इस अंक में- कविता धरोहरः तुलसीदास। माह विशेषः नई पुरानी कविताओं के दो संकलनः1.दीपमालाः नई कविताः रामअवतार त्यागी।, 2. प्यारे बापूः नई कविताःअज्ञात, शैल अग्रवाल, रामाश्रय सिंह। माह की कवियत्रीः रचना श्रीवास्तव। कविता आज और अभीः आचार्य सारथी 'रूमी', गिरीश पंकज, अगेन्द्र, रामनिवास मानव। बाल कविताः चन्द्रपाल यादव 'मयंक', रामेश्वर कम्बोज ' हिमांशु ' ।
मंथनःअमृता प्रीतम। नमनः शैल अग्रवाल। संस्कृतिः हजारी प्रसाद द्विवेदी। कहानी विशेषःसूर्यबाला। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। लघुकथाः डॉ. भारती खुबालकर, आलोक कुमार सातपुते।रागरंगः हेमा गुहा । परिचर्चाः सिमाला प्रसाद। मुद्दाः वेदप्रताप वैदिक। हास्य व्यंग्यः सुरेश अवस्थी।चौपालः वेद प्रताप वैदिक। बाल कहानीः रचना श्रीवास्तव। माह की साहित्यिक व अन्य खबरें से भरपूर विविधा।
पर्व और त्योहारों की बात होगी तो किसी खास संस्कृति, तबके या समाज की ही बात होगी और आज जब .ईद,दशहरा और दिवाली की बात हो रही है; राम और रावण की बात हो रही है, तो बस अंधेरे उजाले की ही नहीं, हमारी-आपकी बात हो रही है... हमारे रीति रिवाजों के साथ रागरंग हमारे रुझान, जीत और कमजोरियों -अतीत और वर्तमान सब सामने आएँगे। गांधी जयंती फिर दीपावली ज्योतिपुंजों में आस्था का पर्व बनकर आया है अक्तूबर का यह महीनाः पर्व जो हमारी संस्कृति और सभ्यता के अभिन्न अँश हैं और दिवाली में अली और रमादान मे राम को साथ लेकर आते हैं हमारे समाज में...सद्भावना, सदाचार. सहयोग और मेल-मिलाप का अनूठा संदेश देते हैं। पर क्या वाकई में याद करते हैं हम उन आदर्शों को और सत्य का अनुसरण करते उनके कठिन और अडिग जीवन संघर्ष को? या फिर दशहरा हो या दिवाली आज ये दिन त्योहारों की लम्बी श्रृंखला में मात्र एक और त्योहार ही बनकर रह गए हैं ? मौज और मस्ती का एक और मौका...!
क्यों अब समझ से परे हैं ये बातें...क्यों आपसी प्रेम और त्याग की बातें आज किसीके समझ में नहीं आ पातीं, या उन्हें कोई समझना ही नहीं चाहता...असम्भव और अव्यवहारिक लगती हैं, सच कहें तो फुरसत ही नहीं समझने की? क्या वाकई में आज की पीढ़ी इतनी भ्रमित हो गई है...इतनी हताश और निराश हो गई है हमारी गलती और असफलताओं से कि अंधेरे और उजाले का फर्क ही करना भूल चुकी है? क्या पूरा विश्व ही आज आगे-पीछे की सोचे बगैर बस जो है उसीको भोगना और जीना नहीं चाहता, वह भी अपनी तरह से और अपनी शर्तों पर, क्योंकि यह जीवन ही नहीं, शायद विश्व तक वाकई में उसे अब क्षण-भंगुर ही दिखता है! क्या इस प्रक्रिया में दूसरों को, आसपास को, चाहे कितनी भी तकलीफ होती है, कितना भी नुकसान होता हो, अब उसे इसकी कोई परवाह नहीं? या फिर इतना निराश हो चुका है वह कि जीना ही भूल चुका है और निराशा की गहन गर्तों में जा छुपा है ? कहीं यह अरस्तू की कैथारसिस और गालिब की बताई दवा ही तो नहीं, जिनसे वह अपने असह्य दुखों का उपचार कर रहा है , सही है, लोहा ही लोहे को काट पाता है...दर्द ही दर्दे दिल की दवा भी है। पर जिन्दगी न तो रणभूमि है और ना ही फूलों की वह सेज जिसपर लेटे हम दर्द को दर्द से ही गुदगुदाते और बहलाते रह जाएं। कविता और शेरो-शायरी की भाषा कुछ भी सही, कितने ही अलंकारों और रंगों से हम इसे सजा लें, परन्तु सच्चाई यह है कि गम या हास्य, मात्र मनोरंजन और उत्तेजना... इन्द्रियों का सुख मात्र ही तो कला का उद्देश्य नहीं!
आज जब हम सबसे कटकर स्व में ही केन्द्रित होते जा रहे हैं, हो सकता है राम और गांधी जैसे चरित्र युवाओं के लिए थोड़े खिसके,, पागल और अविश्वनीय-से लगते हों: जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही बिना मौज-मजे लिए, किसी आदर्श या किसी विश्वास...धर्म अधर्म की लड़ाई पर न्योछावर कर दिया.. फिर, उन्हें जीते-जी- क्या मिल पाया इससे? ...और मरने के बाद जो मिला भी वह उनके किस काम का? आज की व्यवहारिक और लाभोन्मुख पीढ़ी के मन में तो बस यही सवाल घूमता रह जाता होगा, शायद। पर बात अब शरीर...शारीरिक सुखों की ही नहीं, आत्मा की भूख तक जा पहुँची है।
आज लड़ाई मनसा, वाचा, कर्मणा से लड़ी भी जाती है और जीती भी। दलदल में फंसे पर कीचड़ फेंकना आसान है उबारना कठिन...औरों ने हार की जीत मनाई हो पर हमने तो सदा सच की, उजाले की जीत को ही अपने त्योहारों की तरह मनाया है। द्वेष और वैमनस्य को भूल भाईचारे के रंग बिखेरे हैं सदियों से। फिर हममे यह निऱाशा और अराजकता कहां से आ गई। जानती हूं, कई सवाल हैं जो हमें खुद से भी पूछने ही होंगे...क्यों सब जानते और समझते कुछ और नहीं तो मान-अपमान या नेह की भ्रान्ति ही भटका देती है हमें! जब सब जानते और ईश्वर का अवतार जाने जाते राम तक सीता का मन रखने के लिए सोने के मृग के शिकार को चल पड़े थे...या प्रारब्ध के रचे को नहीं टाल पाए थे, तो हमारी-आपकी क्या औकात... फिर भी मनुष्य होने के नाते..विनाश के कगार पर खड़ी धरती और इस पर बसे जीवों के लिए, क्यों न हम सब अपने-अपने मन में बैठे राम की ही विजय का प्रयास करें...प्रार्थना करें! रावण के मद, लोभ और कपट आदि के दसों सिरों का खंडन आज भी उतना ही प्रासंगिक और जरूरी है जितना कि त्रेता में था। आज जब दिल दहला देने वाले धमाके और अफवाहों के बादल मौसम-बेमौसम यूँ ही मंडराते ही रहते हैं चारो तरफ, सब कुछ घटाघोप किए रहते हैं और पर्व और उत्सवों पर भी हम इतने ज्यादा शंकित व आशंकित रहने लगे हैं कि किसी भी उत्सव या पर्व का सामूहिक आनंद तक लेने से डरने लगे हैं, तो क्या समय नहीं आ गया है कि मानवता से, उसकी अच्छाइयों से खोए विश्वास को पुनः ढूँढे और जगाएँ? कहीं इस अराजकता, अविश्वास में, दूसरों के साथ हम खुद भी तो गुनेहगार नहीं! अत्याचारी के साथ-साथ अन्याय सहने वाला भी तो उतना ही बड़ा अपराधी होता है! क्यों न यह दशहरा और दिवाली इसी संकल्प के साथ मनाएँ कि ‘ राम’ या अच्छाई और बेहतरी की दिशा में ही कदम उठाएंगे, कम-से-कम एक भरसक प्रयास तो करेंगे ही, ...कहानी-किस्सों में ही नहीं, क्या पता शायद जीवन में भी देवदूत और कल्पतरु होंते ही हों...हमें मिल ही जाएँ; पावन पर्वों पर इन्ही, बस इन्ही शुभकामनाओं के साथ... .
लगता है—मैं सारी जिन्दगी जो भी सोचती रही, लिखती रही, वह सब देवताओं को जगाने का प्रयत्न था, उन देवताओं को, जो इन्सान के भीतर सो गए हैं... ” ... आसमान के महलों में मेरा सूरज सो रहा है जहां—कोई द्वार नहीं, कोई खिड़की नहीं और सदियों के हाथों ने जो पगडंडी बनाई है— वह मेरी सोच के पैरों के लिए बहुत संकरी है...
1986 के शुरु में जब देश के हालात को देखते हुए –सब प्रान्तों के चीफ मिनिस्टरों की मीटिंग बुलाई गई, दो तीन लोग वे भी बुलाए गए जो सियासत में नहीं थे, उनमें मैं भी थी। और जब मुझे वहां कुछ बोलने के लिए कहा गया, तो भरी आंखों से जो कहा, उसके कुछ अल्फाज थे—
” हमारे विवेकानन्द जी जब भारत के दक्षिण में गए—देखा कि छोटी जाति वालों में कोई, किसी बड़ी जाति वाले के करीब से गुजर जाए, तो उसकी छाया पड़ने से उसे कड़ी सजा दी जाती है, तो विवेकानन्द जी ने तड़प कर कहा था-” यह केरल भारत का पागलखाना है—और आज मैं भरी आंखों से कहना चाहती हूं कि हम अपने हर प्रांत को भारत का पागलखाना बना रहे हैं... ”
उस समय यह भी कहा था-” एक वक्त था, जब देवताओं ने सागर मंथन किया था –और चौदह रत्न प्राप्त किए गए। कहना चाहती हूं—आज हमें फिर से सागर मंथन करना है, और पंद्रहवां रत्न पाना है-अपनी आचरण शक्ति का रत्न।”
उसी साल मई के महीने में जब मुझे राज्य सभा में नामज़द किया गया तो मध्यप्रदेश, गुजरात, केरल और आसाम जैसे दूर-दूर के प्रान्तों से मुझे बुलाया जाने लगा-कुछ कहने के लिए ..बाद में उन तकरीरों से 71 तकरीरें चुन कर एक पुष्तक प्रकाशित हुई थी—‘ मन मंथन की गाथा ‘—जिसमें तारीखें दी हुई हैं। इसलिए यहां सिर्फ थोड़े से अंश दे रही हूं उन तकरीरों के, और पत्रकारों के सवालों के जवाब में जो कहा था—उनमें से भी थोड़े से अंश-
पांडव काल में वीरानियों और जंगलों में घूमते हुए, प्यास से व्याकुल नकुल ने जब पानी का झरना खोज लिया और तड़पते होठों से पानी को जल्दी से पी लेना चाहा, तो पानी की आत्मा ने कुछ प्रश्न किए थे औ कहा था-नकुल! मेरे सवालों का जवाब दिए बिना पानी को मत छूना, नहीं तो मूर्छित हो जाओगे !
लेकिन नकुल का मन अपनी प्यास से जुड़ा हुआ था, पानी की आत्मा से नहीं। उसने प्रश्न सुने, जवाब नहीं दिया, पानी पी लिया, और वहीं पानी के किनारे गिर गया।...इसी तरह भीम, अर्जुन और सहदेव भी बारी-बारी से आए, पानी को देखा और जल्दी से पानी पी लिया। पानी की आत्मा ने जो प्रश्न पूछे, उनका जवाब नहीं दिया और बारी-बारी से मूर्छित होकर पानी के किनारे पर गिरते गए...अंत में युद्धिष्ठिर आए, उन्होंने पानी की आत्मा के प्रश्न सुने और हर प्रश्न का जवाब अपने कर्म में से खोजकर दिया। और जब पानी की आत्मा संतुष्ट हो गई तो युद्धिष्ठिर ने वरदान मांगा कि उनके सब भाइयों की मूर्छना टूट जाए...
हम लोग 1947 में 15 अगस्त की रात को, जब गुलामी के जंगल में भटकते हुए, जिल्लत के कांटों से ज़ख्मी हो चुके अपने देश की स्वतंत्रता के दरवाजे तक पहुंच गए तो स्वतंत्रता की आत्मा ने भी हमसे सात प्रश्न किएः
पहला प्रश्न था- स्वतंत्रता शब्द का ज्ञाता कौन है ? दूसरा प्रश्न था- स्वतंत्रता का अधिकारी कौन होता है ?
तीसरा प्रश्न था- क्या सत्ता आत्मशक्ति होती है ?
चौथा प्रश्न था- क्या सत्ता और स्वतंत्रता का कोई आत्मिक संबंध होता है ?
पांचवां प्रश्न था- क्या स्वतंत्रता भिक्षा की तरह ली और दी जा सकती है ?
