दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में स्थित महात्मा गांधी का ऐतिहासिक घर फ्रांस की एक टूरिज्म कंपनी ने खरीद लिया है। खबर है कि बापू की यह विरासत अपनी निर्धारित कीमत पौने चार लाख डॉलर(करीब पौने दो करोड़ रुपए) से दोगुनी कीमत में बिकी है।
कंपनी बापू के घर को गांधी संग्रहालय बनाना चाहती है। गांधी जी इस घर में वर्ष 1908 से 1910 तक रहे थे। इस घर को उस जमाने के मशहूर आर्किटेक्ट हरमन क्लेनबाक ने डिजाइन किया था। घर के पूर्व मालिक नैंसी और जेराड बल ने यह घर करीब 65 हजार रैंड (करीब चार लाख रु.) में खरीदा था। जेराड अब रिटायर हो गए हैं और इसलिए घर को बेचना चाहते हैं। दोनों ने कहा कि उन्हें इस बात की बेहद खुशी है कि घर के खरीदार गांधीजी की विरासत का सम्मान करते हैं।
गांधीजी ने यहां से सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व किया था। इस घर के अलावा यहां उनसे जुड़े कई अन्य यादगार स्थल भी हैं। इनमें मध्य जोहांसबर्ग में स्थित गांधी स्क्वायर, जोहांसबर्ग जेल, जहां बापू को एक बार कैद किया गया था, द विक्ट्री हाउस जहां वह वकालत किया करते थे। वहां हिंदुओं का अंतिम संस्कार गृह भी है जिसे गांधीजी ने बनवाया था। इसके अलावा डरबन और पीटरमारित्जबर्ग में भी उनसे जुड़े कई स्थल हैं।
साभारः Bhaskar News Thursday, October 08, 2009 03:40
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राष्ट्रस्तरीय भाषाई एकता सम्मेलन,सारस्वत सम्मान समारोहएवं कवि सम्मेलन
साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी,परियावां,प्रतापगढ का 28वां अधिवेशन 25-10-2009 को परियावां,प्रतापगढ में सम्पन्न हुआ। अधिवेशन में राष्ट्रस्तरीय भाषाई एकता सम्मेलन,सारस्वत सम्मान समारोह एवं अखिल भारतीय कवि सम्म्लन का आयोजन किया गया। आयोजन तीन सत्रों में अलग-अलग बंटा हुआ था। प्रथम सत्र में राष्ट्रस्तरीय भाषाई एकता सम्मेलन द्वितीय सत्र में साहित्यकारों का सारस्वत सम्मान समारोह तथा तृतीय सत्र में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया । भाषाई एकता सम्मेलन में देश भर से आये विभिन्न वक्ताओं द्वारा हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विकास एवं उनमें आपस में समन्वय विषय पर अपने अपने विचार रखे । प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता डाँ. भगवान प्रसाद उपाध्याय-अध्यक्ष तारिका विचार मञ्च, इलाहाबाद.डाँ. शिवेन्द्र तिवारी अध्यक्ष, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी,परियावां,प्रतापगढ,श्री वृन्दावन त्रिपाठी ‘रत्नेश’ सचिव, साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी,परियावां,प्रतापगढ,हितेश शर्मा, बिजनौर,डाँ, बाबू सिंह बालियान,डाँ. उमाशंकर द्विवेदी ‘मनमौजी’,सुखदेव पांडे ‘सरल’-हरदोई, डाँ विश्वबन्धु,रोहतक,डाँ सुरेश निर्मल पूर्व न्यायमूर्ति श्री रामचन्द्र शुक्ल एवं न्यायमूर्ति श्री सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव थे । सत्र का संचालन डाँ. इसरार क़ुरेशी अध्यक्ष,हिमाक्षरा राष्ट्रीय साहित्य परिषद व डाँ. वर्षा पुनवटकर, सचिव्,हिमाक्षरा राष्ट्रीय साहित्य परिषद द्वारा संयुक्त रूप सेकिया गया एवं अध्यक्षता डाँ, बाबू सिंह बालियान द्वारा की गयी । इस अवसर पर उन्नाव से पधारे श्री ज्ञानेन्दु की पुस्तक ‘अश्रुमुक्ता’ तथा कोलकाता से पधारे श्री श्यामलाल उपाध्याय की पुस्तक ‘नियतिनिक्षेप’ का लोकार्पण भी किया गया।
