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                                                                                                                                                                  परिचर्चा


                                                                                                                                                   सुशील कुमार

कविता का गद्य-रूप और भावबोध: कुछ विचार

यह गंभीरता से विचारने का वक्त आ चला  है कि वे कौन-कौन से कारक हैं जिसने कविता को आमजन से दूर कर दिया है जहाँ संचार-तकनीक की नित्य फैलती इस मायावी दुनिया में कविता की जगह निरंतर सिकुड़ती जा रही है। हालाकि यह विचार भी अर्धसत्य ही है क्योंकि वास्तव में यदि कविता का संसार लघुतर हो रहा होता तो फिर रोज़ इतनी कवितायें क्यों लिखी जातीं?  आखिर कौन लिख रहा इन्हें और पढ़ कौन रहा ? इतना तो अवश्य  है कि कविता में जो बोझिलता, उबाऊपन और नीरसता के जो अक़्स आये हैं उससे पाठकों में वह चाव  नहीं रहा जो आज से दो-तीन दशक पहले हुआ करता था। इस कारण कविता जितनी तेजी से आज लिखी - पढ़ी जाती है उतनी ही गति से विस्मृत भी हो जाती हैं। खुद कवियों तक को अपनी कवितायें याद नहीं रहती। मैं बात मंच पर गाने वाली कविता की नहीं कर रहा। पर निराला, जयशंकर प्रसाद, दिनकर, महादेवी,  पंत, मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियाँ हमारे जेहन में आज भी गाहे-ब-गाहे आ जाती है। इसके क्या कारण है? क्या आज कविता अपने मूल स्वभाव से विलग हो गयी है? क्या हमने अपनी बुद्धि-विस्तार में कविता की भावपरायणता को इतना दरकिनार कर दिया है?  विचार-बोध के प्राबल्य से रची कविता में वह लोच क्यों नहीं आ पा रही जो पहले की कविता में हुआ करती थी?
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मध्यकालीन भक्ति-साहित्य को कुछ लेखक-पाठक हिन्दी काव्य का स्वर्ण-युग मानने से कतराते हैं और अपनी बात के समर्थन में यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि धर्म-अध्यात्म इस देश की जड़ में है, यह यहाँ की परम्परा का उत्स रहा है। यही कारण है कि सूर-कबीर-तुलसी-जायसी साहित्य के पुरोधा-कवि हो गये।आगे वे कहते हैं कि  जिन घरों में कोई साहित्यिक माहौल नहीं, वहां भी तुलसी की चौपाईयाँ और कबीर के सबद गाये जाते हैं। उनका यह भी कहना है कि अगर उन्होंने कालजयी साहित्य का सृजन किया होता तो आज के दौर में उनकी कृतियां भी अपेक्षाकृत क्यों कम पढ़ी जाने लगी हैं।
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अंतर्जाल पर आम तौर पर जो कवितायें लिखी जा रही हैं वह मध्यमवर्गीय बुर्जुआ सोच की तस्वीर की ही है। उनका मानना है कि अगर साहित्य में सार्वजनीनता और सार्वदेशिकता की बात होती है तो उसमें सब सम्मलित होता है यानी कि रूपवादी भाव और मध्यमवर्गीय सोच से बुनी-रची कवितायें भी साहित्य का प्रधान अंग होना चाहिये और उसको भी उतना ही दर्जा मिलना चाहिये। सोवियत-युनियन के विघटन के बाद मार्क्स-वाम सत्ताधीशों का जिस तरह से पतन हुआ और वहां के गणराज्य अलग होकर पूँजीवाद के हिमायती हो गये, रूस जैसे देश जी- आठ ग्रुप में शामिल हो गये और पूँजीवाद के समर्थक देश बन गये, उसके बाद तो जन- सामान्य में भी यह विचार तेजी से घर कर गया कि वाम विचार-धारा का इतिश्री हो चुका है। जनवादी लेखकों के गिरते चरित्र का हवाला देकर अब वे लोग कविता या कहें पूरे साहित्य को उसी दिशा में घसीट कर ले जाने का उपक्रम कर रहे हैं जिस दिशा में उनकी सोच और संस्कृति अग्रसर हो रही हैं। यहां बाजारवाद गहरी चोट पड़ रही है और लोग लोकधर्मिता और जनचेतना को बाज़ार का बलि बना देने पर आमादा हैं।