छठा प्रश्न था- क्या स्वतंत्रता छीनी या लूटी जा सकती है?
और सातवां प्रश्न था-क्या आचरण की शक्ति के बिना स्वतंत्रता धारण की जा सकती है ?
हम सब जानते हैं कि स्वतंत्रता की आत्मा ने हमसे जितने भी सवाल पूछे, हमने किसी का जवाब नहीं दिया। हम जल्दी से सबकुछ भोग लेना चाहते थे। जिसको जितना मौका मिला, किसी भी अधिकार से या किसी भी पदवी से, उसने उतना ही ज्यादा भोग लेना चाहा है। और जिसको नहीं मिला, उसने किसी भी अधिकार को, सत्ता को मांग लेना चाहा, लूट लेना चाहा...
और आज हम सभी एक मूर्छित अवस्था में जी रहे हैं...
मेरी नज़र में पाण्डव, पांच तत्व, हमारे ही शरीर की पांच शक्तियां हैं और जिनमें चार पाण्डव नकुल, भीम, अर्जुन और सहदेव हैं, तो पांचवां युद्धिष्ठिर भी हमारे अंतर में है- जो इन सवालों के जवाब दे सकता है...इसी हमारे भीतर के युद्धिष्ठिर की वर्तमान की आवाज को सुनना है, समझना है और उस आवाज के हर सवाल का जवाब देना है- अपने चिंतन से –अपने कर्म से।
आपको याद होगा कि पाण्डव काल में जब पानी की आत्मा ने कहा था-युद्धिष्ठिर! यह बताओ कि सूरज किस चीज से सम्मानित होता है और किस चीज से अपमानित होता है?- तो युद्धिष्ठिर ने जवाब दिया था- सूरज इंसान के आचरण में , उसके अखलाक में सम्मानित होता है और इंसान की बदअखलाकी में अपमानित होता है।
आज मैं यही कहना चाहती हूं, एक बहुत बड़ी हलरत से कि मैं अपने देश में सूरज को सम्मानित होते देखना चाहती हूं...
हम नहीं जानते कि कोई अपने हाथ में पत्थर उठाता है तो पहला ज़ख्म इंसान को नहीं, इंसानियत को लगता है। धरती पर जो पहला खून बहता है, वो किसी इंसान का नहीं होता, इंसानियत का होता है। और सड़क पर जो पही लाश गिरती है, वह किसी इंसान की नहीं होती, इंसानियत की होती है...
फिकरापरस्ती, फिकरापरस्ती है। उसके साथ हिंदु, सिक्ख या मुसलमान लफ़्ज़ जोड़ देने से कुछ नहीं होगा। अपने आप में इन लफ्ज़ों की आरजू है। इनका अर्थ है, इनकी एक पाकीजगी है... लेकिन फिकरापरस्ती के साथ इनका जुड़ना, इनका बेआबरू हो जाना है... इनका अर्थहीन हो जाना है, और इनकी पाकीज़गी का खो जाना है जो कुछ गलत है, वह सिर्फ एक लफ्ज़ में गलत है, फिकरापरस्ती लफ्ज़ में। उस गलत को उठाकर हम कभी, इसे हिन्दू लफ्ज के कन्धों पर, रख देते हैं, कभी सिक्ख लफ्ज़ के कंधों पर और कभी मुसलमान लफ्ज़ों के कंधों पर। इस तरह कंधे बदलने से कुछ नहीं होगा। जम्हूरियत का अर्थ, लोकशाही का अर्थ, चिन्तनशील लोगों का मिलकर रहना है, मिलकर बसना है, और चिंतनशील लोगों के हाथ में तर्क होते हैं, पत्थर नहीं होते...
बात चाहे सियासत की हो, या मजहब, या समाज और साहित्य की, उन सब में दो ही तरह के लोग होते हैं- एक-जो अक्षरों को प्यार करते हैं और एक-जो अक्षरों का व्यापार करते हैं-
हमारे देश में राणा प्रताप एक ऐसा नाम है- जो सिर्फ इतिहास के कागज पर नहीं लिखा गया- वह लोगों के दिल पर लिखा गया... राणा प्रताप की बहादुरी सिर्फ शारीरिक बल नहीं था... वह. आत्मिक बल था...जिसने पूरे मेवाड़ को एक किरदार दिया, इखलाक दिया, गौरव दिया...
इसलिए मैं राणा प्रताप की धरती को अपना प्यार और आदर पेश करती हूं...और इस धरती.के खुद्दार लोगों से आज बात करना चाहती हूं। आज जो हमारे देश की हालत है, हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं- उसकी बात करना चाहती हूं-
आज मजहब के नाम पर जितना कत्लो-खून हुआ-वह हमारे देश की स्वतंत्रता का बहुत बड़ा उलाहना है हम पर—और इन्ही हालत में यह नया साल आया-ऐसे
जैसे रातों की नींद ने अपनी उंगलियों में सपने का एक जलता हुआ कोयला पकड़ लिया हो... जैसे दिल के फिकरे से कोई अक्षर मिट गया हो जैसे विश्वास के कागज पर स्याही बिखर गई हो जेसे समय के होठों से एक ठंडा सांस निकल गया हो जैसे आदमजात की आंखों में एक आंसू भर आया हो जैसे सभ्यता की कलाई में एक चूड़ी टूट गई हो जैसे इतिहास की अंगूठी से एक मोती गिर गया हो जैसे धरती को आसमान ने एक बहुत उदास खत लिखा हो नया साल कुछ ऐसे आया...
मैं साल मुबारक किससे कहूं? किससे कहूं? अगर कोई हो- इस मिट्टी की रहमत जैसा
तो मैं साल मुबारक किससे कहूं...मैं साल मुबारक किससे कहूं? अगर कोई हो- मन सागर के मंथन जैसा और मस्तक के चिंतन जैसा
मैं साल मुबारक किससे कहूं...मैं साल मुबारक किससे कहूं? अगर कोई हो- धर्म लफ्ज़ के अर्थों जैसा
मैं साल मुबारक किससे कहूं?
धर्म तो मन की अवस्था नाम है--उसकी जगह मन में होती है, मस्तक में होती है और मन के आंगन में होती है। लेकिन आज हम उसे मन-मस्तक से निकाल कर और घर आंगन से उठाकर बाज़ार में ले आए हैं।
अगर देश की मिट्टी का धर्म समझ लिया जाए तो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के टकराव का सवाल ही पैदा नहीं होता। कोई अकेला भी मिट्टी को उतना ही प्यारा होता है, जितने हजारों या लाखों।
अगर यह नहीं समझा गया तो हमारे देश की मिट्टी अल्पसंख्यक के खून से भी रो उठेगी और बहुसंख्यक के खून से भी। खून तो खयालों को रोशनी देने के लिए होता है। सुर्ख खून सड़कों पर बहता हुआ भी उतना ही भयानक होता है, जितना फिरकापरस्ती के ज़हर से काला खून—किसी की रगों में चलता हुआ...
दागिस्तान की एक गाली है—
अरे जा! तुझे अपनी महबूब का नाम भूल जाए!
सचमुच बहुत भयानक गाली है-
जब उसे महबूब का नाम भूल जाएगा...
इन्सान की महबूब उसकी इंसानियत है...
और मुझे लगता है आज हम उसी का नाम भूल गए हैं...
राहुल सांकृत्यान की किताब ‘ वोल्गा से गंगा ‘ पढ़कर मैने महसूस किया कि राहुल आज काया की सूरत में सामने नहीं हैं, पर अक्षरों की सूरत में सामने हैं। मैं उनके अक्षरों से बातें करने लगी-
पूछा- समय ने जंगल के अंदेरे में पहली बार आग जलती हुई कब देखी थी ? अक्षर कहने लगे-ईसा काल से छह हज़ार बरस पहले- जंगल की एक गुफा में। आज से तीन सौ इकसठ पीढ़ियां पहले की बात है।...
पूछा-सो आग की ईजाद इन्सानी नस्ल को मिला वरदान था...? अक्षर कहने लगे-हां, तब यह वरदान था जब अभिशाप नहीं बना था। क्योंकि तब तेरा-मेरा युग आने में अभी देर थी। आग और हथियार जब तक जंगली जानवरों रक्षा के साधन थे, तब तक वरदान थे। पर जब पशुधन जोड़ा जाने लगा, फिर लूटा जाने लगा, तब स्त्री भी वस्तु बन गई, लूटी जाने लगी...
मैं कह रही थी- तन की गुलामी के साथ मन की गुलामी का यह सिलसिला? राहुल सांकृत्यान के अक्षर बोले- जब किसी राजा ने ऋषि को प्रसन्न करने के लिए सोना, पशु और दास-दासियों को दान दिया और ऋषियों ने राजा की स्तुति केगीत लिखे...यह एक सौ चवालीस पीढ़ियों पहले की बात है- तो राज-सत्ता और ब्राह्मण सत्ता ने मिलकर सिर्फ उस समय की इन्सानी नस्ल को नहीं, आने वाले समय की सैकड़ों पीढ़ियों को भी- हर तरह के अन्याय सहन करने को तैयार कर दिया...
मैने टूटती-सी आवाज में पूछा-पर समय के चिंतक...कवि...
वह बोले- कवि को कंचन और कंचनमाला जैसी सुंदरी राजा का प्रसाद मिलने लगी।
एक बार फिर पूछा-अक्षरों का मायाजाल हमेशा बिछा रहा, आज भी बिछा हुआ है, कोई उपाय?
तो अक्षर हंस पड़े, कहने लगे—अक्षरों का ही तर्कशास्त्र। जैसे लोहे को लोहा लोहा काटता है, अक्षरों के मायाजाल को भी अक्षर का तर्कशास्त्र काट सकता है। मयाजाल दासता पैदा करता है और दायों के बल पर कोई राष्ट्र शक्तिशाली नहीं हो सकता। तर्कशास्त्र की सामर्थ्य सिर्फ वही हाथ हो सकते हैं जिनके पास स्वतंत्र चिंतन का बल होता है।
सो, देख सकी, एक कर्म के अनेक रूप होते हैं-जैसे-
सेक्स का कर्म अगर कमाई का साधन हो तो वह व्यापार हो जाता है; वही कर्म किसी खास मकसद की पूर्ति का जरिया बने तो रिश्वत का रूप हो जाता है; वही कर्म अगर बाहुबल के जोर से, दूसरे की मजबूरी में से पैदा हो तो जब्र-जिनाह हो जाता है; वही अगर उम्र-भर के लिए एक-दूसरे की मिल्कीयत का जरिया बने तो उसका रूप विवाह हो जाता है; वही अगर वंश वृद्धि का वसीला बने तो एक मशीनी कर्म हो जाता है;
पर वही कर्म अगर दो रूहों की पहचान बने-एक दूसरे के अस्तित्व के आदर में से पैदा हुआ हो, तो मुहब्बत हो जाता है- ज़िन्दगी का जश्न हो जाता है...
उसी तरह सोचा करती थी-कलम का कर्म भी अनेक रूप होता है;
वह बचकाने शौक में से निकले तो जोहड़ का पानी हो जाता है; अगर सिर्फ पैसे की कामना में से निकले तो नकली माल हो जाता है; अगर सिर्फ शोहरत की लालसा में से निकले तो कला का कलंक हो जाता है; अगर बीमार मन में से निकले ज़हरीली आबोहवा हो जाता है; अगर किसी भी सरकार की खुशामद में से निकले तो जाली सिक्का हो जाता है।
उन दिनों इतिहास की एक कहानी पढ़ी, जो पहली सदी के सिमोनिअन्ज की कही हुई थी, कि एक बार सात हाकिमों ने समय की बौद्धिकता को बंदी बना लिया और उसे इतनी यातनाएं दीं कि उसे वेश्या बनने पर मजबूर होना पड़ा...इस कहानी की नायिका बौद्धिकता को बाद में कुछ विद्वानों ने बंदीखाने से छुड़ाया –मेरे लिए वे गुमनाम विद्वान-इल्म के सच के और शक्ति के प्रतीक बन गए...
दोस्तों! दागिस्तान की एक कहावत है कि दुनिया की तखलीफ से भी एक सो साल पहले दुनिया का पहला शायर पैदा हुआ था और मैं मानती हूं कि यह महज़ एक खूबसूरत कल्पना नहीं, हकीकत है।
"एक अर्धनग्न बूढ़ा जो ग्रामीण भारत में बसता था, उसके निधन पर मानवता रोई ।"-लुईस फिशर
आखिर क्या था उस अर्धनग्न क्षीण-काय में, उसके व्यक्तित्व में जिसने विवश किया संपूर्ण विश्व को कि न सिर्फ वे उसकी बातें ध्यान से सुनें वरन् मानें भी !
