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                                                                                                                                                                   चैपाल


                                                                                                                                                        वेद प्रताप वैदिक

चीन को दें करारा जवाब


                      आखिर चीन ऐसा क्यों कर रहा है? क्या कारण है कि वह हमारे कश्मीरी और अरूणाचली नागरिकों को वीज़ा वैसे नहीं दे रहा है, जैसे अन्य भारतीय नागरिकों को देता है? इन नागरिकों के पासपोर्टों पर वह वीज़ा नहीं छापता| उसका दूतावास इन नागरिकों को वीज़ा का एक अलग कागज पकड़ा देता है| वह कागज दिखाकर वे चीन में प्रवेश कर सकते हैं याने वह उन्हें वीज़ा तो दे रहा है लेकिन भारतीय पासपोर्ट पर नहीं ! यह फर्क वह क्यों कर रहा है ?

                      इस फर्क का मतलब साफ है| वह कश्मीर और अरूणाचल के नागरिकों को भारत का नागरिक नहीं मानता| दूसरे शब्दों में वह इन दोनों प्रदेशों को भारत का अंग नहीं मानता| इन्हें वह या तो चीन का प्रदेश मानता है या विवादास्पद प्रदेश ! कश्मीर में वह लद्दाख को अपना हिस्सा मानता है और शेष प्रदेश को पाकिस्तान का हिस्सा मानता है| पाकिस्तान ने 1963 में एक संधि के तहत चीन को कब्जाए हुए कश्मीर की हजारों वर्गमील ज़मीन भी भेंट कर दी है| जिन दिनों राजीव गांधी चीन के साथ राजनयिक संबंध सामान्य बनाने की क़वायद कर रहे थे, तत्कालीन चीनी राजदूत भारत के बारे में मीठी-मीठी बातें करने लगे थे| उन्होंने कहा कि वे सारा भारत घूमना चाहते हैं| मैंने कहा आप कश्मीर से ही शुरू क्यों नहीं करते तो वे तपाक से बोले कि ''कश्मीर तो मैं बिल्कुल नहीं जा सकता|'' मैंने पूछा, ''क्यों'' तो बोले कि ''मेरे कश्मीर जाने का अर्थ होगा, यह मान लेना कि कश्मीर भारत का हिस्सा है|''

                     कश्मीर और अरूणाचल भारत के अंग नहीं हैं, यह चीन की पुरानी और दृढ़ मान्यता है| माओ त्से तुंग लद्दाख, अरूणाचल, सिक्किम वगैरह को चीन की उंगलियां कहा करते थे| अरूणाचल के तवांग-क्षेत्र् को चीन अपना हिस्सा इसलिए मानता है कि उसके अनुसार तंवाग कभी तिब्बत का हिस्सा रहा है और तिब्बत आजकल चीन का हिस्सा है| 2003 में जब वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया तो चीनी सरकार ने आश्वासन दिया था कि वह अरूणाचल पर विवाद को खत्म करने की कोशिश करेगी| उसने चीन के नक्शे से अरूणाचल को हटाने के संकेत भी दिए थे लेकिन पिछले छह वर्षों में चीन टस से मस भी नहीं हुआ है| उसने सिर्फ दलाई लामा के तवांग जाने का ही विरोध नहीं किया है, भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अरूणाचल जाने को भी आपत्तिजनक बताया है| इससे बढ़कर चीन की हिमाकत क्या हो सकती है ?

                इसे कूटनीतिक दुस्साहस के अलावा क्या कहा जा सकता है ? इस दुस्साहस का जवाब क्या है ? इसका सीधा जवाब यही है कि चीन के तिब्बत और शिन-च्यांग (सिंक्यांग) में रहनेवाले नागरिकों को भी भारतीय दूतावास अलग कागज़ पर वीज़ा देने लगे| वीज़ा के बजाय वह उन्हें सिर्फ 'प्रवेश-पत्र्' देने लगे| तिब्बत के लोग तिब्बती हैं, हान नहीं| इसी प्रकार सिंक्यांग के लोग उइगर मुसलमान हैं| वह उन्हें 'राज्यविहीन नागरिक' भी घोषित कर सकती है, जैसे कि तालिबान के ज़माने में अफगान नागरिकों को किया जाता था| दूसरे शब्दों में हम बिना कहे ही यह कह देंगे कि हम तिब्बत और सिंक्यांग को 'राज्यविहीन' क्षेत्र् मानते हैं| यदि हम ऐसा करें तो चीनी सरकार के पसीने छूट जाएंगे|

