क्यों खड़ी हम ने की हैं दीवारें दूर जब कर रही हैं दीवारें
जैसे कोई सवाल करता है इस तरह देखती हैं दीवारें
अब मुलाक़ात भी नहीं मुमकिन दरमियाँ आ गई हैं दीवारें
इक झरोका भी इन में रख लेना रौशनी रोकती हैं दीवारें
बारिशों ने गिरा दिया छप्पर सिर्फ़ अब रह गई हैं दीवारें
लग के दीवानों-ओ-दर से रोता हूँ और मुझे देखती हैं दीवारें
कितना दुशवार है सफ़र 'परवाज़' हर क़दम पर उठी हैं दीवारें।
ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ मुश्किलें हैं सफर में क्या क्या कुछ फूल से जिस्म चाँद से चेहरे तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता था हमारे भी घर में क्या क्या कुछ शाम तक तो नगर सलामत था हो गया रात भर में क्या क्या कुछ हम से पूछो न जिंदगी ‘परवाज़’ था हमारी नजर में क्या क्या कुछ
यूँ ही उदास है दिल बेकरार थोड़ी है मुझे किसी का कोई इंतजार थोड़ी है नजर मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसे तुम्हारे दिल पे मेरा इख़्तियार थोड़ी है मुझे भी नींद न आए उसे भी चैन न हो हमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी है ख़िज़ा ही ढूंडती रहती है दर-ब-दर मुझको मेरी तलाश मैं पागल बहार थोड़ी है न जाने कौन यहाँ सांप बन के डस जाए यहाँ किसी का कोई ऐतबार थोड़ी है
यार पुराने छूट गए तो छूट गए कांच के बर्तन टूट गए तो टूट गए सोच समझ कर होंठ हिलाने पड़ते हैं तीर कमाँ से छूट गए तो छूट गए शहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थे मेरे सपने टूट गए तो टूट गए इस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये भाग किसी के फूट गए तो फूट गए छोड़ो रोना धोना रिश्ते नातों पर कच्चे धागे टूट गए तो टूट गए अब के बिछड़े तो मर जाएंगे ‘परवाज़’ हाथ अगर अब छूट गए तो छूट गए