एक बूढ़ा... जिसका मन सिर्फ भारत के गांवों में बसता था, भूखे नंगों और असहायों की वेदना से कराहता था, जो हर भूखे, नंगे लाचार का आत्मीय था ... दीन-बंधु था। समाज से निष्काषित कोढ़ी, अपराधी, सब जिसके अपने थे, उस ऐसे संत की लड़ाई कभी अन्यायी से नहीं, अन्याय से रही। समाज की कुरीतियों व अत्याचार से थी। ईसा मसीह की तरह पाप से थी, पापियों से नहीं। यह वही बूढ़ा है सच ही जिसके जीवन का आधार था... पहला पाठ और सर्वोपरि सिद्धांत भी। गांधी जी ने न सिर्फ सत्य और अहिंसा में विश्वाश किया अपितु आजीवन इन्हें धर्म की तरह निभाया भी और यही नहीं, रास्ते में आई हर बाधा, हर तकलीफ को पूजा और व्रत के आनन्द की तरह ही लिया। यही वज़ह थी कि उनके सत्याग्रह के आगे धुरंधर और षडयंत्री सब झुक गए। ताज़ और तख्त उलट गए !
संरक्षण, स्वाधीनता और देश के खोए वर्चस्व के साथ-साथ सच की ताकत से भी अवगत कराया बापू ने हमें। हर गलत बात का अहिंसक और संयमी विरोध करना सिखलाया बापू ने हमें। समझाया कि कैसे यहीं आकर हम पशुओं से अलग और अधिक सक्षम हैं। शारीरिक बल से तो पशु संसार चलता है, मानवता की ताकत मन जीतने या मनचाहे परिवर्तन में है। शत्रु को नष्ट तो किया ही जा सकता है परन्तु यदि मित्र बना सकें तो यही सबसे बड़ी जीत है और आजीवन ऐसा ही करके दिखाया भी उस दुबले-पतले महात्मा ने। कमज़ोरी या किसी अभाव से डर पैदा होता है और डर से शत्रुता व हिंसा। यदि हम दूसरे के डर और कमज़ोरी...ज़रूरत और अभाव को समझ सकें (साथ-साथ अपने डर और कमजोरियां भी), तो संभवतः दुनिया से वैमनस्य, सारी हिंसा स्वयं ही खत्म हो जाएगी ! परन्तु यह सब इतना आसान भी तो नहीं, कभी 'स्व' आगे आ जाता है, तो कभी 'कमजोरी' या ' युक्ति' !
यहीं पर धैर्य की जरूरत है जो आज शायद कहीं है ही नहीं, क्योंकि धैर्य या सहन-शक्ति तो तभी आएगी जब हम दूसरों को भी अपना-सा ही समझ पाएँगे, उनसे जुड़ पाएँगे! आज जब बापू के विचारों और सिद्धान्तों की दुँदुभी कोने-कोने बज रही है, सोचने पर मज़बूर हूँ कि विश्व को तो छोड़िए, कितने हैं हम भारतीय, जो महात्मा व उनके आदर्शों के बारे में कुछ भी जानते हैं या जानने की कोशिश करते हैं... अंश मात्र आचरण में ढालने का साहस कर सकते हैं।
आज अधिकांश लोगों का गांधीजी से परिचय मात्र बड़ों के मुँह से सुना या किताबों से पढ़ा और जाना है... बचपन में मनाए गए चन्द विध्यालय के उत्सव...चन्द गानों और भजनों तक सीमित है। इधर कुछ सफल हिन्दी फिल्म जैसे 'लगे रहो मुन्ना भाई ' और ' गांधी माई फादर ' आदि ने एकबार फिर आज की युवा पीढ़ी का ध्यान महात्मा की ओर आकर्षित किया है और गांधीजी व गाँधीवाद फिरसे चर्चा का विषय बने हैं। पिछले दशक में आई रिचर्ड एटिनबरो की फिल्म 'गांधी' ने तो भौतिक रूप से गांधीजी को विश्व के सामने मानो पुनर्जीवित ही कर दिया था।
परन्तु गांधी जी खुद कभी किसी आडंबर या अपनी 'फैन-फौलोइँग ' या किसी भी तरह के गांधीवाद में कतई विश्वास नहीं करते थे । उनकी म़त्यु उपरान्त अवसरवादियों ने गांधी से जुड़ी हर चीज का बैसाखी की तरह खूब इस्तेमाल किया। यह पीढ़ी वो पीढ़ी है जो गांधीवाद के ऐसे युग से भी गुजरी, जब गांधी से जुड़ी खादी तक भृष्टाचार और बेइमानी का प्रतीक बनकर रह गई। इसे भी खूब भुनाया और चमकाया गया और इसका सहारा लेकर खूनी पाखंडी सभी ताकत की कुरसियों पर जा बैठे। जबकि गाँधीजी खुद यह मानते थे कि तुम एक बार शक के दायरे में आ जाओ तो फिर तुम्हारे हर आशय को संदिग्ध ही समझा जाएगा और बारबार परखा जाएगा। इसलिए कोशिश यही रहनी चाहिए कि कथनी और करनी ही नहीं, सोच तक एक हो... बुरा मत सोचो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, गांधी जी के तीनों बंदर भला किसे याद नहीं ! पर हजार अच्छाइयों के बावजूद भी यह वही गांधी थे जिन्हें ईसामसीह की तरह ही अपने सिद्धान्तों के लिए जान तक गंवानी पड़ी और अनन्य श्रद्धा के साथ-साथ कइयों के मन में महात्मा के प्रति कुछ अनुत्तरित विवादास्पद सवाल भी हैं ही, जैसे किः
गान्धी अगर लौर्ड इरविन के साथ समझौते में जल्दबाजी नहीं करते तो शायद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीन-तीन देशभक्तों को फाँसी नहीं लगती।
क्या गान्धी अब बस नोटों पर और फिल्मों में ही जिन्दा हैं? क्या राष्ट्रपिता गान्धी अपने पुत्र के लिए अच्छे पिता नहीं थे वगैरह....
इतिहास कुछ भी कहे, यदि हम आज के संदर्भ में और अपने नज़रिए से गांधी को जानना व समझना चाहते हैं तो हमें उनके विचारों और सिद्धांतो...उनके आदर्श और प्रेरणाओं को समझना होगा...समझना होगा कि क्या थी गांधी की सोच और ताकत। फिर गांधी का कितना अनुसरण हमें करना है...कितना उन आदर्शों को अपने जीवन में उतारने में समाज या हम सक्षम हैं ! यह फैसला खुद हमारा अपना होगा और हमारी आजकी जरूरतों के अनुसार होगा।
हम सभी जानते हैं कि सत्य और अहिंसा गांधी के चरित्र के दो सशक्त व स्थाई स्तंभ थे पर किस मिट्टी की बनी थी वह गांधी के मानस की जमीन जिसपर ये दोनों स्तंभ आजभी उसी मजबूती से खड़े हैं? आखिर क्या था गांधी जी का सत्य और अहिंसा का आग्रह...सत्याग्रह !
दुरूह इन सवालों का जवाब गांधीजी ने खुद ही अपने लेखनी से बार-बार दिया है। अपने चरित्र और जीवन से बारबार समझाया है हमें और अपनी कथनी व करनी की एकरूपता मरते दमतक कायम रखी है। गांधी जी का सत्य और हिंसा में अडिग विश्वास था। उन्होंने सत्य के बारे में लिखते हुए कहा कि यदि हम सच को समझ नहीं पाते तो यह हमारी अपनी हार है, सच की नहीं।
गांधी जी ने अपने बारे में लिखते हुए कहा था कि मैं कोई स्वप्न दृष्टा नहीं हूँ, वरन् एक आम बेहद व्यवहारिक इन्सान हूँ जो मानवता का, दीन-दुखियों का उत्थान चाहता है...उनके जीवन की असह्य पीड़ा का अन्त चाहता है। समाज के अत्याचार और अन्याय का उन्मूलन चाहता है। और इसे मानवता शान्ति और अहिंसा से सच के मार्ग पर चलकर ही पा सकती है। यह रास्ता सिर्फ ऋषि-मुनियों का ही नहीं, आम आदमियों का भी है। जानवरों के पास शारीरिक बल के अलावा और कुछ नहीं होता परन्तु इन्सान के पास आत्मिक या आध्यात्मिक शक्ति है, जो शारीरिक शक्ति से ज्यादा ताकतवर और स्थाई है।
कईबार ऐसा होता है कि हम विद्रोह करना चाहते हैं। सामने वाले की अभद्रता से उद्विग्न उसे मारना या डांटना...दंड देना चाहते हैं। परन्तु यदि तब उस एक पल में अपने को रोक सकें तो यही होगी अहिंसा। गांधी की अहिंसा का अर्थ था अत्याचार और अन्याय का शांत व संयमी विरोध। पाप को नष्ट करने के लिए पापी को नष्ट करना तो जरूरी नहीं। यदि अत्याचारी के आगे बिना झुके उसे हम बता सकें कि वह गलत है। उसकी सोच, उसकी करनी गलत है, तो यही गांधी का सत्याग्रह है...सत्य की जीत है।
सत्य और अहिंसा का यह सिद्धांत जिस दिन व्यक्तिगत स्तर से उठकर विश्व-व्यापी हो जाएगा उसदिन सारी लड़ाइयाँ खुद-ब-खुद खतम हो जाएँगीं। यही गाँधीजी का सपना था और इसी एक सपने की खातिर अंततः उन्होंने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए।
गांधीजी यह भी जानते थे कि लिप्सा और स्वार्थमय मनुष्य के लिए यह सब इतना आसान भी नहीं , इसीलिए कहीं पर उन्होंने यह भी लिखा है कि मैं खुद कभी-कभी अपने सिद्धान्तों पर जिस हद तक चलना चाहता हूँ नहीं चल पाता हूँ। हर व्यक्ति चल पाएगा, यह एक दुरूह सपना है फिर भी प्रयास ज़ारी रहना चाहिए। वह स्व-प्रचार या आत्म-श्लाघा में विश्वास नहीं करते थे। अपने अनुयाइयों से उनका कहना था कि तुम मेरे भक्त मत बनो, बस मेरे साथ रहो।
आत्म-त्याग और आत्म-संयम हम भारतीयों के लिए ही क्या, पूरी मानवता के लिए कोई नया सिद्धांत नहीं (देश, व्यक्ति या सिद्धांतों के लिए कुर्बानियों के कई उद्धरण हमें मानव इतिहास में मिल जाएंगे )।
गांधी जी के अनुसार हमारे ऋषि -मुनि जिन्होंने हिंसा के बीच रहकर अहिंसा वृत आजीवन पालन किया वो न्यूटन से बड़े विचारक और वेलिंगटन से बड़े योद्धा थे। अहिंसा क्रियाशील रूप में आत्मसंयम के साथ की गई आत्म संशोधन की एक निरंतर प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में मानसिक यातना और शारीरिक कष्ट दोनों ही हैं पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि अहिंसा कमजोर करती है। हम अत्याचारी के सामने मूक समर्पण कर देते हैं...अहिंसा का सेनानी तो अपने समस्त आत्मबल के साथ अपने सम्मान, धर्म और राष्ट्र के लिए आखिरी सांस तक लड़ता है और साथ-साथ अन्याय के अन्त की और अन्यायी के पुनःनिर्माण की नींव भी रखता है।
गांधी जी अनेकता की एकता में विश्वास करते थे। उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ भारत की एकता का ही नहीं, विश्व- एकता का सपना देख रहा हूँ। यह वही सपना था जो हजारों साल पहले हमारे ऋषि मुनियों ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' के रूप में देखा था। बुद्ध,महाबीर, ईसा और पैगम्बर ने देखा था और विवेकानन्द ने जिसे पिछली शताब्दी में विदेशों में जाकर दोहराया था।
गांधीजी के लिए स्वराज सिर्फ भारत की ही आजादी नहीं, दीन-दुखियों की आजादी थी। भारत के गांवों में बसे निरक्षरों और असहायों की आजादी थी। गांधी जी का मानना था कि जब मन पूरी तरह से निर्मल हो जाता है...स्वार्थ, घृणा और पाप की वहाँ जगह नहीं रहती, तब हमारे विचार दूसरों को छूने लगते हैं। परन्तु बुद्धिमान और व्यवहारिक गांधीजी यह भी जानते थे कि अपनी कोई भी इच्छा दूसरों पर लादी नहीं जा सकती। एक उनके सोचने या चाहने से कुछ नहीं होगा जबतक कि भारत और विश्व के मानस का हृदय परिवर्तन न हो। फिर भी उनका कहना था कि मुझे अपना यह सत्याग्रह तो जारी रखना ही होगा...मानवता को यह तो बताना ही होगा कि यह दुनिया, यह जीवन कितना सुन्दर और बहुमूल्य है...और इसे यूँ नष्ट मत होने दो !
