। उन के अपने भाई-बन्धु, उनके वोट और सपोर्ट से कुरसी पाते हैं और फिर खुद के बंगले और बगीचे बनवाते हैं। उन का अंगूठा तो काटते ही हैं, होने के नाते नका पेट भी नहीं छोड़ते। उन्हें दिलासा देते हैं, भैया, रोजीरोटी तो मुश्किल है, हम ने तुम्हारा आत्मसम्मान तुम्हें सौंपने के लिए ही यह शानदार पार्क बनवाए हैं। अगर पेट न भरे तो यह कोमल मुलायम घास क्यों नहीं ट्राई करते, इसमें क्लोरोफिल भी है। कतई हरयाले कबाब का मजा आएगा।
यों योग्यता के एकलव्य की नियति ही अंगूठा गंवाने की है। भारत एक परंपरावादी देश है। महाभारत युग में द्रोण ने तिक़म से काबिल चेले का हक मारा। हम ने तरक्की की है। हमारी सरकार ऐसे फुजूल के कैक्टस को पनपने ही नहीं देती है। जहां किसी के प्रतिभावान या ईमानदार होने का शक भी हुआ उस की शल्य चिकित्सा की तैयारी शुरू हो जाती है। अर्थशास्त्री ग्रेशम का सिद्धान्त है कि खोटे सिक्के खरों को बाजार से बाहर खदेड़ देते हैं। यह सियासत समाज और प्रसासन पर भी समान रूप से लागू है।
मंहगाई के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था समान रूप से लागू है। मंहगाई के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वस्तर की है। अगर यही प्रगति चलती रही तो सरकार भूखे नागरिकों को सलाह देगी।
“ प्यारे देशवासियों, हम ने तुम्हारे लिए सस्ता राशन उपलब्ध कराया है। अगर तुम्हें उस से भी परहेज है तो भगवान का दिया अंगूठा चूसो। चूसते-चूसते अंगूठा घिसे तो हमारे पास आना, या तो हम तुम्हें राशन देंगे नहीं तो सिंगट्टा दिखा देंगे।“
सरकार के कोरे आश्वासनों से भी सिद्ध होता है कि भारत एक अंगूठा प्रधान देश है। इन सब का नतीजा सिर्प ठेंगा है।
गांव में एक महा कंजूस व्यक्ति रहता था। जो अनेक कष्ट तो सह लेता, परन्तु पैसे नहीं खरचता। उसने कई बरस पहले एक घी का डब्बा खरीदा जिसे वह रोज सुबह-शाम सूँघकर ही अपनी तृप्ति कर लेता। खतम हो जाने के डर से उसमें से न तो खुद ही कभी कुछ खाता और ना ही दूसरों को ही कभी खिलाता। एक दिन सुबह-सुबह जब अन्य दिनों की भांति वह अपना घी सूंघ रहा था एक मक्खी कहीं से आई और घी में गिर प़ड़ी। अब तो कंजूस आग-बबूला हो उठा। ‘ तुम सोचती हो तुम इस तरह से मेरा यह घी पी पाओगी ?‘, कहकर उसने मक्खी को बाहर निकाला और अच्छी तरह से चूस डाला ताकि वह अपना घी वापस ले सके।
बच्चों अब तो तुम समझ ही गए होगे कि बेहद कंजूस आदमी को मक्खीचूस कहने का प्रचलन कैसे और कबसे चला था।
असली घी की ताकत
रामू को शहर में अच्छी नौकरी मिल गई। गांव जाते समय मां ने बेटे को असली घी के लड्डू, मठरी बनाकर दिए ताकि बेटे को देर-सबेर भूख लगे तो खा सके। जैसे-तैसे भीड़भरे रेल के डब्बे में च़ढ़ने के बाद उसने मां की दी हुई वह भारी पोटली पास लटकी जंजीर पर लटका दी। पर यह क्या -अगले पल ही ट्रेन रुक गई और चारो तरफ शोर मच गया कि ‘ अरे-अरे , इस पोटली को उतारो इसने तो हमारी ट्रेन ही रोक दी है।‘ अब रामू के विस्मित होने की बारी थी-असली घी में ताकत होती है, यह तो उसे पता था परन्तु इतनी ताकत होती है कि लाखों लोगों से भरी ट्रेन तक को भी रोक पाए, यह उसे उसी दिन पता चल पाया था।