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                                                    सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर




                                                               


                                                 


                                                  

                                                   अनेकों में एकः इन्द्रधनुषी भारत  


                                                     (लोक संस्कृति विशेषांक)


                                         " कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर


                                                    ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।"


                                                                       -संत कबीर  


                                                          अंक-22 -दिसंबर-2008


 इस अंक में--माह विशेषः संत कबीर के गीत। कविता धरोहरः बाबा नागार्जुन। कविता आज और अभीः निखिल कौशिक, असंग घोष, मोहन राणा, तितिक्षा शाह । माह के कविः दिविक रमेश । लोकप्रिय बाल कथा व बाल कविता ।मंथनः डॉ. पदम चन्द्र काश्यप । कहानीः अजय नावरिया। धारावाहिकःशेषअशेष। लघुकथाःरामनिवास मानव। परिचर्चाःप्रवीण प्रभाकर। स्मृति शेषः दिनेश ध्यानी। बंगाल के लोकगीतः रामचन्द्र राय । लोककाव्य बिरहाः चन्द्रदेव यादव।  लोकनाट्य यात्राः रामचन्द्र राय।  हास्य व्यंग्यः नरेन्द्र कोहली। चांद परियां तितलीः बाल गीत व लोककथा और विचारोत्तेजक विविधा।


In the English section: Chronological History of India: Neeraj Mohanka. Favourites Forever: Rumi, Poetry here & now: Milorad Krystanovich, Story: George Orwell, Two Short Stories : Ram Sharma, From the Scriptures- A Tale of Purana. kids corner: Hans Christian anderson .  


                                                            संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल                            
                                           संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 


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                                                                                                                                                                 अपनी बात


 विविध संस्कृति, खान-पान और रंगबिरंगी वेशभूषा की इन्द्रधनुषी छटा के कारण सदैव से ही  भारत विश्व के लिए चुम्बकीय आकर्षण लिए हुए है। काश्मीर से कन्याकुमारी तक हर चार कोस पर पानी और बानी बदलने वाले इस देश की वेशभूषा और संस्कृति बहुरंगी व बहुआयामी तो रही है, पर सोच और संस्कारों की एक सशक्त कड़ी सदैव से ही इसे आपस में जोड़े ही नहीं, सहोदर भाव को काफी हद तक बनाए रखने में भी सफल रही है। आज जो ये कर्णकटु और विरोधी और उकसाने वाली विध्वंसक और तकलीफ देह आवाजें  आए दिन  ही चारो तरफ से उठने लगी हैं  और जिनका असर पूरे ही विश्व पर पड़ रहा है , हमें एक भय और अविश्वास की संस्कृति की तरफ धकेल रही हैं,  हमारे संस्कार और मानवता में विश्वास ... शांति व एक सुचारु व्यवस्था को डांवाडोल कर रही हैं, इनसे लड़ने के लिए, इनके निर्मूलन के लिए एक बार फिर हमें अपने उन्ही सनातन मूल्यों की तरफ ही मुड़ना होगा , जो प्यार और भाईचारे की बातें समझाते हैं, समस्त विश्व को कुनबे की तरह  मानाते है और जहां लड़ाई  बुराई से होती  है, अधर्म से होती है....व्यक्ति, समूह, जाति या देश से नहीं...मासूम और परिस्थितियों के मारों या निर्बल या असहायों से नहीं।  जैसे शक्ति और समझ भी भगवान की तरह हमारे अपने अंदर ही होती है वैसे ही समस्याओं के हल भी। इनके लिए भी इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं। कबीर जैसा समाजसुधारक और समदृष्टि आजभी  एक सफल जीने की प्रणाली के बारे में बहुत कुछ समझा सकता है;  


 ''ज्यों नैनों में पुतली त्यों मालिक घट माहिं 
  मूरख लोग न जानहिं बाहिर ढूंढन जाहिं'' ,


वैसे भी हम डरते किससे हैं,  हमसे मिलकर ही तो देश बनता है। हमारे बीच से ही  तो राम और रावण उगते हैं।   खुद ही तो हम अपने भाग्य विधाता और निर्माता...दोस्त या दुश्मन हैं। टैगोर ने भी तो यही कहा था कभी-जन गण मन अधिनायक भारत भाग्य विधाता। हमें भूलना नहीं चाहिए कि पंजाब सिंधु गुजरात मराठा द्राविड उत्कल बंगा । विंद्य, हिमाचल, यमुना गंगा और उत्कल जलधि तरंगा, इन सभी से मिलकर भारत बना है और यही  भारत है। आज जब यही विविधता में एकता का देश व्यापार और विज्ञान में भी तरक्की कर रहा है, तो निश्चय ही अपनी सूझबूझ और शांति व सौहाद्र भरी समझ के साथ परिधि से निकल कर विश्व पटल पर भी केन्द्र में आएगा ही और केन्द्र में आने का अर्थ सिर्फ प्रशंशा या आंखों के आगे आ जाना ही नहीं होता, परिधि के दायरे भी तो केन्द्र ही संभालता आया है हमेशा से। क्या हम अपनी यह  भूमिका... जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं...निभा पाएंगे? यदि आज का जटिल जीवन एक संग्राम बन चुका है तो शांति और व्यवस्था में विश्वास करने वाले संसार के हर व्यक्ति को आपस में जुड़ना ही होगा। विश्व बंधुत्व और एक नई मानवीय संस्कृति की जितनी मांग आज के कठिन समाज में है, शायद ही कभी और रही हो।     


आज जब यह विश्व बन्धुत्व का सपना  कम से कम खान-पान और रहन-सहन में ही सही, खूब जोरशोर से असर करता  नजर आ रहा है तो अक्सर ही चिंतित या असंतुष्ट आवाजें भी सुनाई देने लगी हैं कि कहीं यह अजगर की तरह फैलती पाश्चात्य संस्कृति हमारी संस्कृति और हमारे संस्कारों को तो नहीं निगल  जाएगी। पर क्या खून में रची-बसी आदतों को आसानी से भूला जा सकता है? फिर क्या है यह संस्कृति, किस चीज को लेकर परेशान हैं हम इतने ....क्या यह बस परम्परागत विधि-विधानों की अवहेलना और परिधानों का परिवर्तन ही है, जो हमें परेशान कर रहा है या फिर हम परेशान हैं कि आज  अन्दर का आदमी ही बदल रहा है, उसकी सोच, उसके मानक,  उसकी नीयत और नैतिकता, सब बदल रही है....कल तक जो कुछ समाज में अस्वीकार्य या अनैतिक था, अब मान्य है। ' आदत पड़ जानी चाहिए थी अब तक तो हमें' यदि अगर ऐसा समझ में आने लगा  है' तो  स्थिति वाकई में खराब है। पर हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ चिंता  करके ही क्या होगा?  माना आध्यात्म और दर्शन भूखे पेट और चिंतित दिमाग से समझ पाना आसान नहीं, ना ही भाईचारे व विश्वबन्धुत्व की बड़ी-बड़ी बातें ही। माना, भौतिकी दौड़ के इस युग में बिना लड़खडाए सदाचार की राह पर निरंतर ही चल पाना कठिन है परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम बदल रहे है, या हमारी सोच और संस्कार बदल रहे हैं। वक्त के साथ थोड़ा बहुत सामंजस्य, बिना किसी सिद्धांत या संस्कार की बलि चढ़ाए, गलत नहीं। हां, जो भी अस्वीकार्य या अवांछनीय हमतक आए, उस कूड़े को छाड़ने-बटोरने का प्रयास...  उसके खिलाफ जागरूक रहना, जरूरत पड़े तो निर्मूलन करना  हर  देशप्रेमी का फर्ज है।  वक्त आ गया है जब लड़ाई और वैमनस्य जैसे शब्दों को हमें अपने शब्दकोषों से ही नहीं, मन से भी निकाल देना चाहिए क्योंकि इनसे खून-खराबे की, अन्याय की, दुराचार की महक आती है। समाज को आज ' सुधार'  ' समझ ' और  ' करुणा ' की संस्कृति की जरूरत है। सहित की सोच लेकर चलने वाला साहित्य समाज के बीच में रहकर साथ-साथ चलता है,  न पैरों में बिछता है और, ना ही अभद्र और आक्रामक होता है, तभी सुधारने की सामर्थ रख पाता है और पनपने की भी।


किसी भी देश की संस्कृति का वहां के भूगोल और इतिहास से गहरा संबंध होता  है।  पर्यावरण और परिस्थितियां दोनों ही न सिर्फ रूपरंग बदल सकती हैं अपितु सोच और आदतों को भी। एक गरम और ठंडे देश के रहन-सहन खानपान में भेदभाव स्वाभाविक है जैसे कि एक सुरक्षित व असुरक्षित देश के मान-सम्मान व आत्मविश्वास में..ये उनके रहन-सहन व आचरण सभी को प्रभावित करते हैं।अक्सर ही हम संस्कृति और सभ्यता को एक मानने की भूल कर बैठते हैं, परन्तु संस्कृति हमारे अवचेतन मन में बैठी वे धारणाएं और विश्वास हैं जो हमें अपने दादा-दादी या पुरखों से मिलती हैं, जिन्हें अपने चारो तरफ हवा-पानी से सोखते हम बड़े होते हैं, जब कि सभ्यता किसी समूह विशेष के रहन-सहन का तरीका, बाह्य-आचरण आदि से संबन्धित है।  संस्कृति का संबंध संस्कारों से होता है। यदि समाज की तुलना हम एक फूल से  करें तो सभ्यता उसका रूप-स्वरूप है  और संस्कृति खुशबू। आदमी तो आदमी जानवर तक अपनी खास आदतें पीढ़ी-दर-पीढ़ी लेते-देते रहे हैं। बड़ों का आदर, दया, धर्म और शांति अहिंसा आदि यदि भारतीय संस्कृति के स्तंभ हैं तो हमारा विशिष्ट रहन सहन, कपड़े जेवरात, घर-आंगन, चौबारे आदि  हमारी सभ्यता के। 


अपनी जाति विशेष को बचाकर ऱखने की चाह में, अपनी  संस्कृति और सभ्यता दोनों को ही मानव ने आदिकाल से ही बचाकर रखने का प्रयास किया है। आदिमानवों द्वारा अंकित कन्दराओं में उपलब्ध भित्तिचित्र आदि इसके प्रमाण हैं। इसी परंपरा की एक और मुख्य कड़ी लोक कथाएँ और लोक गीत रहे हैं। आदमी ने जब लिखना पढ़ना भी नहीं सीखा था, उससे भी बहुत पहले से ही गीत गाने और कहानी कहने की परंपरा चली आ रही है। ये कहानियां अक्सर गाकर या मंचित करके भी सुनाई जाती रही हैं। भांति-भांति की लोक कथाएँ व लोक गीत दुनिया के हर देश में सदियों से ही मानव समाज का मनोरंजन करते आए हैं। रामलीला, नौटंकी, आल्हा-ऊदल और उत्तर भारत के कजरी बिरहा आदि व शेक्सपियर के नाटक वगैरह  सभी इन लोककथा और लोक गीतों के विविध  और प्रचलित व व्यापक रूप हैं। ध्यान से देखा और समझा जाए तो ये कथाएँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तो पैदा करती ही हैं, हमें आपस में जोड़ने का, एक दूसरे को समझने और समझाने का काम भी करती हैं।
बंगला के विद्वान् लेखक श्री दिनेशचन्द्र सैन ने इन कथाओं के संबंध में विचार प्रगट करते हुए लिखा है- ‘‘प्राचीन काल से ही अपने देश में कहानी कहने और सुनने की परम्परा रही है और उनका पूरा उपयोग होता रहा है। प्राचीन काल में राज-घरानों में ऐसी महिलाओं को रखा जाता था जिनका काम कथा करना मात्र होता था।‘‘


मशहूर पंचतंत्र की कहानियां ऐसी ही नैतिक कहानियों का संग्रह है जो राजकुमारों को सुधारने और शिक्षित करने के लिए सुनाई गई थीं। भारत में सदा से भावना रही है कि कहानियों या कथाओं को केवल मनोरंजन मात्र का ही साधन  न समझा जाए। प्रयत्न रहा है कि मनोविनोद के साथ-साथ ये कथाएँ चरित्र-सुधार, नैतिक विकास और परामर्श की भावना भी पैदा करें। यही वजह है कि राजा महाराजों के महलों में ही नहीं, गांवों के चौपाल और बैठक-बोहारों तक में ये आम लोगों के मनोरंजन के साथ-साथ  नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का बोध और शिक्षण भी कराती रही हैं...  समाज की बेहद संवेदनशील जरूरत यौन शिक्षा आदि तक  का माध्यम बनी हैं। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में आज भी ऐसे उत्सवों का प्रचलन है जहाँ रजस्वला होने पर किशोरियों को उपहार और लोकगीतों के माध्यम से उनके आनेवाले वयस्क जीवन की जिम्मेदारियों का बोध कराया जाता है।


क्योंकि इनके विषय और भाव जन-साधारण के सहज अनुभव और प्रतिक्रियाओं से जुड़े रहे हैं,  इनके वर्णन और संदेश भी जीवन के शाश्वत मूल्यों पर आधारित और सार्वभौमिक ही रहे  हैं और शब्दावली भी सहज व ग्राह्य। भारत में तो करीब-करीब हर अवसर के लिए लोक गीतों का प्रचलन रहा है। कहीं आम मनोरंजन के लिए युवा प्रेमियों के मिलन-विछोह की बात है तो कहीं जनजीवन के ताने-बाने में बुने विभिन्न पर्व जैसे जन्म, मृत्यु और विवाह आदि उत्सवों का उल्लास और अवसाद समेटे हुए हैं ये गीत और गाथाएँ। इन कथाओं की लोकप्रियता की एक और वजह यह भी है कि इन कथाओं की शैली सदा से ही अत्यंत ही आकर्षक और मोहक रही है कहीं जानवर और पशु-पक्षियों के सहारे तो कहीं देवी-देवता, दुष्ट राक्षस, परी, जादूगर आदि पात्रों के सहारे रूपक बनाए गए हैं, या फिर सीधे परमात्मा को ही प्रेमी बनाकर अपनी बात कही गई है जैसा कि सूफियों और बंगाल के भिक्षुगीतों में हमें देखने को मिलता है। कहीं-कहीं तो बिल्कुल ही सीधे सच्चे रूप में बिना किसी रूपक के सहारे ही बात कह दी गई है। संत कबीर और गुरु नानक की बोलियां आज भी वैसी ही प्रचलित हैं जैसे कि तब रही होंगी जब वे लिखी गई होंगी।  



विदेशी विद्वान् श्री मिल्ड्रेड आर्चन ने एक स्थान पर संथाल की लोककथाओं के संबंध में अपने विचार इस प्रकार प्रगट किये: “ इन लोक-कथाओं में जिन आवश्यकताओं की पूर्ति होती है वे महत्त्वपूर्ण हैं जो कालान्तर में उपयोगी सिद्ध होने वाली हैं। इनके द्वारा गरीबी, बीमारी और दैनिक चिन्ताओं को काफी राहत मिलती है। जन-जातियों का परिचय देती हैं, उनके रीति-रिवाजों के महत्त्व पर भी प्रकाश डालती हैं। ये कथाएं केवल मनोरंजन करने तक ही सीमित नहीं रहती हैं अपितु जन मानस में आत्म-विश्वास की भावना जागृत करती हैं, उनमें शक्ति प्रदान करती हैं और जीवन में संघर्ष, और आपदाओं में स्थिर रहने की शक्ति को भी जन्म देती हैं।“
इन कथाओं में तत्कलीन मानव ने अपने-अपने समाज और जनजीवन के  मनभावन चित्र उकेरे हैं। जीवन के हर पहलू का वर्णन मिलता है हमें इन लोकगीत और लोकथाओं में, चाहे वह प्रकृति वर्णन हो या शौर्य गाथाएं। बंगाल के बाउल और भटियारी गीत हों या पंजाब के टप्पे। भक्तिभाव में डूबे प्रेमगीत हों या ईर्षा और प्रतिघात से भरी  राजा महाराजा और सेठ साहूकारों की षडयंत्र भरी कहानियां। इन कथाओं को सुनकर लोग नीति और शिक्षा तो लेते ही थे, दैनिक थकान और संताप भी भूल जाया करते थे।


यू.पी. बिहार और  कई उन्य आंचलिक लोकगीतों को बालीवुड की  फिल्मों में भी लिया गया है जिससे कि उनकी ग्रामीण गमक शहरी वातावरण में भी फैली है। आज संचार साधनों के अभूतपूर्व विकास के कारण दुनिया सिमट कर बहुत छोटी हो गई है और विभिन्न संस्कृतियों और उनकी छवियों को सक्षात, सिर्फ एक बटन या क्लिक के सहारे कोई भी, कभी भी और कहीं भी देख सकता है। ऐसे में इन शब्दचित्रों की चमक का धूमिल हो जाना स्वाभाविक ही है परन्तु इनकी सहज पुलक की सामर्थ को... उपयोगिता को, इस महक को नकारना आज भी संभव नहीं। आधुनिक य़ांत्रिक युग से पहले तो ग्रामीण जन-जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं ये गीतों और बोलियों की परम्पराएं और आज भी जन साधारण का जीवन इनसे अछूता नहीं है। जन-जीवन के हर पहलू और उत्सव के लिए हमारे यहां गीतों का प्रचलन है और बन्ने, बन्नी, सोहर व सुहागगीत ढोलक की थाप पर सुनने को आज भी हमें बखूबी मिल ही जाते हैं। 


लोकगीत  और लोक कथाओं के हर पहलू को एक ही अंक में समेटना और सहेज पाना संभव नहीं,  लेखनी का यह अंक इनके माध्यम से  लोक संस्कृति को समझने के एक लघु प्रयास से शुरू हुआ था परन्तु हाल ही में हुई दर्दनाक और भयावह घटनाओं से  इसमें  लोककल्याण के हित की प्रार्थनाओं के सुर भी स्वतः ही आ मिले हैं । कहते हैं सामूहिक प्रार्थनाओं का असर बहुत अधिक होता है। मिलकर प्रार्थना करते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी  विवेक और सहृदयता साथ रहे... माफ करने की शक्ति बनी रहे...आँख के बदले आँख वाली नीति अपनाकर तो सभी अंधे हो जाएँगे।   


                                                                                                                                       शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                             माह विशेष





                                                                                                                                   

                                                                                                                                गीत-कबीर






मेरी चुनरी में परिगयो दाग पिया।

पांच तत की बनी चुनरिया

सोरह सौ बैद लाग किया।

यह चुनरी मेरे मैके ते आयी

ससुरे में मनवा खोय दिया।

मल मल धोये दाग न छूटे

ग्यान का साबुन लाये पिया।

कहत कबीर दाग तब छुटि है

जब साहब अपनाय लिया।  












अंखियां तो छाई परी

पंथ निहारि निहारि 

जीहड़ियां छाला परया

नाम पुकारि पुकारि

बिरह कमन्डल कर लिये

बैरागी दो नैन

मांगे दरस मधुकरी

छकै रहै दिन रैन

सब रंग तांति रबाब तन

बिरह बजावै नित

और न कोइ सुनि सकै

कै सांई के चित 

 

 









माया महा ठगनी हम जानी।।

तिरगुन फांस लिए कर डोले

बोले मधुरे बानी।।

 

केसव के कमला वे बैठी

शिव के भवन भवानी।।

पंडा के मूरत वे बैठीं

तीरथ में भई पानी।।

 

योगी के योगन वे बैठी

राजा के घर रानी।।

काहू के हीरा वे बैठी

काहू के कौड़ी कानी।।

 

भगतन की भगतिन वे बैठी

बृह्मा के बृह्माणी।।

कहे कबीर सुनो भई साधो

यह सब अकथ कहानी।।

 







 

सुपने में सांइ मिले

सोवत लिया लगाए

आंख न खोलूं डरपता

मत सपना है जाए

सांइ मेरा बहुत गुण

लिखे जो हृदय माहिं

पियूं न पाणी डरपता

मत वे धोय जाहिं

नैना भीतर आव तू

नैन झांप तोहे लेउं

न मैं देखूं और को

न तेही देखण देउं 

 




नैना अंतर आव तू

ज्यौ हौं नैन झंपेउं

ना हौं देखूं और कूँ

ना तुम देखण देउं

कबीर रेख सिंदूर की

काजर दिया न जाइ

नैनू रमैया रमि रह्या

दूजा कहॉ समाइ 

मन परतीत न प्रेम रस

ना इत तन में ढंग

क्या जानै उस पीवसू

कैसे रहसी रंग 

 
अंखियां तो छाई परी

पंथ निहारि निहारि 

जीहड़ियां छाला परया

नाम पुकारि पुकारि

बिरह कमन्डल कर लिये

बैरागी दो नैन

मांगे दरस मधुकरी

छकै रहै दिन रैन

सब रंग तांति रबाब तन

बिरह बजावै नित

और न कोइ सुनि सकै

कै सांई के चित 





 

 




मोको कहां ढूढे रे बन्दे
मैं तो तेरे पास में
ना तीरथ मे ना मूरत में
ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में
ना काबे कैलास में
मैं तो तेरे पास में बन्दे
मैं तो तेरे पास में
ना मैं जप में ना मैं तप में
ना मैं बरत उपास में
ना मैं किरिया करम में रहता
नहिं जोग सन्यास में
नहिं प्राण में नहिं पिंड में
ना ब्रह्याण्ड आकाश में
ना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में
नहिं स्वांसों की स्वांस में
खोजि होए तुरत मिल जाउं
इक पल की तालास में
कहत कबीर सुनो भई साधो
मैं तो हूं विश्वास में








   



अवधूता युगन युगन हम योगी
आवै ना जाय मिटै ना कबहूं
सबद अनाहत भोगी
सभी ठौर जमात हमरी
सब ही ठौर पर मेला
हम सब माय  सब है हम माय
हम है बहुरी अकेला
हम ही सिद्ध  समाधि हम ही
हम मौनी हम बोले
रूप सरूप अरूप दिखा के
हम ही हम तो खेलें
कहे कबीर जो सुनो भाई साधो
ना हीं न कोई इच्छा
अपनी मढ़ी में आप मैं डोलूं
खेलूं सहज स्वेच्छा










कौन ठगवा नगरिया लूटल हो 
चंदन काठ के बनल खटोला
तापर दुलहिन सूतल हो
उठो सखी री मांग संवारौ
दुलहा मोसे रूठल हो
आये जमंराजा पलंग चढि बैठा
नैनन अंसुवां टूटल हो
चार जने मिल खाट उठाइन
चहुं दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जगसे नाता छूटल हो  











साधो ये मुरदों का गांव

पीर मरे पैगम्बर मरिहैं

मरि हैं जिन्दा जोगी

राजा मरिहैं परजा मरिहै

मरिहैं बैद और रोगी

चंदा मरिहै सूरज मरिहै

मरिहैं धरणि आकासा

चौदां भुवन के चौधरी मरिहैं

इन्हूं की का आसा

नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं

मरि हैं सहज अठ्ठासी

तैंतीस कोट देवता मरि हैं

बड़ी काल की बाजी

नाम अनाम अनंत रहत है

दूजा तत्व न होइ

कहत कबीर सुनो भाई साधो

भटक मरो ना कोइ।.

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                                                                                                                                              कविता आज और अभी



सारा समय










सारा समय


मैं मौन रहा


देखता रहा एक स्वप्न





एक स्वप्न कि आंदोलन होगा


पेरिस में


दिल्ली में


लंदन में


सिडनी में


त्रिपोली में


बगदाद में


और न्यूयौर्क में भी





होगी तब एक ऐसी श्रटि


जिसमें सब बंजारे होंगे


तब मैं बनाऊंगा


एक मंदिर


जिसमें स्थापित होगी हिन्दी





वहां होगी एक झील


जिसमें तैरेंगे केवल सच


सच जो परछाईं बन


साथ रहेंगे हर पल


चलेंगे उस गांव तक


जहां सब सपने साकार होंगे





कोई भी मुसाफिर


रौशनी एकत्रित कर सकेगा


और गुमनाम हो जाएंगी


आहटें


ऐसे होगी शुभ प्रभात





हुई भी प्रभात


परन्तु तब तक


सारा समय


जो मेरा था बीत गया


और मैं केवल


एक स्वप्न देखकर ही बस रह गया।


                             निखिल कौशिक  (वेल्स, यू.के.)











ओ पृथ्वी ! 








तुम झुकी रहो ओ पृथ्वी !


अपने अक्षांश पर


कहीं सीधी हो गईं तो प्रलय मच जाएगा


तुम्हें पूजना बन्द कर देंगे, ये


तुम्हारी प्रशंसा में रचे मंत्रों का


उच्चार बंद हो जाएगा


तुम बनी रहो यथावत् वरना


जड़ से समाप्त हो जाएगा जातिगत अहंकार


बिना पूजे पत्थर की तरह कहीं भी पड़ी रहोगी


इसलिए कूबड़ निकाले झुकी रहो


शीधी हो गईं तो


शेषनाग के फन से गिर पड़ोगी


यदि है,


तो फुफकार मार


काटने दौडेगा शेषनाग


उनके इसारे पर





हम मारे जाएंगे शंबूक के मानिंद


क्योंकि हम नहीं मानते


तुम किसी ऐरा-गैरा के फन पर टिकी हो


हमारे लिए तुम झुकी रहो


उनको गाने दो प्रशंसा के गीत


भयभीत हो मंत्रोच्चार करने दो


बस इसी तरह झुकी रहो।


                              असंग घोष, जबलपुर भारत











कुंआ








कोई आवाज नहीं


कोई विचार नहीं


कोई भाव नहीं


दिन होते ही ओढ़ लेता हूं कपड़े


क्या  जीवित पुतला ही नहीं बस


अपनी छाया से भागता अकारण





पलक झपकाता


बाजुओं को हिलाता


एकाएक दौड़ने लगता जैसे याद आया कुछ


छूट गया कुछ


देर हो गई


या भूल गया कुछ ऐसे ही विचार में





कुछ बोलता


कुछ सुनता


समय के पदचाप


धूप के लिए खोलता दरवाजा


बारिश के लिए खिड़की


रोता नहीं दुनिया में अन्याय पर


नहीं आता गुस्सा मुझे झूठ पर


यह भी तो सच है


और क्या मुखौटा ही नहीं मैं उसका !


