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                    तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है    

                                                                                                                 गोपाल दास ' नीरज' 
                                                                                                                              -     
                             

                                                                      ( स्वदेश ! )


                                                             अंक-6-वर्ष-2-अगस्त-2008


                                                   संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल
                         



                                संपर्क सूत्रः editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com

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दोहरी नागरिकता की  संस्कृति में आज  मुम्बई में जागकर, दुबई में दोपहर का खाना और लंदन में रात बिताना  कठिन या असंभव नहीं । न्यूयौर्क और लंदन , दोनों जगह नौकरी करने वालों की, दोनों जगह ही व्यापार के मुख्य कार्यालय रखने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अपने शहर के  चौक या मुख्य बाजार की तरह ही आज कई भारतीय हौंगकौंग और सिगापुर जाकर खरीददारी करने लगे है। कहने का अर्थ सिर्फ यही है कि अब दूरियां उतनी दुसाध्य नहीं, जितनी कि तीन-चार दशक पहले तक थीं।  इक्कीसवीं सदी का प्रगतिशील आदमी आज बादल और नदी की तरह अबाध उड़ना और  बहना चाहता है। फिर भी विश्वीकरण के इस युग में, बरसों बाहर आराम से रहने के बावजूद भी;  कुछ है जो याद बनकर  कसकता  रह जाता  है और इस नये युग के नए मानव को भी बारबार स्वदेश की ओर खींचता  है! क्या है यह ' कुछ ' और आखिर क्या हैं  यह स्वदेश? भले ही मक्के की रोटी और सरसों के साग व देश की सोंधी मिट्टी की महक और रहट व चौपाल  पर लिखे भांति-भांति के गीतों को सुनने के बाद अतीत की सुहानी यादें घेर लें और सात समन्दर पार की अमराई की महक ठंडी-सूनी जिन्दगी को यदा-कदा  पुलकित भी  करे , परन्तु एक औसत और आम आदमी के लिए स्वजनों का प्यार, ...कुछ मीठी यादें और जड़ों से जुड़े रहने का... स्वदेश या अपनों के बीच लौटने का अहसास ही है, जो उसे मजबूर करता है पलट-पलटकर लौटने को !  
कहते हैं अनुपस्थिति भावों और अनुभूतियों को और भी तीव्र कर देती है;  एक प्रवासी से ज्यादा भला कौन  इस दर्द से गुजरता होगा!   स्वदेश की परिभाषा तो हम सभी जानते हैं,  पर क्या जीवन की दौड़ में आज के युग के हांफते-भागते व्यक्ति के पास वक्त है  मातृभूमि या स्वदेश जैसे शब्द और इसके सही समर्पित अर्थ के लिए...   वाल्मीकि ने कभी अपनी रामायण में लिखा था कि 'जननी जन्मभूमि स्वर्गातपि गरीयसी। ' पर आज न मां के प्रति वह जज़बा है और ना ही देश के। मां को वृद्धाश्रम में पहुंचाकर और देश को  किसी भी और अधिक संपन्न देश से बदलकर कष्टों से छुटकारा पाने में आज किसी को संकोच नहीं। जरूरत पड़ने पर आर्थिक दान देकर दोनों  ही  दायित्व और कर्तव्यहीनता  के अपराध-बोध से आसानी से मुक्ति पाई जा सकती है। हजारों मानसिक और भावात्मक  गुत्थियों में उलझे आजके जनजीवन में, खुद अपने लिए ही वक्त नहीं, परिवार, समाज और देश की जिम्मेदारी किसके बस की है। सबकी बस  एक ही भक्ति, निष्टा और द्येय  है अधिक से अधिक धन कमाने और जुटाने की लिप्सा, जहां अपने से ज्यादा दूसरों का बैंक बैंलेंस परेशान किए रहता है ।  हां, चतुर नेतागण जरूर देशप्रेम के नाम पर आजभी हजारों को बेमतलब की लड़ाइयां लड़ने के लिए  मौत के मुंह में धकेल सकते हैं।  'देशभक्ति' के नाम पर जितनी लड़ाइयां लड़ी गई हैं, जितने जीवन कुर्बान हुए हैं या किए गए हैं, जितने अत्याचार हुए हैं और हो रहे हैं; उन्होंने इस शब्द को आतंक से भर दिया है और इसकी गरिमा को कीचड़ से।  पर क्या देशप्रेम और राष्ट्रीयता दो अलग-अलग मुद्दे नहीं जिन्हें साम्प्रदायिकता और जातिवाद से जोड़कर तो और भी अधिक लोगों को भड़काया व लड़ाया जा सकता है और जा रहा है।  वर्तमान युग की परिस्थितियों हमें पुनः पुनः सोचने पर मजबूर करती हैं...क्या अर्थ रह गया है मातृभूमि का,  देशप्रेम का.. जबकि कई-कई व्यक्ति दो-दो देशों में जीवन बिताते हैं....कैसे बांटें वे अब अपनी आस्था और निष्ठा को...कौनसा है उनका स्वदेश ...क्या मानवता आज सबका धर्म नहीं, और समस्त वसुधावासी ही हमारा कुटुम्ब नहीं ? नए नहीं, हमें तो ये विचार वैदिक काल से धरोहर में मिले हैं।


.. स्वदेश वही है जहां शरीर ही नहीं, आत्मा को भी घर की, अपनेपन की अनुभूति हो...नैसर्गिक रुझान और लगाव हो हमारा उस धरती, उस संस्कृति के प्रति;  कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कहां पैदा हुए और कितनी अवधि तक कहां रहे !  हां इतना जरूर है कि जो भी धरती हमें शरण दे या जिसे हम अपना घर बनाएं, उसके प्रति भी हमारी आस्था व निष्ठा होनी ही चाहिए वरना हम एक झूठा और अशांत जीवन ही जी पाएँगे। कैसे भी और किसी भी वजह से आए हों, एकबार आ गए तो कृष्ण उतने ही नन्दगांव और यशोदा के थे, जितने कि मथुरा और देवकी के। बटी आस्था में बंट पाना आसान नहीं , एक बेहद समग्र और सम्यक दृष्टिकोण मांगते हैं ये निर्णय...शायद इन्ही गुणों की वजह से श्री कृष्ण योगेश्वर कहलाए थे। 


हमारे देश की दुनिया में इतनी इज्जत और एक अलग पहचान रह पाई,  क्योंकि हमारे पास एक बेहद सुलझा हुआ और व्यावहारिक दर्शन था जो कि ऋषि-मुनियों की मनन,त्याग और आत्म-संतुष्टि की स्वावलंबी जीवन शैली की वजह से ही मिल पाया था।  इनकी निस्वार्थ सोच  सत्य, अहिंसा, शान्ति और सौहाद्र की थी और क्षमा और परोपकार जैसे इनके दैनिक सिद्धान्त थे। बुद्ध, राम  और गान्धी जैसे सशक्त और कर्मिनिष्ठ ये हमारे नेता और विचारक  अपनी सोच और जीवन-दर्शन को दुनिया के सुदूर कोनों तक लेकर गए, वह भी तब जब आजके युग की संचार-सुविधा तक नहीं थी। पूरे ही विश्व ने इन्हें सुना-समझा और कई ने तो अपनाया भी।  


यह देशप्रेम आजभी  वही समर्पण और लगाव एक आचरण और ताउम्र का जजबा ही है जो हमें आजीवन अपने देश और समाज के हित और  उत्थान के प्रति समर्पित रखता है...मात्र एक ताकत और कुर्सी का सोपान, अनैतिक और अनियंत्रित  धन कमाने का साधन, या फिर अंधा गुरूर  नहीं, जो अपने देश, अपनी जाति और अपने धर्म के अलावा न सिर्फ दूसरों को तुच्छ समझे,  घृणित और घातक षडयंत्रों के लिए उकसाएं और फिर अपराध बोध और ग्लानि से मुक्ति पाने के लिए दोष, इसपर, उसपर या  किसी पर भी डालकर बेफिक्र भी हो जाए । दूसरों की जान-माल, किसी की भी मिट्टी भर इज्जत न करे । अगर देश से प्यार है तो है, पर यह प्यार बस सीमाओं तक ही सीमित क्यों... भौगोलिक सीमाएं तो बदल जाती हैं । ... कोई अगर एक लाइन खींच दे और हमारे अपने भाई या दोस्त का घर दूसरी तरफ चला जाए तो वह रातोरात हमारा दुश्मन तो नहीं हो जाता, या हमें उसे अपना दुश्मन तो नहीं मान लेना चाहिए ?  दुनिया के किसी भी कोने में हों मां और मातृभूमि सदा ही वंदनीय रही हैं और रहेगी। यह एक नैसर्गिक अनुभूति है पर इसका दुरुपयोग, भुनाने की प्रवृत्ति और औजार की तरह इस्तेमाल दोनों ही प्रवृत्तियां अनैतिक और आतंक  फैलाने वाली ही नहीं, शर्मनाक भी हैं।    


धर्म की तरह ही प्रेम भी(देशप्रेम या किसी भी तरह का प्रेम)  बेहद निजी सवाल है, पर परिवार की तरह ही देश के प्रति भी हर नागरिक की एक जिम्मेदारी है और होनी चाहिए। किसी भी देश का उत्थान-पतन, उसकी ताकत आम आदमी ही हैं।  जौन एफ कैनेडी ने कहा था कि- यह मत सोचो कि देश तुम्हारे लिए क्या कर सकता है, यह सोचो कि तुम देश के लिए क्या कर सकते हो। प्यार स्वभावतः त्याग मांगता है। हर चीज की एक कीमत चुकानी पड़ती है। वीर शहीदों ने देश की स्वाधीनता की कीमत अपनी जान देकर चुकाई थी। आज की परिस्थितियों की यह मांग नहीं है। आज तो बस यह सोचना है कि  कहीं  इस लालच, लापरवाही और नफरत  की कीमत  देश को न चुकानी पड़ जाए।   उम्मीद है  इन भावनाओं और प्रश्नों पर सोचेगे जरूर और यदि  कुछ बदलाव या सुधार देश या मानव-समाज के हित में हैं तो उन संकल्पों से भी पीछे  नहीं हटेंगे।


15 अगस्त के इस हर्ष और उल्लासमय पर्व पर दुनिया के हर  देशप्रेमी, हर भारत वंशी और भारतवासी को स्वाधीनता दिवस की अशेष बधाइयों और शुभकामनाओं के साथ अपनी बात यहीं पर समाप्त करती हूं।


                                                                                                                                               -शैल अग्रवाल

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भावभीनी पलकों के साथ  याद कर रहे  हैं हम देश के उन अमर सपूतों को, जिन्होंने हंसते-हंसते सर्वस्व वार दिया  ताकि देश की आने वाली पीढ़ियां खुली हवा में सांस ले सकें। ...सुभाष चन्द्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह,  सुखदेव, राजगुरु...महात्मा गांधी। वीर जननी भारत माता के शहीद सपूतों की  लम्बी फहरिश्त है... वीर जो आज  भी त्याग और हिम्मत के प्रतीक बने हमारे साथ हैं। इतिहास के पन्नों पर ही नहीं, देशवाशियों के हृदयपटल पर भी  अँकित हैं।   सगर्व व ससम्मान प्रस्तुत हैं वीरों की चन्द  यादगार व मर्मस्पर्शी पंक्तियां।                                       
विपरीत और कठिन परिस्थितियों में भी देशप्रेम से ओत-प्रोत मन में चल रहे निरंतर के मन्थन और संघर्ष से उत्पन्न  सरल परन्तु  नवनीत से सारगर्भित ये शब्द, मात्र उद्गार नहीं, निश्चय ही  प्रेरणा और आत्मविश्वास... संबल थे उनके ... और देश के लिए अन्तिम संदेश भी,

     





  





सेंट्रल जेल लाहौर से अपने भाई कुलवंत सिंह को भगत सिंह द्वारा जीवन के अंतिम पत्र में लिखी गई निम्नांकित कविता पत्र सहित बाद में---1अप्रैल 1931 को अभ्युदय में प्रकाशित हुई थी। अडिग उस सेनानी के सांत्वना भरे ये शब्द  अपने  निराश भाई के लिए लिखे गए थे, परन्तु हताश् नहीं, वरन् जीने और जीतने का वचन मांगते ;


भाई कुलवंत सिंह,


आज तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर बहुत रंज हुआ। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था। तुम्हारे आंसू मुझसे बर्दाश्त नहीं हुए। प्यारे भाई हिम्मत से तालीम हासिल करते जाना और सेहत का ख्याल रखना। और क्या लिखूं? हौसला रखना, सुनो...


  


आओ मुकाबला करें


उसे यह फिक्र है कि हर दम नई तर्जे जफा क्या है


हमें यह शौक है कि देखें सितम की इंतेहां क्या है


दहर से क्यों खफा रहें चखे का क्यों गिला करें


सारा जहां अदू सही आओ मुकाबला करें


कोई दम का मेहमान हूं अहले महफिल


चिरागे सेहर हूं बुझा चाहता हूं


आवोहवा में रहेगी ख्याल की बिजली


ये मुश्ते खाक है फानी रहे न रहे


अच्छा खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।


आनंद से रहना तुम्हारा भाई भगत सिंह


















दो कविताएँ चन्द्रशेखर आजाद की जुबानी - 





वही शाहे शहीदां है...


वही शाहे शहीदां है, वही है रौनके आलम


वतन पर दे के जां जो जंग के मैदां में सोता है


उसी का नाम रोशन है उसी का नाम बाकी है


कि जिसकी मौत पर दुनिया का हर इंसा रोता है


जरा बेदार हो अब ख्वाबे गफलत  से जवानो तुम


कि जिसमें जोरे बाजू है, वही 'आजाद' होता है


यही दुनिया से अब इस सूरमा की रूह कहती है


गरीबों को मिले रोटी तो मेरी जान सस्ती है।















वतन के वास्ते


हम दिखाएंगे तुम्हें वह कुब्बते फरियाद की


बैसदा होगी नहीं जंजीर है ' आजाद ' की


कौन कहता है कि मेरा रावगां खूं जाएगा


मरनेवालों  जब एक दुनिया नई आबाद की


किस तरह से जान देते हैं वतन के वास्ते


फकत दुनिया में तुम्हें थे यह बताने आये हम


खुश रहो अहले वतन चलते हैं---वंदेमातरम्।





( प्रतिबिंब आत्मकथाः चंद्रशेखर आजाद की जीवनी; बलदेव प्रसाद शर्मा, बनारस 1931) 

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                                                                                                                                                                        कविता आज और अभी


 


हस्ताक्षर


हस्ताक्षर भी


हम करते हैं


एक विदेशी


भाषा में


कैसे हम


आजाद हो गए


बोलो किस


परिभाषा में?


 राजेश चेतन


रोहिणी, नई दिल्ली
















                                                                                                                    
                                                                                                                                       





भारत की खोज  

कहाँ है भारत सोचती हूँ मै
लोगों की भावनाओं में इसे खोजती हूँ मै
कहाँ से है आप पूछने पे
लोगों ने यू पी,बंगाल ,महाराष्ट्र ,पंजाब बताया
कुछ ने एम पी तमिलनाडु ,गुजरात ,मद्रास बताया
सबने अपना छेत्र बताया
किसी ने भी न हिंदुस्तान बताया
आ के यहाँ सभी ने अपना संगठन बनाया
विदेशी धरती पे भारत को टुकडों में बिछाया
पता नही ये  कब कैसे हो गया
देश प्रदेशों में  खो गया 
लोगों की जमा भीड़ में ,                                                                                                                                                                                                                        देश को तलाशती रही मै
दूर तक फैले अंधकारों  में  
बहुत देर तक टटोलती रही मै
पर धर्म ,जाति,भाषा के अलावा
कुछ भी मेरे हाथ नही आया
प्रान्तीयता के सामने मैने देश को झुका पाया
दुःख तो इस बात का है के
भारतीयों में भी कंही भारत को न पाया
देश नही होगा तो प्रदेश साँस कैसे लेगा
कट गया पेड़ तो बसेरा कहाँ होगा .
क्या प्रदेश से पहले देश नही है दोस्तों
एक बार बस शान्ति से इतना सोचना दोस्तों     


                           -रचना श्रीवास्तव,
                              डैलस यू.एस. ए.





 














लेकिन





आशा दिलानेवाले शब्दों में एक है लेकिन


किसी दर्दनाक दुर्घटना का संवाद सुनते


बढ़ जाती है दिल की धड़कन


चिंता हो जाती है


आत्मीय स्वजन के अपशकुन की


तैरते-तैरते दरिया में चले जाने पर दूर


समा जाता है आतंक, डूब जाने का


नाव को आते ही देख


आशा देता है लेकिन उससे बचने का।


आतंकवादियों के कारनामों से


मुहल्ले में लेती है पुलिस,


घर-घर तलाशी


बैठाते हैं वाहनों पर एक-एक


पूछताछ के बाद देने पर छोड़


आशा देता है लेकिन


उसके चंगुल से बच निकल जाने का।


मद्यरात्रि को नवजात शिशु के क्रंदन से


जाती है टूट नीन्द माताओं की


एकाएक


हो जाने पर शान्त


आशा देता है लेकिन


उसके सो जाने का।


शब्दों की ही आँख मिचौली


बढ़ा देती है दिल की धड़कन


समझ बैठते स्थिति पर हो गया है काबू।


लेकिन


चलती रेलगाड़ी की घटना का समाचार-


दहला देता है दिल


आतंकवादियों के कारनामों का


शब्द ही दिलाता है आशा


बंधवाता है उम्मीद


क्षणिकता से अमरता की।


       डॉ. रामचन्द्र राय


  शान्तिनिकेतन, पश्चिमी बंगाल

















आज़ादी का त्योहार


लज्जा ढकने को
मेरी खरगोश सरीखी भोली पत्नी के पास
नहीं हैं वस्त्र,
कि जिसका रोना सुनता हूँ सर्वत्र !
घर में, बाहर,
सोते-जगते
मेरी आँखों के आगे
फिर-फिर जाते हैं
वे दो गंगाजल जैसे निर्मल आँसू
जो उस दिन तुमने
मैले आँचल से पोंछ लिए थे !

मेरे दोनों छोटे
मूक खिलौनों-से दुर्बल बच्चे
जिनके तन पर गोश्त नहीं है,
जिनके मुख पर रक्त नहीं है,
अभी-अभी लड़कर सोये हैं,
रोटी के टुकड़े पर,
यदि विश्वास नहीं हो तो
अब भी
तुम उनकी लम्बी सिसकी सुन सकते हो
जो वे सोते में
रह-रह कर भर लेते हैं !
जिनको वर्षा की ठंडी रातों में
मैं उर से चिपका लेता हूँ,
तूफ़ानों के अंधड़ में
बाहों में दुबका लेता हूँ !

क्योंकि, नये युग के सपनों की ये तस्वीरें हैं !
बंजर धरती पर
अंकुर उगते धीरे-धीरे हैं !

इनकी रक्षा को
आज़ादी का त्योहार मनाता हूँ !
अपने गिरते घर के टूटे छज्जे पर
कर्ज़ा लेकर
आज़ादी के दीप जलाता हूँ !
अपने सूखे अधरों से
आज़ादी के गाने गाता हूँ !
क्योंकि, मुझे आज़ादी बेहद प्यारी है !
मैंने अपने हाथों से
इसकी सींची फुलवारी है !

पर, सावधान ! लोभी गिद्धो !
यदि तुमने इसके फल-फूलों पर
अपनी दृष्टि गड़ाई,
तो फिर
करनी होगी आज़ादी की
फिर से और लड़ाई !


