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                            सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर



 

 


                                          अँक-8-वर्ष-1

       " An eye for eye only ends up making the whole world blind.

            ...Culture Of the mind must be subservient to the heart."

                                       - Mohan Das Karamchand Gandhi. 

 



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अपनी बात



 

"एक अर्धनग्न बूढ़ा जो ग्रामीण भारत में बसता था, उसके निधन पर मानवता रोई ।"

-लुईस फिशर  

आखिर क्या था उस अर्धनग्न क्षीण-काय में, उसके व्यक्तित्व में जिसने विवश किया संपूर्ण विश्व को कि न सिर्फ वे उसकी बातें ध्यान से सुनें वरन् मानें भी ! 

एक बूढ़ा... जिसका मन सिर्फ भारत के गांवों में बसता था, भूखे नंगों और असहायों की वेदना से कराहता था, जो हर भूखे, नंगे लाचार का आत्मीय था ... दीन-बंधु था। समाज से निष्काषित कोढ़ी, अपराधी, सब जिसके अपने थे, उस ऐसे संत की लड़ाई कभी अन्यायी से नहीं, अन्याय से  रही। समाज की कुरीतियों व अत्याचार से थी। ईसा मसीह की तरह पाप से थी, पापियों से नहीं। यह वही बूढ़ा है सच ही जिसके जीवन का आधार था... पहला पाठ और सर्वोपरि सिद्धांत भी। गांधी जी ने न सिर्फ सत्य और अहिंसा में विश्वाश किया अपितु आजीवन इन्हें धर्म की तरह निभाया भी और यही नहीं, रास्ते में आई हर बाधा, हर तकलीफ को पूजा और व्रत के आनन्द की तरह ही लिया। यही वज़ह थी कि उनके सत्याग्रह के आगे धुरंधर और षडयंत्री सब झुक गए। ताज़ और तख्त उलट गए ! 

संरक्षण, स्वाधीनता और देश के खोए वर्चस्व के साथ-साथ सच की ताकत से भी अवगत कराया बापू ने हमें। हर गलत बात का अहिंसक और संयमी विरोध करना सिखलाया बापू ने हमें। समझाया कि कैसे यहीं आकर हम पशुओं से अलग और अधिक सक्षम हैं। शारीरिक बल से तो पशु संसार चलता है, मानवता की ताकत मन जीतने या मनचाहे परिवर्तन में है। शत्रु को नष्ट तो किया ही जा सकता है परन्तु यदि मित्र बना सकें तो यही सबसे बड़ी जीत है और आजीवन ऐसा ही करके दिखाया भी उस दुबले-पतले महात्मा ने। कमज़ोरी या किसी अभाव से डर पैदा होता है और डर से शत्रुता व हिंसा। यदि हम दूसरे के डर और कमज़ोरी...ज़रूरत और अभाव को समझ सकें (साथ-साथ अपने डर और कमजोरियां भी), तो संभवतः दुनिया से वैमनस्य, सारी हिंसा स्वयं ही खत्म हो जाएगी ! परन्तु यह सब इतना आसान भी तो नहीं, कभी 'स्व' आगे आ जाता है, तो कभी 'कमजोरी' या ' युक्ति' !

यहीं पर धैर्य की जरूरत है जो आज शायद कहीं है ही नहीं, क्योंकि धैर्य या सहन-शक्ति तो तभी आएगी जब हम दूसरों को भी अपना-सा ही समझ पाएँगे, उनसे जुड़ पाएँगे!

वास्तव में गांधी जी ने कुछ भी नया या अनूठा नही कहा ...बस, वही कहा है जो हमारे धर्म ग्रन्थों में लिखा है या हमारे ऋषि मुनि जानते और कहते आए हैं। महावीर या बुद्ध ने जो कहा । बस फरक इतना है कि जो कहा या समझा बापू ने उसपर पूरी सच्चाई से विश्वास भी किया। अपने सिद्धान्तों का मनसा, कर्मणा, वाचा, तीनों से पालन किया। और यहीं आकर महान आत्मा साधारण आत्मा से भिन्न हो जाती है । आदमी, आदमी नहीं सन्त या महापुरुष हो जाता है। इतना संयम, इतनी निष्ठा और इतना धैर्य, आम आदमी के बस की बात ही नहीं। 

भारत के अपने समय के शीर्षस्थ उद्योगपति घनश्याम दास बिरला ने गांधीजी की मृत्यु पर श्रद्धांजली देते हुए कहा थाः"मानवीय इतिहास में यह अनोखी बात है कि एक अकेला व्यक्ति एक ही समय योद्धा, मसीहा और संत तीनों था और उससे भी अधिक वह विनम्र और मानवीय था।" और शायद यही विनम्रता और मानवीयता थी जिसके बल पर गांधी जी सबके अपने बन पाए और उससे भी बड़ी बात है कि बने रह पाए।
अटूट संयम और विलक्षण आत्मबल ... उनके सत्याग्रह का आज पूरा विश्व कायल है ! जन्मदिन, दो अक्टूबर को आज विश्व ने अहिंसा दिवस की तरह मनाने का आवाहन किया है...शायद हिंसा, स्पर्धा और घृणा से जर्जर विश्व, उनके जीवन से, उनके आदर्शों से कुछ सीख ही सके...कुछ पा ही जाए...विनाश के कगार से वापस मानवता की ओर मुड़ ही ले...मिलजुलकर एक कोशिश तो करनी ही होगी! 
संत, सिपाही और सेवक का एक ही व्यक्तित्व में ऐसा अनूठा समिश्रण विरले ही हो पाता है और हम भारतीयों के लिए यह अतीव गौरव की बात है कि वो हमारे अपने बापू थे। आईंस्टाइन ने कहा है कि इस शताब्दी के सबसे ताकतवर और विलक्षण व्यक्तित्व थे मोहनदास करमचन्द गांधी... शायद सबसे बुद्धिमान भी। 

बुद्ध की दया और क्राइस्ट के सेवा भाव की साक्षात मूर्ति...ऐसे ज्योति-पुंज बापू के चरणों में लेखनी का भावभीना नमन। स्मृति-पटल पर से धुँधले पड़ते बापू के पद चिन्हों को श्रद्धा-सुमनों से सजाकर आपका अंतस् सुवासित करने का एक लघु प्रयास है लेखनी का यह अंक... उम्मीद है कि वह अक्षय सुवास चन्दन-वन बनकर न सिर्फ आपको अपनी ओर खींचेगी और सुवासित ही करेगी, अपितु आत्मा तक में रच-बस जाएगी... 

                                     -शैल अग्रवाल  

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ज्योति-पुँज बापू

           -सियाराम शरण गुप्त-

 

 

हम सबके थे प्यारे बापू

सारे जग से न्यारे बापू।

 

जगमग जगमग तारे बापू

भारत के उजियारे बापू।

 

लगते तो थे दुबले बापू

थे ताकत के पुतले बापू।

 

नहीं कभी डरते थे बापू

जो कहते करते थे बापू।

 

सदा सत्य अपनाते बापू

सबको गले लगाते बापू।

 

हम हैं एक सिखाते बापू

सच्ची राह दिखाते बापू।

 

चरखा खादी लाए बापू

हैं आजादी लाए बापू।


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बापू और हम



             आज जब बापू के विचारों और सिद्धान्तों की दुँदुभी कोने-कोने बज रही है, सोचने पर मज़बूर हूँ कि विश्व को तो छोड़िए, कितने हैं हम भारतीय, जो महात्मा व उनके आदर्शों के बारे में कुछ भी जानते हैं या जानने की कोशिश करते हैं... अंश मात्र आचरण में ढालने का साहस कर सकते हैं।

इस पीढ़ी के अधिकांश लोगों का गांधीजी से परिचय मात्र बड़ों के मुँह से सुना या किताबों से पढ़ा और जाना है... बचपन में मनाए गए चन्द विध्यालय के उत्सव...चन्द गानों और भजनों तक सीमित है। इधर कुछ सफल हिन्दी फिल्म जैसे 'लगे रहो मुन्ना भाई ' और ' गांधी माई फादर ' आदि ने एकबार फिर आज की युवा पीढ़ी का ध्यान  महात्मा की ओर आकर्षित किया है और गांधीजी व गाँधीवाद फिरसे चर्चा का विषय बने हैं। पिछले दशक में आई रिचर्ड एटिनबरो की फिल्म 'गांधी' ने तो भौतिक रूप से गांधीजी को विश्व के सामने मानो पुनर्जीवित ही कर दिया था।  

परन्तु गांधी जी खुद कभी किसी आडंबर या अपनी 'फैन-फौलोइँग ' या किसी भी तरह के गांधीवाद में कतई विश्वास नहीं करते थे । उनकी म़त्यु उपरान्त अवसरवादियों ने गांधी से जुड़ी हर चीज का बैसाखी की तरह खूब इस्तेमाल किया। यह पीढ़ी वो पीढ़ी है जो गांधीवाद के ऐसे युग से भी गुजरी, जब गांधी से जुड़ी खादी तक भृष्टाचार और बेइमानी का प्रतीक बनकर रह गई। इसे भी खूब भुनाया और चमकाया गया और इसका सहारा लेकर खूनी पाखंडी सभी ताकत की कुरसियों पर जा बैठे। जबकि गाँधीजी खुद यह मानते थे कि तुम एक बार शक के दायरे में आ जाओ तो फिर तुम्हारे हर आशय को संदिग्ध ही समझा जाएगा और बारबार परखा जाएगा। इसलिए कोशिश यही रहनी चाहिए कि कथनी और करनी ही नहीं, सोच तक एक हो... बुरा मत सोचो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, गांधी जी के तीनों बंदर भला किसे याद नहीं ! पर हजार अच्छाइयों के बावजूद भी यह वही गांधी थे जिन्हें ईसामसीह की तरह ही अपने सिद्धान्तों के लिए जान तक गंवानी पड़ी और अनन्य श्रद्धा के साथ-साथ कइयों के मन में महात्मा के प्रति कुछ अनुत्तरित विवादास्पद सवाल भी हैं जैसे किः     

 गान्धी अगर लौर्ड इरविन के साथ समझौते में जल्दबाजी नहीं करते तो शायद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीन-तीन देशभक्तों को फाँसी नहीं लगती।

 क्या गान्धी अब बस नोटों पर और फिल्मों में ही जिन्दा हैं?

क्या राष्ट्रपिता गान्धी अपने पुत्र के लिए अच्छे पिता नहीं थे वगैरह....

इतिहास कुछ भी कहे यदि हम आज के संदर्भ में और अपने नज़रिए से गांधी को जानना व समझना चाहते हैं तो हमें उनके विचारों और सिद्धांतो...उनके आदर्श और प्रेरणाओं को समझना होगा...समझना होगा कि क्या थी गांधी की सोच और ताकत। फिर गांधी का कितना अनुसरण हमें करना है...कितना उन आदर्शों को अपने जीवन में उतारने में समाज या हम सक्षम हैं ! यह फैसला खुद हमारा अपना होगा और हमारी आजकी जरूरतों के अनुसार होगा। 

हम सभी जानते हैं कि सत्य और अहिंसा गांधी  के चरित्र के दो सशक्त व स्थाई स्तंभ थे पर किस मिट्टी की बनी थी वह गांधी के मानस की जमीन जिसपर ये दोनों स्तंभ आजभी उसी मजबूती से खड़े हैं? आखिर क्या था गांधी जी का सत्य और अहिंसा का आग्रह...सत्याग्रह !  