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कुछ समय पहले आज की गद्य-कविता के स्वरूप को लेकर प्रसिद्ध कथाकार संजीव जी ने कई जेनुईन सवाल उठाये थे और जयपुर की कविता पत्रिका "कृति-ओर" में इस पर लम्बी बहस चल पड़ी थी। यह ठीक है कि आज जितनी भी कविता लिखी जा रहीं है, उसे काव्य- रूप-विधान की दृष्टि से जाँच-परखकर कविता को परिभाषित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जरूरी है कि कविता को हर सूरत में कविता ही बना रहना चाहिये। वह गद्य के वेश में भी कविता रहे, यह उसकी पहली शर्त होनी चाहिये। निराला ने जब पुराने छंद का बंधन तोड़कर, गद्यात्मक वाक्यों से बने हुए मुक्त-छंद को अपनाया था, तब उन्होंने अपने तरह से, उसके लिये छोटे-छोटे , क्रियाशील और सिद्ध वाक्यों की संरचना को काम में लेकर एक नयी राह खोली थी। उन्होंने उसे मुक्त करते हुए भी उसे "कवित्त" छंद की लय को उसकी रूप संरचना में बनाये रखा था। उसके बाद दूसरे और तीसरे तारसप्तक के कवियों ने भी कविता में प्रगीत के अनुशासन को बनाये रखा। इसी तरह सप्तकों के बाहर के कविगण नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल,  मुक्तिबोध, त्रिलोचन, विजेन्द्र,  एकान्त श्रीवास्तव इत्यादि कवियों ने भी कविता की लय पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया। परन्तु कविता में अराजकता की प्रवृति तबसे अधिक लक्षित होने लगी जबसे आलोचना में आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल के बाद कविता के रूप संबंधी प्रश्नों पर गंभीरता और सावधानी नहीं बरती गयी। इसकी फलश्रुति यह हुई कि अकविता का मौहाल बनने लगा और कविता के नाम पर एक तरह की उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित किया जाने लगा। फलत: कविता के रूप में लद्धड़ गद्य-रूप की कविता सामने आने लगी। कविता में प्रगीतात्मकता और बिम्बग्रहण का तिरस्कार किया गया। नामवर सिंह जैसे नामचीन आलोचकों ने कविता के नये प्रतिमान में भी पाश्चात्य शैली की कविता का अनुसमर्थन कर तत्कालीन भारतीय चित्त के श्रेष्ठ कवियों यथा त्रिलोचन, नागार्जुन जैसे कवियों की अपेक्षा रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा जैसे मँझोले कवियों की काव्य-व्यंजना को पाठकों के समक्ष प्रभावशाली ढंग से परोसा। नजीतन, कविता अपनी रूपाभा खोकर पूरी तरह गद्यात्मक और स्मृतिहीनता की जद में आने लगी। पर ये कवितायें जब दृश्य में देर तक टिक न पायीं तो फिर कविता के क्षितिज पर कई कवि उदित हुए जिनकी लोकधर्मिता और इन्द्रियबोधात्मकता के कारण उनकी कविता महत्वपूर्ण मानी गयीं।
                 जहाँ तक कविता की स्मृति का प्रश्न है तो यह बात सही नहीं कि सारी गद्य कविता लयविहीन और नीरस है। कविता अब श्रव्य होने के बजाय ज्यादातर पाठ्य हो गयी है। स्मृतिपरकता कविता की कसौटी नहीं हो सकती। श्रुति परम्परा में तो लोगों ने पूरे वेद को ही कंठाग्र कर लिया था।पर वह सब काव्य की परिधि में नहीं आता। हमारे कवियों ने मुक्तक और प्रबंध काव्य के साथ -साथ गीति-काव्यों की भी रचना की। आधुनिक युग में भारतेन्दु, प्रसाद और निराला इसके प्रमाण हैं। जहाँ तक गीत का सवाल है, वह कविता से स्वतंत्र विधा है। हमें छंद से आज भी परहेज नहीं,  कोई लिखता है तो अच्छी बात है। पर आज जीवन जितना व्यापक, जटिल और कठोर हो गया है और यथार्थ जितना दुरुह कि पूरे जीवन के स्पंदन और रंग को छंदयुक्त कविता में समेट पाना संभव नहीं। ध्यान देने वाली बात है कि छंद योजना के अंदर भी पहले विद्रोह हुए थे और कवियों ने परम्परागत छंद-योजना की जगह भावानुकूल छंद-योजना योजना को अपनाया था। यह तो युग के भीतर जो स्पंदन है उसकी पुकार है कि कविता का स्वरूप क्या होगा और उसी से वह तय भी होता है। तभी तो एक समय रामधारी सिंह "दिनकर’ जैसे कवि ने सायास छंद-योजना की अपेक्षा भावानुकूल छंद-योजना पर बल दिया। इसी कारण परम्परा-प्राप्त छंदों के स्थान पर नये छंदों के निमार्ण की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने लिखा कि-