द्वितीय सत्र में अकादमी की प्रतिभा सम्मान योजना के अंतर्गत देश भर से आये विद्वान साहित्यकारों का सारस्वत सम्मान एवं अलंकरण समारोह का आयोजन किया गया। मुख्य रूप से निम्न साहित्यकारों को उनकी साहित्यिक सेवाओं एवं हिन्दी में रचनाशीलता के लिये सम्मानित एवं अलंकृत किया गया। कबीर सम्मान डाँ विश्वबन्धु,रोहतक, हितेश शर्मा, बिजनौर, मोहन द्विवेदी–गाज़ियाबाद एवं कतिपय अन्य साहित्यकारों को विवेकानन्द सम्मान डाँ, बाबू सिंह बालियान,डाँ. उमाशंकर द्विवेदी ‘मनमौजी’, श्री श्यामलाल उपाध्याय को ,पं अरुन कुमार त्रिपाठी स्मृति सम्मान अनिल शास्त्री ‘शरद’-देहरादून को,कला मार्तण्ड समीर कुमार मण्डल- मेरठ को, साहित्यवाचस्पति मानदोपाधि अशोक दीक्षित शेष –उन्नाव को, विद्यावाचस्पति मानदोपाधि भारत विजय बगेरिया-टीकमगढ व श्यामलाल उपाध्याय-कोलकाता को विद्यावारिधि मानदोपाधि डाँ सुरेश निर्मल,ईश्वर चन्द्र गम्भीर व डाँ. प्रदीप त्यागी मेरठ को प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त भी अकादमी द्वारा कई अन्य साहित्यकारों एवं विशिष्ट व्यक्तियों को उनकी विशिष्ट साहित्यिक सेवाओं एवं हिन्दी में रचनाशीलता के लिये सम्मानित एवं अलंकृत किया गया। इस अवसर पर तारिका विचार मंच, प्रयाग द्वारा भी कतिपय साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। सत्र का संचालन श्री वृन्दावन त्रिपाठी ‘रत्नेश’ व अध्यक्षता न्यायमूर्ति श्री सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा की गयी ।
तृतीय एवं अंतिम सत्र में एक भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें देश भर से आये कवियों द्वारा काव्यपाठ प्रस्तुत किया गया। ऊंचाहार से प्रेमचन्द्र इलाहाबाद से गीतकार स्नेही जी व नि:शंक जी, हरदोई से गीतकार सुखदेव पाण्डे ‘सरल’,मेरठ से गज़लकार कृष्ण कुमार वेदी, पं.ईश्वर चन्द्र गम्भीर, गीतकार डाँ. प्रदीप त्यागी व मयूर जी, गाज़ियाबाद से व्यंग्यकार मोहन द्विवेदी,देववन्द से कम्बोज जी,बिजनौर से डाँ.हितेश कुमार शर्मा व देहरादून से गीतकार व कवि अनिल शास्त्री ‘शरद’ ने देशभक्ति, श्रृंगार, व्यंग्य व समसामयिक चिंतन के बिन्दुओं से जुड़ी रचनाएं प्रस्तुत कर अपने काव्यपाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया । कवि सम्मेलन का प्रारम्भ हरदोई से आये गीतकार सुखदेव पाण्डे ‘सरल’ द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना ‘माँ शारदे बस प्यार दे’ से हुआ। बाद में उनके द्वारा प्रणय एवं श्रृंगार से जुड़े कई मुक्तक एवं गीत पढे जिनको श्रोताओं ने खूब सराहा। इलाहाबाद से आये गीतकार स्नेही जी द्वारा आंचलिक भाषा में गीत प्रस्तुत किया गया-बरसे झमाझम पानी बलम तनि हटियो किहाँ नी। मेरठ से पधारे गज़लकार कृष्ण कुमार वेदी ने कहा –‘पलकों पे आंसुओं को सजाने में रह गये’ मेरठ से पधारे गीतकार डाँ. प्रदीप त्यागी ने कहा- ‘मेरे रोने को खास बात न समाझा जाये, सिर्फ आंसू है ये बरसात न समझा जाए’। गाज़ियाबाद से पधारे व्यंग्यकार मोहन द्विवेदी ने कहा-‘नेता जुटा जुगाड़ में अफसर टाले काम,कहाँ जाय अब आम जन सारी सड़कें जाम’। मेरठ से ही आये मयूर जी द्वारा कहा गया- ‘कुदरत ने जो दिया वो उपहार बेटियाँ हैं, सृष्टि की इमारत का आधार बेटियाँ हैँ’। पं.