दुरूह इन सवालों का जवाब गांधीजी ने खुद ही अपने लेखनी से बार-बार दिया है। अपने चरित्र और जीवन से बारबार समझाया है हमें और अपनी कथनी व करनी की एकरूपता मरते दमतक कायम रखी है। गांधी जी का सत्य और हिंसा में अडिग विश्वास था। उन्होंने सत्य के बारे में लिखते हुए कहा कि यदि हम सच को समझ नहीं पाते तो यह हमारी अपनी हार है, सच की नहीं।

गांधी जी ने अपने बारे में लिखते हुए कहा था कि मैं कोई स्वप्न दृष्टा नहीं हूँ, वरन् एक आम बेहद व्यवहारिक इन्सान हूँ जो मानवता का, दीन-दुखियों का उत्थान चाहता है...उनके जीवन की असह्य पीड़ा का अन्त चाहता है। समाज के अत्याचार और अन्याय का उन्मूलन चाहता है। और इसे मानवता शान्ति और अहिंसा से सच के मार्ग पर चलकर ही पा सकती है। यह रास्ता सिर्फ ऋषि-मुनियों का ही नहीं, आम आदमियों का भी है। जानवरों के पास शारीरिक बल के अलावा और कुछ नहीं होता परन्तु इन्सान के पास आत्मिक या आध्यात्मिक शक्ति है, जो शारीरिक शक्ति से ज्यादा ताकतवर और स्थाई है। 

कईबार ऐसा होता है कि हम विद्रोह करना चाहते हैं। सामने वाले की अभद्रता से उद्विग्न उसे मारना या डांटना...दंड देना चाहते हैं। परन्तु यदि तब उस एक पल में अपने को रोक सकें तो यही होगी अहिंसा। गांधी की अहिंसा का अर्थ था अत्याचार और अन्याय का शांत व संयमी विरोध। पाप को नष्ट करने के लिए पापी को नष्ट करना तो जरूरी नहीं। यदि अत्याचारी के आगे बिना झुके उसे हम बता सकें कि वह गलत है। उसकी सोच, उसकी करनी गलत है, तो यही गांधी का सत्याग्रह है...सत्य की जीत है। 

सत्य और अहिंसा का यह सिद्धांत जिस दिन व्यक्तिगत स्तर से उठकर विश्व-व्यापी हो जाएगा उसदिन सारी लड़ाइयाँ खुद-ब-खुद खतम हो जाएँगीं। यही गाँधीजी का सपना था और इसी एक सपने की खातिर अंततः उन्होंने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। 

गांधीजी यह भी जानते थे कि लिप्सा और स्वार्थमय मनुष्य के लिए यह सब इतना आसान भी नहीं , इसीलिए कहीं पर उन्होंने यह भी लिखा कि मैं खुद कभी-कभी अपने सिद्धान्तों पर जिस हद तक चलना चाहता हूँ नहीं चल पाता हूँ। हर व्यक्ति चल पाएगा, यह एक दुरूह सपना है फिर भी प्रयास ज़ारी रहना चाहिए। वह स्व-प्रचार या आत्म-श्लाघा में विश्वास नहीं करते थे। अपने अनुयाइयों से उनका कहना था कि तुम मेरे भक्त मत बनो, बस मेरे साथ रहो। 

आत्म-त्याग और आत्म-संयम हम भारतीयों के लिए ही क्या, पूरी मानवता के लिए कोई नया सिद्धांत नहीं (देश, व्यक्ति या सिद्धांतों के लिए कुर्बानियों के कई उद्धरण हमें मानव इतिहास में मिल जाएंगे )।  

गांधी जी के अनुसार हमारे ऋषि -मुनि जिन्होंने हिंसा के बीच रहकर अहिंसा वृत आजीवन पालन किया वो न्यूटन से बड़े विचारक और वेलिंगटन से बड़े योद्धा थे। अहिंसा क्रियाशील रूप में आत्मसंयम के साथ की गई आत्म संशोधन की एक निरंतर प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में मानसिक यातना और शारीरिक कष्ट दोनों ही हैं पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि अहिंसा कमजोर करती है। हम अत्याचारी के सामने मूक समर्पण कर देते हैं...अहिंसा का सेनानी तो अपने समस्त आत्मबल के साथ अपने सम्मान, धर्म और राष्ट्र के लिए आखिरी सांस तक लड़ता है और साथ-साथ अन्याय के अन्त की और अन्यायी के पुनःनिर्माण की नींव भी रखता है।

गांधी जी अनेकता की एकता में विश्वास करते थे। उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ भारत की एकता का ही नहीं, विश्व एकता का सपना देखरहा हूँ। यह वही सपना था जो हजारों साल पहले हमारे ऋषि मुनियों ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' के रूप में देखा था। बुद्ध,महाबीर, ईसा और पैगम्बर ने देखा था। विवेकानन्द ने जिसे पिछली शताब्दी में विदेशों में जाकर दोहराया था। 

गांधीजी के लिए स्वराज सिर्फ भारत की ही आजादी नहीं, दीन-दुखियों की आजादी थी। भारत के गांवों में बसे निरक्षरों और असहायों की आजादी थी। गांधी जी का मानना था कि जब मन पूरी तरह से निर्मल हो जाता है...स्वार्थ, घृणा और पाप की वहाँ जगह नहीं रहती, तब हमारे विचार दूसरों को छूने लगते हैं। परन्तु बुद्धिमान और व्यवहारिक गांधीजी यह भी जानते थे कि अपनी कोई भी इच्छा दूसरों पर लादी नहीं जा सकती। एक उनके सोचने या चाहने से कुछ नहीं होगा जबतक कि भारत और विश्व के मानस का हृदय परिवर्तन न हो। फिर भी उनका कहना था कि मुझे अपना यह सत्याग्रह तो जारी रखना ही होगा...मानवता को यह तो बताना ही होगा कि यह दुनिया, यह जीवन कितना सुन्दर और बहुमूल्य है...और इसे यूँ नष्ट मत होने दो ! 

एक शब्द में यदि गांधीजी के प्रति अपने सारे भावों को समेट पाऊँ तो यही कह पाऊँगी कि बापू सच्चे अर्थ में विश्व-बंधु थे इसीलिए तो सबके अपने, विश्व-वंद्य हो पाए...

विश्व वंद्य बापू  

" तुम पोंछ गये

भयभीत कपोलों के आँसू

दे गए धरा विधुरा को

निर्भय अभयदान।

हिंसा की गहन तमिस्त्रा में,

बुझते दीपक की बाती को

फिर जला गए देकर

अंतस का स्नेहदान।"

    -शिव मंगल सिंह सुमन

                                                                                             -शैल अग्रवाल

                

     

            

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कविता-धरोहर

मैथलीशरण गुप्त

माँ कह एक कहानी

"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"

"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?

माँ कह एक कहानी।"

"तू है हठी
, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,

हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
"लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।"


"गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।"
"हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!"


चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।"
"लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,

तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,

गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।"
"सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?"

"माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे?

रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"
"न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"

                                                


सखि, वे मुझसे कहकर जाते,

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।



स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।



हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।



नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते?
गये तरस ही खाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।



जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से?
आज अधिक वे भाते!
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।



गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मु
झसे कहकर जाते।

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माह के  कविः शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव 

 

 



1)

टूट रहा कुछ

 

 

टूट रहा कुछ, मेरे भीतर,

धीरे-धीरे, अन्दर-अन्दर,

उसकी ध्वनि जानी-पहचानी,

है अदृश्य, भारी हैरानी।

कुतर रही है कोई चुहिया,

संचित, सज्जित, सब कुछ झांझर !

छेद-छेद रेशम की चादर,

बजता कुछ बक्से के अन्दर,

टूट रहा कुछ उसके भीतर,

टूट रहा कुछ मेरे भीतर !

 

 

 

 

2)

 कठपुतले

 

 

बचपन में,

कठपुतलों का खेल बड़ा अच्छा लगता था !

 

दूर-दूर से पग्गड़-लहँगा वाले जोड़े,

ले आते थे राजा, रानी, हाथी, घोड़े,

छोटा पर्दा टाँग, स्वयं पीछे छिप जाते,

तरह-तरह के किस्से कहते, गीत सुनाते,

और सामने की चौकी पर,

धमा-चौकड़ी कठपुतलों की चलती रहती।

 

कोई हँसता, कोई रोता,

कोई था तलवार भाँजता !

कोई गाती और नाचती,

कोई था फरमान बाँचता !

कभी रूठना, कभी मनाना,

कभी एँठना, कभी झुकाना,

कभी बुलाना, कभी सुलाना,

कोई झुकती, कोई सदा मचलती रहती,

धमा-चौकड़ी कठपुतलों की चलती रहती।

 

लगता था तब-

सब असली है,

बड़ा मजा आता था सबको !

वर्षों बाद समझ पाया यह,

कठपुतलों की सारी चालें सूत-बँधी थीं।

जो दिखते थे नहीं,

नचानेवाले वे थे,

उनके ही हाथों में तो सबकी नकेल थी।

उनमें था कुछ नहीं स्वयं का,

जो भी था, वह प्रायोजित था,

पर्दे के पीछे वालों से संचालित था।

वे सभी काठ के उल्लू थे,

चाहे मंत्री या कल्लू थे !

यह ज्ञान प्राप्त होने पर भी,

आनन्द बहुत दिनों तक आया !

पर अब,

कोई पैसे भी दे,

तो कठपुतली का नाच न देखूँगा।

 

तब बात और थी,

वर्षों-वर्षों बाद, कोई

कठपुतले लेकर आता था,

उसकी अनदेखी डोरी में ,

पैसा-पैसा साथ जाता था।

अब रोज-रोज,

हर शाम-सुबह,

देखा करता कठपुतलों को !

घर, बाहर, दफ्तर, गद्दी पर,

आँखों की हर चौहद्दी पर,

कठपुतले ही कठपुतले हैं !

 

जो उन्हें नचानेवाले है,

डोरी भी नहीं छिपा पाते,

पर्दे से बाहर आ जाते !

अब पुतले नहीं काठ के हैं,

उनके घर बड़े ठाठ के हैं ! 

 

 

 

3)

गन्दी माता

 

जिसने थोड़ा पढ़ लिया,

गाँव उसका छूटा,

उसके आगे जो पढ़ा,

नगर छूटा उसका,

नाते-रिश्ते अब उसको रास नहीं आते।

जो और पढ़ा,

वह पहुँच गया उस चोटी पर,

जिस पर चढ़ने से सब कुछ बौना लगता है !

जितने भी ज्ञानी-विज्ञानी इस घर के,

सबके माथे में घुसी जा रही है पछुआ,

जो सात समुंदर पार नहीं पहुँचा जल्दी,

आने वाले युग में तो वह होगा 'बबुआ'!

