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                                                                                                                                                                गुलदस्ता


                                                                                                                                 डॉ. ओमप्रकाश श्रीनिवास येमुल

भारत अतरों का उद्गम स्थल

अतर, इत्र या इतर मूलरूप से अरबी शब्द है जिसका अर्थ है खुशबू और ऐसा समझा जाता है कि इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द सुगंध से हुई है। अतर के सबसे आरंभिक आसवन का उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में मिलता है।                                                                                                                                     भारतीय इत्रों का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना प्राचीन है। पुरातत्वीय प्रमाण से ज्ञात होता है कि भारतीय उप महाद्वीप के प्राचीनतम वासी पेड़ पौधों के प्रति असीम आदर भाव रखते थे। समय गुजरने के साथ सुगंधित वनस्पति व जीव उत्पादों को पीस कर, कुचल कर व आसवन करके सुगंधित तैल तैयार किया जाता था। इन प्रक्रियाओं ने कीमिया (अलकेमी) कला का प्रदुर्भाव किया जिसके आरंभिक प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाइयों में मिलने वाले सुगंध पात्रों और टैराकोटा आधानों में मिलते हैं। इनके तैयार करने की विधियों का इतनी शताब्दियों तक विद्यमान रहना स्वयं भारतीय सुगंधों की विशेषताओं का द्योतक है। भारत की दैनिक जीवन शैली में अभिन्न रूप से घुले-मिले सुगंधित पौधे भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पहलू, अनुष्ठान से पाक संबंधी, योग से भोग तक सभी में अहम भूमिका निभाते हैं। वेदों में अनेक पौधों, शाखाओं, छालों और पुष्पों के विभिन्न मिश्रणों के यज्ञों में देवी देवताओं को अर्पण का उल्लेख मिलता है।

भारतीय सुगंधों से संबंधित एक रोचक तथ्य यह है कि लोग कई वर्षों तक एक ही सुगंध का प्रयोग करते हैं। भारतीय सुगंधों की एक खूबी यह भी है कि पश्चिमी जगत के विपरीत, जहां पुरुष और महिला के लिए भिन्न प्रकार की सुगंधें तैयार की जाती है, भारतीय सुगंधों में यह  भेद नहीं होता। भारत में अतर हमेशा से राजाओं और रानियों की पसंद रहे हैं। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपति और विभिन्न प्रकार के अतरों को पसंद करते रहे हैं और प्रत्येक की अपनी निजी पसंद रही है।

सुगंध चिकित्सक अतरों के चिकत्सीय गुणों का दावा करते हैं। सुगंध चिकित्सा का सबसे आम उदाहरण है हरे तैल के प्रयोग से तत्काल मिचली और उलटी पर नियंत्रण पाना। अतर गिल या इत्र ए खाकी में जिसे मिट्टी से बनाया जाता है, वर्षा ऋतु की पहली फुहारों की सुगंध होती है और यह रक्त चाप के उपचार में लाभकारी है। चमेली के सत्व मानसिक तनाव और त्वचा रोगों के उपचार में उपयोगी सिद्द हुआ है। चंदन के तैल की गंध सूंघने से तनाव घटता है और उल्टी रुकती है। वक्ष और गले पर इसके लेप से सूखी खांसी दूर होती है। इससे त्वचा रोगों में भी लाभ पहुंचता है। गेंदे के सत्व पुराने जिद्दी घावों के उपचार में प्राचीन काल से दवा की तरह प्रयुक्त किया जा रहा है। इसमें असाधारण विषाणुरोधी खूबियां होती हैं। नींबू तैल मधुमेह, दमा, छालों और स्फीत शिरा (वेरीकोज वेन्स) में लाभकारी है.। मीठे मुरबक की तीन बूंदों का चीनी के साथ सेवन अधसीसी व नशे के बाद के सिर का  भारीपन दूर करती है। केसर का अतर शरीर की शिथिलता दूर करने और सिर दर्द का प्राकृतिक उपचार है।

हिना अपनी उष्मा उत्पन्न करने वाले गुणों के लिए जानी जाती है और यदि इसे शीतकाल के दौरान कम्बलों पर लगाया जाता है तो उससे अतिरिक्त उष्मा मिलती है। गर्मियों में यदि इसे सूंघा जाता है तो उससे नाक से खून भी निकल सकता है। ऐसा समझा जाता है कि मोतिया के अतर की एक बूंद से रक्त स्राव और मवाद बनना थम जाता है और केवड़ा या खस को सूंघने से गर्मी से होने वाला सिरदर्द गायब हो जाता है। अतर खस के शरबत को गर्मियों में पसंद किया जाता है क्योंकि यह पाचन तंत्र को शीतलता प्रदान करता है। त्वचा रोगों के उपचार में चमेली उपयोगी है और गुलाब हृदय के लिए हितकारी होता है। कस्तूरी और केसर से तैयार शोख हिना हर त्वचा पर बिन्न सुगंध उत्पन्न करती है। शीतकाल में यह एक सुखद अहसास प्रदान करती है। जानकार लोगों का मानना है कि अतर की सुगंध कृतिम रेशों से बने वस्त्रों की बजाय सूती वस्त्रों पर अधिक समय तक ठहरती है. गर्मियों में कुछ अतर यदि सावधानी पूर्वक नहीं लगाए जाते तो वे उड़ जाते हैं। यदि आप वास्तव में कोई असाधारण सुगंध की खोज में हैं तो भारतीय अतर आपको अवश्य पसंद आयेंगे।