वास्तव में देखा जाए तो गांधी जी ने कुछ भी तो नया या अनूठा नही कहा ...बस, वही कहा है जो हमारे धर्म ग्रन्थों में लिखा है या हमारे ऋषि मुनि जानते और कहते आए हैं। महावीर या बुद्ध ने जो कहा है। बस फरक इतना है कि जो कहा या समझा बापू ने उसपर पूरी सच्चाई से विश्वास भी किया। अपने सिद्धान्तों का मनसा, कर्मणा, वाचा, तीनों से पालन किया। और यहीं आकर महान आत्मा साधारण आत्मा से भिन्न हो जाती है । आदमी, आदमी नहीं सन्त या महापुरुष हो जाता है। इतना संयम, इतनी निष्ठा और इतना धैर्य, आम आदमी के बस की बात ही नहीं। भारत के अपने समय के शीर्षस्थ उद्योगपति घनश्याम दास बिरला ने गांधीजी की मृत्यु पर श्रद्धांजली देते हुए कहा थाः"मानवीय इतिहास में यह अनोखी बात है कि एक अकेला व्यक्ति एक ही समय योद्धा, मसीहा और संत तीनों था और उससे भी अधिक वह विनम्र और मानवीय था।" और शायद यही विनम्रता और मानवीयता थी जिसके बल पर गांधी जी सबके अपने बन पाए और उससे भी बड़ी बात है कि बने रह पाए। अटूट संयम और विलक्षण आत्मबल ... उनके सत्याग्रह का आज पूरा विश्व कायल है ! जन्मदिन, दो अक्टूबर को अब विश्व ने अहिंसा दिवस की तरह मनाने का आवाहन किया है...शायद हिंसा, स्पर्धा और घृणा से जर्जर विश्व, उनके जीवन से, उनके आदर्शों से कुछ सीख ही सके...कुछ पा ही जाए...विनाश के कगार से वापस मानवता की ओर मुड़ ही ले...मिलजुलकर एक कोशिश तो करनी ही होगी! संत, सिपाही और सेवक का एक ही व्यक्तित्व में ऐसा अनूठा समिश्रण विरले ही हो पाता है और हम भारतीयों के लिए यह अतीव गौरव की बात है कि वो हमारे अपने बापू थे। आईंस्टाइन ने कहा है कि इस शताब्दी के सबसे ताकतवर और विलक्षण व्यक्तित्व थे मोहनदास करमचन्द गांधी... शायद सबसे बुद्धिमान भी।
बुद्ध की दया और क्राइस्ट के सेवा भाव की साक्षात मूर्ति थे ज्योति-पुंज बापू। एक शब्द में यदि उनके प्रति अपने सारे भावों को समेट पाऊँ तो यही कह पाऊँगी कि बापू सच्चे अर्थों में विश्व-बंधु थे इसीलिए तो सबके अपने और विश्व-वंद्य हो पाए...
विश्व वंद्य बापू
" तुम पोंछ गये भयभीत कपोलों के आँसू दे गए धरा विधुरा को निर्भय अभयदान। हिंसा की गहन तमिस्त्रा में, बुझते दीपक की बाती को फिर जला गए देकर अंतस का स्नेहदान।"
दीप से कहो जले पर मात्र अँधेरा हटाने की नही अज्ञान भागने को भी दीप से कहो जले पर प्रकाश फैलाने को ही नही प्रेम संदेश देने को भी दीप से कहो जले पर लोगों को ही ज्योति न दे स्वयं के अंधेरे को भी प्रकाशित करे दीप से कहो जले कुछ जलाने को नही भटके को राह दिखाने को दीप से कहो जले बस यूँ ही नही राम के घर आने की खुशी में जले
कहा उस ने
कहा उस ने आओ प्रिये दीवाली मनाएं अपने संग होने की खुशियों में समायें आओ प्रिये दीवाली मनाएं हाथ पकड़ दिए के पास लाई जलाने को जो उसने लौ उठाई तभी देखा दूर एक घर अंधेरों में डूबा था बम के धमाके से ये भी तो थरराया था आँगन में उनके करुण क्रन्दन का साया था पड़ोस डूबा हो जब अन्धकार में तो घर हम अपना कैसे सजाएँ तुम ही कहो प्रिये दीवाली हम कैसे मनाएं? कर के हिम्मत उसने एक फुलझडी थमाई लाल बत्ती पे गाड़ी पोछते उस मासूम की पथराई ऑंखें याद आई याचना के बदले मिला तिरस्कार पैसों के बदले दुत्कार घर में जब गर्मी न हो वो पटाखे कैसे जलाये जब है खाली उसके हाथ हम फुल्झडियां कैसे छुडाएं ? तुम ही कहो प्रिये दीवाली हम कैसे मनाएं ? जब खाया नही तो दूध कहांसे आए छाती से चिपकाये बच्चे को सोच रही थी भूखी माँ मिठाइयों की महक से हो रही थी और भूखी माँ खाली हो जब पेट अपनों के कोई तब जेवना कैसे जेवे अब तुम ही कहो प्रिये दिवाली हम कैसे मनाएं? भरी आँखों से देखा उसने फ़िर लिए कुछ दिए ,पटाखे मिठाइयां संग ले मुझको झोपडियों की बस्ती में गई हमारी आहट से ही नयन दीप जल उठे पपडी पड़े होठ मुस्काए सिकुड़ती आंतों को आस बन्धी अंधियारों में डूबा बच्पन आशा की किरण से दमक उठा अमावस की काली रात में जब प्रसन्नता की दामिनी चमक उठी तो अब आओ प्रिये दीवाली हम खुशी से मनाये सुनो न दीवाली हम सदा ऐसे मनाएं
आओ एक दीप जलाएं
आशा किरण घर घर फैले आँगन आँगन खुशियाँ डोलें ज्योतिर्मय हो मन लहराए आओ एक दीप जलाएं
निशा दिवस बन जाए घटा हँसी की चहुँ और छाये बरसे प्रेम रस सभी नहायें आओ एक दीप जलाएं
ज्ञान का अलोक हो निर्भय जन मन प्राण हो आस गंगा धरती पे बहायें आओ एक दीप जलाएं
गणेश लक्ष्मी हर घर आसन धरें कष्ट मिटायें लक्ष दोष हरें लक्ष्मी विष्णु प्रिया गणेश विघ्न विनाशक कहलायें आओ एक दीप जलाएं
हरगोविंद जी का मुक्त दिवस हो या स्वामी महावीर को निर्वाण मिला हो राम जी अयोध्या आ पहुंचे हों या पांडव ने पूरा बनवास किया हो हो कारण कोई भी प्रेम का तोरण हर द्वार सजाएँ खुशियों की सौगात लुटाएं आओ एक दीप जलाएं
'मारकंडेय पुराण' के अनुसार समस्त सृष्टि की मूलभूत आद्याशक्ति महालक्ष्मी है। वह सत्व, रज और तम तीनों गुणों का मूल समन्वय है। वही आद्याशक्ति है। वह समस्त विश्व में व्याप्त होकर विराजमान है। वह लक्ष्य और अलक्ष्य, इन दो रूपों में रहती है। लक्ष्यरूप में यह चराचर जगत ही उसका स्वरूप है और अलक्ष्य रूप में यह समस्त सृष्टि का मूल कारण है। उसी से विभिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है। दीपावली को इसी महालक्ष्मी का पूजन होता है। तामसिक रूप में वह क्षुधा, तृष्णा, निद्रा, कालरात्रि, महामारी के रूप में अभिव्यक्त होती है; राजसिक रूप में वह जगत का भरण-पोषण करने वाली 'श्री' के रूप में उन लोगों के घर में आती है, जिन्होंने पूर्व-जन्म में शुभ कर्म किये होते हैं; परन्तु यदि इस जन्म में उनकी वृत्ति पाप की ओर जाती है तो वह भयंकर अलक्ष्मी बन जाती है। सात्विक रूप में वह महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती के रूप में अभिव्यक्त होती है। मूल आद्याशक्ति ही महालक्ष्मी है।
शास्त्रों में ऐसे वचन भी मिल जाते हैं , जिनमें महालक्ष्मी या महासरस्वती को ही आद्याशक्ति कहा गया है। जो लोग हिन्दू शास्त्रों की पद्धति से परिचित नहीं होते हैं, वे साधारणतः इस प्रकार की बातों को देखकर कह उठते हैं कि यह बहुदेववाद है। यूरोपिय पण्डितों ने इसके लिये ' पालिथीज्म ' शब्द का प्रयोग किया है। पालिथीज्म या बहुदेववाद से एक ऐसे धर्म का बोध होता है, जिसमें अनेक छोटे-बड़े देवताओं की मण्डली में विश्वास किया जाता है। इन देवताओं की मर्यादा और अधिकार निश्चित होते हैं। जो लोग हिन्दू शब्दों की थोड़ी भी गहराई में जाना आवश्यक समझते हैं, वे इस बात को कभी नहीं स्वीकार कर सकते। मैक्समूलर ने बहुत पहले बताया था कि वेदों में पाया जाने वाला ' बहुदेववाद' वस्तुतः बहुदेववाद है ही नहीं, क्योंकि न तो वह ग्रीक-रोमन बहुदेववाद के समान है, जिसमें बहुत-से देव-देवी एक महादेवता के अधीन होते हैं और न अफ्रीका आदि देशों की आदिम जातियों में पाये जाने वाले बहुदेववाद के समान है, जिसमें छोटे-मोटे अनेक देवता स्वतंत्र होते हैं। मैक्समूलर ने इस विश्वास के लिये एक शब्द सुझाया था-हेनोथीज्म, जिसे हिन्दी में ' एकैकदेववाद ' शब्द से कुछ-कुछ स्पष्ट किया जा सकता है। इस प्रकार के धार्मिक विश्वास में अनेक देवताओं की उपासना होती अवश्य है, पर जिस देवता की उपासना चलती रहती है, उसे ही सारे देवताओं से श्रेष्ठ और सबका हेतुभूत माना जाता है। जैसे, जब इन्द्र की प्रार्थना का प्रसंग होगा, तो कहा जाएगा कि इन्द्र ही आदिदेव है; वरुण, यम, सूर्य, चन्द्र, अग्नि सबका वह स्वामी है और सबका मूलभूत है। पर जब अग्नि की उपासना का प्रसंग होगा, तो कहा जायेगा कि अग्नि ही मुख्य देवता है और इन्द्र, वरुण आदि का स्वामी है और सबका मूलभूत देवता है, इत्यादि।
परन्तु थोड़ी और गहराई में जाकर देखा जाये तो इसका स्पष्ट रूप अद्वैतवाद है। एक ही देवता है, जो विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। उपासना के समय उसके जिस विशिष्ट रूप का ध्यान किया जाता है, वही समस्त अन्य रूपों में मुख्य और आदिभूत माना जाता है। इसका रहस्य यह है कि साधक सदा मूल अद्वैत सत्ता के प्रति सजग रहता है। अपनी रुचि और संस्कारों और कभी-कभी प्रयोजन के अनुसार वह उपास्य के विशिष्ट रूप की उपासना अवश्य करता है, परन्तु शास्त्र उसे कभी भूलने नहीं देना चाहता कि रूप कोई हो, है वह मूल अद्वैत सत्ता की ही अभिव्यक्ति। इस प्रकार हिन्दू शास्त्रों की इस पद्धति का रहस्य यही है कि उपास्य वस्तुतः मूल अद्वैत सत्ता का ही रूप है। इसी बात को और भी स्पष्ट करके वैदिक ऋषि ने कहा था कि ' जो देवता अग्नि में है, जल में है, वायु में है, औषधियों में है, वनस्पतियों में है, उसी महादेव को मैं प्रणाम करता हूँ।'