जो जाता, जल्दी नहीं लौटकर है आता,

गोरी मेमों की तुलना में,

कितनी गंदी अपनी माता !

    

          

 

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                                                                                                                       कहानी-धरोहर


हिंसा परमो धर्मः





मुँशी प्रेमचन्द



   

दुनिया में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो किसी के नौकर न होते हुए सबके नौकर होते हैं, जिन्हें कुछ अपना काम न होने पर भी सिर उठाने की फुर्सत नहीं होती। जामिद इसी श्रेणी के मनुष्यों में था। बिल्कुल बेफिक्र न किसी से दोस्ती, न किसी से दुश्मनी। जो जरा हंसकर बोला, उसका बेदाम का गुलाम हो गया। बेकाम का काम करने में उसे मजा आता था। गांव में कोई बीमार पड़े, वह रोगी की सेवा-सुश्रुषा के लिए हाजिर है। कहिए तो आधी रात हकीम के घर चला जाए, किसी जड़ी-बूटी की तलाश में जंगलों की खाक छान आए। मुमकिन न था कि किसी गरीब पर अत्याचार होते देखे और चुप रह जाए। फिर चाहे कोई उसे मार ही डाले, वह हिमायत करने से बाज न आता था। ऐसे सैकड़ों ही मौके उसके सामने आ चुके थे। काँस्टेबल से आए दिन ही उसकी छेड़छाड़ होती रहती थी। इसलिए लोग उसे बौड़म समझते थे। और बात भी यही थी। जो आदमी किसी का बोझ भारी देखकर उससे छीनकर, अपने सिर ले ले, किसी का छप्पर उठाने या आग बुझाने के लिए कोसों दौड़ा चला जाए , उसे समझदार कौन कहेगा। सारांश यह है कि उसकी जात से दूसरों को चाहे कितना ही फायदा पहुंचे, अपना कोई उपकार न होता था, यहां तक कि वह रोटियों तक के लिए भी दूसरों का मुहताज था। दीवाना तो वह था और उसका गम दूसरे खाते थे।

 

                                          

(2)

आखिर जब लोगों ने बहुत धिक्कारा---क्यों अपना जीवन नष्ट कर रहे हो, तुम दूसरों के लिए मरते हो, कोई तुम्हारा भी पूछने वाला है? अगर एक दिन बीमार पड़ जाओ, तो कोई चुल्लू भर पानी न दे, जब तक दूसरों की सेवा करते हो, लोग खैरात समझकर खाने को दे देते हैं, जिस दिन आ पड़ेगी, कोई सीधे मुंह बात भी न करेगा, तब जामिद की आंखें खुलीं। बरतन-भांडा कुछ था ही नहीं। एक दिन उठा और एक तरफ की राह ली। दो दिन के बाद शहर में पहुंचा। शहर बहुत बड़ा था। महल आसमान से बातें करने वाले। सड़कें चौड़ी और साफ, बाजार गुलजार, मसजिदों और मन्दिरों की संख्या अगर मकानों से अधिक न थी, तो कम भी नहीं। देहात में न तो कोई मस्जिद थी, न कोई मन्दिर। मुसलमान लोग एक चबूतरे पर नमाज पढ़ लेते थे। हिन्दू एक वृक्ष के नीचे पानी चढ़ा दिया करते थे। नगर में धर्म का यह माहात्म्य देखकर देखकर जामिद को बड़ा कुतुहल और आनन्द हुआ। उसकी दृष्टि में मजहब का जितना सम्मान था उतना और किसी सांसारिक वस्तु का नहीं। वह सोचने लगा---ये लोग कितने ईमान के पक्के, कितने सत्यवादी हैं। इनमें कितनी दया, कितना विवेक , कितनी सहानुभूति होगी, तभी तो खुदा ने इतना इन्हें माना है। वह हर आने-जाने वाले को श्रद्धा की दृष्टि से देखता और उसके सामने विनय से सिर झुकाता था। यहां के सभी प्राणी उसे देवता-तुल्य मालूम होते थे।

घूमते-घूमते सांझ हो गई। वह थककर मंदिर के चबूतरे पर जा बैठा। मंदिर बहुत बड़ा था, ऊपर सुनहला कलश चमक रहा था। जगमोहन पर संगमरमर के चौके जड़े हुए थे, मगर आँगन में जगह-जगह गोबर और कूड़ा पड़ा था। जामिद को गंदगी से चिढ़ थी, देवालय की यह दशा देखकर उससे न रहा गया, इधर-उधर निगाह दौड़ाई कि कहीं झाड़ू मिल जाए, तो साफ कर दे, पर झाड़ू कहीं नजर न आई। विवश होकर उसने दामन से चबूतरे को साफ करना शुरू कर दिया।

ज़रा देर में भक्तों का जमाव होने लगा। उन्होंनो जामिद को चबूतरा साफ करते देखा , तो आपस में बातें करने लगे---

" है तो मुसलमान" 

" मेहतर होगा।" 

" नहीं, मेहतर अपने दामन से सफाई नहीं करता। कोई पागल मालूम होता है।"

" उधर का भेदिया न हो। " 

" नहीं, चेहरे से बड़ा गरीब मालूम होता है।"

" हसन निजामी का कोई मुरीद होगा।" 

" अजी गोबर के लालच से सफाई कर रहा है। कोई भटियारा होगा। (जामिद से) गोबर न ले जाना बे, समझा? कहां रहता है? " 

" परदेशी मुसाफिर हूं, साहब, मुझे गोबर लेकर क्या करना है? ठाकुर जी का मन्दिर देखा तो आकर बैठ गया। कूड़ा पड़ा हुआ था। मैने सोचा---धर्मात्मा लोग आते होंगे, सफाई करने लगा।" 

" तुम तो मुसलमान हो न? " 

" ठाकुर जी तो सबके ठाकुर हैं---क्या हिन्दु, क्या मुसलमान।" 

" तुम ठाकुर जी को मानते हो?" 

" ठाकुर जी को कौन न मानेगा साहब? जिसने पैदा किया, उसे न मानूंगा तो किसे मानूंगा।"

भक्तों में यह सलाह होने लगी---

 " देहाती है।" 

" फांस लेना चाहिए, जाने न पाए।"

(3)

जामिद फांस लिया गया। उसका आदर सत्कार होने लगा। एक हवादार मकान रहने को मिला। दोनों वक्त उत्तम पदार्थ खाने को मिलने लगे। दो चार आदमी हरदम उसे घेरे रहते। जामिद को भजन खूब याद थे। गला भी अच्छा था। वह रोज मन्दिर में जाकर कीर्तन करता। भक्ति के साथ स्वर लालित्य भी हो, तो फिर क्या पूछना। लोगों पर उसके कीर्तन का बड़ा असर पड़ता। कितने ही लोग संगीत के लोभ से ही मंदिर में आने लगे। सबको विश्वास हो गया कि भगवान ने यह शिकार चुनकर भेजा है।

एक दिन मंदिर में बहुत-से आदमी जमा हुए। आंगन में फर्श बिछाया गया। जामिद का सर मुड़ा दिया गया। नए कपड़े पहनाए। हवन हुआ। जामिद के हाथों से मिठाई बांटी गई। वह अपने आश्रयदाताओं की उदारता और धर्मनिष्ठा का और भी कायल हो गया। ये लोग कितने सज्जन हैं, मुझ जैसे फटेहाल परदेशी की इतनी खातिर। इसी को सच्चा धर्म कहते हैं। जामिद को जीवन में कभी इतना सम्मान न मिला था। यहां वही सैलानी युवक जिसे लोग बौडम कहते थे, भक्तों का सिरमौर बना हुआ था। सैकड़ों ही आदमी केवल उसके दर्शनों को आते थे। उसकी प्रकांड विद्वता की कितनी ही कथाएं प्रचिलित हो गईं। पत्रों में यह समाचार निकला कि एक बड़े आलिम मौलवी साहब की शुद्धि हुई है। सीधा-सादा जामिद इस सम्मान का रहस्य कुछ न समझता था। ऐसे धर्मपरायण सहृदय प्राणियों के लिए वह क्या कुछ न करता? वह नित्य पूजा करता, भजनगाता था। उसके लिए यह कोई नई बात न थी। अपने गांव में भी वह बराबर सत्यनरायण की कथा में बैठा करता था। भजन कीर्तन किया करता था। अंतर यही था कि देहात में उसकी कदर न थी। यहां सब उसके भक्त थे।

एक दिन जामिद कई भक्तों के साथ बैठा हुआ कोई पुराण पढ़ रहा था तो क्या देखता है कि सामने सड़क पर एक बलिष्ठ युवक, माथे पर तिलक लगाए, जनेऊ पहने, एक बूढ़े, दुर्बल मनुष्य को मार रहा है। बुढ्ढा रोता है, गिड़गिड़ाता है और पैड़ों पड़-पड़ के कहता है कि महाराज, मेरा कसूर माफ करो, किन्तु तिलकधारी युवक को उस पर ज़रा भी दया नहीं आती। जामिद का रक्त खौल उठा। ऐसे दृश्य देखकर वह शांत न बैठ सकता था। तुरंत कूदकर बाहर निकला और युवक के सामने आकर बोला---बुड्ढे को क्यों मारते हो, भाई? तुम्हें इस पर ज़रा भी दया नहीं आती?

युवक---में मारते-मारते इसकी हड्डियां तोड़ दूंगा।

जामिद---आखिर इसने क्या कसूर किया है? कुछ मालूम भी तो हो।

युवक---इसकी मुर्गी हमारे घर में घुस गई थी और सारा घर गंदा कर आई।

जामिद---तो क्या इसने मुर्गी को सिखा दिया था कि तुम्हारा घर गंदा कर आए?

बुड्ढा---खुदाबंद मैं उसे बराबर खांचे में ढांके रहता हूं। आज गफलत हो गई। कहता हूं, महाराज, कुसूर माफ करो, मगर नहीं मानते। हुजूर, मारते-मारते अधमरा कर दिया।

युवक---अभी नहीं मारा है, अब मारूंगा---खोद कर गाड़ दूंगा।

जामिद---खोद कर गाड़ देंगे भाई साहब तो तुम भी यों खड़े न रहोगे। समझ गए? अगर फिर हाथ उठाया, तो अच्छा न होगा।

ज़वान को अपनी ताकत का नशा था। उसने फिर बुड्ढे को चांटा लगाया, पर चांटा पड़ने के पहले ही जामिद ने उसकी गरदन पकड़ ली। दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा। जामिद करारा जवान था। युवक को पटकनी दी, तो चारों खाने चित्त गिर गया। उसका गिरना था कि भक्तों का समुदाय, जो अबतक मंदिर में बैठा तमाशा देख रहा था, लपक पड़ा और जामिद पर चारों तरफ से चोटें पड़ने लगीं। जामिद की समझ में न आता था कि लोग मुझे क्यों मार रहे हैं। कोई कुछ न पूछता। तिलकधारी जवान को कोई कुछ नहीं कहता। बस, जो आता है, मुझी पर हाथ साफ करता है। आखिर वह बेदम होकर गिर पड़ा। तब लोगों में बातें होने लगीं।

" दगा दे गया। "

"धत् तेरी जात की! कभी म्लेच्छों से भलाई की आशा न रखनी चाहिए। कौआ कौओं के साथ मिलेगा। कमीना जब करेगा कमीनापन, इसे कोई पूछता न था, मंदिर में झाड़ू लगा रहा था। देह पर कपड़े का तार भी न था, हमने इसका सम्मान किया, पशु से आदमी बना दिया, फिर भी अपना न हुआ। "

"इनके धर्म का तो मूल ही यही है।"

जामिद रात भर सड़क के किनारे पड़ा दर्द से कराहता रहा, उसे मार खाने का दुख न था। ऐसी यातनाएं वह कितनी बार बोग चुका था। उसे दुख और आश्चर्य केवल इस बात का था कि इन लोगों ने क्यों एक दिन मेरा इतना सम्मान किया और क्यों आज अकारण ही मेरी इतनी दुर्गति की ? इनकी वह सज्जनता आज कहां गई? मैं तो वही हूं। मैने कोई कसूर भी नहीं किया। मैने तो वही किया, जो ऐसी दशा में सभी को करना चाहिए, फिर इन लोगों ने मुझपर क्यों इतना अत्याचार किया? देवता क्यों राक्षस बन गए? 

