यदि कभी बरमिंघम आएंगे, तो किसी न किसी मोड़पर, दूर से ही दिखती सड़कों की एक लम्बी स्पाघेटी ( सेवइयों)- सी कई-कई सड़कों वाली उलझी-उलझी, घुमावदार एक भूलभुलैया निश्चय ही आपको चमत्कृत और भ्रमित कर देगी, वैसे ही जैसे कि हर अप्रत्याशित और अनोखी वस्तु कर देती है--हजारों कारें ऊपर से नीचे, बाँए से दाँए हर दिशा में दौड़ती नजर आती हैं यहां पर । आँखें कहीं ठहर ही नहीं पातीं। वैसे भी किसी तेज घूमती चीज को अनदेखा कर पाना आसान नहीं, चाहे आवागमन विचारों का ही क्यों न हो?
शहर को सुचारु और जीवित रखने के लिए बनाया गया, शिराओं और धमनियों सा बिखरा यह सड़कों का जाल निश्चय ही बरमिंघम को आज एक नयी उर्जा और गति दे रहा है -बरमिंघम को चारो तरफ से लपेटे समेटे यह जन्कशन, अब न सिर्फ इस शहर की पहचान है, वरन इसकी जरूरत भी बन चुका है और बखूबी अपनी हर जिम्मेदारी निभा रहा है- रोज यह हजारों से बरमिंघम की पहचान कराता है और हजारों बरमिंघम वासियों को गन्तव्य तक पहुँचाता है। बरमिंघम, जो कभी कारों और औजारों के लिए ही नहीं, टोकिन के "हौबिट" के लिए भी जाना जाता था, कैडबरीज चौकलेट ही नहीं, मशहूर बेवरली स्कौट रिवौल्वर और रौल्स रौयस व जैगुअर कारों के लिए मशहूर था, अब आए दिन किसी न किसी प्रदर्शनी या सम्मेलन के लिए खबरों में रहने लगा है। चैम्बरलिन और शेक्सपियर जैसी प्रतिभाओं को हृदय से लगाए खड़ा इंगलैंड का यह बहुआयामी शहर सिर्फ पर्यटकों का ही आकर्षण केन्द्र नहीं, आज ब्रिटेन का दिल ( मध्य भाग के साथ-साथ औधेयोगिक केन्द्र) कहलाता है। सच्चाई तो यह है कि आज भी बरमिंघम एक ऐसा शहर है जो यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर कल्पना का आकाश छूना ही नहीं चाहता, अपितु बुनता रहता है। हमारे लिए तो यह बात और भी अहम् है क्योंकि दक्षिणी एशियन संस्कृति और सभ्यता अब इसके ताने बाने में रच-बस गई है। चाइना टाउन और सोहो रोड के चक्कर लगाए बगैर तो अब शायद बरमिंघमबासी अंग्रेजों का भी काम नही चल पाता है। वैसे भी पापड़ और चोमीन की लत ही कुछ ऐसी है--यही नही, ये तो ब्रूस ली या अमिताभ बच्चन ही नही.. शाहरूख खान और ऐश्वर्य राय को ही नहीं, शिल्पा शेट्टी और ढोंढी को भी अब तक भली भांति जान और पहचान चुके हैं। ब्रिटिश फैशन स्टोर्स और शो में अब भारतीय धुनें, भारतीय चेहरेः एक आम-सी बात होती जा रही है। आसपास का इलाका जो कारखानों और मिलों की चिमनी से निकलते धुँए की वजह से कभी ब्लैक काउन्टी कहलाता था, आज अधिकांश मिल और फैक्ट्रियों के बन्द हो जाने के बाद भी--चिमनियाँ से कोई धुँआ न निकलने के बावजूद भी, बढ़ती एशियन और अफ्रीकन आबादी की वजह से वास्तविक