अपने ही झूठ पर विश्वास नहीं होता मुझे





लोग डेलते मेरे भीतर अपना प्रेम


भेजते संदेश गिरा देते अपनी गठरियों का बोझ


पर कुछ नहीं होता


कोई प्रतिध्वनि नहीं


खाली यह खालीपन ही जैसे सब कुछ


बार बार उसे ही जीते


यह दिन फिर यह दिन किसी के लिए भविष्य


मेरे लिए बस एक और दिन


अपने आप को कुरेदता।


                             -मोहन राणा, बाथ, इंगलैंड








रिश्तों का सम्मान 








अपनी मां का


दिया हुआ


वह कुंदन का हार


दिया था मेरी मां ने


मुझे कहते हुए


यह तुम्हारी बहू


के लिए है उपहार





मेरी स्पेनिस बहू ने


आज लौटा दिया


वह कुंदन


कहते हुए


' Its old fashioned,


typically Indian'





मेरी आंखें


उस रोज भी नहीं


भरी थीं


जब बचपन से


मेरे हाथों की


खीर खाने वाले


मेरे बेटे ने


खिसका के


खीर की पियाली


पसंद किया था खाना 


' Frozen custard jelly'





स्पनिश और अंग्रेजी


के मध्य


गेंद की तरह उछलते


मेरे पोते के लिए


धुन भी नहीं हैं


मेरी लोरियां


अर्थहीन हैं


मेरी कहानियां





क्रिसमिस की बत्तियां


और गाएफाक्स के


पटाखों में


खो गए हैं


मेरे दीवाली के दीए


खून से


सींचा था जिन्हें


हो गए पराये


किसलिए





मैंने मुडकर देखा


अपने आंगन की ओर


जहां बोए थे


कभी आम के बीज


वह दे रहे हैं आज


बबूल के फल


असमर्थ रही इन्हें


शायद देने में


अपने गांव की हवा


और


पनघट का जल





कटघरे में खड़ी


अपने ही


आज


करती हूं


स्वयं से संवाद


जंग संस्कृति की


आहुति संस्कार की


न भाषा अपनी


न अपनी जुबान


अब तो


लफ्जों में भी


न रहा


रिश्तों का सम्मान।


           -तितिक्षा शाह , बरमिंघम इंगलैंड

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                                                                                                                                                              कविता-धरोहर





                                                                                                                                                                      

                                                                                                                                                               - नागार्जुन


गेहूं दो, चावल दो।           


इतना दिया है और दो, पुष्कल दो।


गंगा बेकार है, हडसन का जल दो।


चारा दो, फल दो।


हिलेगी कैसे,  दुम में बल दो। 


 




गुलाबी चूड़ियां


प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,

सात साल की बच्ची का पिता तो है!

सामने गियर से उपर

हुक से लटका रक्खी हैं

काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी

बस की रफ़्तार के मुताबिक

हिलती रहती हैं…

झुककर मैंने पूछ लिया

खा गया मानो झटका

अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा

आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब

लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया

टाँगे हुए है कई दिनों से

अपनी अमानत

यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने

मैं भी सोचता हूँ

क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ

किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?

और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा

और मैंने एक नज़र उसे देखा

छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में

तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर

और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर

और मैंने झुककर कहा -

हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ

वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे

वर्ना किसे नहीं भाएँगी?

नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!













अकाल और उसके बाद









कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

 

दाने आए घर के अन्दर बहुत दिनों के बाद

धुँआ उठा आँगन में ऊपर बहुत दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें बहुत दिनों के बाद,

कौए ने खुजलाई पांखें बहुत दिनों के बाद। 





चंदू, मैंने सपना देखा,



 






चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू

चंदू,मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू




मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलंडर

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर

चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो

चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो




चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा

चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा

चंदू मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो

चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो




चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम

चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर

चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर 











बातें









बातें -
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चंदन में बसी हुई
बातें -
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य बंधन में कसी हुईं
बातें -
उसाँस में झुलसीं
रोष की आँच में तली हुईं
बातें -
चुहल में हुलसीं
नेह-साँचे में ढली हुईं
बातें -
विष की फुहार-सी
बातें -
अमृत की धार-सी
बातें -
मौत की काली डोर-सी
बातें -
जीवन की दूधिया हिलोर-सी
बातें -
अचूक वरदान-सी
बातें -
घृणित नाबदान-सी
बातें -
फलप्रसू, सुशोभन, फल-सी
बातें -
अमंगल विष-गर्भ शूल-सी
बातें -
क्य करूँ मैं इनका?
मान लूँ कैसे इन्हें तिनका?
बातें -
यही अपनी पूँजी, यही अपने औज़ार
यही अपने साधन, यही अपने हथियार
बातें -
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
बना लूँ वाहन इन्हें घुटन का, घिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
बातें -
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
स्तुति करूँ रात की, ज़िक्र न करूँ दिन का?
क्या करूँ मैं इनका?  


















आ जा


जल्दी आ जा!


बुझने को है यह!


तू इसमें फूंक मार


इसे एक प्रचंड अग्नि होना है


यह काम तो तू ही कर सकेगा


मुझमें अब दम नहीं है रे !


खाली चिनगारी यहां भला क्या करेगी


फूंक मार कर


इस चिनगारी को


तू ' दावानल ' बना डाल !!

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                                                                                                                                                            माह के कवि





                                                                                                                                                            

                                                                                                                                                             दिविक रमेश





अपने अपने डेरे












हैरान थी हिन्दी।

उतनी ही सकुचाई
लजायी
सहमी सहमी सी
खड़ी थी
साहब के कमरे के बाहर
इज़ाजत माँगती
माँगती दुआ
पी.ए. साहब की
तनिक निगाहों की।

हैरान थी हिन्दी
आज भी आना पड़ा था उसे
लटक कर
खचाखच भरी
सरकारी बस के पायदान पर
सम्भाल सम्भाल कर
अपनी इज्जत का आँचल

हैरान थी हिन्दी
आज भी नहीं जा रहा था
किसी का ध्यान
उसकी जींस पर
चश्मे
और नए पर्स पर

मैंने पूछा
यह क्या माजरा है हिन्दी
अच्छा भला पहनावा छोड़कर
यह क्या रूप धर लिया -
और जींस पर्स पर यह आँचल!

बोली
और वह भी
होकर रूआँसी
बस पूछिए मत भाई
आ गई
दिल्ली के एक प्रोफेसर के चक्कर में
बोला था
कि अगर चाहती हो
लोगों की निगाह में आना
तो उतार फेंको
यह पारंपरिक
वेशभूषा
क्या फंसी रहती हो
आज भी उसी संस्कृत और कभी
अपनी  माँ-दादी की वेशभूषा  के चक्कर में
वह भी इस कम्प्यूटरी और
इलैक्ट्रार ज़माने में।
छोड़ो यह व्याकरण फ्याकरण
छोड़ो यह  शुद्धता वुद्धता
यह गलत सही का चक्कर
और मुक्त हो जाओ
और अपनी वेशभूषा से
अच्छे अच्छे संयमियों तक को ललचाओ
ज़रा आधुनिक बनो
झूठे ही सही
चर्चा में आने को
दो चार बूढ़े दकियानूसी नामवरों पर
हैरस्मेंट का चार्ज लगाओ।

और देखो
मेरी भी मति मारी थी
वैसा ही कर बैठी
अब न रही घर की
और न ही घाट की।

बोला मैं
पर हिन्दी
तुम तो कभी ऐसी न थी
क्या तुम्हें सच में नहीं थी समझ
कि कैसे
करने को अपना अपना उल्लू सीधा
चला रहे थे मक्कार
गोलियाँ
रखे अपनी बन्दूक
तुम्हारे कंधे पर।

हाँ, सच में कहाँ समझ पाई थी
सोचा था
इंग्लैंड
और फिर अमरीका से लौट कर
साहिब बन जाऊँगी
और अपने देश के
हर साहब से
आँखें मिला पाऊँगी।


क्या मालूम था
अमरीका रिटर्न होकर भी
बसों
और साहब के द्वार पर
बस धक्के ही खाऊँगी।

मैं हँसा
कुछ ऐसे
जैसे कि रो रहा हूँ
या  शायद किसी  शोक सभा में बैठा
जैसे कि दिलासा दे रहा हूँ

हिन्दी !
अब जाने भी दो
छोड़ो भी गम
इतनी बार बन कर उल्लू अब तो समझो
कि तुम जिनकी हो
उनकी तो रहोगी ही न
उनके मान से ही
क्यों नहीं कर लेती सब्र
यह क्या कम है
कि तुम्हारी बदौलत
कितनों ने ही
कर ली होगी सैर
इंग्लैंड और अमरीका तक की।

देखा
अब कुछ उभर रही थी हिन्दी
यानी सम्भल रही थी।
पेंट  शर्ट पहने भी
जो अपना आंचल नहीं भूली थी
आंखों की कोर
उसी से साफ़ कर बोली थी -
'अरे, हाँ, याद आया
हाल ही में मेरे साथ
न जाने कौन कौन गया था मुफ्त में
न्यूयार्क  नगरी
(सच जानों, कइयों को तो जानती तक नहीं थी
और कई जानकार
जाने क्यों मना कर गए
मुफ्त का टिकिट पाकर भी!)

और आप भी तो नहीं दिखे?

पहाड़ सा टूट पड़ा
यह प्रश्न
मेरी हीन भावना पर।

जिससे बचना चाहता था
वही हुआ।
संकट में था
कैसे बताता
कि न्यूयार्क क्या
मैं तो नागपुर तक नहीं बुलाया गया था

कैसे बताता
न्यौता तो क्या
मेरे नाम पर तो
सूची से पहले भी ज़िक्र तक नहीं होता

कैसे बताता
कि उबरने को अपनी झेंप से
अपनी इज्जत को
'नहीं मैं नहीं जा सका` की झूठी ठेगली से
ढ़कता आ रहा हूँ।

अच्छा है
शायद समझ लिया है
मेरी अन्तरात्मा की झेंप को
हिन्दी ने।
आखिर उसकी
झेंप के सामने
मेरी झेंप तो
तिनका भी नहीं थी

बोली -
भाई,
समझते हो न मेरी पीर

हाँ बहिन!
यूं ही थोड़े कहा है किसी ने
जा के पाँव न फटी बिवाई
वो क्या जाने पीर पराई

और लौट चले थे
हम भाई बहिन
बिना और अफसोस किए
अपने अपने
डेरे।

 

 








कुछ नहीं कहते











मैंने कहा
मज़ाक बन गया है देश।

उसने कहा
तो तैयार हो जाओ
जेल के लिए

मैंने कहा
मज़ाक बना दिया गया है संविधान

उसने कहा
तो तैयार हो जाओ
अदालती धूल चाटने को

मैंने कहा
मखौल होकर रह गए
राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, मंत्री .....................

उसने कहा
तो तैयार हो जाओ
फाँसी के लिए

मैंने कहा
कौन डरता है

उसने कहा .....
कहा .....
कहा ......
दरअसल
उसने कुछ नहीं कहा।

 

 

 

 

 
किसने कहा होगा?





                         





तुम मुझे खून मत दो
मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।

ऐसा
न सुभाष ने कहा
न गाँधी ने।

तब किसने कहा होगा?

मारा मारा फिरा
उठाए
इस प्रश्न के  शव को
कंधों पर

टटोल डाले सारे पन्ने
अच्छे अच्छे दिमागों के

न बुश ने कहा, न पुतिन ने
न मुशर्रफ ने कहा न सोनिया ने
आखिर किसने कहा होगा?

उधेड़ डाली अनुभव की एक एक गुदड़ी
छान डाला
एक एक पंथ
जवाब कहीं नहीं था पर ।
आखिर किसने कहा होगा?

अचानक सूझा
कि किसी और ने नहीं
मेरे मन ने कहा था यह।
और वह भी
बस एक नयी बात कहने के चक्कर में

मैंने उत्तर दिया
'मैंने कहा था`।

देखा
प्रश्नकर्त्ता
फिर अपनी जगह
जा टंगा था।

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डॉ. काश्यप का मानना है कि हड़प्पन संस्कृति और वैदिक संस्कृति दो विभिन्न संस्कृतियां नहीं हैं, वे एक ही हैं। इसका वास्तविक नाम सरस्वती सिंधु सभ्यता है और वह सरस्वती नदी ही थी जिसके गीत वेदों ने गाए हैं। 


                                                                                                                                                                      मंथन


                                                                                                                                                                डॉ.पदमचन्द्र काश्यप

संस्कृति







संस्कृति क्या है? प्रश्न रोचक है, परन्तु उत्तर कठिन। एक जगह अंगुली रखकर नहीं कहा जा सकता कि संस्कृति यहां है, यह है। धर्म संस्कृति है, कला संस्कृति है, इतिहास भी संस्कृति है, लेकिन केवल वे ही संस्कृति हैं, यह कहना गलत होगा। वेदान्तियों के ब्रह्म की तरह संस्कृत यह भी है, वह भी है, किंतु इस यह और वह से परे कुछ और भी है।

विद्वानों ने संस्कृति को कई रूपों में देखा है, ठीक“ जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत तिन देखी तैसी“ के अनुरूप। साहित्यकारों ने संस्कृति में सत्यं, शिवं, सुन्दरम् के दर्शन किए। इतिहास प्रेमियों को इसमें तथ्यों घटनाओं, आंदोलनों और क्रान्तियों का ताना-बाना मिला। समाज-शास्त्रियों ने जब समाज के स्वरूप, उसकी विशेषताओं, अच्छाइयों, बुराइयों की छानबीन की, तो देखा, वे सब संस्कृति की ही तस्बीरें हैं। इससे उन्हें जातिगत और सामाजिक गुत्थियों को समझने और सुलझाने के सूत्र और मंत्र मिले। पुरातत्ववेत्ताओं ने अपनी खोजों और उपलब्धियों की जांच-पड़ताल संस्कृति की कसौटी पर की और मानव शास्त्रियों ने मनुष्य के जन्म, उसकी आदिम अवस्था, शरीर की बनावट और नाड़ियों में बहते रक्त की पहचान इसके द्वारा करने का विधान बनाया। दार्शनिकों को अपने चिंतन का आधार मिला। इस तरह मनीषियों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, भाषाविदों, वैज्ञानिकों, आस्तिकों और नास्तिकों ने संस्कृति को अपने-अपने दृष्टिकोण से देखा। परिणाम कुछ-कुछ वैसा रहा जैसा कि अन्धों द्वारा दिया जाने वाला हाथी की शक्ल और आकार का विवरण।

यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि संस्कृति का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, उसका स्वरूप इन्द्रधनुष की तरह पकड़ से बाहर है। वर्षा के बाद इन्द्रधनुष बड़ा आकर्षक और सुन्दर लगता है। आकाश और पृथ्वी के हाथों में वर और वधू के आंचल की तरह दीखता है, किन्तु उसका प्रकट होना, लुप्त हो जाना, उसकी बनावट, प्रकृति और सभी कुछ एक रहस्य है। यही स्थिति संस्कृति की है।

परिभाषा

शब्दकोष के पलटने पर संस्कृति की जो परिभाषाएँ मिलती हैं, उनके अनुसार संसार में जो सर्वोत्तम बातें जानी या कही गई हैं, उनसे परिचय करना संस्कृति है। यह भी माना जाता है कि मन, आचार और रुचियों को जो परिष्कृत करता है, मांजता है, वह संस्कृति है। पारिभाषिकों का दूसरा वर्ग मानता है कि शिक्षा और अनुशासन द्वारा मनुष्य के नैतिक, बौद्धिक और कलात्मक स्वभाव का विकास ही संस्कृति है। वह कहता है कि संस्कृति वह क्रियाकलाप है, जो कलाकार में सृजन और रसिक में आनन्दानुभूति कराता है। एक अन्य परिभाषा में कहा गया है कि किसी व्यक्ति या समूह की संस्कृति का मानदंड उसका ज्ञान, उसका साहित्य, संगीत और कला से प्रेम या व्यवहार के संस्कार हैं, अर्थात् संस्कृति उन व्यक्तिओं के समूह के समूह के कलात्मक और बौद्धिक विकास का नाम है।

इन सभी परिभाषाओं से ऐसा मालूम पड़ता है कि संस्कृति किसी पूर्व अवस्था में लाए गए सुधार का परिणाम है अथवा उस अवस्था का एक सुनियोजित, सुव्यवस्थित दिशा में विकसित होना है। संस्कृति का शाब्दिक अर्थ है, “ सम्यक कृति “, अर्थात् अच्छा करना, श्रेष्ठतर बनाना, सुधारना, संशोधित करना या परिमार्जित करना। इससे यह मालूम होता है कि इसके दो स्तर हैं संस्कृति से पहले के और संस्कृति के बाद के। प्रकृति ने कुछ गुण सभी प्राणियों को दिए हैं ---और ये गुण हैं क्रोध, मोह, लोभ, राग-द्वेष, कामवासना आदि। क्रोध करना मनुष्य की प्रकृति है, लोभ करना उसका स्वभाव है। वह बेगानों से द्वेष करता है और अपनों से उसे अनुराग है। वह अपने बेगानों में भेद करता है। यदि वह इन प्रकृति के दिए हुए गुणों पर रोक न लगाए, तो उसमें और जानवर में कोई फर्क नहीं रह जाता है। उस जिन्दगी को जिस पर न कोई अंकुश है और न जिसकी कोई मर्यादा ही है, पशु-जीवन कहा जाता है। इसलिए मनुष्य इन आवेगों पर रोक लगाता है और कोशिश करता है कि गुस्से पर काबू पाए। वह चाहता है कि लोभ-मोह, ईर्ष्या-द्वेष और कामवासना का गुलाम न बने, बल्कि उन्हें ही अपना गुलाम बनाए। इन अवगुणों पर आदमी जितना विजयी होता है, उसकी संस्कृति उतनी ही ऊँची समझी जाती है। इन्हें काबू में कर समाज के सर्वांगीण जीवन का जो तत्व निर्माण करते हैं, वे संस्कृति के अंग हैं। या यों कहें कि जानवर से आदमी बनना ही मूलरूप में संस्कृति है।

संस्कृति ऐसी चीज नहीं, जिसकी रचना पचास साठ साल में हो जाए। उसके लिए शताब्दियां दरकार हैं। एक समाज के लोग सैकड़ों सालों तक जिस तरह रहते-सहते, खाते-पीते, सोचते-समझते, धर्म-कर्म करते या राजकाज चलाते रहते हैं, उन सभी कार्यों से उनकी संस्कृति बनती है। आदिकाल से हम जिस रूप में शासन चलाते आए हैं , ‘ देऊ देवी ‘ को मानते हैं, मकान, मन्दिर, देऊरे बनाते आए हैं, बरतन और घर का अन्य सामान बनाते रहे हैं, कपड़े और जेवर पहनते हैं, शादी-ब्याह, श्राद्ध करते, पर्व-त्योहार मनाते आए हैं, अथवा अपने पड़ोसी से दोस्ती या दुश्मनी का बर्ताव करते आए हैं, वह सबका सब हमारी संस्कृति का अंश है। संस्कृति के उपकरण हमारे पुष्तकालय, संग्रालय, थियेटर, सिनेमाघर, रेडिओ और टेलिविजन ही नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक दल, आर्थिक संस्थाएं, सामाजिक संघटन भी होते हैं, हमारा नाच-गाना भी है, क्योंकि इन सभी पर हमारी रुचि और चरित्र की छाप बनी रहती है। हमारा परिवार कैसा हो, संयुक्त हो या ऐकिक, बुजुर्गों का आदर, बड़ों का मान, घर के मुखिया का विशेष दायित्व, माता पिता को देवतुल्य मानना, गुरु के प्रति श्रद्धा, देवता को राजा और राजा को देवता मानना भी संस्कृति के लक्षण हैं। यह मानना कि हमारा पुनर्जन्म होता है, अच्छे कर्म से स्वर्ग मिलता है, बुरे कर्मों का फल नरक में भोगना पड़ता है और भाग्य का लिखा कोई मेट नहीं सकता है, हमारी संस्कृति पर निर्भर करता है।

संस्कृति में हमारा भूत निहित है, वर्तमान गुंफित है। कल हम जो थे, आज हैं और कल बनेंगे, सभी कुछ संस्कृति से मालूम पड़ता है। ‘‘ देश और उसके लोगों की परम्पराओं और अनुभूतियों, उनके रीति रिवाजों, उनकी भाषा, कला यहां तक कि समूचे रूप में उनकी संस्कृति से न केवल उनका अतीत प्रकाश में आता है, बल्कि लोगों की विचारधाराओं से उनके भविष्य के बारे में भी अन्दाजे लगाए जा सकते हैं, और वास्तविकता यह है कि जनता की संस्कृति की कहानी ही किसी देश की असल कहानी होती है।‘‘

                                           लालचन्द प्रार्थीः कुलूत देश की कहानी।

हमारा सारा जीवन संस्कृति से ओतप्रोत है. हम जो भी करते हैं, उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है। सरल शब्दों में कहें तो संस्कृति जीने के तरीके का नाम है। हम क्या करते हैं, क्यों करते हैं, कैसे करते हैं, जीवन को किस दृष्टि से देखते हैं, हमारे कार्य किन विचारों, भावों और इच्छाओं से प्रेरित हैं, अर्थात् हमारे सोचने और करने के सारे व्यवहार-प्रकार ही संस्कृति है। अतः संस्कृति मानव के ऐतिहासिक विकास में जीवन-यापन की रीति का नाम है। जीवन को उसका वास्तविक मूल्य प्रदान करने वाले तत्वों का नाम ही संस्कृति है। हमारे भाव, हमारी अनुभूति, अभिव्यक्ति, आस्था, निष्ठा, आकांक्षा, इच्छा और कार्य संस्कृति द्वारा प्रेरित होते हैं। हम इसी से ज्ञान, विश्वास, कला, आचार-विचार, विधि-विधान, पूजा-अर्चना और रीति-रिवाज ग्रहण करते हैं।

संस्कृति जन्म-प्रसूत भी है और ज्ञान प्रसूत भी। वह वैयक्तिक है, वर्गगत और जातिगत भी है। प्रकृति ने जो गुण दिए, वे जन्म से मिले। पैतृक गुण माता-पिता के रक्त से मिले। विद्या, मनन, चिन्तन, स्वाध्याय, अनुभव और संगति से परिष्कृत गुण अपने प्रयत्न से आए। संस्कार व्यक्ति की तरह समाज के भी होते हैं। संस्कृति किसी भी देश, जाति या समाज की आत्मा होती है। उसमें उक्त देश, जाति समाज की आत्मा होती है। उसमें उक्त देश जाति या समाज का चिन्तन-मनन, रहन-सहन, आचार-विचार आदि सभी बातों का समावेश होता है। इस अर्थ में संस्कृति सार्वदेशिक, सार्वभौमिक और विश्वव्यापी हो जाती है। मनुष्य अन्ततः एक ही जीवश्रेणी का प्राणी है। उसकी अवगतियां और उद्दात्तीकरण की वृत्तियां एक मार्ग से चलती हैं। व्यक्तिगत स्तर पर विभिन्नता होने पर भी मानचित्र एक ही है। मनुष्य चाहे पूर्व का हो, चाहे पश्चिम का। भले ही वह जापान, चीन, मिस्र, अरबका हो या यूरोप, अमेरिका एवं आस्ट्रेलिया का। वह रूस में रहता हो या अफ्रीका में; वह अदृश्य दैवी शक्ति से भयभीत है, अनागत का उसे डर है, अतीत के प्रति उसमें अगाध श्रद्धा है और रूढियों में उसे विश्वास है---किंतु जहां वह रहता है और जब से रहता आया है, उन भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों से उसमें वैविध्य भी काफी आ गया है। ज्यों ज्यों जो वर्ग और समुदाय विज्ञान और टेक्नोलोजी के क्षेत्र में अधिक उन्नति करता है, उसका सांस्कृतिक स्वर अन्य वर्गों और जातियों से उसी अनुपात में भिन्न होता जाता है।

यह ठीक है कि आर्थिक उन्नति जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है; लेकिन जिन्दगी वहीं खतम नहीं हो जाती, वह आर्थिक विकास से भी कहीं ऊँची चीज है। वही बात संस्कृति की है। समय के साथ यह विकसित होती है और परिवर्तित होती रहती है। इतिहास के अन्दर हमें दो सिद्धांत काम करते दिखते हैं---एक सातत्य का सिद्धांत और दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धांत परस्पर विरोधी लगते हैं , परन्तु विरोधी हैं नहीं। सातत्य के भीतर भी परिवर्तन का अंश है। उसी प्रकार परिवर्तन भी अपने भीतर कुछ सातत्य का कुछ अंश लिए रहता है।

सभ्यता

बहुधा संस्कृति और सभ्यता को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है, लेकिन ये दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। संस्कृति सभ्यता से भिन्न गुण है। सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है, संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है। अतः संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन गुण है। सभ्यता का संबंध बाहरी बातों से है, संस्कृति का संबंध भीतरी गुणों से है। सभ्यता केवल भौतिक और शारीरिक उन्नयन है, जबकि संस्कृति मानसिक और बौद्धिक विकास है। संस्कृति और सभ्यता का आपसी संबंध दूध में मक्खन, फूलों में सुगन्ध और शरीर में आत्मा जैसा है। मकान और उसमें लगी सामग्री सभ्यता का क्षेत्र है, लेकिन मकान की कल्पना, वह किस आकार का, किस प्रकार का, किस बनावट का हो, वह संस्कृति की बात है। इस दृष्टि से देखें तो सभ्यता बाहरी ढांचा मात्र है, जो संस्कृति के बिना निष्प्राण व निस्सार है। उसकी अपेक्षा संस्कृति ज्यादा टिकाऊ है। सभ्यता की सामग्रियां टूट-फूटकर विनष्ट हो जाती है, लेकिन संस्कृति का विनाश उतनी आसानी से नहीं किया जा सकता है। सभ्यता अपेक्षाकृत जल्दी बनती है और जल्दी बिगड़ भी जाती है। संस्कृति के बनने में भी पर्याप्त समय लगता है और बिगड़ने में भी।

लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी। सभ्यता और संस्कृति एक दूसरे की पूरक हैं। वे साथ-साथ प्रगति करती हुई एक-दूसरे को प्रभावित करती रहती है। समृद्ध सभ्यता में सुसंकृति का सहज विकास होता है, जिसके फल स्वरूप आचार-विचार में गरिमा आती है तथा धर्म, दर्शन, साहित्य, कला और ज्ञान-विज्ञान की उन्नति होती है। पंचतंन्त्रकार ने ते धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले, आगच्छन्ति गृह येषा कार्यार्थ सुहृदयोजना। में जब सभ्य शब्द का ही प्रयोग किया तो अभिप्राय सुसंस्कृत से ही था।

निर्माणक तत्व

संस्कृति के निर्माण में भूगोल और इतिहास का बहुत बड़ा हाथ रहता है। भूगोल ने ही भारत को एक रूप दिया है, उत्तर में नगाधिराज हिमालय और दक्षिम में सागर। इससे यह देश आत्मनिर्भर हुआ, आत्म-तुष्ट रहा। केवल एक को छोड़कर इसके सभी द्वार बाहर की ओर से बन्द थे। इस खुले पश्चिमी दरवाजे से बाहर के लोगों के बड़े बड़े झुंड यहां आए। कई लोगों का कहना है कि इस प्रकार का सबसे बड़ा झुंड आर्यों का था। उनके बाद कई और लोग आए, लेकिन कोई दूसरा कभी इतनी बड़ी संख्या में दोबारा नहीं आया है।

जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, वह कदापि आदि से अन्त तक आर्य नहीं है। उसका मूल स्वर, मूल स्वरूप और मुख्य अवयव भले ही आर्य है किंतु उसका वर्तमान स्वर एवं स्वरूप स्थिर करने में और लोगों का भी हाथ है। यहां यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि इस तथ्य पर उस विवाद का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि आर्य देशज हैं या कहीं बाहर से आए हैं और कि यहां के बसने वालों को उन्होंने खदेड़ दिया था। वैसे भी ज्यों-ज्यों पुराने अवशेष सामने आ रहे हैं, पुरातत्ववेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि यह धारणा निर्मूल है कि सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के निर्माता व रचयिता द्रविड थे या मध्य एशिया अथवा भूमध्य सागर के आसपास से आए कोई और लोग थे जिन्हें आर्यों ने विस्थापित किया था। जैसा हम आगे चलकर देखेंगे, सिन्धु सभ्यता के जन्मदाताओं में स्वयं आर्य भी थे। भारतीय संस्कृति के स्वरूप का उल्लेख करते हुए डॉ. रामधारी सिंह दिनकर संस्कृति के चार अध्याय में कहते हैं कि “ यह संस्कृति रसायन की प्रक्रिया से तैयार हुई है, एवं उसके भीतर अनेक औषधियों का रस समाहित है। यहां कौन आर्य या अनार्य, द्रविड या मंगोल, शक या हूण है, कुछ नहीं कहा जा सकता। बाहर से जो लोग आए, उनमें से प्रत्येक का कुछ-न-कुछ धर्म रहा होगा, उनमें से प्रत्येक की कुछ अपनी आदतें रही होंगी, अपने भाव, रीति-रिवाज रहे होंगे। वे जातियां वीर थीं, तो वीरता की बहुत सारी कहानियां उनके साथ आई होंगी। यदि वे जातियां धार्मिक थीं, तो अनेक प्रकार के देवी-देवता और धार्मिक विश्वास आए होंगे। लिखित या अलिखित कुछ उनका साहित्य रहा होगा, उनके कुछ गान रहे होंगे। उनका कुछ नृत्य और मनोविनोद भी रहा होगा। किंतु इनमें से किसी भी वस्तु या विचार का कोई अलग अस्तित्व नहीं है। मुसलमानों के आगमन के पूर्व इस देश में जितनी भी जातियों के लोग आए, सब हिन्दू हो गए।“

भारत की संस्कृति एक है। सामान्यतः सभी राम और कृष्ण को मानते हैं। गंगा सभी के लिए पवित्र है। सरस्वती सभी के मन में गौरव का भाव जगाती है, अर्थात् सभी की संस्कृति का मूल यही भारत है। वर्णमाला सबकी एक है, भले ही प्रान्त-प्रान्त में आचार-भेद है, भाषा भेद है, पहराव अलग-अलग है, खान-पान भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु कर्म और जन्मान्तर सभी मानते हैं। सभी मानते हैं कि जीवन नश्वर है। सभी का समाज की सम्पूर्णता में विश्वास है। सभी पारिवारिक जीवन और उत्तरदायित्व की पवित्रता मानते हैं। सभी के मन में मानवमात्र से बन्धुत्व और प्राणीमात्र के प्रति करुणा है। देवताओं के असंख्य नाम और रूप हैं, पुराणों में तो तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का जिकर है। ये सभी आर्य, अनार्य जातियों के सम्प्रदायों और विश्वासों से लिए गए हैं। एक भारतीय के लिए इसमें कोई झंझट नहीं है, क्योंकि वे सब समान अलौकिक, आध्यात्मिक और सौंदर्यात्मक गुणों का मूर्त रूप है। यह चाहे ‘महादेऊ ‘ हो, या  ‘ बड़ा देऊ ‘, ‘नाग रिखी ‘ हो या  माहू नाग, अम्बिका, चामुणडा, महिषासुरवादिनी हो या वज्रेश्वरी और रघुनाथ हो, माधोराव व द्वारिकाधीश हो। हमारी इस भावना का बहुत ही अनूठा चित्रण कर्नाटक में बेलूर के केशव मन्दिर में अंकित इस प्रार्थना में हुआ हैः

यं शैवा समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो।

बौद्दा बुद्द इति प्रमाण पतयः कर्तेति नैयायिकाः।

अर्हन्नित्यय जैन शासनरताः कर्मेति मीमांसकाः।

सोsयं वो विदधातु वाँछित फलं त्रैलोक्यनाथो हरिः।।

 सभी धर्मों, मतामतान्तरों, दर्शनशास्त्रों के प्रति सहिष्णुता। सभी का मार्ग ठीक, सब वांछित फल देने वाले, किसी नाम से पुकारो, किसी नाम से जानो। यह सहिष्णुत्ता, उदारचित्तता ही भारतीय संस्कृति का प्रमुख स्वर है।


प्राचीन इतिहास, परम्परा, रूढ़ि और आदर्श की समानता, समस्त भारतवर्ष की संस्कृति को एक बनाती है, इस दृष्टिकोण से उसे विभिन्न जातियों, समाजों, वर्गों या राज्यों एवं प्रदेशों में बांटा नहीं जा सकता। किंतु यह भी तथ्य है कि भारत एक विशाल देश है, एक महाद्वीप है, अतः यह अनोखी बात नहीं कि उसके विविध भागों की कुछ एक विशिष्ट निजी सांस्कृतिक विशेषताएँ भी हों। और जिस प्रकार एक गुलदस्ते में विविध रंग और सुगंध के पुष्प अपनी-अपनी विशेषता रखते हुए भी उस सामूहिक सौंदर्य की वृद्धि करते हैं, उसी प्रकार क्षेत्रीय और आंचलिक विशेषताएँ भी इस देश की सामूहिक संस्कृति को गरिमा और पूर्णता प्रदान करती है। 


                                                                                    

                                                                                   ( साभार लेखक की पुष्तक ' हिमाचली संस्कृति का इतिहास से)

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                                                                                                                                                  कहानी समकालीन


                                                                                                                                                         अजय नावरिया


एक देर  शाम


सूरज बुझने लगा था, जैसे दिये में तेल कम होने पर लौ मर्द्धिम हो जाती है। दूर पेड़ों के झुरमुट के पीछे सूरज उतरता चला था। उजाले की परछाई धीरे-धीरे फैलती जा रही थी। लेकिन उधर ... उस तरफ ... पेड़ों के उस झुरमुट के पीछे सूरज अब भी होगा... नीचे गिरता हुआ ... अपनी गर्म राख में लिपट... वहां उजाला भी होगा, यहां से ज्यादा...और उधर, उस पार, वहां तो यह उगता हुआ सूरज होगा और उस तरफ  शायद मध्याह्न का।
 'सच...सच भी, सच में, एक सा नहीं।` उसके मुंह से अनायास यह वाक्य छिटक कर पीछे हटते उजाले की संवलाई परछाई पर गिरा था, जैसे पसीने की कोई बूंद टपक जाती है, माथे से होती हुई, नाक तक आने के बाद...टप्प...। 'सिर्फ दृष्टि का एक कोण है सच भी...यानी सिर्फ एक दृष्टिकोण...इतना टुच्चा होता है यह सच भी...तब झूठ।` उसे यह सोचकर अरूचि, वितृष्णा और विक्षोभ हुआ। -फिर सही गलत क्या है?`
 उसने दूरतक नजरें दौड़ाई थी। वहां दूर दो-चार ग्रामीण आकृतियां प्लास्टिक की पानी की बोतलें लिए उकडूं बैठी, हाथ से मक्खियां उड़ा रही थीं। महानगर के कोलाहल से बाहर यह एक छोटा सा गांव है। गांव कहने को गावं है पर गांव नहीं बचा है अब वहां। कहने को वह महानगर की परिभाषा में ही है, लेकिन परिधि में नहीं है, हाशिए पर पड़ा है। पास ही दूसरी तरफ, राष्ट्रीय राजमार्ग है। इस तरफ नहर है, जिसमें महानगर की सभ्य कालोनियों का कूड़ा-कचरा और कई इलाकों से मल भी बहता आता है। 'ये भी कहां जाए बेचारे।` उसकी निगाहें फिर मक्खी उड़ाती उन्हीं उकडूं बैठी इंसानी आकृतियों पर पड़ी थी। गांव से बहुत सारे परिवार अब भी 'फारिग` होने के लिए, नहर किनारे के खेतों पर आश्रित थे।  उनके घर इतने छोटे हैं कि वहां मुश्किल से रहा ही जा सकता है। औरतों के बारे में सोचकर वह और उदास हो गया। 'ये कौन लोग हैं? क्या गरीब...? क्या बिना जात के हैं ये गरीब?` उसने माथे पर आई पसीने की चमचमाहट को साफ किया। हालांकि यह पसीने का मौसम नहीं था। पसीना, पिछले महीने विदा हो चुका था, यह तो पसीना निकालने के महीने की  शुरूआत थी। जुलाई का उफनता और अगस्त का सीझता मौसम समाप्त हो चुका था। दूर तक फसल की हरियाली दिखाई देने लगी थी।
 'ये सब हमारे ही लोग हैं। कुछ बदला है कहीं...हम अब भी वैसे ही हैं... गांव वैसा ही है,  शहर वैसा ही है। गांव के नए-नए चौधरी जब मर्जी अबे-तबे कर देते हैं...उनके साले बिलांद भर के लौंडे, हमारी बहन-बेटियों को दिखा-दिखाकर मूतते हैं...कहीं कुछ बदला है...क्या बदला है...घंटा बदला है बाबाजी का।` वह बड़बड़ाता ही चला गया था। उस सुनसान में कोई था नहीं, जो उसकी सुनता और सुनता भी तो क्या कहता।
 'कहीं मैं सनक तो नहीं गया हूं।` उसने खुद से पूछा और फिर उधर ही निगाहें जमा दी, जहां सूरज की रोशनी, पानी के किसी सोते की तरह फूट रही थी। क्या सुबह और  शाम एक से होते हैं? इस जगह पर बैठते हुए, उसने पहले ही आसपास देख लिया था कि दूर तक कोई न हो, जो बेवजह और बेमौके उसके अकेलेपर में खलल डाले। पर यह वाकई क्या एकांत था? इसमें सूरज की रोशनी थी, गांव के हाजत निपटाते लोग थे, इसमें नहर थी, हरियाली थी और नौकरी से मिली घृणा थी। 'आ  ह नौकरी।` वह भुनभुनाया। `कमबख्त यह  शब्द ही घृणित है...कोई इज्जत नहीं...साले नौकर हैं...पर...पर नौकरशाह भी तो नौकर हैं...नहीं नहीं, यह सच नहीं है...यह सरासर झूठ है... वहीं सच और सच की दृष्टिकोण और झूठ की तरह उसका दुच्चा होना...नौकर और नौकरशाह अलग है, बिल्कुल अलग दो दुनियाओं की तरह...अमरीका और तीसरी दुनियां के देशों की तरह ...पुरोहित की तरह जो हम पर हुक्म चलाता है...हमारी हडि्डयां चिंचोडता है भूखे भेडिए की तरह...हरामी मेरी नौकरी खा गया...नहीं...ऐसे नहीं।` वह झुंझलाहट में बड़बड़ाते हुए उठा खड़ा हुआ।
 उसने दोनों हथेलियों को मुंह के पास किया, जैसे किसी को पुकारने के लिए किया जाता है। फिर उसने छाती में लम्बी सांस भरने की कोशिश की, परंतु वह सांस भर नहीं पाया। वह पलभर रूका और गरदन झटक कर खुद को हल्का करने की व्यर्थ कोशिश की। उसने गला खखारकर साफ किया, जो उसे भरा-भरा महसूस हो रहा था। उसने फिर हथेलियों को मुंह के पास किया और फेफेड़ों में सांस भरी, इस बार भर गई और वह जोर से चिल्लाया, '...कुत्ते   ...हरा   ...। वह तब तक चिल्लाते-चिल्लाते पस्त नहीं हो गया। क्या वह जान गया था कि अब हमें रोने की बजाय चिल्लाना चाहिए? क्या वह जान गया था कि चीख, अत्याचारी के मन की दहशत भरती है? या फिर क्या वह बस खुद को हल्का करने की कोशिश भर थी? वह निढ़ाल होकर चट्टानी ढाल पर पसर गया।
 'पिता   जी।` रोकते-रोकते भी उसकी आत्मा रो पड़ी थी। पर वह सुनसान और प्यासी चट्टान, उसके रोने की आवाज को चुपचाप पी गए थे।
 उसके जेहन में, पिता की छवि चमकी थी। पिता एक सरकारी विद्यालय में चपरासी थे और अपने बेटे-बेटियों के आइ.ए.एस. बनने का सपना देखते थे। वह कहते थे कभी-कभी 'दिनकर, मेरा ख्वाब है रे पगले, कि तू एक दिन एजूकेशन डायरेक्टर बनकर ठाठ से, कुर्सी पर बैठे और घंटी बजाकर तू अपने चपरासी को बुलाए।` इससे बड़ा पद उनकी सोच से बाहर था। यह भावुकता के क्षण थे। तब उसने बारहवीं की परीक्षा पास की थी। अपने विद्यालय में सबसे ज्यादा अंक उसी के आये थे। हिन्दी और इतिहास में पचहत्तर प्रतिशत से ऊपर आये थे।
 विद्यालय में जाट जाति के छात्रों का बाहुल्य था। अधिकतर अध्यापक भी इसी जाति के थे। दूसरे नम्बर पर ब्राहमण अध्यापक थे। छात्रों में जाटों के अलावा सबसे ज्यादा संख्या में चमार जाति के लोग थे। इक्के-दुक्के तो सभी जातियों के छात्र थे। ग्रामीण क्षेत्र के इस विद्यालय की हालत एक ग्राम व्यवस्था से अलग नहीं थी। 'भई तुझे बधाई हो सुमेर सिंह।` प्रधानाचार्य अमर सिंह टोकस ने दिनकर के पिता को बुझे मन से बधाई दी थी। 'इस बार फिर निकल गए, हरजनों के बालक आगे।` अधिकतर अध्यापकों की आवाज में अफसोस था।
 उसके पिता सुनकर बाहर निकल आये थे, खुशी-खुशी। उन्होंने अध्यापकों के अफसोस पर ध्यान नहीं दिया था। 'सुमेर...।` अपने नाम की पुकार सुनकर वह रूके थे। पीछे से गणित के अध्यापक जयकिशन बाल्मीकि लंबे लंबे डग भरते आ रहे थे। 'बधाई हो भाई`। उन्होंने उन्हें गले लगाते हुए कहा। 'इस प्रिंसीपल के बहकावे में मत आना, अभी थोड़ी देर पहले कह रहा था कि ये हरिजनों के छोरे हर बार हमारे छोरों को पछाड़ रहे हैं और हम कुछ कर भी नहीं सकते, बोर्ड की परीक्षाएं जो ठहरी, साईंस वालों को तो प्रेक्टिकल में नम्बर कम देकर हमने ठिकाने लगाया पर आर्ट्स वालों का क्या करें। वह एक ही सांस में बता गए थे।
 'क्या रमाकांत  शर्मा जी भी वहां थे?` उसके पिता ने एक अन्य अध्यापक के बारे में पूछा था।
 'थे क्यों ना...पर वे बेचारे क्या करते, जब सारे एक तरफा हो लिए, अकेले पड़ गए, पहले काफी कुछ हमारे पक्ष में बोले, पर  शीशपाल के आगे कुछ बोल सके हैं।
 'वह के कहवै था?
 'कहवै के था, मजाक उड़ावै था, कहवै था कि ये भी थारी ही औलादें हैं...के फरक पड़े हैं।` सुनकर सब हो हो करके हंसने लगे थे। जयकिशन की बात सुनकर उसके पिता भीतर तक हिल गये थे। जयकिशन बाल्मीकि लौटे गए थे। पिता ने उसे बताया था बाद में। साथ ही कुछ कमजोर  शब्दों में यह भी समझाया था कि यहां सब जातियां एक दूसरे को छोटा-बड़ा मानती हैं। बामन बामन तक से छूआछूत करता है, बाकी दूसरी जातियों की तो बात ही दूर है। उन्होंने यह भी समझाया था कि यह जाति कभी भारत से खत्म नहीं होगी, पर जातिवाद खत्म हो सकता है। जातिवाद खत्म होगा, शिक्षा और आर्थिक स्तर पर बराबरी हो, जैसे  शरीर में निश्चित तापमान से ज्यादा बढ़ जाने को ही बुखार कहते हैं, वैसा ही बुखार यह जातिवाद है। निश्चित तापमान खतरनाक नहीं है, खराब है उस तापमान की सीमा से बढ़ना। इन कमजोर  शब्दों ने धीरे-धीरे उसमें एक मजबूत समझ भरी थी।
 वह पिता की आई.ए.एस. अधिकारी बनने की ख्वाहिश पूरी नहीं कर सका था। बी.ए. करने के दौरान, मंडल कमीशन के मामले पर वह मीडिया की भूमिका देखकर दंग रह गया था। उसे अपने जैसे समाजों की चिंता हुई थी। मीड़िया की भूमिका देखकर दंग रह गया था। उसे अपने जैसे समाजों चिंता हुई थी। मीडिया, आरक्षण विरोधी होकर, आरक्षण विरोधियों का ही साथ दे रहा था। अधिकतर लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी या तो इसमें नंगमनंग होकर कूद पड़े थे या फिर खामोश हो गए थे। प्रगतिशीलता और जनवादिता की घज्जियां उड़ गई थी।
 दलितों का इससे कुछ लेना देना नहीं था। यह लड़ाई पिछड़े वर्गों की थी, परंतु भाई-बंदी की खुजली और  शायद भविष्य के भय से आक्रांत, वे इसे अपनी लड़ाई मानकर जान दिए बैठे थे। उसे  शुरू में यह सब समझ नहीं आया था। उसे जैन लड़के - लड़कियों का आरक्षण विरोध भी समझ नहीं आया था। पर धीरे-धीरे, परत दरपरत यह उसके सामने खुलता चला गया था।
 क्या वाकई आरक्षण की व्यवस्था गलत है? क्या वाकई यह प्रतिभाओं के साथ बलात्कार है? क्या वाकई यह केवल अयोग्यों का चुनाव बनकर रह गया है? उसके सामने कई सवाल फूटे थे। उसे पल भर को, सच में आरक्षण गलत लगा था। पर आखिर वही आरक्षण, आर्थिक आधार पर कैसे जायज हो जाता है? हजारों समाजों के लाखों-करोड़ों लोगों की, क्या इस देश को बनाने में कोई भूमिका नहीं है? फिर क्यों उन्हें हर क्षेत्र में भागीदारी नहीं दी जानी चाहिए? जब सभ्य समाज, एक जन्म के अपाहिज के लिए, आसान जिंदगी जीने के लिए इतनी सहूलियतें देता है, तब ये समाज तो हजारों सालों से लहूलुहान है। पर फिर एक कलेक्टर के बेटे को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? क्या यह व्यवस्था, जाति को बढ़ा रही है? क्या जिन्हें आरक्षण नहीं मिलता, वे समाज इसे अपने हिस्से को हड़प होने के रूप में नहीं देखते हैं? क्या यह कोई नया ब्राहमण वाद हहै... पीढ़ी दर पीढ़ी सुविधापूर्ण व्यवस्था...।` वह घिर गया था। 'सरकारी नौकरी, सरकारी होती है।` पिता ने उसके अखबार की दुनिया चुनने के फैसले पर अपनी असहमति जताई थी। 'वक्त अभी ऐसा भी नहीं बदला है।` फिर वह कुछ पल रूक कर बोले थे, 'तू नहीं तो कोई और करेगा मेरा सपना पूरा।` इतना कहकर उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा था। इस हाथ का वजन बहुत ज्यादा लगा था उसे। क्या यह पिता के सपनों का बोझ था? उसके जेहन में अचानक आज इतने दिनों बाद सवाल चिल्लाया था।
 वह चट्टान पर निस्पंद बैठा था, किसी बुत की तरह या किसी ऐसे दर्शक की तरह, जो डरावनी फिल्म देख रहा हो। दोपहर का दृश्य फिर एक बार पलट गया था। 'दिनकर, तुम्हें एडिटर साहब बुला रहे हैं?` चपरासी की आवाज सुनकर उसने नजरें उठाकर चपरासी की तरफ देखा था, वहां उपहास था। `साला चपरासी भी आप से तुम पर उतर आया। 'वह भुनभुनाया था। 'यह भी जानता है कि मैं इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लोग उसी की कद्र करते हैं जो कुछ दे सकता हो या फिर बिगाड़ने की ताकत रखता हो। बाकी तो साले कीड़े हैं।` वह बड़बड़ाता रहा था। 'यहां ऊपर से नीचे तक ब्राहमणों के गोत्र फन फैलाए बैठे हैं। संपादक के केबिन की तरफ बढ़ते हुए, उसके भारी मन से ये अल्फाज हुए, उसके भारी मन से ये अल्फाज गिर ही पड़े थे। यह एक भारी, नक्काशीर दरवाजा था, जिस पर सुनहरी नेमप्लेट में परशुराम पुरोहित लिखा था।
 उसने दरवाजा खटखटाने से पहले पलटकर चारों तरफ देखा था। प्लास्टिक के वर्गाकार केबिनों में, कम्प्यूटर खोले ज्यादातर चेहरे उसी की तरफ देख रहे थे। इन चेहरों में टकी ज्यादातर आंखों में हिंसा थी, हरकत थी, हंसी थी, जैसे किसी भोजन जीमने बैठी पंगत में, बीचोंबीच, सुअर के अचानक घुस आने पर होती है।
 `हां अंदर आओ। उसके अंदर झांकते ही, पुरोहित की पैनी नजर ने उसे छील दिया था। उसके होने को भी। `अब क्या यही काम रह गया है, तुम्हें प्रूफ चेक करना सिखाऊं क्या? पुरोहित चिल्लाया था। आज यह लगातार तीसरा दिन था, जब उसकी प्रूफ पर गलती दिखायी जा रही थी। यह तीसरा दिन था, उसे पड़ती लगातार फटकार का। यह तीसरा दिन था, इस निश्चय का कि वह और सतर्क होकर प्रूफ पढ़ेगा। `सर, मैंने कई बार चेक किया था।` वह पहले वाली निर्भीकता खो गई थी। अब वह पुरोहित से डरने लगा था। रोज पड़ने वाली फटकार ने उसके हौसले तोड़ दिए थे धीरे-धीरे। क्या गुलाम बनने की  शुरूआत इसी हौसले के टूट जाने से होती है। `तो मैं झूठ बोल रहा हूं... मुझे पढ़ना नहीं आता...तू मुझे सिखाएगा... मेरा इतना वक्त खराब कर दिया... एक तो तू, एक घंटे का काम  पूरे दिन में करता है और उस पर मुझे झूठा बोलता है।` पुरोहित फट पड़ा था बुरी  तरह। वह तीन दिनों, में, आप से तू पर उतर आया था।
 'जन जागरण` अखबार में काम करते हुए उसे सात महीने हो गये थे और इन पिछले दिनों के अलावा न उससे कभी ऐसा व्यवहार हुआ था और न उससे कोई गलती हुई थी।  शायद होती भी होगी, तो कोई उसे पकड़ता नहीं था। एक दिन पुरोहित ने उसकी तैयार कापी पर एक  शब्द लाल निशान के घेरे में लेकर उसे ठीक करने को कहा और वह हैरान रह गया कि वह तीन बार में उसे ठीक से नहीं लिख सका। वह चकरा गया था और  शब्द हर बार एकदम नया और अलग लगने लगा था।
 'दिनकर, उस दोगले को तुम्हारी कास्ट का पता चल गया है।`  शशि  शर्मा ने उसे बाद में बताया था।` `यह पक्का भगवाधारी है।`  शशि ने पुरोहित के केबिन की तरफ मुट्ठी तानते हुए कहा। `यह प्रूफ की नहीं, उन रिपोर्ट का मामला है जो तुमने छापी थी प्रमुखता से...दलित उत्पीड़न वाली है।
  शशि  शर्मा के कमजोर दिलासे ने उस कठिन वक्त में सम्बल दिया था। उसने रूमाल निकालकर अपनी गर्दन के पास से चिपचिपाहट को साफ किया था। `नहीं  शशि, गलती मुझसे हुई तो है ही...।` वह पल भर ढका था। ` नौकरशाह में, मैंने 'औ` की जगह 'ओ` लगा दिया था।`
 'एक दो गलती किससे नहीं होती?`  शशि  शर्मा हाथ झटकता चला गया था। तीन दिनों में उसका दो सीटों पर ट्रांसफर किया था पुरोहित ने। यह सबसे ऊबाऊ और बेकार सीट थी। यहां सिर्फ बाहर से आई खबरों को दोबारा लिखना भर था, पर पुरोहित को इस पर भी संतोष नहीं था। वह उसे निकाल बाहर करना चाहता था। `आगे ख्याल रखूंगा...।` यह कहते हुए, जैसे वह जमीन में धंस गया था। यह बिल्कुल ऐसी आवाज थी जो किसी गहरी खुदी कब्र से किसी के बोलने पर आती है। 'गेट आउट... आज से तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है यहां।` पुरोहित ने गुस्से में अपनी कुर्सी से उठते हुए कह ही दिया। उसकी उंगली का इशारा दरवाजे की तरफ था।
 पुरोहित का ऐसा रौद्र रूप देखकर वह पल भर को सहम गया था। फिर जैसे उसे सब कुछ गवां देने का एहसास हुआ था और पल के इसी सौंवे हिस्से में, उसने फाइल पुरोहित की मेज पर फेंक मारी थी।
 'बैठ जा चुपचाप, नहीं तो जहां से निकला है वहीं गाड़ दूंगा तुझे।` वह पुरोहित से कहना चाहता था, पर कह नहीं सका था। पुरोहित उसकी गुस्से में निकलती भाप को देखकर चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया। वह बचाव की मुद्रा में आ गया था। आखिर वह बूढ़ा था। उसने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया था।
 'दिनकर, तुम्हें जमा देने थे साले के।`  शशि  शर्मा भी उसके पीछे-पीछे दफ्तर से बाहर चला गया था। दिनकर का मन भारी था, वह कुछ बोलने की हालत में नहीं था। `अब कहां जा रहे हो?`  शशि के स्वर में चिंता थी।
 `वापस...घर।` दिनकर को बचपन में पढ़ी उसे चूहे की कहानी याद आई थी, जिसे ऋषि ने अपने मंत्र से  शेर से फिर चूहा बना दिया था। वह ऋषि के बहुरूपिये होने का क्षोभ से भर गया था। वह ऋषि दुष्ट था, चूहा नहीं। 
  शशि  शर्मा ने चलते वक्त  शाम सात बजे किंग्स सर्किल पर मिलने को कहा था। `एक दिन हमारा होगा।` शशि ने दिनकर के कंधे थपथपाए थे। इन  शब्दों में भरोसे से ज्यादा दिलासा था। 
  शशि का जन्म कहने को बिहार के एक सुदूर पिछड़े गांव में हुआ था, पर आधुनिकता, जिसका राजनीतिक रूप लोकतांत्रिकता है, उसमें कूट-कूट कर भरी थी।  शशि के व्यवहार ने उसके कई भ्रमों को तोड़ा था।
 
