आज के अमानुष और ताकतवर समाज के अनगिनित कुरूप और घिनौने कुकर्मों की सड़ांध अब तो करीब-करीब पूरे ही विश्व को दूषित कर चुकी है, और हम ही नहीं, आने वाली कई-कई पीढ़ियां हरज़ाना भुगतने को मजबूर हैं। बहुत कुछ बदल रहा है और तेजी से बदल रहा है। नजरिया हमारे मूल्य सभी कुछ। ज़ाहिर है विश्वीकरण के इस युग में रुचि और मनोरंजन के साधन भी। कुछ नया परोसने और ढूंढने की चाह में, तुरंत की लोकप्रियता की तलाश में विवेक और जिम्मेदारी दोनों ही बहुत पीछे छूट गए हैं, न सिर्फ लेखकों से, अपितु प्रकाषक और प्रस्तुतकर्ताओं से भी...इन्द्रजाल भी अपवाद नहीं। हाथ पर हाथ धरे हम तमाशबीन बने बैठे हैं और क्रूरता व अश्लीलता के चित्र व विडिओ इन्द्रजाल पर घूमते रहते हैं। जाने किस आस या उपहास में लगातार भेजे और दिखाए जाते हैं...चित्र जिन्हें आम आदमी देखते ही आंखें बन्द करने पर मजबूर हो जाता है। सोचने पर मजबूर हूँ कि वाकई में कौन इन्हें देखना चाहेगा, और आखिर क्यों कोई इन्हें दिखाना भी?...किस तरह के प्रभाव और परिणाम की अपेक्षा की जाती है इनसे...अपने आस-पड़ोस, समाज में तो कुछ बदला नहीं पाए हम, विश्व की समस्याओं से जूझकर क्या हासिल कर पाएँगे ! इंगित मात्र कर देने से तो हल नहीं निकल आते। जबतक हर आदमी अपने कामों और अभिप्रायों की जिम्मेदारी नहीं लेता किसी बदलाव की अपेक्षा बेमानी ही है। न तो कहीं कोई डरा या शर्मिन्दा है, और ना ही यातना में कोई कमी आ पाई है, या दिला पाया है, तो सिर्फ इन कटे सिरों की तस्बीरों और चिनगारी भरी बातों से क्या फायदा ! आज भी तो हम आँखें बन्द करके मलाई खा लेते हैं। आज भी तो लाठी वाला ही भैंस हांकता है और आज भी तो शेर की खाल ओढ़े गीदड़ ही राज करते हैं; क्योंकि आज भी तो अच्छी तरह से सब जानने, समझने के बावजूद भी समाज के अपराधी और भ्रष्टों का ही हम राजतिलक कर आते हैं; क्योंकि आज भी तो बस बातें ही आसान हैं।
लेखनी का यह अंक नारी के इर्दगिर्द है...क्या है उसकी तस्बीर, खुद उसकी अपनी आखों में और दुनिया की आखों में भी... अबला है या फिर वह सबला...भ्रष्टा या फिर कुलपा, जननी, जगधात्री?
धूल झाड़ने और सोचने की जरूरत है, क्योंकि जवाब इसी दुनिया, इसी समाज में... हम सबके अपने अन्दर हैं।
हर साल की तरह ही, इस साल भी गत माह की आठ तारीख को अँतर्ऱाष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। कहीं नारियों के रूप-गुणों के कसीदे पढ़े गए तो कहीं उनकी परिवार और समाज में बढ़ती जिम्मेदारियां और योगदान के, परन्तु फिर भी यह दोयम् दर्जे की जीव आज भी तो. या तो गर्भ में ही भ्रूणृहत्या का शिकार हो जाती है और अपनी यातनाओं से मुक्ति पा लेती है, या फिर आजीवन कठपुतली-सी जाने किस भ्रम में पड़ी, एक अदृश्य डोर में बंधी रह जाती है...इशारों पर ही नाचते-फिरते उमर गुजार देती है। यह इक्कीसवीं सदी की सोच और सुविधाएं...क्या वाकई में इसकी भी हैं,...आइए देखते हैं क्या सोचता है यह समाज...हम आप । आत्मविश्वास की सच्ची-झूठी फूंकों से भरी क्या यह कभी चलना...थमना भी सीख पाएगी, या फिर बस अपने अछिन्न भ्रम में ही भटकती रहेगी...बस उड़ना और टूट-टूट कर बिखर जाना ही इसकी नियति है और रहेगी !
एक था बेटा। एक थी बेटी। दोनों खेलते आंगन में। आंगन में था पेड़। पेड़ पर थे पत्ते। पत्तों में था घोंसला। घोंसले में थे बच्चे। बच्चे चिड़िया के। चिड़िया की थी चहक। बच्चों की थी चें-चें। पत्तों की थी नाक। नाक से पत्ते लेते थे सांस। सांसों में बसा था हरापन। हरेपन में था पानी। पानी से था जीवन। जीवन की थी कहानी। कहानी से बना था संसार। संसार में था सूरज। सूरज में थी आग। आग में था ताप। ताप से थी गरमाहट। गरमी में थी धड़कन। धड़कनों की भी भाषा। भाषा में थे शब्द। शब्द टपके थे वृक्ष से।
आंधी चली। वृक्ष उखड़ा। कुल्हाड़ी चली। वृक्ष कटा। पंछी उड़े। बच्चे भागे। पत्ते सूखे। आँखों का पानी सूखा। होठों की बानी सूखी। हरापन टूटा। आंगन मैदान हुआ। छाया गुमी। चेंचें बरबाद हुई। कलरव के घाट सूने हुए। रिश्तों की नदी में पत्थर उभरे। तह की काई सतह पर आई। बेटा-बेटी की भाषा खो गयी। भाषा की संस्कृति की रोटी को कागला ले उड़ा।
क्या रोना निर्जीव की मौत पर? निर्जीव के नाश पर। छाया के विनाश पर। रोने के और भी हैं कितने बहाने। फिर वृक्ष पर ही इतना दर्द क्यों उड़ेलना? वृक्ष की मौत से दुनिया को क्यों परेशान करते हो? प्रकृति के अस्तित्व-विनाश पर इतने हैरान क्यों होते हो? अरे राजा नहीं रहा। रानी नहीं रही। वृक्ष नहीं रहा। पानी नहीं रहा। चीज़ें नाशवान हैं। नष्ट होंगी ही। पेड़ उगा है, तो उखड़ेगा ही। उदास होना बेकार है। रोना नादानी है। दुनिया अपने रस्ते चली जा रही है। वह ऐसी ही और ऐसी ही गति से जाती रहेगी। बम मत मारो। ज़मीन आसमान में धमाल मत मचाओ।
कैसे न रोयें? क्यों न उदास हों। वृक्ष कटता है तो भाषा की एक संस्कृति नष्ट होती है। शब्द ख़त्म होते हैं। एक वृक्ष से कितने शब्द बने हैं। एक जंगल से भाषा कितने-कितने स्रोतों से समृद्ध होती है। एक शब्द के आने से भाषा-संस्कृति में कितनी तरह की महक भर जाती है।
एक वसंत प्रकृति की चित्रकला में कितने-कितने रंगों के कलशे भर देता है। एक वृक्ष अपने में जंगल, शरद, वसंत, सब कुछ छुपाए रहता है। वृक्ष का टूटना, भाषा की गली का बंद होना है। एक पगडंडी का मिट जाना है। एक पनघट का उजड़ जाना है। एक कुंए का सूख जाना है। एक रिश्ते का खत्म हो जाना है। एक कम्प्यूटर की फ्लापी धुल जाना है। दुनिया के नक्शे से एक भरे-पूरे देश का गायब हो जाना है। बड़े दुःख की बात तो यह कि एक नन्ही चिड़िया की दुनिया का शून्य हो जाना है।
वृक्ष का शब्द से क् नाता है? भाषा से क्या रिश्ता है? क्या भाषा पेड़ ने पैदा की? या भाषा मनुष्य की काल्पनिक उपज है? या भाषा ईश्वर प्रदत्त होती है?
वेदों, उपनिषदों और ब्राह्मणों में भाषा को जिस स्तर पर वंदनीय बताया गया है, वह सर्वथा दैवी ही हो सकती है। कहा गया है कि ब्रह्म के जितने रूप हैं, उतने ही शब्द हैं। यजुर्वेद में कहा गया है- तस्मिन हतस्वुर्भुवनानि विश्वा । उस परमात्मा में ही संपूर्ण लोक स्थित है। तब वृक्ष कहां अलग हुआ? वृक्ष भी तो लोक में ही स्थित है। लोक के सारे स्वरूपों में शब्द की संभावना है। उनके नाम है। रूप हैं। रूप हैं। यह नाम रूप उन वस्तुओं को मनुष्य ने ही दिए हैं।
भाषा के पीछे ईश्वरीय शक्ति मनुष्य की विवेकशीलता के रूप में होती है। व्यक्ति संसार में जिन चीजों के संपर्क में आता है, उनका बिम्ब मनुष्य के मष्तिष्क पर पड़ता है। उन बिम्बों को मनुष्य के मष्तिष्क की शक्ति रूप, गुण, आकार के आधार पर नाम देती है। अज्ञानी को इन बाह्य वस्तुओं से जुड़कर भी कोई बोध नहीं होता। क्योंकि उसके मष्तिष्क की विवेक नामक शक्ति शून्य होती है। विवेक तो प्रकृति प्रदत्त होता ही है। अतः भाषा के मूल में दैवी शक्ति काम करती है तथा उसके विस्तार और स्वरूप निर्धारण में व्यक्ति की कल्पना, उसके भीतर स्थित मिथक, बनते हुए बिम्ब, प्रकृति का साहचर्य और परिवेशगत क्रीडाएं, ध्वनियां संग्रहित होती हैं।
डेविड पियर्स कहते हैं-' किसी चीज़ को हम वही नाम क्यों देते हैं, जो हमने दिया है। इसे समझाने का हमारे पास कोई तर्क नहीं है। यह इच्छा कि नाम देने की बुनियाद को समझा जाए, असल में भाषा को पार कर जाने का उपक्रम है।'
यह इसलिए कि हम चीज़ों को देखते भी भाषा की ही दृष्टि से हैं और भाषा में ही उनका संसार रचते हैं। हमारी भाषा द्वारा नाम न देने के बाद भी उनकी स्थिती वैसी ही थी। पेड़ को हमने पेड़ कहा। नहीं कहते तो भी वह रहता ही एक जीवित वनस्पति रूप में।
स्वामी शून्यानन्द (अजातशत्रु) कहते हैं-' आत्मा रूपी यह शून्य भाषा रचकर खुद को खोजता है और भाषा की पकड़ में नहीं आता। भाषा सदा परेशान रहती है। अन्त में छटपटाती हुई भाषा जब इसी आत्मा(शून्य) को खोज लेती है जिससे यह उपजी थी, तो उलझन खत्म हो जाती है, क्योंकि तब भाषा नष्ट हो जाती है। आदमी की मुक्ति का रास्ता आज भाषा के अध्ययन में है। भाषा ही वह खलनायिका है जिसने आदमी को निगल लिया है। अब इसी पूतना को नष्ट करने की जरूरत है। सारी भाषा शून्य को खोजती है। याने वह स्वयं को नष्ट करने की राह पर बढ़ती है। अंत में भाषा अपने को नष्ट कर लेती है, जिसका मतलब है, प्रश्न और उत्तर से बरी हो जाना। यही मोक्ष है।'
उत्तर आधुनिकता चीख चीखकर कहती है कि भाषा का पीछा किया जाए, तो वह छुप जाती है। मगर उत्तर आधुनिकता यह नहीं बताती कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि जिस तत्व से भाषा का संसार जन्म लेता है, वह शून्य है। निर्गुण निराकार है। उत्तर आधुनिकता दरअसल भाषा को नष्ट करने की कोशिश है जिसका अंतिम परिणाम है भाषा के पार चले जाना। अर्थात हर वक्तव्य, पाठ, इतिहास, व्याख्या सब अपने अन्तर्भूत खण्डन पर खड़े हैं।
यह तय है कि जिस निराकार की स्थिति मनुष्य के भीतर है, उसी निराकार की सत्ता सृष्टि में है। सृष्टि के रेशे-रेशे में है। संसार की अनेक स्थितियां और बाहरी आवरण के कारण उस सत्ता को हम सीधे-सीधे जान नहीं सकते। इन्ही आवरणों में एक भाषा भी है। खुद को जानने या संसार को जानने की स्थिति में मनुष्य के पास की भाषा भी मिट जाती है। भाषा को नष्ट करके ही खुद को और संसार को जाना जा सकता है। संसार की सत्ता से शब्द से भिड़ा जा सकता है, परन्तु संसार को जानते-जानते शब्द नष्ट हो जाते हैं। 'अविगत गति कछु कहत न जाये।' क्योंकि वह खुद अव्यक्त है, जिससे भाषा उपजी है। कबीर कहते हैं-
' नाद नहीं था, बिन्द नहीं था, करम नहीं था काया।
अलख पुरुष की जिह्वा नहीं थी, सबद कहां से आया ।। '
यह बिना जिह्वा के उपजा शब्द मनुष्य के मष्तिष्क की वही शक्ति है जो मनुष्य के अंतर्जगत को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनती है। इस दृष्टि से देखें तो ब्रह्म की भाषा संपूर्ण सृष्टि है, क्योंकि वह सृष्टि के कण-कण में अभिव्यक्त हो रहा है। मनुष्य स्वयं को अबिव्यक्त मन, वचन और कर्म के स्तर पर करता है। वह निरंतर कर्म में व्यक्त होता रहता है। वह वाणी में स्वयं को प्रकट करता है। दोनों के केन्द्र के रूप में मन की स्थिति है। मन को भी विवेक हस्तक्षेप करता रहता है। सृष्टि में मनुष्य भी है. जब सृष्टा सभी वस्तुओं में स्वयं को अबिव्यक्त करता है, तो मनुष्य में भी वह अभिव्यक्त होता है। वृक्ष में भी वह व्याख्यायित हो रहा है।
मनुष्य की अभिव्यक्ति उसके संसार से जुड़ी है। उसके संसार में तमाम वस्तुएँ हैं। उनमें से एक पेड़ भी है। प्रकृति भी है। पेड़ भी अभिव्यक्त होता है-अंकुर में, तने में, डालियों में, टहनियों में, पत्तों में, फूलों में, फलों में, बीज में। प्रकारान्तर से इन सबसे परम प्रकृति ही अभिव्यक्त होती है। इन सबको भी हम भाषा के माध्यम से जानते जानते भाषा से परे हो जाते हैं। पेड़ से सही-सही जुड़ने पर न भाषा रहती है, न पेड़ , न हम।
मारी समूती सांस्कृतिकता वृक्ष-जन्मा है। पीपल के पत्ते पर बीज रूप में सृष्टि बत जाती है। जीवन की आखें पत्ते पर खुलती हैं। विश्व अश्वस्थ वृक्ष के रूप में शनैः शनैः विकसित होता है। वृक्ष पर दो पक्षी-ईश्वर और जीव बैठे हुए हैं। ईश्वर स्वयं कुरुक्षेत्र के मैदान में कहते हैं- 'मैं वृक्षों में पीपल हूँ।' क्या ये सब हमारे रहस्य भरे संवादों वाले अध्याय हैं? नहीं। यह अनुभव का चाक्षुष सत्य है। इसलिए एक वृक्ष की अभिव्यक्ति को हम मंत्र पुष्प की तरह अनुभव करते हैं। सदाजीवा हरिद्र अंकुरा दूब्रा में वासुदेविक पावित्र्य देखते हैं। विल्वपत्र में शिव की अनायास उपस्थिति पाते हैं। इस तरह सम्पूर्ण वानस्पतिक जगत में हम अपने ही अनुष्ठानों की सम्पन्नता की वैदिकता अनुभव करते हैं।
लेकिन इस संसार में रहने के लिए भाषा जरूरी है। संसार में व्यवहार के लिए भाषा जरूरी है। संसार की चीज़ों से संवाद के लिए संसार स्तर पर शब्द जरूरी हैं। हम अनुभव करते हैं एक अरण्य संस्कृति , जो अपनी जीवन विधि का सारा अस्तित्व वृश्र के साथ बंधन किए हुए हैं। हम जंगलों में रहते हैं। हमारा जीवन ही वृक्ष है। वृक्ष है, तो हमारा जीवन है। वृक्ष नहीं, तो जीवन नहीं। हमारी सारी भाषा ही वृक्ष के पत्तों-सी है। हमारी फसलें वृक्षों में जन्मती हैं। हमारी पलकों पर वृश्र उगते हैं। हमारे सपनों में वृक्ष आते हैं। वृक्ष को देखकर हम समस्त निसर्ग को देख लेते हैं। पर्यावरण को छू लेते हैं। वृक्ष प्रतिनिधि है- प्रकृति का। वृक्ष हमारे पूर्वज हैं। उन्ही से हमारे घर हैं। हमारे जल, जंगल, ज़मीन हैं। हमारा परिवेश है। परिवेश की वस्तुएँ वृक्ष की वंशज हैं। प्रत्येक वस्तु को हमारे द्वारा दिया गया नाम है। अर्थ है। वृक्षों के संदर्भ हैं। कथाएं हैं। मिथक हैं। अभिप्राय हैं। वृक्ष भाषा स्रोत हैं। साहित्य हैं। संस्कृति हैं। वृक्ष हमसे बात करते हैं। वृक्ष नहीं होंगे तो हम किससे बात करेंगे ? किससे पार जाकर हम स्वयं को जानना चाहेंगे?