ब्लैक काउन्टी बन चुका है और आज बरमिंघम इंगलैड की करी कैपिटल के नाम से जाना जाने लगा है। भारतीय व्यंजनों की विविधिता ही नहीं, संगीत और कला के भी कई नए नए प्रयोग यहीं से शुरु हुए थे जो अब भारत से अमेरिका तक धूम मचा चुके हैं। रिमिक्स गानों की धूम तो पूरे विश्व में ही सुनी जा सकती है। कोने-कोने एशियाई दुकानें, धर्म संस्थान और आए दिन मनाए जाने वाले तीज त्योहार इस बात के गवाह हैं कि अब ब्रितानवी जीवन के हम अभिन्न हिस्सा हैं। ये आयोजन और जश्न-जुलूस--इसलिए भी प्रवासियों के लिए औरभी महत्वपूर्ण हो चले हैं, क्योंकि इन्ही के सहारे तो वे अपने खोए और छूटे जीवन को बचाकर रखने का सपना संजोते हैं। इन्ही दिवाली, मुहर्रम, नानक जयन्ती, रथयात्रा, जन्माष्टमी और बैशाखी के सहारे वे बच्चों को अपना रहन सहन, पहनावा उढ़ावा और तौर-तरीके ही नहीं, देश और उसकी यादें तक धरोहर में देना चाहते हैं। कुछ दिनों पहले अपने देश की एक खबर पढ़ी थी कि किसी ऐसे ही एक सार्वजनिक उत्सव के बाद अलीगढ़ में हुए सांप्रदायिक दंगों में एक त्रिलोकी नाम का युवक दिनदहाड़े सड़क पर गोली खाकर, कराहता और तड़पता ही मर गया था, बेमदद और असहाय--- अपने ही देश, अपने ही शहर और अपनों के ही बीच। परन्तु मरते ही दावेदारों और मददगारों में होड़ लग गई थी। पहले जावेद कहकर उसे दफनाया गया फिर अगले दिन ही दुबारा हिन्दू रीति-रिवाज से भी जलाया गया। जब हमारा धर्म और समाज इतना खोखला और निष्क्रिय है कि मृतक को भी चैन नहीं लेने देता, तो अब हम किस धर्म या मूल्य की बात करें ---कौनसी धरोहर दे पाएँगे हम अपनी भावी पीढ़ी को ? क्या वह जो बस बाँटेगी और तोड़ेगी, आडम्बर पूर्ण है। जिन्दों को ही नहीं, दिवगंतों को भी कब्जे में रखना चाहती है, प्रचार का मुद्दा बनाती है --- या फिर वह जिसकी संरचना समाज के संरक्षण के लिए की गई थी, और जो यदि ठीक से समझा जाए तो आज भी नैतिक और सामाजिक संबल बनकर लम्बे समय तक हमारा साथ निभाने की सामर्थ रखता है? कोई औकात नही हमारी कि हम इन महती सवालों को उठाएँ, या इन जलती समस्याओं के सेतोषपूर्ण हल ढूँढें, पर क्या हम जैसे आम आदमियों का भी कर्तव्य नहीं कि जो घट रहा है उसे देखें, सुनें और समझें, और यदि कुछ अवाँछनीय है, देश या समाज के हित में नही है, तो उसके खिलाफ आवाज उठा पाएँ? सभ्यता की इस इक्कीसवीं सदी में बहुत नहीं तो कम से कम तृणमूल मानवता तो अपेक्षित होनी ही चाहिए ? शायद कोई समर्थ सुन ले, सिर्फ पढ़े ही नही, सक्रिय सोच के साथ समझे इस कुंठित और रोगी समाज की इस मानसिकता को और सही निदान व उपचार ढूँढ लाए ---वैसे भी क्या सहित सोच का नाम ही साहित्य नही ?