“अब वे ही छंद कवियों के भीतर से नवीन अनुभूतियों को बाहर निकाल सकेंगे जिसमें संगीत कम, सुस्थिरता अधिक होगी, जो उड़ान की अपेक्षा चिन्तन के उपयुक्त होंगे।क्योंकि हमारी मनोदशाएँ परिवर्तित हो रही हैं और इन मनोदशाओं की अभिव्यक्ति वे छंद नहीं कर सकेंगे जो पहले से चले आ रहे हैं।”क्योंकि वे मानते थे कि-“कविता के नये माध्यम यानी नये ढाँचे और नये छंद कविता की नवीनता के प्रमाण होते हैं। उनसे युगमानस की जड़ता टूटती है, उनसे यह आभास मिलता है कि काव्याकाश में नया नक्षत्र उदित हो रहा है। जब कविता पुराने छंदों की भूमि से नये छंदों के भीतर पाँव धरती है, तभी यह अनुभूति जगने लगती है कि कविता वहीं तक सीमित नहीं है जहाँ तक हम उसे समझते आये हैं बल्कि और भी नयी भूमियाँ है जहाँ कवि के चरण पर सकते हैं। नये छंदों से नयी भावदशा पकड़ी जाती है। नये छंदो से नयी आयु प्राप्त होती है।”
                       इसी प्रकार वर्तमान में कविता की आवश्यकता मुक्तछंद में ही पूरी हो सकती है क्योंकि जीवनानुभव की संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये कविता के गद्य-रूप को छोड़कर किसी अन्य रूप का वरण करना कदाचित संभव नहीं। पर आवश्यकता है उसके गद्य-रूप को सँवारने की। इसके लिये कविता में ‘लय’ के अभ्यास की महती आवश्यकता है। वही कविता का प्राण है जो कविता को कविता बनाये रख सकता है अन्यथा राजेन्द्र यादव जैसे अलेखक-अकवि ‘चिल-पों’( हल्ला-गुल्ला) मचायेंगे ही कि यह युग कविता से मुक्त होने का युग है। लय तो सारी सृष्टि में भी वर्तमान है।लय के बिना जीवन भी नहीं। स्वाँस-प्रस्वाँस में भी लय और संगति है।पर दीगर है कि  कविता में यह लय चार कारकों से आती है-1) बिम्ब-ग्रहण 2) प्रगीतात्मकता 3) इंद्रियबोध और 4)सघन जीवनानुभव|
                अर्थ-ग्रहण कविता को सपाट और नीरस बनाता है। बिम्ब-ग्रहण का अभिप्राय है वस्तु पर प्रत्यारोपित विचार की जगह वह भाव जो कवि की कल्पना-शक्ति को भाव-लोक में मूर्तिमान कर दे। यानी वस्तु के भौतिक विश्लेषण के बजाय उसकी आंतरिक भावमयता को कवि आत्मसात करे जो वस्तु में न होकर कवि की अपनी अर्जित संपत्ति हो जाती है। प्रगीतात्मकता से गद्य का विन्यास कविता के विन्यास में बदलता है। उसी प्रकार कवि का इन्द्रियबोध तब प्रखर होता है जब वह सिर्फ़ मन से काम नहीं लेता बल्कि कवि का हृदय और ईश्वर की दी हुई समस्त इन्द्रियाँ यथा आवश्कतानुसार आँख, कान, नाक़, जीभ, त्वचा सब सृजनकाल में समान रूप से सक्रिय हों। आजकल कमरे में बंद होकर जो किताबी कवितायें लिखी जाती हैं उनमें इनका नितांत अभाव होता है। पर यह लक्ष्य करने वाली बात है कि सघन जीवनानुभव व्यष्टि को समष्टि से जोड़ता है, उसे व्यक्तिपरक आत्मबद्धता से मुक्त कर उसकी रचना का आयाम को वृहत्तर और गहराई प्रदान करता है और उसकी रचना का समाजीकरण भी करता है जिससे रचना में युग-बोध के गुण प्रकट होते हैं।
                 आप पायेंगे कि भक्ति काल की रचनाओं में ये तत्व समस्त रूप से पूरी शिष्टता और प्रभूता से विद्यमान हैं जो युगमानस की जड़ता को तोड़ने में सहायक हुए और वह युग कविता का स्वर्णिम युग कहलाया, न कि धार्मिक मतांधता के कारण। मध्ययुगीन भक्तिकाल के काव्य की साहित्यिक अर्थवत्ता का मतलब भी सिर्फ़ उसकी पारिभाषिक विवेचना ( literal translation)  से नहीं समझा जाना चाहिये, बल्कि इसका संबंध उसकी भावमयता से है जिसके केन्द्र में मानव का हृदय है न कि खाली  मन और विचार का उद्वेग । इसी सुदीर्घ भाव-परम्परा की भूमि पर कविता के आत्म-पक्ष का संधान होना चाहिये न कि पाश्चात्यायातित उन विचारों की पृष्ठभूमि में जहाँ न हमारी तरह समृद्ध लोक है न कला वर्ना लोक का अर्थ फोक बनकर रह जायेगा और कविता भी दिनानुदिन लोक से अलग होती चली जायेगी।