बिल्लू अपने मेहनतकश मज़दूर मां-बाप का इकलौता बेटा था। वह उनकी उम्मीदों का सहारा था। होनहार बिल्लू दिन भर अपने मां-बाप की मदद करता और शाम को मन लगाकर पढ़ता। शाम के स्कूल में उसके अच्छे दोस्तों में कालू और ढीलू थे। दिन में जहां वह अपने मां -बाप के साथ रहता वहां पीपल का एक पेड़ था। उसपर गिल्लू गिलहरी रह्ती थी। बिल्लू अपना बचा हुआ खाना वहां छोड़ आता। गिल्लू उसे खा जाती। धीरे-धीरे गिल्लू ,बिल्लू की दोस्त बन गई।
कह्ते हैं सब दिन एक जैसे नहीं होते। बिल्लू और गिल्लू की दोस्ती परवान चढ़ ही रही थी कि किसी की बुरी नज़र उनपर लग गई। गिल्लू अपने दोस्त बिल्लू जैसा बन गई थी। वह भी बिल्लू की ही तरह अन्य पशु- पक्षियों की सहायता किया करती थी। एक दिन जब वह अपने मित्र बिल्लू का दिया हुआ अन्न ग्रहण कर रही थी थका-मांदा कालिया वहां आया और बड़ी ही दीनता से बोला, ‘बहन, गिल्लू! बहुत दिनों से भूखा हूं. मुझे भी थोड़ा सा खाना दे दो. मैं तुम्हारा बहुत्त आभारी रहूंगा.’ गिल्लू में बिल्लू ही जैसी दयालुता थी, कालिया के हालत पर तरस खाते हुए अपने खाने में शामिल कर लिया। कालिया बहुत धूर्त था। खाना मिलते ही अपनी मक्कारी पर आ गया और पूरे खाने पर कब्जा जमा लिया।
भोली-भाली गिल्लू एक जगह जाकर उदास बैठ गई। उसे पहली बार अपने भोलेपन का पछ्तावा हुआ,लेकिन अब पछताने से क्या होना था जब चिड़िया चुग गई खेत।