       -महेन्द्र भटनागर,


       ग्वालियर, मध्य प्रदेश



 













मेरा देश

प्रगतिशील मेरा देश

प्रगति कर रहा है


विकासशील देशों से हटकर


विकसित देशों की


कतार को उन्मुख  है


विकसित देशों की तरह


शान्ति को भूल


मूल्यों को भूल


जीना सीख गया है।





लूटमार , व्यभिचार, हिंसा


और धोखाधड़ी  की खबरें


अब  यहां भी चौंकाती नहीं


आम बातें हैं आज

खूनी डाकू...


और बाहुबली जो


लेते यहां


संरक्षण ही नहीं, ताकत भी.....


और

चोरी डकैती   फिरौती का  

नियमित राजसी भत्ता !





जरूरी हो  शायद यह भी


नयी  पहचान हेतु,


जितना विकसित देश


उतना  खून-खराबा


आदर्शों का, इन्सानों का


कुर्सी ही शायद सबसे बड़ी


अधीन मुद्दा


देश या  इन्सान नहीं! 





उत्तेजना का युग है यह


पुराने से आदमी

वैसे भी तो


ऊब ही जाता है


फिर सीधी उंगली से घी

भला कब निकल पाता है ! 



ज्ञान, प्रतिभा, भाईचारा


सहज सेवा जैसी


किताबी और बेहद पुरानी

बातों से हटकर


खेत खलिहान


गांवों से निकलकर


(अहिंसा...कैसी अहिंसा


किस युग के आदमी हो तुम)


हम भी तो अब


विध्वंसक-शस्त्रों की

खोज में ही  


प्रगति शील हैं !





तर्क है  कि आज भी तो 


लाठी वाला ही भैंस हांकता है


पर पहले भी तो ऐसा ही था ...


और  हम पानी को पानी कहते थे


राम  कृष्ण गौतम के स्वर में


वेदों  की वाणी कहते थे!


                          शैल अग्रवाल























आम के पत्ते


वह जवान आदमी


बहुत उत्साह के साथ पार्क में आया


एक पेड़ की बहुत सारी पत्तियां तोड़ीं


और जाते हुए मुझसे टकरा गया


पूछा-


अंकल जी, ये आम के पत्ते हैं न


नहीं बेटे, ये आम के पत्ते नहीं हैं


कहां मिलेंगे पूजा के लिए चाहिए


इधर तो कहीं नहीं मिलेंगे


हां, पास के किसी गांव में चले जाओ


वह पत्ते फेंककर चला गया


मैं सोचने लगा-


अब हमारी सांस्कृतिक वस्तुएं


वस्तुएं न रह कर


जड़ धार्मिक प्रतीक बन गयी हैं


जो हमारे पूजा पाठ में तो हैं


किन्तु हमारी पहचान से गायब हो रही हैं।


                       -डॉ. रामदरश मिश्र


                       उत्तम नगर, दिल्ली




















देश मांगता


देश मांगता तुमसे निज इतिहास पुराना


वही स्वर्णयुग, गुप्तकाल का वही जमाना


तुमने देखी हैं भारत की स्वर्णिम सदियां


सोने के प्रासाद, दूध की बहती, नदियां


फिर से वही महान समय तुमको है लाना


वही स्वर्ण युग, गुप्तकाल का वही जमाना !


दृढ़ प्रतिज्ञ चाणक्य बने देश का हर नर


समर छेड़ दे स्वाभिमान-हित अखिल धरा पर


वही विश्व-सम्मान तुम्हें फिर से है पाना


वही स्वर्णयुग, गुप्तकाल का वही जमाना !


ज़रा क्रांतिवीरों की याद करो गाथाएँ


अजर-अमर हो गईं जिन्हें जनकर माताएँ


आज़ादी का वही गीत फिर से है गाना


वही स्वर्णयुग, गुप्तकाल का वही जमाना !


तुम्हें भूत को ला रखना है वर्तमान में


और भविष्यवत् भी रखना है सदा ध्यान में


तुम्हें इसी धरती पर फिर से स्वर्ग बसाना


वही स्वर्णयुग,  गुप्तकाल का वही जमाना।


                               -डॉ ब्रह्मजीत गौतम  


                                   भोपाल, मध्य प्रदेश








 








ऋचाओं में कथानक


क्यों ढूँढते हो तुम ऋचाओं में कथानक,


ये


प्रश्न सारे,


यों न सुलझेंगे,


व्यर्थ ही तुम जाओगे तब थक,





हर कथन में है छिपी


गहरी चुभन।


बस बिखरना है यहाँ,


आकाश बन।


इन भोजपत्रों को न ताको,


अपलक ।





शब्द क्यों इतने


तराशे जा रहे।


आज रिश्ते सिर्फ टाँके जा रहे।


नुच गए हैं


चित्र सारे,


हो गया गूँगा फलक.


रोशनी को पी गयी


घाटी कोई,


छल रही है चुप्पियों को,


कोई परिपाटी नई।


अब धुँऐले चित्र बन-बन


मिट रहे मानक।


  - पंकज मिश्र 'अटल ' शाहजहाँपुर ( उ. प्र) 


    


              
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                                                                                                                                                                       कविता-धरोहर





मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम









मातृ-भू, शत-शत बार प्रणाम
ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
तेरे उर में शायित गांधी, 'बुद्ध औ' राम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
तेरे चरण चूमता सागर,
श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ
वाणी में है गीता का स्वर।
ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

हरे-भरे हैं खेत सुहाने,
फल-फूलों से युत वन-उपवन,
तेरे अंदर भरा हुआ है
खनिजों का कितना व्यापक धन।
मुक्त-हस्त तू बाँट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

प्रेम-दया का इष्ट लिए तू,
सत्य-अहिंसा तेरा संयम,
नयी चेतना, नयी स्फूर्ति-युत
तुझमें चिर विकास का है क्रम।
चिर नवीन तू, ज़रा-मरण से -
मुक्त, सबल उद्दाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

एक हाथ में न्याय-पताका,
ज्ञान-द्वीप दूसरे हाथ में,
जग का रूप बदल दे हे माँ,
कोटि-कोटि हम आज साथ में।
गूँज उठे जय-हिंद नाद से -
सकल नगर औ' ग्राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।

                 - भगवती चरण वर्मा
















अरुण यह मधुमय देश हमारा।








अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।  


सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

          - जयशंकर प्रसाद















मेरा देश जल रहा









घर–आँगन सब आग लग रही
सुलग रहे वन–उपवन
दर–दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर–छाजन

तन जलता है¸ मन जलता है
जलता जन–घन–जीवन
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बन्धन।
दूर बैठकर ताप रहा है¸ आग लगाने वाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

भाई की गर्दन पर
भाई का तन गया दुधारा
सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बंटवारा
एक अकड़ कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगे
और दूसरा कहता
तिल भर भूमि न बँटने देंगे
पंच बना बैठा है घर में¸ फूट डालने वाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

दोनों के नेतागण बनते
अधिकारों के हामी
किन्तु एक दिन को भी
हमको अखरी नहीं गुलामी
दानों को मोहताज हो गए
दर–दर बने भिखारी
भूख¸ अकाल¸ महामारी से
दोनों की लाचारी
आज धार्मिक बना¸ धर्म का नाम मिटाने वाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

होकर बड़े लड़ेंगे यों
यदि कहीं जान मैं लेती
कुल – कलंक – संतान
सौर में गला घोंट मैं देती
लोग निपूती कहते पर
यह दिन न देखना पड़ता
मैं न बँधनों में सड़ती
छाती में शूल न गड़ता
बैठी यही बिसूर रही माँ¸ नीचों ने धर डाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

भगतसिंह अशफाक¸
लालमोहन¸ गणेश बलिदानी
सोच रहे होंगे हम सब की
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की
देकर खाद¸ खून से सींचा
अंकुर लेते समय¸ उसी पर
किसने जहर उलीचा
हरी भरी खेती पर ओले गिरे¸ पड़ गया पाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

जब भूखा बंगाल¸ तड़प
मर गया ठोंक कर किस्मत
बीच हाट में बिकी
तुम्हारी माँ–बहनों की अस्मत
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख–बिलख नर–नारी
कहाँ गई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी
तब अन्याय का गढ़ तुमने क्यों न चूर कर डाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

पुरखों का अभिमान तुम्हारा
और वीरता देखी¸
राम–मुहम्मद की सन्तानो
व्यर्थ न मारो शेखी¸
सर्वनाश की लपटों में
सुख–शान्ति झोंकने वालो
भोले बच्चों¸ अबलाओं के
छुरा भोंकने वालो
ऐसी बर्बरता का इतिहासों में नहीं हवाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

घर घर माँ की कलख
पिता की आह¸ बहन का क्रन्दन
हाय¸ दुधमुँहे बच्चे भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी?
मुँह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे न भारतवासी।
हँसते हैं सब देख गुलामों का यह ढंग निराला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

जाति – धर्म – गृह–हीन
युगों का नंगा–भूखा–प्यासा
आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा
ये छल–छंद शोषकों के हैं
कुत्सित¸ ओछे¸ गन्दे
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फन्दे
तेरा एका¸ गुमराहों को राह दिखाने वाला
मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।

              शिवमंगलसिंह -"सुमन"

















तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है








तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है
सचमुच आज काट दी हमने
जंजीरें स्वदेश के तन की
बदल दिया इतिहास बदल दी
चाल समय की चाल पवन की

देख रहा है राम राज्य का
स्वप्न आज साकेत हमारा
खूनी कफन ओढ़ लेती है
लाश मगर दशरथ के प्रण की

मानव तो हो गया आज
आज़ाद दासता बंधन से पर
मज़हब के पोथों से ईश्वर का जीवन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

हम शोणित से सींच देश के
पतझर में बहार ले आए
खाद बना अपने तन की-
हमने नवयुग के फूल खिलाए

डाल डाल में हमने ही तो
अपनी बाहों का बल डाला
पात पात पर हमने ही तो
श्रम जल के मोती बिखराए

कैद कफस सय्यद सभी से
बुलबुल आज स्वतंत्र हमारी
ऋतुओं के बंधन से लेकिन अभी चमन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।
यद्यपि कर निर्माण रहे हम
एक नयी नगरी तारों में
सीमित किन्तु हमारी पूजा
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारों में

यद्यपि कहते आज कि हम सब
एक हमारा एक देश है
गूंज रहा है किन्तु घृणा का
तार बीन की झंकारों में

गंगा ज़मज़म के पानी में
घुली मिली ज़िन्दगी़ हमारी
मासूमों के गरम लहू से पर दामन आज़ाद नहीं है ।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

                                         गोपाल दास 'नीरज'

















आग की भीख








धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।



रामधारी सिंह दिनकर

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                                                                                                                                                                     मेरा देश







                                                                                                                                                              -

                                                                                                                                                                             शैल अग्रवाल


अभिनंदन








मेरे आजाद देश की
साल गिरह पर
लोगों ने बहुत कुछ गाया
खूब जश्न मनाया
फिर मेरे मस्तिष्क में ही क्यों
एक तूफान-सा उठा है
हृदय को लपेटता 
मेरे अस्तित्व को ही
जो आज ले उड़ा है
दूर बहुत दूर
नदी-नाले समुंदर पहाड़
पार करता उस देश
उस धरती की ओर
जो मेरा घर था, घर है
मेरा अपना भारत देश
माना कि धीरे-धीरे
मेरे सब निशान
मिटते जा रहे हैं
और बंजारे सी अपनी
नई पहचान के संग
खड़ी सोच रही हूँ मैं -
कि कैसे तुम मुझे अब
इससे दूर-दूर रख पाओगे
मैं तो इसी की
मिट्टी से बनी हूँ
और यह मिट्टी
मेरे पूर्वजों के
खून से सिंची है
इसी ने तो मुझे
सर्वस्व दिया है
और इसी ने 
मेरा सुख-चैन                                                                                                                                                                                     सबकुछ लिया है
मैं इसकी पहचान हूँ
यह मेरा अभिमान।                                                                                                                                                                                                                         क्या हुआ जो दूर                                                                                                                                                                                                                               मुझसे बहुत  दूर                                                                                                                                                                                                                           मेरा देश महान!


स्वराज लेकर भी
सुराज का सपना देखने वाली
हर आँख क्यों आज भी
बस खून के ही
आँसू रो रही है
क्यों गरीबी
और भ्रष्टाचार के
बिस्तर पे लेटी
मेरे आजाद भारत की
किस्मत
आजतक सो रही है

क्यों दुराचारी दशानन के
दसों सर कट-कटकर
बार बार ही उग आते हैं
देखो विभीषण के संग
राम, लक्ष्मण और हनुमान
जाने कब कहाँ और कैसे


                                                                                                                                                                                                                             वापस मिल पाते हैं

सफेद हरे और वसंती
रंग में लिपटा यह तिरंगा
शान्ति, सौहाद्र और
संयम का प्रतीक है                                                                                                                                                                                                                        हमने माना                                                                                                                                                                                                                              अमन हमे प्यारा है
यह भी हमने जाना                                                                                                                                                                                                                       भटके यदा-कदा
पर भूले नहीं
बसंती चोले पर
जब-जब
खून के छींटे पड़े
हजारों प्राण आज भी
कर्तव्य-पथ पर
साथ-साथ ही आगे बढ़े

शस्त्रों के संग लड़ने वाले
सब वे सेनानी वीर हैं
सिर्फ आत्म-बल पे
जो लड़े
मेरे देशवासी
वीर ही नहीं
महावीर हैं
राम, कृष्ण, बुद्ध
और नानक जैसे
महात्मा
पैगम्बर पीर हैं

मेरे हाथों में
श्रद्धा के फूल
और आँखों में
कर्तव्य का पानी
मेरे प्यारे देश बता
आज मैं तुझ पर
कौनसा फूल चढ़ाऊँ
देश-परिवेश की
परिधियों से परें
हम-तुम तो अभिन्न
और अविच्छेद हैं
जो कुछ भी मेरा
तन-मन-धन सब
तुझको ही अर्पण
आशीष यही चाहूँ
अब तो
जब भी जन्मूँ
सिर्फ भारती
बनकर ही मैं आऊँ
मैं तेरी पहचान हूँ
तू मेरा अभिमान
क्या हुआ जो दूर
मुझसे बहुत दूर
मेरा देश महान!











 


हिन्दू







मेरा देश बस साँप-सपेरे


और मदारियों का देश नहीं


जहां जादू से रस्सी चढ़


साधू गायब हो जाए


ना ही यह पुनर्जन्म


और अंधविश्वासों की कोई


लम्बी रोमांचक गाथा है


मैने तुमसे कब कहा था


कि तुम सर मुड़ाकर


राम-नामी दुपट्टा ओढ़े


किसी नदी किनारे जा बैठो


तभी सच्चे हिन्दू बन पाओगे


ज्ञानी ही कहलाओगे


मेरा धर्म कोई विधिवत्


सन्यास नहीं, जीवन है


जीने की एक आदत है


' जो जिओ और जीने दो '


का मूलमंत्र सिखलाता है


अन्दर से जो जगे


वही बुद्द है


वरना समस्त ज्ञान लेकर भी


ज्ञानी नेति-नेति चिल्लाता है


यह किसी प्रभु द्वारा लिखा


पराधीनता का दस्तावेज नहीं


निष्कर्म बना मानव को


जो बारबार


अपना ही नाम रटवाए...


कर्म-धर्म है यह


हर कर्म-योगी का


बादल, पवन, पक्षी-सा


हवा में उड़ता बस


एक खयाल नहीं।


हिन्दू, मुसलमान


सिख, ईसाई क्या


तुम पक्षी पौधे तक


कुछ भी बनकर


आ सकते हो


जैसे कर्म करोगे


वैसी ही योनि पाओगे


सीदे-सादे मेरे देश की


हर बात बड़ी ही सीधी है


जो गोदी में बिठलाए


भूख, प्यास मिटाए


वह धरती, नदिया, गैया


आज भी बस


माता ही तो कहलाए ।

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                                                                                                                                                                          जन्माष्टमी विशेष   

यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्‍हैया बनता धीरे धीरे
ले देती यदि मुझे तुम बांसुरी दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली
तुम्‍हें नहीं कुछ कहता, पर मैं चुपके चुपके आता
उस नीची डाली से अम्‍मां ऊंचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बांसुरी बजाता
अम्‍मां-अम्‍मां कह बंसी के स्‍वरों में तुम्‍हें बुलाता


सुन मेरी बंसी मां, तुम कितना खुश हो जातीं
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आतीं
तुमको आती देख, बांसुरी रख मैं चुप हो जाता
एक बार मां कह, पत्‍तों में धीरे से छिप जाता
तुम हो चकित देखती, चारों ओर ना मुझको पातीं
व्‍या‍कुल सी हो तब, कदंब के नीचे तक आ जातीं
पत्‍तों का मरमर स्‍वर सुनकर,जब ऊपर आंख उठातीं
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितनी घबरा जातीं


ग़ुस्‍सा होकर मुझे डांटतीं, कहतीं नीचे आ जा
पर जब मैं ना उतरता, हंसकर कहतीं मुन्‍ना राजा
नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्‍हें मिठाई दूंगी
नये खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी
मैं हंसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता
वहीं कहीं पत्‍तों में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता
बुलाने पर भी जब मैं ना उतरकर आता
मां, तब मां का हृदय तुम्‍हारा बहुत विकल हो जाता


तुम आंचल फैलाकर अम्‍मां, वहीं पेड़ के नीचे
ईश्‍वर से विनती करतीं, बैठी आंखें मीचे
तुम्‍हें ध्‍यान में लगी देख मैं, धीरे धीरे आता
और तुम्‍हारे आंचल के नीचे छिप जाता
तुम घबराकर आंख खोलतीं, और मां खुश हो जातीं
इसी तरह खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे ।।

                                             सुभद्रा कुमारी चौहान














मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

धुरि भरे अति सोहत स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछोटी॥
वा छबि को रसखान बिलोकत, वारत काम कला निधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥

कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।
माहिनि तानन सों रसखान, अटा चड़ि गोधन गैहै पै गैहै॥
टेरी कहाँ सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोई कितनो समझैहै।
माई री वा मुख की मुसकान, सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥

मोरपखा मुरली बनमाल, लख्यौ हिय मै हियरा उमह्यो री।
ता दिन तें इन बैरिन कों, कहि कौन न बोलकुबोल सह्यो री॥
अब तौ रसखान सनेह लग्यौ, कौउ एक कह्यो कोउ लाख कह्यो री।
और सो रंग रह्यो न रह्यो, इक रंग रंगीले सो रंग रह्यो री।


                                                                          -रसखान


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किधर जा रहे हैं हम साहित्य में भी और समाज में भी... आज हमारे कथा-साहित्य में ' गोरा'  जैसे तेजस्वी चरित्र न के बराबर हैं, जो स्वयं ठोंककर कहें कि ' आज इस भारत वर्ष में सबकी जात मेरी जात है, सबका अन्न मेरा अन्न है। ' सद्य प्रकाशित साहित्यिक कृतियों की जानकारी से भरपूर यह लेख  चार साल पहले आजकल पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। तत्कालीन साहित्य और सामाज की पड़ताल कर  रही हैं सुप्रसिद्ध कथा लेखिका चंद्रकांता-  


 