वह रात भर इसी उलझन में पड़ा रहा। प्रातःकाल उठकर एक तरफ की राह ली।

जामिद अभी थोड़ी ही दूर गया कि वह बुड्ढा उसे मिला। उसे देखते ही बोला---कसम खुदा की, तुमने कल मेरी जान बचा दी। सुना, जालिमों ने तुम्हें बुरी तरह पीटा। मैं तो मौका पाते ही निकल भागा। अब तक कहां थे। यहां लोग रात ही से तुमसे मिलने के लिए बेकरार हो रहे हैं। काज़ी साहब रात ही से तुम्हारी तलाश में निकले थे, मगर तुम न मिले। कल हम दोनों अकेले पड़ गए थे। दुस्मनों ने हमें पीट लिया। नमाज़ का वक्त था, जहां सब लोग मस्जिद में थे, अगर ज़र भी खबर हो जाती, तो एक हजार लठैत पहुंच जाते। तब आटे-दाल का भाव मालूम होता। कसम खुदा की, आज से मैने तीन कोड़ी मुर्गियां पाली हैं। देखूं, पंडित जी महाराज अब क्या करते हैं। कसम खुदा की, काज़ी साहब ने कहा है, अगर यह लौंडा ज़रा भी आंख दिखाए, तो तुम आकर मुझसे कहना। या तो बच्चा घर छोड़कर भागेंगे या हड्डी-पसली तोड़कर रख दी जाएगी।

जामिद को लिए वह बुड्ढा काजी जोरावर हुसैन के दरवाजे पर पहुंचा। काजी साहब वजू कर रहे थे। जामिद को देखते ही दौड़कर गले लगा लिया और बोले---वल्लाह! तुम्हें आंखें ढूंढ़ रही थीं। तुमने अकेले इतने काफिरों के दांत खट्टे कर दिए। क्यों न हो, मोमिन का खून है। काफिरों की हकीकत क्या? सुना सब-के-सब तुम्हारी शुद्धि करने जा रहे थे, मगर तुमने उनके सारे मनसूबे पलट दिए। इस्लाम को ऐसे ही खदिमों की जरूरत है। तुम जैसे दीनदारों से इस्लाम का नाम रौशन है। गलती यही हुई कि तुमने एक महीने तक सब्र नहीं किया। शादी हो जाने देते, तब मजा आता। एक नाजनीन साथ लाते और दौलत मुफ्त। वल्लाह! तुमने उजलत की दी।

दिन भर भक्तों का तांता लगा रहा। जामिद को एक नजर देखने का सबको शौक था। सभी उसकी हिम्मत, जोर और मजहबी जोश की प्रशंसा करते थे।

(4)

पहर रात बीत चुकी थी। मुसाफिरों की आमदरफ्त कम हो चली थी। जामिद ने काजी समाज से धर्म-ग्रन्थ पढ़ना शुरु किया था। उन्होंने उसके लिए अपने बगल का कमरा खाली कर दिया था। वह काजी साहब से सबक लेकर आया और सोने जा रहा था कि सहसा उसे दरवाजे पर एक तांगे के रुकने की आवाज सुनाई दी। काजी साहब के मुरीद अक्सर आया करते थे। जामिद ने सोचा, कोई मुरीद आया होगा। नीचे आय तो देखा---एक स्त्री तांगे से उतरकर बरामदे में खड़ी है और तांगे वाला उसका असबाब उतार रहा है।

महिला ने मकान को इधर-उधर देखकर कहा---नहीं जी, मुझे अच्छी तरह ख्याल है, यह उनका मकान नहीं है। शायद तुम भूल गए हो। 

तांगे वाला---हुजूर तो मानती ही नहीं। कह दिया कि बाबू सीहब ने मकान तब्दील कर दिया है। ऊपर चलिए।

स्त्री ने कुछ छिछकते हुए कहा---बुलाते क्यों नहीं? आवाज दो! 

तांगे वाला---ओ साहब, आवाज क्या दूं, जब जानता हूं कि साहब का मकान यही है, तो नाहक चिल्लाने से क्या फायदा? बेचारे आराम कर रहे होंगे। आराम में खलल पड़ेगा। आप निसाखातिर रहिए। चलिए ऊपर चलिए।

औरत ऊपर चली। पीछे-पीछे तांगे वाला असबाब लिए हुए चला। जामिद गुमसुम नीचे खड़ा रहा। यह रहस्य उसकी समझ में न आया।

तांगे वाले की आवाज सुनते ही काजी साहब छत पर निकल आए और एक औरत को आते देख कमरे की खिड़कियां चारों तरफ से बंद करके खूंटी पर लटकती तलवार उतार ली और दरवाजे पर आकर खड़े हो गए।

औरत ने जीना तय करके ज्यों ही छत पर पैर रखा कि काज़ी साबह को देखकर झिझकी। वह तुरंत पीछे की तरफ मुड़ना चाहती थी कि काजी साहब ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और कमरे में घसीट लाए। इसी बीच में जामिद और तांगेवाला यह दोनों भी ऊपर आ गए थे। जामिद यह दृश्य देखकर विस्मित हो गया था। यह रहस्य और भी रहस्यमय हो गया था। यह विद्या का सागर, यह न्याय का भंडार, यह नीति, धर्म और दर्शन का आगार इस समय एक अपरिचित महिला के ऊपर यह घोर अत्याचार कर रहा है। तांगे वाले के साथ वह भी काजी साहब के कमरे में चला गया। काजी साहब ने स्त्री के दोनों हाथ पकड़े हुए थे। तांगे वाले ने दरवाजा बन्द कर दिया।    

 महिला ने तांगे वाले की ओर खूनभरी आंखों से देखकर कहा---तू मुझे यहां क्यों लाया? 

 

काजी साहब ने तलवार चमकाकर कहा---पहले आराम से बैठ जाओ,  सब कुछ मालूम हो जाएगा।

 

औरत----तुम तो मुझे कोई मौलवी मालूम होते हो ? क्या तुम्हें खुदा ने यही सिखाया है कि पराई बहू-बेटियों को जबर्दस्ती घर में बन्द करके उनकी आबरू बिगाड़ो?

 

काज़ी---हां खुदा का यही हुक्म है कि काफिरों को जिस तरह मुमकिन हो, इस्लाम के रास्ते पर लाया जाए। अगर खुशी से न आएं, तो जब्र से। 

 

औरत---इसी तरह अगर कोई तुम्हारी बहू-बेटी पकड़कर बे-आबरू करे, तो ?

 

काज़ी---हो रहा है। जैसा तुम हमारे  साथ करोगे वैसा ही हम तुम्हारे साथ करेंगे। फिर हम तो बे-आबरू नहीं करते, सिर्फ अपने मजहब में शामिल करते है। इस्लाम कबूल करने से आबरू बढ़ती है, घटती नहीं। हिन्दू कौम ने तो हमें मिटा देने का बीड़ा उठाया है। वह इस मुल्क से हमारा निशान मिटा देना चाहती है। धोखे से, लालच से, जब्र से, मुसलमानों को बे-दीन बनाया जा रहा है, तो मुसलमान बैठे मुंह ताकेंगे ?

 

औरत ---- हिन्दू कभी ऐसा अत्याचार नहीं कर सकता। संभव है,  तुम लोगों की शरारतों से तंग आकर नीचे दर्जे के  लोग इस तरह से बदला लेने लगे हों, मगर अब भी कोई सच्चा हिन्दू इसे पसंद नहीं करता।

 

काज़ी साहब ने कुछ सोचकर कहा---बेशक, पहले इस तरह की शरारत मुसलमान शोहदे किया करते थे। गर शरीफ इन हरकतों को बुरा समझते थे और अपने इमकान भर रोकने की कोशिश करते थे। तालीम और तहजीब की तरक्की के साथ  कुछ दिनों में यह गुंडापन जरूर गायब हो जाता, मगर अब तो सारी हिन्दू कौम हमें निगलने के लिए तैयार बैठी हुई है। फिर हमारे लिए और रास्ता ही कौन-सा है। हम कमजोर हैं,  इसलिए हमें मजबूर होकर अपने को अपने को कायम रखने के लिए दगा से काम लेना पड़ता है,  मगर तुम इतना घबराती क्यों हो? तुम्हें यहां किसी बत की तकलीफ न होगी। इस्लाम औरतों के हक का जितना लिहाज करता है,  उतना और कोई मजहब नहीं करता। और मुसलमान मर्द तो अपनी औरत पर जान देता है। मेरे यह नौजवान दोस्त (जामिद) तुम्हारे सामने खड़े हैं,  इन्ही के साथ तुम्हारा निकाह करा दिया जाएगा। बस आराम से जिन्दगी के दिन बसर करना। 

औरत--- मैं तुम्हें और तुम्हारे धर्म को घृणित समझती हूं,  तुम कुत्ते हो । इसके सिवा तुम्हारे  लिए कोई दूसरा काम नहीं। खैरियत इसी में है कि मुझे जाने दो,  नहीं तो मैं अभी शोर मचा दूंगी और तुम्हारा सारा मौलवीपन निकल  जाएगा।

 

काजी----अगर तुमने ज़बान खोली,  तो तुम्हे जान से हाथ धोना पड़ेगा। बस, इतना समझ लो।

 

औरत---आबरू के सामने ज़ान की कोई हकीकत नहीं। तुम मेरी ज़ान ले सकते हो, मगर आबरू नहीं ले सकते।

 

काजी---क्यों नाहक जिद करती हो?

 

औरत ने दरवाजे के पास जाकर कहा--- कहती हूं, दरवाजा खोल दो।

 

जामिद अब तक चुपचाप खड़ा था। ज्यों ही स्त्री दरवाजे की तरफ चली  और काज़ी साहब ने उसका हाथ पकड़कर खींचा, जामिद ने तुरंत दरवाजा खोल दिया और काज़ी साहब से बोला ----इन्हें छोड़ दीजिए।

 

काज़ी---क्या बकता है ?