समुद्र के गर्भ में उगी नन्ही काई के पास करोड़ों वर्ष का अनुभव है। उसके अनुभव को सुनने की न भाषा हमारे पास है और ना ही कान। सैकड़ों वर्षों से जटाएं फैलाए वटवृक्ष की भाषा को सुनने की शक्ति हमारे पास अभी भी नहीं आयी है। लेकिन उनके सम्पर्क में आकर हमने अपनी भाषा की स्थली में अभ्यारण बनाएँ हैं। आंगन में खेलते हुए बेटा-बेटी उन्ही अभ्यारणों में निकल जाना चाहते हैं। आँगन के कोने में गीली मिट्टी की खिड़की से एक अँकुर झाँकने लगा है। बस थोड़ी ही देर में वह आँगन के बेटा-बेटी से बात करने वाला है।
मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……
फिर समुन्द्र को खुदा जाने क्या ख्याल आया उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी मेरे हाथों में थमाई और हंस कर कुछ दूर हो गया
हैरान थी…. पर उसका चमत्कार ले लिया पता था कि इस प्रकार की घटना कभी सदियों में होती है…..
लाखों ख्याल आये माथे में झिलमिलाये
पर खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर अब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?
मेरे शहर की हर गली संकरी मेरे शहर की हर छत नीची मेरे शहर की हर दीवार चुगली
सोचा कि अगर तू कहीं मिले तो समुन्द्र की तरह इसे छाती पर रख कर हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे
और नीची छतों और संकरी गलियों के शहर में बस सकते थे….
पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती और अपनी आग का मैंने आप ही घूंट पिया
मैं अकेला किनारा किनारे को गिरा दिया और जब दिन ढलने को था समुन्द्र का तूफान समुन्द्र को लौटा दिया….
अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है तूं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल मैं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल सिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है…..
शहर
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है पर नींद में भी बहस खतम न होती
रात आती, फिर टपकती और चली जाती शंख घंटों के सांस सूखते
बहस से निकलता, बहस में मिलता… फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही? जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
और घंटियां हार्न एक दूसरे पर झपटते गालियों की तरह निकलते फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये और हर द्वार के मूंह से जो उसे देख कर यह और गरमाती यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
और नालियां, ज्यों मूंह से झाग बहती है दीवारें-किचकिचाती सी हर मकान एक मुट्ठी सा भिंचा हुआ
कोई उधर जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता और गलियां इस तरह सड़कें - बेतुकी दलीलों सी… मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
मैं पापरहित,निष्कलुष,निष्काम सिर्फ़ कुछ शब्द चुनूंगा इस दुनिया में और अपनी कविता में उसे रख दूंगा।
वह शब्द दराजों में सुबकती मोटी-मोटी किताबों से नहीं लूंगा।
खेतों में स्वेद से लथ-पथ किसानों से गहरी अंधेरी खदानों में काम कर रहे खनिकों से भट्ठों पर इँट पाथ रही यौवना-कंठों से उमस में नंगे पाँव बालू ढोती बालाओं के स्वर से घर-दफ़्तर-दुकानों पर अपने दिन काटते बाल-मजदूरों से और जहां-जहां पृथ्वी पर मेहनतकश लोग श्रम का संगीत रच रहे हैं उन सबके हृदय से भी
जिंदा कुछ शब्द लूंगा मैं और कविता में रख दूंगा।
मैं नहीं लोकूंगा एक भी शब्द तुम्हारे। तुम्हारे शब्द तो शब्द-तस्करों से घिरे हुए घबराये हुए काँखते हुए डरे हुए और चुप हैं जिनके वर्णाक्षरों पर बैठ कोई तोड़ रहा है रोज़ इसे और अपने मतलब के व्याकरण में गढ़ रहा है।
"रे समय...तू, किस पाखी के डैन चुरा कर आया है ? चुपचाप उडाये क्षण क्षण जीवन के, उडता जाये रे! . तू, बतला, ओ अविचल, बहता तू जो प्रतिपल, कौन लोक से आया है ? रे समय..ओ समय .. तू, किस पाखी के डैन चुरा कर आया है ?"
एक दिन की बात है राजश्री बाजार ,सौदा लेने गयी थी। मिठाई की दुकान मेँ दाखिल होते ही उसकी निगाह रीना से जा टकरायी, जो काउँटर पे अपने पैसे दे रही थी। रीना ने ही उसे अपने पास बुलाया था, " राजश्री बहन, कैसी हो ? "
इतना सुनते ही राजश्री , रीना के नज़दीक आ गयी - " मजे मेँ हूँ! घर गृहस्थी मेँ समय कहाँ बीत रहा है, कैसे बतलाऊँ?"
उसने कहा तो रीना भी मुस्कुराई - "हाँ कैसे हैँ पँखुरी और प्रताप?" उसने मीठे स्वर से पूछा तो राजश्री भी खुश हो गई।
- " बिलकुल आनँद मेँ हैँ -- आज वे दोनोँ अपने पापा के पास हैँ। वे उन्हेँ कौन सी नयी शरारत fसखला रहे होँगे क्या पता !" राजश्री ने कहा तो दोनोँ को हँसने का मौका मिल गया! इसी तरह यहाँ , वहाँ की बातेँ होने लगीँ। अचानक राजश्री ने कुछ गँभीर होकर पूछ लिया, " एक बात पूछूँ रीना ? बुरा तो नहीँ मानोगी?" अब तक वे दुकान के बाहर आ गईँ थीँ।
- " ना। पूछिये न दीदी क्या प्रश्न है " रीना बोली तो राजश्री ने पूछ ही लिया।
" तुम मेँ और रोहित मेँ क्या हुआ था ? क्यूँ दूर हो गये ? "
तो रीना ने कहा," सच बतलाऊँ... ? अब आप ही बतलाओ, ये भी क्या तमाशा हुआ!इस तरह से नहीँ रह पाती थी !अक्सर ममी मुझसे पूछती रहती कि 'रीना बता क्या खाओगी ?और रोहित के साथ ऐसा होता था कि जब हम खाने की मेज़ पर खाना खाने लगते तो कितनी भी डीशीस बनी होँ वो कोयी अलग चीज़ की fडमान्ड करने लगता ! जिससे मुझे घबराहट हो जाती।" उसने रुँआसे स्वर मेँ धीमी आवाज़ मेँ इतना कह कर बात को वहीँ खत्म किया तो राजश्री ने भी आगे बात नहीँ बढायी।
इतनी बात ज़ाहिर थी कि रीना भी परेशान थी। अब राजश्री ने बातोँ का सिलसिला वहीँ दफनाते हुए रीना के मन की तह को समझते अपने घर का रुख अपनाया। 'मियाँ बीवी के ऐसे विवाद, किसी कोर्ट कचहरी मेँ निपटे हैँ कभी?' राजश्री सोचती रही।
घर पहुँचते ही उसने नन्हे प्रताप और चहकती हुई नन्ही पँखुरी को कुछ ज्यादह ही प्यार से चूमते हुए अपने से भीँच कर गले लगा लिया था। और फिर प्रकाश को रीना से अचानक हुई मुलाकात के बारे मेँ बतलाने लगी तो शाम कब रात मेँ ढल गई उन्हेँ पता ही न चला। सर्द हवाओँ को सहना पड जाये तो पँछी भी अपने घोँसलोँ को सहेजने लग जाते हैँ ! ये हर जीव का अपने आप को सुरक्षित रखने का नैसर्गिक प्रयास रहता है। राजश्री भी ऐसे ही प्रयास से अपने को रोक न पायी।-- ------ समय फिर आगे बढता गया. आज राजश्री और प्रकाश बेहद खुश थे। उनका पुत्र प्रताप आज २ साल का हो गया था। वे लोग बडे उत्साह के साथ नन्हे प्रताप राजा का बर्थ -डे मना रहे थे। पार्टी मेँ सारे मित्रोँ के बच्चे, मम्मीयोँ के साथ आ पहुँचे थे। बडे सी कार की शेप वाला केक काटा गया और खूब जोर से सब मिलकर 'हेप्पी बर्थ डे टू यू ...हैप्पी बर्थ डे डीअर प्रताप.. ..।" गा रहे थे। मुँह मीठा किया तभी मोबाइल की रिंग सुनकर प्रकाश ने ' हेल्लो हेल्लो ..कौन ?' पूछा तो सामने से रोहित की जानी पहचानी आवाज़ आयी, " बडा हँगामा हो रहा है ! पार्टी चल रही है क्या तेरे यहाँ ? " उसने पूछा तो प्रकाश ने कहा,
" हाँ आ जा ना ...प्रताप आज २ वर्ष का हो गया आ के केक खाओ!" तो रोहित भी आधे घँटे बाद वहाँ आ पहुँचा।
प्रकाश और राजश्री उससे मिलकर खुश हुए। रोहित परिवार के सदस्योँ से बारी बारी से जा कर मिला। फिर रात देर तक वे लोग बातेँ करते रहे। पँखुरी और प्रताप को सुलाकर राजश्री भी गैलरी मेँ आ गयी जहाँ दोनो दोस्त कुर्सीयोँ पर बैठे थे।
" राजश्री जी, कहिये, कैसी हैँ आप ? " रोहित ने मुस्कुराकर प्रश्न कियातो राजश्री ने कहा, " ठीक हूँ ..बस !थकान हो रही है ..तुम सुनाओ ..कहाँ रहे इतने दिन ? '
" वही, अमरीका और अब यहाँ ..काम काम और फिर औ भी ज्यादा काम ...मेरा समय तो ऐसे ही बीत रहा है भाभी।"
राजश्री ने अचानक कहा, " रीना से मुलाकात हुई थी २ महीने पहले। सच बत्ताना रोहित, क्या तुम दोनोँ दुबारा एक नहीँ हो सकते ? "
" ना ..मैँने बहुत सोचा है, हम एक साथ खुश नहीँ रह सकते .
.अब वो चेप्टर खत्म हो गया ..भाभी जी ..जाने दीजिये उस बात को "
रोहित बोला
..तो राजश्री और प्रकाश रोहित का चेहरा निहारने लगे और उसे बहुत उदास और सँजीदा पाया -
- "क्या बात है दोस्त ? तुम ठीक तो हो ? " प्रकाश ने पूछा,
" हाँ अब तो अकेले रहने की आदत हो गयी है ! "
रोहित ने गहरी साँस लेते हुए आहिस्ता से कहा तो राजश्री ने प्रकाश की ओर निहारा , दोनोँ की निगाहोँ मेँ सुहानुभूति घुल गयी ।अपने मित्र के दुख से वे भी दुखी हो गये।.
" तुम मेरी मानो और दुबारा शादी कर लो ! " राजश्री ने कहा।
" रीना से तुम्हारी नहीँ निभी ...हो जाता है ऐसा, समाज बदल चुका है, लोग समझने लगे हैँ और तलाक होना कोयी बहुत बडी बात नहीँ रही अब हमारे भारतीय समाज मेँ ,खास कर बँबई जैसे शहरोँ मे। "
ये प्रकाश ने समझाते हुए कहा ..तो रोहित ने कहा,
" शायद तुम सच कह रहे हो मित्र !पर शादी - ब्याह की ओर मेरा मन नहीँ -- मैँ काम मेँ इतना मस्रुफ रहता हूँ कि शादी या लडकीयोँ के बारे मेँ सोचने की फुर्सत नहीँ मुझे "..
रोहित ने अपनी बात , अपने अँदाज़ मेँ रख दी ।
जब भी थोडी - सी भी फुर्सत मिलेगी तब शादी और लडकीयोँ के बारे मेँ भी सोचना जरुर !!लडकीयाँ इतनी बुरी नहीँ होतीँ रोहित ! " राजश्री ने उलाहना देने के लहजे से कहा ।
" मैँ कहाँ बुराई कर रहा हूँ !अब आप ह इतनी अच्छी मिसाल हो भाभी जी ! तब और क्या कहेँ ! " रोहित ने कहा और फिर जोडते हुए कहा, " अरे हाँ, शालिनी से मिला था -- एक एयरपोर्ट पे "
" अच्छा ?
शालू को अवोर्ड मिला है इस साल -- बेहतरीन कार्य कुशलता पर , उसके शहर की नगर पालिका की ओर से ! -- ये वसुधँरा दीदी बतला रहीँ थीँ "-
राजश्री ने बडे गर्व के साथ अपनी चहेती शालिनी का जिक्र करते कहा .
" ओह यस ! शी डीझर्वज़ देट ! "
प्रकाश ने भी हाँ मेँ हाँ मिलाते हुए कहा -
"रात के ११.३० बज रहेँ हैँ ...मैँ चलूँ ? "रोहित ने आहीस्ता से प्रश्न रखा। .
.और रात के गहराते सन्नाटे मेँ, रातरानी की खुश्बू बाग के भीतर से गेलेरी तक आ पहुँची. तो तीनोँ उठ खडे हुए।. पति पत्नी मित्र को विदा कर भीतर घर मेँ चले गये और रोहित अपनी नयी मर्सीडीज़ मेँ अकेला अपने सूने आशियाने की ओर चल निकला।
१ साल बाद : वसुँधरा दीदी , प्रकाश और राजश्री और माँ जी से मिलने आयीँ थीँ और अचानक पूछने लगीँ --
" प्रकाश , वो तुम्हारा दोस्त रोहित किस शहर मेँ रहता है ? "
" क्योँ दीदी ? ऐसे क्यूँ पूछ रही हो ? वोशीँगटन डी.सी. अमीरीकी राजधानी है ना, उसी शहर से , "गणमान्य" जो उसकी आइटी कँपनी है, उसका सारा कारोबार देखता है रोहित।" प्रकाश ने बतलाया।
" अच्छा ! तब ये बतला दूँ कि शालिनी अब शिकागो शहर से, वहीँ तुम्हारे वोशीँगटन डी.सी. रहने चली गयी है ! ये मेरे जेठ जी , बतला रहे थे -- " दीदी ने नये सामाचार सुनाये अपनी लाडली ननद शालिनी के बारे मेँ , तो इसे सुनकर, सभी को आश्चर्य हुआ ..
" अमीराका मेँ लोग ना जाने कितने घर बदलते हैँ " -- माँ ने कहा, तो सब हँसे क्यूँ कि बात तो सच थी !