ईश्वर चन्द्र गम्भीर ने कहा –‘जिन्हें सौंप दी है सत्ता वो जेब भर रहे हैं’। देववन्द से आये कम्बोज जी ने कहा-‘कभी सच्चाई लगती है कभी छलना सी लगती है, भरे इस मानसरोवर में युगों की प्यासी लगती है’। बिजनौर से आये कवि डाँ.हितेश कुमार शर्मा ने कहा-‘मन्दिर नहीं मन्दिरा भाई यह काले धन का प्रभाव है। देहरादून से पधारे गीतकार व कवि अनिल शास्त्री ‘शरद’ ने भौतिक प्रणय को दिव्यत्व की ओर ले जाते हुए एक सुन्दर एवं सरस गीत पढा-
‘तुम्हारे साथ जो पल जी लिया है चिरंतन प्रेम-अमृत पी लिया है’
कवि सम्मेलन का संचालन गीतकार मयूर जी एवं सुखदेव पाण्डे ‘सरल’ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया ।
-वृन्दावन त्रिपाठी ‘रत्नेश’’
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कौमी एकता का संदेश देता सर्वोत्कृष्ट कवि सम्मेलन
शमशेर अहमद खान
02 अक्तूबर 2009 की पूर्व संध्या पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के महान पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जन्म दिवस और विगत माह आयोजित किए गए हिंदी पखवाड़े के संपन्न किए जाने वाले समारोह को कुछ इस प्रकार से आयोजित किया कि आमंत्रित श्रोतागणों ने उदात्ता की परम अवस्था में न केवल कविता के विभिन्न रसों का आस्वादन लिया बल्कि बड़ी बेबाकी के साथ वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर की गई प्रतीकात्मक बिम्बों के माध्यम से उन अनुभूति के क्षणों को जिया भी.
भारतीय सांकृतिक संबंध परिषद के महानिदेशक श्री वीरेंद्र गुप्ता जी के प्रशासन का यह पहला कार्यक्रम था. उन्होंने दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम का शुभारंभ किया.
इस कवि सम्मेलन में आमंत्रित किए गए कविगण मंचीय कविता जगत के सितारे थे. इन जगमगाते सितारों में बेकल उत्साही,डॉ.कन्हैयालाल नंदन,उदय प्रताप सिंह,अशोक चक्रधर, बुद्धिनाथ मिश्र,दीक्षित धनकौरी,गजेंद्र सोलंकी,आलोक श्रीवास्तव और कवित्री रश्मि सानन थीं.
कवि सम्मेलन के संचालक कवि अशोक चक्रधर ने उपस्थित कवियों और अतिथियों का परिचय कराया. रश्मि सानन ने मां सरस्वती की वंदना मधुर कंठ से प्रस्तुत कर इंद्रलोक का सा समां बांध दिया.गजेंद्र सोलंकी ने मातृभूमि कीवंदना प्रस्तुत करते हुए आजादी के शहीदों व क्रांतिकारियों की भूमिका को याद कराया.उन्होंने छोटे-छोटे दोहों से जो समां बांधा उसे श्रोता सुनकर झूम उठे. चूंकि इस कवि सम्मेलन का आयोज 02 अक्तूबर की पूर्व संध्या पर किया गया था और हिन्दी पख्वाड़े का समापन समारोह भी था इसलिए गांधी जी और लाल बहादुर शास्त्री को याद किया जाना लाजिमी बात थी और सोलंकी की ये पंक्तियां स्मरणीय बन गईं---
जिसके आगे स्वर्गपुरी भी लगती जैसे बांदी है,
कि जिसका जर्रा-जर्रा हीरा-मोती, सोना-चांदी है.