 'सात बजने में तो अभी लगभग सवा धंटा है।` दिनकर ने अपने मोबाइल में वक्त देखते हुए सोचा। `मेट्रो ट्रेन से पैंतीस-चालीस मिनट में पहुंच जाऊंगा...अभी वक्त है।` बुदबुदाते हुए कुछ देर, वह औंधी पड़ी चट्टान पर लेट गया था।
 वह थका-थका सा, घुटने पर हाथ रखकर उठ गया था। उसने पलटकर उस चट्टानी पत्थर की तरफ देखा, जिस पर वह इतनी देर से बैठा हुआ था। तेज बारिशों या किसी नमी के कारण उसके आसपास किनारों पर हरियाली फूट रही थी। `अगर यह मुलायम मिट्टी न होती तो  शायद यह हरियाली भी न होती।` फिर एकाएक उसे अपने प्यारे दोस्त  शशि  शर्मा की याद आई थी। `मैं किसी से रूकूंगा नहीं अब।` उसने निश्चय किया।
 जब वह किंग्स सर्किल के मेट्रो स्टेशन पर उतरा, तब साढ़े सात बजने को आये थे।  शहर में मेट्रो के आने से  शहर की पूरी व्यवस्था में बदलाव आ गया था। वरना किंग्स सर्किल से उसके गांव पहुंचने में पहले ढाई घंटा लगता था। अब सिर्फ पैंतीस मिनट में, एकदम तरोताजा वह पहुंच जाता है। पहले तो वह पहुंचते-पहुंचते पसीने से लथपथ और बेदम हो जाता था। मेट्रो के चलते उसके गांव की जमीनों के भाव आसमान छूने लगे हैं। लोगों के काम करने की क्षमता बढ़ गई है। क्या टेक्नोलॉजी ही हमारा उद्धार करेगी?
 `एकदम पका दिया यार दिनकर।`  शशि ने दिनकर को देखकर घड़ी दिखाते हुए कहा।
 'मन नहीं था आने का।` दिनकर ने धम्म से कुर्सी पर बैठते हुए स्पष्टीकरण दिया।
 'गम न कर...जो बीत गई सो बात गई।`  शशि ने कंधे पर हाथ रखकर हिम्मत बंधाई।
 सड़क पर धीरे-धीरे अंधेरा उतर चुका था। सड़क किनारे लगे बिजली के खंभों और आसपास की दुकानों से दूधिया रोशनी के सोते छूट रहे थे। दिनकर की आंखों में यह रोशनी चुभ रही थी। दिनकर ने मन ही मन बच्चनजी की इस कविता को दो-चार बार गुनगुनाया। उसने भीतर कुछ ऊर्जा महसूस की थी। क्या वाकई ये  शब्द उसके हारे हुए मन को ताकत दे रहे हैं? 'चलें कहीं?`  शशि की आंखों में सवाल था और जवाब में दिनकर उठ गया था।
 उन्होंने मुख्य सड़क से एक आटोरिक्शा किया, जो पांच-पांच रूपये में सेन्ट्रल मार्केट सवारियां पहुंचाता था। पांच-सात मिनट में, दोनों वहां पहुंच गए थे। वहां से उन्होंने मेजिक मोमेंट वोदका का एक अद्धा और एक लिम्का और एक सोड़ा खरीदा, साथ ही एक नमकीन का पैकेट भी। सारा सामान उन्होंने अपने-अपने बैग में डाल लिया।
 दोनों पैदल चलते हुए फ्लाई ओवर के नीचे जा पहुंचे थे, जहां रेलवे लाइन थी और कभी-कभार मालगाड़ी ही वहां से गुजरती थी। सिर्फ पचास कदम की दूरी पर दृश्य एकदम बदल गया था। यहां काफी अंधेरा था, पर दसियों लोग इधर-उधर खड़े थे। कुछ दो-चार के समूहों में और कुछ अकेले। उन्होंने वहीं वोदका, लिम्का और सोडा को आपस में मिला कर दो बोतलें तैयार कीं और बोदका की खाली बोलत झाड़ी में फेंक दी। उनके बोतल फेंकते ही दो पांच छह साल के लड़के उसे उठाने के लिए आपस में लड़ पड़े। वह पास मेज पर चलने वाली एक दुकान वाले आदमी के बच्चे थे  शायद। वह उन्हें नाम से पुकार कर गालियां दे रहा था। उस मेज पर उबले अंडे, नमकीन और आमलेट बनाने की सामग्री थी। यह एक दुकाननुमा मेज थी।
 'प्लास्टिक क्रांति` लिम्का और सोड़ा की प्लास्टिक बोतलें आपस में टकराते हुए उनके चेहरे पर 'चीयर्स` की चमक आई। दोनों ने इधर-उधर देखा और गट-गटकर काफी माल गटक गए। बोलत बंद कर वापस अपने-अपने बैग में डालकर निश्चिंत हो गए। दोनों का ध्यान इस ओर बराबर बना था कि कहीं पुलिस वाले न आ जायें। यहां इसका खतरा हमेशा बना रहता था। हालांकि पुलिस वाले ज्यादा कुछ नहीं करते थे, बस आदमी की हैसियत देखकर पैसे ऐंठ लेते थे। बाकी लोग भी  शायद इधर-उधर, बार-बार यही देख रहे थे। कुछ बेखौफ थे,  शायद उन्हें नशा चढ़ चुका था और वे `जो होएगा देखा जाएगा` की परम अवस्था में जा चुके थे।
 `यहां से चलो।` दिनकर ने  शशि से कहा तो दोनों बढ़ चले। 'आजकल यहां छापा पड़ता है, वो 'मर्डर` हुआ था न उसके बाद से।
 'पर साले हमारे जैसे लोग जायं तो जायं कहां। बार में पीने की औकात नहीं और घर में पी नहीं सकते।`  शशि ने मन मसोसते हुए कहा।
 वे दोनों रेल लाइन पार कर चुके थे कि तभी पीछे से पुलिस का छापा पड़ा। लोग  इधर-उधर भागने लगे थे। कुछेक को पुलिस वालों ने पकड़ लिया था।
 'अच्छा हुआ।` दिनकर ने सांस छोड़ी।
 'कुछ नहीं साले ठुल्ले हैं, बीस पचास लेकर भाग जायेंगे।`  शशि को हल्का सा नशा हो गया था।
 फ्लाई ओवर के उस तरफ कई रिक्शे वाले खड़े थे। उन्होंने एक ऐसा रिक्शा चुना जो ऊपर से ढका हो और चलाने वाला जवान हो।
 'रॉक व्यू होटल।`  शशि ने जान बूझकर, सेन्ट्रल मार्केट के दूसरे कोने तक चलने के बारे में पूछा, जो लगभग डेढ़ किलोमीटर के फासले पर था।
 'आइए साहेब।` रिक्शेवाला सीटा पर हाथ मारते हुए बोला।
 'क्या लोगे?`
 'जो मन आए दे देना साहेब।` रिक्शेवाला इस बार सीट पर एक बार और हाथ मारकर चढ़ गया। वह उन्हें नशे में समझ रहा था। वह तेज आदमी था। `नहीं वे पहले तै कर।`  शशि की आवाज में कठोरता थी। 'दस रूपये।` रिक्शेवाले ने यह कठोरता भांप ली थी। यह उसके अनुमान और समय से मेल नहीं खा रही थी।
 'सात रूपये।`  शशि ने फिर कड़े स्वर में पूछा। `चलना है। 'कहकर वह आगे को बढ़ने को हुआ।
 'ठीक है बाबूजी आइए।` तीन रूपये घटते ही वे दोनों साहेब से बाबू जी हो गए।
 दिनकर कहना चाहता था  शशि से कि दस रूपये ठीक हैं, पर इस बीच यह सब तय हो गया था। 'यह लोग हमारे ही तो लोग हैं।` उसने सोचा था। 'क्या यह भी दलित ही नहीं होगा?`
 रिक्शा चल पड़ा था और उन्होंने अपनी-अपनी बोतलें फिर थाम ली थी, इस बार खुले-आम। लोग देखते थे, पर या तो वे इसे समझ नहीं पाते थे या उनसे वास्ता नहीं रखना चाहते थे, तो पुलिस थी बेइज्जती का डर था और अब ये सब कुछ नहीं। लोग कार चलाते हुए  शराब पीते रहते हैं। सब मार गरीब पर।` दिनकर घूंट भरते हुए सोच रहा था।
 'वापस पुल पर चलो।`  शशि ने रिक्शेवाले से कहा तो कभी वह  शशि और कभी दिनकर के मुंह की तरफ टुकुर-टुकुर देखता रहा।  शशि ने वहां तक का किराया उसके हाथ में रख दिया था। रिक्शा फिर मुड़ गया। रिक्शेवाले ने अब सारी स्थिति भांप ली थी।
 इस बार उसने भीड़ वाला रास्ता चुना चुना, पर अब तक उनका डर भी भाग चुका था। बाजार अपने  शबाब पर था, किसी खूबसूरत मॉडल की तरह, जो रैंप जाने को तैयार हुई हो। खूबसूरत और खूबसूरती से कहीं ज्यादा आकर्षक पंजाबी लड़कियों और औरतों की भीड़ ने बाजार में एक जादू भर दिया था। `ये भरे-भरे जिस्म वाली खूबसूरत लड़कियां न हों तो ये बाजार खाली हो जाय।` यह दिनकर की नशे में लहकती आवाज थी, किसी हिंसक पशु की गुर्राहट जैसी। इसमें प्रतिशोध भी चिलक रहा था।
 मार्केट के आस-पास का सारा इलाका पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त आये रिफ्यूजियों का था। जब वह आये थे, तो उनमें से ज्यादातर फटेहाल और दाने-दाने को मोहताज थे, पर अपनी लगन, मेहनत और बुद्धि के बल पर उन्होंने जल्द ही अपना साम्राज्य  शहर में खड़ा कर लिया था।  शहर के खाने से लेकर नाच गाने तक पर पंजाबियों का प्रभाव था।
 'ये सब बेईमान लोगों के महल हैं  शशि। इनकी कोई नैतिकता नहीं...सारी  शर्म  लिहाज घोलकर पी गए... सिर्फ पैसा चाहिए इन्हें...जा पुत्तर पैसा कमा कर ला...जा कुछ कुछ कमा...इसके लिए चाहे वह खुद को बेचे, इससे कोई मतलब नहींं।` दिनकर की यह सोच प्रतिशोध के कारण बनी थी  शायद। वह प्रतिहिंसा में सुलग रहा था  शराब के नशे ने इसे बढ़ावा दिया था। 
 शशि यह सब सुनकर हैरान था कि दिनकर एक पूरी कौम के बारे में ऐसी टिप्पणी कैसे कर सकता है। उसने हस्तक्षेप करते हुए कहा, `दिनकर सब लोग ऐसे नहीं हैं।`
 'तुम्हें क्या पता? मैं यहां पैदा हुआ हूं। मैं जानता हूं इनके बारे में। इनके रंग-रूप, कद-काठी में इतनी भिन्नता इसीलिए है।` दिनकर ने खास आशय से आंख मारते हुए कहा। `टके टके पर बिकी थी इनकी औरतें...।` पर तुम्हें इनकी परेशानी भी देखनी चाहिए?`  शशि ने दिनकर की बात काटी। `अबे साले बिहारी।` सुनकर  शशि और दिनकर की बातचीत का क्रम अचानक टूटा और जब तक वे दोनों समझ पाते, तब तक दो गोल-मटोल पंजाबी लड़कों में से एक ने रिक्शे वाले के थप्पड़ जमा दिया था। `दिखता नहीं साले बिहारी, अभी बिहार से छूटकर आया है क्या?` दोनों में से वही थप्पड़ मारने वाला लड़का गुर्रा रहा था। रिक्शेवाले ने कान पकड़कर माफी मांग ली थी और आगे बढ़ गया था।  शशि यह देखकर  शर्मिंदगी महसूस कर रहा था।
 'कहा के हो भय्या?` यह सवाल  शशि का था और अतिरिक्त आत्मीयता से भरा था। क्या इस `परदेस` में  शशि को `देस` से प्रीत हुई थी?
 `इलाहाबाद के हैं सर।` रिक्शेवाले के सर में कोई तुर्शी न थी और कोई तल्खी भी नहीं। क्या उसने अपनी नियति को स्वीकार कर लिया था? क्या वह घुटने टेक चुका था, इस नई दुनिया के सामने? या फिर यह दिखाई देने वाली रणनीति सच्चाई है? `वह बिहार का नहीं है, पर यहां सब लोग गरीबों, मजदूरों को `बिहारी` कहकर बुलाते हैं। इसमें कितनी घृणा है...क्या यह गाली नहीं है, जैसे मुम्बई में किसी को भय्या कहना।`  शशि के चेहरे पर अब भी अवसाद था। वह दिनकर की बात पर कोई टिप्पणी नहीं कर सका।
 बाजार में  शोर था, लेकिर रिक्शे पर चुप्पी चढ़ बैठी थी। वे चुपचाप अपने घूंट भरते रहे। उनके हाथ में कसैलेपन का स्वाद था और आंखें नमकीन हो चुकी थीं। कुछ देर के सन्नाटे के बाद, पुरोहित के लिए गालियां छूटने लगी, जैसे जमीन से पानी का सोता फूटता है, बुल  बुल   बुल ल   ।
 'कितना पैसा हुआ भय्या?`  शशि की आवाज में पहले जैसी हिंसा और हिकारत नहीं थी। रॉक व्यू की सीढ़ियां भी रोशनी से चमक रही थी। अंदर पूरा होटल दूधिया रोशनी से जगमगा रहा था।  शशि उसी दूधिया सीढ़ी पर खड़ा था। रिक्शेवाला रिक्शे की गद्दी से उतर गया था और आगे हैंडिल पर कपड़ा मार रहा था। वह अपने दोनों ग्राहकों की असली औकात और पी गई बादशाहत के बीच कहीं झूल रहा था।
 'चालीस रूपये।` आखिर वह कह गया था।
 `बस्स!` यह  शशि के  शब्द थे।
 `रूक  शशि...ये आज हमारे साथ खाना खाएगा।` दिनकर के  शब्दों से तीनों ही चौंक गए थे।  शशि की आंखों में आश्चर्य था। रिक्शेवाले के चेहरे पर से चमक चली गई थी, जो अभी कुछ देर पहले तक भी थी, शायद होटल की रोशनी की तेजी से । दिनकर भी खुद पर हैरानी से हंस पड़ा था।
 रिक्शेवाला भतीर जाने से मना कर रहा था, बार बार लगातार। उसकी आंखों में रिरियाहट थी और आवाज में कातरता। उसकी जीभ पर कामना थी और पसीने में डर। इस डर को भांपते हुए दिनकर ने पहले उसके चालीस रूपये किराये के रख दिए।  शशि इस बीच चुपचाप खड़ा रहा। इस बीच दो-चार खाली खड़े रिक्शे वाले भी वहां आ गए थे। उनके चेहरे पर अफसोस था, कौतुक था और उत्सुकता भी थी।
 'चले काहे नहीं जाते, जब बाबूजी लोग कह रहे हैं?` रिक्शेवालों ने अपनी हसरतों के बीच से उसे हौंसला दिया।
 यह सुनकर उसने रिक्शा होटल के सामने ताला लगाकर खड़ा कर दिया था। वे दोनों आगे बढ़ चुके थंे।
 `साहेब...।`उनके कान में रिक्शेवाले की आवाज पड़ी तो वे पलटे। दरवाजे पर दरबान ने उसे रोक दिया था। उन्होंने दरबान की तरफ छूटकर इस भाव से देखा कि `यह हमारे साथ है` और दरबान ने उसे आने दिया था। वह अब उसे मना नहीं कर सकता था।
 'यहां बैठो!` यह एक आलीशान वातानुकूलित होटल का हॉल था। रिक्शेवाला सकुचाता हुआ बैठ गया था। उसकी आंखों में आनंद ज्यादा था या दुश्चिंताएं, यह कहा नहीं जा सकता था। होटल के दूसरे ग्राहकों की आंखों में हिकारत, हिंसा और उपेक्षा थी। उनकी नजर में वह अवांछित और गंदे कीड़े की तरह था। दिनकर ने दफ्तर में अपनी स्थिति का इससे विपर्यय किया। उनके सामने खाना लगने लगा था। रिक्शेवाला हुक्म के इंताजर में था ताकि जल्दी से वह भाग सके। शशि का इशारा पाकर वह  शुरू हो गया। वह सहमा हुआ था, पर तेजी से खा रहा था। लोगों की खा जाने वाली नजरों को वह अनदेखा कर रहा था। वेटर बार-बार आकर रिक्शेवाले से ही पूछ रहा था 'और कुछ लेंगे सर`- इसमें कुछ व्यंग्य भरा खेल था। क्या दिनकर अपना घाव सहला रहा था? उसकी आंखों में  शांति और संतोष था, जैसे किसी सद्यप्रसवा मां को अपने शिशु को दूध पिलाते हुए होता है या फिर किसी बाघ को, जिसने अपना शिकार खाया हो और अब पेड़ की छांव में बैठकर जीभ से दांत साफ कर रहा हो। दिनकर को कबीर को वह दोहा याद आया था जिसमें 'बाजार के किसी से दोस्ती या दुश्मनी न करने` के भाव को साफ किया गया था।

 'बाजार लिबरेट करता है।` सहसा उसके मन में यह हिंसक विचार उछला।
 खाना हो चुका था। हाथ धोने के लिए, एक कटोरी में गुनगुना पानी और आधा टुकड़ा नींबू रख दिया था। रिक्शेवाले की आंख में जिज्ञासा थी। दोनों की देखदेख, उसने भी उसमें हाथ धो लिए थे, सौंफ और मिश्री भी उठा ली थी।
 'यह वेटर को दे दो।` दिनकर ने दस रूपये का नोट रिक्शे वाले को पकड़ाया।
 'थैंक्यू सर।` जब रिक्शेवाले ने वेटर को दस रूपये दिए तो उसने झुकर उसका अभिवादन किया। इस बार उसकी आंखों में व्यंग्य की जगह आदर आ बैठा था। रिक्शेवाले ने उन दोनों की तरफ देखा, जिसमें सवाल था कि 'क्या वह जा सकता है` और उनकी आंखों ने इसकी अनुमति दे दी थी। वह तुरंत दरवाजे पर पहुंच गया था। दरबान ने झुककर सलाम किया था। वह खी खी करते हुए बाहर उतर गया था। वह तेजी से रिक्शे पर चढ़ा और तेज-तेज पैडल मारते हुए, अमगता-अफनता, रिक्शे को ले उड़ा था। वह  शायद सूरज के सातवें घोड़े पर सवार था।
 'हो गई क्षतिपूर्ति?`  शशि के सवाल ने दिनकर को दूर जाते रिक्शे से वापस खींचा।
 'भरपाई।` दिनकर हंसा। `यहां हमें कौन जानता है?...पर इसे सब जानते हैं।` उसने अंगूठे से तर्जनी के पोर को दो बार ऊपर-नीचे करते हुए छुआ, जिसका अर्थ था पैसा। 
 

कमबख्त, सच भी सच में एक सा नहीं होता, वह नजरिए का एक टुच्चा सा खेल भर है।` दिनकर ने पतलून की दोनों खाली जेबें बाहर की तरफ पलट दी थी, जो बकरी के निचुड़े थनों की तरह लग रही थी।

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                                                                                                                                                        दो लघुकथाएँ


   


                                                                                                                                                   

                                                                                                                                                    रामनिवास मानव





मुक्ति

बंधुआ मज़दूरों की मुक्ति के लिए, सर्वोदयी नेता, पुलिस की चौकसी में ट्रक लेकर, इंर्ट-भट्ठे पर पहुंच गये। उनके आह्वाहन पर सभी मज़दूर, तत्काल अपना सामान बांधकर, चलने को तैयार हो गये।
 ट्रक के पास आकर, मज़दूरों के मुखिया के पैर, एकाएक ठिठक गये। उसने और उसके साथ सभी दूसरे मज़दूरों ने अपना-अपना सामान ज़मीन पर रख दिया।
 "चलिये-चलिये, अपना-अपना सामान जल्दी से ट्रक में रखिये।" सर्वोदयी नेता ने कहा।
 सभी मज़दूर मुखिया की ओर देखने लगे। वह चुप रहा।
 "बुधराम, क्या बात है भई ! खा़मोश क्यों हो ? अपने साथियों को सामान रखने के लिए कहो न !"
 मुखिया अब भी चुप था, जैसे कुछ सोच रहा हो। सर्वोदयी नेता ने समझा, ये पुलिस वालों से डर रहे हैं। अत: उनकी ओर संकेत करते हुए बोले-"ये सिपाही तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे। ये तो हमारे साथ हैं, तुम्हारी मुक्ति के लिए आये हैं।"
 "सा`ब ! म्हां की किस्मत मैं तो यो ही लिख्यो है।" मुखिया बोला-"काल इपैं नाय, तो दूजा ओर भट्टा पै सही, एई मजूरी करनी पड़ैली।"
 "क्....क्यों ?"
 "ऐं भट्टा ली कैद सैं तो थे मुकत करा द्यो ला, पण भूख सैं मुकत कोण करावैलो सा`ब !" 

 












खिलौने

हरिबाबू ने नज़र घुमाकर देखा, तो उन्हें अपने ड्राइंग-रूम की हर चीज़ बड़ी सस्ती और घटिया नज़र आई। 'यह भी कोई ड्राइंग-रूम है ! सोचकर वह उदास से हो गये।
 ड्राइंग-रूम तो धीर साहब का है, एकदम फस्स क्लास। कल जन्म-दिन की बधाई देने गये, तो देखते ही रह गये। क्या सोफ़े, रंगीन टी.वी., वी.सी.आर. और फ्रिज थे ! और क्या डेकोरेशन थी, वाह !!
 और हां, शो-केस में कितने शो-पीस सजे थे, एक से बढ़कर एक, पीतल के, लकड़ी के, संगमरमर के ! एक रैक तो पूरे-का-पूरा खिलौनांे से भरा था और हर खिलौना कितना क़ीमती, खूबसूरत और चमचमाता हुआ लगता था।
 क्षण-भर के लिए हरिबाबू कहीं खो गये थे कि तभी उनके चुन्नू-मुन्नू 'पपा आ गये, पपा आ गये का शोर मचाते हुए अन्दर घुस आये। फिर उछलते-गाते-झूमते उन दोनों ने, पूरे ड्राइंग-रूम को, एक संगीतमय ताज़गी से तर कर दिया।
 हरिबाबू के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान झलक आई। बस, फिर क्या था, दोनों बच्चे चढ़ बैठे उनके कंधों पर और लगे उछल-उछलकर खेलने।
 अब पुन: निगाह डाली, तो हरिबाबू को अपनी सारी-की-सारी चीजें  बदली हुई नज़र आईं।
 'धीर साहब के ड्राइंग-रूम में सब-कुछ तो है, लेकिन ऐसे सजीव खिलौने तो नहीं हैं।' उन्होंने अपने-आपसे कहा और बच्चों को कसकर छाती से लगा लिया। 

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                                                                                                                                                                 शेष-अशेष





                                                                                                                                                               

                                                                                                                                                         -शैल अग्रवाल

भाग -15

हलो, हलो में ही वह जंग लगा हवाई अड्डे का फोन सारे पैसे खा गया। मुश्किल से बस इतना ही पूछ पायी थी कि ' जोनुस  ठीक तो हो न ' , कि लाइन कट गई। हारी मनु वापस उसी सीट पर आकर लस्त बैठ गई, जहां से उठकर अभी-अभी चन्द मिनट पहले ही, बड़ी ललक के साथ जोनुस से बात करने को उठी थी वह। सारी उलझन और देरियों से परेशान और अनमनी मनु ने पत्रिका के पिछले पन्ने पर  ऐसे ही कुछ लिखना और आड़ी-तिरछी  लाइनें खींचना शुरु कर दिया।


‘ ज़मला ऐसी प्रीत कर जैसे निशि और चन्द
चन्दा बिन निशि साँवरी निशि बिन चन्दो मन्द।‘
हवाई अड्डे पर बैठे-बैठे इन्तजार करती ऐसे ही लिख गई थी वह तो और अब पढ़ते ही आश्चर्यचकित थी खुदपर ... इस कलम को कैसे पता चला कि जोनुस को याद कर रही है वह?  बातें जो खुद उसने कभी जोनुस से नहीं कही थी आज इस भीड़ में जोनुस के बिना बेहद अकेला और उदास महसूस करती कलम जोनुस से कहना चाह रही थी। यूं तो जोनुस से दूर रहना हमेशा ही उदास कर देता है , पर इस अनचाही  भागदौड़ और अराजकता में मनु को वाकई में जोनुस की  बहुत याद आ रही थी। अब बस कुछ दिन ही तो रह गए हैं जोनुस को भारत से लौटने में--मनु खुद को बहलाने के लिए जोनुस की  जगमग यादों में डूब गई । यादों की उंगली छोड़ सदैव हंसते मुस्कुराते जोनुस की तरह ही एक और खुशनुमा पल एक शरारती बच्चे सा मनु के सामने आ बैठा और  उसके अकेलेपन को गुदगुदाने लगा। जोनुस का वह बचपना, बीसियों बार एक नयी ताजगी से सुनाए गए वे सच्चे झूठे लतीफे---- कितने सच्चे और कितने झूठे थे मनु नही जानती, परन्तु इतनी थकान के बाद भी एकबार फिर से मनु की आँखों में वही पुरानी हंसी और शरारत की बिजलियाँ वापस चमक रही थीं।  