                                                                                                                                                                                                  मंथन







                                                                                                                                                                                                            चंद्रकांता


नई शताब्दी में हिन्दी कथा साहित्य



नई सदी के आगमन के करीब डेढ़ दशक पूर्व भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने तकनीकी करिश्मों, विडियो-इंटरनेट के संजाल और विश्व-व्यापार नीतियों के रास्ते हमारे देश-समाज को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया था। हमारे साहित्य में भी यहां-वहां इसके प्रभाव दिखने लगे थे। फास्ट फूड, फास्ट म्यूजिक और फास्ट लाइफ के नारे वाले समय में, विडियो-इंटरनेट का सूचना विस्फोट है, और देशी-विदेशी चैनलों पर शोर-शराबे वाले संगीत, सेक्स और हिंसा से भरपूर भोगवादी मनोरंजन अब घरों के भीतरी कक्षों में प्रवेश पा गए हैं। आम जन मुग्ध, चकित और हतप्रभ है। हम एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं, और हम एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।


यह सच अब स्पष्ट हो गया है कि भूमंडलीकरण विश्व ग्राम की अवधारणा लेकर नहीं आया है। निरंकुश सत्ताधारियों ने अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए विकासशील देशों को अपने स्वार्थ के लिए मुद्दा बना लिया है। वहां वैश्विक चिंताएं नहीं हैं। जोसेफ. ए. स्टिंग्लिट्ज ने द रोरिंग नाइनटीज पुष्तक में भूमंडलीकरण का उद्देश्य विभिन्न देशों के साथ मिलकर आर्थिक, सैनिक और बढ़ते आतंकवाद की समस्याओं के समाधान की कोशिश थी, लेकिन अमरीका शक्ति का अकेला और निरंकुश केन्द्र हो जाने के कारण, न्याय, समताभाव को ताक पर रखकर अपने स्वार्थ और हित के लिए दूसरों पर दबाव और धौंस जमाता रहा।


इसका प्रभाव हम पर यह हुआ कि हम एक नयी गुलामी की जद में आ गए। बाजार ने मनुष्य के सामाजिक संबंधों में घुसपैठ की, रिश्ते अर्थ की तुला पर तुलने लगे। एक आयातित संस्कृति के आक्रमण ने हमारे मूल्यों को बुरी तरह प्रभावित किया। एक ओर ज्ञान के नए वातायन खुले,  दूसरी ओर हमारी चिंतन परंपरा को गहरा आघात लगा। धनी अधिक धनवान और निर्धन अधिक कंगाल होता गया साथ में प्रतिस्पर्धा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना बढ़ी।


बीसवीं  सदी में दो विश्व युद्ध हुए। वहां मनुष्य की स्वाधीनता और संघर्ष से जुड़ी चिंताएँ थीं, उपनिवेशवाद का विरोध था, लेकिन आज अर्थकेन्द्रित तंत्र और मूल्यहीन राजनीति के हथकंडों ने मनुष्य को हाशिए पर डाल दिया है। एक नए साम्राज्यवाद और बाजारवादी प्रवृत्तियों वाले इस दौर में हम नए संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं। यह हमारे संस्कारों-मूल्यों को बचाने की परीक्षा का समय है, हमारे हम बने रहने की परीक्षा का समय है।


हमारा साहित्य तमाम सार्वभौमिकता के गुणों के बावजूद इसी समय का साक्ष्य है, परीक्षक विश्लेषक भी। इसी समय की रक्त-कीच में सनकर वह गूंगे-मजलूमों की आवाज भी बनता है और मनुष्य के होने और जीने की अर्थवत्ता भी ढूंढता है।


हिन्दी कथासाहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखें,  तो समय की गाथा कहकर समय के पार जाने वाले साहित्य में भी, तात्कालिक व्यवस्था के साथ, मनुष्य की आकांक्षाओं, समस्याओं के घात-प्रतिघात और मुठभेड़ के साथ, मनुष्य विरोधी तंत्र का विरोध दर्ज है। यह सही है कि आज हमारे कथासाहित्य में ' गोरा ' जैसे तेजस्वी चरित्र न के बराबर हैं, जो ठोककर कहें कि ,  'आज इस भारतवर्ष में सबकी जात मेरी जात है, सबका अन्न मेरा अन्न है। '  इस स्वाभिमानी और स्वदेशी स्वर की साहित्य में अनुपस्थिति को डा. नामवर सिंह ठीक ही युग की मानसिकता से जोड़कर देखते हैं। लेकिन उस मानसिकता के लिए लेखक किस हद तक दोषी है! यह विचार करने लायक प्रश्न है। हमारी मानसिकता हमारे राजनीतिक- सामाजिक परिवेश में पनपती प्रवृत्तियों से बनती है। उस यथार्थ से जिसमें हम जीते और सांस लेते हैं। हमारी बाह्य परिस्थितियां हमारी सोच और मनोविज्ञान को नियंत्रित करती हैं। इस व्यवस्था जन्य परिवेश को काटकर, हम रचनाकारों को कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते। वह जिस व्यव्स्था के बीच जीते-मरते मनुष्य की पीड़ा को महसूस करेगा, उसी परिवेश से आपकी कथा के पात्र चुनेगा, उनकी तमाम खूबियों-खराबियों के साथ और उनके दुख द्वन्द्व और संघर्ष से जुड़ेगा।


बहुत पीछे न जाकर देखें तो कथा सम्राट प्रेमचन्द ने भी ऐसा ही किया। कहानी को उन्होंने प्रसाद की पौराणिक शैली से अलग विशुद्ध यथार्थ के धरातल पर मनुष्य की समस्यओं से सीधे जोड़ दिया। किसानों, दलितों, और शोषितों का पक्षधर बनकर उन्होंने गोदान, सेवासदन, रंगभूमि जैसे उपन्यास और सदगति, ठाकुर का कुँआ आदि कहानियां लिखीं। उन्होंने जहां समाज में व्याप्त अन्याय, अत्याचार और शोषण के प्रति जनता को सचेत किया वहीं रंगभूमि के सूरदास के चरित्र के माध्यम से गलत व्यवस्था के विरुद्द प्रतिशोध और संघर्ष की प्रेरणा भी दी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही विभाजन से उपजी त्रासद स्थितियां-हत्या, आतंक और घरों से बेघर होने के माहौल को, जिसे नेहरू ने ‘ ह्यूमेन अर्थक्वेक’ कहा, रचनाकारों ने साहित्य में दर्ज कराने के प्रयास किए। इसमें भीष्म साहनी का तमस उपन्यास, अमृतसर आ गया कहानी, मोहन राकेश की मलवे का मालिक, अज्ञेय की शरणदाता, कृष्णा सोबती की सिक्का बदल गया आदि यादगार कहानियां आईं, जो समय के सच को मद्देनजर लिखी जाने के बावजूद गहरी मानवीय संवेदना के कारण सर्वकालिक बन गईं।

उखड़ने, उजड़ने और मानवीय मूल्यों के ध्वस्त होते समय ने लेखकों को बराबर उद्वेलित किया है। तभी तो राही मासूमतम रजा के आधा गांव, शानी के काला जल से लेकर कुछ वर्ष पूर्व आए नासिरा शर्मा के जिंदा मुहावरे और मंजूर एहतेशाम के दास्ताने लापता और नई सदी के पहले वर्ष में आए चंद्रकान्ता के कथा सतीसर जैसी दस्तावेजी रचनाएँ जन्म ले सकीं।

अपनी जमीन से कटने की व्यथा शिव प्रसाद सिंह के उपन्यास अलग-अलग वैतरणी में भी थी।  एक उदास प्रश्न था कि किन विवशताओं के कारण गांव, नाचिरागी मौजों में बदलते हैं?  शिव प्रसाद सिंह अपने पात्रों से कहलवाते हैं कि 'तोहमत लगाकर तो मेहरारू को छोड़ते हैं, महतारी को नहीं। ' पर आज हमारा युवा विदेशी सुविधाओं और संपन्नताओं के मोह में आँख बन्दकर अमरीका नहीं तो गल्फ भाग जाने को तैयार है। वह न जन्मदात्री छोटी महतारी के विषय में सोचता है, न बड़ी महतारी के ! परिणाम सम्मिलित परिवारों का टूटना और थके-टूटे वार्धक्य में अकेलेपन से जूझना आज समय का सच हो गया है, मूल्यों, मान्यताओं की चिंता गौण।


दरअसल नई सदी के इस दौर में हम विचित्र  स्थिति में हैं। आजादी पाने के 57 वर्षों बाद , एक ओर तो हम वैज्ञानिक-तकनीकी उपलब्धियों की  तमाम ऊंचाइयाँ  छू रहे हैं , परमाणु बम भी बना चुके हैं, पर दूसरी ओर बहुत पीछे, मद्य युग की बर्बरता और अंधेरों में भटक रहे हैं। स्त्रियों की स्थिति, तमाम महिमामंडल और कानून के बावजूद कुछ वैसी ही है जैसी सविता सिंह की इन पंक्तियों में दर्ज हैः


नमन करूं इस देश को


जहां मार दी जाती हैं हर रोज, ढेर सारी औरतें


जहां एक औरत का जीवित रहना


एक चमत्कार की तरह है।


हिंसा, भ्रूणहत्या, परिवारिक शोषण आदि ब्यौरों में न जाकर यह कहना जरूरी लगता है कि आज धर्म, दर्शन, राजनीति, समाज व्यवस्था शंका के दायरे में आ गए हैं। यथार्थ का परीक्षण करते संदेह और विद्रोह लेखक के अस्त्र बन गए हैं, जबकि भारतीय दर्शन और चिंतन जीवन सत्यों को जिज्ञासा के माध्यम से खोजता रहा है। क्या ये स्थितियां मात्र विदेशी प्रभाव और भूमंडलीकरण की देन हैं? क्या हमें अपने गिरेबान में झांककर देखने और आत्मलोचन की जरूरत नहीं है? लेखक इसी आत्मलोचन के लिए समाज को टहोके देता है।


आज हिन्दी में तीन पीढयों के लेखक इसी आत्मलोचन के लिए, उकसाने की खातिर रचनाकर्म में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। एक साथ अमरकांत, शेखर जोशी, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोवती की वरिष्ठ पीढ़ी, दूधनाथ सिंह, गिरिराज किशोर, कमलेश्वर, मुद्राराक्षस, गोविंद मिश्र से लेकर उदय प्रकाश, देवेन्द्र, हरि भटनागर और शशिभूषण द्विवेदी तक ढेरों लेखक सक्रिय हैं। लेखिकाओं में कृष्णा सोबती, राजी सेठ, नमृता सिंह, सूर्यबाला, मेहरुन्निसा परवेज, मालती जोशी, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, चंद्रकान्ता, सुनीता जैन, कमल कुमार से लेकर नई लेखिका शीताक्षी सिंह तक अनेक नाम हैं जो उपन्यास, कहानी लेखन में महत्वपूर्ण काम कर रही हैं।


हाल ही में अमरकांत के दो उपन्यास काले उजले दिन और आकाश पक्षी आए हैं जो इस भ्रष्ट समय में जीवन मूल्यों की गिरावट के प्रति उनकी चिंता दर्शाते हैं। एक कथा में सामंती मानसिकता वाले परिवार के द्वन्द्वों और आपसी टकराव की परिणीतियां हैं तो दूसरे उपन्यास में प्रेम के त्रिकोण के माद्यम से नैतिक मूल्यों  के क्षरण की दास्तान। विषय नया न होने के बावजूद, सरल प्रवाहित शैली में विगत के  रजवाड़ों के दंभ और दिखावे की प्रवृत्ति को उघाड़ा  गया है। बेमेल विवाह से उत्पन्न पारिवारिक क्लेश और टूटन को अमरकान्त ने सधी हुई भाषा में पाठकों तक संप्रेषित किया है।


कुछ वर्ष पूर्व निर्मल वर्मा का उपन्यास अंतिम अरण्य आया। इसे पढ़कर मुझे अशोक बाजपेयी का कथन याद आया कि ' साहित्य  स्मृतियों का पुनर्वास है- सच्चाई और स्वप्नों के बीच की वह जगह, जहां नैतिक और मानवीय होना अभी भी संभव है। '  अँतिम अरण्य में जीवन और मृत्यु के संदर्भ में स्मृतियों का संजाल है, जीवन-मृत्यु को समझने की गहरी दार्शनिक दृष्टि है, जो महत्वपूर्ण है परन्तु पाटक को उदास अकेलेपन में धकेल देती है। इसी उपन्यास के साथ कृष्णा सोबती का समय सरगम भी आया था। जहां एक ओर संयुक्त परिवारों में तेजी से पनपते बुजुर्गों के प्रति उपेक्षाभाव की चिंता है , वहीं दूसरी ओर जीवन को आखिरी सांस तक जीने का संकल्प भी,  यहां जीवन तमाम विसंगतियों के बावजूद  एक उत्सव है। दो भिन्न दृष्टियों से जीवन की अर्थवत्ता को समझने की वयस्क दृष्टि।


इधर पिछले कुछ वर्षों से दलितों और शोषितों की समस्याओं से  जुड़े कई उपन्यास और कहानियां आई हैं। सूरजपाल चौहान, स्योराज सिंह बेचैन, मोहनदाष नैमिषराय आदि इनमें कुछ प्रमुख नाम हैं। नैमिषराय का मुक्तिपर्व दलितों के प्रति सवर्णों की मानसिकता, दलितों की अपमान और क्षोभ से भरी जिन्दगी का प्रामाणिक दस्तावेज लगता है। शैलेन्द्र सागर के हाल में आए चतुरंग उपन्यास में  दलित लड़के रमेश और लड़की आशा के स्कूल में दाखिला मिलने पर दलितों और सवर्णों के बीच टकराव और गांव के राजनीतिक हथकंडों को उभारा गया है। संजीव, जंगल जहां से शुरु होता है-उपन्यास में थारू जनजाति के जीवन संघर्ष एवं समस्याओं के साथ डाकू समस्या, भुखमरी, तस्करी एवं पुरुष तंत्र की हकीकत को युगीन सच्चाइयों के आइने में परीक्षित करते हैं।


पिछले वर्षों में ग्राम्य जीवन के परिवर्तित संदर्भों और दुरूह जीवन स्शितियों को लेकर कई उपन्यास एवं कथा -संग्रह आए। ये उपन्यास प्रेमचंद की परंपरा के उपन्यास हैं पर देशव्यापी बदलाव और उनसे उपजे तनावों के कारण ये कुछ नए प्रश्न भी उठाते हैं। भीमसेन त्यागी का नया उपन्यास जमीन इसी ग्राम्य जीवन में आए बदलावों की गहरी पड़ताल करता है। राकेश कुमार सिंह कई कहानियों में गांव समाज की विसंगतियों को उघाड़ते हैं। उनका पठार पर कुहरा उपन्यास आदिवासियों के अभावग्रस्त जीवन को बड़ी मार्मिकता से विश्लेषित करता है। मिथिलेश्वर सुरंग में सुबह उपन्यास में मौजूदा राजनीति की विद्रूपताओं पर प्रहार करते, किसानों-दलितों की शोचनीय स्थिति को परत-दर-परत खोलते हैं। निरीह लगते ग्रामवासियों में कैसे आक्रोश जन्मने लगता है, और वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने लगते हैं, इसका विश्वनीय और जीवंत वर्णन  उपन्यास में मिलता है। तिरिया चरित्तर लिखने वाले शिवमूर्ति जहाँ गांव में प्रवेश कर गई  राजनीति का परदा फाश करते हैं, वहां स्त्री शोषण पर भी अपनी चिंता दर्ज करते हैं। स्त्री अब गांव में मां-बहन-बेटी नहीं, उपभोग की वस्तु रह गई है।


इधर कुछ कहानियां एवं उपन्यास व्यवस्था के विभिन्न पक्षों की पड़ताल करते , संस्थानों की भीतरी राजनीति और उस राजनीति में सीधे-सच्चे संवेदनशील व्यक्ति के द्वन्द्वों को शिद्दत से उभारते हैं। पांच आंगनों वाले घर रचयिता गोविंद मिश्र का नया उपन्यास फूल बंदर और इमारतें इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इस उपन्यास में उच्च सरकारी संस्थानों और प्रशासकीय कार्यालयों में बोर्ड के अध्यक्ष पद पर पहुंचने और बने रहने के संघर्ष के दौरान एक संवेदनशील व्यक्ति की मनःस्थिति और तकलीफ का बेहद विश्वसनीय और मार्मिक आकलन है।


सरकारी कार्यालयों में अवसरवाद और भ्रष्ट व्यवस्था को फोकस में लाता, विभूतिनरायण का उपन्यास तबादला भी हाल ही में प्रकाशित होकर आया है। इधर आतंकवाद और सांप्रदायिक उन्माद विश्व के वातावरण को बराबर दूषित करता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई खौफनाक घटनाएं घटीं और हजारों-लाखों निरपराध इसकी चपेट में आ गए। कई रचनाकारों ने भावात्मक एवं वैचारिक स्तर पर मानवीयता का ध्वंस करने वाली इन स्थितियों को साहित्य में दर्ज कर लिया। गीतांजली श्री ने कुछ वर्ष पूर्व हमारा शहर उस बरस उपन्यास लिखकर सांप्रदायिक दंगों के कारण दांपत्य संबंधों में तनाव और व्यक्ति की असुरक्षा के प्रश्नों को उठाया था। हाल में ही सुधा अरोड़ा का कहानी संग्रह काला शुक्रवार बंबई में हुए दंगों से पीड़ित लोगों की दर्दनाक दास्तान कहता है। गुजरात के सांप्रदायिक तनाव के प्रभावों की कुछ कहानियां हाल ही में प्रकाशित हुई हैं। कुछ समय पूर्व आया तेजिन्दर का उपन्यास काला पादरी  आदिवासियों के  धर्म परिवर्तन के कारणों की समीक्षा कर, ईसाई मिशनरियों की भूमिका की निष्पक्ष पड़ताल करता है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने आज के काले समय का वृतांत कहा है। दूधनाथ सिंह का हाल ही में आया उपन्यास आखिरी कलाम जो बाबरी मस्जिद कांड के माद्यम से देश की राजनीति और व्यवस्था से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाता है,  इधर काफी चर्चित हो रहा है। दो वर्ष पूर्व आया  चंद्रकांता का उपन्यास कथा सतीसर कश्मीर में आतंकवाद के कारण एक सांझी परंपरा के क्षरण और अल्पसंख्यकों के घरों से निष्कासन की व्यथा बयान करता है। कश्मीर समस्या के कुछ ऐसे अनकहे सच इस उपन्यास में पहली बार दर्ज हुए हैं जिनकी, बकौल ब्रेख्त पहचान करना और बोलना लेखक की जिम्मेदारी है।


इधर कुच वर्षों से महिला लेखिकाओं की बड़ी तादात समय और समाज के सुलगते प्रश्नों के उत्तर तलाशती लेखन में महत्वपूर्ण भागीदारी निभा रही है। वयोवृद्ध रचनाकार दिनेशनंदिनी डालमिया के दो उपन्यास पिछले तीन वर्षों के दौरान आए हैं-व्यूहवद्द और ज़हरमोहरा । यहां सामंती मनोवृत्तियों ओर रूढ़ नैतिकताओं से विद्रोह करती स्त्रियां अपनी अस्मिता की तलाश करती हैं। निरंतर प्रताड़ना सहने की अपेक्षा तलाक लेकर गरिमा से जीना कबूल करती हैं। कुछ वर्ष पूर्व मृदुला गर्ग का स्त्री प्रश्नों और सामाजिक संतुलन के समाधान खोजता कहगुलाब आया था। हाल ही में उनका मेरे देश की धरती अहा ! भौतिक-सांस्कृतिक आक्रमणों के बीच देश के बिगड़ते संतुलन की ओर आगाह करता है।