अपनी इस भारत माता पर कैसे न मुझको गर्व न हो,
कि जिसका बेटा लाल बहादुर,जिसका बेटा गांधी हो.
इसके बाद उन्होंने जो कविताएं सुनाईं,वे एक से बढ़कर एक थीं. इनमें कुछ ऐसी थीं जिसे श्रोता कवि के साथ एकात्म होकर उन पंक्तियों को दोहराने के लिए सम्मोहित था, यथा—
धड़कता प्यारा हिंदुस्तान,नयन का तारा हिंदुस्तान,जहां से न्यारा हिंदुस्तान,
कि गंगा की कलकल सीने में,चंदन सी महक पसीने में,
मन में मुरली की मधुर तान ........
इसके पूर्व रश्मि सानन की ये पंक्तियां भी श्रोताओं की ओर से खूब सराही गईं....नाम लेकर चलते रहे तन्हा-तन्हा.ठोकर खाकर संभलते रहे तन्हा-तन्हा.अजनबी बनकर सीख लिया, हम अपनी पहचान बदलते रहे तन्हा-तन्हा.
कवि आलोक श्रीवास्तव की कविताएं काफी ऊंचाइयों का स्पर्श कराती रहीं.गीत से कहे गए उनके दोहे अंदर तक झकझोर गए.यथा---
भौंचक्की है आत्मा, सांसें भी हैरान,
हुक्म दिया है जिस्म ने खाली करो मकान.
आंखों में लग जाएं तो नाहक निकले खून,
बेहतर है छोटे रखें रिश्तों के नाखून,
तुझ में मेरा मन हुआ कुछ ऐसा तल्लीन,
जैसे गाएं सूर को आबिदा परवीन.
गुलमोहर सी जिंदगी,धड़कन जैसे फांस.
दो तोले का जिस्म है,सौ- सौ टन की सांस.
चंदा कल आया लेकर जब बारात,
हीरा खाकर सो गई एक दुखियारी रात.
गनीमत है नगरवालो लुटेरों से लुटे हो तुम,
हमें तो गांव में अक्सर दारोगा लूट जाता है.
चांद अगर पूरा चमके तो उसका दाग खटकता है,
एक बुराई तय है सभी इज्जतदारों में.
कल रात सुना है अंबर ने, सिर फोड़ लिया दीवारों से,
आखिर तुमने क्या कह डाला, सूरज चांद-सितारों से.
दो-एक दिन नाराज रहेंगे बाबूजी की फितरत है,
चांद कहीं टेढा रहता है सालों-साल सितारों से.
….. …. ….. …… …… ……
यह सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं,
मशरूफ हम बहुत हैं , मगर बेखबर नहीं.
अबतो खुद अपने खून ने साफ कह दिया,
मैं आपका रहूंगा मगर उम्र भर नहीं.
आ ही गए हैं ख्वाब तो फिर जाएंगे कहां?
आंखों से आगे फिर इनकी कोई रहगुजर नहीं.
बुद्धिनाथ मिश्र श्रृंगार रस के कवि माने जाते हैं.जब वे मंच पर काव्यपाठ के लिए उपस्थित होते हैं तो श्रोताओं की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं.प्रेम रस से भिगी उनकी दो कविताएं मंच पर काफी लोकप्रिय रही हैं, यथा—
तुम मेरे समीप आओगे मैने कभी नहीं सोचा था. और
एक बार जाल और फेंक रे मछेरे जाने किस मछली में बंधन की चाह हो.
काफी सराही गईं.
नंदन जी की कविताएं जीवन के अनुभवों से गुजरकर यथार्थ में ऐसी पगी होती हैं कि श्रोता उसमें स्वयं को देखने लगता है.
आपकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं—
जब से लगने लगे हैं अस्पताल के चक्कर,
सारी दुनिया मुझे बीमार नजर आती है.