किसी ऐसे ही एक भावुक पल में टकटकी बाँधे उसे देखते जोनुस को बाँहों में भरकर टोका था मनु ने --"-ऐसे क्या देखरहे हो मुझे, लो अगर तुम्हारा मन नही है तो आज काम पर नही जाऊंगी, बस। तुम्हारे पास ही बैठी रहूँगी मैं ---सारे काम की छुट्टी आज।" और तब “ अरे नही, नही। मैं  तुम्हे नहीं, उस कीड़े को देख रहा था जो तुम्हारे बालों पर रेंगता कान में घुसने की तैयारी कर रहा है और मैं देखना चाहता हूँ कि वो घुस भी पाएगा या नही?" कहकर अपने ही अनोखे अन्दाज में बेहद शोखी और शरारत के साथ झेंप मिटाई थी जोनुस ने अपनी और तब जब ‘ कहाँ है, कहाँ है’ की हड़बड़ी में उस काल्पनिक कीड़े को ढूंढती मनु धम्म से लड़खड़ाकर गिरने ही वाली थी, पीछे खड़े जोनुस ने बाँहों में संभाल भी लिया था उसे और बेहद प्चार से बालों को ठीक करता कानों में धीरे-से बोला था, ‘ यह कीड़ा तो कबका तुम्हारे दिल-दिमाग में घर बसा चुका है मैडम । अब कहाँ बचकर जाओगी इससे ? अच्छा, रुको अब एक बिल्कुल सच्चा चुटकुला सुनाता हूँ तुम्हें।‘ और बाँह छुड़ाकर काम पर जाती मनु को चलते चलते सुना ही डाला था उसने अपना वह जोरदार लतीफा। हर मौसम के लिए हमेशा ही एक नया और ताजा चुटकुला तैयार जो रहता है उसके पास। ऐसा ही है उसका जोनुस, हर स्थिति में खुश और एक एक दिन में हजार-हजार खुशियाँ ढूँढ-ढूँढकर लाने वाला।       

मनु पूरी तरह से जोनुस की यादों में डूब चुकी थी।

स्वत: ही मानस पर एक के बाद एक जोनुस की प्रिय पंक्तियाँ उभरती चली जा रही थीं, कभी चुटकुला, कभी कविता तो कभी मात्र यूँ ही बड़ी बेफिक्री से कहा गया कोई बेहद प्रेरणादायक वाक्य --‘ जानती हो मनु, यदि इरादे दृढ़ हों और सच्ची लगन हो, तो कुछ भी असंभव नही, कोई परेशानी विचलित नही कर पाती। रास्ते खुद ब खुद निकल ही आते हैं।‘

मनु अपनी सारी परेशानियों को कपड़ों में पड़ी सलवटों-सा झाड़कर उठ खड़ी हुई। हज़ारों पूछताछ और टेलिफ़ोन के बाद भी, कुछ संभव है भी या नहीं, पता तो लगाना ही था उसे। अगली उड़ान अगले दो घंटे बाद मिल जाएगी और उसका बुक किया सामान उससे पहले ही कतार पहुंचकर उसका इंतजार कर रहा है।  वह सीधा-सा लगता औफिसर इस भ्रमित देरी और असुविधा के लिए क्षमा याचना के अलावा अब और कोई मदद नहीं कर सकता था मनु की। मनु पास ही पड़ी खाली सीट पर निढाल बैठ गई। अगली उड़ान का इन्तजार करने के अलावा  मनु के पास भी अब और कोई विकल्प नहीं था।  

       इतने सारे लोग---- एयरपोर्ट पर चारो तरफ सामान की तरह ही यात्री भी बिखरे पड़े थे। भीड़ देखकर मनु हैरान थी। सामने बैठी बीस पच्चीस औरतों का वह जुट जाने कहाँ से आया था और जाने कहाँ जाने की तैयारी कर रहा था मनु नहीं जानती थी, परंतु सामने बैठा वह शातिर सा लगता आदमी उन्हें एक गड़ेरिये सा ही हाँके जा रहा था। शौचालय तक भी तो वे सब एकसाथ ही गई थीं। एक अनजान भविष्य के लिए खुद को तैयार करतीं,  उदास और डरी आँखों से साड़ियों की चुन्नटें ठीक करतीं वे, बिना किसी से कुछ कहे या सुने--एक दूसरे से भी नहीं, चुपचाप ही खड़ी रहीं और फिर वैसे ही वापस आकर ख़ामोश अपनी-अपनी जगह पर बैठ भी गइं, मानो बचने का, भागने का अब उनके पास कोई और रास्ता ही नहीं था।  

       बाहर खड़ा, सिगरेट फूँकता वह आदमी उन सब पर कड़ी नज़र रखे बेवजह मुस्कुरा रहा था-- पलकें तक नहीं झपका रहा था वह तो, मानो कि उसकी आँखें झपकी नहीं कि सोने की ये चिड़िया कहीं उड़ जाएँगी, जाल तोड़कर। मानो कि उसकी बेईमान ज़िंदगी में वे औरतें इंसान नहीं, बस मुनाफ़े के सौदे का सामान मात्र थीं। मनु को वह आदमी बेहद ही तिकड़मी और दलाल क़िस्म का लगरहा था और वह आदमी भी मनु को भी उतनी ही शंकित और आक्रामक नज़रों से ही देख रहा था मानो कह रहा हो मुझसे भिड़ना मत, मैं किस हद तक गिर सकता हूँ, यह  तुम नही जानतीं!  कुछ ही मिनटों में वे सभी औरतें उड़ान पर लाचार भेड़-बकरियों की तरह लाद दी गई। उनका भविष्य क्या होगा मनु नहीं जानती थी--- शायद किसी शेख़ के हरम में नौकरानी और रखैल का पात्र निभाते निभाते जब हज़ार बीमारियाँ पाल लेंगी तो किसी स्थानीय अस्पताल में सड़ने और मरने के लिए छोड़ दी जाएँगी?

मनु ने ख़ूब ही सुन और पढ़ रखा था ऐसी औरतें और उनकी लाचार ज़िंदगी के बारे में --कैसे चंद पैसों के लालच में खुद इनके बाप, भाई, संरक्षक इन्हें बेचकर मात्र एक जोड़ी कपड़े में बिदा कर देते हैं और फिर किस बेरहमी से इनका इस्तेमाल किया जाता है? एक संडास से ज़्यादा हैसियत नहीं होती इनकी।  आता जाता घर का मेहमान और हर आदमी अपने को हलका कर सकता है इनके ऊपर--वक्त बेवक़्त कभी भी पीस सकता है इन्हें। मुँह में आई उबकाई और आँखों में उमड़ती दया को रोककर उसने लाचार औरतों से एक ख़ामोश वादा किया--माफ़ करना बहन, आज तुम्हारे लिए मैं कुछ नहीं कर पा रही परंतु एक दिन समाज के इस कोढ़, इस सड़े मवाद देते नासूर को, सबके आगे ज़रूर लाऊँगी, जिससे कि इसे फोड़ा जा सके --- तुम्हें या तुम्हारी जैसी अन्य कई औरतों को दुख-दर्द,  इस ज़िल्लत की ज़िंदगी से मुक्ति दिलाई जा सके।

       बार बार मुड़ कर आँसू भीगी आँखों से उन्हें देखती-पढ़ती मनु, उन अभागी औरतों को उनकी ही किस्मत पर छोड़कर, लाचार-सी, एक और अधिकारी के संरक्षण में चलती, दूसरी दिशा में, गेट न 7 की तरफ़ बेबस चली जा रही थी---और कर भी क्या सकती थी वह इस पुरुष प्रधान समाज में? औरतों का भी छाया की तरह ही, अपना कोई अस्तित्व नहीं होता पुरुष की परछांई मात्र ही तो हैं वे यहाँ इन देशों में। अकेली औरत यहाँ अजनबी नक्षत्र से उतरे यान से भी बड़ा चमत्कार समझी जाती है। यहाँ पर पैदा हुई लड़कियों के बारे में, जिस घर में पैदा हुर्इं हैं, जनाज़े के साथ ही उससे बाहर निकलने के कई अज़ीबो-गरीब क़िस्से सुन रखे थे मनु ने भी। नहीं जानती थी वह कि इन अफ़वाहों में कितना जोशीले पत्रकारों की कलम का जादू  था और कितनी सचाई----परन्तु यह बात तो उसे भी बहुत ही साल रही थी, कि क्या आज इस इक्कीसवीं सदी में भी दुनिया में इतना पिछड़ा और प्रताड़ित नारी समाज है, या फिर संभव भी है?  सब कुछ देखते समझते हुए भी, मनु का मन कुछ भी जानने और मानने से इनकार कर रहा था।

       वह तो यह तक नहीं जानती थी कि फ़िलहाल उसे उसका सामान और उड़ान भी मिल पाएगी या नहीं? अनायास की इस भागदौड़ से उसके दिल और दिमाग़ दोनों ही थक चुके थे और ज़ोर ज़ोर से धड़क रहे थे। सामर्थ से लंबे कदम लेती, कौरीडोर की लंबी दूरी पार करती वह किसी तरह से सही जहाज पर बैठ ही गई आखिर। चारों तरफ़ अब एक शांत और आरामदेह वातावरण था और इसबार जहाज कतार होता हुआ लंदन ही जा रहा था। मनु ने एक चैन की साँस ली और आँखें बंद कर लीं। वह जानती थी कि रेशमा ने पूरा कार्यक्रम बहुत ही सुचारु और सुंदर ढंग से आयोजित कर रखा होगा और हवाई अड्डे पर बाँहें फैलाए उसका इंतज़ार कर रही होगी उसकी सहेली।

       आने वाली मुलाक़ात के लिए सुव्यवस्थित होने के प्रयास में मनु ने बैग से लैपटौप निकाला और एक बार फिर से अपने वक्तव्य पर सरसरी नज़र डालने लगी--कहीं कोई मुख्य मुदूदा छूट तो नहीं गया, यही सब गुनती बुनती वह पूरी तरह से विषय में खो चुकी थी। बगल की सीट पर बैठे दोनों छोटे बच्चों ने अबतक कंप्यूटर पर क्या हो रहा है के कौतूहल वश उसकी सीट पर लदकर झूलना शुरू कर दिया था, मनु के लिए शांति से काम करना असंभव हो चला, -

       "-आन्टी, आन्टी आपके कंप्यूटर में वह टैट्रिस वाला खेल भी है क्या--?" वे उत्साहित और उतावले होकर बार बार मनु से पूछे जा रहे थे। उड़ान परिचारिका आई और सभी को सुरक्षा पेटी बाँधने का आदेश देकर चली गई। माँ बाप ने तुरंत ही अपने दोनों नटखट बेटों को भी पेटी से कस दिया और मनु ने भी कंप्यूटर बंद करके सामने फैली ट्रे समेट ली। बच्चे अब सीट में बँधे-बँधे उससे दोस्ती कर रहे थे---'' अगर एक क्रोकोडाइल के हाथ में टेलिफोन दे दिया जाए तो वह क्या करेगा आन्टी?" उनमें से जो छोटा और ज्यादा शरारती लग रहा था उसने चहक कर मनु से पूछा-''-क्या करेगा वह?'' ---इसके पहले कि कुछ भी सोच पाए, बड़े ने झट-से जबाव दिया--" ईजी आन्टी, ईजी। ही विल क्रोक-ए-डायल। " शब्दों के इस खेल पर मनु भी मुस्कुराए बिना न रह सकी। अब बड़े की बारी थी --" अच्छा बताओ क्या होगा अगर हम क्रोकोडायल को एक इथोपियन के साथ टेलिफोन बूथ में बन्द कर दें?" " मुझे नहीं मालूम क्या होगा?"  मनु ने भी उसी सहजता से सर खुजलाते हुए पूछा, "तुम्ही बताओ ना कि क्या होगा?"

       " भूखा इथोपियन क्रोकोडायल को खा जाएगा।" बच्चे ने हंसते हुए उत्साह के साथ उसे बताया। पता नहीं चुटकुला और यह भोंडा मज़ाक बच्चे कितना समझ पाए, परन्तु अब सभी ज़ोर ज़ोर से हँस रहे थे--- बच्चे अपने चुटकुले पर और मनु चुटकुला बनाने वाले की अक्ल पर---कोई भी देश हो या फिर व्यक्ति, किसी की भूख और गुर्बत का मज़ाक उड़ाने का हक किसीको नहीं। "अब मैं भी एक टेलीफोन वाला जोक सुनाऊँगा।"--अचानक ही पीछे की सीट पर बैठा सुन्दर, घुँघराले बालों वाला वह बच्चा मचला और अपनी बड़ी बड़ी आँखों से उनकी तरफ देखकर मुस्कुराने लगा, मानो सुनाने से पहले ही चुटकुले का पूरा आनन्द ले रहा हो---'हाँ, हाँ क्यों नहीं।' इसबार शरारती बच्चे नहीं, खुद मनु बोल पड़ी मानो वह भी बच्चों की उस पार्टी का एक अभिन्न हिस्सा थी।

       " एक सरदार जी पब्लिक बूथ पर फोन करने गए और जाते ही वहाँ बैठे आदमी को दो झापड़ रसीद कर दिए। आदमी भोंचक्का और परेशान था। गुस्से में बोला, यह कहाँ की शराफत है और कैसी अभद्र हरकत है तुम्हारी? तुमने ऐसा क्यों किया?  सरदार जी बोले, तुमने ही तो लिख रखा है, कि कृपया नम्बर घुमाने से पहले दो लगाइए।" अब तो मनु ही नहीं बगल में बैठे दोनों सरदार जी का भी हँसते हँसते बुरा हाल था। उन्हें यूँ लगातार हंसते देख पीछे बैठे सरदार जी भी मूड में आ गए और बोले, ‘ बाश्साओं एक चुटकुला नहीं, सच्ची घटना मैं भी सुनाता हूँ आप सबको। हमारी तहसील फिरोजपुर की सच्ची बात है। पास के गांव के अस्पताल में एक सोनी कुडी नई डाक्टरनी आई। एक मनचला रोज उसकी डिसपैंसरी में आता और ठीक उसके सामने बैठा उसे देखता रहता और फिर बिना कोई मर्ज बताए, बिना दवा मांगे, चला भी जाता। पूरा हफ्ता यूँ ही निकल गया। डाक्दरनी परेशान हो गयी। एक दिन पूछ ही बैठी तुम क्या रोज-रोज बस मुझे यूँ घूरने के लिए ही यहां आते हो, और घंटों बैठे घूरते रहते हो।  अगर तुमने अपनी हरकत बन्द नहीं की तो मैं अपने सीक्योरिटी गार्ड से तो पिटवाऊंगी ही, साथ में तुम्हें पुलिस को भी दे दूंगी। गांववाला डर गया और हाथ जोड़कर बोला-डाक्दरनी जी, गुस्से क्यों होती हो, आपने ही तो बाहर लिख रखा है देखने का समय सुबह दस से एक बजे तक।‘     

इसी तरह से हँसी खुशी के माहौल में हो-हो की आवाज से गूँजता जहाज रन वे पर धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था। कुछ घंटों की ही तो उड़ान है वक्त चुटकियों में ही निकल जाएगा, मनु ने सोचा और सामने रखी सुरक्षा पत्रिका उठाकर पलटने लगी।

       जहाज अभी मुश्किल से रनवे को ही छोड़ पाया था कि मनु की आँखों को कुदरत ने एक और डरावना सपना दिखलाना शुरू कर दिया। दुर्भाग्य ने एकबार फिरसे मनु को घेर लिया था और इस बार तो सामने सुरक्षा पेटी बाँधे बैठी एयर होस्टेस का चेहरा तक, पूरी तरह से सफ़ेद पड़ चुका था।

       "किसी तकनीकी ख़राबी की वजह से जहाज के पिछले दोनों पहिये आग पकड़ चुके हैं और जहाज के हर यात्री को सूचित किया जाता है कि वे इमरजेंसी लैंडिंग के लिए खुद को तैयार कर लें।'

       अचानक ही पटाखे जैसी फटफट की दो आवाजों के बाद पॉयलट की इस आकस्मिक घोषणा के साथ ही पूरे कैबिन में मौत का सा सन्नाटा छा गया। मुर्ग़े की पोजीशन में बैठा हर इंसान ज़िंदगी की दुआ करने लगा। मनु के बग़ल में बैठी उस वृद्ध महिला ने तो ज़ोर ज़ोर से क़ुरान शरीफ़ ही पढ़ना शुरू कर दिया था और सामने बैठा वह बंगाली पैसेंजर हिचकियाँ लेकर तार-तार रो रहा था, अपने पाँच साल के बेटे को बार बार कोसते और मारते हुए।

       " मुझे पता था यही होगा--बहुत ही मनहूस है यह लड़का। जहाँ भी जाता है ऐसा ही होता है। सब मर जाते हैं बस यही बच जाता है। स्कूल की ट्रिप में बस का एक्सीडेंट हुआ, सभी मर गए, सिर्फ़ यही बच गया। कार एक्सीडेंट में माँ और बहन चली गई, बस यह बच गया। आज अब जाने क्या होगा -- पर मैं मरना नहीं चाहता।"        वह कायर बाप बेटे को खुद से दूर धकेलकर, डर से काँप रहा था, " बचा लो भगवान, एक बार जहाज सही सलामत उतर जाए, तो मैं इसे कोलंबो वापस  भेज दूँगा--फिर वहाँ जिए या मरे यह, मुझे इससे कोई मतलब नहीं। नहीं रखना मुझे ऐसे मनहूस लड़के को अपने पास।" दुख की विषम स्थिति में भी मनु के होठों पर एक करुण और विकृत हंसी आ ही गयी,- अपनी ज़िंदगी का सवाल आता है तो कितने डर जाते हैं हम, परंतु दूसरों की बड़ी से बड़ी आपदा कब जरा भी विचलित कर पाती है हमें? बस एक उत्तेजक ख़बर की तरह मज़ा लेकर, भूल जाते हैं सभी कुछ--- यार दोस्तों के साथ एक शाम चाय के प्याले या फ़ोन पर गरमागरम बहस करके!

मनु आश्चर्य और दुख से सहमे बच्चे और विक्षिप्त बाप ही क्या, जहाज के अंदर बैठे और डरे हर इंसान को देखे जा रही थी---कभी आसपास बैठों को तसल्ली देती, तो कभी बस चुपचाप सब समझती और देखती ही रह जाती। बार बार सोचती क्या पता इसी लड़के की किस्मत से ही, जिसे बाप अशुभ और अभागा कह रहा है, बचजाएँ आज हम? इतनी छोटी सी उम्र में ही जब इसने इतने दुख देखे हैं और उनसे उबरा भी है, तो भला

अशुभ और बदक़िस्मत कैसे हो सकता  है यह ? निश्चय ही हमारा ताजीब और लकी चार्म ही बना है आज तो यह। चारों तरफ एक बेतरतीब हलचल मच चुकी थी और जहाज के सुरक्षित उतरते ही, हर व्यक्ति अब तुरंत ही बाहर आने के लिए बेहद उतावला हो चला था --बिना किसी क्रम और दूसरे की तकलीफ़ की परवाह किए बग़ैर ही, एक दूसरे को कुचलता रौंदता हर आदमी झट से बाहर आ जाना चाहता था। सभी जो अभी तक मुर्ग़े की तरह उकड़ू बैठे, आँखें बंद किए अपने अपने अल्लाह, भगवान और पैग़ंबर से इस आपदा से उबरने की दुआ माँग रहे थे, अब अचानक फिर भगवान और इन्सानियत को भूल चुके थे और एकबार फिर बौखलाए, इधर-उधर दिशा-हीन दौड़ रहे थे। सभी को बस बाहर जाने की ही जल्दी थी। बस और कुछ नही। मनु ने आसपास देखते हुए एक गहरी साँस ली-- कितने दुख हैं इस धरती पर, इस ज़िंदगी में--- कितने आँसू हैं चारो तरफ पर पोंछने वाला कोई नहीं! उसे अपने दुख और भय, दोनों पर ही अब बहुत मामूली लग रहे थे। कैसी कैसी त्रासदी की लपटें हैं चारो तरफ, जो आए दिन ही दुनिया और इसमें बसे हजारों इन्सानों को जलाती और भूनती रहती हैं और एक वह है, जो ऐसे आने वाले कल से डर रही थी जो कि अमूर्त है, मात्र एक संभावना मात्र है।  हज़ारों अन्य दुर्घटनाओं और संभावनाओं की तरह ही! कितनी नासमझ है वह भी! क्यों बस एक काल्पनिक हमले के सूचना पत्र मात्र से ही डरी जा रही थी ! खुद पर शर्म आने लगी मनु को,  वैसे भी कल तो तभी सुधर पाएगा, जब बिखरते आज को सहेज पाएँगे हम? मनु भय को झाड़ कर उठ खड़ी हुई।

       अराज़कता बढ़ न जाए इसलिए जहाज़ के कप्तान ने न सिर्फ क्रमबद्ध उतरने की प्रार्थना की सभी यात्रियों से , अपितु बस जरूरी और मूल्यवान सामान लेकर ही उतरने की भी प्रार्थना की। उड़ान पट्टी पर जहाज के न खड़े होने की वजह से आपदकालीन सीढ़ी से उतरना था सबको, जो कि रबर की स्लाइड जैसी थी और ज्यादा बोझ लेकर फिसल पाना संभव नही था उसपर से। पहले प्रथम श्रेणी के यात्री फिर पीछे वाले और अन्त में बीच में बैठे हुए---इसी क्रम से उतरना पड़ा था सभी को।       
   

बग़ल वाली वृद्धा जो डर से हिचकियाँ ले लेकर रो रही थी और बहुत समझाने बुझाने के बाद ही शान्त हो पाई थी, अब पूरी तरह से मनु पर ही आश्रित थी। उसने मनु को पकड़ा तो छोड़ा ही नहीं---इमरजेंसी शूट से भी वह मनु की पीठ पर लदी हुई ही उतरी थी--यह बात दूसरी है कि एयरपोर्ट के लंबे और आरामदेह लाउंज में पहुँचकर उसकी आँखें मनु की बलैया ले रही थीं, हज़ार दुआएँ दे रही थीं।

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                                                                                                                गौरा देवी: चिपकों आन्दोलन की जननी


                                                                                                                                                     दिनेश ध्यानी


 गढ़वाल हिमालय के जिला चमोली के एक गांव रैंणी से शुरू हुए चिपको आन्दोलन ने विश्व समुदाय को जल, जंगल तथा जमीन के प्रति आज से ३४ साल पहले सजग कर दिया था। उस समय न ग्लोबल वार्मिंग का शोर और न नदियां इस तरह सूखनी शुरू हुई थीं लेकिन रैंणी गांव की एक साधारण महिला गौरा देवी ने वनों के महत्व और प्रकृति की पीड़ा को समझ लिया था। उसने सीधे शब्दों में ठेकेदार के आदमी जो रैंणी के जंगल काटने आये थे उनसे कहा कि ये जंगल हमारे देवता हैं इनपर हमारा जीवन आश्रित है इसलिए हम इन्हें नही कटने देंगे और गौरा देवी पेड़ों पर चिपक गई। यही चिपकना चिपको आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब गौरा देवी को भी पता नही था उसका यह चिपकना ही एक दिन विश्व पटल पर इतनी प्रसिद्धि पायेगा। इस आन्दोलन ने विश्व समाज को वनों के प्रति संजीदगी से सोचने का विचार दिया व जागरूक किया।
 आज कई लोगों ने चिपको आन्दोलन के नाम पर अपनी दुकाने खोली हैं कई लोग तो अपने को चिपको आन्दोलन के जनक और न जाने क्या-क्या बता रहे हैं लेकिन सच्चाई यही है कि चिपको आन्दोलन की जन्मदात्री रैंणी गांव की साधारण महिला गौरा देवी ही थीं। यह बात अलग है कि इन्ही लोगों की शाजिसों के कारण गौरा देवी को उतनी प्रसिद्धि नही मिल पाई जिसकी वह हकदार थी। गौरा देवी ने तब चिपको आन्दोलन का अलख जगाया था जब एक आम पहाड़ी महिला से केवल घर-गृहस्थी चलाने की ही उम्मीद की जाती थी।