फिर बात दिमाग से उतर गयी।
पर एक रात ...ठीक मध्य रात्रि को , जब दीदी के बडे जेठ जी का अमेरीका से फोन आया ,तब प्रकाश और राजश्री की नीँद उड गयी।
- " हेल्लो ! मैँ , झवेर बोल रहा हूँ ..हाँ हाँ ..अमेरीका से ..वो तुम्हारा दोस्त रोहित कहाँ है ? " बडे झल्लाये स्वर मेँ वे पूछ रहे थे। जिसे सुनकर प्रकाश की रही सही तन्द्रा भी गायब हो गयी।
- " भाइस्स्सा ..क्या बात है ? इतनी रात आप मेरे दोस्त की खबर लेने मुझे फोन कर रहे हो ! "
प्रकाश ने पूछा तो झवर भाई सा'ब ने अब झल्ला कर कहा,
" सुना है रोहित , मेरी बेटी शालिनी से कल शादी कर रहा है ! "
" सच !! हमेँ तो इसके बारे मेँ खबर भी नही ।...ना ही कोयी सँदेशा आया है ना ही बुलावा ! " प्रकाश ने कहा तब भी झवर भाई साहब खीजे हुए थे।
-" शालिनी ने हम से बातचीत करना लगभग छोड दिया है। सयानी हो गई है।.उसकी जो मरजी करे ..पर शादी कर रही है तो पिता को भी अब , इस वक्त बताया जब कि मैँ शादी मेँ शामिल भी हो न पाऊँगा -- हाँ उसकी मम्मी जी को भारत से बुला लिया है ।
- मुझे और सुधा को ( नई पत्नि ) और उसके भाई बहनोँ को भी नहीं बुलाया और तुम जैसे पुराने और खास दोस्तोँ को भी कुछ बतलाने की आवश्यकता नहीँ लगी उन दोनोँ को ! " झवर भाईसाहब ने गुस्से से शिकायत की तो प्रकाश और राजश्री भी असमँजस मेँ पड गये ! पर लोन्ग डीस्टन्स फोन पे क्या बात करते ...जैसे तैसे समझा बुझा कर झवर भाई साहब से ,बात खत्म की और सुबह वसुँधरा दीदी से ७ बजे फोन कर के सारा किस्सा बतलाया ।
फिर ९ बजे प्रकाश के माता पिता से, डा. प्रियँका दीदी के केन्सास के घर का फोन नँबर लिया गया तब कहीँ जाकर प्रकाश और राजश्री, शालिनी और रोहित से बात कर पाये ! शादी की मुबारकबाद दी, अपनी और परिवार की ओर से शादी की सफलता की शुभकामनाएँ व बडोँ के आशीर्वाद दिये। तब रोहित ने इतना ही कहा था,
" राजश्री भाभी और तुम, हमारे हित के बारे मेँ कितने सही थे, ये गूढ रहस्य, आज समझ पाये हैँ हम दोनोँ । अचानक ये सब तै हुआ, बतला नहीँ पाये आप लोगोँ से ! " -
- अब और क्या कहना ? मियाँ बीवी राजी तो क्या करे समाजी ...वाली उक्ति चरितार्थ थी इस मामले मेँ, ऐसा सोचकर राजश्री और प्रकाश ने भी अपने दोस्त की खुशी को सामने रखते हुए और बातो पे ध्यान नहीँ दिया।
* * *
अंतर मनसे उपजी मधुरारागिनीयों सा, होता है दम्पतियोँ का सुभग सँसार ,
परस्पर, प्रीत,सदा सत्कार, हो साकार,
कुल वैभव से सिँचित, सुसँस्कार !
तब होता नहीँ, दूषित जीवन का,
कोई भी, लघु - गुरु, व्यवहार...
नहीँ उठती दारुण व्यथा हृदय में,
बँधते हैँ प्राणोँ से तब प्राण !
कौन देता नाम शिशु को ?
कौन भरता सौरभ भँडार ?
कौन fसखलाता रीत जगत की ?
कौन पढाता, दुर्गम ये पाठ ?
माता और, पिता दोनोँ हैँ, एक यान के दो आधार,
जिससे चलता रहता है, जीवन का ये कारोबार !
सभी व्यवस्था पूर्ण रही तो,
स्वर्ग ना होगा क्या सँसार ?
ये धरती है इँसानोँ की,
नहीँ दिव्य, सारे उपचार!
एक दिया,सौ दीप जलाये,
प्रण लो, करो,आज,पुकार!
बदलेँगेँ हम, बदलेगा जग,
नहीँ रहेँगे, हम लाचार!
कोरी बातोँ से नहीँ सजेगा,
ये अपने सपनोँ का सँसार!
तो चलिये ...फिर एक बार, रोहित दवे और मिसिज़ शालिनी दवे की दुनिया की ओर चलेँ..
रोहित ने शालिनी से देर -सबेर शादी की, पर मानोँ , दुनिया के सारे आनँद एक साथ अपनी नन्ही सी, सिमटी -सी, उनकी प्यार के दायरे मेँ उलझी , उलझी -सी दुनिया मेँ समेटने की होड लगा दी थी उसने -- सारी दुनिया की खुशी एक तरफ रह गयी और रोहित , शालिनी की खुशीयोँ का पलडा,सब से भारी हो चला था..
..
प्रकाश और राजश्री, ई -मेल से, अपने दोस्त, रोहित के, सतत, सँपर्क मेँ, रहने लगे थे.शालिनी भी खुश रहने लगी थी. वे दोनोँ डावोस शहर, स्वीटज़रलैन्ड "गणमान्य" , कोदोबारा ऐवोर्ड मिला था ,उसे लेने, साथ साथ गये थे और वहाँ आल्प्स पर्वत शृँखला के कईदर्शनीय स्थलोँ की सैर कर आये. उनके ई -पत्र मेँ भी, सुखद यात्रा विवरण उनकी खुशीयों की तरहछलका बिखरा,झलक रहा था !
राजश्री सबसे ज्यादह प्रसन्न थी ! बार बार कहती ," देखा !मैँ न कहती थी कि शालू ही रोहित के लिये बिलकुल सही है !
पर अफसोस ! हमारी बात मानता ही कौन है? "
तो प्रकाश हँस कर कह देता, "मैँ ने सारी बातेँ मानीँ हैँ आपकी, महारानी साहिबा !
पर हम तो अब भी, आपकी कृपा के पात्र नहीँ बने !"
"अरे, जाओ जाओ, .आप जैसा झूठोँ का सरदार और कोयी नहीँ!" कहकर राजश्री भी मुस्कुराने लगती।
-फिर, रोहित ने फोन किया और बहुत आग्रह करके कहा कि, "आप दोनोँ यहाँ हमारे मेहमान बन कर आइये।" रोहित ने अपने वृद्ध माता, पिता, दीदी- डा.प्रियँका का पूरा परिवार, सभी को अपने नये घर के उद्घाटन के अवसर पर न्योता भेजा था और सभी की हवाई यात्रा के टिकट भी साथ भेजे थे। परिवार के इस खुशी के मौके पर, रोहित, राजश्री और परिवार को भी सपरिवार आमँत्रित कर रहा था वह।
प्रकाश ने आभार प्रकट करते हुए कहा, " इस बार नहीँ आ पायेँगे हम लोग ..पर हमारा आना उधार रहा ! जल्दी ही आयेँगे और तुमसे मिलेँगे भी ।" उसके बाद कुछ माह बीते ही नहीँ थे कि फिर रोहित का फोन आ गया - कहने लगा," मैँ और शालिनी, अटलान्टिक महासागर मेँ, वैभवशाली सुविधा से सजी "क्रूज़ "की यात्रा पे जाने का प्लान बना रहे हैँ -- आप लोग भी आ जाइये हमारे साथ - -- इन्फोसिस के नारायण मूर्ति जी भी साथ होँगेँ -- हम साथ साथ समय बितायेँगे। बडा मज़ा आयेगा। आ जाओ।"
इस बार भी प्रकाश को मनाही करनी पडी – “अरे! रोहित उदार ह्रदय से बुला रहा था पर ऐसे दोस्त के पैसे से घूमने जाना क्या ठीक होता है ? नहीँ जी” उसने राजश्री से कहा, " हम भी जायेँगे,.पर इस साल मुझे काम बहुत है, अभी तो छुट्टी नहीँ ले सकुँगा।" फिर सुना शालिनी और रोहित पूरे १ महीने तक क्रूज़ लेकर, बहामा, कैरेबीयन, वर्जीन आइलैन्ड, वेस्ट इन्डीज़ के छोटे छोटे द्वीपोँ की सैर करते रहे। मानो पिछले कुछ सालोँ के कडुवे अनुभवो को मन से निकालने का भरसक प्रयास जारी था।
शालिनी के मृदु व्यवहार से रोहित रीना के साथ गुजारे ३ वर्षोँ के कटु अनुभव मानोँ भूलने की प्रक्रिया मेँ व्यस्त था । उनकी खुशी और जीवने के बारे मेँ सुनकर प्रकाश, राजश्री भी बहोत खुश रहने लगे थे । झवर भाई सा, वसुँधरा दीदी इत्यादी से भी, हर हफ्ते उनकी बातेँ होने लगीँ थीँ। सभी यही कहते,चलो, देर आये दुरुस्त आये ! खुश रहेँ दोनोँ , और क्या !
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2 साल बाद: एक रात शालू का फोन आया । राजश्री जाग रही थी हालाँकि रात के १२.३० बज रहे थे.
वो सोना चाहती थी परँतु, अपना काम निपटाते उसे इतनी देरी हो गई थी। फोन की घँटी ने रात मे सन्नाटे को चीर कर बजना शुरु किया तो राजश्री हडबडाकर, फोन की ओर लपकी,.
"हेल्लो, कौन?" उसने प्रश्न किया।
सामने से शालू की धीमी आवाज़ ने उसे चौँका दिया।
"भाभी! एक बुरा समाचार दे रही हूँ! हमने अपने रोहित को खो दिया ! "
"क्या मतलब तुम्हारा? " राजश्री ने लगभग गभराहट मिश्रित, भय के आवेग को रोकते हुअ, चिल्लाते हुए पूछा ।
राजश्री नो फिर रुँआसे स्वर से पूछा ,"शालू, तुम क्या कह रही हो बेटे ? "
" भाभी, रोहित हमारे बीच अब नही रहे ! एकाध घँटे पहले ...अँतिम साँस ली उन्होंने.!" अब शालिनी भी सुबक रही थी जिस की आवाज़ से, राजश्री के दिमाग ने वो बात समझी, जो उसका मन अब भी मानने से इन्कार कर रहा था। और जब ये बात वो समझी तो वो भी रोने लगी। उसे सूझा नही वो शालिनी से क्या कहे?
“नहीँ..नहीं....।“
रोहित का मुस्कुराता चेहारा आँखोँ के सामने था। रोहीत की आवाज़, "भाभी जी, कैसी हैँ आप? " उसके खास अँदाज़ मे कहने की आदत, बार बार राजश्री के जहन मे घूम रहे थे। अब तो राजश्री की रुलाई छूट पडी। ऐसे समाचार जब भी आते हैँ, इन्सान बिलकुल हतप्रभ हो जाता है। अगर आप के तालुकात्त , किसी व्यक्ति से घनिष्ट होँ, मधुर होँ, तब सीधे ह्रदय पर चोट हो जाती है। यही तो है, मनुजता का अहसास! हम दुनिया मे रहते हैँ पर, सारे सँबँध, रिश्तोँ पर कायम हैँ, जो सीधा दिल से जुडे रहते हैँ। भावनाएँ ना होँ, तो क्या इन्सान इन्सान रह पायेगा ? अगर हमारा ह्रदय द्रवित न हो, किसी स्वजन के वियोग से, तो क्या हममे मानवता बची रहेगी?
नहीँ ना !
ऐसा कौन होगा जो अपने मित्र या परिवार के सदस्य के बिछोह मे रोया न हो?
ये आँसू हमारे मनुष्वत्त्व की असली पहचान है ! कभी कभार, अन्य भावनाएँ, मनुज, छिपा भी लेता है। किसी पर प्रेम या आसक्ति की भावनाएँ दबी रह सकतीँ हैँ वर्षोँ तक ! पाप या कुकर्म की प्रेरणा ,या ईर्ष्या, जलन, डाह की जहीरीली फुँकार, दबी, सुप्त नागोँ के फण सी, या, कटुता नागफणी के दँश सी, भयानक होते हुए भी, द्रष्टिगोचर नही हो पाती। आँखोँ से मनुष्य देखता है इस माया रुपी विश्व को ! फिर भी, इसी नयन के मूँदते,
ये सँसार स्वप्न मेँ परिणीत हो जाता है और इन्सान सोचता है ..’सच ! ये ज़िँदगी ..ख्वाब ही तो है ! … मैँ कौन हूँ ? एक शरीर ? भौतिक सुखोँ की लिप्सा मे प्रयत्नशील, जीवन निर्वाह मेँ कार्यरत, एक जीव ? तो जैवी कौन? आत्मा का सत्य क्या है? क्योँ है आत्मा? किसने देखा है परमात्मा को? आकाश के उपर है स्वर्ग? जन्नत? जिसके ख्वाब, हर इन्सान आँखें खोल के और बँद कर के देखता रहता है? सूफी सँतोँ ने, दरवेशोँ ने, मौला के लिये न जाने कितनी बार, पुकार कीँ...साधु सँतोँ ने, योगीयोँ ने ना जाने कितने तरीकोँ से उस एक "सत्य " को खोजा। हर इन्सान की यात्रा, इसी तरह चलती रही है। जिस के ज़ोर पर, ये पानी दुनिया कायम है ! ये तो दार्शनिकता की बातेँ हैँ, जो हम अपने आपको साँत्वना देने के लिये गढते हैँ। सत्य फिर भी हमेशा सत्य रहता है।अपने आप मेँ पूर्ण ! पूर्णता से निकला, पूर्ण को जनम देता, फिर भी जो रहता है, पूर्ण का पूर्ण !
रहस्यपूर्ण ! जिस पर से पर्दा, यदा कदा हटा है। बिरले व्यक्तियोँ की तपस्या से , मसीहा के आगमन से, उनके अनुभव से, वे हमे राह बता कर चले गये हैँ, पर आम, साधारण इन्सान कि अक्ल मे, ये सारी बात कहाँ आतीँ हैँ? आज राजश्री और शालिनी बस २ दुखी ह्रदय से भरे इन्सान थे ! बस! इससे अधिक कुछ नही!
"भाभी, आप के लिये इन्तज़ाम हो रहा है. आप और प्रकाश भाई आ जाइये। रोहित से मिलने नही आओगे?"
राजश्री को लगा कि वह, सात समुद्रोँ की दूरी पाटकर, नन्ही सी कन्या को कलेजे से लगा ले! काश !
वे लोग पास मे होते.....आमने -सामने । कितनी सँयत थी शालिनी इस वक्त भी!
" हाँ बेटे हम लोग आ रहे हैँ ..तुम से मिलने...मेरी बहादुर बिटिया है तू !" राजश्री ने कहा और फिर दोनोँ रोहित की बातेँ, याद करने लगीं।
प्रकाश और राजश्री रोहित के घर गये - पर वहाँ रोहित नहीँ था। उसकी तस्वीर थी फूलोँ के सुगँधित हार से ढकी हुई-मुस्कुराता हुआ चेहरा -वही हिम्मती अँदाज़, स्वप्न साकार करने की क्षमता लिये एक आधुनिक दीर्घद्रष्टा की छवि मे जा कर, उनका मित्र छिप गया था और मानोँ उनसे कह रहा था, " आप लोग नही आये ना मुझसे मिलने ? अब आये हो जब मैँ नहीँ रहा।
तब राजश्री और प्रकाश को शालू ने बतलाया कि, दीदी प्रियँका ने रोहित का चेक -अप किया था - पूरे शरीर का ! रोहित ने कहा कि उसे सर दर्द रहने लगा था। हो सकता है, अत्याधिक काम की व्यस्तता के कारण ही ये हो! पर, दीदी डाक्टर जो थीँ ! ब्रैन स्केन करके ही मानीँ और पता चला कि उनके प्यारे छोटे भाई को ब्रेन का कैन्सर था जो काफी बढ गया था। बातोँ बातोँ मे, शालिनी तक भी ये राज़ पहुँचा तो शालिनी ने जिद्द पकड ली कि वो रोहित की सेवा -सुष्रुषा से ज्यादह रोहित का सान्निध्य चाहती है और शादी करना चाहती है ! रोहित ने उसे बहुत समझाया पर शालू ने एक ना मानी। इसी के फलस्वरुप दोनोँ की शादी हुई थी, जिस के कारण झवर भाईसा नाराज़ हुए थे। रोहित, प्रियँका दीदी और शालिनी के अलावा किसी को ये बात का पता, उन तीनोँ ने लगने न दिया था। उसके बाद के ३ वर्ष स्वप्न से बीते। अँतिम दिनोँ मेँ रोहित ने बँबई के एक अस्पताल का जीर्णोध्धार करवाने के लिये १० करोड रुपये की धनराशि खर्च की थी। उसके वकील रात दिन रोहित की इन अँतिम इच्छा रुपी योजनाओँ को कार्यान्वित करने मे व्यस्त थे। रोहित ने लँदन और अमेरीका के म्युजियमोँ को दान किया। ब्रज के १० हज़ार बच्चोँ के दोपहर के भोजन के लिये धनराशि जमा करवायी और शालू ने ही बतलाया कि अँतिम समय मे उस के विचार तीव्रता से आ, जा रहे थे - कभी वह बोलता," गाँधी जी " फिर बेहोश हो जाता। फिर कहता," मेरा स्कूल "- फिर होश खो देता। फिर शालू से कहता, "तुम वचन दो कि मेरी हर योजना को बँद नही होने दोगी। -उन्हे पूरा करोगी!" शालू ने कहा, "मैँ वचन देती हूँ , मेरे रोहित !"
और आखिर शालू ने अपना हाथ छुडा लिया था, जिसे रोहित ने कस कर पकड रखा था। शालू अस्पताल के पलँग के पैताने खडी हुई, तो रोहित ने उसकी ओर देखते हुए, प्राण त्याग दिये !