 

जामिद---कछ नहीं। खैरियत इसी में है इन्हें छोड़ दीजिए।

 

लेकिन जब काजी साहब ने उस महिला का हाथ न छोड़ा और तांगे वाला भी उसे पकड़ने के लिए बढ़ा , तो जामिद ने एक धक्का देकर काजी साहब को धकेल दिया और उस स्त्री का हाथ पकड़े हुए कमरे से बाहर निकल गया। तांगे वाला पीछे लपका, मगर जामिद ने उसे इतने जोर से धक्का दिया कि वह औंधे मुंह जा गिरा। एक क्षण में जामिद और स्त्री दोनों सड़क पर थे।

 

जामिद----आपका घर किस मोहल्ले में है?

 

 औरत--- अढ़ियागंज में।

 

जामिद---चलिए मैं आपको पहुंचा आऊं।

 

औरत---इससे बड़ी और क्या मेहरबानी होगी। मैं आपकी इस नेकी को कभी न भूलूंगी। आपने आज मेरी आबरू बचा ली, नहीं तो मैं कहीं की न रहती। मुझे अब मालूम हुआ कि अच्छे और बुरे सब जगह होते हैं। मेरे शौहर का नाम पंडित राजकुमार है।

 

उसी वक्त एक तांगा सड़क पर आता दिखाई दिया। जामिद ने स्त्री को उसपर बिठा दिया और खुद बैठना ही चाहता था कि ऊपर से काजी साहब ने जामिद पर लठ्ठ चलाया और डंडा तांगे से टकराया। जामिद तांगे में आ बैठा और तांगा चल दिया।

 

अहियागंज में पंडित राजकुमार का पता लगाने में कठिनाई न पड़ी। जामिद ने ज्यों ही आवाज दी, वह घबराए हुए बाहर निकल आए और स्त्री को देखकर बोले---तुम कहां रह गइं थीं, इंदिरा ? मैने तो तुम्हे स्टेशन पर कहीं न देखा, मुझे पहुंचने में देर हो गई  थी। तुम्हे इतनी देर कहां लगी?

 

इंदिरा ने घर के अंदर कदम रखते ही कहा---बड़ी लम्बी कथा है, जरा दम लेने दो, तो बता दूंगी। बस, इतना ही समझ लो कि आज इस मुसलमान ने मेरी मदद न की होती तो आबरू चली गई थी।

 

पंडित जी पूरी कथा सुनने के लिए और भी व्याकुल हो उठे। इंदिरा के साथ वह भी घर में चले गए,  पर एक ही मिनट बाद बाहर आकर जामिद से बोले---भाईसाहब, शायद आप बनावट समझें, पर मुझे आपके रूप में इस समय इष्टदेव के दर्शन हो रहे हैं। मेरी जबान में इतनी ताकत नहीं कि आपका शुक्रिया अदा कर सकूं। आइए,  बैठ जाइए।    

 

जामिद---जी नहीं, अब मुझे इजाजत दीजिए।

 

पंडित----मैं आपकी इस नेकी का क्या बदला दे सकता हूं?

 

जामिद---इसका बदला यही है कि इस शरारत का बदला किसी गरीब मुसलमान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरख्वास्त है।

 

यह कहकर जामिद चल खड़ा हुआ और उस अँधेरी रात के सन्नाटे में शहर से बाहर निकल गया। उस शहर की विषाक्त वायु में सांस लेते हुए उसका दम घुटता था। वह जल्द-से-जल्द शहर से भागकर अपने गांव में पहुंचना चाहता था, जहां मजहब का नाम सहानुभूति, प्रेम और सौहाद्र था। धर्म और धार्मिक लोगों से उसे घृणा हो गई थी।


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                                                                                                                     हास्य-व्यंग्य


अनिर्णय के विशेषज्ञ



-श्रवण कुमार उर्मलिया

 

जी  हां, उनमें किसी भी बात का निर्णय न ले पाने की अभूतपूर्व क्षमता है। किसी भी बात पर किस तरह कोई निर्णय न लिया जाए, इस विधा को उन्होंने कला के स्तर तक पहुंचा दिया है। अपने अब तक के जीवन में उन्होंने कभी भी कोई निर्णय नहीं लिया है। बल्कि जिन मामलों पर निर्णय लिया जा चुका था, उन्हें भी उन्होंने कुछ इस योग्यता से उलझाया कि वे भी अनिर्णीत होकर अपना सिर धुनते रह गए।

वे जमाने लद गए, जब अनिर्णय की स्थिति में जीनेवाले लोग अकर्मण्य, कामचोर और देश की प्रगति में बाधक समझे जाते थे। आज देश की सारी कार्यप्रणाली लोग ऐसे ही चला रहे हैं जिन्होंने निर्णय न ले लेकर देश के विकास को एक नई दिशा और नई गति दी है। देश ऐसी विभूतियों का इतना ऋणी हो गया है कि वह कर्ज शायद कभी भी न उतर पाए।

कुछ अधिकारियों में निर्णय न लेने की जन्मजात प्रतिभा होती है। कुछ को यह प्रतिभा विरासत में मिलती है। पर धन्य हैं वे लोग जो दिन-रात एक करके इसकी साधना करते हैं। उनके साथ अपने अनुभवों का जायजा लेने के बाद मैने यह निर्णय लिया है कि उनमें यह प्रतिभा जन्मजात थी। क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से जहांतक लोगों को मालूम है, उनकी संरचना और पैदाइश का जिम्मा भी उनके भूतपूर्व मां-बाप ने लिया था। 

इनके बचपन के विषय में ज्यादा ऐतिहासिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग कैसे किया, यह बात भी रहस्य बनी हुई है। एक अनुमान के अनुसार ज्यादा संभावना इस बात की है कि हर बार अगली कक्षा में उन्हें खिसकाने का निर्णय उनके शिक्षकों ने ही लिया होगा। 

इस महान देश को एक महान अभियंता की सेवाएँ मिलती थीं, इसलिए अपने समूचे निकम्मेपन का सदुपयोग कर उन्होंने इंजनियरिंग की डिग्री ले ली। और चूँकि निकम्मेपन की सरकारी महकमों में बड़ी मांग होती है, इसलिए ये भी एक सरकारी उपक्रम में चुन लिए गए। यहाँ पर चयन समिति के विषय में कोई टिप्पणी करना व्यर्थ है, क्योंकि जाहिर है कि उसमें भी योग्य व्यक्ति ही रहे होंगे।

नौकरी लगी तो उनकी शादी भी हो गई। बहुत दिनों तक ' शादी करूँ या न करूँ ?' वाली उहापोह की स्थिति रही। परन्तु एक दिन माँ-बाप ने अल्टिमेटम दे दिया कि करो या मरो। परिणाम स्वरूप इन्होंने शादी कर ली और एक बेचारी अबला नारी आँखों में पानी लिए जीते जी मर गई।

शादी के बाद अपने देश में बच्चे पैदा होने का रिवाज है। इनके लिए फिर वही अनिर्णय की स्थिति आ गई। बच्चे पैदा करें कि न करें? और यदि बच्चे पैदा हों तो, लड़की हो या लड़का? सालों यही स्थिति बनी रही। अंततः उनकी धर्मपत्नी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्होंने खुद संतानवती होने का निर्णय ले लिया। इस तरह उन्हें एक पुत्र और पुत्री प्राप्त होते गए।

कुछ वर्षों तक वे बिना कोई निर्णय लिए निर्बाध गति से देश की सेवा करते रहे। अपनी महान प्रतिभा के बल पर एक-दो देशी कंपनियों की निम्नगामी प्रगति में अपना महान योगदान देने के बाद वे कुछ दिनों के लिए एक विदेशी कंपनी की सेवा में विदेश प्रस्थान कर गए। वे अभी अपनी पूरी योग्यता दिखा भी न पाए थे कि उस कंपनी के प्रबंधक मंडल ने उन्हें वापस भेजने का निर्णय ले लिया।

कंपनी-दर-कंपनी भटकने के बाद अब वे कुछ वर्षों से इस कंपनी में शोभायमान हैं। इन वर्षों में अपनी निष्काम सेवा भावना से उन्होंने निर्णय न लेने के ऐसे-ऐसे कीर्तिमान बनाए हैं, जिनपर सुना जाता है कि ' गिनीज बुक औफ वर्ड रिकार्डस ' वालों की भी नजर है। वे इस कंपनी के एक प्रमुख विभाग की छाती पर पहाड़ बनकर विराजमान हैं और उनकी छत्रछाया व कुशल मार्गदर्शन में हम सब कर्मचारीनुमा कंकड़-पत्थरों को उस पहाड़ से निर्णय रूपी सरिता के निकलने की बराबर आसा बनी हुई है।

हर जिज्ञसु मन में सहज ही यह जानने का विचार उठ सकता है कि दफ्तर में उनका एक अदद दिन कैसे बीतता होगा। तो आइए, आप सभी धृतराष्ट्रों के लिए मैं थोड़ी देर को संजय बन जाता हूँ---

कबाड़खाना-सा लगनेवाले एक बड़े कमरे में एक विशाल टेबल रखी हुई है और उसपर पूरी भव्यता से फाइलों का अंबार लगा हुआ है। एड़ियां उठाकर आदमकद फाइलों के ढेर के पीछे झांकने पर उनकी दिव्य छवि नजर आती है। चेहरे पर असीमित शांति, आँखों में मनभावन स्निग्धता। लग रहा है जैसे कोई शासकीय योगी समाधिस्थ है और उसके चारों ओर प्रशासन की मकड़ियों ने जाले बुन दिए हों।

क्षण भर को योगी का मुखौटा उनके चेहरे से खसक जाता है तो ऐसा लगता है मानो फालों के पीछे कोई मेढक उकड़ूँ बैठा हुआ अपनी जीभ लपलपा रहा हो।

चपरासी आता है और टेबल से दो-चार फाइलें उठाकर कमरे से बाहर जाने लगता है। उनकी आत्मा चीत्कार कर उठती है, " अरे...अरे, कहाँ ले जा रहे हो इन फाइलों को? अभी मुझे इन फाइलों को देखना है, भई!" 

चपरासी झुँझलाता है, " साहबजी, ये फाइलें तो फिछला चपरासी आपकी टेबल पर रख गया था। अब क्या मेरे रिटायर होने तक इन्हें अपने पास रखेंगे?" कहकर चपरासी फाइलें वहीं पटककर बाहर चला जाता है।

 वे बड़बड़ाते हैं," पता नहीं कैसे-कैसे निकम्मों को भर लेती है कंपनी! मुझे चैन से काम करने ही नहीं देते!"

एकांत पाकर एक फाइल पर महान अनुकंपा करते हुए वे उसे खोल लेते हैं। फाइल कृतार्थ हो जाती है। फाइल के पन्ने पलटते हुए थोड़ी ही देर में उनका मूड उखड़ जाता है। फाइल बंद करके वे अपने पी.ए. को फोन करते हैं, " भई भाटियाजी, मेरे मेडिकल बिल का चेक बन गया कि नहीं?"

भाटियाजी जवाब देते हैं," जनाब, अभी तो नहीं मिला। मैं अभी पता करता हूँ, जनाब!"