आज से कोई दो हजार वर्ष पहले से इस देश के धार्मिक साहित्य में और शिल्प और कला में यह विश्वास मुखर हो उठा है कि उपास्य वस्तुतः देवता की शक्ति होती है। यह नहीं है कि यह विचार नया है, पहले था ही नहीं, पर उपलब्ध धार्मिक साहित्य और शिल्प और कला सामग्री में यह बात इस समय से अधिक व्यापक रूप में और अत्याधिक मुखर भाव से प्रकट हुई दिखती है। इस विश्वास का सबसे बड़ा आवश्यक अँग यह है कि शक्ति और शक्तिमान में कोई तात्विक भेद नहीं है, दोनों एक हैं। चन्द्रमा और चन्द्रिका की भाँति वे अलग अलग प्रतीत होकर भी एक हैं- ' अन्तरं नैव जानीमश्चन्द्र-चन्द्रिकयोरिव।' परन्तु उपास्य शक्ति ही है। जो लोग इस विश्वास को अपनी तर्कसम्मत सीमा तक खींचकर ले जाते हैं, वे शाक्त कहलाते हैं। जो शक्ति और शक्तिमान् के एकत्व पर अधिक जोर देते हैं, वे शाक्त नहीं कहलाते। मगर कहलाते हों या न कहलाते हों, शक्ति की उपासना पर विश्वास दोनों का है। जिन लोगों ने संसार की भरण-पोषण करने वाली वैष्णवी शक्ति को मुख्य रूप से उपास्य माना है, उन्होंने उस आदिभूता शक्ति का नाम ' महालक्ष्मी' स्वीकार किया है। दीपावली के पुण्य-पर्व पर इसी आद्याशक्ति की पूजा होती है। देश के पूर्वी हिस्सों में इस दिन महाकाली की पूजा होती है। दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। केवल रुचि और संस्कार के अनुसार आद्याशक्ति के विशिष्ट रूपों पर बल दिया जाता है। पूजा आद्याशक्ति की ही होती है। मुझे यह ठीक-ठीक नहीं मालूम कि देश के किसी कोने में इस दिन महासरस्वती की पूजा होती है या नहीं। होती हो तो कुछ अचरज क बात नहीं होगी। दीपावली का पर्व आद्याशक्ति के विभिन्न रूपों के स्मरण का दिन है। यह सारा दृश्यमान जगत-ज्ञान, इच्छा और क्रिया के रूप में त्रिपुटीकृत है। ब्रह्म की मूल शक्ति में इन तीनों का सूक्ष्म रूप में अवस्थान होगा। त्रिपुटीकृत जगत की मूल कारणभूता इस शक्ति को ' त्रिपुरा' भी कहा जाता है। आरम्भ में जिसे महालक्ष्मी कहा गया है उससे यह अभिन्न है। ज्ञान रूप में अभिव्यक्त होने पर यह सत्वगुणप्रधान सरस्वती के रूप में, इच्छा-रूप में रजोगुण-प्रधान लक्ष्मी के रूप में और क्रियारूप में तमोगुण-प्रधान काली के रूप में उपास्य होती है। लक्ष्मी इच्छा रूप में अभिव्यक्त होती है। जो साधक लक्ष्मी-रूप में आद्याशक्ति की उपासना करते हैं, उनके चित्त में इच्छाशक्ति की प्रधानता होती है, पर बाकी दो तत्व ज्ञान और क्रिया भी उसमें सहायक होते हैं। इसीलिए लक्ष्मी की उपासना 'ज्ञानपूर्वा क्रियापरा' होती है, अर्थात वह ज्ञान द्वारा चलित और क्रिया द्वारा अनुगमित इच्छा-शक्ति की उपासना होती है। 'ज्ञानपूर्वा क्रियापरा' का मतलब है कि यद्यपि इच्छाशक्ति ही मुख्यतः उपास्य है, पर पहले ज्ञान की सहयता और बाद में क्रिया का समर्थन इसमें आवश्यक है। यदि उलटा हो जाये, अर्थात इच्छा-शक्ति की उपासना क्रियापूर्वा और ज्ञानपरा हो जाए, तो उपासना का रूप बदल जाता है। पहली अवस्था में उपास्या लक्ष्मी समस्त जगत के उपकार के लिये होती है। उस लक्ष्मी का वाहन गरुण होता है। गरुण शक्ति, वेग और सेवावृत्ति का प्रतीक है। दूसरी अवस्था में उसका वाहन उल्लू होता है। उल्लू स्वार्थ, अन्धकारप्रियता और विच्छिन्नता का प्रतीक है। लक्ष्मी तभी उपास्य होकर भक्त को ठीक-ठीक कृतकृतय करती है जब उसके चित्त में सबके कल्याण की कामना रहती है। यदि केवल अपना स्वार्थ ही साधक के चित्त में प्रधान हो, तो वह उलूक-वाहिनी शक्ति की ही कृपा पा सकता है। फिर तो वह तमोगुण का शिकार हो जाता है। उसकी उपासना लोककल्याण मार्ग से विच्छिन्न होकर बन्ध्या हो जाती है। दीपावली प्रकाश का पर्व है। इस दिन जिस लक्ष्मी की पूजा होती है, वह गरुण-वाहिनी है-शक्ति, सेवा और गतिशीलता उसके प्रमुख गुण हैं। प्रकाश और अन्धकार का नियत विरोध है। अमावस्या की रात को प्रयत्नपूर्वक लाख-लाख प्रदीपों को जलाकर हम लख्मी के उलूकवाहिनी रूप की नहीं, गरुणवाहिनी रूप की उपासना करते हैं। हम अन्धकार का, समाज में कटकर रहने का, स्वार्थपरता का प्रयत्नपूर्वक प्रात्याख्यान करते हैं और प्रकाश का, सामाजिकता का और सेवावृत्ति का आव्हान करते हैं। हमें भूलना न चाहिए कि यह उपासना ज्ञान द्वारा चलित और क्रिया द्वारा अनुगमित होकर ही सार्थक होती है।सर्वहया दया महालक्ष्मीस्त्रीगुणा परमेश्वरी।लक्ष्यालक्षस्वरूपा या व्याप्त कुत्सनं व्यवस्थिता।।
पर्व वेला पर रोशनी की कतारें अभी उतरी नहीं हैं। जब उतरेंगीं तो सागर तट की पंद्रहवीं मंजिल पर मेरा फ्लैट कंदील-सा झिलमिला उठेगा।
रंग-रोगन, झाड़-पोंछ, सिल्वो, ब्रासो से चमचमाती पीतल, चांदी और कांसे की नायाब नक्काशियाँ। धूप-दीप, नैवेद्य और फूल, गजरे। दीपपर्व पर लक्ष्मी की पूजा का विशेष विधि-विधान।
इसलिए शाम को फिर से नहाई और बाथरूम से निकल कालोन, लैवेंडर छिड़के लहराते बालों के लच्छे झटक दिए हैं। कमरे में खुशबू का सोता सा फूट पड़ा है। तब बालों को बड़े प्यार से समेट, धुले कुरकुरे तौलिए से सहला-सहलाकर पोंछती हुई मैं उसकी ओर पलटती हूँ। वह उसी तरह समूचे माहौल की मोहकता में सराबोर हकबकी-सी खड़ी है। चारों ओर बिखरी हुई रोशनी में चौंधियाई-सी, जैसे इस लोक में नहीं, किसी अपार कौतुक-भरे अतींद्रिय लोक में खड़ी हो।
मैंने स्वर्ण पंखी साड़ी का पल्लू सँवार कलाइयों के कंकण पीछे किए और उस बौड़म-सी खड़ी हुई को टहोका दिया है कि ऐसी खड़ी-खड़ी वह कैसे काम निपटाएगी? एँ ? इधर पूजा की चौकी के पास पोंछा लगा।
वह चौंककर झटपट काम में जुट गई और पूजावाला सुवासित कोना बड़े यत्न से रगड़-रगड़कर पोंछने लगती है। कभी मुझे, कभी मेरे पूजा-स्थल को देखती हुई...उसकी आँखों में अपार श्रद्धाभाव है- मेरे ईश्वर के प्रति नहीं- मेरे प्रति और मेरे पूजा स्थल के प्रति।
ठीक उसी समय मैं भी मन-ही-मन पूजा की चौकी की ओर देखकर आभार प्रकट करती हूँ जो ऐन दीपावली के दो दिन पहले, नई-नई पास के गाँव से कमाने-खाने आई यह औरत मेरे सुपुर्द कर दी; नहीं तो रंग-रंगोली मंडित पूरा त्योहार अक्षत, कुमकुम और झाड़-पोंछ के बीच संतुलन बिठाने में ही बीत जाता। न काजू कतली और मलाई पाक बन पाता, न चूड़ी-कंकड़ और स्वर्ण पंखी साड़ी से लैस यह पूजा हो पाती। अब सुगंधाबाई मिल गई है न, तो जरा चैन से अर्चन-अभिनंदन हो पाएगा, सुख सौभाग्य और श्री की देवी लक्ष्मी का...आओ देवी ! पांव धरो, इस स्वर्ण पंखी साड़ी के जरी-जटित पल्लू पर सुख-सुविधा उपादानों के वृक्षारोपण करो। इस कुमकुम, अक्षत, फूल, धूप, दीप-नैवेद्य की क्यारी में !
दरवाजे की बेल बजी है। वह झटपट मुस्तैदी से दौड़ी है। उसे यह काम बड़ा मनभाया है। हर थोड़ी देर पर दरवाजे की घंटी बजती है। कोई एक आदमी एक बड़ा-सा रंगीन पैकेट लिए खड़ा होता है। संकेत पाते ही मैं दरवाजे तक आती हूँ।
कौन ? तनेजा साहब ? दीपावली मुबारक आपको भी- अरे इसकी क्या जरूरत थी ? पर वाकई है बेहद खूबसूरत! कहाँ से मँगवाया ? कटक से ? हाँ चाँदी की नक्काशी तो वहीं की लगती है...अच्छा थैंक्स !
अरे खुल्लर भाई। यूँ बाहर खड़े दीपावली मुबारक कैसी ? दो मिनट बैठिए तो—देखिए, इस फारमैलिटी की क्या जरूरत थी—मिठाइयां तो काफी थीं—रिंग, विंग नहीं चलेगी—आप तो जिद करते हैं। अच्छा जी—थैंक्यू वेरी मच।
येस ? कहां से आए हैं ? ए.के. इंटरप्राइजेज से ? ओ.के. थैंक्यू। हैप्पी दीपावली टु यू आलसो...
जी? साहब ? साहब नहीं हैं...दीपावली का गिफ्ट? थैंक्यू, नमस्ते।
मगन भाई, आप हैं ? तो अंदर तो आइये—मैने समझा कोई और है। ये बाई नई है न ! इसे क्या मालूम किसे अंदर आने देना है, किसे बाहर से टरकाना है...अरे नहीं जी, कृपा कैसी ? आप लोग तो इतने पुराने ‘ वैल-विशर ‘ ठहरे, अब बताइये इतनी बड़ी-सी कीमती चीज आप उठा लाए। और नहीं कहूँ तो जानती हूँ आपको तहेदिल से दुःख होगा। ऊपर से आप कहते हैं, भाभीजी ने अपने पैसे से खरीदी मेरे लिए....थैंक्यू—थैंक्यू अ लाट।
हाs sय मिस्टर तन्खावाला... !
थैंक्यू चड्ढा साहब...हैप्पी दीपावली आपको भी। नमस्ते जी। एक पांव से दौड़ रही हूँ मैं सुबह से; पर थकान का नामोनिशान नहीं। उसकी आँखों में अपार प्रशंसाभाव है मेरे लिए। मैं कितना अच्छा बोलती हूँ, कितनी बार अंदर से दरवाजे तक आती हूँ और रंगीन चमचमाते पैकेट लेकर अंदर जाती हूँ। वह झाड़-पोंछ करते-करते ही, बीच में जब मौका मिलता है, उन रंगीन पैकेटों पर हाथ फेरकर अपार आनंद अनुभव कर लेती है, और वापस अक्षत कुमकुम के थाल सजाने लगती है।उसका उत्साह देखकर दया आ गई। सो चार-पांच बार मैने उसे ही ‘ पैकेट्स ‘ अंलमारी में रखने के लिए कह दिया। बस, वह निहाल हो गई। पैकेट्स खूब सहेजकर रखती-रखती मुझसे बड़े गद्गद भाव से पूछ बैठी—
‘ ये लोग पूजा का सामान लाता न ? ‘
गूढ़ रहस्य में भरकर मैं शरारत से मुस्कुरा पड़ी हूँ। लेकिन तभी मैं जैसे मैं अपनी ही मुस्कुराहट से भयभीत हो उठी हूँ। मुझमें एक अनजाना भय-सा समा जाता है। मैं बारबार इस भय से आतंकित, ईश्वर से मन-ही-मन प्रार्थना करने लगती हूँ कि मुझे किसी भी तरह के दुर्भाग्य से बचाना, सब कुछ हमेशा ऐसा ही भरा-पूरा रखना। इस सरकारी नौकरी को कभी आँच न आए; जिसकी बदौलत दीपावली के दिन एक पूरा बड़ा लौफ्ट और एक अलमारी खाली करनी पड़ी है, उपहारों के पैकेट्स ठूँस-ठूँसकर भरने के लिए...आह देवी...सुख, सौभाग्य, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी ! हमपर सदैव ऐसी ही कृपादृष्टि करना।
रोमरोम भक्तिभाव से पूर जाता है। तब भी संतोष नहीं होता तो अचानक ही कह पड़ती हूँ—
‘ सुगन्धा ! यह तेल नहीं, जाकर देशी घी लाकर डाल दियों में...’ और बड़ी एकाग्रता से सुगंधा से रूई लेकर एक-दो बत्तियां खुद पूरने लगती हूँ। देशी घी से लबालब दीये और भक्तिभाव से लबालब हृदय मुझे अतिरिक्त दयाभाव से भर देते हैं। आह ! कितने दुखी-दरिद्र हैं ये सब। क्यों न ज्ञानामृत की दो-चार घूंटें इस नादान, अकिंचन सुगंधा के गले में उतारने की चेष्टा करूँ ? इस गरीब का भला होगा। काम करते जाने की बोरियत भी दूर होगी। कुछ विनोद मनबहलाव भी।
सो अतिरिक्त कृपाभाव से पूछा—
’ तू पूजा करती है दीपावली पर ? ’
’ न ! ’
’ अरे, फिर क्या करती है ? ’
’ मैं ? ’ उसने एक क्षण अचकचा कर सोचा; जैसे अपनी दिनचर्या का कैसेट रिबांइड किया हो और कहा—
’ मैं सब बाई लोगों का झाड़ू-लादी करती...’