नैन दीप की ज्योति, महा ज्योति मे विलीन हो गयी।
उसकी भव्य अँतिम यात्रा मे कैसे फूल रहेँगे, कितने बडे, ये भी सारा रोहित ने तै किया था। वो भी शालिनी ने पूरा किया। और कई सारी घर मे खिँची चित्र विथी देखते हुए, आज भी प्रकाश और राजश्री, मानने के लिये तैयार नही कि उनका हँसमुख, बहादुर और स्फूर्तिला दोस्त, रोहित सशरीर उनके साथ नही रहा।
क्या यही है ज़िँदगी? थोडी हँसी, थोडी खुशी, कुछ नगमे, कुछ वादे .........और......और ...आप बत्तायेँ? क्या है ज़िँदगी ? ....मैँ तो यही कहूँगी, कि,...ज़िँदगी ...ख्वाब है !...उसके अलावा, और कुछ नही।
(- ये कथा मेरे परम मित्र को समर्पित है जिसकी याद आज भी आँसू से आँखेँ भिगो देतीँ हैँ।)
अगर आत्मा है, तो मेरे मित्र की आत्मा को चिर शाँति मिले परमात्मा का सामीप्य मिले, यही मेरी प्रार्थना है। ...ईश्वर, स्वीकारियेगा !
पीछे सबकुछ छोड़कर आए लोगों का वह टुकड़े-टुकड़े हुआ देश था, जहां खुश रह पाना असंभव नहीं, पर बेहद मुश्किल जरूर था। कई ऐसे थे जो अभीतक नयी पहचान को आत्मसात नहीं कर पाए थे।... घरबार तो छूटा लोगों का, परन्तु मुसीबतें और रंजिशें नहीं। आगे-आगे अब और जाने क्या हो? जान पहचान के, आसपास के, कई ऐसे थे जिनकी पिछली पीढ़ी शरणार्थियों की थी। खानाबदोश या राजनीतिक शरणार्थी... पिता, बाबा चाचा वगैरह, सब अभी भी अपने उसी पुराने दर्द में ही जीते थे...दिनरात कुर्बानियों की रौ में बहते रहते और वे मां चाची, दादी, जो रातदिन चौके में सुलगते चूल्हे से भी ज्यादा सुलगती रहती थीं, न एक रोटी ढंग से पका पाती उनके लिए, न एक ख्वाइश। और तब उनकी वह सारी बेचैनी आने वाली पीढ़ी को दूध और घुट्टी में पीनी पड़ती। वही पी-पीकर ही तो बड़ी हो रही है यह।
'... इतनी यह नफरत...गहरे रूह तक पैठी हुई... बेचैन ये रूहें कहीं बिखरे घरबार को सहेजते समेटते कई-कई पीढ़ियां न निकाल दें !’ मनु सोचती और आत्मा तक बेचैन हो उठती।
बोसनिआ, लाओस, काबुल, ईरान, लीबिया जाने कहां –कहां के भटके लोगों की कौम थी वह उसके आसपास। इनका अब कोई देश नहीं , बस धरम ही रह गया था और रह गए थे बदले की आग भड़काने वाले ठेकेदार। कश्मीरी, तामिल, बंगलादेशी जाने कितनी-कितनी पार्टियां थीं और उतनी ही समीतियां भी। आए दिन नए प्रस्ताव पास होते और अगले दिन ही खारिज भी हो जाते....कभी पैसे की कमी से तो कभी हिम्मत और लगन की कमी से। आए दिन ही समीतियों की मीटिंग होती और फिर नए जोश से दुगने परचे बंटते। ऐसा ही एक भटका हुआ परचा मनु के हाथों भी आ पहुँचा था और वह भी अचानक ही।
पढते ही सिर से पैर तक दहक उठी थी मनु...' कैसे कोई आजभी, विश्वीकरण के इस युग में भी ऐसी सोच रख सकता है ...वह भी युवा पीढी के साथ...जो संबल और भविष्य ही नहीं, पहचान है उनकी.... यहां हजारो मील दूर, एक नए और तेजी से बदलते हुए नए समाज में थमी और सुलझी सोच की जरूरत है। कैसे कोई घर और समाज का बड़ा और जिम्मेदार ऐसे समझा सकता है अपने युवाओं को, कि जाओ विध्यालय और समाज में अभद्र मनमानी करो। साजिशें करो। दूसरे धर्म की भोली-भाली लड़कियों को बहकाओ। अपने धर्म में शामिल करो। और अगर ऐसा न कर पाओ तो जी भरकर मौज-मस्ती करो और फिर खराब करके छोड़ दो उन्हें। क्योंकि यही बस यही एक तरीका था उनकी आखों में बदला लेने का।...
'शैतानी इन दिमागों की जंगलगी यह सोच बदलनी ही होगी ...यही एक तरीका है शान्ति और सभ्यता से जीने का। आंख के बदले दूसरी आँख फोड़ते चले गए तो एक दिन पूरी दुनिया ही अन्धी हो जाएगी और अन्धी दुनिया में तो सबके लिए ही भटकन है! क्यों नहीं समझ पाते ये भी इतनी ज़रा सी इस बात को? पुरानी शिकायतों की गठरी क्यों अभी तक साथ रख रखी है इन्होंने और बजाय सहारा बनने के क्यों रोज ही एक नयी गांठ, नया घाव खोलकर बैठ जाते हैं ये? '
मनु उम्र में छोटी जरूर थी पर उसकी सोच और संवेदना बेहद ही जिम्मेदार और सुलझी हुई थी। नई पीढ़ी में भी तो कई नादान ऐसे थे जो इस नफरत की झुलस से नहीं बच पा रहे थे। सांप्रदायिक झगड़ों और मनमुटाव की आंच अब मैनचेस्टर और बर्नली जैसी जगहों में ही नही एडिनबरा, ग्लास्को और बरमिंघम होती, अमेरिका, यूरोप, एशिया, अप्रीका चारो महाद्वीपों को चपेट में ले चुकी थी। करांची और श्रीनगर में ही नहीं, लंदन और न्यूयौर्क में भी धमाके होने लगे थे अब तो। आए दिन के झगड़े और तोड़फोड़ आम बातें हो चली थीं। कभी कनाडा में, तो कभी ब्रैडफोर्ड में, कभी काबुल में तो कभी कहीं, तो कभी कहीं और अगले पल ही...कोई भी तो सुरक्षित नहीं था अब दुनिया के किसी भी कोने में, कहीं भी और कभी भी। आंसुओं का सैलाब था चारो तरफ.और पोंछने वाला कोई नहीं था , हां बेदर्दी से निचोड़ने वाले जरूर कई-कई। फिर आया वह ‘ 9-9-‘ और सभी शक के दायरे में आ गए। कोई पहचान नहीं बची किसीकी बस एक रंग रह गया और रहगई एक बेबसी। इन अंग्रेजों के लिए तो वैसे भी सब पाकी ही थे।
मनु ने निश्चय किया कि युवाओं का एक नया और समझदार व संगठित चेहरा लाने की जरूरत है इस बिखरती और भटकती सोच के विरोध में। मनु की ' फ्रैंड्स औफ अर्थ' संस्था में बीस सदस्य हो चुके थे फूलों से सहृदय और मुस्कुराते, हर देश, हर जाति, हर रंग के। जोनुस ने कब सारा कार्य भार अपने हाथों ले लिया मनु को पता ही नहीं चल पाया। शुक्रवार को वह युवाओं की समस्या सुनते थे और नाप-तौलकर, सोच-समझकर ही कोई राय दी जाती थी। समस्याएं जो वे अपने परिवार से नहीं बांट पाते थे, इनसे जी भर-भरकर बांटने लगे थे।
मनप्रीत और मो (मोहम्मद) की समस्या बिल्कुल जारा और डेविड जैसी ही थी। दोनों के ही परिवार वाले सख्त खिलाफ थे उनके और उनकी शादी के। मनप्रीत की मां ने फांसी लगाकर मरने की धमकी दे रखी थी तो पापा ने जिंदा ही उसे जमीन में गाड़ देने की। जारा का झटपट रिश्ता पापा के दोस्त मीर अंकल से तय कर दिया गया था। बेटी जात धरम से बाहर जाए, इससे तो परिवार ने यही बेहतर समझा था। और तब बीसों सदस्यों की घंटों की तर्क-वितर्क से भरी बेहद सुलझी और शांत बैठक के बाद यह निश्चित किया गया कि दोनों युगलों की रजिस्टर्ड शादी करा दी जाए और फिर चारो साल दो साल के लिए मां-बाप की पहुंच से दूर रहें जबतक गुस्से का गुबार थम न जाए...आखिर पहले भी तो स्वयंबर और गंधर्व विवाह होते ही थे और फिर क्या पता इसी तरह के मेल-मिलापों से ही यह नफरत की दीवारें कमजोर पड़ पाएं...शायद यही एक रास्ता हो। सबको अच्छा लगा था जोनुस का सुझाव और सर्व सम्मति से अगले पल ही पास भी हो गया था। शादी की तारीख तीन महीने के बाद, इम्तहान के बाद की ही निकाली गयी ...आखिर पढ़ाई भी तो उतनी ही जरूरी थी और वैसे भी शादी में शामिल होनेवाले, तैयारी करने वाले, वही बीस लोग ही तो थे जो उस समय उस कमरे में मौजूद थे। घर की एकएक चीज सबने मिलकर जुटाई थी और नव विवाहितों की गृहस्थी व्यवस्थित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। एक उल्लासमय और सन्तोष जनक दिन था वह सत्रह अगस्त का जब पृथ्वी के उन मित्रों ने अपने मित्रों को उनकी हर संभव खुशियों की सौगात दी थी। एक ही व्यक्ति मां बाप और सखा कैसे बन सकता है इसकी अनूठी मिसाल थे वे अब एक दूसरे के लिए।
अलौकिक या पूर्व निर्धारित...आम आदमी जिसे भाग्य या किस्मत कहता है, कुछ ऐसा ही तो था वह दिन... उमंगों से भरपूर। और इन सब बातों में विश्वास न करते हुए भी मनु को वह दिन सुबह से ही कुछ विशेष संभावनाओं से भरा और दिव्य लग रहा था...एक ऐसा दिन, जब पक्षी आकाश में उड़ते उड़ते गाना सुनाते हैं और खुशी से झूमती डालियां फूलों से रास्ता भर देती हैं। याद आते ही मनु का मन आज भी तो बादलों से भी ऊँची उड़ान लेने लगता है। मनु के मन की सारी पुलक मानो प्रकृति में ही जा समाई थी उस दिन।
शादी की भागम-भाग भरी व्यस्तता के बाद, दिन भर की थकान और उत्तेजना को शांत करने के लिए मनु जब अपना स्केच पैड और तूलिका लेकर पार्क में पहुंची तो जोनुस वहांपर मौजूद था...वैसे ही शांत और चुपचाप योगी-सा अपने काम में व्यस्त, मानो दिन भर की हलचल एक लहर थी जो आई और चली गयी। पर प्रकृति ने तो कुछ और ही सोच रखा था दोनों के लिए। साधारण सी जीन और सफेद एरन स्वेटर में खड़ी मनु को अचानक ही तेज हवा में झरझर झरती एपल और चेरी ब्लौजम की कोमल सफेद गुलाबी पत्तियों ने बाल, कान और कपड़ों पर गिर गिरकर दुल्हन सा सजा दिया। गालों और होठों पर ही नहीं, चंद नटखट तो झुकी पलकों तक पर जा बैठी थीं। और तब पता नहीं यह उसकी निष्कलुष नजर से नहाई-धोई मनु के रूप का जादू था या फिर होनी के षडयंत्र का, जोनुस की निष्पलक दृष्टि बारबार ही ऊदे बादलों की जगह मनु के उड़ते बालों में उलझकर रह जा रही थी और सोच ही नहीं उसकी तूलिका तक बग़ावत कर बैठी थी अब तो उससे। अब जोनुस की आंखों के आगे हरियाली और फूलों से लदी वादियां नहीं, सफेद एरन स्वेटर की गोलाइयों के उतार चढ़ाव थे। झुके ऊदे रंग-बिरंगे बादल नहीं, हवा में बिखरकर बेतरतीब उड़ रहे मनु के घुंघराले बाल और पंखुरियों से नाजुक होठ थे। और तब उन अलकों और उनमें गुंथी गुलाबी पंखुड़ियां, दोनों को ही बेहद प्यार और परवाह से कागज पर समेट लिया था जोनुस ने। उस अनुरागी पल में शर्मीले सूरज से भी ज्यादा अरुणिमा और रंग जो दिख रहे थे उसे मनु के सिंदूरी गालों पर।
जोनुस की तरफ चौकलेट बार बढ़ाती मनु की दृष्टि जब उसके कैनवस पर गई तो वहीं ठिठककर रह गई। “यह क्या बना डाला है जोनुस तुमने?“ पूछने तक की हिम्मत न जुटा पाई वह। पल भर में ही पैरों के नीचे झूमती नरम ऊदी घास की तरह वह भी जाने किन सपनों की हरी भरी वादियों में रच बस गई। जोनुस ने भी तो उसी पल सबकुछ पढ़ और जान लिया था, उसके अभिसारी मन को भी, और सामीप्य से उठती नन्ही वादियों की उस उठती गिरती हलचल को भी। और तब जैसे फूलों की टहनियों ने कोमल किरनों को बांहों में समेट रखा था, एक नई उष्मा और आवेश से जोनुस ने मनु को बांहों में ले लिया और उसकी बंद पलकों पर अटकी कांपती पंखुड़ी को ही नहीं, एक-एक करके बालों में गुंथी सारी कि सारी पंखुड़ियों को भी होठों से ही हटाना शुरु कर दिया। पता नहीं पास में झूमती चम्पई झाड़ियों का मादक नशा था या मन में छुपी नेह कस्तूरी का, कैनवस, रंग, ब्रश ही क्या, अब तो खुद भी वे सारी दुनिया से अलग कहीं दूर जा गिरे थे और कांपते हाथ और होठ जाने किन किन अनजान और रहस्यमय वादियों में खुद को ही ढूंढे जा रहे थे।
हवा में उड़ती वे चेरी और एपल ब्लौजम की पत्तियां अब मनु को ही नहीं, जोनुस को भी दुलरा रही थीं। एक दूसरे में रिझे-बिंधे वे निःशब्द बुत बन चुके थे और खुद उनके अपने स्पंदन के शोर ने बहते झरने की गूंज और चिड़ियों का कलरव सब कुछ डुबो दिया था उनके कानों से। जोनुस तो जोनुस, पत्तों से गुजरती हवा की सरसराहट से भी ज्यादा चौकन्नी मनु तक आसपास के शोरगुल, खेलते बच्चे और टहलते दौड़ते वयस्क सबसे ही बेखबर हो चुकी थी।
उसकी इस तंद्रा को उस नन्ही बच्ची ने आकर तोड़ा जो आराम से बैठकर बिखरे रंग और ब्रशों से मनु के कैनवस को एक नया ही रूप और आकार दे रही थी और उसकी मां दौड़ती-भागती दूर से ही हाथ हिला-हिलाकर मना करती, उसे रोकती हुई, भागी चली आ रही थी -.” ओह गॉड, यह क्या कर डाला है तुमने? ब्रश नीचे रखो बेबी!” कह-कहकर अब उसे समझा और धमका रही थी।
मनु के कैनवस पर अब उन क्रीडारत कबूतरों की जगह दो बड़े बड़े धब्बे थे और चिप्स हैम्बर्गर की चिकनाई और टोमैटो सौस में डूबी उंगलियों के कई-कई नन्हे नन्हे निशान थे। जोनुस के कैनवस का तो आसपास क्या दूरदूर तक कोई अता-पता ही नहीं था ।
हांफती मां भी अबतक वहां आ पहुंची थी और कलाकार की लापरवाही से परेशान और क्षुब्द थी। बच्ची को गोदी में उठाकर उसके हाथ पैर ...मुंह और बाल साफ करने शुरु कर दिए। ‘कितने लापरवाह होते हैं यह कलाकार भी। पता नहीं किसका सामान है? लगता तो नहीं कि कैनवस या ट्यूब के अन्दर कोई भी रंग बचा है ! ‘ बड़बड़ाती उसकी आखें अभी भी बिखरे सामान के मालिक को ढूंढ रही थीं।
उसे चित्रकार पर गुस्सा भी आ रहा था और सहानुभूति भी ....’ कौन जाने कितने दिन, घंटों की मेहनत बेकार हुई बिचारे की ! ‘ सोच-सोचकर कम परेशान नहीं थी वह अब।
“ कैथलीन, ओह माई गॉड, व्हाट हैव यू डन ? से सॉरी टू द.... “ नन्ही कैथलीन और उसकी मां, दोनों ही भौंचक्की सी इधर-उधऱ देख रही थीं- किसका हो सकता है, इतनी दूर पड़ा यह सामान...इनका तो हरगिज ही नहीं? एक दूसरे में पूरी तरह से खोए और आलिंगनबद्ध मनु और जोनुस को देखकर उस वक्त मां भी तो बच्ची की तरह ही, बस यही सोच पायी थी।
और तब मस्त बच्ची और परेशान व झुंझलाई मां को देखकर, न चाहते हुए भी, दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े थे। आज उन्हें किसी भी नुकसानकी परवाह नहीं थी। एक दूसरे में डूबकर, खुदको खोकर, एक नया और अनमोल खज़ाना जो पा लिया था उन्होंने। इसके पहले कि जोनुस की आखों की शरारती चमक से सम्मोहित और उद्वेलित मनु कुछ भी कह पाए, जोनुस हवा सी ही सरसराहट से आगे झुककर उसके कानों में फुसफुसाया था, “ देखो, अब तुम मुझसे कुछ मत कहना मनु, मेरी नहीं, यह तो इस मन की ही शरारत थी। वही गुनहगार है तुम्हारा। अब जो भी सजा देनी है, इसीको देना तुम। “
“तो फिर अपने इस धृष्ट मन से कहो कि आज शाम को ही घर आकर मुझसे मिले और अपनी सफाई में जो भी कहना है , साफ़ साफ़ खुलकर कहे !“
बिखरे रंग और कैनवस को समेटती मनु ने शरारत से मुस्कुराते हुए, बिना कुछ सोचे समझे, बस यही जबाव दिया था उस समय तो।
“जरूर, क्यों नहीं!” जोनुस ने भी उसी चुस्ती से शरारत भरा वह आमंत्रण स्वीकार कर लिया था।
वक्त सी उलझी नाज़ुक पंखुड़ियों को हिफ़ाज़त से अँजुरी में भरकर जोनुस का मन हवा के सात घोड़ों पर जा बैठा था। और तब उसी एक पल में ही शाम की ही क्या, पूरी जिन्दगी की ही सारी तैयारियां कर डाली थीं जोनुस ने। दर्जन भर दहकते सुर्ख गुलाब और मनु की आखों-सी ही चमकती हीरे की अगूंठी लेकर ही तो पहुंचा था वह उस शाम मनु के फ्लैट पर और चौकलेट सी तारतार होती मनु से अपने प्यार की बेताब घोषणा भी हिम्मत जुटाकर एक ही सांस में दे डाली थी...उसी पल, वहीं दरवाजे पर खड़े-खड़े ही। अगूंठी तक तो बड़ी मुश्किल से पहना पाया था जोनुस, क्योंकि हाथ तो पलभर के लिए भी मनु को छोड़ने को तैयार ही नहीं थे।
तुरंत ही मझली-सी फड़कती और फड़फड़ाती मनु उसकी बाहों से फिसलकर बाहर भी आ गई थी। हंसकर बोली थी-, “नहीं! इतनी जल्दी क्या है...पहले हम एक-दूसरे को जान तो लें जोनुस?”
