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                                                                                                                                                      माह के कवि

                                                                                                                                                         सुरश पन्डा

स्वप्न से जागा नहीं हूँ ।


स्वप्न से जागा नहीं हूँ ।

अमूर्त छबियों के झरोखे में बंद तुमको देखकर

दीर्घ निश्वासों की कड़ी दिखती नहीं टूटेगी अब

कंदर्प को अब तक नहीं पहचान पाया था

कुसुम शर से बिद्ध होने का ही था अहसास कब ।

 

भाव जलनिधि का अतुल विस्तार क्या देखा कहीं

अपनी इयत्ता को सकल साकार बस देखा वहीं

फिर न कहना जागतिक अनुताप का भय

विकल हो भागा कहीं हूँ ।

 

स्वप्न से जागा नहीं हूँ ।

 

अनकही बातें पुरानी आज फिर आतुर हुई हैं

तृप्त मन की वंदना फिर आज अभिमंत्रित हुई है

मापने की क्या जरुरत नया सा कुछ भी नहीं है

होने न होने का नहीं संशय अटल विश्वास ही है ।

 

रुप , रस और गंध की बढ़ती पिपाशा

आसक्त मन का जागरण निःशेष आशा

कर रहा है दर्पमय जयघोष फिर अपने अहं का

अवांतर की जोड़ का धागा नहीं हूँ ।

 

स्वप्न से जागा नहीं हूँ ।


 

 



मन मेरा चंचल हुआ है ।



 


जागरण की ले अभिप्सा दूर तक चलता रहा हूँ

अठखेलियाँ करता रहा तन जानकर गलता रहा हूँ

एक अनसुलझी पहेली है मुझे फिर आज घेरे

भ्रान्ति में करता रहा हूँ अनगिनत अनवरत फेरे ।

 

प्यास की उस तीव्रता ने अश्वगति को छू लिया है ।

मन मेरा चंचल हुआ है ।

 

कामनामय ज्वार थमने का नहीं है नाम लेता

सरस उर की धड़कनों से भी अजाने काम लेता

प्रार्थना के स्वर अबोले कंठ से झरते नहीं हैं

विकल मन में राग के कुमकुम बिखरते जा रहे हैं ।

 

थिर नहीं होता है तन मन कौन जाने क्या हुआ है ।

मन मेरा चंचल हुआ है ।

 

अहम की सत्ता निराली फैलती चौदह भुवन में

दर्प बनकर है खड़ा अगुवार फिर अपने बरन में

स्वाँस बेचारी बनी चढ़ती उतरती जा रही है

काल के आगोश में स्वयमेव तिरती जा रही है ।

 

फिर भुलावे में रहा जी, स्वप्न क्या कब सच हुआ है ।

मन मेरा चंचल हुआ है ।


 

 

 



तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा



 


स्निग्ध स्नाता चाँदनी थी मन विहग था पाँख खोले

तरंगायित रागिनी के मदिर स्वर थे सुमन फूले

उल्लास का पर्वत हरा था बरसते थे मेह झरझर

भोर का तारा उगा था हर्ष का मनुहार बनकर ।

 

बाट तकने की न सुध आई सुवाषित था बसेरा

तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा

 

ओस भीगी यामिनी थी कांपते थे अंग मेरे

टीसती थी अलस काया ताप के थे तंग घेरे

नयन अश्रु से भरे थे विकल मन का संग पाकर

समय का आभास खोकर जगे थे आशा सुलाकर ।

 

स्पर्श की कमनीयता से बन रहा था पुलक घेरा

तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा

 

स्वप्न की माया ने दिखलाये अनेकों विरल रंग

शिखर को भी छू लिया अनुराग मुद्रा थी त्रिभंग

सजगता क्या भिन्न रुपा नाटिका बन जायेगी

संगिनी बनने की मेरी चाह ना घुट जायेगी ।

 

ओह कितना क्लेशदायी बन गया निज सत्य मेरा

तुम न आये लौटकर फिर, आ गया संदेश मेरा