गौरा देवी का जन्म १९२५ में चमोली जिले के लाता गांव में एक मरछिया परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम नारायण सिंह था। गौरा देवी ने दर्जा पाचं तक शिक्षा ली थी यही शिक्षा उसके साहस तथा उच्च विचारो का सम्बल बनें। मात्र ११ वर्ष की बाल उम्र में गौरा देवी का विवाह रैंणी गांव के मेहरबान सिंह के साथ कर दिया गया। गौरा देवी जब मात्र २२ वर्ष की थी तब उसके पति का देहान्त हो गया था। तब गौरा देवी का इकलौता बेटा मात्र ढ़ाई साल का था। गौरा देवी ने अपने ससुराल में रहते हुए अपने बेटे की परिवरिश करने के साथ-साथ अपने जीवन को जंगल और अपने गांव के लोगों के हितों के प्रति समर्पित कर दिया।
चमोली सीमान्त जिले के निवासी भोटिया लोग तिब्बत के साथ ब्यापार करके जीवन यापन करते थे लेकिन चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने व १९६२ में चीन के साथ भारत के युद्ध के बाद उनका पारम्परिक ब्यापार एक तरह से ठप हो गया।  चीन से सबक लेने के बाद सरकार को सीमान्त जिला चमोली की याद आई और यहां सड़कों का जाल बिछने लगा। जगह-जगह निर्माण कार्य होने लगे। यहां के लोगों के खेतों को काटा जाने लगा तब यहां के लोगों को लगा कि यदि इसी तरह से यहां निर्माण होता रहा तो हमारे जंगल और पर्यावरण तबाह हो जायेगा। इन्हीं बातों को केन्द्र में रखते हुए रैंणी गांव में लोगों ने १९७२ में एक महिला मंगलदल का गठन किया। गौरा देवी चूंकि प्रगतिशील विचारों की निर्भीक महिला थी इसलिए उसे महिला मंगलदल का अध्यक्ष बनाया गया।
सन् १९७३ में स्थानीय कामरेड़ गोविन्द सिंह रावत तथा उनके जैसे अन्य कई लोगों ने जल, जंगल व जमीन सहित जन सरोकारों को लेकर लगातार जनजागरण किया गौरा देवी हमेशा उनके साथ सहयोग करती। इन्ही दिनों ठेकेदार के आदमी यहां के वनों को काट रहे थे। जनवरी १९७४ की बात है रैंणी गांव में जंगल में २,४५१ पेड़ों को काटने की नीलामी होनी तय हुई लेकिन स्थानीय जनता का पला चल गया और उन्हौंने इसका पुरजोर विरोध किया। गौरा देवी ने महिला मंगलदल के माध्यम से उक्त नीलामी का जोरदार विरोध किया फलस्वरूप यह नीलामी रोकनी पड़ी। ठेकेदार के आदमी एक बार तो वापस चले गये थे लेकिन वे उक्त पेड़ों को काटने के लिए पुन: २५ मार्च सन् १९७४ रैणी गांव के जंगलों में पहुंचे। उस दिन रैणी गांव के अधिकांश मर्द चमोली गये हुए थे। गांव में अधिकांश महिलायें ही थीं। उसी रोज इलाहाबाद की साइमन कम्पनी के ठेकेदारों के आदमी अपनी लेबर के साथ रैणी के जंगलों को काटने के लिए यहां पहुंचे। गौरा देवी को जब पता चला तो उसने महिला मंगलदल की सदस्यों को इकट्ठा किया और उन्हें समझाया कि यदि आज हमारे गांव के जंगल यो ही काटे जायेंगे तो कल हमारा क्या होगा? हमारा जीवन इन्हीं वनों पर निर्भर है इसलिए हम कुछ भी करें लेकिन अपने वनों को नही कटने देंगे। साथ की महिलाओं ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं? तो गौरा देवी ने कहा कि हम उन पेड़ों पर चिपक जायेंगी जिन्हें ठेकेदार के आदमी काटने आयेंगे। गौरा देवी इसी संकल्प को लेकर अपनी २१ सहेलियों के साथ जंगल में गई, ठेकेदार के आदमी उस समय अपने लिए खाना पका रहे थे। गौरा देवी ने उन्हें कहा कि अपना खाना खाओ और चुपचाप यहां से निकल पड़ो यहां अगर तुमने पेड़ काटने की सोची तो ठीक नही होगा। ठेकेदार के एक आदमी ने गौरा देवी पर अपनी बन्दूक तान कर कहा कि तुम जैसी महिलाओं को हम रोज खदेड़ते हैं तुम चुपचाप अपने घर चली जाओ। गौरा देवी ने कहा कि ये जंगल हमारे देवता हैं और यदि हमारे रहते हुए किसी ने हमारे देवता पर हथियार उठाया तो फिर तुम्हारी खैर नही। कुछ देर बार जब ठेकेदार के आदमी पेड़ो को काटने पहंुचे तो गौरा ने अपनी सहेलियों सहित पेड़ों पर चिपट कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को काटना। यदि तुमने इन पेड़ों को काटा तो बहुत बुरा होगा। ठेकेदार के आदमी ने गौरा देवी के मुंह पर थूक भी दिया लेकिन अपने इरादे पर अटल यह लौह महिला पेड़ से नही हटी। काफी जिद्दोजेहद के बाद ठेकेदार के आदमियों को जंगल से वापस अपने ड़ेरों में आना पड़ा।
गौरा देवी को शंका थी कि ठेकेदार के आदमी अभी तो वापस चले गये हैं लेकिन वे फिर पेड़ काटने आयेंगे इसलिए उनमें से कुछ महिलायें वहीं जंगल में डेरा ड़ालकर बैठ गई। रैणी के लोगों को जब गौरा देवी के जुझारूपन तथा जंगलों के प्रति उनके लगाव को देखा तो वहां के लोग उनके साथ हो लिए। अगले दिन चमोली से लौटकर गांव के लोगों ने बैठक की और ठेकेदार तथा स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। अन्ततोगत्वा यह तय हुआ कि रैंणी गांव का जंगल नही काटा जायेगा। इस आन्दोलन का ही प्रभाव था कि समूचा प्रशासन हिल गया। और शीघ्र ही ड़ाक्टर वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी बैठा दी गई। रैंणी के जंगल के साथ-साथ अलकनन्दा नदी की बायीं तरफ की सभी नदियों ऋषिगंगा, पातालगंगा, गरूड़गंगा, विरही, नंदाकिनी, के जल-संग्रहण क्षेत्रों और कुंवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा को लेकर गहन चिंतन के बाद उक्त परिक्षेत्र के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर कई सकारात्मक निर्णय लिये गये तथा गौरा देवी की प्रयासों की सर्वत्र प्रशंसा की गई। गौरा देवी चिपको आन्दोलन की जननी बन गई। तब सरकार ने जंगलों को काटने के लिए ठेकेदार प्रणाली को समाप्त करके वन-निगम की स्थापना की।
गौरा देवी के अथक प्रयासों से रैंणी के जंगलो का बचाया जा सका। रैणी के जंगलों को बचाने के बाद गौरा देवी ने रैणी महिला मंगलदल के माध्यम से क्षेत्र के कई गांवों में लोगों को प्रकृति तथा पर्यावरण के प्रति जागरूक किया। उन्हौंने लोगों को बताया कि यदि हम आज अपने वनों तथा पेड़ों का संरक्षण करेंगे तो हमारे साथ-साथ हमारी आने वाली पीढ़ियों को इसका फायदा होगा। गौरा देवी ने वनों की सुरक्षा के अतिरिक्त महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने के लिए कई प्रयास किये। गांव के बच्चों को साक्षर बनाने के लिए कार्य किया। इसी कड़ी में गौरा देवी ने एक प्राथमिक तथा एक मिड़िल विद्यालय की स्थापना भी अपने गांव में की।
शासन-प्रशासन के लोगों ने गौरा देवी के त्याग को भुला दिया और इस लौह महिला को गुमनामी के अंधेरों में छोड़ दिया। यदि गौरा देवी को वनों से संबधिक नीति बनाने तथा जंगलों की सुरक्षा आदि के लिए आगे लाया जाता तो हिमालय की यह लौह महिला अपने अनुभवों तथा भावों के माध्यम से वनों की और अच्छे तरीके से सुरक्षा तथा व्यवस्था आदि के प्रति समाज का और अधिक मार्ग दर्शन कर सकती थी। पहाड़ के जनमानस का जीवन इन्हीं वनों पर आधारित रहा है। अपने जीवन यापन से लेकर अपने मवेशियों की उदर पूर्ति, ईंधन के रूप में लकड़ी आदि के लिए लोग सदा से ही जंगलों पर निर्भर रहे है। यह बात भी सच है कि समय-समय पर यहां के लोगों ने इन वनों को अनावश्यक रूप से हानि भी पहुंचाई यही कारण है कि आज मध्याहिमालय के वनों का क्षेत्रफल घटता जा रहा है। हालात आज काफी खराब हो चुके हैं कि यहां न तो वन बचे हैं और न नदियों में पानी। यहां का वातावरण जो जंगलों के कारण सदा ही सुहावना और वन तथा घन युक्त रहता था आज यहां के पहाड़ों में भी भयंकर गर्मी से दो-चार होना पड़ता है। वनों को हमारे जीवन में कितना महत्व है इस बात को अधिकांश लोग आज भी या तो समझ नही पाये हैं या समझते हुए भी वे लालच व स्वार्थवश इन वनों का विनाश जारी रखे हुए हैं।
गौरा देवी के द्वारा शुरू किया गया चिपको आन्दोलन तो पूरी दुनिया में प्रसिद्धि पा गया लेकिन खुद गौरा देवी गुमनामी के अंधरों में ही रही। गौरा देवी के योगदान को हमारे नीति-नियंताओं ने किसी प्रकार से महत्व नही दिया। जन सरोकारों के लिए सर्मपित यह लौह महिला देहरूप में ६६ वर्ष की उम्र में ४ जुलाई, १९९१ पंचतत्व में विलीन होगई लेकिन उसका विचार और आदर्श आज भी हमारे साथ हैं तथा सदियों तक मानव सभ्यता को जल, जंगल और जमीन से जुड़े सरोकारों के प्रति सजग करते रहेंगे।  गौरा देवी आजीवन सामाजिक सरोकारों के लिए लड़ती रही। उनका सपना था कि हमारा पहाड़ स्वाबलम्बी बने तथा हम अपनी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के साथ-साथ अपने वनों का संरक्षण करें।  गौरा देवी एक विचार है जो आज भी जिन्दा है। गौरा देवी का विचार सदा ही हिमालय सा सन्देश पूरी मानव सभ्यता को देता रहेगा। हिमालय की इस बेटी को इसके त्याग तथा दिशा दर्शन के लिए सदा ही याद किया जाता रहेगा।

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                                                                                                                                                बंगाल के लोकगीत


                                                                                                                                               डॉ.रामचन्द्र ऱॉय    

बाउळ             

भारत के विभिन्न प्रदेशों की भांति बंगाल का भी अपना लोक साहित्य, गीत-नृत्य आदि हैं। बंगाल के विभिन्न प्रकारों के लोकगीतों में बाउल एवं भटियाली लोकगीत प्रमुख हैं। यह लोक गीत बंगाल के उस वर्ग या समुदाय की रचना है जो किसी जाति, धर्म, समाज, शास्त्र-पुराण, लोकाचार आदि को नहीं मानता है। वह केवल महाकवि चंडीदास की उक्ति सबरि उपर मानुष सत्य आर किछु नाइ अर्थात मानव को ही स्वीकारता है।

संस्कृत में एक शब्द बातुल है। बातुल शब्द से बाउल शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। बातुल का अर्थ बाउर, बौरा, वायु  आदि दिया गया है जिसका सामान्य अर्थ पागल बन्धनहीन, मुक्त आदि होता है। इन सब कारणों से बाउल समुदाय के लोग अपने को पागल भी कहते हैं। इसलिए आपस में पुरुष बाउल के लिए खेपा (पागल) एवं महिला बाउल के लिए खेपी (पगली) शब्द भी प्रचलित है। इस प्रकार संस्कृत बातुल शब्द से ही बाउल शब्द की उत्पत्ति हुई है। इस प्रकार इस समुदाय के द्वारा लय, छंद एवं सुर से गायन करने वाला पद ही बाउल गीत है। किंतु बाउल शब्द पागल का द्योतक नहीं है। बाउल से यह अभिप्राय है कि स समुदाय के लोग जाति, धर्म, समाज, शास्त्र-पुराण, लोकाचार आदि का अनुसरण न करके, मुक्त कंठ से मानव की साधना करते हैं। इन लोगों की दृष्टि में मानव ही ईश्वर है। ये लोग मानव शरीर के अन्दर ही ईश्वर को ढूँडने का प्रयास करते हैं। प्रस्तुत गीत में बाउल की जाति, धर्म, वेशभूषा, खानपान आदि का परिचय मिलता है-

वेद छाड़ा फकिरे एइ धारा।।

    माने ना केताब-कोरान नबीर तरीक छाड़ा।

    मसरेक तरीक धरे ,चन्द्र-सूर्य पूजा करे,

पंचरस साधन करे , चन्द्र भेदी यारा।।

सरल चन्द्र, गरल चन्द्र, रोहिणी चन्द्र धारा

   रस-बीज मिल करे पार करछे तारा।।

सब चूल माथाय जटा, काय सिद्दि भाँग घोंटा,

कथा कय एलो मेलो, बुझा याय ना सेटा ।।

तादेर भंगी देखे लोक तुले याय गानेर बड़ घटा।

ए दीन रसिक बले बेतरीक से आउल-बाउल नेड़ा।

अक्षय कुमार दत्त ने भारत वर्षीय उपसक सम्प्रदाय पुष्तक में बाउल को एक धार्मिक सम्प्रदाय कहा है। इसका जन्म बंगाल में ही मानते हैं। इनकी वेशभूषा के संबंध में कहा है पीत वस्त्र धारण करके हाथ में एकतारा लेकर अपने धर्म एवं संगीत की चर्चा करते हैं। बाउल आत्मभोला गृहत्यागी वैरागी मानव होते हैं। ये लोग गीत गा-गाकर मन के मानव का अनुसंधान करते हैं। बाउल माधुकरी कर्म से प्राप्त अन्न से जीविकोपार्जन करते हैं। माधुकरी का अर्थ भिक्षाटन होता है। किंतु बाउलों की भाषा में माधुकरी का अर्थ कर अथवा हाथ से मधु रूपी अन्न ग्रहण करना होता है। बाउल बाहर से पीत वस्त्राधारी वैरागी एवं अंदर से प्रेमिक होते हैं।

वैष्णव सहजिया मतालम्बी की साधना पद्धति में साधन-संगिनी की प्रधानता है। बाउल धर्म-साधना में साधन-संगिनी का स्थान है। किंतु यह साधन-संगिनी गृही की भांति यौनाचार के लिए नहीं होती है। बल्कि मिथुनात्मक योग-साधना के अंग के रूप में पुरुष-प्रकृति (नारी-पुरुष) के संगम से साधना के लिए होती है। सहजिया वैष्णव धर्म मतालम्बियों के लिए पुरुष-नारी का यौन मिलन धार्मिक रूप से वैध है। वैष्णव सहजिया के साथ एक श्रेणी के मुसलमान फकीर के मेल-मिलाप से बाउल समुदाय का जन्म हुआ है जो वेद-कुरान, मन्दिर-मसजीद, साधन-भजन, व्रत-नमाज इत्यादि शास्त्रीय दार्मिक रीति-रिवाजों का विरोध करते हुए अपने आराध्य देव को पाने के लिए साधना करते हैं। नलोगों का की लिखित शास्त्र नहीं है। इनके धर्म का उद्बावन मौखिक गीतों के माध्यम से ही होता है। बाउल मतवाद एक निरक्षर समुदाय की सृष्टि एवं अनुसृत से सम्पूर्ण रूपेण लौकिक धर्म मत है। किंतु बाउल सामाजिक आचार-विचार, वेद-कुरान के विरोधी होते हुए भी नास्तिक की भांति व्यवहार नहीं करते हैं। ये लोग गुरुवादी, दैहिक एवं अद्यात्मवादी धर्म-साधना के साथ-साथ लौकिक धर्म का भी पालन करते हैं। बाउलों ने वेद-कुरान आदि को अस्वीकार करते हुए हिन्दू एवं मुसलमान को एक मंच पर लाने का प्रयास किया है। जिस दिन से बंगाल में हिंदू-मुसलमान का मिलन हुआ है उस दिन से बंगाल में बाउल समुदाय का आत्म-प्रकाश हुआ है। किंतु यह कार्य एक दिन में सम्भव नहीं हुआ है। बल्कि सहजिया मतालम्बी वैष्णव-वैरागी तथा सूफी मुसलमान फकीरों के ऊपर समाज के उच्च श्रेणी के लोगों की उदासीनता, अवहेलना, तिरस्कार से प्रताड़ित होकर एकसूत्र में बंधने के लिए बाउल समुदाय का जन्म हुआ है। इसका उदाहरण इस गीत में मिलता है-

वेदे कि तार मर्म जाने

ये रूप साँइर लीला-खेला

        आछे एइ देह भुवने।।
पंचतत्व वेदेर विचार

पंडितेरा करने प्रचार,

मानुष तत्व भजनेर सार

वेद छाड़ा वै रागेर माने।।

गोले हरि बलले कि हय,

निगूढ़ तत्व निराला पाय,

नीरे क्षीरे युगल हय

      साँइर बारमखाना सेइखाने।।

पइले कि पाय पदार्थ

आत्म तत्वे याराभ्रान्त

लालन बले साधु मोहान्त

सिद्ध हय आपनार चिने।

बाउल समुदाय का अविर्भाव अठारहवीं शती का मध्य माना जाता है। इस दारा के प्रवर्तकों में बाउल फकीर लालन शाह (सन 1774-1890) का नाम सर्वप्रथम आता है। इनके पूर्व बाउल साहित्य की रचना हुई है इसका उल्लेख नहीं मिलता है। बाउल गुरुवादी धर्ममत है। गुरु के माध्यम से ही इसका मिलन घटा है। इसका उल्लेख आचार्य क्षितिमोहन सेन की पुष्तक बांग्लार बाउल में मिलता है। बाउलों में फकीर लालनशाह प्रतिभावान कवि थे। इन्होंने लगभग अढ़ाई हजार बाउल गीतों की रचना की है। ये स्वयं इन गीतों को गाते भी थे। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी इनके गीतों से प्रभावित हुए थे । कवीन्द्र ने लालन के गीतों का संग्रह भी किया था। इन्होने बाउलगीत के सुरों में गीत एवं कविताएँ भी रची हैं। कबीर की भाँति लालन हिन्दू थे या मुसलमान इसमें मतभेद है।  इसका विवरण लालन के इस गीत से मिलता है-

         सब लोके कय लालन कि जात संसारे

लालन कय, जेतेर कि रूप, देखलाम ना ए नजरे।।

          छुन्नत दिले हये मुसलमान,

           नारी लोकेर कि हय विधान?

वामन यिनि पैतार प्रमाण

             वामनि चिनी कि धरे।।

केओ माला, केओ तसबि गलाय,

जाइते कि जात भिन्न बलाय

              जेतोर चिह्न रय कार रे।।

गर्ते गेले कू पजल कय,

गंगाय गेले गंगाजल हय,

मूले एक जल, से ये भिन्न नय

           भिन्न जानाय पात्र- अनुसारे।

जगत बेड़े जेतेर कथा

लोके गौरव करे यथा तथा,

लालन से जेतेर फाता

बिकियेछे सात बजारे।।

बाउल फकीर लालनशाह का जन्म बाँग्लादेश के कुष्टिया जिले के भाँडरा गाँव में एक हिन्दू परिवार के कायस्थ जाति में हुआ था। अल्पावस्था में ही तीर्थ-यात्रा के पथ पर वसन्तरोग से आक्रान्त होने पर अपने ही परिवार से तिरस्कृत हो गये थे। इन्हें फकीर सिराज साँइ के स्नेहाश्रय से जीवनदान मिला था। इसके बाद लालन को अपने लोगों के यहाँ स्थान नहीं मिला। इन्होंने सिराज साँइ को गुरु मानकर उनसे दीक्षा ग्रहण की थी। तदुपरान्त धर्म-साधना की ओर प्रवृत्त हुए। लगभग एक सौ वर्ष तक जीवित रहकर बाउल समुदाय का नेतृत्व दिया था एवं दो हजार शिष्य और लाकों बक्त बनाए थे। इन्होंने बाउल धर्म एवं साधना आश्रित गीतों की रचना करके एवं गा-गाकर बाउल मतवाद का सर्वप्रथम सामाजिक एवं सास्कृतिक नींव डाली। लालन निरक्षर थे। इन्होंने हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति को लेकर इस प्रकार के गीतों की रचना की है जिसकी तुलना अन्य गीतकारों से नहीं की जा सकती है। इसका कारण यह हो सकता है कि हिन्दू-परिवार में जन्म-ग्रहण के कारण हिन्दू-संस्कृति तथा बाद में फकीरी मत में दीक्षित होने के कारण इस्लामी संस्कृति का ज्ञान अर्जित किया था। इसलिए लालन के गीतों में दोनों संस्कृतियों का संगम है। इसलिए हिन्दू वर्ग से आनेवाले को बाउल एवं मुस्लिम वर्ग से आनेवाले को फकीर, दरवेश आदि कहा जाता है।

बंगाल के अत्यंत ही सामान्य मानव के हृदय में बाउल भाव का पोषण होता है। बाउल लोगों के दिल को जीतने का मर्म भी जानता है. ये लोग शास्त्राचार, लोकाचार को तिलांजली देकर मानव आचार-विचार पर ही अधिक बल देते हैं। ये लोग काया (देह) की आद्यात्मिक साधना करते हैं। इसलिए मानव देह, मानव जीवन, मानव गुरु, मानव आत्मा, मानव धर्म, मानव बोध आदि के संबंध में कौतुहल उत्पन्न करते हैं एवं इन सब को अत्यंत मर्यादा भी देते हैं। नलोगों की मान्यता है कि धर्मशास्त्र के कारण ही जाति-जाति, वर्ण-वर्ण में विभेद है। जाति, वर्ण, वित्त भेद मुक्त मानव जीवन एवं मानव समाज की स्थापना ही बाउलों की कामना है। इसका परिचय स गीत में मिलता है-

एमन समाज कबे गो सृजन हबे

ये दिन हिन्दु-मुसलमान बौद्ध-खृष्टान जाति-गोत्र नाहि रबे।

शोनाय लोभेर बुलि

नेबे ना केओ काँधेर झुलि,

इतर आतरफ बलि

दुरे ठेले ना देबे।।

आमिर फकीर हये एक ठाँइ

सबार पाओना पाबे सबाइ,

आशरफ बलिया रेहाइ,

भवे केओ येनाहि पाबे।।

धर्म-कुल-गोत्र-जातिर,

तुलबे ना गो जिगिर,

केंदे बले लालन फकिर

केबा देखाये देबे।

बाउलों की मान्यता है कि मानवीय प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति में किसी प्रकार की बाधा नहीं है। मानव के मध्य ही मानुष रतन (मानव रत्न) है। इसलिए मानव के मध्य ही उन्हें ढूँढते हैं। लालन के इस गीत में मानव जीवन के महत्व को दिखाया गया है-

एमन मानव-जनम आर कि हबे?

मन या कर त्वराय कर एइ भावे।

अन्तर रूप सृष्टि करलने साँइ

शुनि मानवेर तुलना किछुर नाइ

देव-मानवगण करे अराधन जन्म निते मानवे

कत् भाग्यरे फल ना जानि,

मनेर पेयेछ एइ मानव तरणी,

येन मरा ना डोबे।।

एइ मानुषे हवे माधुर्य भजन,

ताइते मानुष रूप एइ गठिल निरंजन

एबार ठकिले आर ना देखि किनार,

लालन कय कातर भावे।।

बाउल गीत एक समुदाय विशेष के गीत होने के कारण ही इस गीत को गाकर अपने धर्म का पालन करते हैं। बाउल गीत की मुख्य विषय वस्तु एक धर्म तत्व एवं उस धर्म साधना का क्रिया कलाप है। बाउल गीत मानव-साधना केन्द्रित गीत है। इनलोगों की दृष्टि में इसकी उपलब्धि के लिए पुरुष-प्रकृति (नारी-पुरुष) का संगम आवश्यक है। क्योंकि प्रेम के माध्यम से ही मानव रूपी अचिन पाखी, अधर मानुष, मनेर मानुष को पाया जा सकता है। इसके लिए देहिक साधना की आवश्यकता है। यह दैहिक साधना प्रकृति-पुरुष (नारी-पुरुष) के क्रिया कलापों से ही संबव है। यही बाउल गीत का उपादान है। 

 

                       

      भाटियाली

बाउलगीत भांति बंगाल का एक अन्य लोकप्रिय लोकगीत भाटियाली है। बंगाल भारत का एक नदी प्रधान देश है। भारत की अधिकांश नदियां बंगाल में आकर हिन्द महासागर से मिलती हैं। इसलिए बंगाल के लोग नदी मार्ग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर नाव से आना जाना करते रहते हैं। इसलिए नाव खेनेवाले माझी, मल्लाह या केवट नाव चलाते समय अपने हृदय के उद्गार को सुर देकर जो भाव प्रकट करते हैं, वही सुरबद्ध भाव भाटियाली है। भाटियाली गीत ऊँचे कंठस्वर एवं देर तक स्वर को आरोह-अवरोह करने वाले सुर ही भटियाली है। यही भाटियाली लोकगीत की विशेषता भी है।

भाटियाली नामकरण के संबंध में विभिन्न मत प्रचलित हैं। कुछ लोगों का कहना है कि बंगाल के एक अन्य लोकगीत भावाइ का ही रूप भटियाली है। किंतु बंगाल के लोक साहित्य के विशेषज्ञ आशुतोष भट्टाचार्य ने बाँग्लार लोक साहित्य पुष्तक में भाटियाली के संबंध में कहा है –सामान्यतः लोगों का विश्वास है कि भाटि अँचल के संगीत होने के कारण ही इसका नाम भाटियाली है। बाँग्लादेश की निम्नभूमि अर्थात् वह अँचल जो वर्षा ऋतु में वर्षा के जल से प्लावित हो जाता है वही भाटि के नाम से परिचित है। फलतः इस अंचल में गानेवाले गीत ही भाटियाली हैं। हो सकता है एक ओऱ नदी और जलमग्न भूमि का विस्तार एवं दूसरी ओर इसकी मंथर गति के प्रवाह के संयोग से ही भाटियाली का उद्भव हुआ हो। इस स्थिति में हो सकता है माझी, मल्लाह अथवा केवट को नाव खेने के समय, अवसर के क्षण भाटियाली के लिए अनुकूल समय हो। इसलिए नदी की भाटि में नाव बहाकर एक हाथ से बैठा स्थिर चित्त से पकड़े हुए माझी, मल्लाह अर्थात् केवट आदि जो गीत गाते हैं वही भाटियाली गीत के रूप में परिचित है। हिन्दी शब्द सागर में भाटा शब्द का अर्थ इस प्रकार दिया गया है-पानी का उतार की ओर जाना, समुद्र के चढ़ाव का उतरना एवं ज्वार का उलटा। इन अर्थों में आशुतोष भट्टाचार्य की व्याख्या से साम्य है। भाटि का अर्थ नदी के स्वाभाविक स्रोत की ओर बहना है। यही नहीं  बाँग्लादेश का जो अँचल वर्षा ऋतु में जलमग्न हो जाता है, उन अंचलों को भाटि भी कहा जाता है। बाँग्लादेश की निम्न भूमि को भाटि कहते हैं। बाँग्लादेश में वर्षाऋतु में केवल गांव ही बचा रहता है। इसलिए यातायात के साधन के रूप में नाव छोड़, कोई दूसरा साधन नहीं होता है।

भारत की तीन प्रमुख नदियां गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जो बाँग्लादेश में पद्मा, मेघना, यमुना आदि के नाम से परिचित हैं। वह बाँग्लादेश होकर ही हिन्द महासागर या बंगोपसागर में आकर समाहित होती हैं। इसलिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमनागमन तथा व्यापार के लिए जलमार्ग से ही यातायात करना पड़ता है। अतः भाटि अर्थात निम्नभूमि के जलमार्ग से नाव खेने के समय मल्लाहों या केवटों के लयात्मक कंठस्वर ही भटियाली के नाम से परिचित हैं।

भटियाली गीत की विशेषता यह है कि वह करुण रस प्रधीन गीत है। भटियाली गीत की विशेषता यह है कि यह करुण रस प्रधान गीत है। भटियाली गीत की विषय-वस्तुएँ लौकिक प्रेम एवं राधा-कृष्ण से संबंधित लीलापरक होती हैं।

भटियाली व्यक्ति केन्द्रित एकक कंठस्वर प्रधान गीत होने के कारण , इस गीत में ताल नहीं होता है और न ही किसी प्रकार के वाद्ययंत्र की आवश्यकता होती है। गायक कुछ एक शब्दों का उच्चारण करते हुए स्वरों को खींचता रहता है। यह ऊंचे स्वर से आरंभ होकर क्रमशः मन्द स्वर की ओर आकर रुकता है। भटियाली का लौकिक प्रेम से संबंधित एक गीत, उदाहरण स्वरूप दिया जा रहा है जिसमें केवट अपनी प्रेम व्यथा को प्रकट किया है कि तुमसे प्रेम करके मैने गलती की है। मैं पहले बहुत सुखी थी किंतु जब से मैंने तुमसे प्रेम किया है तबसे मैं इस प्रेम की ज्वाला से जल रही हूं-

आमार सरल प्राणे एत दुःख दिले।।

सहे ना यौवन ज्वाला,

प्रेम ना करे छिलाम भालो गो।

दुइ नयने नदी नाला तुइ बन्धु बहाइले।।

आगे तो ना जानि आमि,

एत पाषाण हइबे तुमि गो।

बइसे थाकताम एकाकिनी, कि इहते प्रेम ना करिले।।

तुमि बन्धु ताके सुखे,

मरब आमि देखुक लोके गो

अभागिनीर मरणकाले आइस खबर पाइले।।
सी प्रकार इस गीत को देखा जा सकता है जिसमें मल्लाह को संबोधित करके कहा गया है – ओ भले नाविक तुम अपने सोने की नाव को बहाकर किस देश में जाते हो? कहाँ तुम्हारा घर है? तुम इस घाट पर नाव को लगाओ और मुझे भी साथ ले चलो। पुरबिया हवा से बादाम ( पीले रंग का पाल) रुक रुक कर उड़ रहा है। मैं पाल के रंग को देखकर, पागल होकर, घाट के किनारे बैठकर रो रही हूँ-