योगी के चेहरे पर आर्थिक असंतोष व्याप्त हो जाता है। वे उखड़ जाते हैं, " भाटियाजी फिर क्या फायदा बीमार होने से? आप दिन भर क्या करते रहते हैं? इतना भी नहीं होता आपसे!" 

भाटियाजी विनम्र होकर कहते हैं," जनाब, वो मेडिकल बिल पास करने वाला बीमार हो गया था जी। मैं अभी पता करता हूँ जनाब!"

मन-ही-मन भाटिया श्रद्धापूर्वक बड़बड़ाता है--- ' ससुरा मेरे मेडिकल बिल तो हफ्तों दबाए रहता है और अपने बिलों के लिए जान खा जाता है!'

भुनभुनाते हुए वे फिर फाइल खोल लेते हैं। थोड़ी ही देर में ऊबकर पुनः फाइल बंद कर देते हैं, ' क्या करें , क्या न करें?' वाली एक ज्वलंत अनिर्णय की स्थिति से गुजरते हुए वे पुनः भाटियाजी को फोन करते हैं, " भई, भाटियाजी, जरा चाय-वाय तो भिजवाइये। कितनी देर हो गई! आप इतना भी ख्याल नहीं रख सकते?"

भाटियाजी पूरे सौजन्य से पूछते हैं, " जनाब, चाय भिजवाऊँ या कॉफी?"

उनके गांडीव से अनिर्णय का अग्निबाण छूटता है, " चाय ही चलेगी। अच्छा, चाय नहीं, कॉफी भिजवा दीजिए। नहीं ठहरिए, चाय ही चलेगी। अच्छा जाने दीजिए अभी! एक घंटे बाद कुछ भी भिजवा दीजिएगा। अभी मैं व्यस्त हूँ; मुझे कई फाइलें निबटानी हैं!"

फिर वही अनिर्णय भरा एकांत। वे अपनी कुरसी से उठकर कमरे में टहलने लगते हैं। खिड़की के पास जाकर थोड़ी देर तक दार्शनिक की तरह बाहर की ओर निहारते हैं। फिर आकर फोन उठाते हैं और अपने मातहत प्रबंधक शर्माजी का नंबर डायल कर कहते हैं, " भई शर्माजी, उस एनवायरमेंट वाले मामले का क्या हुआ? लेटर आपने लिखवा दिया था कि नहीं?"

शर्माजी जवाब देते हैं, "सरजी, वह लेटर तो मैने पिछले हफ्ते ही आपके हस्ताक्षर के लिए आपके पास भिजवा दिया था।"

शर्माजी के जवाब से वे खिन्न होकर कहते हैं, " अच्छा, मेरे पास भिजवाया था...पर शर्माजी, आपको चाहिए कि मुझे याद दिलाते। मेरे पास एक काम तो नहीं है न! और ऐसे इँपौर्टेंट मामले में हमें केयरलेस नहीं होना चाहिए। जरा भाटियाजी से ढुँढवाइये उसे, जल्दी!"

शर्माजी मन-ही-मन कुढ़ते हैं--- ' अजीब आदमी है यार! याद दिलाओ तो मौसम की बातें करने लगता है। खुद एक छोटा सा लेटर भी डिक्टेट नहीं करा सकता। क्या हमने ठेका ले रखा है जो उसके लेटर तैयार करवाते फिरें?' प्रत्यक्ष में वे फोन पर कहते हैं, " सरजी, अब उस लेटर को भेजने का कोई फायदा नहीं। वह मीटिंग पोस्टपोन हो चुकी है।"

"अच्छा तो ठीक है फिर!" वे आश्वस्त होकर कहते हैं, " खैर आगे से ख्याल रखा कीजिए! आप एक जिम्मेदार अफसर हैं, हैं कि नहीं?"

चपरासी आठ दस फाइलें लिए हुए कमरे में प्रवेश करता है और पूछता है," साहबजी, कहाँ पटकूँ इन्हें? भाटियाजी कह रहे थे कि इन पर जल्दी काररवाई करनी है।"

वे मन-ही-मन बहुत खुश हो जाते हैं। और फाइलें...अनिर्णय की स्थिति के और अवसर। उनका मन तो कह रहा है कि वे चपरासी को मिठाई खाने को रुपए दें, पर ऊपर से कहते हैं," भई, ये भाटियाजी तो मुझे काम के बोझ से दबाकर ही दम लेंगे। रख दो इन्हें उस अर्जेंट ट्रे पर!"

चपरासी बाहर जाने लगता है तो वे उसे हिदायत देते हैं, " देखो, भाटियाजी से कह देना कि जब वे मुझे चाय या कॉफी भिजवाएँ तो मुझसे पूछ लें कि मुझे चाय चाहिए या कॉफी! समझे?"

चपरासी जाते-जाते मुस्कराते हुए कह जाता है, " साहबजी, मैं तो समझ गया। अब भाटियाजी समझें तब न बात बने!"

मन उनका लग नहीं रहा है। वे अपने ब्रीफकेस से ' डेबोनेयर' का ताजा अंक निकाल लेते हैं और उसे पलटने लगते हैं।

इसी बीच धर्मपत्नी का फोन आता है, " अजी, सुनते हो?"

वे लगभग चीखते हैं, " मैं ही तो सुनता हूँ और कौन सुनेगा तुम्हारी बकवास! बको, क्या बकना चाहती हो?"

धर्मपत्नी कहती है, " मैं कह रही थी कि अपनी वसुधा अब जवान हो गई है। मेडिकल में उसका चौथा साल है। अब हमें उसकी शादी की चिंता करनी चाहिए।"

'डेबोनेयर' के शाश्वत चित्रों से प्रेरित होकर वे पत्नी को छेड़ते हैं, " अरी भागवान, अभी तो तुम भी ठीक से जवान नहीं हुईं, बिटिया तो तुम्हारी अभी बच्ची है! और उसे पढ़ा-लिखा क्यों रहे हैं, इसलिए न कि अपने बारे में खुद फैसला कर सके!"

पत्नी तुनकते हुए कहती है, " लगता है, वह ऐसा ही करेगी! यदि तुम्हारे भरोसे रही तो निश्चित कुँवारी रह जाएगी। भगवान ऐसा बिना पेंदी का बाप किसी बेटी को न दे!"

वे जोर से ' बेवकूफ औरत' कहते हैं और फोन पटक देते हैं। फिर वही झुँझलाहट, एकांत और अनिर्णय भरे क्षण। थोड़ी देर अपने हाथों में मुँह छुपाए कुछ सोचते रहते हैं। फिर खन्नाजी को फोन कर पूछते हैं, " भई खन्नाजी, वह मीटिंग कितने बजे रखी है?"

जवाब मिलता है, " सर, साढ़े बारह बजे!" 

वे खिसिया जाते हैं, " साढ़े बारह बजे ही क्यों? भई, आप लोग ही सबकुछ तय कर लेते हैं! मुझसे कुछ पूछते ही नहीं! मैं कहता हूँ कि मीटिंग पौने एक बजे से रखिए। समझ गए न आप? और हाँ, देर हो जाएगी, इसलिए लँच वहीं मँगवा लीजिए!"

खन्नाजी मन-ही-मन बड़बड़ाते हैं---' अच्छा सनकी है, यार! साढ़े बारह और पौने एक में कितना फर्क है? अरे, कंपनी का लंच ही खाना था तो पहले बता देता!'

 मीटिंग और लंच के बाद वे दफ्तर से बाहर चले जाते हैं। शायद एकाध घंटे की नींद लेने के लिए अपने घर। तीन बजे के करीब दफ्तर आकर भाटियाजी से पूछते हैं, " भई, मेरे बैंगलोर टूर का टिकट  गया कि नहीं?"
भाटियाजी जवाब देते हैं, "जनाब, वाय क्लास का टिकट मिला है!"

वे नाराज हो जाते हैं, " नौनसेंस! क्या मैं जूनियर्स के साथ बैठकर सफर करूँगा? जे क्लास का टिकट मँगवाइए, चाहे एक- दो दिन बाद जाना पड़े, समझे? और होटल की बुकिंग भी करवाइए!"

भाटियाजी भीतर-ही-भीतर कुढ़ते हैं---' अजीब आदमी है ससुरा। जूनियर्स के साथ बैठकर दारू पी लेता है, पर उनके साथ बैठकर सफर नहीं कर सकता!" 

फिर वही एकांत। फिर वही फाइलें और फाइलों की चिता में सती होने को बैठे वे। दिन की डाक देखते हैं। आँखें बन्द कर हरेक पत्र पर ‘रिव्यू एँड डिस्कस’ लिखते जाते हैं। लोगों के टी.ए., बिल, मेडिकल क्लेम, टूर एडवांस इत्यादि पर भी उन्हें हस्ताक्षर करने हैं, पर वे फिर अनिर्णय की स्थिति में आ जाते हैं। परेशान होकर भाटिया जी को फोन करते हैं, “ भई भाटियाजी, इस कम्पनी के लोग काम भी करते हैं या अपना क्लेम ही बनाते रहते हैं? और आप मुझसे रोज-के-रोज इन पर दस्तखत क्यों नहीं करवा लेते?“

भाटियाजी कहते हैं, “ जनाब, वह पिछले महीने की डाक है। इसणहीने की डाक तो अभी मैने आपके पास भिजवाई ही नहीं।“

वे फिर उखड़ जाते हैं, “भई, भाटियाजी, ये बिल वगैरह पर आप भाटिया जी से दस्खत करवा लिया करें। मुझे और भी महत्वपूर्ण काम रहते हैं, भई!”