और तब भिखारी सी करुण आवाज में पूछा था जोनुस ने, “ इतनी कठोर क्यों हो मनु, क्या दया करुणा नहीं आती तुम्हें मुझपर?”
और जोनुस को आश्चर्य-चकित करती, अबूझ सुख में डुबोती, अगले दिन ही अपने सारे सामान से लदी-फंदी मनु दरवाजे पर खड़ी थी ... उसके घर साथ रहने के लिए आ पहुंची थी वह।
भावातिरेक से बन्द आँखों में पूरी तरह से मनु को कैद कर लिया था जोनुस ने तब उसी पल। उसका और अपना बोझ हलका करते हुए, हाथों से सारा सामान लेते , गूंजती-सी आवाज में बस इतना ही तो पूछ पाया था, “ मेरे इस उल्लासित घर और जीवन को सूना करती अब कभी वापस तो नहीं जाओगी मनु?”
और तब एक दृढ़ “नहीं!” के साथ मनु तुरंत ही कांपती लता-सी लिपट गई थी जोनुस से। इसके पहले कि मन और शरीर में उठते उस ताप से पूरी-की-पूरी पिघल जाए मनु, समेट लिया था जोनुस ने...उसे भी और उसकी भटकती सोच को भी। जीवन भर के लिए तने सा सहारा जो बन चुका था जोनुस अपनी आत्म-वल्लरी का। सशक्त बाहों में लिपटी लरजती-कांपती मनु ने भी दोनों के भविष्य के बारे में कई-कई दृढ़ संकल्प ले डाले थे उसी पल...अम्मा बाबा और दादी को तुरंत ही बताना होगा।मना लेगी सबको वह। उसके बाद तो जीवन के हर कमजोर पड़ते क्षण में सुख और सहारे के लिए बस यही करती आयी है मनु...जोनुस का सानिध्य एक सुखद आदत थी अब मनु के जीवन की... बाहर से बेहद ही मज़बूत और समझदार दिखती, बच्चों-सी नादान और कमजोर मनु का वही तो आधार और संबल है आखिर...सच पूछो तो उसीके सहारे ही तो, हर आंधी-पानी में...इस जीवन में खड़ी रह पायी है मनुश्री सरकार....और जोनुस ? …जोनुस के बारे में क्या कहें, जिन्दगी एक बहुत ही असमर्थ-सा शब्द लगता है...उसके सोते जागते हर पल की, आत्मा की जरूरत थी मनु।
निश्चय के उस पहले पल में ही, जीवन... एक नेहसिक्त वादा जिम्मेदारी के साथ निभाना सीख लिया था दोनों ने।...( क्रमशः)
टी.वी. खोला तो सेक्स सिम्बल का इंटर्व्यू चल रहा था। सेक्ससिम्बल जानबूझकर, बेखबर चहचहा रही थी। वात्स्यायन, कोणार्क, खजुराहो, मदनोत्सव, विश्वामित्र, मेनका, उर्वशी, रम्भा, विषकन्य, गीत-गोविन्द, कुमार संभवम् यौन शिक्षा, कोकशास्त्र, रेड लाइट जैसे शब्द इंटरव्यू को रोचक बना रहे थे, इंटरव्यू कर्ता की चोर-नजर झेंपती सजग होती साफ दिख रही थी, लेकिन अलमस्त गुरूर से लबरेज सेक्स सिम्बल के चेहरे से आत्मविश्वास और नूर जैसे चू रहा था।
इ.क.-अभी आपने कहा कि आप अपने शरीर को पूंजी मानती हैं, इसे अधिक स्पष्ट करेंगी।
सै. सिं.- देखिए, जिस तरह आप अपने धन और बुद्धि के मालिक हैं, वे आपकी 'पूंजी' हैं, उन्हें आप जैसा चाहें यूज करते हैं, उसी तरह हम भी अपने शरीर के मालिक होने के नाते, उसका मनचाहा यूज करते हैं। अपने अपने रास्ते हैं...(शरारती नजर से मुस्कराहट में कटाक्ष करती आगे बोली) हमारे अंग प्रदर्शन वाले रास्ते से तो यथार्थ के साथ परमार्थ भी सजता है, हमें धन और प्रसिद्धि मिलती है और देखने वाले को खुशी, नयन सुख एवं सभी दुखों से छुटकारा मिल जाता है।
इ.क. -(चौंकते हुए) दुखों से छुटकारे से आपका क्या अभिप्राय है?
से. सि.- सीधा-साधा मतलब है, हमारी खूबसूरती और अदायें देखने वाले के दिलोदिमाग पर छा जाती है, तन मन की सुधि बिसर जाती है, पहाण सा दुख क्षण भर में छू मन्तर हो जाता है।
इ.क.- लेकिन यह तो क्षणिक सुख हुआ?
से.सि.- तो आप मुझे किसी स्थाई सुख का नाम बता दीजिए? सुनिए जीवन क्षण भंगुर होता है। इसमें कोई सुख स्थाई नहीं है, बस जो लम्हा खुशी खुशी गुजर जाए वही असली सुख है। चार्वाक का श्लोक आपने अवश्य सुना होगा-भस्मीभूतय देहस्य पुनरागमनो कुतः
ऋणं कृत्वा घृतम् पिवेत्, यावज्जीवेत सुखम जीवेत।
इ.क.- आपका मतलब है सुख पाने का साधन केवल शरीर है?
से.सि.- शरीर के अलावा और क्या हो सकता है, क्या बिना शरीर के सुख का अनुभव संभव है?
इ.क.- अपनी बात, और खुल कर बता सकती हैं?
से.सि.-क्या खुल के बताना है, जीवन में सारा तामझाम भागादौड़ी इसी शरीर के लिए ही तो है, तन सुखी तो मन सुखी। किसी ने शेर कहा है-
सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां
जिन्दगानी भी रही तो ये नौजवानी फिर कहां?
मुझे पढ़ने का शौक है। संस्कृत और हिन्दी साहित्य तो स्त्री-देह के नख-शिख चित्रण से भरा पड़ा है। आदमी की बात तो छोड़िए, तन-सुख की कामना में शिव-मोहिनी, ब्रह्मा-सरस्वती, नारद-विश्वमोहिनी, इन्द्र-अहिल्या, जैसे देवताओं के प्रसंग शरीर के महत्व को खुलकर बताते हैं। कालीदास और जयदेव जैसे महाकवियों के साहित्य से शरीर निकाल दीजिए तो क्या बचेगा, उदाहरण के लिए गीत गोविन्द और श्रंगार शतक के श्लोक सुनाती हूँ
किसलयशयननिवेशितया चिरमुरसिममैवशयानम्
कृतपरिरम्भणचुम्बनया परिरम्भकृताधरपानम् ।।
(हे सखि, मैं कुंज कुटीर के मध्य कोमल पत्तों की शय्या
बनाकर शयन करूंगी तब श्यामसुन्दर श्री कृष्ण मेरे
साथ विराजमान होकर मेरे ही वक्षस्थल पर चिरकाल
तक शयन करते हुए आलिंगन कर मेरा अधरामृत पान करेंगे
ऐसे श्री कृष्ण चन्द्र जी से हमें मिला दो।)
इ.क.- मैडम आपने इतना पढ़ा है, अच्छी बात है। काश आपने उसे सही समझा होता, जिस लौकिक शरीर की आप चर्चा कर रही हैं वह तो वहां है ही नहीं। कला और नंगई, अध्यात्म और रतिसुख के अन्तर को समझने के लिए गहरी समझ व पारखी नजर की जरूरत है। देहधर्मी मानसिकता और वासना भरी दृष्टि की वहां पहुंच नहीं। शरीर की भर्त्सना का साहित्य भी भरा पड़ा है। जिन भर्तहरि के श्रृंगार शतक का उदाहरण आपने दिया , उन्ही ने आगे विषय भोगी की कितनी निंदा की है, मालूम है आपको?
से.सि.- हां मालूम है, हमें। वह भृतहरि की कुंठा है, अवसरवादिता है, यह क्या बात हुई कि जब उन्हें प्रेम मिला तो नारी स्वर्ग थी, जब वह वंचित हुए तो नारी नर्क हो गयी।
जानती हूं पोथियांदेह-निन्दा से भरी पड़ी हैं, लेकिन उसके पीछे की सचाई आपको नहीं मालूम है, ये सभी देह-निंदक कुंठित लोग हैं। जो प्रत्यक्ष की कद्र न कर सकेगा वह परोक्ष की कद्र क्या करेगा, जो देह को न जान सका, वह आत्मा को क्या जानेगा ?
इ.क.- स्त्री देह पर समाज की वर्जनाओं पर कुछ कहेंगी?
से.सिं- हम वर्जनाओं से दो-दो हाथ करके निकल पड़े हैं, पुरुषों की गुलामी अब और बर्दश्त नहीं होगी। हमारी पीढ़ी समाज की लगाई हर बंदिश को कुचल कर रख देगी। हमें जो अच्छा लगेगा, वो करेंगी। मां बाप, बुजुर्ग, धर्म समाज को अब हमारी सोच के पीछे-पीछे चलना होगा, वर्जनाएं, बन्दिशें...माई फुट।
इ.क.- आप यह तो मानेंगी कि अंग प्रदर्ळन नई पीढ़ी पर दूषित प्रभाव पड़ता है।
से सिं- (खिलखिलाते हुए) ज्यादातर यह प्रश्न इंचरव्यू के शुरु में ही पूछ लिया जाता है, आपने काफी देर से पूछा , देखिए हमारे अंग प्रदर्शन का समाज के सभी वर्गों पर । पहले बच्चों को लेते अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। पहले बच्चों को लेते हैं- बच्चे पेड़ पर नहीं उगाए जाते, फैक्ट्री में नहीं ढाले जाते, बिस्तर पर बनाए जाते हैं, भोले बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासाएं होती हैं, वे छोटे क्यों हैं, बड़े बड़े क्यों हैं, वे इस दुनिया में कहां से आए, मां बाप , कुटुम्बी, टीचर उन्हें सही उत्तर देना गन्दी बात समझते हैं-हमारे अंग प्रदर्शन से उन्हें काफी जानकारी मिल जाती है, जो उनके मानसिक विकास में बहुत काम आती है। जहां तक यंग लड़के लड़कियों का प्रश्न है तो उनके लिए हमारा अंग प्रदर्शन एक वरदान है। इससे उनमें साहस और आत्मविश्वास, खासतौर से लड़कियों को तो अपनी बाडी की ताकत और कीमत का अन्दाज लग जाता है।
अब लीजिए काम धंधे में फंसे और पिसते वर्ग को हमारा अंग प्रदर्शन पल-दोडपल चैप देता है प्रदर्शन उनके घुटन भरे जीवन में ठंडी हवा का झोंका है, तपते रेगिस्तान में शीतल छांव है। मैं एक ट्रेड सीक्रेट बताती हूं, खर्च करने की पावर के चलते यह वर्ग हमारी इंडस्ट्री का मेन टारगेट है।
अब बात करें स्त्री की, हम उन्हें पुरुष की गुलामी से छुटकारा पाने का मंत्र दे रहे हैं, शरीर के सटीक प्रयोग से, वे जो चाहें जहां चाहें, हर चीज़ हासिल कर सकती हैं। आसिकी से लेकर नौकरी तक , ग्लैमर की दुनिया से लेकर पालिटिक्स हर जगह यह सिक्का अमोघ बाण का काम करता है।
रही बात बुजुर्ग पीढ़ी की, उनकी छोड़िए। जब से दुनिया बनी है तभी से नई पीढ़ी के रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने, चलने-फिरने हर बात में माथा पीटते हैं। खुद अपने टाइम में मजे मार लिए और हमें उस मजे से रोकते हैं। हम जानते हैं कि उम्र के चलते अंगूर खट्टे हैं वरना क्या-क्या नहीं करते। गलिब ने इनकी अन्दर-बाहर की सोच का बड़ा अच्छा नक्शा खींचा है।
गो हाथ में जुंबिश नहीं, आखों में तो दम है,
रहने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे
दरअसल यह जनरेशन गैप है, इसलिए हम उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते। पिटी औन देम।
इ.क.- लेकिन आप यह जरूर मानेंगी कि सेक्स के भौंडे प्रदर्शन से समाज में सांस्कृतिक, धार्मिक और नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है।
से.सि.- प्लीज माइंड योर लैंगवेज। अंग प्रदर्शन एक कला है, भौंडा वह होता है जिसके मूल में मूर्खता हो, फूहड़ता हो, अव्यवस्था हो। हमारा हर मिलीमीटर प्रदर्शन योजनानुसार आकर्षक और शानदार होता है। उसको भौंडा कहना अपनी नासमझी ज़ाहिर करना है। मैने अभी आपको अँग प्रदर्शन के लाभ गिनाए हैं।
जहां तक आपके इन सोकाल्ड मूल्यों का प्रशन है तो मेरी राय है कि आप लोग पहले अपने इन मूल्यों को मजबूत बनाइये। एक आँख मिचकाने या जरा सा बाडी हिला देने से जो मूल्य भरभरा कर गिर पड़ें, उन्हें कोई नहीं बचा सकता। आप धर्म की बात कर रहे हैं, मुझे बताइये कि शिलिंग क्या है, किस पर टिका है, कामाख्या मंदिर में किसकी पूजा होती है, लाखों की भीड़ के बीच से नागा साधु त्रिवेणी नहाने जाते हैं। नैतिकता का दोहरापन देखिए, खजुराहो और कोणार्क की मिथुनरत मूर्तियां और पैरिस के चित्रों की तारीफ में जिनकी जुबान नहीं थकती, वही हमारी अर्धनग्नता पर नाक भौंसिकोड़ते हैं। पतन-पतन कर छाती पीटते हैं। अरे नग्नता तो नग्नता है, चाहे पत्थर में हो, कागज पर हो या सशरीर सामने हो! यदि उन्हें आपने कला का दर्जा दिया है तो आपको हमारे अंग प्रदर्शन को कला मानना ही होगा।
इ.क.- मैडम बुरा न मानें आप लोगों पर नंगई इतना हाबी है कि कला जैसे पवित्र शब्द को गन्दगी में घसीट रही हैं।
से.सिं.-(टोकते हुए) ...मैं कला में गन्दगी नहीं घसीट रही हूं, थोथी कूपमंडूकता को झिंझोड़ रही हूं। दोहरेपन की नकाब उघाड़ रही हूं जो औरत को देखते ही बिस्तर पर बिछाने की कल्पना में डूबने उतराने लगते हैं। और ऊपर से कला पारखी, समाज सुधारक जैसे मुखौटे लगा लेते हैं। यह लोगों को मूर्ख बनाना है, जिसे हमारी पीढ़ी ने समझ लिया है। मेरी सलाह है आप लोगों को मांस के लोथड़े से हटकर देखना चाहिए और हम पर कीचड़ उछालने से बाज आइये।
इ.क.- यानी अंग प्रदर्शन ही आपके जीवन का लक्ष हो गया है! अच्छा बताइये इसे आप किस सीमातक जायज समझती हैं।
से.सिं.- जिस सीमा तक लोगों को अच्छा लगे...