जब हम किसी विषय, सोच या मुद्दे को उठाते हैं तो आपसी तारतम्य जरूरी होता है, बिल्कुल इन्ही उलझी फैली सड़कों सा, एक जगह पर खड़ी होकर ये भी तो कहीं भी आ जा सकती हैं, मनचाही मंजिलें सामने ला सकती हैं और कदम न उठाओ तो वहीं के वहीं...होते हुए भी कुछ नहीं। फिर यह तो संचार का युग है। भावों का सहज और सुचारु आदान प्रदान अब एक अभिलाषा नहीं, जरा सा प्रयास करें तो एक महती सच्चाई है, वह भी घर के अन्दर बैठे-बैठे ही, बिना अपनी आरामदेह कुर्सी से उठे बगैर ही। ---- कोशिश तो हमारी भी यही है कि सक्रिय और जागृत साहित्य और सोच से रूबरु रहपाएँ ---विदेश की मिट्टी में भी रची जा रही अनूठी काव्य व विचार-यात्रा के साथ-साथ चलें। ऐसी रचनाएं जो आज और अभी रची जा रही हैं, साथ साथ मिलजुलक पढ़ें और जानें। इनमें से कुछ तो ऐसी होंगी जो पाठकों के मन में एक विशेश स्थान लेकर रचनाकार को गौरव ग्राम में बिठा चुकी हैं, तो कुछ ऐसी भी होंगी, जो आज भी जंगली फूल सी अकथनीय सौंदर्य के बावजूद भी, किताबों के ढेर में खोई पड़ी हैं, सही गन्तव्य न पा सकी हैं--- किसी खयाल या संग्रह के कीमती गुलदान में न सज सकी हैं क्योंकि कोई नजर ही उनतक न पहुँच पाई है। कभी आपके पास आएँगे तो कभी आपको बुलाएंगे ---माध्यम व तरीका चाहे जो भी हो, लक्ष्य बस यही रहेगा कि मिलने मिलाने का, विचारों के आदान प्रदान का एक रोचक और सार्थक सिलसिला लगातार ही रहे। विश्वीकरण की हजार बातों के बावजूद भी हर देश की संस्कृति और सोच थोड़ी सी भिन्न होती है और यही भिनन्ता किसी साहित्य को अनोखे और विशिष्ट रंग देती है। शब्दावली और मानक सबमें नया अनूठापन आ जाता है, जो उस समाज की झलक ही नहीं, तत्कालीन प्रचलन और सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं से भी हमें अवगत कराता चलता है। इसी संदर्भ में याद आ रही हैं यहीं पर रची, युवा स्थानीय कवियत्री की अंग्रेजी में लिखी एक कविता जिसके बेबाक मानक इस बेझिझक और स्वच्छंद यूरोपियन धरातल पर ही जन्म ले सकते थे, भाव कुछ इस तरह से थे--- कल जब तुमने मेरे खयालों के साथ छेड़छाड़ की थी तो मेरा मष्तिष्क फूल गया था बधाई हो तुम्हे, नए नए पापा शायद तुम्हे तो पता ही नहीं कि तुम्हारे घर अभी अभी कुछ ही घंटे पहले चौबीस घंटे की लम्बी प्रसव वेदना बाद गोल मटोल कविता का जन्म हुआ है। दूसरा रंग देखिए। यह कविता भी बरमिंघम की ही है और उस स्थानीय कवियत्री की है, जो यहाँ की (बरमिंघम शहर की) पोएट लौरिएट भी रह चुकी हैं। इसमें माँ जो कि एक औजार बनाने वाले की पत्नी है, बच्चे को समझाती है कि यह तेजमय सूरज, चाँद कुछ और नहीं, पिता के हथौड़े की चोट से निकला हुआ आग का गोला है जो अपनी तेजी और गरमी की वजह से छिटककर आकाश पर जा पहुँचा है। सूरज, चाँद दो हिस्सों में बट गया है। यही नही, ये तारे भी उसी घर्षण से उत्पन्न चिनगारियाँ हैं जो उनके स्वेत बिन्दुओ में भीगकर झिलमिला रही हैं। किसी मजदूर नेता की आंदोलक सोच नहीं है यह, वरन् यहाँ के पढ़े लिखे समाज की प्रतिनिधि सोच है। यहाँ हर काम गौरव लायक होता है, चाहे वह कितना भी बड़ा हो, या कितना भी छोटा। सुबह-सुबह जो घर या सड़क साफ करता है शाम को वही साथ-साथ ब्रिज या क्रिकेट भी खेल सकता है--घृणा या हीन भावना का तो सवाल