 घर-परिवार की चौहद्दी लांघ वृहत्तर संदर्भों  से लेखन को जोड़ने वाली लेखिकाओं में चित्रा मुद्गल खासी दमदार कृतियां दे रही हैं। आवां उपन्यास में उन्होंने मजदूर की बेटी के संघर्ष, मोहभंग और हार न मानने की जिद के साथ,  ट्रेड यूनियनों के भीतरी विकृत स्वरूप को उघाड़ा है। पिछले वर्ष अपने नए उपन्यास, गिलिगड्डू में चित्रा बुजुर्गों के असहाय अकेलेपन को बड़ी शिद्दत से उभार नई पीढ़ी को उनके बिसरे दायित्वों के प्रति सचेत करती हैं।


इधर अपने नए उपन्यास तापसी में कुसुम अंसल वृंदावन के आश्रम में रहती विधवा युवती तापसी की दारुण दुःख गाथा के माध्यम से विधवाओं के मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न की कहानी कहती हैं, साथ ही धर्म की आड़ में होते अनाचार का भी पर्दाफाश करती हैं। कलिकथा वाया बायपाश उपन्यास से ख्याति प्राप्त करने वाली अलका सरावगी, शेष कादम्बरी उपन्यास में रूबी गुप्ता के आडेन्टिटी क्राइसिस को फोकस में लेकर आई हैं। इसी वर्ष आया उसका नया उपन्यास कोई बात नहीं, शारीरिक रूप से अक्षम, सत्तरह वर्षीय शशांक को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। यह उपन्यास शशांक और उसकी मां के प्रेम और दुख के साझेदारी की कथा है, जिसमें सबके लिए एक सम्मान भरी जिन्दगी की मांग है, दया की नहीं। कमलकुमार का उपन्यास यह खबर नहीं स्त्री संबंधों के साथ वक्ती, राजनीति और नैतिक व्यवस्था में संबंधों के क्षरण को तीखेपन से उभारता है।


अपने नए उपन्यास दौड़  में ममता कालिया भूमंडलीय प्रभाव को समेटते उस अंतहीन दौड़ का यथार्थ प्रस्तुत करती हैं जिसमें बहुत कुछ पाने की कीमत मन की शांति और घर का सूकून खोकर चुकानी पड़ती है। सलाम आखिरी उपन्यास की लेखिका मधु कांकरिया लोडशेडिंग कहानी में शेयर बाजार के बेताज बादशाह योगेश को केन्द्र में रखकर इसी अंधी दौड़ और भोगवादी प्रवृत्तियों की करुण परिणतियों के प्रति आगाह करती हैं। सादे शिल्प में जटिल यथार्थ की कहानियां कहने वाले स्वयंप्रकाश जहां बलि कहानी में औध्योगिकीकरण और बाजारवाद के बीच पिसती लड़की की करुण कथा कहते है, वहां उदय प्रकाश नई टेकनीक और भाषा के नए तेवरों के साथ और अंत में प्रार्थना जैसी यादगार कहानी का सृजन करते हैं जिसमें भ्रष्ट तंत्र और सांप्रदायिकता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझाने की कोशिश है लेकिन पिछले वर्षों में आई उनकी कहानी पीली छतरी वाली लड़की ने लेखकीय दायित्व संबंधी कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।


हाल ही में आए महीपसिंह के उपन्यास अभी शेष है में इतिहास के उस कालखंड की व्यथा दर्ज है, जहां सर्वसत्तावादी प्रवृत्तियां चरम पर थीं और लोकतंत्र में आतंक की थरथराहट। सदी के अंत में प्रियंवद का कहानी संग्रह खरगोश बोधिसत्व जैसी, कहानी लेकर आया। इन कहानियों में मानव मूल्यों से रिक्त व्यवस्था के साथ मनुष्य की आकांक्षाओं की टकराहट है,  जीवन की चीख और आत्मा तक उतरता अवसाद है। इधर वैश्वीकरण की अयातित संस्कृति के प्रतिरोधस्वरूप स्थानीयता को साहित्य में दर्ज कराती कई कृतियां आई हैं। मैत्रेयी पुष्पा के चाक   और कस्तूरी कुंडल बसे  उपन्यासों  को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। कथा सतीसर    में जहां कश्मीर की लोक संस्कृति उभारी गई है वहीं कसप और कैसे हो माट्साहब  कहानी में मनोहर श्याम जोशी जहां  उत्तरांचल के पहाड़ी जीवन की व्यथा कहते हैं तो मैत्रेयी ने बुंदेलखंड के परिवेश में स्त्री शोषण और उससे मुक्ति के लिए संघर्ष करती औरतों की दास्तां कही है। नासिरा शर्मा का उपन्यास अक्षयवट  इलाहाबाद के बदलते परिवेश का आकलन करता है तो पहला गिरमिटिया  में गिरिराज किशोर इस मूल्यहीन समय में महात्मा गांधी के सत्य अहिंसा और संघर्ष भरे जीवन पर उपन्यास रचकर हमें अपने गिरेबान में झांकने को विवश कर देते हैं। 


वरिष्ठ रचनाकार श्रीलाल शुक्ल बिसरामपुर का संत उपन्यास में  भूदान के  अंतर्विरोधों पर पैनी नज़र डालते हैं, तो नए उपन्यास राग विराग में संबन्धों के द्वन्द्व , आकर्षण-विकर्षण, अकेलेपन  और उदासी को वयस्क दृष्टि से परीक्षित करते हैं। रमेशचन्द्र शाह के उपन्यास विभूति बाबू आप कहां नहीं रहते   इधर आई कहानियों में छीजती जा रही उष्मा की तलाश करते हैं तो ज्योत्सना मिलन स्त्री-संघर्ष और अधिकार चेतना के प्रति जागरूक करती है। मीरा सीकरी, बलात्कार एवं अन्य कहानियों में आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद समाज में स्त्री के नियति पर प्रश्नाकुल है, तो सिम्मी हर्षिता नए उपन्यास रंगशाला  में दाम्पत्य संबंधों में पुरुष की नैतिकता के ढोंग को आड़े हाथों लेती है। लवलीन की स्वप्न ही रास्ता है व कई  कहानियां स्त्री के संघर्ष और अस्मिता की तलाश से जुड़ी हैं।


जीवन के कई कोणों, समय की जटिलताओं और मानवीय स्थितियों को आज साहित्य प्रतिबद्धता से खंगालता है। कमलेश्वर कितने पाकिस्तान में सांप्रदायिकता के घातक प्रभावों से सावधान करते हैं, तो प्रकाश मनु कथा-सर्कस उपन्यास में  मौजूदा हालात में असहाय होते लेखकों-कलाकारों की दास्तां बयान करते हैं। राकेश वत्स फिर लौटते हुए उपन्यास में   कर्म और संघर्ष में से जीवन की समस्याओं का हल ढूंढते हैं। मुक्ता, मृणाल पांडे, क्षमा शर्मा, 7मा कौल, संजना कौल घर-परिवार की समस्याओं के बाहर बड़े परिप्रेक्ष्य में व्यवस्था के गुट्ठिल प्रश्नों के उत्तर ढूंढती हैं। विनोद कुमार शुक्ल दीवार में एक खिड़की रहती थी उपन्यास में जीवन की  उन छोटी-छोटी खुशियों को ढूँढते हैं जो जो दिनोदिन खटरागों में गायब होती जा रही हैं।


जिस तादात में स्तरीय रचनाएँ आ रही हैं उससे लगता है रचनाकारों ने फूको देरिदा के उत्तर संरचनावाद, उत्तर आधुनिकतावाद  और उपन्यासवाद के अंत, विचारधारा के अंत जैसी आयातीत भविष्यवाणियों से भयभीत होना छोड़ दिया है और शब्द के सामर्थ्य पर उनका विश्वास लौट आया है। वे आश्वस्त होकर नहीं बैठे हैं बल्कि टी.वी., विडियो व संचार माध्यमों  के संकट के प्रति चेताने की बराबर कोशिश कर रहे हैं।


जानते हैं, आज का हमारा समय भाषा का संक्रमणकाल भी है। नए पुराने रचनाकार भाषा को नए प्रयोगों से समृद्ध करने के प्रयास कर रहे हैं। युवा कथाकार शशिभूषण द्विवेदीकी विप्लव कहानी, शैली, शिल्प और कथ्य की नवीनता के साथ पारंपरिक शैली के सामंजस्य की अनूठी कहानी है। भूमण्डलीकरण के व्यापक संदर्भों से गुजरती इस कथा में कथा रस भी है और आत्म परीक्षण का विचलन भी। यहां खजुराहो की कलाकृतियों का कला वैभव, इतिहास, मिथ, राजा गंगदेव और तारादेवी  की स्वप्न कथाएँ हैं, तो खजुराहो घूमने आयी फ्रांसीसी युवती का कलाकार से प्रेम का नाटक कर उसकी कलाकृतियां विदेश में मंहगे दामों बेचने की व्यापार नीति भी है। फ्रांसिसी युवती न कलाकार का प्रेम लौटाती है न कलाकृतियां। हर तरह से शोषित कलाकार असहाय होकर रोने के सिवा कुछ नहीं कर पाता।


लेखक यहां सांस्कृतिक विप्लव के महाआख्यान से मुक्ति चाहता है क्योंकि वह कलाकार के रोने का असली कारण जानना चाहता है। यह कहानी राजनीति में धर्म के हस्तक्षेप से उत्पन्न विकृतियों एवं कलाकारों के शोषण और बाजारवाद की प्रवृत्तियों संबंधी कई आयाम खोलती है।
युवा लेखिका नीलाक्षी सिंह ' सूरज ढलने से पहले सोचता है ' कहानी में पिता-पुत्र के बीच द्वन्द्वों को नए शिल्प के साथ खोलती है। बेटे के कुछ शब्द  ' आई नीड यू पापा ' दो पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरियों को पाट रिश्तों में उम्मीद भी बनाए रखते हैं और युवा वर्ग के मन में छिपे उष्मा के स्रोत से भी वाकिफ कराते हैं।


आनंद हर्षुल भी  भाषा के कारीगर हैं। उनकी कहानी  ' पृथ्वी को चंद्रमा ', प्रेम की दुर्निवार आकांक्षा के फेंटेसी के माद्यम से सजीव कर देती है। संजय खाती मादरे वतन में   सामयिक राजनीति की विसंगतियों को उघाड़ एक तीखा प्रश्न छोड़ जाते हैं कि अंग्रेजों के दमनकारी राज से हम किस बेहतर स्थिति में हैं? सांप्रदायिक उन्माद के प्रभावों की कहानियां, काली बर्फ, शरणागत दीनार्त  अंतिम अपराध ' निष्कासन ' और अपने देश में शरणार्थी होने की पीड़ा के दस्तावेज है। निलय उपाद्याय की कहानी  ' कूss  मास्टर' में आज के स्वार्थ केन्द्रित समाज में उपहास का पात्र बने सीधे-सच्चे निर्भीक व्यक्ति की आवाज है।  कथ्य, शिल्प दोनों स्तरों पर कथा साहित्य आज समृद्ध है, पर कहीं नएपन की होड़ में कथा के ढांचे  की ऊलजलूल तोड़-फोड़ भी दिखाई पड़ती है। गीतांजली श्री का उपन्यास तिरोहित  और शीताक्षी सिंह की कहानी  ' बिंबघात ' इसके कुछ नमूने हैं। यहां शिल्प की कारीगरी थोड़ी देर के लिए चौंकाती जरूर  है पर जल्दी ही पाठक को उबाना शुरु कर देती है।


नई भाषा और टेकनीक की तलाश जरूरी है । प्रयोग भी, पर कहानी के कहानीपन को बचाना भी अनिवार्य है। इसके लिए मार्ख़ेज तक जाने की जरूरत नहीं, हमारे किस्से-कहानियों  से लेकर मनोहर श्याम जोशी, राजी सेठ और जया  जादवानी जैसे कई नए-पुराने रचनाकार साहित्य पटल पर मौजूद हैं।


जया जादवानी की कहानी ' अंदर के पानियों में कोई सपना कांपता है' और अनामिका का लघु उपन्यास अवांतर कथा   तथा कई अन्य रचनाएं शिल्प की कारीगरी का नमूना होने के साथ कहानीपन को भी बनाए रखती हैं। ये कृतियां स्त्री मन के अनछुए कोनों को खंगालने में काफी सफल हो गई हैं। यों सहज भाषा में भी रवानगी पैदा कर पाठकों को बांधे रखा जा सकता है। इसे पद्मा सचदेव के नए उपन्यास जम्मू जो कभी शहर था  को पढ़कर जाना जा सकता है।


अँत में इतना कहना काफी है कि इस रचना विरोधी समय में भी रचनाकार सक्रिय है। समय के सरोकारों के प्रति सचेत और निष्ठावान। आज वह मनुष्य के स्वप्नों और स्मृतियों को जिंदा रखने के लिए लिखता है ताकि भोंथरी होती संवेदनाओं और जीवन मूल्यों को बचाया जा सके। समय के जटिल प्रश्नों की तलाश तो वहां है ही और आगे भी रहेगी!!!  


                                                                                                                                                 (साभार आजकल)

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                                                                                                                                                                                              कहानी-धरोहर


                                                                                                                                                                                        जयशंकर प्रसाद

पुरस्कार




आद्रा नक्षत्र; आकाश में काले-काले बादलों की घुमड़, जिसमें देव-दुंदुभी का गंभीर घोष। प्राची के निरभ्र कोने से स्वर्ण-पुरुष झांकने लगा---देखने महाराजा की सवारी। शैलमाला के अंचल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी। नगर-तोरण से जयघोष हुआ। भीड़ में गजराज का चामरधारी झुण्ड उन्नत दिखाई पड़ा। वह हर्ष और उत्साह का समुद्र हिलोर भरता हुआ आगे बढ़ने लगा।                                                                                            

प्रभात की हेम-किरणों से अनुरंजित नन्ही-नन्ही बूंदों का एक झोंका स्वर्ण-मल्लिका के समान पड़ा। मंगल-सूचना से जनता ने हर्ष-ध्वनि की।


रथों, हाथियों और अश्वारोहियों की पंक्ति जम गयी। दर्शकों की भीड़ भी कम थी। गजराज बैठ गया, सीढ़ियों से महाराज उतरे। सौभाग्यवती और कुमारी सुन्दरियों के दो दल, आम्रपल्लवों से सुशोभित मंगलकलश और फूल, कुंकुम तथा खीलों से भरे थाल लिये, मधुर गान करते हुए आगे बढ़े।


महाराज के मुख पर मधुर मुस्कान थी। पुरोहित वर्ग ने स्वस्तिवाचन किया। स्वर्णरंजित हल की मूठ पकड़कर महाराज ने जुते हुए सुन्दर पुष्ट बैलों को चलने का संकेत किया। बाजे बजने लगे। किशोरी कुमारियों ने खीलों और फूलों की वर्षा की।


कौशल का यह उत्सव प्रसिद्द था। एक दिन के लिए महाराज को कृषक बनना पड़ता--- उस दिन इन्द्र-पूजन की धूम-धाम होती; गोठ होती। नगर-निवासी उस पहाड़ी भूमि में आनंद मनाते। प्रतिवर्ष कृषि का यह उत्सव उत्साह से संपन्न होता, दूसरे राज्यों से भी युवक राजकुमार इस उत्सव में बड़े चाव से आकर योग देते।


मगध का एक राजकुमार अरुण अपने रथ पर बैठा कुतूहल से यह दृश्य देख रहा था।


बीजों का एक थाल लिए कुमारी मधूलिका महाराज के साथ थी। बीज बोते हुए महाराज जब हाथ बढ़ाते, तब मधूलिका उनके सामने थाल कर देती। यह खेत मधूलिका का था, जो इस साल महाराज ने खेती के लिए चुना था; इसलिए बीज देने का सम्मान मधूलिका को ही मिला। वह कुमारी थी। सुन्दरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी  उसे सम्हालती और कभी अपने रूखे अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की कमी न थी, वे सब बरौनियों में गुँथे जा रहे थे। सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मन्द मुस्कराहट के साथ सिहर  उठते; किन्तु महाराज को बीज देने में उसने कोई शिथिलता नहीं की। सब लोग महाराज का हल चलाना देख रहे थे---विस्मय से, कुतूहल से। अरुण देख रहा था कृषक कुमारी मधूलिका को। आह कितना भोला सौंदर्य! कितनी सरल चितवन ! 


उत्सव का प्रधान कृत्य समाप्त हो गया। महाराज ने मधूलिका को खेत का पुरस्कार दिया, थाल में कुछ स्वर्ण-मुद्राएँ। वह राजकीय अनुग्रह था। मधूलिका ने थाली सिर से लगा ली; किन्तु साथ ही उसमें स्थित स्वर्ण-मुद्राओं को महाराज पर न्योछावर करके बिखेर दिया। मधूलिका की उस समय उर्जस्वित मूर्ति लोग आश्चर्य से देखने लगे। महाराज की भृकुटि जो ज़रा चढ़ी ही थी कि मधूलिका ने सविनय कहा, ' देव! यह मेरे पितृ-पितामहों की भूमि है। इसे बेचना अपराध है; इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है।'


महाराज के बोलने के पहले ही वृद्द मंत्री ने तीखे स्वर में कहा,  ' अबोध! क्या बक रही है! राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार ! तेरी भूमि से चौगुना मूल्य है ; तू आज से राजकीय रक्षण पाने की अधिकारिणी हुई, इस धन से अपने को सुखी बना। '


 'राजकीय रक्षण की अधिकारिणी तो सारी प्रजा है, मंत्रीवर!...महाराज को भूमि-समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था और न है; किन्तु मूल्य स्वीकार करना असंभव है।' मधूलिका उत्तेजित हो उठी थी।


महाराज के संकेत करने पर मन्त्री ने कहा, ' देव ! वाराणसी-युद्द के अनन्यतम वीर सिंहमित्र की यह एकमात्र कन्या है। '


महाराज चौंक उठे, ' सिंहमित्र की कन्या ! जिसने मगध के सामने कौशल की लाज रख ली थी, उसी वीर की मधूलिका कन्या है? '


'हां, देव!' सविनय मंत्री ने कहा।


'इस उत्सव के परंपरागत नियम क्या हैं, मंत्रिवर? ' महाराज ने पूछा।


' देव, नियम तो बहुत साधारण हैं। किसी भी अच्छी भूमि को इस उत्सव के लिए चुनकर नियमानुसार पुरस्कार स्वरूप उसका मूल्य दे दिया जाता है। वह भी अत्यन्त अनुग्रह पूर्वक अर्थात भू-सम्पत्ति का चौगुना मूल्य उसे मिलता है। उस खेती को वही व्यक्ति वर्ष भर देखता है। वह राजा का खेत कहा जाता है।'


महाराज को विचार-संघर्ष से विश्राम की अत्यन्त आवश्यकता थी। महाराज चुप रहे। जयघोष के साथ सभा विसर्जित हुई। सब अपने-अपने शिविरों में चले गए, किन्तु मधूलिका को उत्सव में फिर किसी ने न देखा। वह अपने खेतों की सीमा पर विशाल मधूक वृक्ष के चिकने हरे पत्तों की छाया में अनमनी-सी चुपचाप बैठी रही।


रात्रि का उत्सव अब विराम ले रहा था। राजकुमार अरुण उसमें सम्मिलित नहीं हुआ। वह अपने विश्राम-भवन में जागरण कर रहा था। आँखों में नींद न थी। प्राची में जैसे गुलाबी खिल रही थी, वह रंग उसकी आंखों में था। सामने देखा तो मुंडेर पर कपोती एक पैर पर खड़ी, पंख फैलाए  अंगड़ाई ले रही थी। अरुण उठ खड़ा हुआ। द्वार पर सुसज्जित अश्व था। वह देखते-देखते नगर-तोरण पर जा पहुंचा। रक्षक-गण ऊँघ रहे थे, अश्व के पैरों के शब्द से वे चौंक उठे।


युवक कुमार तीर-सा निकल गया। सिंधुदेश का तुरंग प्रभात के पवन से पुलकित हो रहा था। घूमता-घूमता अरुण उसी मधूक वृक्ष के नीचे पहुँचा, जहाँ मधूलिका अपने हाथ पर सिर धरे हुए खिन्न निंद्रा का सुख ले रही थी।


अरुण ने देखा, एक छिन्न माधवीलता वृक्ष की शाखा से च्युत होकर पड़ी है। सुमन मुकलित, भ्रमर निष्पन्द थे। अरुण ने अपने अश्व को मौन रहने का संकेत किया, उस सुषमा को देखने के लिए, परन्तु कोकिल बोल उठा, जैसे उसने अरुण से प्रश्न किया, ' छिः, कुमारी के सोए हुए सौंदर्य पर दृष्टिपात करनेवाले धृष्ट, तुम कौन,' मधूलिका की आंखें खुल पड़ीं। उसने देखा, एक अपरिचित युवक। वह संकोच से उठ बैठी। 


' भद्रे! तुम्ही न कल के उत्सव की संचालिका रही हो? '


 ' उत्सव ! हां उत्सव ही तो था। '


' कल उस सम्मान...'