इ,क. -यानी लोगों के चाहने पर आप और छोटी...
से.सिं.-(बीच में ही टोकते हुए) मैं समझ गयी आप अंग प्रदर्शन की सीमा को क्वांटिफाई करना चाहते हैं। देखिए यह तो आप जानते ही होंगे कि वेश्या की नग्नता कौड़ियों में बिक जाती है, जबकि हमारी अर्धनग्नता हमें लाखों-करोड़ों दिला देती है। लुकाछिपी के इस खेल में कपड़ों की सीमा जरूरत के हिसाब से घटती-बढ़ती रहती है। दरअसल यह प्रश्न अर्थशास्त्र का प्रश्न है, आप जितना इसको समझने की कोशिश करेंगे उतना उलझकते जाएंगे। चलिए एक सूत्र देती हूं विश्व भर की वित्रापन-दुनिया का बजट करोड़ों नहीं अरबों में है और वह समूची दुनिया औरत के कपड़े पहनने, उतारने की बैसाखी पर टिकी है, ड्रेस का साइज उसी के मुताबिक तय होता है।
इ.क.- लोग आपकी आलोचना करते हैं आपको इसका बुरा नहीं लगता।
से.सिं.- (हल्की मुस्कुराहट) बुरा लगने का तो प्रश्न ही नहीं होता, बल्कि यह तो हमारी सफलता की निशानी है। जितनी अधिक चर्चा होगी, उतनी पब्लिसिटी मिलेगी। पब्लिसिटी आगे बड़े बड़े काम दिलाती है और फिर तरक्की की राह में रोड़े अटकाना, बढ़ते की टांग खींचना लोगों की आदत है, इसमें उन्हें मजा मिलता है। हम तो नके इस मजे का मजा लेते हैं।
रही बात कठमुल्लों की तो उनकी न पूछिए, हर चेंज और तरक्की पर हाय-तौबा मचाना उनकी प्रकृति है, उनका बस चलता तो इन्सान को गुफा-युग से बाहर नहीं निकलने देते, उनकी बकवास का हम कतई परवाह नहीं करते।
इ.क. भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं।
से.सि.- फिल्म, सीरियल, माडलिंग सभी जगह से अच्छा रिसपांस मिल रहा ह, एक फिल्म रिलीज होने वाली है, बाथरूम और बेडरूम के काफी बोल्ड सीन हैं, उम्मीद है इस फिल्म से मुझे काफी बड़ा ब्रेक मिलेगा।
इ.क.-इस लाइन में आने वाली लड़कियों को क्या पैगाम देना चाहेंगी।
से.सि.-यही कहूंगी कि अपने शरीर की ताकत को पहचानो, इसके समझदारी भरे इस्तेमाल से-कर लो दुनिया मुठ्ठी में।
इ.क.-समय समाप्त हो रहा है, चलते-चलते एक पूर्णतः व्यक्तिगत प्रश्न पूछना चाहता हूं अन्यथा न लीजिएगा। क्या आप अपनी बेटी को 'सेक्स बम' बनाना चाहेंगी।
से.सि.- मैं एक अच्छी मां का रोल निभाऊंगी, लालन-पालन,पढ़ाई-लिखाई में कोई कमी नहीं रखूंगी, लेकिन उसके व्यक्ति-स्वातंत्र्य में कोई दखल नहीं दूंगी, वह जो भी बनना चाहेगी उसे खुशी-खुशी मंजूर करूंगी।
(धन्यवाद की औपचारिकता से इंटरव्यू समाप्त हुआ, मैने टी.वी. बंद किया और एक गहरी सांस ली।)
दॉस्तोएव्स्की के प्रेम-पत्रः अनुवाद रूपसिंह चन्देल
अपोलिनेरिया प्रोकोफेव्ना सस्लोवा के नाम पत्र वीस्बडेन) वृहस्पतिवार, अगस्त १२/२४, १८६५
मैं तुम पर पत्रों की बौछार करता रहा हूँ। तुम्हे मेरा परसों (मंगलवार) का पत्र मिला ? मुझे आज अभी तक तुम्हारे उत्तर की उम्मीद है।
हमारा प्रेम संबंध शोचनीय स्थिति में है. इसे और अधिक बिगाड़ना संभव नहीं है। नीचे गहराई में दुख और बुराई का निश्चित ही दूसरा क्षेत्र है, जिसका मुझे अभी तक आभास नहीं है। मुझे अभी तक हर्जेन से कुछ भी नहीं मिला, न कोई उत्तर या प्रतिक्रिया। आज उन्हें लिखे एक सप्ताह हो गया। आज सोमवार है, वह दिन, जिस दिन के लिए मैनें मकान मालिक से किराया देने का वायदा किया था। मैं नहीं जानता, क्या होगा ! अभी सुबह के १ बजे हैं।
मैं विश्वास नहीं कर सकता कि हर्जे ( न ) मुझे उत्तर देने को इच्छुक नहीं हैं ! क्या वह उत्तर न देने का निर्णय कर सकते हैं ? यह प्रश्न नहीं उठता ! किस कारण ? हमारे अच्छे संबंध हैं, जैसा कि तुमने स्वयं देखा है। क्या कोई उन्हें मेरे विरुद्ध भड़का सकता है ? लेकिन इस मामले में यह अकल्पनीय है (अधिक ही अकल्पनीय) कि वह मेरे पत्र को अनुत्तरित छोड़ देगें. इसलिए , कुछ समय के लिए , मैं यह मानता हूँ, कि मेरा पत्र भटक गया है (जो असंभव है ) अथवा , मेरे दुर्भाग्य से , वह इस समय जिनेवा में नहीं हैं। बाद वाली बात ( जिनेवा से बाहर होने) की ही संभावना है। यदि ऐसा है , मैं संभवत: अनुमान लगा सकता हूँ कि (१) उन्हेानें कम समय के लिए ही शहर छोड़ा होगा। इस स्थिति में मुझे किसी भी दिन उनका उत्तर मिलने की आशा है(जैसे ही वह वापस लौटगें); अथवा ( २ ) वह लंबे समय के लिए शहर छोड़ गए हैं, ऐसी स्थिति में , यह संभावना अधिक है कि मेरा पत्र जहां वह इस समय हैं , उन्हें भेज दिया जाएगा , क्योंकि उन्होनें इस बात का निर्देश अवश्य छोड़ा होगा कि उनकी अनुपतिस्थति में जो डाक आए उसे उन्हें भेज दिया जाए। अत: मझे अभी भी उनके पत्रोत्तर की आशा है।
मैं इस पूरे सप्ताह रविवार तक उनके उत्तर की आशा जारी रखूंगा -- लेकिन , बेशक , उम्मीद से अधिक कुछ न होगा और मैं इस समय ऐसी दशा में हूं कि अकेली उम्मीद जिन्दा रहने के लिए पर्याप्त नहीं है ।
लेकिन यदि मैं अधिक अवसादग्रस्त न हुआ तो टिका रह सकता हूं। मैं अपनी गतिविधियों , विचार में, बिना किसी दृढ़ निश्चय के इधर-उधर की अनिश्चित प्र्रतीक्षा , समय की बर्बादी, इस घृणित वीस्बडेन से उत्पीड़ित हूं, जिसने मुझे इतना बीमार कर दिया है कि मुझे जीवन से विरक्ति हो चुकी है। और इस दौरान तुम पेरिस में हो और मैं तुमसे नहीं मिल पाऊंगा। हर्जे ( न ) भी मेरे दिमाग पर छाए हुए हैं । यदि उन्हें पत्र मिला और उन्होनें उत्तर देने की इच्छा न की ,सोचो, मेरे लिए वह कितना अपमानजनक होगा. क्या संभवत: मैं इसी योग्य हूँ? क्या यह मेरा अनुशासनहीन आचरण है? मैं मानता हूं कि मैनें पर्याप्त अव्यवस्थित जिन्दगी जी है , लेकिन यह सब कैसी बूर्जुआ नैतिकता है ! यदि दूसरा कुछ नहीं, उन्हें मुझे उत्तर देना चाहिए , अथवा वह यह अनुभव करते हैं कि मैं उनकी सहायता के 'योग्य' नहीं ( जैसा कि होटल मालिक मुझे डिनर सर्व करने के योग्य नहीं समझता )। लेकिन यह अकल्पनीय है कि वह उत्तर नहीं देगें -- निश्चित ही वह जिनेवा से बाहर होगें।
मैनें तुमसे कहा था कि किसी से उधार लेकर मेरी सहायता करो। पोल्या, मैं बहुत आशावादी नहीं हूं, लेकिन यदि तुम कर सकती हो तो मेरे लिए करो। तुम अवश्य मानोगी कि इस समय जितनी अधिक कश्टप्रद और पीड़ाजनक स्थिति में मैं हूं किसी और को पाना निश्चित ही कठिन होगा।
जब तक मुझे तुम्हारी ओर से कोई समाचार प्राप्त नहीं होता , मेरा तुम्हारे लिए यह आखिरी पत्र है। मैं पूरे समय इस विचार के अधीन रहता हूँ कि होटल फ्लूरस में तुम्हारे न होने के समय पहुंचे मेरे पत्र इधर-उधर पड़े रहकर खो जाते हैं। मैं उनमें टिकट नहीं लगाता क्योंकि मेरे पास एक कोपेक तक नहीं है। मैं अभी भी बिना डिनर के हूं और यह तीसरा दिन है कि मैं केवल सुबह -शाम की चाय पर जी रहा हूं.और एक आश्चर्यजनक बात -- मैं बिल्कुल भूखा अनुभव नहीं करता। बुरी बात यह है कि वे चीजों को मेरे लिए अप्रिय बनाते हैं और कभी - कभी शाम को मुझे नई मोमबत्ती देने से इंकार कर देते हैं , विशेशरूप से जब पिछली रात की मोमबत्ती का छोटा-सा टुकड़ा बचा होता है । लेकिन वास्तव में मैं अपरान्ह तीन से छ: के बीच प्रतिदिन होटल से बाहर आ जाता हूं, जिससे उन्हें यह प्रकट न हो कि मैं बिना भेाजन के जा रहा हूँ।.
निश्चित ही, मुझे धुधंली-सी उम्मीद है कि एक सप्ताह या अधिक से अधिक दस दिनों में मुझे रूस से कुछ अवश्य प्राप्त होगा ( बराह ज्यूरिख ) लेकिन, और फिर भी , मेरा मन यह मानने से इंकार करता है कि मुझे पेरिस से कुछ नहीं प्राप्त होगा और तुम्हारे जाने से पहले मैं तुमसे नहीं मिलूंगा। यह बिल्कुल संभव नहीं है। लेकिन तब मेरी निश्क्रियता मेरी कल्पनाशीलता के साथ मिलकर मेरे साथ कोई शरारत कर सकती है --- और मैं बिल्कुल निश्क्रियता में परिवर्तित हो जाऊं।
विदा , मेरी प्रिये , और जब तक कुछ खास घटित नहीं होता , मैं और अधिक नहीं लिखूँगा . फिर मिलेगें।
तुम्हारा सर्वस्व
दोस्तोएव्स्की
पुनश्च - मैं एक बार पुन: तुम्हे जोरदार गले लगाता हूँ। नदे( ज्दा ) प्रोको ( फेव्ना ) आयी और कब ? उसे मेरा अभिवादन कहना ।
४ बजे
मेरी प्रिय पोल्या ,
मुझे अभी इसी क्षण हर्जेन से उत्तर प्राप्त हुआ है। वह पहाड़ों पर हैं और इसीलिए उनके उत्तर में विलंब हुआ। उन्हेंनें कोई पैसा नहीं भेजा। उनका कहना है कि मेरा पत्र उन्हें पर्याप्त निराशाजनक क्षणों में मिला। और कि वह ४०० फ्लोरिन्स नहीं दे सकते। लेकिन १०० या १५० गल्डेस की बिल्कुल अलग बात है। और यदि उतने से मेरी सहायता हो जाएगी, वह मुझे वह राशि भेज देगें। और उन्होंनें अनुरोध किया है कि मैं नाराज न होऊं , आदि।
क्या यह कुछ आश्चर्यजनक नहीं है, तो भी -- उन्होंने मुझे १५० गल्डेंस क्यो नहीं भेजे, जबकि उन्हेंनें स्वयं लिखा कि वह उतना दे सकते हें? यह कहते हुए कि उतना ही वह कर सकते थे, उन्हें मुझे १५० गल्डेंस भेजने चाहिए थे। चीजें कैसे घटित होती हैं। लेकिन यहां कोई रहस्य नहीं है, या तो उनके पास स्वयं बहुत कम है या दूसरा यह कि वह कंजूस हैं। लेकिन उन्हें इस बात की आशंका नहीं होनी चाहिए थी कि मैं उन्हें लौटा न सकूंगा , क्योंकि उनके पास मेरा पत्र है। आखिरकार , मैं प्रायिश्चित के परे का व्यक्ति नहीं हूं। नहीं , मुझे निश्चय है कि वह स्वयं तंग स्थिति में हे। .
उनसे पुन: सहायता के लिए कहना --- बिल्कुल संभव नहीं है। लेकिन तब मैं अब करूं क्या? पोल्या, मेरी मित्र , मेरी सहायता करो , मेरी रक्षा करो ! कहीं से १५० रूबल की व्यवस्था करो , वास्तव में इतने की ही मुझे आवश्यकता है . दस दिनों में ( इससे पहले भी हो सकता है ) वोस्कोबोइनिकोव से ज्यूरिख में तुम्हारी बहन के लिए निश्चित ही कुछ आ जाएगा। हालांकि , वह अधिक नहीं होगा। लेकिन वह १५० गल्डेंस से कम निश्चित ही नहीं होगा। और तब मैं तुम्हे लौटा दूँगा। तुम निश्चित समझ सकती हो कि मैं तुम्हे अप्रिय स्थिति में नहीं डालना चाहूंगा। निश्चित ही यह प्रश्नातीत है। सलाह के लिए अपनी बहन से पूछना। लेकिन किसी भी रूप में , इस विषय में तुमसे जल्दी ही जानना चाहता हूँ।. तुम्हारा सर्वस्व
फ्यो . दोस्तोएव्स्की
अब पुन: , मुझे कुछ अनुमान नहीं है कि मेरे साथ क्या होगा !
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अपोलिनेरिया : अपोलिनेरिया २२ वर्शीया सुन्दरी थी जो ४२ वर्शीय दॉस्तोएव्स्की के सब्जबाग में आ गयी थी और उन्हें प्रेम करनी लगी थी. अपनी पत्नी मारिया के जीवित रहते हुए दॉस्तोएव्स्की उसके साथ विदेश यात्रा पर गये थे . लेकिन शीघ्र अपोलिनेरिया का उनसे मोहभंग हो गया था। उसने उन पर ओरोप लगाते हुए एक बार कहा था -''उन्होनें उसे सेक्स की आग में झोंक दिया था।''
निकोलई निकोलाएविच वोस्कोबोइनिकोव ( १८३८ - १८८२ ) : पेशे से एक इंजीनियर था (उसने मास्को नदी पर पत्थरों का पुल बनाया था ) लेकिन बाद में पत्रकार हो गया था। इस पत्र के लिखे जाने के समय वह ' ए लाइब्रेरी फार रीडिगं ' का सह-प्रकाशक था , लेकिन १८७० में वह मास्को गजेट से जुड़ गया था। अंततोगत्वा प्रधान संपादक का सहायक बन गया था।
उपरोक्त पत्र लिखने के कुछ सप्ताह पश्चात्, दोस्तोएव्स्की ने कोपेनहेगन में अपने मित्र रैंगेल को जुआ में अपने हारने की बात स्वीकार करते हुए पत्र लिखा था और उससे १०० डेनिस रिग्स डालर भेजने का अनुरोध किया था। आखिरकार रैंगेल ने वह राशि उन्हें भेजी थी।
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2).