अजीब ऊटपटांग-सा उत्तर था। प्रश्न से कोई तालमेल ही नहीं। मैं अंदर तक चिड़चिड़ा-सी उठी। भक्ति-दर्शन पर बात करने का सारा मजा ही बदमजा हो गया। लेकिन तभी ध्यान आया—न, मेरा इस तरह सोचना अनुचित है। इस मूढ़ अविवेकी में इतना ज्ञान, विवेक होता तो यह झाड़ू-फटका करतीअपनी जिन्दगी गुजारती होती ? नहीं न ! यह तो हम जैसों का फर्ज है, इस ऊसर पडे खेत में बुद्धि-विवेक की खाद डालना। इस अज्ञान की अंधेरी खोह में ज्ञान का अलख जगाना। इसलिए वापस आ डटी—
’ अरे झाड़ू-पोंछा तो रोज ही करती है—उसकी कोई बात नहीं; पर दीपावली भी तो मनाती होगी, मनाती है कि नहीं... ? ’
उसने कुछ सोचा और सहमे भाव से ’ हां ’ में सिर हिलाया।
’ अच्छा तो कैसे मनाती है दीपावली ? ’
’ मेरा छोटा लड़का है न, वह एक पाकिट फुलझड़ी और दो अनार लाता--’ फिर जैसे सूत्र उसकी पकड़ में आ गया हो, इस तरह खुश होकर बोली--’उसके साथ मइ भी अनार छोड़ती—वो छोटा हइ न! ’
’ हां, लेकिन पूजा ? पूजा भी तो करनी चाहिए भगवान की...अच्छा, दीपावली को किसकी पूजा की जाती है, तुझे मालूम है ? ’
वह पहले अचकचाई, फिर थोड़े आत्मविश्वास के साथ बोली—
’ भगवान की... ’
’ हाँ-हाँ, लेकिन किस भगवान की ? ’
उसने फिर मेरी तरफ हैरानी से देखा—मेरे अंतस्तल से दया का स्रोत फूट पड़ा। हे ईश्वर! ये अपढ़, नादान कुछ भी तो नहीं जानते! यह भी नहीं कि देवी-देवता कौन-कौन से हैं—उनके क्या-क्या काम, कौन-कौन से विभाग हैं। कब, किस दिन, किसकी पूजा की जाती है और उसका क्या विधि-विधान तथा फल मिलता है। इन्ही मूढ़ों के लिए ही तो संस्कृत में वह श्लोक है कि विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील और धर्म से हीन ऐसे व्यक्ति भूमंडल के भारस्वरूप होते हैं। मनुष्य के रूप में पशुओं से भी गए-बीते। बहुत दुष्कर है इनके भीतर ज्ञान का अलख जगाना। कहां से शुरु किया जाए ? लेकिन अब तो ओखली में सिर दिया ही है तो बात पूरी करनी होगी । कितना अच्छा होता अगर इस बीच कोई उपहार के पैकेटवाला आ गया होता, तो इस प्रवचन की कड़ी आप से आप टूट जाती।
’हां तो सुन !’ ’ भगवान तो कई होते हैं, कोई पैदा करता है, कोई पालन-पोषण करता है, कोई विद्या-बुद्धि देता है, कोई धन-संपत्ति देता है, कोई विघ्न-संकटों से रक्षा करता है, समझ में आया ? ’
लेकिन उसने जिस तरह सिर हिलाया, उससे साफ लगा कि समझ तो वह खाक-भर भी नहीं रही; लेकिन चूंकि मैं कह रही हूँ, इसलिए बात कुछ पते की ही होगी। एकाएक, जैसे बच्चे कक्षा में पढ़ाई की बोरियत से ऊबकर इधर-उधऱ ध्यान बंटाने लगते हैं, वैसे ही वह मेरी पूजा की चौकी पर रखी लक्ष्मी की चाँदी की प्रतिमा की ओर इशारा करके बोली—
’ तुम्हारा भगवान काए का है? चाँदी का ? ’
’हाँ, ये देवी लक्ष्मी की मूर्ति है न—इन्ही की पूजा आज होती है। तुझे मालूम है, लक्ष्मी काहे के भगवान हैं ? लक्ष्मी धन-संपत्ति, सुख-सौभाग्य की देवी हैं, समझी ? ’
उसने ’ हाँ ’ में सिर हिलाया और जैसे यह सोचकर खुश हुई, पूरा पाठ समझ में आए चाहे नहीं; लेकिन ’ हाँ ’ में सिर हिला देने से मास्टर छुट्टी जरूर दे देंगे।
सब कुछ रख-रखाकर वह जाने लगी तो मैने कहा—
’रात में एक बार आ जाना...यहीं पास में ही रहती है न तू.. ’
उसने सोत्साह ’ हाँ ’ कहकर सामने फैली दस बारह मैली-कुचैली चीथड़ों से ढाँपी, झोपड़ियों की तरफ इशारा कर दिया; जैसे अपना पता-ठिकाना नहीं, शहर का कोई दर्शनीय स्थल दिखा रही हो। अपना ’ घर ’ दिखाने का गर्व उसके चेहरे से छलका जाता था।
’ सुन तू भी अपने मरद से कहकर रात में भगवान की पूजा करना । ’ मन में सोचा—मैं भी अपनी पूजा के समय अपने भगवान से थोड़ी पैरवी कर दूंगी, इनके सुख चैन के लिए।
’मेरा मरद नई... ’ उसने एक तटस्थ-सी सूचना देने के लहजे में बताया।
’ क्या ? ’ एक झटका-सा लगा। मैं जैसे सन्न-से नीचे आ गिरी।
’ क्या हुआ तेरे मरद को... ’
उसने उसी सूचना देने के से लहजे में किसी तरह अपनी टूटी-फूटी भाषा में समझाया कि उसका मरद गांव से काफी दूर नहर खुदाई का काम करते-करते वहीं गहरे गढ़े में गिरकर मर गया।
’ अरे...कैसे... ? ’ मेरे मुँह से अनायास ही निकला।
’ क्या मालूम? ’ उसने एक तटस्थ और शांत भाव से धीमे से कुछ बुदबुदाया—जिसमें मैं सिर्फ भगवान-भर ही समझ पाई।
मेरा दिल सहानुभूति-संवेदना से ऊपर तक लबालब था। मस्तिष्क में तमाम सारे संवेदना संदेशों की इबारतें घूम गईं। लेकिन संवेदना दें तो किसे ? लेने की फुरसत भी तो हो किसी को। वह तो जल्दी-जल्दी झाड़ू-ब्रुश और दूसरी आलतू-फालतू चीजें समेटे, वापस किचन में भागी; क्योंकि अभी उसे दो और फ्लैटों के फर्श चमकाने थे। झोंपड़े से काफी दूर, सड़क किनारे फटे पाइप से पानी लाना था, सुबह के बरतन साफ करने थे, इधर-उधर डाँव-डाँव करते, मारे-मारे अपने बेटे को ढूंढ़ उसे दाना-पानी देना था। क्यू में खड़े मेरे संवेदना-संदेश मुँह देखते रह गए। वह रेलगाड़ी-सी भागती निकल गई।
ढली शाम ये आए। मैने हुलसकर अगवानी की। लेकिन चेहरे पर अजीब-सी उधेड़बुन हावी थी। मैने सारे दिन की आवाजाही और रंग-बिरंगे पैकेटों का खुलासा बयान करना शुरु किया। उन्होंने किसी मातहत की रिपोर्ट की तरह सुना।...उकताकर चाय की तलब की और दो गहरे घूँट उतारने के बाद अपनी उद्विग्नता छुपाते-छुपाते भी पूछ बैठे—
’मजीठिया आया था ? ’ -- ’ मजीठिया ’ का मतलब मुझे मालूम था। सप्लायरों में सबसे कीमती नगीना। और फिर दीपावली पर मजीठिया का पर्याय था, बेल्जियन कट गिलासों का पूरा सेट, शैंडीलीयर, मसूर की दालों से माणिक की ऐसे ही थमा दी गई पुड़िया, या फिर बेशकीमती हीरे की छोटी-सी अँगूठी।
मेरे ’न...नहीं तो ’ कहने पर बेचैनी थोड़ी और बढ़ी सी लगी।
’क्यों ? क्या बात हो गई ? ’
’ कुछ नहीं...यूँ ही पूछा था... ’ फिर जैसे रोकते-न-रोकते अपनी उधेड़बुन जोड़ गए--’ ऑफिस में उसका ड्राइवर तो दिखा था...इसका मतलब आया था...’
’कोई जरूरी नहीं कि आया ही हो—हो सकता है कि अपने ड्राइवर और गुमाश्तों को ही पैकेट्स लेकर भेज दिया हो... ’
मेरी बात से न्हें बल मिला। चाय के दो-चार घूंट और शान्ति से उतरे। लेकिन तभी बेचैनी फिर हावी—
’ तो भी...मेरे पास आए बिन... ’
’अरे, हो सकता है, आपसे घर पर मिलना चाहता हो खुल्लर, मगन औरह लाकड़वाला की तरह...मगन भाई बड़ी खूबसूरत तनछोई की साड़ी लाया है, दिखाऊँ ? ’
उन्होंने जैसे सुना ही नहीं।
’फिर भी—घर पर भी आना होता तो भी, अब तक तो आ जाना चाहिए था...समझ में नहीं आता इस मजीठिए के बच्चे को हुआ क्या--’
’ कौन, पापा ?’ छोटे मिंटू ने अभी-अभी आए पिस्ता-बादामवाले बिस्कुटों के रंगीन पेपर को नोचते-नोचते पूछा।
’कुछ...।’ मैंने छोटे बेटे को टोका-- ’ ये बच्चों के सुननेवाली बातें नहीं। ’ और इनके पास आकर सहानुभूति पूर्वक पूछा कि क्या चाय और लेंगे? जवाब में उन्होंने एक अनमनी-सी ना कर दी और सिगरेट सुलगाकर बालकनी पर टहलने लगे।
मैं बीच-बीच में किसी-न-किसी बहाने कुछ बोलने-बतियाने की कोशिश करती। दिमाग इधर-उधर बहकाने की भी। लेकिन इनके जवाब के अंत के साथ जुड़ता-- ’ समझ में नहीं आता, इस मजीठिया के बच्चे को क्या हुआ ? ’
मैं अपना सहधर्मिणी का रोल अदा करने में जी-जान से जुटी थी। वैसे भी इनका दुःख और बेचैनी इनसे ज्यादा मेरी थी। मजीठिया हर साल सबसे पहले ही आया करता था और इ साल तो इनका प्रमोशन भी हो गया था। प्रमोशन के बाद खुशी-खुशी सारे साल की आमदनी का अंदाजा लगाते हुए मजीठिया को हमने सबसे ऊपरी पादान पर रखा था। और उसी मजीठिया का दीपावली की शाम तक कहीं अता-पता नहीं था।
रोल अदा करते-करते एक भूल हो गई। एक बेहद लचर बचकानी-सी बात निकल गई मुँह से--
’सुनिए...आपके प्रमोशनवाली बात उसे मालूम है ?
ये भभक पड़े-- ’ अजीब बेवकूफी की बात करती हो तुम भी ? अरे ! प्रमोशन की बात का इससे क्या लेना-देना...वह तो वैसे ही आता रहा है हर साल, उस तरह तो आता...’ लेकिन तभी जैसे कुछ खटका हो-- ’ कहीं ऐसा तो नहीं कि इधर-उधर के छुटभइयों ने कान भर दिए हों उसके कि काम तो सारा मातहतों के थ्र्रू होता है; अब बेकार बड़े साहब के लिए माल ढोने का क्या मतलब...लेकिन अगर उस स्साले ने ऐसा सोचा है तो... ’
कहने के साथ ही इनके चेहरे पर जो आंवे की धधक उठी तो मैं सहम गई। फौरन ठंडे पानी के छींटे ताबड़तोड़ मारने लगी--’ अरे छोड़िए...बरसों से बिजनेस का पक्का खिलाड़ी है—ऐसी गलती भला कैसे कर सकता है वह... ’
और सचमुच ये फौरन ठीक तापमान पर आ गए।
’ हां, यह तो है ही...लेकिन फिर भी समझ में नहीं आता कि इस मजीठिया के बच्चे को... ’
दरवाजे की घंटी बजी । छोटा बेटा चट से उचककर बोला-- ’ मैं देखूँ पापा ? शायद ’ मजीठिया ’ हो... ’
मेरे आने से पहले ही वह दरवाजा खोलने भागा और पलक झपकते लौटकर मेरे कानों में फुसफुसाया—
’ सुल्तान ब्रदर्स...खूब बड़ा-सा पैकेट है...