भाटियाजी चपरासी के साथ बिल वगैरह मँगवा लेते हैं। वे फिर निष्क्रिय हो जाते हैं। भाटियाजी चपरासी के साथ बिल वगैरह मँगवा लेते हैं। वे फिर निष्क्रिय हो जाते हैं। भाटियाजी फोन पर सूचना देते हैं, “ज़नाब, राव साहब आ गए हैं...हाँ-हाँ, वही‘ आर्टिफीशियल फूड प्रोसेसिंग कम्पनी ‘ के मैनेजिंग डायरेक्टर। चार बजे का अपाइंटमेंट था।“

वे फिर चिड़चिड़ाने लगते हैं, “भई, ये अपाइंटमेंटवाले तो अलग से जान खाते हैं। मुझे काम ही नहीं करने देते। भाटियाजी, कह दीजिए कि आज मैं बिजी हूँ। कल इसी समय आ जाएँ।“

मुलाकाती को भगाकर वे फिर निश्चित हो जाते हैं। फिर वही खालीपन। फिर वही ‘क्या करें, क्या न करें‘ की चिंतित स्थिति। वे इधर-उधर दो चार फोन करते हैं। फिर भी समय कटता नहीं।

तभी चपरासी फोन पर सूचना देता है, “ जनाब, चंडोक साहब आए हैं और तुरंत आपसे मिलना चाहते हैं।“

वे कुढ़कर कहते हैं, “ भई, अब कौन चंडोक आ गया? मैं किसी चंडोक-वेडोक को नहीं जानता। भई, भाटियाजी, आप मुझे काम क्यों नहीं करने देते?“

भाटियाजी फिर विनम्रता से कहते हैं, “ चंडोक साहब कह रहे हैं कि उन्हें किसी मुरारीलाल ने भेजा है। वे कह रहे हैं, वही मुरारीलाल जिनके साथ आपने रानीखेत में साझे की जमीन खरीदी है।“

मुरारीलाल का नाम सुनते ही वे कुरसी से खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, “अच्छा ! अच्छा !! जल्दी अंदर भेजिए उन्हें। और देखिए, जल्दी कॉफी भिजवाइये।“

वे चंडोक साहब के साथ दफ्तर बंद होने तक अपने चैंबर में बंद हो जाते हैं।

तो यह रहा दफ्तर में उनका एक अदद दिन। ऐसे ही न जाने कितने दिन, कितने मास, कितने वर्ष...नितांत अनिर्णय भरे।

वे अपने निर्णय न लेने की कला पर मुग्ध रहते हैं, पर दूसरों के बारे में हमेशा चिंतित रहते हैं--- ‘ न जाने इस देश का क्या होगा? कोई न कोई काम करना चाहता है, न कोई डिसीजन लेना चाहता है।’

हर लेटर में ‘ रिव्यू एंड डिस्कस ‘ लिखकर वे मातहतों को सरकाते रहते हैं। जब कोई किस्मत का मारा उनसे कोई मसला डिस्कस करना चाहता है तो वे सरलता से कहते हैं,

“भई, ज़रा आप उसके डिटेल्स बनवा लीजिए। फिर हम सब उसपर बैठेंगे!“

‘ उसपर बैठेंगे ‘ का मतलब है कि मीटिंग करेंगे। और ‘मीटिंग‘ निर्णय न लेने का एक सशक्त माध्यम होती हैं, यह सभी जानते हैं।

किसी भी मसले को किस तरह स्वाभाविक मौत मारना है, यह उनसे अच्छी तरह कोई नहीं जानता। यदि किसी सब आर्डिनेट ने किसी मामले पर निर्णय ले लिया है तो वह निश्चित ही इनकी नजरों में एक निहायत निकम्मा अफसर है। उनके ख्याल से वह भी एकदम बेकार अफसर है जो सही आडियाज और सही सलाह देता है। उनका विश्वास है कि जूनियर्स के सही आडियाज भी घटिया हैं और उनके घटिया आइडियाज भी सर्वश्रेष्ठ हैं।

उनकी एकमात्र पुत्री को भी अब विश्वास हो गया है कि उनके पिताजी अपना रिकार्ड नहीं तोड़ेंगे तो उसने एक योग्य होनहार लड़के से शादी कर ली। उन्हें कोई अफसोस नहीं, क्योंकि किसी-न-किसी लड़के की किस्मत तो फूटनी ही थी।

वे निर्णय न लेने के एक जीते-जागते संस्थान बन चुके हैं। हमें उनकी इस प्रतिभा का अफसोस नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति बिना निर्णय लिए कंपनी को पतन के गर्त में ढकेलने की क्षमता रखता है, ज़रा सोचिए कि यदि वह निर्णय लेने लगता तो कंपनी का क्या हाल होता?

गंभीरता से सोचिए ज़रा और निर्णय कीजिए।

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(भाग-1)

शेष-अशेषः

                                                                                                                      -शैल अग्रवाल

 

बैग में हमेशा साथ रहने वाले पंसीदा तीन रंगों के पैलेट की तरह ही नेह, उल्लास और चैन, इन्ही तीन रंगों की ही तो जगह थी  उसके जीवन में। सयानी मनु जानती थी कि इन्ही, और सिर्फ इन्ही तीनों के साथ जीवन का मनभावन इंद्रधनुष रचा जा सकता है। यह न मिल पाएं तो मन को कुछ भी तो स्थिर नहीं कर पाता---नाम, पैसा, ऐशो-आराम कुछ भी नहीं! बहुत कुछ था दुनिया में, इस जीवन में जो बदलना चाहती थी मनु, पर अपनी इस छोटी सी मुहिम से कितना और क्या बदल पाएगी नहीं जानती थी वह; फिर भी न ही उसने कभी हार मानी और ना ही उसके जीवन के प्रति अटूट आस्था और अदम्य जोश ने। कम-से-कम चन्द आँसू तो पोंछ ही सकती है वह, एक छोटा-सा प्रयास तो कर ही सकती है---एक बार फिर पर्स से कागज और कलम निकालकर मनु अपनी वही पुरानी अधलिखी स्क्रिप्ट एक नए नज़रिए और नए सिरे से लिखने बैठ गई।

"  सेंध (एक नई कहानी)

यह कहानी जीवन की उन अंधी मज़बूर गलियों की है जिनसे बाहर निकलने की आस में आजभी कई जीवन बेबस दम तोड़ रहे हैं। घुप अँधेरों में असह्य जिन्दगी के मारे लाश-से ये हमारी आँखों के आगे घूमते इन्सान भले ही हमारी चेतना और संसार दोनों से ही अदृश्य हो चुके हों, परन्तु आज भी ये अपने विकलांग जीवन की लड़ाई लड़ते अकेले ही दुनिया के गुमनाम कोनों में दम तोड़ देते हैं और हममें से किसीको पता तक नहीं चल पाता...गलत, फरक तक नहीं पड़ता। एक मरें या हज़ार...हर खबर बस एक और खबर होती है। कभी नैसर्गिक आपदा इन्हें मार देती है तो कभी खुद इनकी अपनी भूख और कुँठाएँ। कभी-कभी तो इस निर्मम दुनिया का स्वार्थी हस्तक्षेप और आक्रोष तक इन्हें ---" लिखते-लिखते अचानक ही मनु की आँखें बहकीं और सामने दूरदर्शन की स्क्रीन पर जम गईं। रुकी कलम की तरह अब मनु भी स्तब्ध थी। 

स्क्रीन पर सामने एक आदमी जू के पिंजरे में बन्द बैठा था और जानवरों की तरह उसे चारो तरफ से घेरा जा रहा था। बाँधकर काबू करने की कोशिश में...पिंजरा तोड़कर बाहर निकालने की कोशिश में। ' यह कैसा भद्दा मज़ाक है...क्या देख रही थी मनु...यह कोई नया प्रयोग है क्या, या फिर बस एक और खिलवाड़ इस आधुनिक प्रगतिशील समाज का? तो अब भगवान का बनाया आखिरी जानवर मनुष्य भी पहुँच ही गया खुद अपने ही बनाए चिड़ियाघर में और अब वह भी अन्य जानवरों की तरह ही पिंजरे में रखा और प्रदर्शित किया जाएगा? क्यों नहीं, आखिर बुराई ही क्या है इसमें...अपनी विक्षिप्त मानसिकता और कौतूहल के वशीभूत कैसे-कैसे रोमांचक और अद्भुत प्रयोग नहीं किए बीसवीं सदी के इस इन्सान ने? जब मरते और आत्म-हत्या करते इन्सानों तक का चलचित्र देखकर रोमांचित हो सकता है यह, सामूहिक हत्याओं से खुश होता है, तो यह तो एक और नई और रोमांचक उत्तेजना है, एक नया मनोरंजक नाटक है। अखबार और दूसरे संचार-साधन भरे ही रहते हैं ऐसी तरह-तरह की खबरों से-एक अनहोनी खबर और सही? जीवन के हर क्षेत्र में जानवरों-सा ही तो गिरा लिया है हमने खुदको, फिर यह स्थिति तो पलपल ही नई संभावनाओं से भरपूर है और पूरी तरह से ही नाटकीय है। इससे ज्यादा " वर्चुयल रियालिटी" भला और कहाँ देखने को मिलेगी? पर जरूर ही कोई बेहद मजबूर और लाचार होगा, जो राजी हुआ बेचारा!'

मनु की सोच रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और उसकी नज़र एकबार फिर कौतूहलवश चित्रपटल पर जा अटकी। पर यह क्या... सामने कोई और नहीं उसके अपने बाबा बैठे हुए थे, अपने ही जू के पिंजरे में बन्द।

मनु का दुःख अब सारी सीमाएँ तोड़कर बिफर जाना चाहता था-' क्या बस एक उसके बाबा ही रह गए थे सारी इस भरी-पूरी दुनिया में इस खिलवाड़... इस मज़ाक के लिए? कहीं बाबा खुदही तो अपनी परेशानी और नाराज़गी में इतने उलझ नहीं गए कि दीन-दुनिया की ही खबर नहीं रह गई उन्हें? अगर वाकई में ऐसा है तो कितनी नासमझ है वह और कितनी थोथी हैं उसकी दुनिया को बेहतर बनाने वाली ये बड़ी-बड़ी दलीलें ---कितने निरर्थक हैं उसके ये सभी महत्वाकांक्षी सपने? पहले अपने को, अपने घर को तो संभाल ले, फिर दुनिया को संभालने की सोचेगी ...वैसे भी यूँ टूटी बिखरी किसके काम आ पाएगी वह!' 

मनु के लिए अब खुदको और आंसुओं को संभालना असंभव हो चला था। वह जहाज के अन्दर, एक सार्वजनिक कक्ष में तमाशा नहीं बनना चाहती थी पर आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे-' जब बाबा को जरूरत थी तो वह उन्हें छोड़ आई?'

" जू-कीपर शेखर सरकार को आज इस पिंजरे में बन्द बैठे हुए पूरे तीन दिन हो चुके हैं और अब इनके लिए यह स्थिति काफी खतरनाक हो चली है। देखने से तो लगता है कि यह न किसी की तरफ देख पा रहे हैं और ना ही कुछ सुन या समझ पा रहे हैं, परन्तु आँखों से बहते आँसुओं से लगता है, अभी भी होश में हैं और जीवित हैं। आज रात का तापमान -बीस डिग्री तक जाने की संभावना है। आवश्यक है कि अब किसी भी तरह से इन्हें इस स्थिति से बाहर निकाला जाए।" 

चित्रपटल पर खड़ी वह संवाददाता जाने क्या-क्या बोले जा रही थी। सिवाय मनु के पूरी दुनिया के लिए यह खबर बासी और तीन दिन पुरानी हो चुकी थी। ' क्या इतनी लापरवाह थी वह अपने बाबा के प्रति कि उसे आज पता चल पाया...पूरे तीन दिन बाद कि उसके बाबा कैसे हैं और किस तकलीफदेह दयनीयता से गुजर रहे हैं? बाबा के पास तो दस साल से इस मुल्क में रहने के बावजूद भी, हर जाने अनजाने की मदद करते रहने के बाद भी, मदद करने वाला क्या, पहचानने वाला तक, आसपास ही नहीं दूर-दूरतक, सिवाय मनु के कोई और नहीं था---' मनु की सोच अब उसे धिक्कार ही नहीं, पूरी तरह से तोड़ रही थी।

" कुछ नहीं हो सकता मेरे बाबा को।" मनु के संयम और धैर्य छूट चुके थे। टूटी-थकी मनु सारी लाज़-शरम और लोक-मर्यादा को भूल बच्चों-सी सुबकने लगी। " आती हूँ बाबा, अभी आती हूँ में। थोड़ी हिम्मत और रखो। बस, थोड़ी और देर अपने को संभाले रखना। मुझे आपको यूँ अकेले छोड़कर नहीं आना चाहिए था। आप तो खुद एक सहृदय और समझदार व्यक्ति हो और इतना तो समझ ही सकते हो कि भावनाओं के आवेश में हम सभी से कभी-कभी अतिशयोक्ति हो जाती है...क्यों लिखती हूँ आखिर मैं...? सांसों-सी सहज और जरूरी मेरी यह आदत आखिर कौन-सी मुहिम छेड़ पाएगी, जंग जीत पाएगी...मुझे नहीं मालूम?"