' क्यों, आपको कल का स्वप्न सता रहा है? भद्र ! आप क्या मुझे इस अवस्था में संतुष्ट न रहने देंगे? '


' मेरा हृदय उस छवि का भक्त बन गया है, देवि! '


' मेरे उस अभिनय का---मेरी विडंबना का। आह ! मनुष्य कितना निर्दय है, अपरिचित ! क्षमा करो, जाओ अपने मार्ग। '


 ' सरलता की देवि ! मैं मगध का राजकुमार तुम्हारे अनुग्रह का प्रार्थी हूँ--- मेरे हृदय की भावना अवगुंठन में रहना नहीं जानती। उसे अपनी.....। '


' राजकुमार! मैं कृषक बालिका हूं। आप नन्दबिहारी और मैं पृथ्वी पर परिश्रम करके जीनेवाली। आज मेरी स्नेह की भूमि पर से मेरा अधिकार छीन लिया गया है। मैं दुःख से विकल हूँ, मेरा उपहास न करो। '


 ' मैं कौशल नरेश से तुम्हारी भूमि तुम्हें दिलवा दूंगा। '


' नहीं, वह कौशल का राष्ट्रीय नियम है। मैं उसे बदलना नहीं चाहती---चाहे उससे मुझे कितना ही दुःख हो। '


' तब तुम्हारा रहस्य क्या है? '


' यह रहस्य मा'नव हृदय का है, मेरा नहीं। राजकुमार, नियमों से यदि मानव- हृदय बाद्य होता तो आज मगध के राजकुमार का हृदय किसी राजकुमारी की ओर न खिंचकर एक कृषक-बालिका का अपमान करने न आता।' मधूलिका उठ खड़ी हुई।


चोट खाकर राजकुमार लौट पड़ा। किशोर किरणों में उसका रत्नकिरीट चमक उठा। अश्व वेग से चला जा रहा था और मधूलिका, निष्टुर प्रहार करके क्या वह स्वयं आहत न हुई? वह सजल नेत्रों से उड़ती हुई धूल को देखने लगी।


मधूलिका ने राजा का प्रतिपादन, अनुग्रह नहीं लिया। वह दूसरे खेतों में काम करती और रूखी-सूखी खाकर पड़ी रहती। मधूक-वृक्ष के नीचे छोटी-सी पर्णकुटीर थी। सूखे डण्ठलों से उसकी दीवार बनी थी। मधूलिका का वही आश्रय था। कठोर परिश्रम से जो रूखा अन्न मिलता, वही उसकी सांसों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त था।


दुबली होने पर भी उसके अंग पर तपस्या की कांति थी। आसपास के कृषक उसका आदर करते। वह एक आदर्श बालिका  थी। दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष बीतने लगे।


शीतकाल की रजनी, मेघों से भरा आकाश जिसमें बिजली की दौड़-धूप। मधूलिका का छाजन टपक रहा था। ओढ़ने की कमी थी। वह ठिठुरकर एक कोने में बैठी थी। मधूलिका अपने अभाव को आज बढ़ाकर सोच रही थी। जीवन के सामंजस्य  बनाए रखनेवाले  उपकरण तो अपनी सीमा निर्धारित रखते हैं, परन्तु उनकी आवश्यकता और कल्पना  भावना के साथ बढ़ती-घटती रहती है। आज बहुत दिनों पर उसे बीती हुई बात स्मरण हुई। दो, नहीं-नहीं तीन वर्ष हुए होंगे, इसी मधूक के नीचे प्रभात में---अरुण राजकुमार ने क्या कहा था ?


वह अपने हृदय से पूछने लगी---उन चाटुकारी के शब्दों को सुनने के लिए उत्सुक-सी वह पूछने लगी---क्या कहा था?  दुःख-दग्ध हृदय उन स्वप्न-सी बातों को स्मरण रख सकता था ! और स्मरण ही होता तो भी कष्टों की इस काली निशा में वह कहने का साहस करता। हाय री विडंबना!


आज मधूलिका उन बीते हुए क्षणों को लौटा लेने के लिए विकल थी। दारिद्र्य की ठोकरों ने उसे व्यथित और अधीर कर दिया है। मगध की प्रासादमाला के वैभव का काल्पनिक चित्र---उन सूखे डंठलों के रन्ध्रों से, नभ में---बिजली के आलोक में---नाचता हुआ दिखाई देने लगा। खिलाड़ी शिशु जैसे श्रावण की संध्या में जुगनू को पकड़ने के लिए हाथ लपकाता है, वैसे ही मधूलिका मन-ही-मन कह रही थी---अभी वह निकल गया। वर्षा ने भीषण रूप धारण किया। गड़गड़ाहट बढ़ने लगी; ओले पड़ने की संभावना थी। मधूलिका अपनी जर्जर झोंपड़ी के लिए काँप उठी। सहसा बाहर कुछ शब्द हुआ।


' कौन है यहाँ ? पथिक को आश्रय चाहिए। '


मधूलिका ने डंठलों का कपाट खोल दिया। बिजली चमक उठी। उसने देखा, एक पुरुष घोड़े की डोर पकड़े खड़ा है। सहसा वह चिल्ला उठी, ' राजकुमार ! '


 ' मधूलिका !' आश्चर्य से युवक ने कहा।


एक क्षण के लिए मधूलिका अपनी कल्पना को सहसा प्रत्यक्ष देखकर चकित हो गयी---इतने दिनों के बाद आज फिर !


अरुण ने कहा, ' कितना समझाया मैने, परन्तु.....  '


मधूलिका अपनी दयनीय अवस्था पर संकेत करने देना नहीं चाहती थी। उसने कहा,  ' और आज आपकी यह क्या दशा है ? '


सिर झुकाकर अरुण ने कहा, ' मैं मगध का विद्रोही निर्वासित कौशल में जीविका खोजने आया हूं। '


मधूलिका उस अंधकार में हंस पड़ी, ' मगध के विद्रोही राजकुमार का स्वागत करे एक अनाथिनी कृषक-बालिका, यह भी एक विडंबना है, तो भी मैं स्वागत के लिए प्रस्तुत हूँ। '


शीतकाल की निस्तब्ध रजनी, कुहरे से धुली हुई चाँदनी, हाड़ कँपा देनेवाला समीर, तो भी अरुण और मधूलिका दोनों पहाड़ी के गहृवर के द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे बैठे हुए बातें कर रहे हैं। मधूलिका की वाणी में उत्साह था, किन्तु अरुण जैसे अत्यंत सावधान होकर बोलता।


मधूलिका ने पूछा, ' जब तुम इतनी विपन्न अवस्था में हो तो फिर इतने सैनिकों को साथ रखने की क्या आवश्यकता है ? '


' मधूलिका ! बाहुबल ही तो वीरों की आजीविका है। ये मेरे जीवन-मरण के साथी हैं, भला मैं इन्हें कैसे छोड़ देता? और करता ही क्या ? भूल न करो, मैं अपने बाहुबल पर भरोसा करता हूं। नए राज्य की स्थापना कर सकता हूँ। निराश क्यों हो जाऊँ। ' अरुण के शब्दों में कंपन था; वह जैसे कुछ कहना चाहता था; पर वह कह न सकता था। 


'नवीन राज्य! ओहो, तुम्हारा उत्साह तो कम नहीं। भला कैसे? कोई ढंग बताओ तो मैं भी कल्पना का आनंद ले लूँ। '


'कल्पना का आनंद नहीं मधूलिका ! मैं तुम्हें राजरानी के सम्मान से सिंहासन पर बिठाऊँगा ! तुम अपने छिने हुए खेत की चिंता करके भयभीत न हो। '


एक क्षण में सरल मधूलिका के मन में प्रासाद का अन्धड़ बहने लगा---द्वन्द्व मच गया। उसने कहा,  ' आह, मैं सचमुच आज तक तुम्हारी प्रतीक्षा करती थी, राजकुमार!'


अरुण ढिठाई से उसके हाथों को दबाकर बोला, ' तो मेरा  भ्रम था, तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो! '


युवती का वक्षःस्थल फूल उठा। वह हाँ  भी नहीं कह सकी, ना भी नहीं। अरुण ने उसकी अवस्था का अनुभव कर लिया। कुशल मनुष्य के समान उसने अवसर को हाथ से न जाने दिया। तुरंत बोल उठा,  ' तुम्हारी इच्छा हो तो प्राणों से पण लगाकर मैं तुम्हें इस कौशल-सिंहासन पर बिठा दूं। मधूलिके ! अरुण के खड्ग का आतंक देखोगी ? '


मधूलिका एक बार काँप उठी। वह कहना चाहती थी...नहीं, किन्तु उसके मुँह से निकला---क्या ?


' सत्य मधूलिका, कौशल-नरेश तभी से तुम्हारे लिए चिन्तित हैं। यह मैं जानता हूँ, तुम्हारी साधारण-सी प्रार्थना वह अस्वीकार न करेंगे और मुझे यह भी विदित है कि कौशल के सेनापति अधिकांश सैनिकों के साथ पहाड़ी दस्युओं का दमन करने के लिए बहुत दूर चले गए हैं।'


 मधूलिका की आँखों के आगे बिजलियाँ हँसने लगीं। दारुण भावना से उसका मस्तक विकृत हो उठा।


अरुण ने कहा, 'तुम बोलती नहीं हो ? '


' जो कहोगे, वह करूंगी...' मंत्रमुग्ध-सी मधूलिका ने कहा।


स्वर्ण-मंच पर कौशल-नरेश अर्धनिद्रित अवस्था में आखें मुकुलित किए हैं। एक चामर-धारिणी युवती पीछे खड़ी अपनी कलाई बड़ी कुशलता से घुमा रही है। चामर के शुभ्र आन्दोलन उस प्रकोष्ठ में धीरे-धीरे संचालित हो रहे हैं। ताम्बूल-वाहिनी प्रतिमा के समान दूर खड़ी है।


  प्रतिहारी ने आकर कहा, ' जय हो देव! एक स्त्री कुछ प्रार्थना करने आयी है। '


आखें खोलते हुए महाराज ने कहा, ' स्त्री! प्रार्थना करने आयी है ? आने दो।  '


प्रतिहारी के साथ मधूलिका आयी। उसने प्रणाम किया। महाराज ने स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा और कहा,  ' तुम्हें कहीं देखा है ? '


'तीन बरस हुए देव ! मेरी  भूमि खेती के लिए ली गयी थी। '


' ओह, तो तुमने इतने दिन कष्ट में बिताए, आज उसका मूल्य मांगने आई हो, क्यों? अच्छा-अच्छा तुम्हें मिलेगा। प्रतिहारी! '


 'नहीं महाराज, मुझे मूल्य नहीं चाहिए।'


'मूर्ख ! फिर क्या चाहिए ? '


' उतनी भूमि, दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की जंगली भूमि। वहीं मैं अपनी खेती करूँगी। मुझे एक सहायक मिल गया है। वह मनुष्यों से मेरी सहायता करेगा। भूमि को समतल भी बनाना होगा। '


महाराज ने कहा, 'कृषक बालिके ! वह बड़ी ऊबड़-घाबड़ भूमि है। जिस पर वह दुर्ग के समीप एक सैनिक महत्व रकती है। '


' तो फिर निराश लौट जाऊँ ? '


' सिंहमित्र की कन्या ! मैं क्या करूँ, तुम्हारी यह प्रार्थना... '


' देव! जैसी आज्ञा हो!'


' जाओ, तुम श्रमजीवियों को उसमें लगाओ। मैं आमात्य को आज्ञा-पत्र देने का आदेश करता हूँ। '


'जय हो देव !' कहकर प्रणाम करती हुई मधूलिका राजमन्दिर के बाहर आयी।





दुर्ग के दक्षिण, भयावने नाले के तट पर घना जंगल है। आज मनुष्यों के पद-संचार से शून्यता भंग हो रही थी। अरुण के छिपे वे मनुष्य स्वतंत्रता से इधर-उधर घूमते थे। झाड़ियों को काटकर पथ बन रहा था। नगर दूर था, फिर उधर यों ही कोई नहीं आता था। फिर अब तो महाराज की आज्ञा से वहाँ मधूलिका का अच्छा-सा खेत बन रहा था। तब इधर की किसको चिन्ता होती?


एक घने कुंज में अरुण और मधूलिका एक-दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। संध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगड़ अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।


प्रसन्नता से अरुण की आँखें चमक उठीं। सूर्य की अन्तिम किरण झुरमुट में घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगीं। अरुण ने कहा, ' चार प्रहर और, विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण कलेवर कौशल राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा  और मगध से निर्वासित मैं एक स्वतंत्र राष्ट्र का अधिपति बनूँगा, मधूलिके !'


'भयानक! अरुण, तुम्हारा साहस देख मैं चकित हो रही हूँ। केवल सौ सैनिकों से तुम... '


'रात के तीसरे प्रहर मेरी विजय-यात्रा आरम्भ होगी। '


'तो तुमको इस विजय पर विश्वास है ? '


'अवश्य, तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ; प्रभात से तो राज-मन्दिर ही तुम्हारा लीला-निकेतन बनेगा। '


मधूलिका प्रसन्न थी; किन्तु अरुण के लिए उसकी कल्याण-कामना सार्थक थी। वह कभी-कभी उद्विग्न होकर बालकों के समान प्रश्न कर बैठती। अरुण उसका समाधान कर देता। सहसा कोई संकेत पाकर सने कहा,  ' अच्छा, अंधकार हो गया। अभी तुम्हें दूर जाना है और मुझे भी प्राण-पण से इस अभियान के प्रारम्भिक कार्यों को अर्धरात्रि तक पूरा कर लेना चाहिए;  तब रात्रि-भर के लिए विदा! मधूलिके !'


मधूलिका उठ खड़ी हुई। कंटीली झाड़ियों से उलझती हुई क्रम से बढ़ने वाले अन्धकार में वह झोंपड़ी की ओर चली।


पथ अन्धकारमय था और मधूलिका का हृदय भी निविड़ तम से घिरा था। उसका मन सहसा विचलित हो उठा, मधुरता नष्ट हो गयी। जितनी सुख-कल्पना थी, वह जैसे अन्धकार में विलीन होने लगी। वह भयभीत थी, --पहला भय उसे अरुण के लिए उत्पन्न हुआ, यदि वह सफल न हुआ तो? फिर सोचने लगी--वह क्यों सफल हो? श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाये ? मगध का चिरशत्रु ! ओह, उसकी विजय ! कौशल-नरेश ने क्या कहा था, ' सिंहमित्र की कन्या। सिंहमित्र कौशल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है ? नहीं, नहीं, मधूलिका!  मधूलिका !!' जैसे उसके पिता उस अँधकार में उसे पुकार रहे थे। वह पागलों की तरह चिल्ला उठी। रास्ता भूल गयी।    


रात एक पहर बीत चली; पर मधूलिका अपनी झोंपड़ी तक न पहुँची। वह उधेड़बुन में विक्षिप्त-सी चली जा रही थी। उसकी आँखों के आगे कभी संघमित्र और कभी अरुण की मूर्ति अन्धकार में चित्रित होती जाती। उसे सामने आलोक दिखाई पड़ा। वह बीच पथ में खड़ी हो गयी। प्रायः एक सौ उल्काधारी अश्वारोही चले आ रहे थे और आगे-आगे एक वीर अधेड़ सैनिक था। उसके बाँए हाथ में अश्व की वल्गा और दाहिने हाथ में नग्न खड्ग। अत्यंत वीरता से वह टुकड़ी अपने पथ पर चल रही थी। परन्तु मधूलिका बीच पथ से हिली नहीं। प्रमुख सैनिक पास आ गया;  पर मधूलिका अब भी नहीं हटी। सैनिक ने अश्व रोककर कहा, ' कौन है ? ' कोई उत्तर नहीं मिला। तब तक दूसरे अश्वारोही ने कड़ककर कहा,  ' तू कौन है, स्त्री ? कौशल के सेनापति को उत्तर शीघ्र दे। '


रमणी जैसे विकारग्रस्त स्वर में चिल्ला उठी, ' बाँध लो, मुझे! मेरी हत्या करो। मैने अपराध ही ऐसा किया है।'


सेनापति हँस पड़े, बोले, 'पगली है। '


' पगली नहीं, यदि वही होती तो इतनी विचार-वेदना क्यों होती ?  सेनापति ! मुझे बाँध लो। राजा के पास ले चलो। '


' क्या, स्पष्ट कह ! '


'श्रावस्ती का दुर्ग क प्रहर में दस्युओं के हस्तगत हो जायेगा। दक्षिणी नाले के पार से उनका अतिक्रमण होगा।  '


सेनापति चौंक उठे। उन्होंने आश्चर्य से पूछा, ' तू क्या कह रही है ? '


' मैं सत्य कह रही हूँ ; शीघ्रता करो। '


सेनापति ने अस्सी सैनिकों  को नाले की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की आज्ञा दी और स्वयं बीस अश्वारोहियों के साथ दुर्ग की ओर बढ़े। मधूलिका एक अश्वारोही के साथ बांध दी गयी।


 श्रावस्ती का दुर्ग, कौशल राष्ट्र का केन्द्र, इस रात्रि में अपने वैभव के स्वप्न देख रहा था। भिन्न राजवंशों ने उसके प्रान्तों पर अधिकार जमा लिया है। अब वह केवल कई गाँवों का अधिपति है। फिर भी उसके साथ कौशल के अतीत की गौरव-गाथाएँ लिपटी हैं। वही लोगों की ईर्ष्या का कारण है। जब घोड़े से अश्वारोही बड़े वेग से आते हुए दुर्ग-द्वार पर रुके, तब दुर्ग के प्रहरी चौंक उठे, उल्का के आलोक में उन्होंने सेनापति को पहचाना, द्वार खुला। सेनापति घोड़े की पीठ से उतरे। उन्होंने कहा,  ' अग्निसेन ! दुर्ग में कितने सैनिक होंगे ? '


'सेनापति की जय हो ! दो सौ '


 ' उन्हें शीघ्र ही एकत्र करो ; परन्तु बिना किसी शब्द के। सौ को लेकर तुम शीघ्र ही चुपचाप दुर्ग के दक्षिण की ओर चलो। आलोक और शब्द न हों। '