’धत् ! ’ मैं अंदर से मगन होते हुए, उसे बनावटी रोष से तरेरती हूँ। तभी मेरा ध्यान वापस इनकी ओर जाता है और मेरा उत्साह ठंडा पड़ जाता है। घंटी बजने पर सचमुच इन्होंने अपनी उतावली छुपाते-छुपाते भी बेचैनी से दरवाजे की तरफ देखा था ; लेकिन अब वापस चहलकदमी तेज हो गई।
अब ? मुझे कुछ नहीं सूझता तो बैठे-बैठे मजीठिया के बच्चे को कोसने लगती हूँ। बना-बनाया त्योहार बिगाड़ दिया। अरे आ जाता तो कौन-सा सोना झर जाता उसका। करोड़ों का आदमी है। हमारी साल-भर की खुशियों पर पानी फेरने से आखिर क्या मिला उसे ?—और मैं पाती हूँ कि इनका वाला सुरूर अब ठीक उसी तरह मेरे सिर पर चढ़कर बोल रहा है—आखिर मजीठिया के बच्चे को हुआ क्या ? क्यों नहीं आया हर साल की तरह।
घंटी फिर बजती है। इस बार बाकी दोनों बच्चे अनार, चर्खी, रॉकेट, फुलझड़ियों के बड़े-बड़े पैकेट से लदे-फंदे उछलते कूदते लौट आए हैं...छोटा बेटा उनके पास आता है...लेकिन मेरे और इनके चेहरे की ओर देखकर वे दोनों सहम गए। दोनों का एक साथ सवाल मिला है कि ’ क्या हुआ ? ’
और जब तक मैं कुछ सोचूँ या बोलूँ, छोटा मिंटू टप से बताता है-- ’ वो मजीठिया इस साल आया ही नहीं...
’शटअप-! ’ ये जोर से दहाड़ते हैं !
थोड़ी देर इन्तजार करने के बाद मैं चाहती हूँ कि इनसे कहूँ, गोली मारिए उस मजीठिया को...आइये चलिए पूजा करें...लेकिन जानती हूँ, पूजा करते हुए भी क्या मजीठिया चैन लेने देगा ? उसी की लाई आधा किलो ठोस चाँदी की लक्ष्मी की ही तो हम हर दीपावली पर पूजा करते आए हैं। यों ऐसा कोई रिवाज या रूढ़ि नहीं थी...परिवार में तो पहले हमेशा मिट्टी की गणेश और लक्ष्मी की छोटी-सी प्रतिमा और चार आने के माला-फूल-बतासे में ही हँसी-खुशी लक्ष्मीपूजा की आरती हो जाती। लेकिन अब चाँदी की ठोस लक्ष्मी पधारने लगीं तो मिट्टी की मूर्ति पूजने की बेवकूफी कौन करता—इसलिए वह आदत ही छूट गई। गणेश लक्ष्मी की नई मूरत ही नहीं ।
’ बाई ! ’
ओह ! सुगन्धा को आने के लिए कहा था । लेकिन अभई तो कुछ हुआ ही नहीं। मैने बेमन से मिठाइयों का एक पैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया।
उसने उत्सुक आँखों से एक बार पूजा की चौकी की ओर देखा और बड़े प्रेम से हाथ जोड़कर मिठाई का पैकेट माथे से लगाते हुए बोली—
’ पूजा संपली ? (हो गई?) ’
’ नहीं—पूजा अभी नहीं हुई। ये प्रसाद नहीं, ऐसे ही मिठाई है। तू जा अब... ’ मैं किसी तरह जल्दी-से जल्दी उसे टरकाना चाहती थी।
लेकिन उसकी आँखों में अपार विस्मय झाँक उठा; जैसे विश्वास ही नहीं कर पा रही हो कि भला यह कैसे हो सकता है ? अब तक पूजा नहीं हुई ? मुझसे उसकी हकबकी, विस्मय-भरी उपस्थिति सही नहीं जा रही थी । किसी तरह एकदम रुक्ष स्वर में बोली—
‘ कहा न...लेके जा सुबह आना, हम पूजा देर से करते हैं । ‘
कुछ न समझते हुए भी वह मेरी आवाज की तुर्शी से सहमकर धीमे-धीमे सीढ़ियाँ उतर गई।
इसी के साथ सब कुछ शांत और निस्तब्ध होता चला गया । हालाँकि अब चारों तरफ से छूटते बमों और पटाखों की तेज आवाजें आ रही थी। सड़क पर शोर-शराबा, हो-हुल्लड़ बढ़ रहा था। रोशनी की कतारों में जबरदस्त होड़ाहोड़ी-सी चल रही थी; लेकिन सागर तट की पंद्रहवीं मंजिल के मेरे फ्लैट में एक अजीब-सा सन्नाटा था। बम छूटते तो सन्नाटा और ज्यादा महसूस होता।
अंततः।
पूजा हुई । बच्चों ने पटाखे भी छोड़े...इन्होंने वापस बालकनी में जाकर सिगरेट सुलगा ली । मुझे कुछ न सूझा तो इन्हें ज्यादा डिस्टर्ब करना ठीक न समझ, चुपचाप निस्तब्ध सन्नाटे में पिछले कमरे की खिड़की से जा लगी—
सामने—
पंद्रहवीं मंजिल से बहुत नीचे, काफी दूर, सागर तट से लगी, मैले-कुचैले चीथड़ों से ढँपी, झोपड़ी की एक कतार थी। उस कतार में एक अँधेरी-सी झोंपड़ी के सामने सुनहरे, हरे और सफेद बूँटोवाला छोटा-सा अनार छूट रहा था और उसमें घुली थीं दो मुक्त, मगन खिलखिलाहटें।
"जय दुर्गे महाकाली नमस्तुते माँ चंडी नम:। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।" श्लोक के शब्द मनचाहे क्रम से ही, विस्मृत अवस्था में भी स्वत: ही होठों तक आ और जा रहे थे। "जय जयति ब्रह्मचारिणी जय जयंती भद्रकाली माँ सरस्वती नम:।" मानो बिस्तर पर नहीं, माँ के मंदिर में आसित थे वे -- आश्चर्य था प्रणव भास्कर बैनर्जी को खुदपर? "जय जय शैलपुत्री रक्त-नेत्रिणी विघ्न-विनाशिनी विंध्य-वासिनी कष्ट हरिणी नम:।" "या कात्यायनी पार्वती कमला गौरी नंदिनी रक्षामि अहं माँ अंबे नमोस्तुते।"
मंत्र और संस्कृत सब भूल चुके थे वे परंतु रात के नीरव सन्नाटे में भी, अनियंत्रित और उत्कंठ पाठ खुद उनके ही कानों से टकराकर चतुर्दिक गूँजने लगा। बुद्धि और मन की सीमाएँ तोड़ते, माथे पर बहते ठंडे पसीने से, देवी के प्रति समर्पित वे बोल, निरंकुश आँखों और होठों से बह रहे थे। माँ के हर रूप का साक्षात्कार कर लिया था आज उन्होंने- माँ जगत जननी दुर्गा, माँ सुख-समृद्धिदात्री लक्ष्मी, माँ आत्मसंतुष्टा, ज्ञान-वर्धिनी सरस्वती, माँ पाप-विनाशिनी महाकाली। शक्ति का संचार था चारों तरफ़। सृष्टि और रचयिता दोनों ही से जुड़ गए थे वे इस एक ही पल में।
खुदको नास्तिक मानने वाले प्रणव बैनर्जी के लिए यह एक नया अनुभव था। आस्था और प्रकाश की इस रात्रि में त्रिशंकु से लटके हुए वे अपनी अधखुली आँखों से भी, साफ़-साफ़ देख पा रहे थे माँ को। बस माँ के रेशमी आँचल के नीचे सर रखकर भी, पूर्णत: समर्पित होकर भी, वापस सो नहीं पा रहे थे वह -- एक बेचैनी, एक प्रश्न पूछती, उत्तर टटोलती व्यग्रता में डूब चुका था आकुल मन।
प्रणव बैनर्जी को याद आया कि जब एक बार पहले भी कभी, दुर्गा माँ पूर्ण शृंगार के साथ, मिष्ठान भंडार पर लेटी, सपने में अवतरित हुई थीं और अपने ही नाम पर घर का नामकरण करने की सलाह दी थीं, तो भी बस वही एक बात कही थी माँ ने उनसे। बस यही कहा था तब भी तो, कि देख मैं तो हमेशा ही तेरे आस-पास हूँ, पर तू ही ध्यान नहीं देता मुझपर। तब भी तो बस उनकी आस्था को ही झकझोरा था माँ ने। आख़िर कौन हैं यह माँ -- गौरी, अंबा, दुर्गा, महाकाली? वह तो पूजा पाठ में विश्वास नहीं करते फिर माँ दुर्गा कभी शेर पर तो कभी सुअर पर, कभी गधे पर, तो कभी भैंसे और कभी हँस, हाथी, मयूर पर चढ़कर क्यों आ जाती हैं उनके पास? यों सपनों में बार-बार आना -- दर्शन देना आख़िर क्या चाहती हैं माँ उनसे? पहली बार तो नहीं हुआ यह कि माँ सपने में आईं, इसके पहले भी कम से कम दो तीन बार तो आ ही चुकी हैं माँ? याद है उन्हें कि कैसे खुशी की एक लहर दौड़ गई थी पूरे बदन में, शांति मिली थी उन्हें माँ के दर्शन से। परंतु आज तो मन बस उद्वेलित ही था -- अनजाने अशुभ की आशंका से काँप रहा था।
माँ कृशकाय, बेहद दयनीय रूप में, सूखे, सफ़ेद बालों को हवा में लहराती, पिछवाड़े आँगन में अति सूक्ष्म रूप ले प्रकट हुई थीं और हवा की सरसराहट सी गुज़र गई थीं उनके आँखो के आगे से। उनकी तरफ़ देखते-देखते, उसी पथरीली और सख्त़ ज़मीन पर बेचैन तेज़ी से लुढ़कती, पलट-पलटकर परिक्रमा लेती माँ पल भर में ही अदृश्य भी हो गई थीं - क्यों ये सपने इतने अस्पष्ट और धुँधले होते हैं? झुँझलाहट हो रही थी उन्हें खुदपर, सपना टूट जाने पर। कृशकाय और दरिद्र -- बूढ़ी कमज़ोर माँ। मारकीन की मैली कुचैली काली किनारी की धोती में लिपटी हुई, लिपटी क्या खोई हुई। कोई शृंगार नहीं और झुर्रियों भरे हाथों में त्रिशूल और पोपले होठों पर एक रहस्यमय मुस्कान, आधी खुली आँखों से एकटक उन्हें ही देखती हुई? आख़िर क्या अर्थ हो सकता है इस स्वप्न का? क्या कहना चाह रही थीं वह-- कैसा रूप था यह माँ का - बेटे की आस्था की परीक्षा ले रही थीं या फिर वह बस अवहेलना कर रही थीं उसकी, दंड देना चाहती थीं उसे? धिक्कार रही थीं पुत्र के कर्तव्य का दायित्व ठीक-ठीक न निभाने के लिए -- दूर-दूर रहने के लिए?