पश्चाताप के अँधे कुँए में छटपटाती मनु को अब खुद को ही नहीं, बाबा को भी असह्य दुःख और ग्लानि की अंधेरी गर्तों से उबारना था।

" नहीं जानती थी मैं कि आप वाकई में इतने अकेले हो? बस अपनी बात समझाना चाहती थी मैं तो आपको बाबा...सिर्फ आपकी ही नहीं, हर मर्द के औरत के प्रति रवैये की बात कर रही थी  ...आपको इतनी तकलीफ नहीं देना चाहती थी मैं बाबा।"

हर सोच अब कर्तव्य-बोध का एक नया अहसास थी और मार्ग-दर्शन कर रही थी। बाबा को घर...दीन-दुनिया में अब सिर्फ वही वापस ला सकती थी फिर इतना कमजोर क्यों महसूस कर रही थी मनु... घुटने क्यों कांप रहे थे उसके?

"आप अकेले कहाँ हो बाबा...देखो आपकी मनु आजभी साथ और आपके पास है...आपकी अपनी लाडली मनुश्री, जिसमें दीदा श्रीमना को भी तो हमेशा के लिए सहेज और समेट लिया है आपने...हमेशा ही के लिए...कुछ नहीं खोया आपने...बस हिम्मत और विश्वास मत खोना।"

बहते आँसुओं को दृढ़ संकल्प के साथ पोंछती, सुबकती मनु बारबार बस वही एक बात दोहराए जा रही थी, मानो बाबा को ही नहीं, खुद को भी तसल्ली दे रही हो। बगल में खड़ी एयर हस्टेस जब किसी भी तरह से तसल्ली न दे पाई, तो वैलियम की गोली खिलाकर सुला दिया मनु को उसने। और कोई चारा भी तो नहीं था उसके पास। वैसे भी अब जो मदद दी जा सकती थी, वापस इंगलैंड पहुँचकर ही तो दी जा सकती थी।...           

                                                                         (क्रमशः)


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                                                                                                                               पर्यटन




अशोक-स्तंभ , सारनाथ वाराणसी

 

भारत का राष्ट्रीय चिन्ह 

 

  -योगेश 'नवीन'

 

धर्म, विकास, शक्ति एवं सृजन का प्रतीक है स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ का 'सिंह चतुर्भुज शीर्ष'। भारतीय कला, संस्कृति एवं इतिहास का अद्भुत परिचय तथा संपूर्ण मानव जाति को अनेकानेक संदेश देती यह पाषाण कलाकृति, सम्राट अशोक महान् द्वारा सारनाथ के हरिण उध्यान में महात्मा बुद्ध के प्रथम प्रवचन स्थल पर स्थापित करवाये गए 70 फीट ऊँचे स्तंभ की अनुकृति है।

वर्तमान में जो राष्ट्रीय चिन्ह हम देखते हैं उसमें गर्जन मुद्रा में तीन शेर हैं जिसके नीचे गोल पट्टी में संस्कृत के शब्द 'सत्यमेव जयते' अंकित है। किंतु वह मूल कलाकृति का परिष्कृत रूप है। मूल रूप में गर्जन मुद्रा में चार सिंह हैं जो एक-दूसरे की ओर पीठ किए हुए हैं तथा गोल पट्टी पर चार चक्र तथा चार पशु-गज, सिंह, अश्वज, वृषभ हैं। स्तंभ के शीर्ष के सिंहों के ऊपर धर्म चक्र है।

अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण सिंह, गज, अश्व, वृषभ और धर्मचक्रों की विभिन्न विद्वानों एवं कला मर्मज्ञों ने अलग-अलग व्याख्या की है और अपने-अपने तरीके से इस उत्कृष्ट कलाकृति का आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व बताया है। अनेक विद्वानों ने गर्जन मुद्रा वाले चार सिंहों की तुलना महात्मा बुद्ध एवं अनमोल प्रवचनों से की है तथा नीचे गोल पट्टी पर बने गज, सिंह, अश्व, वृषभ को बुद्ध के जीवन की चार घटनाओं से जोड़कर प्रस्तुत किया है। गज को महामाया के स्वप्न का, सिंह को महात्मा बुद्ध(शाक्य सिंह) का, अश्व को महात्मा बुद्ध के गृहत्याग का तथा वृषभ को महात्मा बुद्ध की जन्म राशि का प्रतीक स्वीकारा है। चक्र को धर्म प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने सिंह, गज, अश्व और वृषभ को धार्मिक भावनाओं से जोड़कर इस राष्ट्रीय चिन्ह की व्याख्या की है। उनके अनुसार ये चारो पशु दुर्गा, इंद्र, सूर्य, और शिव के वाहन हैं और इन दैव्य शक्तियों के बुद्ध-सत्त के अधीन हो जाने की बात कही है। इसी प्रकार कुछ विद्वानों का कहना है कि ' सिंह चतुर्मुख धर्मचक्र शीर्ष' का धर्म चक्र अशोक महान की धर्म विजय का, चारों सिंह सम्राट अशोक की चारों ओर स्थापित राज सत्ता का तथा नीचे पट्टी पर उत्कीर्ण चार पशु व चार चक्र व्यक्ति के जीवन में देवत्व व एकत्व की भावना दर्शाते हैं। 

'सिंह चतुर्मुख शीर्ष' की उक्त व्याख्याएं विद्वानों ने समय, परिस्थितियों एवं प्रचलित वातावरण से प्रभावित होकर की होंगी किन्तु भारतीय दर्शन, संस्कृति और कला की गहराइयों को केवल विद्वानों के तथ्यों, व्याख्याओं और अवधारणाओं की नजर से देखना इस अतुल्य कलाकृतियों के साथ अन्याय ही होगा। सारनाथ अशोक स्तंभ का मूल रूप सिंह 'चतुर्मुख धर्म चक्र शीर्ष' भी ऐसी ही एक कलाकृति है जो कि बुद्ध, सम्राट अशोक और उसकी राजसत्ता तक ही सीमित नहीं है बल्कि अशोक महान के दार्शनिक विचारों एवं उनके आदर्श व्यक्ति, आदर्श समाज और आदर्श राज्य की कल्पना का मूर्त रूप है, किसी काल या देश विशेष के लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व को सदैव धर्म पालन हेतु प्रेरित करने वाली एक रचना है। वास्तव में हमारा यह राष्ट्रीय चिन्ह अपने समय की एक उत्कृष्ट कलाकृति है जो संपूर्ण मानव जाति को धर्म, शक्ति, विकास एवं सृजन का संदेश देती है।

(साभार साहित्य वैभव)  

 

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                                                                                                      चाँद परियाँ और तितली 




जैसे को तैसा

सुन्दरवन में एक जामुन का पेड़ था। उसमें एक गिलहरी रहती थी। छोटी सी गौरैया ने भी एक डाल पर अपना घोंसला बना रखा था। गिलहरी और गौरैया में अच्छी दोस्ती थी। जामुन का पेड़ दोनों की दोस्ती देखकर खुश हो जाता। एक बार की बात है। भीषण गर्मी पड़ रही थी। गौरैया और गिलहरी जामुन के पेड़ में सुस्ता रहे थे। तभी एक बन्दर आया। वह चिल्लाया- ' कोई है मुझे भूख लगी है। प्यास भी लग रही है। मेरा गला सूख रहा है।'

गौरैया और गिलहरी ने सुना। दोनों मदद के लिए तैयार हो गये।

जामुन के पेड़ ने टोका-' यह बन्दर धूर्त है। मक्कार है।'

गौरैया बोली- ' काका। उसे प्यास लगी है। हमें उसकी मदद करनी चाहिये।'

गिलहरी ने भी हामी भर दी- ' काका अपनी टहनियां हिला दो। पके हुए जामुन गिरा दो। बंदर को भूख लगी है।'

तभी हवा का झोंका आया। जामुन के कई फल गिर पड़े। गिलहरी ने छोटी-छोटी डालियां हिलाईं। बन्दर ने सारे जामुन खा लिये।

गौरैया उड़ी गिद्ध के पास गई। सारा किस्सा सुनाया। गिद्ध बड़ी बोतल में पानी ले आया। बंदर ने अपनी प्यास बुझाई। गौरैया और गिलहरी खुशी से नाचने लगे। कुछ दिन बाद बंदर फिर आया। उसने फिर आवाज लगाई। कहा, ' मैं शहर गया था, वहां जामुन बिकते हैं। तुम जामुन तोड़कर मुझे दो। मैं बाज़ार में जाकर बेच आऊंगा। खूब सारा रुपया मिलेगा। रुपये से मैं दाना खरीद लाऊंगा। फिर तीनों दाना बांट लेंगे।' दोनों बंदर की बातों में आ गये। दोनों ने ढेर सारे जामुन गिराये। बंदर ने जामुन इकठ्ठा किये। जामुन लेकर बंदर चला गया।

कई दिनों के बाद बंदर फिर आया। उसने फिर पुकार लगाई। कहने लगा- ' हाथी मामा ने सारे जामुन मुझसे छीन लिए थे। आज हम तीनों जामुन तोड़कर बाजार ले जायेंगे।'

जामुन का पेड़ सब कुछ सुन रहा था। उसने गिलहरी के कान में कुछ कहा। गिलहरी बोली- ' बंदर भइय्या। आज तुम्हें पेड़ पर चढ़ना होगा। पेड़ की बड़ी डालियों पर मोटे-मोटे जामुन लगे हैं।' बंदर लालची था। झट से पेड़ पर चढ़ गया। तेज हवा का झोंका आया। पेड़ ने अपनी डालियां जोर से हिलाईं। बंदर के हाथ डाल से छिटक गये। बंदर विशाल पेड़ से जमीन पर ऐसा गिरा कि फिर उठ नहीं पाया। जामुन के पेड़ ने गिलहरी और गौरैया से कहा- ' जैसे को तैसा।'   

                                                                    

 मनोहर चमोली मधु 

                                                              

 

 

 

 

 
2) बाल गीत
 


चूँ चूं चिड़िया सभा बुलाए

शहर-शहर पर्ची छपवाए

सुबह-सुबह ही आना है

मिलने और मिलाने बाद

अच्छा अच्छा खाना है। 

 

 

 

गिलहरी रानी बड़ी सयानी

जाड़े की करती रहतीं तैयारी

कुछ खाती, कुछ है बचाती

जहाँ-तहाँ छुपाकर आ जातीं

बुरे वक्त को रहो तैयार

संदेश सदा ये देती जातीं।

       

-शैल अग्रवाल