सेनापति ने मधूलिका की ओर देखा। वह खोल दी गयी। उसे अपने पीछे आने का संकेत कर सेनापति राज-मंदिर की ओर बढ़े। प्रतिहारी ने सेनापति को देखते ही महाराज को सावधान किया। वह अपनी सुक-निद्रा के लिए प्रस्तुत हो रहे थे; किन्तु सेनापति और साथ में मधूलिका को देखते ही चंचल हो उठे।   


सेनापति ने कहा, ' जय हो देव! इस स्त्री के कारण मुझे इस समय उपस्थित होना पड़ा है। '


महाराज ने स्थिर नेत्रों से देककर कहा, ' सिंहमित्र की कन्या ! फिर यहाँ क्यों ? क्या तुम्हारा क्षेत्र नहीं बन रहा है ? कोई बाधा ? सेनापति ! मैने दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की भूमि इसे दी है। क्या सी संबंध में तुम कुछ कहना चाहते हो ? '


'देव ! किसी गुप्त शत्रु ने उसी ओर से आज की रात में दुर्ग पर अधिकार कर लेने का प्रबंध किया है और इसी स्त्री ने मुझे पथ में यह संदेश दिया है। '


राजा ने मधूलिका की ओर देखा। वह कांप उठी। घृणा और लज्जा से वह गड़ी जा रही थी। राजा ने पूछा, 


 ' मधूलिका! यह सत्य है! '


'हाँ, देव ! '


 राजा ने सेनापति से कहा, 'सैनिकों को एकत्र करके तुम चलो ! मैं अभी आता हूँ। '


 सेनापति के चले जाने पर राजा ने कहा, ' सिंहमित्र की कन्या ! तुमने एक बार फिर कौशल का उपकार किया। यह सूचना देकर तुमने पुरस्कार का काम किया है। अच्छा, तुम यहीं ठहरो। पहले उनका प्रबंध कर लूँ।'





अपने साहसिक अभियान में अरुण बन्दी हुआ और दुर्ग उल्का के आलोक में अतिरंजित हो गया। भीड़ ने जयघोष किया। सबके मन में उल्लास था। श्रावस्ती-दुर्ग आज एक दस्यु के हात में जाने से बच गया था। अबला-वृद्ध-नारी आनंद से उन्मत्त हो उठे।


ऊषा के आलोक में सभा-मण्डप दर्शकों से भर गया। बन्दी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हुँकार भरते हुए कहा,  ' प्राण-दण्ड '


मधूलिका बुलाई गयी। वह पागल-सी कर खड़ी हो गयी। कौशल-नरेश ने पूछा,  ' मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग । '


वह चुप रही।


राजा ने कहा, ' मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ। '


मधूलिका ने एक बार बन्दी अरुण की ओर देखा । उसने कहा, ' मुझे कुछ न चाहिए। '


अरुण हंस पड़ा।


राजा ने कहा, ' नहीं, मैं तुझे अवश्य दूँगा। माँग ले। '



'तो मुझे प्राण-दंड मिले। ' कहती वह बन्दी अरुण के पास आ खड़ी हुई।

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                                                                                                                                                                                    शेष अशेष ( भाग-11)


                                                                                                                                                                                                -शैल अग्रवाल

चारो तरफ हरे-भरे लॉन...फल-फूलों से लदी डालियां और साफ-सुथरी नदियां और उन पर तैरते बतख और हंसों के जोड़े...। मनोरम बगिया-से दिखते, हरे-भरे इंगलैंड में श्रीमना का मन रमना शुरु ही हुआ था कि मौसम बदल गया। पतझड़ आ गया और सब ठंडा और वीरान हो गया। एकबार फिर  सूखी नंगी टहनियों पर लटके उसके दिन-रात  ठंडे और उदास थे। बूढ़ी-थकी आंखों के लिए एकबार फिर बस इंतजार ही था ...इंतजार धूप का, इंतजार उष्मा का, इंतजार उस वक्त का जो सब सही करने की सामर्थ रखता है...उस छलिया बसंत का, जो बस जाने के लिए ही आता है; जिसे संभालकर  परिवार के बीच रख पाना संभव नहीं था... दिन-रात मात्र परिवार के लिए ही सोचती रहने वाली श्रीमना के लिए  नहीं, हर मुश्किल का हल ढूँढ लेने वाले  कर्मठ  शेखर के लिए भी नहीं, और सावन की पहली फुहार-सी तरावट और आल्हाद बिखेरने वाली मनु के लिए भी नहीं !  ‘ तो, क्या मनु का परिवार के लिए इंगलैंड का वह बुलावा, सूने और आस के बुझते दिए में नई रोशनी नहीं, मात्र छलावा  ...एक सुलगती लपट थी, जिसकी आंच में झुलसना ही अब उनकी नियति है ! बहुत खुश भी तो हो सकते थे वे पर! 

कौन खुश रह पाया... पिनाकी…शेखर...वे... खुद मनु, आखिर कौन ? कितने सपने देखे थे होनहार बेटे शेखर के लिए उन्होंने और कितने अरमान थे शेखर सरकार के भी परिवार को एक सुख और आराम से भरा जीवन संजो पाने के, पर क्या हो पाया? दोष नहीं दे रही; कसर नहीं छोड़ी शेखर ने एक आदर्श बेटा , पति और पिता की जिम्मेदारी निभाने में ... पर जी-जान की इस लगन के बावजूद भी क्या हासिल हुआ... ? वही, जो इन परिस्तितियों में आमतौर पर हर मां- बेटे को होता है। बेटा रोटी-पानी के जुगाड़ में, अपनी दुनिया में व्यस्त और मां जिन्दा ही प्रेत की तरह अदृश्य। खुद के लिए भी और परिवार के लिए भी...अपने सारे फीके, बेरंग दिन-रात अकेली ही जीती, जागती। रोजमर्रा की जिम्मेदारियों की चकरी के दो पाटों के बीच बस इतना ही रिश्ता तो रह गया था अब  उन मां-बेटों के बीच कि   हर शाम –मां ठीक तो हो, पूछकर बेटा संतुष्ट हो जाता और - हां बेटा- कहकर मां। कई बार तो बंद दरवाजे के पीछे से ही कह देती –हां ठीक हूं मैं, सुमी। और शेखर तुरंत ही पूरी तरह से आश्वस्त होकर सोने भी चले जाते---मां का जवाब सुने बगैर ही या चेहरा देखे बगैर ही। जाने बगैर ही कि वाकई में मां ठीक है भी, या नहीं... मानो मां के ठीक होने से ज्यादा पूछना ही जरूरी  था अब  -या फिर शायद अभ्यस्त हो चले थे जीवन की निर्मम मजबूरी से कि वक्त ही नहीं पल भर का भी अब, कभी एक-दूसरे का मुंह देखकर जीने वाले मां बेटों के पास  ! और दिन भर एक ही छत के नीचे अलग-अलग रहने वाली पिनाकी भी तो  चटपट दोनों वक्त का खाना पहुंचाकर  अपनी जिम्मेदारी और  कर्तव्य-बोध, दोनों से ही मुक्ति पा लेती थी।  ‘ जिन्दगी अपनी होकर भी क्यों इतनी बेबस और बेगानी रहती है...क्यों खुद के लिए ही वक्त नहीं निकाल पाती हम?’  कभी उन उदास पलों में दम घुटता तो तर्क-वितर्क के साथ तुरंत ही खुद को समझा भी लेती श्रीमना, आखिर पिनाकी को कैसे और उद्विग्न रख सकता है वह। कम दुखी नहीं रही है वह भी। यूं भी क्या दे पाएं हैं वे लोग उसे सिवाय तनाव और उलझन भरी जिन्दगी के? पिछले चार साल से बेटी और पत्नी को अकेले ही तो छोड़ रखा था उसने यहां इंगलैंड की बर्फीली लड़ाई लड़ने के लिए ! उम्र की ढलान पर खड़ी मां को अकेली छोड़कर उनके साथ आने और रहने की तो वह सोच ही नहीं सकता था, तो अब आखिर उसका भी तो कुछ फर्ज बनता है। कैकयी नहीं कौशल्या है वह। राम को आदर्श मानकर चलने वाले उस परिवार ने रामायण पढ़ी ही नहीं, जियी भी थी। माता-पिता के आदेश पर वनवास लेना और राजपाट छोड़ देना, दोनों ही बातें उनके शेखर के लिए भी उतनी ही सहज थीं, जितनी कि भगवान श्री राम जी के लिए। शेखर के तो नाम मात्र से सुख-संतोष और गर्व की आभा से आंसू भीगा चेहरा चमकने लग जाता श्रीमना का । आज जब एक लम्बी भटकन और तकलीफ के बाद सब साथ हैं...बरसों बाद एक सुखी घर-गृहस्थी का अहसास हो पाया है उसे और उसके परिवार को, तो इतनी आसानी से सबकुछ बिखरने नहीं देगी वह ! समझना ही होगा यह उसे भी और  पूरे परिवार को भी,  विशेषतः पिनाकी को -कि मां और पिनाकी दोनों ही शेखर के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं...कि दोनों के ही बिना उनके शेखर का जीवन असंतुष्ट है।‘

एक कड़वाहट थी जो बीमारी की तरह ही उनके परिवार की खुशियों को भी कुतरती जा रही थी।परेशान और झुंझलाए-से शेखर अक्सर ही मां से कहते " इतना कड़वा क्यों बोलती हो, मां! क्यों ऐसे काम करती हो कि तिरस्कार मिले, तुम्हारे पास आने तक से कतराएँ लोग...? बड़े बनने का, काम करवाने का भी तो आखिर एक तरीका होता है?" श्रीमना रोज ही देख और जान रही थी कि अक्सर ही पत्नी के उलाहने और आंसुओं से भीगे शेखर, मां की आंख में रुके आंसुओं को अपनी टेढ़ी नजरों के ताप से सुखाने की कोशिश करते, और थोड़ी देर बाद ही मां की उदासी को पत्नी की प्रताड़ना से। तो कभी दोनों को मनाने और शान्त करने की कोशिश में खुद ही बेकाबू होकर चीखने लग जाते। देखते-देखते ही घर की सारी सुख-शान्ति तहस-नहस होती जा रही थी और अपने ही विध्वंस सपनों के मलवे के नीचे परिवार का हर सदस्य आहत तड़प रहा था। परिस्थिति की जटिलता से घबराए, भ्रमित सरकार अब तो पत्नी और मां से रोज ही यह तक कहने लगे थे कि- जैसा करोगी, वैसा ही तो भरोगी---भूल चुके थे वह कि ममता और प्यार को तराजू में तोलकर लिया या दिया नहीं जा सकता, सिखाया या खरीदा भी नहीं जा सकता। अपनी शर्तों पर मांगा और बांटा तो हरगिज ही नहीं, क्योंकि मांगने से तो सभी जानते हैं सिर्फ भीख ही मिलती है।

आजीवन अकेले ही घर-परिवार की पूरी जिम्मेदारी ढोती श्रीमना को अचानक ही अपने कंधे बूढ़े और कमजोर लगने लगे थे और अब उतर आना चाहती थी वह इस सुख-दुःख की चकरी से-वीतराग होना चाहती थी वह राग और रंजभरे घर और परिवार के खेल से क्योंकि जोड़ने और तोड़ने, दोनों की ही ताकत खतम होती जा रही थी उसकी। बूढ़ी हड्डियां और जर्जर मन दोनों ही टूट रहे थे। पूरे घर में अब एक अकेली मनु ही तो थी जो दादी की आंखों की उदासी पढ़ पाती थी। सच कहें तो बोलने से भी पहले दादी, मां और पापा को बहलाना और मनाना ही सीखा था उनकी  सुकुमार और सहृदया लाडली ने। दादी को अकेला और उदास देखते ही जैसे बचपन में अपने खिलौने और रंग के क्रेयौन लेकर दादी की बगल में आ बैठती थी, अब भी तो यूं ही चुपचाप आ बैठती है मनु...फर्क बस इतना कि अब खिलौनों की जगह अक्सर लैपटौप होता  है मनु के हाथों में और ‘ देखो दादी, कितना काम करना है मुझे!’ , का तो चुपचाप दादी के बगल में बैठने का बहाना मात्र रहता है,  और तब खो और छुप जाती हैं दादी-पोती कुछ घंटों के लिए।  कभी घर-परिवार और मित्रों की तस्बीरें दिखाती, तो कभी स्क्रैबल या अंताक्षरी खेलकर दादी का घंटों मन बहलाती मनु।... आखिर दादी के बगल में बैठकर सीखी उन चौपाइयों का इससे बेहतर और क्या उपयोग कर सकती थी मनु। तब भी दादी न मुस्कुरा पाती, तो सफेद रूखे बालों में तेल लगाती मनु, कंघी करती मनु। कभी गीता के श्लोकों पर बहस करने लग जाती तो कभी रामायण और अरविंदों पढ़कर सुनाती। अपनी समझ से हर भरसक प्रयास करती दादी को बहलाने और फुसलाने का।जितना ही वे मनु से दूर होने की कोशिश करतीं, उतना ही मन में उमड़ता प्यार उन्हें पोती से जोड़ता चला गया। एक बहुत ही नजदीकी और अटूट अहसास भरा रिश्ता जुड़ चुका था दोनों के बीच—इतना नजदीकी कि यदि एक को तकलीफ हो, तो दूसरी कराहने लग जाती। श्रीमना परेशान पोती को देखती और अक्सर सोच में डूब जाती, मनु के आगे तो अभी पूरा जीवन पड़ा है, फिर क्यों और बांधे अपने बूढ़े और अतीत होते मोह में इसे और फिर बिछुड़ने का असह्य दर्द दे इस छोटी-सी उम्र में ही ! औरतों का मन वैसे भी ज्यादा कोमल होता है, भूलना और भुलापाना आसान नहीं होता इनके लिए। फिर श्रीमना खुद भी तो एक औरत ही थी और यह बात अच्छी तरह से जानती व समझती थी...क्या खुद वह पलभर को भी कुछ भूल पाई ---बेटा सुब्रतो...युवावस्था में ही दूर चलेगए पति, किसी को भी? परिवार के प्रति कर्तव्य और प्यार से लबालब श्रीमना अक्सर मन-ही-मन अपनी तुलना उस काली मकड़ी से करती जो खुद ही अपने बच्चों को खा-खाकर और भी जहरीली होती चली जाती है। अब उसकी आंखों की तरलता एक रूखी और निर्मम बेचारगी में बदलती जा रही थी जो कि अक्सर विषमताओं से जूझती, टूटे सपनों के मलवे समेटती थकी-हारी आँखों में आ ही जाती है। दुःखी श्रीमना रोज ही सोचती कि ऐसा क्या किया आज फिर उसने, जो बहू-बेटे को इतनी तकलीफ पहुंची-क्या ज्यादा मिठास होने से मधुमेह सी यह  मधुरता शरीर की ही तरह आपसी रिश्तों को भी खोखला करने की ताकत रखती है? लाचार श्रीमना रोज ही सोचती, और सोचती ही रह जाती। यह वही श्रीमना थी जो अपमान तो दूर, बड़े बेटे सुब्रतो की उदासीनता तक को न झेल पाई थी---जीवन भर के लिए मुँह मोड़ लिया था उससे। पर अब कहां जाए वह उम्र के इस मोड़ पर? वैसे भी तो शेखर और सुब्रतो में बहुत फर्क है; एक जलती आंच-सा गरम और तेज है, तो दूसरा झील-सा शांत और गहरा। शांत इस झील में ये तूफानी लहरें कैसे...कैसे रोक पाएगी वह इस बर्फीले तूफान को, कहां से आ रहा है यहþ?—कहीं वह खुद ही तो नहीं, उसका अटूट स्नेह ही तो कारण नहीं इस सारे दुख का?पूजा के बहाने अकेले कमरे में बंद श्रीमना अक्सर मौत के लिए दुआ मांगती; वह जानती थी कि बेटे से दूर होकर भी वह कभी उसके मन या जीवन से दूर नहीं हो पाएगी---कुछ ऐसा ही अभिन्न था उसका और शेखर का रिश्ता, आज से नहीं बचपन से ही। मां को खुद से दूर नहीं होने देगा वह। अगर मौत आ जाए, तो बेटे और बहू की सभी समस्याओं का अंत हो जाए ! दर्द से कटती श्रीमना सोते-जगते बारबार यही दुआ माँगती। कैसी है यह मन की अदालत जहाँ सजा भी खुद ही सुनाओ और भुगतो भी खुद ही...फिर मौत भला मांगने से कब आती है! वैसे भी मरने से बहुत डर लगता था श्रीमना को, इतना डर कि बहू द्वारा परोसे तिरस्कार तक जीमने की आदत डाल ली थी उसने। माना कि दंश देते थे, परन्तु बेटे और पोती के प्यार में विवश श्रीमना सहना सीख चुकी थी---बहू के तानों को भी, और आचरण सुधारने की बेटे द्वारा परोसी सैकड़ों हिदायतों को भी। कुछ न कर पाने की दुविधा में झटपटाते शेखर सरकार समस्याओं का आनन-फानन हल ढूंढने के प्रयास में और भी बौखलाते जा रहे थे और निशब्द व स्तब्ध श्रीमना कहना और चाहना क्या जीना तक भूलती जा रही थी। हर तरफ ही बस एक नीर बिन मझली सी तड़प रह गई थी।   " और क्या चाहती हो तुम आखिर..आखिर तुम्हें यह और क्या इज्जत दे सकती है, माँ...तुम्हारे नाम पर ही तो देखो इसने अपनी इकलौती बेटी का नाम रखा है...मनुश्री...यह इज्जत क्या कम है तुम्हारे लिए? इतनी उदासीनता अच्छी नहीं, इससे ज़्यादा और क्या चाहती हो तुम इससे?’ रिश्तों को निभाना सीखो। प्यार चाहती हो तो पहले प्यार देना सीखो। क्यों सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह, तुम खुद ही हर आखिरी फैसला करना चाहती हो। क्यों हर पल जज और ज्यूरी दोनों ही बनी रहना चाहती हो...क्यों हर व्यक्ति हर पल तुम्हारी ही ताल पर नाचे...क्यों बस अपना ही कहा करवाना चाहती हो...थोड़ी जगह दो, हमें भी। अब बच्चे नहीं रहे हम, जो बस तुम्हारा ही पल्ला पकड़े बैठे रहें...आखिर तुमसे अलग भी एक जिन्दगी है हमारी? नहीं सुनूंगा अब तुम्हारी एक भी मैं, किसी लफड़े में नहीं पड़ूंगा  मैं अब... तुम्हारे या पिनाकी के। कुछ और सुनना चाहती हो तो सुनो, मुझे पूरा विश्वास है कि तुमसे पहले ही जाऊंगा मैं इस दुनिया से। और तब यूं आंसू सुड़कती, एक टेलिविजन सीरियल की तरह और ज़ायके नहीं ले पाओगी तुम मेरी इस बेबस जिन्दगी के।"

जिन्दगी की असह्य विषमता में आवारा बादल से भटकते शेखर के विचार अक्सर ही मर्यादा को भूल गाज बनकर गिरते श्रीमना के कोमल मन पर और अंतस् तक झुलस जाता उनका  क्रोध और नफरत की उस आंच से। क्यों होश संभालते ही, जीवन की थपेड़ में आते ही, हर रिश्ते को भूल मर्द बस मर्द ही रह जाता है? श्रीमना कभी भी तो न जान पायी थी यह रहस्य! अपने लिए ही नहीं, अक्सर उनका मन पिनाकी और सबसे ज्यादा फूल-सी मनु के लिए रोता...कैसे बड़ी हो पाएगी इस नफरत का इतना ज़हर पी-पीकर वह!