और जहां मैं अपना दर ढूढ्ने निकला था,
वहां मुझे दीवार ही दीवार नजर आती है.
मेरे जेहन में कोई ख्वाब था,
उसे देखना भी अजाब था.
वह बिखर गया मेरे सामने,यह इल्जाम मेरे ही सिर गया.
डॉ. उदय प्रताप सिंह राष्ट्रीय परिदृश्य में जब अपनी अनुभूतियों को श्रोताओं तक ले जाते हैं तब श्रोतागण भी देश के हालात और बेबसी पर ्केवल समझने के अलावा कुछ नहीं कर पाता है. यथा—
पछुआ की ऐसी बीमारी,नई फसल पर संकट भारी,
उजड़ गई जब बगिया सारी,
तब चेती पुरवाई क्या?
बात समझ में आई क्या?
मेहनतकश को मुश्किल राशन,
उनका सोने का सिंहासन,
हर सिंहासन पर एक रावण, देते राम दुहाई क्या? बात समझ में आई क्या?
अपमानित हो रहा पसीना,
मुश्किल है इज्जत से जीना.
बेईमानी ताने सीना,
करती ये नेताई क्या? बात समझ में आई क्या?
बेकल उत्साही वरिष्ठ कवि हैं, मंच पर उनकी उपस्थित कवियों में जीवन का संचार भर देती है. अमीर खुसरो, रहीम और रसखान की परंपरा में आधुनिक भारत में वे अनेकता में एकता के प्रतीक हैं. जिस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद ने इस कौमी एकता पर आधारित कवि सम्मेलन का आयोजन करवाया था . अपनी पहली पंक्तियों में उन्होंने यों बयां कर दिया----
बापू जी की हर सिक्के पर छ्पी हुई तस्वीर,
रिश्वत में हम खर्च करें यही मेरी तकदीर.
मेरे पुरखे जायसी, रहिमन और रसखान,
मैं सुगंध हूं देश की, देश है मेरी जान.
देश है मेरी जान,कि सब हैं मेरे शैदाई,
गीत,छंद, अतुकांत, गजल, दोहे, चौपाई.
मैं हिंदी हूं ,यार मेरी औकात न पूछो,
मैं भारत की ज्योति, मेरी जात न पूछो.
इस यादगार कवि सम्मेलन का कुशल संचालन हास्य सम्राट कविवर अशोक चक्रधर ने किया. कविता पाठ के उपरांत संचालन कर रहे हास्य कवि ने जो तीर फेंके उसे श्रोताओं ने सिर-आंखोम ले लिया. बानगी देखें—
जल नहीं जंगलों में मिलता है,
खून मिल जाए तो नहाते हैं.
वीरप्पन की गजल गाते हैं,
एक जंगल है तेरी मूंछों मे,
हम राह जहां भूल जाते हैं.
कविता पाठ का यह कार्यक्रम अपने निर्धारित समय से काफी आगे तक चला लेकिन श्रोताओं की कविता सुनने की प्यास नहीं बुझी. नौ रत्नों की कविताएं ऐसी थीं जिसे श्रोतागण बार-बार सुनने का आग्रह करते जा रहे थे.
इस कवि सम्मेलन में विशेष अतिथिगणों में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री रामकृपाल सिंहा,सांसद श्री टी. मेनीया, पूर्व सांसद श्री हरिकेश बहादुर, डॉ. कृष्णवीर चौधरी,श्रीमती कुसुमवीर,डॉ. परमानंद पांचाल, हरचरण सिंह जोश, श्री वीरेंद्र प्रभाकर, श्री फोतेदार, प्रो. सत्यकाम, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, नारायण कुमार, डॉ. कमल किशोर गोयंका, डॉ. हरिपाल सिंह, उमाशंकर मिश्र सहित अनेक कला एवं संस्कृति से जुड़े लोग उपस्थित थे.
उत्कृष्ठ कोटि के कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन गगनांचल के संपादक अजय कुमार गुप्ता द्वारा किया गया. महानिदेशक श्री वीरेंद्र गुप्ता ने आमंत्रित कवियों पुष्पगुच्छ भेंट कर आभार प्रदर्शन किया.