                         यदि हम यह जवाबी कार्रवाई नहीं करते हैं और सिर्फ विरोध-पत्र् पठाते रहते हैं तो यह शुद्घ दब्बूपना होगा| इसके परिणाम आगे जाकर काफ़ी घातक होंगे| यह विचित्र् है कि हम अपने कश्मीरियों और अरूणाचलियों को अपने ही हवाई अड्डों से वापस लौटा रहे हैं ! जिन्हें चीन जाकर पढ़ाई या नौकरी या व्यापार करना है, हम उनके अवसरों पर कुठाराघात कर रहे हैं| उनका कसूर क्या है ? कसूर चीन का है और नुकसान हमारे नागरिकों का हो, यह कैसी कूटनीति है ? यदि हमारे कश्मीरियों और अरूणाचलियों को  हम चीन नहीं जाने देंगे तो इसमें चीन का क्या नुकसान है ? यदि हम चीन को उसी की भाषा में जवाब दे तो क्या होगा ? चीन क्या कर लेगा ? वह कुछ नहीं कर सकता ! ज्यादा से ज्यादा वह तिब्बती, उइगर, मंगोल, मंचू, किरगिज़ मूल के यात्रियों को भारत नहीं आने देगा| न आने दे तो मत आने दे| भारत का क्या बिगड़ रहा है ? कुछ नहीं ! भारत के अरूणाचली और कश्मीरी तो 'कागज़-वीज़ा' पर चीन जाते रहेंगे|

                  यदि चीन दादागीरी पर उतर आए तो वह क्या करेगा ? वह ऐसा क्या करेगा, जो अभी नहीं कर रहा है ? उसने पाकिस्तान को परमाणु हथियार दिए, तीनों युद्घों के दौरान कूटनीतिक समर्थन दिया, बलूचिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह बना दिया और उसे भारत के विरूद्घ उकसाता रहा| उसने नेपाल और म्यांमार तक रेल्वे-लाइन डालना शुरू कर दिया है| श्रीलंका में वह हन्मंतोता बंदरगाह बना रहा है| बांग्लादेश से होकर गैस की पाइप लाइन भारत नहीं आने दे रहा है| वह भारत को सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बनाने पर अपने होंठ सिले हुए है, जबकि साम्यवादी चीन को मान्यता देनेवाला पहला देश भारत ही था और भारत ने ही उसे संयुक्त राष्ट्रसंघ में प्रवेश दिलवाने की कमान थाम रखी थी| वह परमाणु सप्लायर्स ग्रुप में भारत-अमेरिकी परमाणु सौदे के विरूद्घ काम कर रहा है| अरूणाचल को मिलनेवाली विश्व-बैंक की सहायता में भी उसने अडंगा लगाया है| अफगानिस्तान में उसने तीन अरब डॉलर देकर तांबे की खदानें खरीद ली है| ईरान में वह गैस के सौदे में भारत को पछाड़ रहा है| भारत के सभी पड़ौसी देशों में वह अपने पांव पसार रहा है|

                  मान लें कि वीज़ा के मुद्रदे पर चीन भारत से नाराज़ हो जाएगा| तो क्या वह व्यापार बंद कर देगा ? 60 बिलियन डॉलर के आपसी व्यापार में भारत के मुकाबले चीन को ज्यादा फायदा है| चीन का विदेशी व्यापार इधर इतना घट गया है कि अब वह ऐसा खतरा मोल नहीं लेगा| भारत भी नहीं चाहेगा कि चीन से संबंध खराब हों लेकिन वह यह न भूले कि भारत को चीन की जितनी गर्ज है, उससे ज्यादा चीन को भारत की गर्ज है| चीन के साथ भारत के संबंध सहज और घनिष्ट हों, यह जरूरी है लेकिन यह काम बराबरी के स्तर पर हो, यह बेहद जरूरी है|

(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)