आरे ओ, ओरे सुजन नाइया-

कोन वा देशे याओ रे तुमि, सोनार तरी बाइया।।

कोन वा देशे बाड़ी तोमार, कोन वा देशे याओ।।

एइ घाटे लगाइया नाओ, आमार लइया याओ।।

सोनार तरी, रंगेर बादाम, दिवाछ उड़ाइया।

पुबाली बातासे बादाम उड़े रइया रइया।।
रंग देखिया एइ अभागी कान्दे घाटे बइया।

सोतेर टाने कलसी आमार गेल रे भसिया।।

आइस आइस सुजन नाइया, कलसी देओ धरिया।।

कि धन लइया याइब घरे, शून्य आमार हिया।।

इसी प्रकार कोकिल के उपालंभ से यह गीत संबंधित है-

ओ कोकिला रे---

आमार निभानो आगुन ज्वले मोर स्वरे।।

देखले तोर रूपेर किरण,

मने पड़े बन्धुर वरण।

आमार दुटो मनेर कथा शोन, कोकला रे।।
पड़ले नयन काल रूपे

पराण आमार उठे क्षेपे।

आमार ए व्यथा कि बुझबे अपरे।।
बंगाल गौड़ीय वैष्णवता का केन्द्र रहा है। पलस्वरूप इसका प्रभाव यहां के सामान्य जन पर पड़ना स्वाभाविक ही है। भाटियाली सुर में भी राधा-कृष्ण से संबंधित गीत हैं। कृष्ण की अनुपस्थिति में राधा की क्या स्थिति है? उदाहरणस्वरूप, राधा-कृष्ण से संबंधित इस गीत को देखा जा सकता है-

कृष्ण हारा हइलाम गो,

कृष्ण हारा हइया कान्दछि गो वने निशि दिने

ओ गो, आमार मत दीन दुःखिनी,

के आछे आर वृन्दावने।।

सखी गो, यार ये ज्वाला सेइ जाने

 अन्य कि आर जाने

आमार अरण्ये रोदन करा,

कार काछे कइ, केवा शोने।।

सखी गो, नयन दिलाम रूपे नेहारे

प्राण दिलाम तार सने।

ओ गो, देह दिलाम, अंगे वसन,

मन दिलाम तार श्रीचरणे।।

सखी गो, कृष्ण सून्य देह गो आमार,

काज कि ए जीवने।

अधीन कालाचाँद, कय,

राइ मरिल श्याम बिहने।।
बंगाल के लोकजीवन पर बाउल गीत का बहुत ही प्रभाव पड़ा है। यही नहीं कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ की रचनाओं पर भी बाउल गीत और विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा है। फलस्वरूप माझी मल्लाहों को बुल की विचारधाराओं का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। भाटियाली सुर में आध्यात्मिक एवं काया अथवा दैहिक संबंधी इस गीत को देखा जा सकता है। गीत मन के मानुष को ढूंढने से संबंधित गीत है-

आमार मनेर मानुष, प्राण सइ गो

पाइगो कोथा गेले।

आमि याबो सेइ देशे

से देशे मानुष मिले।।

यदि मनेर मानुष पेतेम तारे हद मझारे

बसाइताम अति यतन कइरे।.।

आमि मन-सुते माला गेंथे

दिताम ताहार गले।।

भेवे छिलाम मने मने, से याबे ना आमार छेड़े,

आरे आपन बइले।

से ये फाँकि दिये गेलो चले,

ऐ कि छिल मोर कपाले।।

इसी प्रकार यह गीत दैहिक अथवा काया संबंधित है---

आरे मन माझि, तोर बैठा नेरे,

आमि आर बाइते पारलाम ना।

आमि जनम भइरा बाइलाम बैठा रे

तरी भाइटाय रय, आर उजाय ना।।

ओरे जंगी-रसी यतइ कसि,

ओ रे हाइलेते जल माने ना।

नायेर तली खसा गुरा भांगारे,

नाव तो गाव-गयनि माने ना।।

भाटियाली गीत माझी, मल्लाहों के कंठस्वर होते हुए भी लौकिक, लीलापरक, अद्यात्मिक एवं काया ( देहिक संबंधी गीत भी मिलते हैं। बंगाल के लोक जीवन पर बाउल , गौड़ीय सहजिया वैष्णव का प्रभाव इतना अधिक पड़ा है कि इसका चित्रण बंगाल के साहित्य में सर्वत्र दिखाई देता है। भाटियाली गीत की विशेषता यह है कि इसकी भाषा सहज सरल होती है । किंतु सामान्य जन को इसे समझने में इसलिए कठिनाई होती है कि इसके गानेवाले श्रमजीवी निरक्षर लोग होते हैं जो कायिक परिश्रम से वि8म के क्षण पने हृदय के उद्गार को सुरों के माद्यम से व्यक्त करते रहते हैं। इस गीत को गाने वाले बाँग्लादेश की निम्नभूमि में रहनेवाले लोग होते हैं जो सामान्य बोलचाल की भाषा से कुछ भिन्न उच्चारण करते हैं।

इस प्रकार अपने अद्भुत गायन शैली के कारण, बंगाल के लोकप्रिय लोकगीतों में बाउल भाटियाली विशिष्ट लोकगीत हैं।   

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                                                                                                                                                      लोक काव्य विरहा


                                                                                                                                                      -चन्द्रदेव यादव



बहुत पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द ने अपने जातीय संगीत नामक लेख में लिखा था कि हमें जन सामान्य को शिक्षित और जागरूक करने के लिए लोक काव्य-रूपों का सहारा लेना चाहिए। इन काव्य रूपों -कजरी, ठुमरी, चैता, बिरहा आदि-के द्वारा शिष्ट साहित्य की अपेक्षा बेहतर ढंग से जनता को विवेकशील बनाया जा सकता है।

दुर्भाग्य से साहित्य में इस तरह की रचना नहीं हो सकी और जनता को दूसरे-दूसरे माध्यमों से शिक्षित और जागरूक बनाने की कोशिश की जाती रही। आज भी सरकारी स्तर पर लोक काव्य-रूपों और लोक नाट्यं को नजरन्दाज कर जनसंख्या वृद्धि, परिवार कल्याण, पर्यावरण प्रदूषण या टीकाकरण के प्रति जागरूक करने के लिए तरह-तरह के प्रोग्राम दिखाए जा रहे हैं। परिणाम ढाक के तीन पात।

भारतेन्दु ने जिस समय लोक-काव्य रूपों के द्वारा साहित्य-सर्जना पर बल दिया था, वह नवजागरण का जमाना था। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए जनता को जागरूक करना या अपनी सामाजिक स्थितियों और रूढ़ियों-परंपराओं से मुक्ति हेतु लोक साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, भारतेन्दु को यह मालूम था। अंधेर नगरी ऐसा ही लोकधर्मी नाटक था जिसके द्वारा उन्होंने काला शाषन की अंतर्बाह्य स्थितियों को जनता के सामने प्रस्तुत किया। बाद में ऐसे नाटकों की बहुत कम रचना हुई।

जहां तक लोककाव्य विरहा का सवाल है, इससे अन्य प्रचलित काव्य-रूपों की तरह ही जनजागृति का संदेश दिया जा सकता है। बिरहा चूंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिणी-पश्चिमी बिहार में गाई जाने वाली लोकगाथा है, इसलिए देश की बहुत बड़ी आबादी को इसके जरिए समाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक समस्याओं से अवगत कराया जा सकता है।

बिरहा पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिण-पश्चिमी बिहार के यादवों का जातीय संगीत है। यह लोककाव्य पशुचारण सभ्यता की देन है। आभीर जाति ने, जो प्रकृति से स्वच्छंद व स्थान विशेष से अनासक्त थी, इस काव्य रूप को जन्म दिया। तब से लेकर अब तक अत्यंत लोकप्रिय काव्य रहा है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि एक फिल्म निर्माता ने अपनी भोजपुरी फिल्म सोनवां क पिंजरा में दो श्रेष्ठ विरहा गायकों से गीत गवाया। यही नहीं विरहा के राष्ट्रीय गायक हीरालाल यादव विरहा गायन के लिए जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से पुरुस्कृत हो चुके हैं।

इसकी लोकप्रियता को देखकर ही आज दूसरी जातियां भी इसे अपना रही हैं, अन्यथा उच्च जातियां इसे गंवारों का गीत कहकर इसकी उपेक्षा करती थीं। चूँकि इस काव्य से जुड़े लोग व्यावसायिक हो चुके हैं और इससे ख्याति और पैसा दोनों ही प्राप्त होते हैं, इसलिए निम्न जातियों के लोग ही नहीं, ब्राह्मण और क्षत्रिय भी विरहा गायन की ओर उन्मुख हुए हैं।

यही नहीं, विरहा गायन के प्रति महिलाओं का भी रुझान बढ़ा है। गीता भारती, पूनम यादव, कविता कृष्णमूर्ति, गीता त्यागी समेत अनेक महिलाएँ विरहा गायन के क्षेत्र में उतर चुकी हैं। विदित हो कि इससे पहले विरहा गायन के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका नगण्य थी। महिला बिरहा गायिकाएं सार्वजनिक दंगलों में पुरुष गायकों का डटकर मुकाबला कर रही हैं। वे बिरहा के मर्म को अच्छी तरह जानती हैं और बिरहा की कला से पूरी तरह वाकिफ हैं। बिरहा की लोकप्रियता और उसके उज्ज्वल भविष्य का यह शुभ संकेत है। बिरहा की उत्पत्ति ’बिरह ‘ से हुई है, किंतु उसमें केवल बिरह की ही अभिव्यक्ति नहीं हुई है। बिरहा में सभी तरह के जीवनानुभव व्यक्त हुए हैं। बिरहा के दो रूप हैं-प्राचीन बिरहा यानी मुक्तक और आधुनिक बिरहा यानी गाथापरक लोकगीत।पुरानी बिरहा में चार चरण होते हैं। इसलिए इसे ‘ चरकड़िया‘  भी कहा जाता है। इसका एक नाम ‘ खड़ी बिरहा‘  भी है। खड़ी बिरहा एक मुक्तक छंद है। बिरहा चूँकि लोक काव्य है, इसलिए इसके प्रत्येक चरणों में समान मात्राएँ या वरण नहीं होते हैं। फिर भी बिरहा के प्रथम और तृतीय चरण में 15-16 वर्ण तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 10-10 वर्ण होते हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य हैः

हुरवा नियर तोर जुरवा रे गोरिया

पुअवा नियर तोर गाल।

पनवां नियर बाड़ पतरी रे गोरिया

लोटवा नियर तोर भाल।

लेकिन कुछ बिरहों में इस नियम का पालन नहीं किया गया है। डॉ. ग्रियर्सन ने बिरहा में यति पर खासतौर से ध्यान देते हुए उसके चारों चरणों के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित किए हैः

प्रथम चरणः 6+ 4+ 4+2=16 वर्ण

द्वितीय चरणः   4+4+3 =11 वर्ण

तृतीय चरणः 6+ 4+4=2= 16 वर्ण

 चतुर्थ चरणः 4+4+4+4=12 वर्ण

दरअसल बिरहा का लिखित रूप न होने के कारण उसमें इस प्रकार की असमानताएं दिखाई देती हैं। गायक अपनी सुविधानुसार एकाध वर्ण घटा-बढ़ाकर गा देता है, क्योंकि उसे छंद की जानकारी नहीं होती। डॉ. ग्रियर्सन ने भी माना है कि बिरहा में पिंगल शास्त्र के नियम शिथिल पड़ जाते हैं। वस्तुतः बिरहा का कवि भावावेश में बह जाता है और उसकी अनुभूति पहाड़ी नदी की तरह प्रवाहित होने लगती है। यही कारण है कि बिरहा में कहीं भी कृतिमता नहीं दिखाई पड़ती है। इसीलिए उसकी सीधी, किंतु गहन अनुभूति अत्यंत मार्मिक होती है। डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने इसीलिए बिरहा को बिहारी के दोहों की तरह सीधा चोट करने वाला बताया है।

आज की बिरहा प्राचीन बिरहा से बिल्कुल भिन्न है। खड़ी बिरहा मुक्तक है और स्वतंत्र रूप से तथा ‘ लोरकी ‘  के बीच में गाई जाती है, किंतु आज की बिरहा में ऐसा नहीं है। लम्बी और कथात्मक होने के कारण इनमें अनेक चीजों का समावेश होता है। इसमें खड़ी बिरहा के लिए कोई जगह नहीं है। चूंकि ‘ लोरकी‘ भी कथात्मक है, इसलिए बिरहा में उसके गाने का सवाल ही नहीं उठता। आधुनिक बिरहा के प्रचलन के कारण खड़ी बिरहा और लोरकी जैसे सशक्त लोककाव्यों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। अब न तो इनके गाने वाले हैं और न सुनने वाले। यही हाल रहा तो खड़ी बिरहा और लोरकी सुदूर अतीत की चीजें बनकर रह जाएंगी।

आधुनिक बिरहा किसी न किसी कथा पर आधारित होती है. ये कथाएं पौराणिक, ऐतिहासिक या सामाजिक होती हैं। बिरहा लेखक की रुझान मुख्यतः सनसनीखेज, और रोमांटिक कथाओं की ओर ज्यादा होती हैं।समकालीन समस्याओं को वह इन्ही कथाओं के जरिए प्रस्तुत करता है। अखबारों या पत्रिकाओं में छपने वाली दहेज उत्पीड़न, अंतर्जातीय विवाह, विश्वासघात, जातीय संघर्ष आदि घटनाओं को वह बिरहा का विषय बनाता है और अपनी कल्पना से उसमें तरह-तरह के रंग भरता है। बिरहा लेखक और बिरहा गायक दोनों ही क्रांतिकारी होते हैं, किंतु उनकी क्रांतिकारिता बिरहा लेखन और बिरहा गायन तक ही सीमित रहती है। इस क्रांतिकारी भावना का उनके जीवन से बहुत कम संबंध रहता है।

बिरहा का एक निश्चित शिल्प है। उसके कई विभाग हैं। बिरहा लेखक उसी शिल्प के आधार पर किसी कथा को काव्यमय बनाता है। सर्वप्रथम बिरहा में भूमिका के रूप में मुक्तक छंद का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद ग़ज़ल और ग़ज़ल के बाद आवश्यक धुनों का प्रयोग किया जाता है। ये धुनें लोकगीतों की या फिल्मी होती हैं। बिरहा के बीच में टेरी होती है। टेरी, यानी बिरहा का केन्द्रीय भाव। पृथ्वीराज और संयोगिता प्रणय पर आश्रित बिरहा की टेरी दृष्टव्य हैः

नैनों में पृथ्वीराज बस गए।

छत्री बंस विभूषण दिल्ली के सरताज

नैनों में पृथ्वीराज बस गए।

बरहा की टेरी और दूसरे गीतों की टेरी में अंतर होता है। गीतों की शुरुवात टेरों से होती है और हर अंतरे के बाद उसकी पुनरावृत्ति होती है, किंतु बिरहा में टेरी बीच में होती है। टेरी के बाद पुनः छंद या कड़ी का प्रयोग किया जाता है। कड़ी को अधर या सीधा-पलट छंद में भी लिखा जाता है। छंद या कड़ी के बाद पुनः कई धुनों का प्रयोग किया जाता है। धुनों के पश्चात पहपट का नम्बर आता है। बिरहा में इस धुन के प्रवर्तक पंधारी चचा हैं जिन्हें विंध्यवासिनी देवी का आशीर्वाद प्राप्त था और जो तत्काल बिरहा बनाकर गाने में सिद्धहस्त थे। खड़ी धुन के बाद बिरहा में ‘ छाप‘ का प्रयोग किया जाता है जिसमें बिरहा का कवि अपने अखाड़े के प्रवर्तक का नाम बहुत श्रद्धा के साथ लेता है। वह स्वयं अपने और गायक के नाम को भी विरहा में जोड़ देता है। संक्षेप में बिरहा का यही शास्त्रीय रूप है।

बिरहा चूंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और दक्षिण-पश्चिमी बिहार की एक लोकप्रिय काव्य-विधा है., इसलिए इस क्षेत्र में बिरहा गायकों की भरमार है। वे बिरहा प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। यही नहीं, उत्तर प्रदेश और बिहार से दूर बंबई-कलकत्ता में भी बिरहा दंगलों का आयोजन होता है। बिरहा दंगल के आयोजकों से उन्हें अच्छा-खासा पैसा मिलता है। बिरहा गायन के लिए निर्धारित राशि के अलावा उन्हें हजारों रुपए इनाम में भी मिल जाते हैं। इसलिए बिरहा गायक हमेशा ज्यादा से ज्यादा रुपए प्राप्त करने के चक्कर में लगे रहते हैं।                 

 बिरहा दँगलों के अलावा लोग शादी-ब्याह, मुंडन-जन्मोत्सव, और गमी के अवसर पर भी बिरहा दंगल का आयोजन करते हैं। यही नहीं, अब तो इलैक्ट्रौनिक मीडिया भी इसको भुना रहा है। प्रायः सभी श्रेष्ट बिरहा गायकों के आडियो कैसेट कंपनियां अनुबंध कर लेती हैं और उनके बिरहों को खुले बाजार में बेचकर लाभ कमाती हैं। बिरहा गायकों से उनको बहुत कम पैसा मिलता है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि इससे बिरहा गायकों में एक विचित्र प्रतिस्पर्धी भावना का जन्म हुआ है। हर बिरहा गायक इन कंपनियों के मायाजाल में फंसने को ललायित रहता है।

यही कारणहै कि जो बिरहा गायक कभी जन्म जन-मनोरंजन को ही अपना परम उद्देश्य मानता था, वही अब व्यावसायिकता के दबाव के कारण जन मनोरंजन को गौण समझने लगा है। वह वहीं बिरहा गाने को तैयार होता है जहां से उसे मोटी रकम मिलने की उम्मीद होती है।

बिरहा के स्वरूप में बहुत तेजी से बदलाव आया है। आज की बिरहा खड़ी बिरहा से बिल्कुल अलग हो गई है। यही नहीं, वह आधी शताब्दी पहले की बिरहा को भी पीछे छोड़ चुकी है। उसमें तरह-तरह की फिल्मी धुनों और लोकगीतों की धुनों का समावेश हो गया है। बिरहा का कवि इन धुनों के आधार पर ही कथा के एक बड़े भाग का वर्णन करता है। बिरहा गायन के दौरान गायक उन धुनों को बड़ी तन्मयता से गाता है। इससे बिरहा की मौलिकता बाधित होती है और कथारस भंग होता है। संभव हो तो उन्हें इस प्रवृत्ति से बचते हुए स्वयं अपनी धुन तैयार करनी चाहिए।

चूँकि बिरहा गायन और लेखन की एक परंपरा चली आ रही है, इसलिए उसमें संगीतकार या धुन निर्माता की जरूरत नहीं पड़ती है। गायक स्वयं संगीत के आरोह-अवरोह का संकेत करता रहता है और ढोलक हारमोनियम वादक तदनुसार अपने-अपने वाध्य बजाते हैं। बिरहा का प्राचीन वाध्य करताल है जिसका प्रयोग आज भी किया जाता है।

बिरहा का दूसरा नकारात्मक पहलू है कथा-भाष्य। यह प्रवृत्ति बिरहा के कवि में नहीं, बिरहा गायक में पाई जाती है। बिरहा गायक बीच-बीच में बिरहा गायन रोक कर किस्सा सुनाने लगता है। कभी-कभी तो यह लगने लगता है कि बिरहा गायक बिरहा गायक न होकर एक किस्सागो है। आज का बिरहा गायक एक किस्सागो में बदल गया है। यह बिरहा की कमजोरी है। इससे बिरहा गायक प्रभावित नहीं होता बल्कि बिरहा प्रभावित होती है। चूँकि बिरहा समूचे वाकये को प्रस्तुत करने में नाकाम रहती है, इसलिए बिरहा में अव्यक्त प्रसंगों को बिरहा गायक अपनी ओर से विस्तारपूर्वक बताता है। इससे रसभंग हो जाता है।

 बिरहा का तीसरा नकारात्मक पक्ष उसके छंदों की दुरूहता है। बिरहा के आरंभ में मुक्तक के रूप में जो छंद होता है उसमें शब्दाडंबर अधिक होता है। उसमें भाव अस्पष्ट और भाषा क्लिष्ट होती है। एक सामान्य आदमी उसका अर्थ नहीं समझ पाता। वह उसकी धुन में ही खो जाता है।

चूँकि छंद से बिरहा शुरू होती है और छंद गाने के बाद बिरहा गायक कथा सुनाने लगता है , इसलिए भी सामान्य आदमी उस छंद पर ध्यान नहीं देता है। एक पढ़े-लिखे आदमी को भी उसके भावों को समझने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ता है, फिर भी कभी-कभी बात नहीं बनती है। दरअसल बिरहा लेखक अपना पांडित्य प्रदर्शित करने के लिए यह सब करता है। उदाहरण के लिए एक छंद दृष्टव्य हैः

कचनार कली बल खाय रही,

मधु बांट रही निज दामन से,

खुद से खुद केलि करैं मिलि के,

भँवरा मचलै रितु आवन से,

घन घोरि घटा गम टूट पड्यौ

प्रतिभा मचलैं प्रतिपादन से।

बिरहा में और भी छोटी-मोटी असंगतियां हैं जिन्हें दूर किए बिना बिरहा अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बनाए रखने में असमर्थ होगी। बिरहा लेखकों और गायकों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए। खासतौर से बिरहा के लेखकों को चमत्कारिक, चटपटी और सनसनीखेज कथाओं को आधार न बनाकर स्वयं कथा की संकल्पना करनी चाहिए और उस संकल्पना के आधार पर बिरहा की निर्मति करनी चाहिए।

चूँकि बिरहा का क्षेत्र विस्तार हो रहा है और इसने अपार लोकप्रियता हासिल कर ली है, इसलिए बिरहा में आई विकृतियों को दूर करते हुए व्यावसायिक दबावों से बचना चाहिए, क्योंकि विकृति और व्यावसायिकता किसी भी कला के स्वस्थ रूप और उसके अस्तित्व को नष्ट कर देती है। यही नहीं, बिरहा लेखकों को बिरहा की भाषा पर भी ध्यान देना चाहिए। बिरहा में, जहां तक संभव हो, भोजपुरी का ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि सामान्य भोजपुरी भाषी लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए खड़ी बोली हिन्दी उपयुक्त नहीं।



तात्पर्य यह है कि उन्हें संप्रेषणीयता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आज के बिरहा लेखकों को उपनिवेशकालीन बिरहों को देखना चाहिए जिनमें अत्यंत सरल भाषा में साम्राज्यवाद विरोधी भावना के साथ-साथ देशप्रेम और देशभक्ति की अभिव्यक्ति हुई है। उन बिरहों में कहीं भी शब्दाडंबर नहीं है और क्लिष्ट या खड़ी बोली हिन्दी का आग्रह नहीं है।   
                                                                                                          (साभार आजकल)

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                                                                                                                                              पश्चिम बंगाल के लोक नाट्य 







                                                                                                                                                         डा. रामचन्द्र राय  
                                                                                                                                                     

 यात्रा




किसी भी साहित्य के विकास क्रम में शास्त्रीय व लौकिक दो धाराएँ वर्तमान रहती हैं। शास्त्रीय धारा के पोषक समाज के सुशिक्षित एवं उच्च श्रेणी के एवं लौकिक धारा के पोषक समाज के निम्न श्रेणी के निरक्षर दीन-हीन लोग रहे हैं जो अपने विश्राम के क्षणों में आनन्द के लिए इसका सृजन करते हैं। इस लोक धारा के उपादानों में साहित्य की विभिन्न धाराएँ यथाक्रम- कविता, नाटक, कथा आदि आती हैं।

साहित्य की लोकधाराओं के उपादानों में लोकनाट्य एक प्रमुख एवं लोकप्रिय उपादान है। लोकनाट्य  ग्रामीण लोक समाज के मध्य उत्पन्न, ग्रामीण कलाकारों द्वारा अभिनित तथा ग्रामीण जनगण के निकट प्रस्तुत अभिनय कला है। इसकी उत्पत्ति संगीत एवं नृत्य से होती है। इस हेतु संगीत एवं नृत्य इसके आंगिक रस होते हैं। वह आंचलिक भाषाश्रयी, आंचलिक पटभूमि एवं परंपरा आश्रित होता है। इसकी कथा वस्तु मुख्यतः पौराणिक, धार्मिक एवं गीतात्मक होती है। इसका मंचन खुले आकाश के नीचे दर्शकमंडली से परिवेष्ठित स्थल पर होता है। अभिनेता, वाद्यकार, सहयोगी अभिनेता, दर्शकगण सभी इसके सहभागी होते हैं। अतिरंजित अंग संचालन , ऊँचे कंठ स्वर एवं आवेग प्रकाश की प्रबलता, इसके आवश्यक अंग हैं। मौखिक, पारंपरिक, आदि लोक संस्कृति की धारा से सामंजस्ययुक्त यह एक मौखिक रचना है तथा स्मृति वाहित परंपरा इसमें सुरक्षित रहती है।

भारत गांव का देश है। यहां की अधिकांश जनता गांव में ही निवास करती है। फलस्वरूप कृषि कार्य स निवृत्ति के बाद अवकास के क्षणों में मनोरंजन हेतु ग्रामीण ने संगीत नृत्य से परिवेष्ठित एक अभिनय कला का विकास किया। वही आज का लोकनाट्य है। भारत के विभिन्न अंचल भिन्न-भिन्न प्रकार के लोक नाट्यों से ख्यात हैं। यथाक्रम-असम का बीहू, राजस्थान का रासधारी, उत्तर प्रदेश की नौटंकी, रामलीला, रासलीला, बिहार की विदेसिया, महाराष्ट्र के तमासा, पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा की यात्रा इत्यादि हैं।

पश्चिम बंगाल के विभिन्न अंचलों में विभिन्न प्रकार के लोकनाट्य एवं नृत्य प्रचलित हैं। इनमें यात्रा, लेटो, आलकप आदि लोक नाट्य एवं भादु एवं टुसु लोक नृत्य आदि तथा बाउल एवं भटियाली लोकगीत आदि प्रमुख हैं।

पश्चिम बंगाल का सर्वख्यात एवं लोकप्रिय लोकनाट्य यात्रा है ( बंगाल में इसका उच्चारण जात्रा से करते हैं)। साधारणतः यात्रा का अर्थ गमन या किसी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना होता है। प्राचीन काल में देवपूजा के अवसर पर देव विग्रह को एक स्थान से दूसरे स्थान पर यात्रा या गमन करना पडता था। इसका प्रमाण हमें पुरी की रथयात्रा से मिलता है। भक्तगणया पुजारी देव-विग्रह के पीछे झुंड बांधकर चलते थे। इस झुंड में देव-वंदना साथ मानव के सामाजिक प्रसंग, कला-कौशल,था। नृत्य की भंगिमा में बाहु फैलाकर , पदचारण, कौतुक रस, देव प्रसंग के साथ-साथ मानव प्रसंग एवं गीत के साथ नृत्य-भंगिमा का उद्भव हुआ।