शमशेर अहमद खान,2-सी,प्रैस ब्लॉक,पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली---110054
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संगमन के बहाने कथा-साहित्य की जनपक्षधरता पर विमर्श
हिन्दी साहित्य में गंभीर पहचान बना चुके `संगमन` का १५वां आयोजन उदयपुर में २ से ४ अक्टूबर २००९ को हुआ। नगर के समीप गांव बेदला स्थित आस्था प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित इस समारोह के सहयोगी जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड विश्वविद्यालय) के जन शिक्षण व विस्तार कार्यक्रम निदेशालय, आस्था व राजस्थान साहित्य अकादमी थे। तीन दिन के इस जमावड़े में बाहर से आये लगभग ४० कथाकारों और साहित्यकारों के अलावा नगर के साहित्यकार, पाठक व युवा छात्र-छात्राआंे की सक्रिय भागीदारी रही। नगर के आस-पास के शहरों कस्बों के साहित्यकारों-पाठकों की आवाजाही ने आयोजन को जीवंत बनाया। कथाकारों में सर्जनात्मक संवाद को सघन बनाने, युवा कथाकारों को मंच उपलब्ध करवाने व जन आन्दोलनों में साहित्यकारों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर केन्द्रित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने साहित्य और सामाजिक सरोकारों में एक नया आयाम जोड़ा। पहले दिन के सत्र का विषय `नयी सदी का यथार्थ और मेरी प्रिय पुस्तक` था। चर्चा की शुरुआत आलोचक विजय कुमार के वक्तव्य से हुई जो पोलेण्ड की विश्व विख्यात कवयित्री शिम्बोर्सका पर केन्द्रित था। विजय कुमार ने कहा कि लेखिका ने वर्तमान के यथार्थ को उभारने का जो प्रयास किया है, वह हमको आज के समाज की यथार्थता के बिम्बों प प्रतीकों के मूल में छिपी नग्नता व छद्म को जानने की दृष्टि देने वाला है। उन्होंने कहा कि शिम्बोर्सका का जीवन यह भी दिखाता है कि एक रचनाकार किस तरह अपने समाज की विद्रुपताओं से जिरह करता हुआ समाज को वैचारिक ताकत देता है। विजय कुमार ने शिम्बोर्सका की कुछ मह>वपूर्ण कविताओं के अंशों को भी उद्धृत किया। चर्चित युवा कथाकार वन्दना राग ने राही मासूम रजा के प्रसिद्ध उपन्यास `आधा गांव` के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिक मनोदशा को स्वरूप व दिशा देनेवाले कारणों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि `स>ाा` किस तरह से सच्चाई से ज्यादा अफवाहों का आतंक फैलाकर अपना हित साधती है। बाहरी शक्तियों का असर हमारे अंदरूनी रिश्तों व समरसता की भावना को तोड़ता है। कवि व उपन्यासकार हरिराम मीणा ने `आदि धर्म` पुस्तक के माध्यम से आदिवासी जीवन व संस्कृति में पाये जाने वाले सकारात्मक पहलुओं को आत्मासात करते हुए आज के समाज में धर्म, पर्यावरण, वैचारिक संकीर्णता, अलगाव जैसी समस्याओं से निजात पाने की दृष्टि ग्रहण करने पर बल दिया। मीणा ने विकास के नाम पर आदिवासी समाज व जीवन पर आये संकटों की चर्चा करते हुए कहा कि सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण आदिवासी अस्मिता संकट में है। उन्होंने इस संकट से लड़ने में लेखकीय भागीदारी की अपेक्षा बताई। समालोचक एवं गद्यकार दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के उपन्यास `ईंधन` की चर्चा की। उन्होंने ईंधन को आज के युवा वर्ग के जीवन मूल्यों में आ गये अन्तर्द्वन्द्व, सामाजिक मनोवृि>ा व व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच नये अन्तर्विरोधों को समझने में आधारभूत उपन्यास