दुनिया भर के दुःख और अपमान तो सह लिए श्रीमना ने, पर खुद अपने ही अंश के तिरस्कार का बोझ कैसे उठाए? जिन्दगी में पहली बार लगा श्रीमना को कि हर साया उठ चुका है सर से...खुद उसके अपने आत्मबल और भगवान का भी। इतना अकेला और लाचार तो कभी महसूस नहीं किया था उसने; पति के जाने पर भी नहीं! बेटा शेखर तो है सुख-दुःख में साथ देने को, यही सोचकर उठ खड़ी हुई थी तब वह और सारे आंसू पोंछ डाले थे उसने...योद्धा की तरह जुटी रह पाई थी जीवन के कर्मक्षेत्र में वह।


निशब्द रोती श्रीमना ग्लानि व दुःख से चूर-चूर थी। अक्सर ही पाषाण बनी, मूक बेटे बहू को  देखती और देखती रह जाती...गलती कहां, कब और किससे हुई...वह बदल गई या उसका वक्त, यही जानने का प्रयास करती रह जाती। अपने ही अदृश्य दुःखों में डूबकर भूल चुकी थी वह कि जिन्दगी को पूरी जीवटता के साथ कैसे जिया जाता है—कि आदमी तो जिन्दगी की बिसात का वह मोहरा है जो सात-आठ घर भी हिम्मत के साथ सीधे-सीधे पार कर ले तो कठिन से कठिन बाज़ी तक जीत सकता है। बादशाह तक को हरा सकता है। उसे तो बस इतना ही याद रह गया था कि वक्त बहुत बलवान होता है। वह हमें छेड़ सकता है, हम उसे नहीं। ... जीवन के उस मरु में भयावह सपने सी, जलते पैरों निर्वस्त्र दौड़ती श्रीमना सारा ताप अंदर ही अंदर सोखती चली जा रही थी।

सवालों का तूफान था चारो तरफ और उसके पास किसी सहारे की नौका या एक भी जबाव की पतवार नहीं थी। दिन-रात उदास सोचती ही रह जाती वह कि कैसे मिटा या समेट पाएगी वह दुःख, इस कड़वाहट को इनकी और अपनी जिन्दगी से? बेटे-बहू का बिखरा घर या गंदा फर्श तो नहीं, कि समेट ले या साफ कर दे। इसके लिए तो एक बार फिर से बहुत ही हिम्मत, धैर्य और संयम से काम लेना होगा। कहां से लाए इतना आत्मा और शरीर का बल वह इस ढलती उम्र में? सही ही तो कह रहा है शेखर...वाक़ई में और क्या चाहती है वह इनसे? अक्सर शर्म, दुःख और ग्लानि से बेटे-बहू के आगे गर्दन तक न उठा पाती वह। अब तो मां और पत्नी के रिश्तों से झुंझलाए और परेशान शेखर को भी पिनाकी की लगातार चलती जुबान और मां की उदास चुप्पी अंदर तक भेदने लगी थी ...यहां तक कि अपनी बात मनवाने के लिए, बदलने के लिए वह जोर जबरदस्ती करने लगे थे...पत्नी पर हाथ तक उठने लगा था उनका। परन्तु कुछ भी तो नहीं बदल पा रहा था...ना ही पत्नी का स्वभाव और ना ही घर का वातावरण। दोनों ही तो उसके लिए एक नासूर...गूढ़ पहेली बनते जा रहे थे। ऐसा नहीं था कि पिनाकी समझती नहीं थी पति की परेशानी को, बस अपने ईर्शालू स्वभाव से ऊपर नहीं उठ पा रही थी वह। कई बार वादा भी किया था उसने खुद को संयत रखने का, पर जितना ही खुद को संभालती, उतना ही बिखरती जाती पिनाकी। इसके पहले कि हर आदर्श, हर सपना एक कड़वाहट में बदले, श्रीमना बेटे-बहू की जिन्दगी से बहुत दूर चली जाना चाहती थी। शेखर की आँख के अंगार, पिनाकी के चेहरे पर पड़ते थप्पड़ और नन्ही मनु का गुमसुम चेहरा; सब खुद उसकी अपनी आत्मा को लहूलुहान कर रहे थे और लाचार श्रीमना किसी का भी दुःख दूर करने में असमर्थ थी; ना ही अपना और ना ही बेटे बहू का। अब तो गीता-रामायण या सत्संग तक में उसे आराम नहीं मिलता; क्यों इतना पराधीन है उसका जीवन---क्यों इन रिश्ते और सांसों के बंधनों से मुक्ति नहीं ले पा रही वह...क्यों अपने साथ-साथ इनके जीवन को भी विषमय कर रखा है उसने ?

और तब बहुत सोच-समझकर आखिर अपना वह फैसला बेटे को सुना ही दिया उसने, कि अब और नहीं रह सकती इतनी ठंड में...अंधेरे और बर्फीले, इस बेहद बेजान इंगलैंड में वह।

बेटे के सफेद पड़ते चेहरे को पूरी तरह से अनदेखा करने की कोशिश करते हुए तब श्रीमना ने प्रार्थना की थी, कि- " मुझे तो तू कालीबाड़ी ही छोड़ आ शेखर। कम-से-कम धूप और खुली हवा तो है वहां पर इन बूढ़ी हड्डियों के लिए। अकेली कहां हूं मैं, हजार यादें हैं वहां मेरे पास। आस-पड़ोस है। पेड़, पौधे और मेरे अपने पालतू पशु, पंछी हैं। जाना पहचाना सबकुछ ही तो है वहां पर। उन्ही के सहारे खुशी-खुशी जी लूंगी मैं और फिर तुम सब भी तो आते-जाते ही रहोगे? "किसी को भी उनके इस फ़ैसले से कोई विशेष शिकायत या दुःख नहीं हुआ। सच पूछो तो सभी दिशा, खुद अपने लिए वक्त ढूंढ रहे थे। और ऐसा भी नहीं था कि मां से मिलने वे नहीं जा पाएंगे, या मां की खबर नहीं ले पाएंगे या फिर मां की ज़रूरतों का ध्यान नहीं रख पाएंगे। बेटे का फर्ज भलीभांति निभाएंगे शेखर सरकार। हर साल छुट्टी का पूरा महीना मां के साथ ही निकालने का मन बना चुके थे वे और छुट्टी आते ही गए भी वे, जब मां से ही पता चला था उन्हें कि बीच में एकबार हाल ही में, सुब्रतो दादा भी आए थे भारत मां से मिलने, पत्नी लीसा और बेटी निकोल के साथ। और बाहर बैठक से ही, मेहमानों की तरह ही चाय-नाश्ता करके लौट भी गए थे। बरसों की चुप्पी के बाद कुछ ज्यादा बता या पूछ नहीं पाए थे वे दोनों एक दूसरे से। अंदर-ही-अंदर उमड़ती शिकायत और रोष की बदली ने मां के मन में भी तो एक ऐसी दलदल पैदा कर दी थी, जिससे उबर पाना न अब मां के बस में था और ना ही परदेशी दादा के। ठीक भी तो है, महत्वाकांक्षा की इन अंधी गलियों में प्यार और रिश्तों की भी तो सारी पहचानें अक्सर खो ही जाती हैं। पता नहीं सुब्रतो दादा मां की दबी ममता को कैसे नहीं पढ़ पाए थे, पर मां की आवाज में कांपती बिजलियों को और आँखों की नमी को शेखर ने मां के लाख छुपाने के बावजूद भी पहचान लिया था। कितनी रुंधी आवाज में मां ने बताया था कि चलते वक्त सुब्रतो दादा ने मां के पैर भी छुए थे...क्या पता अपनी दूरी या बेरुखी के लिए मां से माफी मांग रहे थे या फिर बस अन्तिम विदा ले रहे थे, श्रीमना नहीं जान पाई थी, परन्तु बेटे के हिलते कंधों और लड़खड़ाते कदमों के बीच पड़े उस ताजे आंसू के कतरे को अनदेखा करते-करते वह खुद भी तो रो ही पड़ी थी, आखिर।          

तो क्या खुश नहीं रह पाई  उस सांय-सांय करती हवेली में अकेली-अकेली भटकती श्रीमना...काली बाड़ी की तरह ही एक और गौरवमय जर्जर खंडहर--- शेखर का प्यार और परवाह जिसे बिखरने नहीं दे रहे थे और उनकी खुद अपनी जिन्दगी के प्रति उदासीन अनमयस्कता, जीने। परन्तु यह सजा तो श्रीमना को भुगतनी ही थी। अपनी बेहिसाब लंबी जिंदगी से वह इतना तो जान ही गई थी कि एक-न-एक दिन हर आज को अतीत होना ही पड़ता है और अतीत का सिवाय यादों के कोई और अस्तित्व नहीं होता, चाहे वह कितना ही सशक्त क्यों न हो, जैसे कि इतिहास का नहीं होता।  भलीभांति जान चुकी थी वह कि इन खंडहरों को दूर से सराहा तो जा सकता है, परन्तु इनमें रहा या जिया नहीं।...परिवार से हजारों मील दूर बैठी बस एक पर्यटन स्थल बनकर ही तो रह गई थी वह। एक ऐसा तीर्थस्थान जहां शेखर सरकार परिवार सहित हर साल आने का मन बना चुके थे और आते भी हर वर्ष  जरूर अपना प्यार और परवाह बिखेरने, अगर होनी को कुछ और ही मंजूर न होता । ...
 
महीनों बीत गए अब तो इस बात को भी... यूं ही अलग-अलग जिन्दगी जीते-जीते उन्हें। अपनी-अपनी जिन्दगी से सभी अभ्यस्त हो चले थे। शेखर सरकार खुश थे चिड़ियाघर की नौकरी और उन निरीह, मूक जानवरों की देखभाल करते,---पक्षियों की गुनगुन और उन्मुक्त उड़ानों के बीच कविता लिखते, और पिनाकी अपनी तनावहीन, मनमानी जिन्दगी जीते। बिना किसी रोक टोक या जांच-पड़ताल के उसे जो सही और अच्छा लगता था, बस वही करती थी पिनाकी। दिनरात लाडली की देखभाल करती, बेटी के और अपने हर शौक पूरे करती। पूरा दिन कैसे निकल जाता, अब तो उसे पता ही नहीं चल पाता। इंगलैंड में पहली बार जिन्दगी उसके लिए, परिवार के लिए मानो पंख लगाकर मनमानी आजाद उड़ानें ले रही थी---एकबार फिर नीले आकाश को बांहों में लेकर जी पा रही थी पिनाकी।        

रोज की ही तरह उस दिन भी सुबह उठते ही कम्प्यूटर खोलकर बैठ गयी थी मनु। नए प्ले की स्क्रिप्ट भी तो देनी थी उसे---यूं ही बहुत देर हो चुकी है और पत्रिका का संपादक बारबार याद दिलाए जा रहा है। झटपट घर के सारे काम निबटा लिए थे उसने । तीन-चार घंटे बैठकर आराम से लिखेगी अब और जरूर ही पूरा कर लेगी आज। परन्तु मेज पर बैठते ही याद आया कि  मंगलवार था उस दिन और हर मंगलवार को वह पिनाकी के साथ टेस्को जाती है, रोजमर्रा और खाने-पीने की चीजों की खरीददारी करने। मनु जानती है कि पिनाकी सुबह सात बजे से ही नहा-धोकर, तैयार बैठी इन्तजार करती है उसका। पूरे सप्ताह ही इंतजार करती है वह तो मंगलवार का। शौपिंग बगैर तो काम चल भी जाए मां का, परन्तु मनु बगैर नहीं।

शौपिंग से लौटते ही आदतन् कम्प्यूटर खोलते ही, पहले वह मेल चेक करने लगी। हजार इधर-उधर की ई.मेल के बीच एक ई मेल जोनुस की भी थी। उल्लसित मन से मनु ने उसे खोला। पहली क्लिक में ही मेल खुल भी गई...मानो मनु का इन्तजार कर रही थी ... खुलते ही मनु की आंखों के आगे एक निशब्द धमाका हुआ और सारे शब्द गोल-मोल धब्बे बनकर चारो तरफ नाचने लगे , तुरंत ही नाचते-नाचते गुम भी हो गए। मनु ने जलती आंखों से चश्मा उतारा और एकबार फिरसे साफ-साफ पढ़ने की कोशिश की---खबर सही तो है, कुछ गलत तो नहीं पढ़ा या समझा उसने? खबर तो शत्-प्रतिशत सही थी, बस बताने का तरीका ही जरा गलत था- जलती आंच की लपट-सा जलाता और झुलसाता, आंसू पोंछने की बजाय आँसुओं से नहलाता-सा...उसे और उसके दुःख को पूरी तरह से झुठलाता और बेगाना करता हुआ-सा।


तब मनु ने घड़ी देखी थी...सात बजकर तीस मिनट यानी वहां के  बारह। अचानक ही एक फक् के साथ कम्यूटर की स्क्रीन का वह सुलगता घड़ी वाला कोना धू-धू लपटों में फूट पड़ा ...धधकने लगा  और जलते हुए शमशान-सा पल भर में ही धुंआ-धुंआ सबकुछ निगल भी गया। सबकुछ... जो भारत में मनु के लिए सर्वाधिक महत्व रखता था।  प्रिय था। यादों में, अस्तित्व में अशेष बना, उम्रभर शेष रहनेवाला था  उसके जीवन में... उसके व्यक्तित्व में  ।...  स्मृतियों के चक्रवात में उलझी मनु सूखे पत्ते-सी भटकती रही,  कैसे भी  मन को स्थिर ही नहीं कर पा रही थी वह।... 

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                                                                                                                                                                                            दो लघु कथाएं


                                                                                                                                                                                        सुभाष नीरव

बीमार




 

“चलो, पढ़ो।”

तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढ़ने लगी,  “अ से अनाल... आ से आम...”  एकाएक उसने पूछा, “पापा, ये अनाल क्या होता है ?”

“यह एक फल होता है, बेटे।” मैंने उसे समझाते हुए कहा, “इसमें लाल-लाल दाने होते हैं, मीठे-मीठे !”

“पापा, हम भी अनाल खायेंगे...” बच्ची पढ़ना छोड़कर जिद्द-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, “बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो ! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फॉर ऐप्पिल... ऐप्पिल माने...।“

 

सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डॉक्टर ने सलाह दी थी– पत्नी को सेब दीजिये, सेब।

सेब !

और मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच-विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था– पत्नी के लिए।

 

“बच्ची पढ़ रही थी, ए फॉर ऐप्पिल... ऐप्पिल माने सेब...”

“पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ?... जैसे मम्मी ?...”

बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, बच्ची के चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।

बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नज़रों से देखते हुए पूछा, “मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा ?”

 

 

 




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वाह मिट्टी

 


“छोनू बेटा, बाहर मिट्टी है, गंदी! गंदे हो जाओगे। घर के अन्दर ही खेलो, आं...।” जब से सोनू घुटनों के बल रेंगने लगा था, रमा उसकी चौकसी करती रहती कि वह बाहर न जाए। मिट्टी में न खेलने लगे।

“छी-छी! गंदी मिट्टी ! मिट्टी में नहीं खेलते बेटा। देखो, हो गए न गंदे हाथ-पैर! छी!” सोनू बाहर चला जाता तो रमा उसे तुरन्त उठाकर अन्दर ले आती। प्यार से समझाती-झिड़कती।

जब सोनू खड़े होकर चलने लगा तो हम पति-पत्नी बेहद खुश हुए। लेकिन, अब रमा की परेशानी और अधिक बढ़ गयी। वह न जाने कब चुपके से बाहर निकल जाता और मिट्टी में खेलने लगता। रमा खीझ उठती, “उफ्फ! मैं तो तंग आ गयी। दिन भर पकड़-पकड़कर अन्दर कमरे में बिठाती हूँ और यह बदमाश है कि न जाने कब चकमा देकर बाहर चला जाता है। ठहर, अभी लेती हूँ तेरी खबर!”

अब रमा सोनू को डांटने भी लगी थी। वह चपत दिखाते हुए उसे धमकाती, “खबरदार! अब अगर बाहर मिट्टी की तरफ झांका भी! मार पडे़गी, समझे।”

“तुझसे अन्दर बैठकर नहीं खेला जाता ?  हर समय मिट्टी की तरफ ध्यान रहता है।” सोनू की हरकत से कभी-कभी मैं भी खीझ उठता।

फिर, न जाने क्या हुआ कि सोनू ने बाहर जाकर मिट्टी में खेलना तो क्या उधर झांकना भी बन्द कर दिया। दिनभर वह घर के अन्दर ही घूमता रहता। कभी इस कमरे में, कभी उस कमरे में। कभी बाहर वाले दरवाजे की ओर जाता भी तो तुरन्त ही ‘छी मित्ती!’ कहता हुआ अन्दर लौट आता। अब न सोनू हँसता था, न किलकारियाँ मारता था। हर समय खामोश और गुमसुम-सा बना रहता।

सोनू के दादा-दादी को जब इस बात की खबर हुई तो वे भी चिंतित हो उठे। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि हम सोनू को लेकर कुछ रोज के लिए गाँव चले आएँ। मुझे और रमा को उनका प्रस्ताव अच्छा लगा। हम उसी रोज बस पकड़कर गाँव पहुँच गये।

 

माँ-पिताजी, छोटे भाई-बहन सभी सोनू को पाकर बेहद खुश हुए। लेकिन, सोनू था कि यहाँ आकर और अधिक गुमसुम हो गया था। वह गोद से नीचे ही नहीं उतरता था। उतारने की कोशिश करते तो रुआंसा-सा हो जाता और गोद में ही बने रहने की जिद्द करता।

तभी, पिताजी ने सोनू को अपनी गोद में उठाया और बाहर ले गये। काफी देर बाद जब पिताजी वापस घर आये तो सोनू उनके संग नहीं था।

“सोनू कहाँ है ?” हम पति-पत्नी ने चिंतित स्वर में एक साथ पूछा।




“बाहर बच्चों के संग खेल रहा है।” पिताजी ने सहज स्वर में बताया। तभी, एक जोरदार किलकारी हमारे कानों में पड़ी। हम दौड़कर बाहर गये। सोनू मिट्टी में लथपथ हुआ बच्चों के संग खेल रहा था और किलकारियाँ मार रहा था।

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                                                                                                                                                                                                  परिचर्चा





देश के स्वतंत्रता-संग्राम में महारानी लक्ष्मीबाई ही नही, उतनी ही वीर और  धीर-गंभीर  आम महिलाओं का भी महत्व पूर्ण योगदान रहा। यह लड़ाई घर-घर से और देश के कोने-कोने से लड़ी गई थी और इसकी सफलता में  वीर पुरुषों के साथ वीर बाला, बच्चे बूढ़े सभी का बराबर का हाथ था। तिरस्कृत और समाज का कोढ़ समझी जाने वाली वैश्याओँ तक ने लड़ी थी यह लड़ाई। परिचर्चा में प्रस्तुत हैं कुछ ऐसी ही वक्त की गर्त में गुम गाथाएं सविता प्रथमेश की कलम से;





वेश्याओं ने भी लड़ी थी आजादी की लड़ाई 





आजादी के संघर्ष में ऐसी महिलाओं के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता जो न तो प्रतिष्ठित घर-परिवार से ताल्लुक रखती थीं और ना ही जिनका मार्गदर्शन किसी बड़ी हस्ती ने किया। वे स्वप्रेरणा से, जान जोखिम में डालकर स्वयं के चरित्र पर लगे उस दाग को धोने की कोशिश कर रही थीं, जिन्हें समाज पतित, वेश्या, गणिका आदि कहता है। सरकार की नई योजनाओं की जानकारी हासिल करना  इनके बांये हात का खेल था।