पीटर्सबर्ग , मार्च १४ , १८६०
अत्यंत स्नेही और अविस्मरणीय अलेक्जेंड्रा इवानोव्ना ,
कल मैं स्टीपेन दि्मत्रीएविच से मिला (मैं उनसे मिलने गया था)।
उन्होनें मुझे आपके दो पत्र दिखाए और मुझसे कहा कि आपने हमें याद किया है। उसके लिए मैं आपको अपना अभिवादन भेजता हूँ और आपके हाथों को चूमता हूँ ।.
मुझे इस बात से अत्यधिक प्रसन्नता है कि मास्को में उन्होनें आपका अच्छी प्रकार स्वागत किया। मैनें प्लेचेएव को लिखा और उन्हें याद दिलाया था कि आपके आगामी
प्रथम अभिनय की घोशणा ' मास्को मेसेंजर ' में अवश्य करें। मैनें ऐसा कुछेक शब्दों में किया , क्योंकि वह स्वयं सब जानते हैं। मैं आपको बता नहीं सकता कि मैं कितना चाहता हूँ कि मैं आपके प्रथम प्रदर्शन के समय उपस्थित रहूँ। . मेरा विश्वास है कि मेरे भाई का ' पवित्र सप्ताह ' के पश्चात् व्यवसाय के लिए मास्को जाने का विचार है, और मैं अवश्य ही उसके साथ होऊंगा, इसलिए संभावना है कि मैं आपके किसी एक प्रारंभिक प्रद र्शन के समय उपस्थित रहूंगा। आपने हम सभी के पीछे इतनी अच्छी सहानुभूति और प्र शंसा छोड़ी है कि मैं सद्भाव अभिव्यक्त करने का इच्छुक हूं ।
स्टीपेन दि्मत्रीएविच कुलीकोव परिवार के साथ रह रहे हैं , जिनसे मैं परिचित हो गया हूँ। मैं उनसे मिलने दो बार गया, पहली बार आपके जाने के अगले दिन , जब मैनें उन्हें घर पर नहीं पाया था। मैं कल भी गया था। हमने आपके विषय में बहुत-सी बातें कीं। मैनें आपका पोट्रेट देखा। मैनें आपकी दूसरी तस्वीरें भी देखीं। एक छोटी तस्वीर, जिसमें आपके बाल छोटे और अधिक ही गोलाकार ( गिलौरीदार) हैं। लेकिन मुझे आपका बड़ा पोट्रेट अधिक पसंद आया। वह बिल्कुल आपकी तरह है, जैसी इन दिनों आप हैं।
अचानक दि्मत्रीएविच ने मुझसे पूछा , ''आपने मैकोव को बताया कि अलेक्जैंड्रा इवानोव्ना से कुछ पैसे गुम हो गए थे ? उन्हें इस विषय में जानकारी कैसे हुई ? मैनें मैकोव को देखा तक नहीं है।'' फिर उन्होंनें मुझसे आगे पूछा, '' और आप जानते हैं कि उसने कितने गुमाए थे ? ''
मैनें उनकी ओर देखा और भलीभांति नहीं समझ पाया कि कि क्या कहूं। उन्हेाने देखा कि वह जानते थे कि मुझे नुकसान के विषय में जानकारी थी, अत: मैं बोला ,
'' मैनें सुना था कि वह दो रूबल थे।'' आप क्या कह रहे हैं ? '' वह बोले , '' वे ३२० रूबल थे। उसने आपसे क्यों नहीं बताया ? ''
तत्पश्चात् मैनें उत्तर दिया कि आपने मुझे और मेरे भाई से कहा था और तब मैनें सोचा था कि वह एक मजाक था ,क्योंकि आप बिल्कुल परेशान दिखाई न दी थीं और केवल अपनी पैकिगं और जाने में दिलचस्पी दिखा रही थीं।
स्टीपेन दि्मत्रीएविच ने तब पूछा कि मैं मास्को जाने का विचार तो नहीं कर रहा। मैनें कहा कि संभवत: मैं ' पवित्र सप्ताह ' के बाद आपने भाई के साथ जाऊं , और उन्होनें कहा कि संभवत: वह स्वयं भी जा सकते हैं। तब उन्होनें कहा मैं आपको लिखूं ( वास्तविक बात यह है , मैं उससे पहले ही आपको लिखने की सोच रहा था ) . मैनें कहा कि प्ले चेएव के पत्र के साथ मैं आपके लिए भी एक पत्र संलग्न कर दूंगा और उनसे कहूंगा कि वह आपको दे दें। वह बोले , '' अथवा मेरे पत्र में ( लिख देना ) । और वह उसे मिल जाएगा। '' मैं उनसे कल मिल्युकोव के यहां मिलूंगा और कहूंगा कि मैं आपको पहले ही पत्र भेज चुका हूँ।''
मैं कल्पना कर सकता हूं कि आप कितना व्यस्त हैं । आपका समय कितना खलबली-पूर्ण है, और आपने अपने काम को कितना आत्मसात कर लिया है। एक नयी जिन्दगी ! ईश्वर करे कि आप जीवन में इस छोटे महापरिवर्तन और संकट का आनंद प्राप्त करें। यहां लोग आपको बहुत अधिक स्मरण करते हैं और आपके विषय में चर्चा करते हैं। और मैं दूसरे से कहीं अधिक। अलेक्जैंडा्र इवानोव्ना, वह अवसर आपको याद है, जब मेरे भाई के यहां डिनर के समय, आपने मुझसे कहा था कि मेरा चेहरा कितना उदास और मांसरहित है ? तब आप मेरे चेहरे पर खूब हंसी थीं। मैं उस सब पर सोचता हूँ और अनुभव करता हूं कि मुझे आपसे मिलना, बात करना और आपके हाथों को चूमना चाहिए। आप जानती हैं, आपकी जो अंतिम छवि मेरे पास है वह स्टेरोझेन्को के यहां हमारी अंतिम मुलाकात की है ? सामान्यतया , जब कोई किसी के विशय में सोचता है, आखिरी मुलाकात की छवि ही उसके मस्तिष्क में उभरती है ।
यदि मुझमें कॉमेडी का एक भी अंक लिखने की मामूली-सी ही प्रतिभा होती, मैं आपके लिए एक अवश्य लिखता । मैं प्रयत्न करना चाहता हूं । यदि मैं सफल हुआ (दूसरे ही उसके निर्णायक होगें ), उसे मैं आपके प्रति अपने गहन आदर के प्रतीक-स्वरूप आपको भेंट करूंगा।
यहां नीरसता है, वास्तव में गजब की नीरसता । मौसम खराब है । मुझे करने के लिए बहुत से छोटे-मोटे काम होते हैं , जब मैं केवल लिखना चाहता हूं । आप कल्पना नहीं कर सकतीं कि यह सब कितना उबाऊ और घृणित है , जहां तक मेरा संबधं है। मुझे ताज्जुब है कि वसंत थोड़ा-सा भी स्फूर्ति नहीं लाएगा । यदि मैं इस बदबूदार पीटर्सबर्ग से सप्ताह या अधिक ( दिनों ) के लिए भाग सकता ! लेकिन कौन जानता है , कदाचित् हमारा मास्को के लिए पलायन अंतत: कार्यान्वित हो जाए !
विदा , सदैव अत्यधिक कृपालु और सम्मानित अलेक्जैंड्रा इवानोव्ना । कृपया मेरी काट-छांट और बिल्लियों जैसी घसीट लिखाई से उत्तेजित न हों । केवल एक चीज, मेरा हस्त-लेख ही केवल वह चीज है जिसमें नेपोलियन के साथ मेरी समानता है , और तब , मैं दो पंक्तियां भी बिना संशोधन किए लिखने में असमर्थ हूँ। विदा ! मैं पुन: आपके नन्हें हाथों को चूमता हूँ और अत्यंत ईमानदारी-पूर्वक , अपने ह्यदय के अतंरतम से आपके जीवन में सब कुछ शुभ , निश्चिंत , निर्मल और फलीभूत होने की दुआ करता हूं। .
असीम आदर सहित ,
सदैव आपका --
फ्योदोर दोस्तोएव्स्की
अलेक्जैंड्रा इवानोव्ना शूबर्ट (१८२७ - १९०९ ) उर्फ कुलीकोवा एक ख्यातलब्ध अभिनेत्री थी। जिसने अपना पहला अभिनय प्रदर्शन पीटर्सबर्ग में १८४३ में किया था। उसने एक अभिनेता एम.शूबर्ट से विवाह किया था, और उसकी मृत्यु के एक वर्ष पश्चात् १८५४ में स्टीफेन दि्मत्रीएविच यनोवस्की से विवाह किया था, जो एक फिजिशियन और दोस्तोएव्स्की का अच्छा मित्र था। उसने अलेक्जैंड्रा इवानोव्ना के अभिनय का विरोध किया था। पति के विरोध के बावजूद अभिनय के लिए वह मास्को चली गयी थी। दोस्तोएव्स्की अलेक्जैंड्रा इवानोव्ना से प्रेम करने लगे थे और पति-पत्नी के टकराव को अपने लिए अनुकूल माना था। वास्तव में वह उससे विवाह के इच्छुक थे और किसी न किसी बहाने उससे मिलने के लिए उन्होंनें कई बार मास्को की यात्राएं की थीं।
मास्को मेसेंजर ( मास्काव्स्की वेस्तनिक ) एक राजनैतिक और साहित्यिक पत्रिका थी जो १८५९ से १८६१ तक प्रकाशित होती रही थी। प्ले चेएव उसके संपादकीय बोर्ड में थे ।
कुलीकोव संभवत: अलेक्जैंड्रा इवानाव्ना के भाई के परिवार के लिए संबोधित किया गया है। उसका भाई निकोलई इवानाविच कुलीकोव ( १८१५ - १८९१ ) प्लेराइटर , अभिनेता , और मंच निर्देशक था ।
`अपने संस्मरणें में अलेक्जैंड्र इवानोव्ना ने एक घटना का उल्लेख '' अपने पति से गोपनीयता'' के अंतर्गत किया था. उसने थिएटर प्रशासन से ३०० रूबल उधार लिए थे और फिर '' घर पहुंचने से पहले मैनें पैसे गुमा दिए -- मैनें शायद स्लेज में यात्रा करते समय गिरा दिए '' कहा था।
अलेक्सेई पेत्रोविच स्टोरोझेन्को १८०५ - १८७४ एक उपन्यासकार था और लेखकों और अभिनेताओं के सर्कल का एक सदस्य था।
दिवाली लक्ष्मी का त्योहार मानी जाती है, लेकिन आमतौर पर आती है महीने के अन्तिम सप्ताह में। ऐसी स्थिति में, व्यापारी तो फिर भी लक्ष्मी-पूजन कर लेते हैं, पर बेचारे सर्विस-मैन मन-ही-मन चाव करते रह जाते हैं। महीने का आखिऱी सप्ताह आते-आते उनकी जेब पूरी तरह खाली हो जाती है और राशन, सब्जी, पै्रस आदि सबके बिल बकाया। फिर छुटि्टयां भी दो-चार न पड़ें, तो पटाखे फुस्स हों या न हों, उनका मन ज़रूर फुस्स हो जाता है।
दशरथ-नन्दन रामचन्द्र जी तो दिवाली के दिन अयोध्या वापिस आ गये थे, लेकिन हमारे लघुकथा-नायक रामचन्द्र अक्सर घर नहीं पहुंच पाते। वैसे उनके मन में इस दिन अपने घर पर, घरवालों, बूढ़े मां-बाप के पास होने की इच्छा भगवान राम से भी अधिक रहती है। कारण, रामजी के पिताजी तो स्वर्गवासी हो गये थे, पर इन रामचन्द्र के पिताजी, भगवान की कृपा से, अस्सी वर्ष की उम्र में भी, अभी तक सही-सलामत हैं। पिता-सुख इनके भाग्य में खूब लिखा है।
इसे संयोग ही समझिये कि इस बार दिवाली के लक्ष्मी-पर्व पर रामचन्द्र की जेब सौ-सौ के नोटों से भरी है। कुछ पहले महीने की तनखा़ह लेट मिली और कुछ दिवाली पहले आ गई। यह भी संयोग ही है कि इस बार छुटि्टयां भी, दो-एक दिन की बजाय, पूरे पांच दिन की पड़ रही हैं। अत: वह बड़े खुश हैं। चलो इस बार तो दिवाली पर घर होंगे। मां-बाप बूढ़े हैं, पता नहीं कब क्या हो जाये !
"सीता!" मान लीजिये यही उनकी पत्नी का नाम है-"कल सुबह पांच-बीस वाली बस से घर चलेंगे, दोपहर तक पहुंच जायेंगे। इसी हिसाब से सारी तैयारी रखना।"
"क्या करेंगे घर चलकर! हर साल तो दिवाली सूखी निकलती ही है, इस बार वक्त़ पर तनखा़ मिली, तो घर के लिए बोरी-बिस्तर बांध लो। मैं पूछती हूं, सिवाय परेशानी के क्या मिलेगा वहां जाने से ? पांच-सात सौ से कम खऱ्च नहीं होगा।"
"अरे भई, तुम समझती क्यों नहीं हो ! बात पैसे की नहीं, भावना की होती है। त्योहार के मौक़े पर अपने बूढ़े मां-बाप के पास होना क्या कम है ?"