बताया। उन्होंने उपन्यास से उदाहरण देकर स्पष्ट किया कि वैश्वीकरण और बाजारवाद का हमारे जीवन पर कितना गहरा असर पड़ा है। अग्रवाल ने इसे भारतीय परिदृश्य में हो रहे भूमण्डलीकरण पर लिखा गया पहला मह>वपूर्ण उपन्यास माना। इतिहास बोध के संपादक, इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने अपने उद्बोधन में सबसे पहले गाँधी के व्यक्ति और कृतित्व की चर्चा की उन्होंने गाँधी की सबसे बड़ी ताकत अपने पर गहरा विश्वास और साहस बताते हुये कहा कि आज की नई मानव विरोधी स्थितियोंं से लड़ने में ऐसी ही ताकत की जरूरत है। उन्होंने अपनी प्रिय पुस्तक हार्वर्ड फास्ट की `सिटीजन टोम्पेन` के कथानक पर कहा कि सृजन व संघर्ष में एक अन्तर्द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। हर सृजन जीवन के संघर्ष से उत्पन्न होता है तथा जीवन में ही अपनी सार्थकता को स्थापित करता है। उन्होंने यथार्थ के सर्जनात्मक पक्षों को उद्घाटित करने के साहस व उसके साथ चलने को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती बताया। चर्चा में कथाकार लता शर्मा, कैलाश बनवासी, डॉ. सर्वतुन्निसा खान, अनुपमा सिसोदिया ने भाग लिया। इससे पहले कथाकार महेश कटारे ने संगमन के शुभारंभ की घोषणा की। सुप्रसिद्ध कवि हरीश भादानी के निधन का समाचार सत्र के प्रारंभ होने से पहले मिल गया था अत: सभी ने दो मिनट का मौन रख श्रद्धांजलि दी। संगमन के स्थानीय संयोजक पल्लव ने सभी का स्वागत किया। सत्र का संयोजन कथाकार ओमा शर्मा ने किया। दूसरे दिन आयोजित कहानी पाठ सत्र में जयपुर के युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपनी कहानी `शराबी उर्फ हम तुझे वली समझते` व मुम्बई से आये वरुण ग्रोवर ने `डैन्यूब के पत्थर` का पाठ किया। अलग-अलग शैलियों में लिखी गई इन कहानियों पर विशद् चर्चा में यह बात मुखर हुई कि वरुण की कहानी प्रागैतिहासिक काल की होते हुए भी समकालीन सवालों टकराती है वहीं रामकुमार की कहानी को भाषायी रचनात्मकता व परिवेश को जीवंत बनाने के लिए उल्लेखनीय माना गया। कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने वरुण की कहानी के कथ्य को समकालीन मुद्दों से बचाव की युक्ति कहा तो वरिष्ठ लेखक लाल बहादुर वर्मा ने इसे असाधारण को साधारण बनाने का प्रयास बताया। उन्होंने भाषा के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वरुण की कहानी को दुस्साहसी बताया। सुभाषचन्द्र कुशवाहा ने कहा कि ये कहानियां मनुष्यता के संकट को हमारे सामने रखती है। युवा फिल्म समीक्षक मिहिर पंड्या ने वरुण की कहानी पर टिप्पणी में कहा कि इसके नायक व खलनायक एक ही पात्र में नजर आने से कहानी की सुन्दरता बढ़ी है। समालोचक प्रो. नवल किशोर, देवेन्द्र, ओमा शर्मा, सीमा शफक, जितेन्द्र भारती व पल्लव ने भी चर्चा में भागीदारी की। गालिब की पंक्ति के शीर्षक में प्रयोग पर हुई बहस पर लक्ष्मण व्यास ने कहा कि यह इस्तेमाल दादा-पोते के सम्बन्ध जैसा है जिस पर आपि>ा करना उचित नहीं होगा। इस सत्र का प्रभावी संचालन वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने किया। इस दिन की शाम उदयपुर भ्रमण हेतु रखी गई थी। सभी प्रतिभागी उदयपुर के समीप ऐतिहासिक स्थल सज्जनगढ़, बड़ी तालाब व फतहसागर गये। यहां की प्राकृतिक सुन्दरता ने लेखकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। तीसरे दिन के अन्तिम सत्र में `प्रतिरोध, जन आन्दोलन और