कानपुर की एक नर्तकी  थी-अजीजन। वह अपनी अप्रतिम सुंदरता के लिए विख्यात थी, किंतु अंग्रेजों ने जब कानपुर पर आक्रमण किया तब उसने युद्ध क्षेत्र में भी कुशलता दिखाई। अजीजन के शौर्य ने अंग्रेजों को अचंभित कर दिया था। अंग्रेजों ने उसकी स्वतंत्रता से प्रभावित होकर उसके सामने प्रस्ताव रखा था कि उसे छोड़ दिया जाएगा। उसपर कोई मुकदमा नहीं चलेगा, बशर्ते कि वह अपने कृत्यों के लिए माफी मांग ले। लेकिन अजीजन ने माफी मांगने से इनकार कर दिया, यह जानते हुए भी कि अंग्रेज उसे छोड़ेंगे नहीं। अजीजन के इनकार से बौखलाए अंग्रेजों ने गोली चलाकर उसे अमर कर दिया। बंगाल की वेश्या अलिकेश्वरी ने क्रांतिकारियों को आश्रय दिया था। साथ ही वह न्हें गुप्त रूप से धन भी दिया करती थी। सिक्षित अलिकेश्वरी अंग्रेजी भी अच्छी जानती थी। महात्मा गांदी के असहयोग आन्दोलन के देशव्यापी प्रचार-प्रसार ने उसे भी इस आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।


गणिका जो सम्पादक थी   


दिल्ली की शमीम पुतली रात को तवायफ का पेशा करती थी और दिन की रोशनी में समाज-सेविका, देशभक्त और क्रांतिकारियों की मददगार के रूप में भूमिका अदा करती थी। यह अच्छी संपादक और लेखिका  भी थी। क्रांतिकारियों को हथियार दिलाने में शमीम की भूमिका थी। साप्ताहिक उर्दू पत्र ' अरासेवी' के प्रकाशन और संपादकत्व की बात अंग्रेजों को पता चलने पर उन्होंने शमीम को बेहद तंग किया। आखिरकार परेशानी से बचने के लिए वह अज्ञात स्थान को चली गयी।


काशी की चरखाबाई के नाम से प्रसिद्ध थी---ललिता बाई। वह न केवल खुद चरखा चलाती थी बल्कि खादी पहनती भी थी। खुलेआम वह कांग्रेस के लिए वह चंदा भी एकत्रित करती थी। अंग्रेजों की गुलामी करने वाले भारतीयों से उसे सख्त नफरत थी। ऐसे ही एक कोतवाल की तरफ पीठ करके उसने एक गीत गाया था -ऐसों की क्या देंखें सूरत, जिन्हें वतन से है अपने नफरत


अदम्य साहस की धनी ऐसी ही थी आरा ( बिहार) की गुलाब कली। वह पुरुष का वेश धारण कर अपनी इच्छा से शाहबाद के राजा कुंवर सिंह की अंगरक्षक बन गई। अपना पेशा त्यागकर उसने हाथों में तलवार थाम ली। अंग्रेजों द्वारा राजा पर किए वार को स्वयं झेलकर वह वीर गति को प्राप्त हुई।

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                                                                                                                                                                                          हास्य-व्यंग्य





                                                                                                                                                                                            

                                                                                                                                                                                          -गोपाल चतुर्वेदी

उधार का उत्सव

बैंक के आला अफसर परेशान हैं। वह बारबार कलेंडर देख रहे हैं। कौन सा ऐसा खाली दिन मिले जब वह उधार उत्सव का राष्ट्रीय आयोजन कर सकें। रोज ही कोई न कोई त्योहार या उत्सव है। कभी देसी है, कभी आयातीत। उनकी एक और विवशता है। उनके पास सप्ताह में केवल पांच दिन उपलब्ध हैं। शनिवार इतवार को कभी काम किया तो यूनियन ईंट से ईंट बजा देगी। उस में देश की तरक्की को समर्पित ऐसे-ऐसे कामचोर कामरेड जमा हैं जिनकी दृढ़ आस्था है कि कोई भी काम हराम है।


दो-तीन दिन की मेहनत, लंच, डिनर के बाद दो अधिकारी मिलकर ऐसे दिन खोज निकालते हैं जब जनता को एक शामियाने के नीचे कार या घर के लिए लोन लेने को आमंत्रित किया जा सके। बड़े अधिकारी गर्व के साथ छोटों को सूचित करते हैं, " हम ने यूनियन के प्रेसिडेंट से बात कर उन्हें मना लिया है कि वह शनिवार या इतवार के दिन उधार उत्सव की इजाजत दे दें।"


उनकी इस उपलब्धि पर छोटे सहयोगी ताली बजाते हैं। बड़ों को खुश रखना 'सर' के मोहक सुर और ताली की ताल में आसान हो जाता है। उसी बैंक में हमारे मित्र मुरारी भी काम करते हैं। उनका मानना है कि सर, अफसर और सूअर में कोई खास अंतर नहीं है। कई बार अफसर का नाम लो तो सूअर सुनाई पड़ता है।


वह एक दिन हमें मिले तो उन्होंने सुखद सूचना दी कि उनका बैंक अपने शहर में शीघ्र ही एक उदार  उधार उत्सव का बृहद आयोजन कर रहा है। " उधार में उदार क्या होता है? क्या लंबी और सुविधाजनक किस्तों पर लोन दे कर आपका बैंक सूद नहीं लेगा ? अपने हिसाब से उदार उधार वह है जहां बैंक ऋण दे कर दो-तीन साल तक भूला रहे और जब याद आए तो पूरा का पूरा कर्जा ही माफ कर दे।"


मुरारी को हमारी परिभाषा में अपनी रोजीरोटी का खतरा नजर आया। उन्होंने गंभीरता से हमें उदार उधार के बारे में बैंक का नजरिया समझाया, " हम सामान्य लोगों को पैसा देकर न भूलते हैं, न वसूल करने से चूकते हैं। बड़े लोगों की श्रेणी अलग है। वह कभी कभी चकमा दे जाते है। इस उत्सव के लिए बैंक ने  'प्रोसेसिंग चार्ज' न लेने की बड़ी रियायद दी है। "


मुरारी को विदा कर हम इस नए उत्सव के बारे में सोचने लगे। दरअसल, उधार के बारे में अपना फलसफा दूसरों से अलग है। अपनी मान्यता है कि शत प्रतिशत उधार सुखद जीवन की आवश्यक शर्त है।


जिंदगी से ही शुरुआत करें। कौन जानता है कि कल क्या होगा? कुछ वक्त पहले शहर के धन्ना सेठ प्यारे सिंगापुर से छुट्टी मना कर और अपना पूरा मेडिकल चेकअप करवा कर लौटे थे। आते ही वह धंधे जुट गए। उन्होंने अपने नए शिक्षा-संस्थान का शिलान्यास मुख्यमंत्री के करकमलों से करवाया। जैसा सब जानते हैं, हर फ्राडिया, जालिया के पैर सदा पंकज और कर सदा कमल होते हैं। अगले दिन हर अखबार में चांदी की खुरपी हिलाते मुख्यमंत्री और उन्हें माला पहनाते प्यारे के फोटो छपे। उसी रात भयंकर दिल के दौरे से प्यारे टें बोल गए, फिर हर अखबार ने मरे हुए प्यारे के जोरदार फोटो छापे।


कहने का आशय यह है कि फोटो का भरोसा है, जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं है, कब दगा दे जाए, इसी कारण समझदार कहते हैं कि डट कर उधार लो और ऐसे जियो जैसे हर पल त्योहार हो। इस दर्शन में सब से बड़ी बात यह है कि कर्ज लेते बुद्धिमान हैं और चुकाते मूरख इनसान हैं।


हमारे एक अक्लमंद दोस्त अब तक 5-6 क्रेडिट कार्ड की पूरी लिमिट का फायदा उठाकर घर बदल चुके हैं। उन के पुराने पते पर अभी तक नए किराएदार के पास तकरीबन हर बैंक से नोटिस आ चुका है। एक बार तो नए किराएदार के पास पुराने किराएदार की तलाश में पुलिस भी धमक चुकी है।


हमारे दोस्त घर और अपना नाम बदल कर नए उधार और क्रेडिट कार्ड की जुगाड़ में भिड़े हैं। उन्हें यकीन है कि वह कामयाब होंगे और फिर उधार के शानदार जीवन का मजा लेंगे। इस बीच उन्होंने नए घर और शहर की खोज अभी से शुरू कर दी है। जरूरी है कि उधार की जिन्दगी योजनाबद्ध तरीके से बसर हो जाए।


हमारे जैसे भुक्तभोगी जानते हैं कि कर्ज लेने वाला बीमार कम ही पड़ता है। क्या पता मर्ज उससे डरते हों। यह भी मुमकिन है कि कर्जदार की अच्छी सेहत की दुआ उस के बैंक, मकान और दुकान मालिक जैसे सारे सेठ साहूकार करते हों। जब तक उधार लेने वाले की सांस है, कर्ज लौटाने की आस है। कौन कहे, उधार लौटाने की सद्बुद्धि कब आ जाए लेकिन सांस एक बार गई तो उसका लौट कर आना मुश्किल है। निष्कर्ष यह कि कर्जदार का जीवन जेब पर जब्त रखने वालों के मुकाबले ज्यादा लंबा, सुखी और चिंतारहित होता है।


अपने गहन आत्म विश्वास के दौरान हम ने कर्ज के हर पक्ष के बारे में सोचा और पाया है कि व्यक्ति के बारे में ' आज नकद, कल उधार' जैसी बकवास किसी अविकसित देश की पहचान है। हर सरकार उधार पर चलती है। जितने विकसित अर्थव्यवस्था और देश हैं, उतने ही अदिक वह उधार पर आधारित हैं। वह हाथ फैला कर कर्ज लेते हैं और झोली खोल कर उधार देते हैं। फिर व्यक्ति पर उधार न लेने का नैतिक और सामाजिक बंधन क्यों हो?


अपने घर का स्कूटर, फ्रिज, टीवी, साउंड सिस्टम, फर्नीचर आदि सब कुछ उधार पर है। इस संसार में ऐसों की बहुतायत है जो कहते कुछ और करते कुछ हैं। हम उनमें से नहीं हैं। इसी को ले कर अपना भोलू पान वाले से झगड़ा होता है, तब वह पान सिगरेट के लिए नकदी की मांग करता है। हम ने कई बार उसे क्रेडिट कार्ड दिखाया, वह हमेशा कहता है, " यह सब आप पढ़ेलिखों के नएनए चोंचले हैं। क्या आप समझते हैं कि हमारा सफेदपोश ठगों से पाला नहीं पड़ा है जो ' हिसाब में लिख लो ' का हुक्म दे कर उसे बिना चुकाए फुर्र हो जाते हैं। अब तो न क्रेडिट कार्ड, न कम्प्यूटर, अपनी बुद्धि में बस, कैश समझ में आता है।"


 अपनी कर्ज प्रतिबद्धता के वशीभूत हम मुरारी के बैंक के लोग उत्सव में बड़ी उम्मीदों के साथ पहुंचे। इस बार इतना उधार ले लेंगे कि स्कूटर के बजाय कार पर सवारी कर सकें। अपने हाथ निराशा लगी। बैंक वाले न जाने कितनी तरह की अगड़मबगड़म सूचना मांगने लगे। एक ने तो हम से आयकर के प्रमाणपत्र तक की फरमाइश की। उस गधे को क्या पता था कि हमने एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते ऐसे फालतू के कर कभी नहीं चुकाए हैं।


हम लौट रहे थे कि एक मददगार सज्जन ने हमारी निराशा भांप कर प्रस्ताव दिया,  "बस, टोटल पर एक परसेंट की प्रोसेसिंग फीस नकदी दीजिए, लोन आप का हम करवा देते हैं। "


हम अपने उसूल के पक्के हैं।  कैश दे कर ऊधार क्यों लें। यों अपने पल्ले यह बात पड़ गई है कि कैश ही भ्रष्टाचार की जड़ है। अगर सब हमारे उधारउसूल का अनुमोदन करें तो इस साधुसंतों के देश में सदाचार का ऐसा सुराज आएगा कि यह काहिलों का जन्नत बनेगा। 


                                                                                                                                  साभार 'सरिता'

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                                                                                                                                                                                                       -ओशो

इस धरती की                         जिम्मेदारी                                         कौन लेगा

सचेत होना तो पशु जीवन का अंग नहीं हो सकता। वह तो मनुष्य की आत्मा की संभावना है। वह तो एक ऐसा बीज है जिसकी देखभाल की जानी चाहिए। जब यह बीज पनपता है तो इससे स्वाधीनता मिलती है, मुक्ति मिलती है, आनंद मिलता है।

शांति नए फूल खिलाती है। कुछ कहा नहीं जाता, पर बहुत कुछ सुना जाता है। कुछ दिखाया नहीं जाता, पर काफी कुछ देख लिया जाता है। कोई तुम्हारा पथ प्रदर्शन नहीं करता, पर शांति की एक चुंबकीय शक्ति तुम्हें आगे, और आगे ले जाती है, तुम्हारे मष्तिष्क से आगे, तुम्हारे देह से आगे, तुम्हारी पत्नी से आगे, तुम्हारे पति से आगे।

जब तक हम सारी दुनिया में इस तरह की शांति का अनुभव करने वाले ऐसे लाखों-करोड़ों लोग तैयार नहीं कर लेते, तब तक युद्ध होते ही रहेंगे, क्योंकि लोग सपाट जिन्दगियां जीते नहीं रह सकते। ऐसी जिन्दगी से बेहतर है कि युद्ध किया जाए, ताकि थोड़ी उत्तेजना मिले, हालांकि इसका परिणाम मृत्यु में निकलता है।

अगर ऐसे मनुष्य को शांतिपूर्वक रहने पर मजबूर किया गया जो आंतरिक शांति से परिचित नहीं है, तो वह या तो किसी दूसरे की हत्या करेगा या खुद को मार डालेगा। इससे उसे कुछ न कुछ उत्तेजना तो मिलेगी। सही किस्म की उत्तेजना पुष्ट करती है, गलत किस्म की उत्तेजना जहर होती है। आज तक मानवता पर गलत किस्म की उत्तेजना का प्रभुत्व ही रहा है।

यहां तुम मेरे साथ एक सहज बात सीख रहे हो। और वह है शांति का आनंद किस तरह लिया जाए। मौन का आनंद कैसे लिया जाए। उसका आनंद कैसे लिया जाए जो तुम्हारे भीतर है, जिसके लिए तुम्हें दूसरे पर निर्भर नहीं होना है। ऐसा शांतिमय व्यक्ति दूसरों को भी शांत करता है। उसका मौन दूसरों के हृदय को स्पर्श करने लगता है। उसका मौन सागर के समान होता है, और बड़ा लुभाता है।

यह सब तुम पर निर्भर है। अगर तुम शान्त, मौन और प्रेमपूर्ण हो गए तो तुम हर तरफ प्रेम की उर्जा रचोगे। लोग तुम्हें सड़कों पर रोक-रोककर पूछने लगेगें कि तुम्हारे साथ क्या घटित हुआ है। यह तो कुछ ऐसा है जो है तो अदृश्य, पर है बड़ा स्पर्श्य। ऐसा शांति पा कर तुम सागर की लहरों की भांति पूरी धरती पर फैलते चले जाओगे।

मैं कोई तृतीय विश्व युद्ध के खिलाफ नहीं लड़ रहा हूं। इसका सीधा कारण यह है कि इससे लड़ने का एकमात्र तरीका है एक शांतिपूर्ण मानवता की रचना करना। एक ऐसी मानवता की रचना जो लड़ने से इंकार करे, क्योंकि उस युद्ध से कोई उत्तेजना नहीं मिलेगी। मौन बैठे रहने में, कुछ न करने में और घास को खुद ब खुद उगने देने में भी तो एक उत्तेजना है। जब तुम्हें वास्तविक और प्रामाणिक उत्तेजना मिल जाएगी तो फिर युद्ध की परवाह कौन करता है।

मैं कोई वाशिंगटन और मास्को के लिए विरोध प्रदर्शन नहीं निकालने वाला। लेकिन, मैं एक ऐसी ताकत रच रहा हूं , पैदा कर रहा हूं जो सारी दुनिया को अपने आगोश में ले लेगी। और वही ताकत एटमी हथियारों, युद्धों और सभी तरह की मूर्खताओं को रोकेगी।

सिर्फ अपने उत्तरदायित्व को पहचानो. अपने उत्तरदायित्व को पहचानने की मनुष्य को जितनी जरूरत आज है उतनी पहले कभी नहीं हुई. सभी कुछ उसी पर निर्भर है। उसी पर निर्भर है कि यह धरती जीवित, स्पंदित और पुष्पित रहेगी, या फिर एक मृत गृह बदल जाएगी।

                                                                                                                                              साभार ' डेथ टु डेथलेसनेस' से।

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                                                                                                                                                                      चांद परियां और तितली







हर मां का बच्चा सुन्दर (नार्वेजियन लोककथा)







अनुवादः सुरेश चन्द्र शुक्ला ' शरद आलोक'





एक बार एक शिकारी जंगल में शिकार खेलने आया जंगल गया। रास्ते में उसे एक कौवी दिखाई पड़ी। कौवी ने शिकारी से कहा ' तुम बहुत अच्छे हो, तुम मेरे बच्चों को नहीं मारना ।'


'अच्छा तुम यह बताओ कि तुम्हारे बच्चे हैं कैसे ? ' शिकारी ने पूछा।


 ' पूरे जंगल में मेरे बच्चे सबसे सुन्दर हैं '  कौवी ने कहा।


' ठीक है, मैं तुम्हारे बच्चों को नहीं मारूंगा।' कहकर शिकारी चला गया।


परन्तु जब शिकारी वापस आया तो उसके हाथ में कौवी के तीन छोटे-छोटे बच्चे थे। कौवी ने जैसे ही शिकारी के हात में अपने बच्चों को मरा देखा तो जोर-जोर से रोने लगी।  रोते-रोते उसने कहा ' तुमने तो मुझसे कहा था कि तुम मेरे बच्चों को नहीं मारोगे ? '


' क्या ये तुम्हारे बच्चे हैं ? ' शिकारी ने हैरान होकर पूछा।


' तुमने ही तो कहा था कि तुम्हारे बच्चे सबसे सुन्दर हैं,'  शिकारी ने आगे कहा, ' मैं तो घोंसले में जा-जा कर देख रहा था कि कहीं सुन्दर बच्चों को न मार दूँ। मुझे तो ये ही सबसे बदसूरत बच्चे लगे,  इसलिए  मैने इन्हें मारा किसी दूसरे बच्चे को नहीं।'


 ' अच्छा।  तुम्हें यह नहीं पता कि हर मां को अपने बच्चे सबसे अच्छे और सुन्दर लगते हैं। '  कौवी ने उत्तर दिया।











मेरी मम्मी सब से अच्छी






मेरी मम्मी\ सब से अच्छी
मेरा  ध्यान  खूब वो रखती 
जो मै चाहूँ बना  के देती
रोटी भी बनती अच्छी अच्छी
मेरी मम्मी सबसे अच्छी
मेरी  है सब बात वो सुनती 
सही ग़लत का फैसला करती
मेरी तो सहेली वो पक्की
मेरी मम्मी सबसे अच्छी
बीमार पडू तो खूब मेरी सेवा करती
मेरी अभिलाषा  को सदा पूरा करती
पर  बात कहती  सच्ची सच्ची 
मेरी मम्मी सबसे अच्छी 


                         

रचना श्रीवास्तव