प्राचीन काल की विभिन्न प्रकार की देवयात्रा का विवरण मिलता है। यथा-राम यात्रा, कृष्ण यात्रा आदि। इस यात्रा का आरम्भ रास यात्रा से हुआ है। बाद में इसका रूप कृष्ण यात्रा ने ले लिया। आरम्भ में, यात्रा की कथावस्तु, स्थान , पात्र, भाषा आदि लोकनाट्य की भांति ही थी। जहां पर यात्रा का अभिनय होता था, उस स्थल को आसर कहा जाता था। आसर समतल भूमि पर होती थी। दर्शकगण उस आसर के चारो तरफ गोलाकार होकर बैठते थे। यात्रा दल के मुख्य को अधिकारी कहा जाता था। अधिकारी के नामकरण से ही यात्रा का नामकरण होता था। अदिकारी यात्रा हेतु पाठ की रचना करते थे। इसके अभिनेतागण समाज के निम्न श्रेणी के लोग हुआ करते थे। आजकल पस्चिम बंगाल में जिस यात्रा का अभिनय किया जाता है, उस पर पश्चिमी अभिनय कला का प्रबाव पड़ा है। इस प्रकार की यात्रा का आरम्भ उन्नीसवीं शती के आरम्भ में कलकत्ते एवं उसके पार्श्ववर्ती अंचल में ही अधिक लोकप्रिय हुआ। क्रमशः यात्रा का अभिनय शैली में परिवर्तन होने लगा। लोक जीवन के मनोरंजन के साधन , नगर में रहने वाले बाबुओं के मनोरंजन के साधन हो गये। विषय वस्तु, स्थान, पात्र , भाषा जो इनकी निजी वस्तुएँ थीं इनमें बदलाव आया। लोक शिक्षा की विषय वस्तु के स्थान पर ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि कथा वस्तुओं ने स्थान ले लिया। तकनीकी विद्या तथा सिनेमा के प्रभाव से इसमें आमूल परिवर्तन हुआ। खुले आकाश का स्थान पर्दा ने ले लिया। सामान्य प्रकाश के स्थान पर रंग-बिरंगे प्रकाश का इस्तेमाल होने लगा। फलस्वरूप यात्रा ग्रामीण के मनोरंजन का साधन न होकर नागर के मनोरंजन का साधन हो गया। इसके बावजूद आजकल गाँव में जो यात्रा के दल हैं, वे अभी भी लोकजीवन से सम्पर्क स्थापित करते आ रहे हैं। ग्रामीण यात्रा ही बंगाल के लोकनाट्य यात्रा का आदि रूप है।

पश्चिम बंगाल का दूसरा महत्वपूर्ण लोकनाट्य लेटो है। इस लोकनाट्य का उद्भव वीरभूमि जिले से माना जाता है। आजकल यह लोकनाट्य पूरे पश्चिम बंगाल में अभिनीत होता है। लेटो शब्द नट धातु का अपभ्रंश रूप है। वस्तुतः जो नट हैं वही आजकल के नटुआ हैं। नटुआ से ही नेटो या लेटो शब्द बना है। ग्रामीण उच्चारण के कारण न शब्द ल हो गया है। इस प्रकार नेटो ही लेटो का आदि रूप है।

यह लोकनाट्य उन लोगों के प्रयास हैं, जो लोग शिक्षा के प्रयास से वंचित रहे हैं। इसकी विषय-वस्तु जन साधारण में प्रचलित कथा कहानियों से ली जाती है। यह लोकनाट्य प्रहसन का ही एक रूप है। यह जन-सामान्य की अभिनय कला होने के कारण, इसके लिए किसी लिखित पाठ्य की आवश्यकता नहीं होती है। इसके मुख्य अभिनेता वाक्य-चातुर्य व्यक्ति ही होते हैं। इन्हें संगदार से संबोधित किया जाता है। संगदार वही व्यक्ति होते हैं जिनमें लोकायत भंगिमा से लोक की भाषा से हास्यरस की सृष्टि करने की क्षमता होती है। वैसे संगदार के एक सहयोगी कलाकार भी होते हैं। इस लोकनाट्य में महिला पात्र की भूमिका पुरुष ही साड़ी पहनकर करते हैं। लेटो का अभिनय किसी एक कथावस्तु पर केन्द्रित नहींरहता है। विभिन्न प्रकार की कथावस्तु का निर्माण करके एक वैशिष्ट्य का निर्माण करते हैं। यही नहीं, जब एक से अधिक नाट्य दल एक स्थान पर एकत्र होते हैं तब एक असाधारण दृश्य उपस्थित हो जाता है। अतः यह कहा जा सकता है कि यह लोकनाट्य गाँव के सहज-सरल मानव का मनोरंजनात्मक प्रदर्शन है। इसका आंगिक रस हास्य मुख्य है। इसकी रचना-सृष्टि इस प्रकार से की जाती है जिससे किसी प्रकार की जटिलता की सृष्टि न हो। अभिनेता का प्रत्येक शब्द जैसे जन-साधारण के ही शब्द हों। इसकी भाषा बोलचाल की स्थानीय भाषा होती है। यही कारण है कि यह स्थानीय लोगों का अत्यंत ही लोकप्रिय नाट्य है। इस नाट्य दल के अभिनेतागण सर्वदा दर्शक वर्ग को नित्य नवीन रसास्वादन कराने का प्रयास करते रहते हैं। स्वाधीनता आन्दोलन के समय लेटो के दल ने देश की स्वाधीनता के लिए, जन-सामान्य में जन-जागरण का भी कार्य किया था। यही नहीं साम्प्रदायिकता विरोधी प्रदर्शन से एक दूसरे से सौहार्द स्थापित करने का संदेश भी दिया करते हैं।

इसके अभिनेतागण गाँव के साधारण श्रमजीवी वर्ग के ही लोग होते हैं। वे दिनभर के अथक परिश्रम से क्लान्त होकर संध्या समय अभिनय, संगीत, नृत्यादि से आनन्द का रसास्वादन करते हैं। इसके वाद्य यंत्र भी गांव में सहज-सरल भाव से उपलब्ध हारमोनियम, तबला, वंशी आदि हुआ करते हैं। यद्यपि यह धर्म-निरपेक्ष लोक नाट्य है तथापि सका आरम्भ वन्दनवार से होता है। इसके मंचन हेतु किसी मंच स्थल की आवश्यकता नहीं होती है। जहां सका मंचन करना होता है वहां थोड़ा-सा स्थल मंचन के लिए गोलाकार खाली छोड़ दिया जाता है और दर्शकगण उसके चारो ओर गोलाकार होकर बैठ जाते हैं। नाट्य के आरम्भ से पूर्व वाध्यकार वाद्ययंत्र की सहायता से गत बजाते हैं। उसके बाद अभिनय आरम्भ होता है। सर्वप्रथम महिला वेशधारी पात्र हात में धूप-दीप लेकर वन्दनवार गाती है। वन्दनवार के बाद संस्कृत नाटक की भांति सर्वप्रथम मंच पर सूत्रधार उपस्थित होता है। वह मंच के चारो ओर उपस्थित होकर दर्शक मंडली से नाट्य मंचन की अनुमति मांगता है। तत्पश्चात अभिनय आरंभ होता है।

आजकल लेटो यात्रा की भांति हो गया है। इस हेतु कभी-कभी लिखित पाठांश की भी सहायता लेनी पड़ती है। इसके बावजूद यह अपनी परम्परा को रखने में सक्षम है। पश्चिम बंगाल का अन्य लोकप्रिय लोकनाट्य आलकाप है। इस लोकनाट्य का उद्भव मुरशीदाबाद जिले से माना जाता है। आलकाप शब्द का अर्थ रंग-रस होता है। इसके अन्य नाम पंचरस अथवा श्रीकृष्ण यात्रा भी हैं। यह हास्य रस प्रधान लोक प्रहसन है। इसे व्यंग्य विद्रूपात्मक नाट्य प्रहसन भी कहा जाता है। आलकेप के प्रख्यात उस्ताद झांकसुर के मतानुसार आल का अर्थ विद्ध और काप शब्द की उत्पत्ति कापट्य से हुई है जिसका अर्थ व्यंग्य विद्रूप है। इस प्रकार आलकाप व्यंग्य रसात्मक नाट्याभिनय है जो अपनी अभिनयकला से दर्शक के हृदय को छू जाता है।

लेटो की भांति ही आलकाप का मंचन खुले आकाश के नीचे समतल भूमि पर होता है। दर्शक उस समतल भूमि पर गोलाकार होकर बैठते हैं। लेटो की भांति इसके अभिनेतागण बी गांव के श्रमजीवी वर्ग के लोग ही होते हैं। इसमें भी साड़ी वेशदारी पुरुष महिला पात्र की भूमिका निबाते हैं। इस महिला पात्र को छोकरी कहा जाता है।  एक ही छोकरी विभिन्न प्रकार की महिला पात्र का अभिनय करती है। इसके मुख्य अभिनेता या उस्ताद को केप्या अथवा कप्या कहा जाता है। इसके सभी पात्र समाज के निम्न वर्ग के लोग ही होते हैं। साधारणतः इसकी कथावस्तु पौराणिक कथाओं पर ही आधारित होती है। आजकल समकालीन विषय-वस्तुओं से भी कथाएँ ली जाती हैं। इसके बावजूद इसकी अधिकांश वस्तुएँ, ग्रामीण जीवन-यात्रा पर ही आधारित होती हैं। इसके गीत-संगीत भी ग्रामीण दैनन्दिन जीवन-यात्रा से संबंधित होते हैं जो सहज में गाँव के सहज-सरल मानव के हृदय को स्पर्श कर जाता है। इस लोकनाट्य की प्रमुख विशेषता यह है कि संगीत की रचना दर्शक के सामने गाकर एवं कविता की रचना करके उपस्थित दर्शक वर्ग को सुनाता रहता है। इसके वाद्य यंत्र भी लेटो वाद्य यंत्र की तरह होते हैं।

इस प्रकार इन लोकनाटकों के माध्यम से पश्चिम बंगाल की लोक साहित्य-संस्कृति का परिचय मिलता है। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल के वर्दवान जिले का बोलान, रणपा मिदनापुर जिले का माछनि, उत्तरी बंगाल जिले का दोतरा या कुषाण, धामगान, डोमनी, हालुआ-हलुआनी, चौबीस परगना जिले का वनबीबी, पुरुलिया जिले का छौ , बाँकुड़ा जिले का नाचनी आदि अंचल विशेष का लोक नाट्य है। इन लोकनाट्यों की विषय-वस्तुएँ, पात्र, स्थान, भाषा-शैली, वाद्य-यंत्र आदि वही होते हैं जो उपर्युक्त विवेचित लोक-नाट्य के हैं।

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                                                                                                                                        लोकनाटकः चुनौती और संभावना


                                                                                                                                                      प्रवीण प्रभाकर



 उत्तर भारत की नौटंकी, भांड़, रामलीला और रासलीला, पंजाब का भांगड़ा महाराष्ट्र का तमाशा, बंगाल की यात्रा और बिहार की विदेशिया लोकनाट्य की वह अमूल्य निशानी है जो सदियों से भारतीय लोक परंपराओं को अपने अंदर समेटे हुई है। पर इन लोकनाट> शैलियों को आज तक वह दर्जा नहीं मिला जिसके वे हकदार रहे। लगातार उपेक्षाओं के बाद भी इसने अपनी समृद्धि को बढ़ाना जारी रखा और आज आधुनिक नाट- परंपरा में सबसे ज्यादा लोकनाट- शैली की ही झलक मिल रही है। वैसे भी रीमिक्स का जमाना है और हर चीज ट्रांसफ्यूजन स्टेट में है। चाहे वह शेक्सपियर के नाटक हों या घासीराम कोतवाल का मंचन, सभी में लोकनाट- शैली की झलक मिलती है। यहां तक कि थियेटर आर्टिस्ट से लेकर डायरेक्टर तक मानते हैं कि लोकनाट- शैली से उनके नाटक समृद्ध हो रहे हैं।
आज भारतीय नाट- परंपरा में लोक को प्रतिष्ठित करने का सारा श्रेय जाने-माने रंगकर्मी हबीब तनवीर को जाता है। विदेश से पश्चिमी रंगमंच के गहन प्रशिक्षण के बाद स्वदेश लौटकर हबीब तनवीर ने प्राचीन भारतीय नाट> परंपरा को जाना-समझा और इसे देशज शैली में घोल दिया। 1958 में उन्होंने शुद्रक के नाटक मृच्छकटिकम को माटी गाड़ी के रूप में पेश किया। इसमें उन्होंने रायपुर की मशहूर लोकनाट- शैली नाचा का सहारा लिया। तब से लेकर अब तक लोकनाट-शैली को नई ऊंचाइंया मिल रही है। हालांकि चुनौती अब भी कम नहीं हुई है। न तो लोक नाटककार खुद को बाजारू परिवेश में ढाल पा रहे हैं और न ही नाटक संस्थानों से पढ़े रंगकर्मी लोकनाट- को पचा पा रहे हैं।
लोकनाट- शैली पर अनुसंधान कर किताब लिख चुके आ॓म प्रकाश भारती कहते हैं कि कुछ साल पहले तक बिहार में 5000 नटुओं की टीमें थी जो अब बढ़कर 8000 हो चुकी हैं। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि लोक नाटक सिमट रहे हैं। लोक नाटकों की अन्य कलाओं की तरह ही दो प्रमुख उपादेयता रहे हैं- मनोरंजन और सामाजिक अभिव्यक्ति। मनोरंजन की बदौलत ही एक समय लोक कलाओं को राजकीय संरक्षण मिला हुआ था और 15-16वीं शताब्दी में लोक कला अपने स्वर्ण युग में थी। भारती कहते हैं कि हर लोक नाट- शैली के कलाकार शोषित और दबे कुचले लोग ही हैं ऐसे में उनकी विधा को मान्यता नहीं देने का ये दबाव तो सालों साल से चला आ रहा है। भारती उदाहरण देते हुए कहते हैं कि भारतीय लोकनाट> शैली की पढा़ई कैंब्रिज, आक्सफोर्ड और जापान के कई विश्वविघालयों में होती है लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविघालय सहित देश के केंद्रीय विश्वविघालयों में इसके लिए कोई जगह नहीं निकाली गई। माना जाता है कि पूरे भारत में 70 से ज्यादा लोक नाट-परंपराएं हैं। हालांकि मीडिया और विमर्श के केंद्र में महज आधे दर्जन परंपराएं ही होती हैं। जबकि कोई भी परंपरा कमजोर नहीं होती मजबूत नहीं होती। वह संबंधित समुदाय विशेष के लिए श्रेष्ठ होती है। समुदाय ने सदियों से अगर अपनी परंपराओं को जीवित रखा है तो साफ है कि समाज को अपनी परंपराओं की जरूरत है और रहेगी। यही वजह है कि बिहार के एक गांव में नटुवा नाच को देखने के लिए बाई जी के नाच से कहीं ज्यादा भीड़ उमड़ती है और पंजाब में ख्याल और भांगड़ा का जादू चल रहा है। 

                                                                                                                                          साभार-राष्ट्रीय सहारा

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                                                                                                                                                                    नरेन्द्र कोहली

 झगड़ा

 वह बहुत क्रुद्ध था। इतना कि उसे अपने वस्त्रों  का भी चेत नहीं था। वह संतरियों की सलामी की ओर क्या' ध्यान देता।  वह घर में घुसता चला गया। किसी ने उसे टोका नहीं। टोकने से वह रुकने वाला भी नहीं था।  
 उसने गृहस्वामी को देखा तो जैसे उसके कपाल में से अग्नि फूट निकली। उसके मुख से ज्वालामुखी के समान अपशब्दों  का लावा फूट कर बहने लगा। लगा, लावा उसके कंठ में जमा हुआ था, सुपात्र को सामने देखते ही फूट पड़ा।
 गृहस्वामी की आंखें आश्चूर्य से फट पड़ीं, ''क्या  हो  गया है तुम्हें? होश में तो हो?''  


''होश में तो तुम नहीं हो। जाने अपने आपको क्या समझने लगे हो।'' ज्वायलामुखी ने कहा, ''मैंने साथ छोड़ दिया तो तुम्हांरे भी होश ठिकाने आ जाएंगे। चपरासी भी नहीं रह पाओगे, मुख्यामंत्री तो क्या।''  


''पर हुआ क्या है ?''  


''मेरा सागर तट वाला बंगला क्यों  तुड़वा रहे हो ?'' ज्वालामुखी आपे में नहीं था।  ''कौन सा बंगला ?''  ''यह भी कोई रामसेतु है कि पूछ रहे हो, कौन सा रामसेतु ? कौन सा राम ?''  


''मैं सचमुच कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूं।''  


''नहीं समझ पा रहे तो मैं समझा देता हूं।'' ज्वालामुखी बोला, ''मुझे वकील ने बता दिया है कि अगली पेशी में वह न्यायालय में कहने वाला है कि हमें मल्बा' मिल गया है।''  


''कौन सा मल्बा?''
 ''रामसेतु का मल्बा‍।'' ज्वा‍लामुखी ने कहा, ''राम ने सेतु तुड़वाया तो मल्बा कहां डलवाया ? कोई प्रमाण भी तो होना चाहिए।''
 ''उससे तुम्हामरे बंगले का क्या  संबंध ?''


 ''मेरे बंगले को तोड़ कर वह उस मल्बे को रामसेतु का मल्बा सिद्ध करेगा।''


ज्वातलामुखी ने कहा, '' पर मेरा बंगला कितना भी बड़ा हो, उसका मल्बा् इतना नहीं होगा कि तुम उसे रामसेतु का मल्बा' सिद्ध कर सको।''
 ''तुम तो ऐसे कह रहे हो, जैसे तुम जानते हो कि रामसेतु कितना बड़ा था।''  


''तुम नहीं जानते क्या हो?'' ज्वालामुखी बोला, ''रामेश्वबरम से ले कर श्रीलंका के मन्नार द्वीप तक है। छोटा नहीं है। 48 किलोमीटर लंबा है। चौड़ाई ... मैं भूल गया हूं।''  


''तुम्हारा दिमाग सचमुच खराब है।'' गृहस्वामी बोला, '' तुम यह सब कहीं भी बक दोगे और सिद्ध कर दोगे कि रामसेतु ऐतिहासिक सेतु है। ऐसे में हम उसे तुड़वाएंगे कैसे ?''  


''हां दिमाग खराब है मेरा। अपना बंगला तुड़वा कर उसका मल्बा समद्र में डलवा दो और कहो कि यह रामसेतु का मल्बा है। मेरे बंगले के पीछे क्यों पड़े हो ?''  


''मैंने तुम से पहले ही कहा है कि मैं तुम्हांरा बंगला नहीं तुड़वा रहा हूं।''  


''तो कौन तुड़वा रहा है - हनुमान् ?''  


''अब तुम हनुमान् को भी मानने लगे ?''  


'' क्या तुम नहीं मानते ?''


 ''मैं यह सब कुछ नहीं मानता।''  


''तो हर समय पीला कपड़ा क्यों टांगे रहते हो अपने कंधों पर?''  


''उसका इससे क्या संबंध ?''


''वह सब बाद में बताऊंगा।'' ज्वायलामुखी बोला, '' अभी तो इतना ही कहने आया हूं कि यह मल्बे का चक्कर छोड़ो।''  


''तो यह कैसे सिद्ध करेंगे कि राम ने स्व्यं सेतु तुड़वाया था ?''  


''तुम और तुम्हारा वकील दोनों ही पागल हो। यदि यह सिद्ध करोगे कि राम ने स्वयं सेतु तुड़वाया था तो तुम कितनी बातें स्वीकार कर रहे हो, मालूम भी है ?''


 ''क्या स्वीकार कर रहे हैं कि तुम्हारा बंगला अवैध रूप से बनवाया गया था ?''  


''वह तो स्वमयंसिद्ध है।'' ज्वालामुखी बोला, '' तुम स्वीकार कर रहे हो कि राम सचमुच ऐतिहासिक पुरुष हैं। वे सचमुच हुए थे।...''  


''यह क्या् बकवास है ?''  


''अरे यदि वे हुए नहीं थे तो सेतु कैसे बनवाया ? और यदि बनवाया नहीं तो तुड़वाया क्या - तुम्हाररा सिर ? और अब ...''  


''और अब क्या ?''  


''अब मेरे बंगले के मल्बे  को सेतु का मल्बा बता कर तुम सिद्ध करोगे कि उस समय सीमेंट लोहा, कंकरीट सब कुछ हुआ करते थे।''  ज्वा‍लामुखी भड़क उठा, ''तुम पागल हो गए हो एकदम।'' 
 


''अनाप शनाप बकना छोड़ो और होश में आओ।'' गृहस्‍वामी ने कहा।  ''


 ज्‍वालामुखी बोला, '' मेरा बंगला टूटा तो मैं न्‍यायालय में यह सिद्ध करूंगा कि राम ने सेतु बिना सीमेंट के बनवाया था। पत्‍थरों में जोड़ नहीं थे। वे बड़ी बड़ी शिलाएं थीं, जो अपने भार के कारण एक दूसरे पर टिकी हुई थीं। वे इतनी भारी थीं कि समुद्र की लहरें भी उन्‍हें हिला नहीं पा रही थीं । इसलिए यह मल्‍बा उस सेतु का नहीं हो सकता।''  


''तो उससे क्‍या सिद्ध होगा ?''  


''उससे सिद्ध होगा कि सेतु को न किसी ने तोड़ा न तुड़वाया। तुम ही हो जो उसे तोड़ना चाहते हो। ''  


''लक्ष्‍य क्‍या बताओगे ?'' 


गृहस्‍वामी बोला, ''मैं सिद्ध करूंगा कि तुम तुड़वाना चाहते हो, ताकि तुम्‍हारे जलपोत उस मार्ग से आ-जा सकें।''  ''और मैं सिद्ध करूंगा कि तुम यह सब वोटों के लिए कर रहे हो। तुम एल.ट.टी.ई. के छोटे बजरों को अवैध रूप से शस्‍त्र लाने, ले जाने की सुविधा देना चाहते हो। तुम इस देश को तोड़ना चाहते हो।''  


'' अभी तो मैं तुम्‍हारा सिर तोड़ना चाहता हूं।'' गृहस्‍वामी ने पास पड़ा लठ उठा लिया।                                          


                                                                                                                                                 (8.8.2008)  

                                


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                                                                                                                                           चांद परियां और तितली







चिड़िया और धान का दाना ( बाल लोककथा)








एक बार एक गौरेया अपने मुंह में धान का दाने लेकर बच्चों को खिलाने लौट रही थी। दूसरी चिड़िया उसे आवाज देती है और गौरेया मुंह/चोंच खोलती है कि उसका धान जाता के डंडी में फंस जाता है। गौरेया खूंटी से प्रार्थना करती है, उसे धान का दाना लौटा दे उसके बच्चे भूखे है। खूंटी जाता से प्रार्थना करने को कहती है। जांता कहता है मुझे तीरने के लिए बढ़ई बुलवा लो गौरेया बढ़ई के पास जाती है, बढ़ई फुर्सत नहीं है कहकर गौरेया को लौटा देता है । गौरेया बढ़ई की शिकायत लेकर राजा के पास जाती है और प्रार्थना करती है -राजा तुम बढ़ई दंडो,
बढ़ई न खूंटा चीरे
खूंटी भीतर धान का दाना
बच्चों का वही है खाना
राजा गौरेया की बात अनसुनी करके लौटा देता है, तब रानी के पास गौरेया पहुंचती है - रानी से कहती है -
रानी तुम राजा बुलाओं
राजा न बढ़ई दंडे
बढ़ई न खूंटी चीरे
खूंटी भीतर धान का दाना
बच्चों का वही है खाना ।
रानी गौरेया को दुत्कार देती है तब चिड़िया सांप के पास जाती है, सांप को प्रार्थना करती है - सांप तुम रानी काटो
रानी न राजा बुझावे,
राजा न बढ़ई दंडे
बढ़ई न खूंटी चीरे
खूंटी भीतर धान का दाना
बच्चों का वही है खाना ।
सांप रानी के बदले गौरेया को काटने दौड़ाता है तो वह लाठी के पास पहुंचती है - लाठी से कहती है -
लाठी तुम सांप मारो,
सांप न रानी काटे
राजा न बढ़ई दंडे
बढ़ई न खूंटी चीरे
खूंटी भीतर धान का दाना
बच्चों का वही है खाना ।
इस प्रकार वह लाठी को जलाने का आग्रह आग से, आग को बुझाने का आग्रह समुद्र से, समुद्र को पीकर सुखाने का आग्रह हाथी से और हाथी के सूंड में घुसकर काटने का आग्रह चींटी से करते कहती है -
चीटी दीदी, चीटी दीदी
तुम काटो हाथी का सूंड
समुद्र का पानी न सुखाये
समुद्र न आग बुझाए
आग न लाठी जलाये
लाठी न सांप मारे
सांप न रानी काटे
रानी न राजा बुझाय
राजा न बढ़ई दंडे
बढ़ई न खूंटी चीरे
खूंटी भीतर धान का दाना
वही है बच्चों का खाना।
चींटी को दया आती है, वह गौरेया के साथ हाथी के पास पहुंचती है । चींटी हाथी के सूंड में घुसने लगती है तो वह घबड़ा जाता है, वह चींटी से प्रार्थना करती है -
हमें न काटो, सूंड न काटो
चलो तुम्हारे संग चलेंगे
अभी समुद्र सुखा सुखाये
अभी सबीन आग बुझायें
समुद्र गरजते आग की ओर बढ़ता है, तब आग कहता है कि -
हमे न कोई बुझो सिराये
हम तो लाठी अभी जराये।
लाठी के जलने की बारी आता है तो लाठी कहता है -
हमे ऐले बैले जलाये न कोय
हम तो सांप मारे जाय।
इसी प्रकार लाठी सांप को मारने बढ़ता है तब सांप रानी को काटने का, रानी, राजा को समझाने का, राजा बढ़ई को दंड देने का, बढ़ई घूंटी को चिरने के लिए औजार के साथ पहुंचता है । तब खूंटी कहती है -
हमें चीरेबरी न कोय
अभी दाना हम उगले देय।
खूंटी सबके सामने दाना उगल देती है। दाना लेकर चिड़िया उड़ जाती है।




मछली जल की रानी है








मछली जल की रानी है


जीवन इसका पानी है


हाथ लगाया तो  डर जाएगी

बाहर निकाला तो मर जाएगी।