ही नही। सामाजिक उत्सवों में भाग लेता है। अच्छे और नेक कामों के लिए पैसे जमा करता है। सांस्कृतिक व सामाजिक समारोह आयोजित करता और करवाता है। संस्थाए चलाता है। समाज और उसके निर्णय में एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हर स्तर पर भाग लेता है --यानी कि व्यक्ति की पहचान व्यक्तित्व से है, जाति, समाज, वैभव या परिवार से नहीं, ओहदे से भी नहीं---यदि है भी तो बस तबतक ही, जबतक कि वह काम या नौकरी की वेशभूषा में है ---यानी कि ड्यूटी पर है। शायद यही वजह है कि ये पश्चिमी देश प्रगति करपाए और आजभी कर रहे हैं जबकि हमारे देशों की युवा प्रतिभाएँ और बुद्धिजीवी आजभी डिग्रियों को जेब में रखे कुंठा और भूख की चिता पे सुलग रहे हैं। यह सामाजिक सच आज भी क्यों हमारे गले में काँटे सा ही अटका है और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। विचारक और सुधारक महाकवि रहीम भी तो इसी छोटों और बड़ों की बराबर की महत्ता और योगदान को समझा रहे थे, जब उन्होंने कहा था कि,- " रहिमन देख बड़न को लघु न दीजिए डार / जहाँ काम आवै सुर्इं कहा करे तलवार।।" कोई भी समाज अपने पीर पैगम्बरों को, धर्म को नही भूलता। पीढ़ी दर पीढ़ी आयोजन और स्मारकों में सजा संवारकर रखता है इन्हें। हमारे त्योहारों की ही तरह यहाँ भी हर ईस्टर और क्रिसमस पर क्राइस्ट को याद किया जाता है। क्रिसमस जिसकी तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है और साथ में उपहार व दावतों का सिलसिला भी। पर कोशिश तो यह भी रहनी चाहिए कि हम उन नामों के साथ उनके संदेशों को भी याद रख पाएं। अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ते सच को सूली पर न चढ़ायें--- ये गलतियाँ फिर से न हों; यह सीख याद रखें---बस उपहारों के आदान प्रदान और मौजमस्ती के लिए ही त्योहार नहीं। त्योहार और मेलों की भीड़ और मेलमिलाप के कहकहों में विचारों का भी आदान प्रदान होते रहना चाहिए...नई और पुरानी पीढ़ियों के बीच एक सजगता, एक जागरूकता बनी रहनी चाहिए, जिससे कि नए युग की नई समस्याओं के सार्थक हल ढूँढा जा सकें। और यहीं आती है समाज के बुद्धिजीवी और कलाकारों पर जिम्मेदारी कि कैसे वे इन मूल सच और संदेशों को रोचक और ग्राह्र बनाते हैं--- पर क्या किसी भी समाज में संभव है ऐसा --इन्सान तो आजभी खुदसे बाहर तक नहीं आ पाया है--- अगर ऐसा हो पाता तो क्या रामराज्य का सपना, सपना न होकर एक यथार्थ न होता और इस यूटोपिया की कल्पना मात्र एक कल्पना ही नही, वास्तविकता न होती। पता नही कब हम विचारों की नजदीकी के इस महत्व को समझ पाएँगे। कुरुतियों और स्वार्थ के पहियों से कुचला, घायल समाज आज भी प्लास्टर में है और लंगड़ा घूम रहा है, चाहे बगदाद की सड़कें हों या फिर ब्रौडफर्ड, बनारस, अलीगढ़ या आसाम की--हम बस हाथ पर हाथ रखे दोष ही देते रह जाते हैं, लादेन. सदाम, बुश, ब्लेयर या फिर मायावती, मुलायम सिंह, आशाबापू या कोईऔर--जो भी--कोई भी--कहीं भी!
पर निराश होने की जरूरत नहीं। माना कि मानवीय आस आज आपदकालीन स्थिति में है, पर जिन्दा तो है। ---और शायद रहेगी भी। क्योंकि हम अभी भी कराह सुन सकते हैं। पूरी तरह से बहरे नही हुए हैं। आजभी सत्य शिव और सुन्दर की लौ क्षीण ही सही, टिमटिमा तो रही है।...