साहित्य` विषय पर चर्चा का प्रवर्तन योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य से हुआ। कथाकार देवेन्द्र ने कहा कि कोई विचारधारा एक युग में मह>वपूर्ण होती है किन्तु वह अन्य युग में प्रभावहीन भी हो सकती है इसलिए विचारधारा से ज्यादा जरूरी विजन है। कथाकार शिवमूर्ति ने जन आन्दोलनों से लेखकों का जुड़ाव व अपनी रचनाओं में कला के सन्तुलित उपयोग को जरूरी बताया। आलोचक डॉ. माधव हाडा ने कहा कि लेखक को मध्य वर्ग के बदलते सरोकार एवं प्राथमिकताओं की जानकारी होनी चाहिये। शोधार्थी प्रज्ञा जोशी ने लेखकों के जन आन्दोलनों से जुड़ाव न होने से रचनाओं के प्रभाव में आ रही कमी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दमन के बढ़ते स्वरूपों को देखकर हमें प्रतिरोध के नये तरीकों को खोजना होगा। वरुण ग्रोवर ने जन आन्दोलनों को वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूर्त विचार कहा। उनका कहना था कि क्या सच कहना ही प्रतिरोध नहीं है ? हिमांशु पंड्या ने कहा कि किसी और को जवाब देने से पहले जरूरी है अपने आप को जवाब देना। चर्चा में मधु कांकरिया, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रतन कुमार सांभरिया, मंजू चतुर्वेदी, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. रईस अहमद, जितेन्द्र भारती, हबीब कैफी, विजय कुमार, कैलाश बनवासी और प्रो. नवल किशोर ने भाग लिया। समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि कथाकार वह है जो अमूर्त को आकृति दे। किसी रचना के स्वरूप को अस्वीकार किया जा सकता है किन्तु रचनाकार की ईमानदारी पर अंगुली उठाना अनुचित है। उन्होंने कहा कि प्रतिबद्धता विरोध ही है। बाहरी दृष्टि से मूल्यांकन की प्रवृि>ा को अनुचित बताते हुए उन्होंने कहा कि रचनाकार उलझनों को सुलझाने का काम करता है। गिरिराज किशोर ने नामवर सिंह के आलोचना कर्म की द्विधा पर प्रहार कर इसे वैचारिक जकड़ बताया। सत्र का संयोजन महेश कटारे व ओमा शर्मा ने किया। हिमांशु पंड्या ने स्थानीय आयोजकों की ओर से आभार माना। कथाकार प्रियंवद के संयोजन में हुए इस आयोजन के अन्य आकर्षणों में पंकज दीक्षित द्वारा लगाई गई कथा पोस्टर प्रदर्शनी, लघु पत्रिका प्रदर्शनी व पंडित जनार्दन राय नागर के साहित्य की प्रदर्शनी भी थी। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजन स्थल पर पुस्तक बिक्री की व्यवस्था थी। तीन दिन तक चले आयोजन में मूलचन्द्र पाठक, हरिनारायण, नवीन कुमार नैथानी, चरणसिंह पथिक, सुशील कुमार, अश्विनी पालीवाल, क़मर मेवाड़ी, ज्योतिपुंज, माधव नागदा, नन्द चतुर्वेदी, अमरीक सिंह दीप, कनक जैन, जितेन्द्रसिंह, डी.एस. पालीवाल, गजेन्द्र मीणा, गणेशलाल मीणा सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों ने भागीदारी की।
डॉ. सुधा चौधरी सी-२, दुर्गा नर्सरी रोड, उदयपुर-३१३००
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Manna Dey gets Dadasaheb Phalke Award
New Delhi: The Dadasaheb Phalke Award, the country’s highest honour in cinema, has been given to veteran singer Manna Dey.
Dey, who dominated playback music in from the 1950s to the 1970s, has recorded more than 3,500 songs. Some his popular compositions are Yeh Dosti from Sholay and Ek Chatur Naar from Padosan.
Dey has been previously been awarded with Padma Shri and Padma Bhushan.