"नहीं, मैं नहीं जाऊंगी। जाना ही है, तो आप चले जाओ। आपको तो अपने मां-बाप के सिवाय किसी का ध्यान ही नहीं है। लेकिन मुझे तो घर का, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का, सबका ध्यान रखना है।"
"भाग्यवान्, सर्दी शुरू हो गई है। घर जाकर यह भी तो देखना है कि किसके पास कपड़े-बिस्तर हैं और किसके पास नहीं। जायेंगे, तो दोनों काम हो जायेंगे।"
"आप सोचते हैं, आप बनवायेंगे, तो ही कपड़े-लत्ते बनेंगे उनके लिए ! आपके और भी तो तीन भाई हैं, तीनों कमाते हैं। क्या उनको बिल्कुल ध्यान नहीं होगा अपने मां-बाप का, वे बनवा देंगे।"
खै़र, निष्कर्ष यह कि सीता घर जाने को बिल्कुल तैयार नहीं हुई। अकेले अयोध्या जाकर रामचन्द्र जी भी क्या करते ! उन्हें लगा, जैसे वनवास का एक वर्ष और बढ़ गया है। 'काश, इस बार भी तनखा़ह समय पर न मिलती ! जेब खाली होने के कारण घर न जा पाने का कम-से-कम बहाना तो होता।` मन-ही-मन वह सोचते हैं।
2)
टॉलरेन्स
दिन में देखी 'शहीद` फ़िल्म उसकी आंखों के सामने घूम रही है। भगतसिंह के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है... बऱ्फ की शिला पर लिटाया जाता है... चाबुकों से पीटा जाता है... गन्दा खाना दिया जाता है। फिर भी वह अपनी मां को पत्रा में लिखता है-"तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करना। यहां के लोगों का बर्ताव बहुत अच्छा है। जेलर बड़े मेहरबान हैं।"
"ग्रेट टॉलरेन्स !" उसके मुख से निकलता है। उसका मन भगतसिंह के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। वह धीरे-से करवट बदलता है।
रील फिर चल पड़ी। उसकी पत्नी उसके बराबर सर्विस करती है। सुबह-शाम घर का काम करती है, वह अलग। बीमार भी रहती है। वह रोज़ शराब पीकर गई रात घर लौटता है। बात-बात पर तुनकता है, डांटता है, पीटता भी है। वह घर पत्रा लिखती है-"मेरी चिन्ता मन करना मम्मी ! ये बहुत ही अच्छे हैं। सच, इनके साथ रहकर बहुत खुश हूं मैं।"
'गे्रट टॉलरेन्स !` उसके मुख से फिर निकलता है। उसका मन अपनी पत्नी के प्रति प्यार से भर आता है। वह फिर करवट बदलता है।
"ऐं !" वह अर्द्ध निद्रा में ही चौंकता है। पत्नी अभी तक उसके पैर दबा रही है। वह गुस्से से गुर्राता है-"कमबख्त़, अभी तक सोई नहीं ! आधी रात हो गई।"
और पत्नी को एक लात जमाकर, वह एक बार फिर करवट बदल लेता है।
जैसे ही आप व्यास नदी को अपनी बगल में कुलाचें मारते देखते हैं अंतहीनता का एक हृदयस्पर्शी भाव आपको एक मधुर गीत की भांति गुनगुनाता है। मनाली की ओर बढ़ते हुए जैसे ही आप मंडी से आगे बढ़ते हैं, यह न जाने कहां से प्रकट होती है। यह आपका साथ कभी नही छोड़ती और आपको हिम के समान धवल प्रकृति के अंचल में ले जाती है।ब्यास गोल चट्टानों के ऊपर से बहती हुई एक प्रश्नवाची मुद्रा में पर्वत के आधार तक बहती रहती है। कभी नदी का पाट चौड़ा होता है तो आप जलराशि की शांत सतह को देख सकते हैं जिसके नीचे तेज बहाव दृष्टिगोचर होता है। कभी कभार टेढे मेढे पर्वत पाट को संकरा कर देते हैं और यह एक दूसरे के बेहद करीब आ जाते हैं। फिर एक तंग घाटी व्यास को अवरुद्ध कर देती है और यह एक उफनती धारा में बदल जाती है। मार्ग के दोनों ओर सेव, बादाम और शहतूत के पुष्प गुच्छ अपने विभिन्न रंगों को आपकी नजरों और अप्रैल के सूने आकाश में बिखरा देते हैं।
सड़क नदी के तट के करीब से गुजरती है और आप नदी की गुनगुनाहट सुन सकते हैं। मौसम अपना वादा भूल जाता है और उसमें सहसा परिवर्तन दिखाई देता है। पिघळती हुई हिम प्रचुर मात्रा में जल में परिवर्तित होकर सड़क के ऊपर से एक अकड़ भरे जुलूस की भांति गुजरती है। आप बिना जाने-बूझे एक छोटी नदी को पार कर जाते हैं। यह सड़क वैसी ही बेवफा है जैसी एक रखैल।
ब्रेक खराब हो जाने के कारण हमें मरम्मत के लिए आट में रुकना पड़ा। इसके कारण थोड़ी देर बाद रात के आगमन के संकेत दिखाई देने लगे।विशाल पर्वतों का दृश्य जो निगाहों के समान सीधा बढ़ता है वास्तव में प्रभावशाली लगता है। अनेक गुफाएँ और वृत्ताकार वृक्ष धीरे-धीरे अँधेरे के आगोश में खोते जाते हैं। जब हम आगे बढ़े तो एक रोयेदार पूंछ और छरहरे टांगों वाली चालाक लोमड़ी हमारा रास्ता काट गई।
चांदनी से नहा कर हिमाच्छादित शिखर चांदी के समान दमकते हैं। चंद्रमा की मृदु किरणें पर्वत के जिस भाग पर पड़ती हैं वह उनमें भीग कर एक विचित्र आभा से आलोकित हो उठता है। छिपे हुए भाग अँधियारी परछांई की भांति दिखते हैं और एक रहस्यमयी आकर्षण उत्पन्न करते हैं। ब्रेक का खराब होना वाकई में वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि तभी हमें हिम की धवल छवि के सौंदर्य का रसपान करने को मिला। अपने गंतव्य स्थल पर पहुंचने से पूर्व ही हमने व्यास नदी के तट पर डेरा डाल दिया। बहते हुए जल की कलकल ने रास्ते की थकान को उतार दिया।
मनाली की सुबह अलौकिक होती है-आँखें खोलने पर आपके समक्ष एक अद्भुत नजारा होता है। चारो तरफ हिमाच्छादित शिखरों वाले विशाल भव्य पर्वत वनदेवता की भांति खड़े दिखाई देते हैं। दूर उस स्थान पर जहां सोलंग और रोहतांग की घाटियां आरंभ होती हैं धौलाकार पर्वत हिम से ढके हुए दिखते हैं। प्रीनी हिमनद और इसकी एकाकी हमता चोटी तथा ढलाने क्रीम से ढकी सतह की भांति लगती है। समस्त क्षेत्र एक पात्र की भांति लगता है। जिसे मानो दोनों हथेलियां जोड़कर बनाया गया हो। इस आनंद से परिपूर्ण पात्र में मनाली शहर बसा है और जो अब ब्यास के दोनों ओर भी उग गया है। इस्पात के नाजुक पुल से जब आप गुजरते हैं तो वह चरमराता है और ऐसा लगता है कि मानो वह बहती बयार, गड़गड़ाती नदी और वर्षा की बूंदों की टपटपाहट को प्रतिध्वनित कर रहा हो। वैसे वह इस शहर के विभिन्न भागों को जोड़े रखने का काम करता है।
शांत बैठिए और चारों तरफ बिखरे सौंदर्य का निगाहों से रसपान कीजिए। पर्वत के सामने जमी हुई नदी को ढूंढ निकालने का आनंद उठाइये। बर्फीली हवा ने इसके बहाव को अवरुद्ध करके इसे आगे बढ़ने से रोक दिया है। यह पर्वत की दृढ़ता से मंत्रमुग्ध होकर ढहर सी गयी लगती है। आपकी नजरें घूमती हुई पर्वतों को सहलाती हैं और उनपर सब तरफ खड़े चीड़ के वृक्षों के बीच जमी हिम की चादरों का आनंद उठाती हैं और सहसा उन्हें पर्वतों से झूमता लहराता जल प्रपात दिखाई देता है। पर्वतों के शिखरों से उत्पन्न निर्मलतम वरदान। दूर से आप इसकी आवाज नहीं सुन सकते लेकिन जब आप इसे इतनी ऊँचाई से उतरते हुए देखते हैं तब आपको इसकी प्रचंडता का अहसास होता है।
यदि मौसम सर्द हो जाता है और आप कंपकपी महसूस करते हैं तो यकीन मानिए आपको दूर ऊंचाई पर हिमपात देखने का अवसर मिलेगा। चीड़ के हरे भरे पेड़ों से ढके पर्वत धवल होने लगते हैं। रूई के फाहों के समान गिरती हिम हर संभव वस्तु और दरारों को हिम की चादर से ढक देती है। हरियाली घटती जाती है और धवलता बढ़ती जाती है। यह प्रकिया वास्तव में मंत्रमुग्धकारी है।
मनाली शहर का दृश्य आपके भीतर आनंद और अवसाद दोनों की अनुभूति कर देता है। शहर की सुंदरता का आनंद और भंगुरता की पीड़ा साथ-साथ उत्पन्न होती है। यह कल्पना उंची उड़ान भरती है और आप स्वप्न जगत में खो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो आप हिम रानी को परिधान धारण करते हुए देख रहे हैं। जब वह अपने अमूल्य आभूषणों को धारण करने लगती है तो सहसा उसकी आभूषण पेटिका खुल जाती है और उसके सुंदर मोती, नीलम, हीरे, पुखराज, स्वर्ण कंठहार सभी इस आनंद से परिपूर्ण घाटी में बिखर जाते हैं। ब्यास के तट और आकाश की ओर बांहें फैलाते हुए पर्वतों में जहां जहां यह आभूषण गिरे वह स्थान जगमगा उठे।
चमचमाती हिम को स्पर्ष किए बगैर आप यहां से लौट नहीं सकते। ग्रीष्म के दौरान हिम की मात्रा घट जाती है। लेकिन फिर भी आपको मनाली से 12 कि.मी. दूर केयलोग मार्ग पर एक एक मनोरम गांव कोठी से कुछ ही दूर हिम को स्पर्श करने का अवसर मिल सकता है। शीतकाल के दौरान हिम समस्त मनाली को अपने आगोश में ले लेती है। हिम से ढकी ढलानों का आप आनंद उठा सकते हैं। इन पर एक बच्चे के समान फिसलने का आनंद अद्भुत है। चढ़ाई चढ़ने में जिनको कठिनाई होती है उन्हें विकराल सी दिखने वाली याक की सवारी मिलती है जबकि चुस्त दुरुस्त लोग चपल गति से इन ऊंचाइयों का सफर तय करते हैं।
अब तक आप सर्दी से किटकिटाने लगे होंगे। वापसी में वशिष्ठ गांव में ठहरिये जहां गंधक के गर्म सोते हैं। इनमें स्नान करने से आपके शरीर में पुनः ताजगी और उष्मा का संचार होने लगेगा। श्रद्धालुओं के लिए ब्यास के दूसरे तट पर हडिम्बा मंदिर है। हडिम्बा महाभारत के धर्मग्रन्थ में वर्णित भीम की पत्नी थी। यह मंदिर 1553 ईसवी का है।
कुल्लु के विशेष शालों की खरीद के उत्सुक लोगों को माल पर शापिंग करने से फायदा हो सकता है। इस क्षेत्र की अनगिनत सुन्दर स्त्रियां इनको हाथकरखों पर बुनती हैं। पर्वतों, मंदिरों, बागों पुष्पों से जुड़ी उनकी धारणाएँ इन बुनाइयों में दिखाई देती हैं। उनके विचारों के इन्द्रधनुषी रंग और हृदय से उपजी भावनाएं इन कलावस्तुओं में चहुंओर दिखाई देती है।
यदि आप ट्रेकिंग के शौकीन हैं तो कुछ समय और यहां रुकिए। मनाली वह स्थान है जहां आपके सशक्त पैरों और बलशाली फेफड़ों का परीक्षण होता है। मनाली से रानी सुई 420 0 मीटर, लामा डुघ से (11कि.मी., 2 दिन) मनाली से भुन्चर, (रूमसु, चंद्रखनी, मलाना, कसोल, जरी से होकर 74 कि. मी., 7 दिन और चंद्रखनी पर 3650 मीटर की ऊंचाई को नापते हुए भी) और मनाली से केलोंग (हमता, चंद्रताल और बरालछा दर्रों से होकर) आदि अनेक ट्रेकिंग मार्ग हैं जो आपको जीवन पर्यंत याद रहेंगे। प्रकृति की मनोरमता और विराटता का इतना घनिष्ठ संसर्ग आपको शायद ही कहीं अनुभव करने को मिलेगा।
मनाली की धौलाधर पर्वत श्रंखला के सौंदर्य से आप शायद ही कभी तृप्त हो पायें। दिन के विभिन्न पहरों के साथ साथ यह विभिन्न छटाएँ बिखेरती हैं। सूर्योदय पर गुलाबी रंगत, दोपहर में चटकीली आभा, संध्याकाल में मंडराते बादल और फिर हिमाच्छादित शिखरों के पीछे से उभरते प्रेमासिक्त चंद्रमा की किरणें शिथिल दिलोदिमाग को असीम शांति से सिक्त कर देती हैं।
ह्यूरान नदी के किनारे डक्की बत्तख अपने छोटे से बच्चे व्ह्यटी के साथ रहती थी। डक्की ने व्ह्यटी को सख़्त हिदायत दे रखी थी कि वह ह्यूरान नदी के ब्रिज तक तो अकेला तैर सकता है, पर ब्रिज के उस पार वह तभी जाए जब उस के साथ कोई हो। व्ह्यटी एक आज्ञाकारी बच्चा था, इसलिए कभी अकेला वहां नहीं जाता।
एक दिन मौसम बहुत सुहाना था। व्ह्यटी नदी में तैरने लगा। तैरते-तैरते वह गाना गुनगुनाने लगा। उसे अब बहुत मज़ा आने लगा था। तैरते-तैरते वह ह्यूरान ब्रिज के पास आ पहुंचा। पर अभी व्ह्यटी का घर वापस जाने का मन नहीं था। वह और आगे तैरने लगा।
तैरते-तैरते वह बहुत आगे जंगल में चला गया। तभी अचानक आवाज़ आई-छपाक! व्ह्यटी ने पीछे मुड़कर देखा।
‘अरे यह तो फ़ाक्सी लोमड़ी है’। वह डर गया। उसे अब मां की सीख याद आने लगी-‘अकेले ब्रिज के पार नहीं जाना’।
पर अब क्या हो सकता था- कुछ नहीं! तभी उसे याद आया, मां ने तो यह भी कहा था कि खतरे के समय घबराना नहीं चाहिए।
बस फ़िर क्या था, व्ह्यटी तेजी से तैरने लगा।
पर फ़ाक्सी भी कहां कम थी। वह भी तेजी से पीछे-पीछे तैरने लगी।
तैरते-तैरते व्ह्यटी एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां नदी बर्ड पार्क के पास से गुजरती थी। पार्क में बहुत से लोग थे।
‘चलो, अब तो मैं फ़ाक्सी से बच जाऊंगा’ सोचते हुए व्ह्यटी नदी के किनारे-किनारे तैरने लगा, जबकि फ़ाक्सी लोगों को देख नदी के बीचोबीच पानी के नीचे-नीचे तैरने लगी।
प्यारे से व्ह्यटी को देख नदी के किनारे खेल रहे जैवी ने उस पर अपना छोटा सा मछ्ली का जाल फ़ेंका। व्ह्यटी भी यही चाहता था, इसलिए वह पांच साल के उस बच्चे के जाल में खुद ही फ़ंस गया।
जैवी अपने जाल में व्ह्यटी को देख बहुत खुश हुआ। उसने व्ह्यटी को अपनी टोकरी में डाला और खुशी-खुशी घर की ओर चल दिया। यह देख फ़ाक्सी मनमसोस कर रह गई। और चुपके-चुपके पानी के नीचे-नीचे जंगल की ओर वापस तैर चली।
उधर जैवी व्ह्यटी को लेकर घर पहुंचा। मां ने जैवी से व्ह्यटी के बारे में पूछा। जैवी ने सारी बात कह सुनाई। सारी बात सुन मां बहुत खुश हुई। फ़िर जैवी से कहा कि वह हाथ धोकर जल्दी से खाना खाने आ जाए। जैवी हाथ धोकर डाइनिंग टेबल पर आ गया। उसने व्ह्यटी की टोकरी अपने पांव के पास ही डाइनिंग टेबल के नीचे ही रख दी।
इधर जैवी खाने में मस्त हुआ, उधर घर के बाहर बैठी जैवी की बिल्ली ब्लैकी चुपके से घर में घुसी और डाइनिंग टेबल के नीचे से टोकरी समेत व्ह्यटी को ले गई।
मन ही मन व्ह्यटी को खाने का सोच ब्लैकी तेज कदमों से खुशी-खुशी नदी की ओर चल दी।
अब व्ह्यटी को तो अपने बचने की कोई उम्मीद ही नहीं बची। वह रह-रहकर मां डक्की की सीख याद करने लगा, पर अब तो कुछ हो ही नहीं सकता। डर के मारे उसने तो अपनी आंखें बंद कर ली।
कुछ देर बाद अचानक टोकरी रुक गई। डरते-डरते व्ह्यटी ने आंखें खोली।
‘अरे, टोकरी तो रुक---’ कह उसने नजर इधर-उधर दौड़ाई। ब्लैकी, डब्बी कुत्ते से उसे छुपा रही थी।
‘इससे अच्छा मौका बचने का फ़िर नहीं मिलेगा’ सोच बिना देर किए व्ह्यटी टोकरी से कूदा और छिपता-छिपाता नदी की तरफ़ भागा। जब तक ब्लैकी को अपनी गलती का अहसास होता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नदी की बहती धारा में व्ह्यटी कूद चुका था। और वह एक ऊंची सी लहर पर सवार हो गया। इस लहर ने उसे ह्यूरान ब्रिज के पास उतारा। यह देख व्ह्यटी की जान में जान आ गई। शाम का अंधेरा घिर चुका था। वह तेजी से घर की ओर बह चला।
दूर से देखा मां घर के बागीचे में बेसब्री से टहल रही थी। वह तेजी से तैरता मां के पास जा पहुंचा।
‘तुम इतनी देर अकेले कहां रहे’ कहती हुई डक्की उसे घर के अंदर ले गई।
‘नहीं, मां मैं अकेला नहीं था’ कह वह गरम-गरम सूप पीने के लिए डाइनिंग टेबल पर मुसकुराते हुए बैठ गया।
अरुणा घवाना
2250, Nixon Road
Ann Arbor
Michigan, USA
गाँधीजी के बन्दर तीन, सीख हमें देते अनमोल।
बुरा दिखे तो दो मत ध्यान, बुरी बात पर दो मत कान, कभी न बोलो कड़वे बोल।
याद रखोगे यदि यह बात , कभी नहीं खाओगे मात, कभी न होगे डाँवाडोल ।
गाँधीजी के बन्दर तीन, सीख हमें देते अनमोल। -बालस्वरूप राही