वैसे तो बुद्धिजीवी और विख्यात मनोचिकित्सक प्रणव बैनर्जी दुनिया की नज़रों में प्रमाणित और सही या गल़त समझे जाने वाले किसी भी मुद्दे की कभी परवाह ही नहीं करते थे परंतु हाड़ माँस के एक इंसान थे वह भी तो, और माँ के दुख-सुख से तो हर बेटा ही विचलित हो जाता है फिर वह ही कैसे अपवाद रह पाते? पचास साल की इस लंबी उम्र में भलीभाँति जान गए थे वह भी कि सारा खेल मन का ही तो होता है। यह मन ही तो है जो अंदर ही अंदर एक संसार रचता है और फिर भरमाता है। उनके मतानुसार हर मन के अंदर सही ग़लत की एक अपनी ही अलग दुनिया है, हर व्यक्ति खुद ही अपराधी और निर्णायक भी स्वयं ही होता है अपना। और अपनी किसी भी दुख या आपदा से तबतक नहीं उबर सकता, जबतक कि खुद ना चाहे।
सब जानते और समझते हुए भी, अक्सर ही बेचैन हो उठना, किसी अनजाने और खोए को ढूँढते रह जाना, उसी में उलझे रह जाना, मानो एक आदत-सी पड़ती जा रही थी यह उनकी। परंतु यह भी तो जानते थे वे कि दुनिया या विद्वान कुछ भी कहें, कोई नहीं समझ पाया कभी अबूझ इन रहस्यों को। एक अकेला वह ईश्वर ही है जो जानता और समझता है सबकुछ। पूजा-पाठ ही नहीं, उन जैसों की आडंबरहीन सहजता को भी समझता है वह तो। वैसे भी, खुदपर बाँधे अनगिनत संयम और नियमों का अँधेरा भी तो उतना ही भटका सकता है जितना कि अज्ञान का? क्या समझता और माफ़ नहीं करता वह -- हमारी कमज़ोरियों को, क्रूर और अबोध हर तरह के अपराधों को, राग द्वेष के हज़ार विकारों के - आख़िर उसी का रचा तो है यह संसार? अगर ग्लानि और पश्चाताप के आँसुओं से मन निर्मल करना हम सीख लें, तो बस प्रकाश ही प्रकाश है चारों तरफ़। विद्वानों का ज्ञान ही नहीं, प्यासे मन की ज़रूरत और तड़प तक जानता है वह तो। फिर कैसी यह बेचैनी और उलझन? दंड देना ही नहीं, प्यार करना भी आता है उसे। तभी तो बार-बार ही भिन्न-भिन्न रूपों में आगाह और आवाज़ देती है माँ। जानते थे वे कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं उन्हें, ना ही इस दुनिया में और ना ही उस दुनिया में। माना कि विधिवत कभी कोई पूजापाठ नहीं की थी उन्होंने, परंतु जानते थे वे कि कभी कोई ऐसा काम भी तो नहीं किया, जिसकी वजह से आत्मा कचोटें या कष्ट दें और फिर यह आत्मा ही तो परमात्मा है। चलो पल भर को मान भी लें कि आत्मा परमात्मा नहीं, अलग है, पर हैं तो आख़िर उसका ही अंश? "एको अहं, सर्वो अहं" पढ़ा ही नहीं, जिया भी था उन्होंने तो। प्रणव भास्कर बैनर्जी के होठों पर एक निरासक्त हँसी बिजली-सी कौंधी और बहते आँसुओं में विलुप्त हो गई - इतना अकेला और सूना क्यों हैं यह संसार- क्यों इतनी लाचार है "अहं ब्रह्मास्मि" का वेदमंत्र देती और पढ़ाती यह दुनिया?
प्रणव ने घड़ी देखी सुबह के पाँच बज चुके थे। परदे खोल दिए। कमरा उजाले से भर गया। याद आया आज तो महालय का दिन है, अर्थात हफ़्ते भर में ही नवरात्रि शुरू। सोच की उमंग मुक्त नर्तन करने लगी। फिर तो अब नव दुर्गा के स्वागत में लग जाएगा पूरा का पूरा बंगाल, बंगाल ही क्या पूरा भारत ही, गुजरात, पंजाब सब। सारी व्यस्तताओं के बाद भी उनका मन अक्सर ही भारत में ही रमा रह जाता। शरद ऋतु की वह गुलाबी ठंड और पूजा का जोश और उत्साह -- अश्विन मास के नव चंद्र का भव्य स्वागत करने वाली यह प्रथा बहुत ही प्यारी लगती है उन्हें। यों तो अश्विन और चैत्र, साल में दो बार माँ आती हैं, परंतु दशहरे से जुड़ जाने के कारण शरद की यह छटा कई गुना ज़्यादा हो जाती है। कहीं हँसी कहकहे, तो कहीं सुंदरियों और किशोरियों के रेशमी कपड़ों की सरसराहट। नई नवेली चूड़ी व पायलों की खनक। बच्चों के लिए कोने-कोने मिठाई, कपड़े, खिलौने सभी कुछ- चारों तरफ़ बस उल्लास ही उल्लास। हज़ारों बड़े बूढ़े और बच्चे- मानो खुशी से उमड़ पड़ता है पूरा शहर। भारत ही क्यों यहाँ ब्रिटेन में भी तो होती होगी देवी पूजा? वक्त मिला तो जाते ही रहेंगे वह भारत इसी वक्त, इसी महीने। एक वादा कर लिया था उन्होंने खुदसे भी और अपने भारत से भी।
मात्र याद करते ही एक अनोखी पुलक से भर गया मन। कभी वे भी गौरी के साथ सुबह शाम तीनों दिन ही पूजा के पंडाल पर जाते थे। नौ दिन बस पूजा पाठ, खाना पीना और सांस्कृतिक कार्यक्रम। वह धनुचि नृत्य-- ढोल मृदंग पखवाज़, शंखनाद में मिलकर बहती धूप, गूगल, कपूर और चंदन की महक, जो कपड़ों और बालों में ही नहीं आत्मा तक में रची बसी है - आज भी याद है उन्हें सबकुछ। माँ दुर्गा के बीसों रूपों की भव्य पूजा होती हैं इन नौ दिनों में। तीन दिन दुर्गा के अंदर के विकार नष्ट करने के लिए। फिर अगले तीन दिन लक्ष्मी के, उनकी कृपा और समृद्धि के लिए। और अंतिम तीन दिन माँ सरस्वती के, ज्ञान अर्जन के लिए। और फिर माँ की विदाई। साल में बस इन्हीं नौ दिन के लिए ही तो आ पाती है माँ अपने मायके। उनके परदादा के दादा शिरोमणि ने ही तो बनवाया था वह दुर्गा माँ का भव्य मंदिर, और वह भी, उसी स्थान पर जहाँ पर माँ प्रकट हुई थीं। तभी तो आजतक माँ की कृपादृष्टि है उनके परिवार पर।
साफ़ स्वस्थ होकर, संयम व शांति लेकर ही तो मन ज्ञान अर्जन के लायक हो सकता है, इतनी-सी बात तो देवी की पूजा के बिना भी, बचपन से ही जान गए थे वह। सोलह वर्ष की नाजुक उम्र में ही पहली बार दर्शन दिए थे माँ ने बुद्धिजीवी प्रणव को। अपने रथ पर सवार माँ ने हज़ारों की भीड़ में से एक उसी को तो चुना था और वह आशीश माला पुजारी द्वारा फेंके जाने पर, सीधे उसी के गले में तो आकर गिरी थी। पता नहीं माँ के आशीश का फल था या फिर उससे उत्पन्न आत्मविश्वास और मेहनत का कि अपने स्कूल या शहर में ही नहीं, पूरे प्रांत में उच्चतम अंक आए थे प्रणव बैनर्जी के। माँ-बाप, परिवार, विद्यालय और गुरुजन, सबका ही सीना गर्व से तन गया था।
ऐसा नहीं कि पूजा में आस्था नहीं थी, अच्छा लगता था उन्हें माँ का शृंगार और असुर महिषासुर का मर्दन। सत्य की असत्य पर विजय। बस अष्टमी के दिन दी गई बलि को नहीं स्वीकार पाते थे सुकुमार भावुक प्रणव। ना ही बकरे की और ना ही प्रतीकात्मक दिए गए कुम्हड़े की बलि। कोई भी अच्छी नहीं लगती थी उन्हें। कोई न्याय संयम या बलिदान और त्याग की भावना नहीं जगा पाती थी यह प्रथा उनके अंदर। इस प्रथा को छोड़कर सबकुछ अच्छा लगता था उन्हें नवरात्रि और माँ के बारे में -- सैंकड़ों देवी माँ के रूपों और पौराणिक कथाओं के बारे में सबकुछ जाना था उन्होंने भी।
कैसे कभी बालरूप में तो कभी रमणी रूप में दर्शन देती आई हैं माँ अपने भक्तों को, पता था उन्हें भी। जन्माष्टमी से ही तैयारी शुरू हो जाती थी दुर्गा पूजा की। और यह महालय का दिन जिस दिन माँ अपने ज्ञान चक्षु खोलती हैं उन्हें विशेष रूप से ही भाता था। ज्ञान की एक अतृप्त भूख जो थी उनके जिज्ञासु मन में। महालय यानि कि माँ दुर्गा की अधगढ़ी मूर्ति की चक्षुदान का दिन। पूर्वजों को याद करने और तर्पण का दिन। मन एक बार फिर बेचैन हो उठा- आख़िर क्या चाहती है माँ उनसे - क्यों देखा उन्होंने विचलित करने वाला माँ का यह रूप, वह भी आज के दिन, कौन से नेत्र खोलना चाहती हैं माँ? क्या आज ही भारत जाना चाहिए उन्हें, हफ़्ते बाद तो जा ही रहे थे वह। पिछले तीस साल से एक आध वर्ष को छोड़कर हर दुर्गापूजा पर बनारस के दुर्गा कुंड वाले अपने घर में ही तो होते हैं वे। पूरा दिन यों ही, एक उहापोह में निकल गया। डॉ. प्रणव बैनर्जी का मन आज मरीज़ों में नहीं लग पा रहा था। किसी भी मन की गुत्थियाँ नहीं सुलझा पा रहे थे वे, क्योंकि खुद उनके अपने मन में एक गाँठ लग चुकी थी अब।
रात खाना खाने के बाद पत्नी और बच्चों के साथ ड्राइंग रूम में बैठकर टी.वी. देखने के बजाय अकेले स्टडी में बंद कर लिया था प्रणव ने खुद को। हाथों ने मजबूरन, जाने किस याद की उँगली पकड़ें, पास पड़े काग़ज़ पेंसिल उठा लिए थे और बेचैन उँगलियों ने स्केच बनाना शुरू कर दिया था। हमेशा की तरह एकबार फिर आज तस्वीर के नाम पर वही दो हृदय-भेदी रहस्यमय आँखें उभर आईं थीं उस सादा सफ़ेद काग़ज़ पर। आँखें जो हूबहू गौरी की याद दिलाती थी उन्हें-- आँखें जिनकी गुत्थियों में प्रणव तरुणावस्था से ही पूरी तरह से डूब चुके थे, आँखें जो आजतक, छह हज़ार मील दूर बैठकर भी पीछा करती रहती हैं उनका। "यह तुम आँखें ही पहले क्यों बनाते हो प्रणव? हमलोगों की तरह चेहरे का बाहर का आकार क्यों नहीं?" गौरी ने भी आख़िर एक दिन पूछ ही डाला था उनसे। "क्योंकि आँखों के सहारे ही किसी के मन या आत्मा में उतरा जा सकता है गौरी। उसे पढ़ा जा सकता है।" और तब उनकी सहपाठिनी, बरसों से ही, वहीं दुर्गा कुंड पर, पड़ोस में रहने वाली गौरी प्रियदर्शिनी डर गईं थी। भावों की तीव्रता से भी और उनके सोचने के तरीकें से भी। न जाने क्या सोचकर तब न सिर्फ़ दोनों हाथों से चेहरा छुपाकर आँखें बंद कर ली थीं उसने, अपितु चुपचाप सर झुकाए वहाँ से तुरंत ही चली भी गई थी वह - मानों प्रणव हमउम्र नहीं, एक जादूगर थे और उनके आगे कुछ पल और रुके रहने से सारे भेद खुल जाने का अंदेशा था उसे। क्या छुपा रही थी गौरी उनसे, यह तो प्रणव बरसों बाद ही जान पाए थे, मन को पढ़ने का जादुई तिलिस्म जो नहीं आता था उस वक्त। और तब पहली बार प्रणव ने गौरी की वे शर्मीली झुकी आँखें काग़ज़ पर उतारी थीं। उसके बाद तो अक्सर ही वे आँखें स्केच पैड पर उभरी आतीं और बात करने लगतीं उनसे - बातें जो घंटों पेंटिंग स्कूल में साथ-साथ रहते हुए भी वे एक दूसरे से कह या सुन नहीं पाते थे। हाल यह था कि प्रणव पूरे हफ़्ते मेडिकल स्कूल में अपने लेक्चर्स में बैठे-बैठे ही वह सब बातें दोहराने लगते जो उन्हें शनिवार को गौरी से कहनी होती थीं और वह जो गौरी के आते ही, उसके सौम्य रूप को देखते ही, भूल जाया करते थे वे। एक अकथ सुख में डूबे, घंटों बिना कुछ कहे, बगल में बैठे रह जाते थे वे। शब्दों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता था तब और ना ही अनकहे अर्थों के लिए उपयुक्त शब्द ही।
सभी पहचान गए थे इस राग-अनुराग -- अनकही प्रीत को। प्रणव के डाक्टर बनते ही गौरी की माँ खुद ही रिश्ता लेकर आ गई थीं और तब ज्योतिषाचार्य किशन देव की बेटी ज्योतिर्मयी ने गौरी की कुंडली चुपचाप वापस लौटा दी थी। यह कहकर कि जिसके सातवें घर में मंगल और शनि बैठें हों, काल सर्प योग हो, ऐसी कुलच्छिनी को कैसे अपनी बहू बना सकती है वह -- आख़िर एक ही तो बेटा है उनका। और तब अपनी बचपन की सहेली कावेरी की बेटी नंदिता से तुरंत ही शादी रचा दी थी प्रणव की। मद्रासिन की बेटी का अशुभ ख़तरा सर पर मंडरा रहा था उनके बंगाली ब्राह्मण परिवार पर और ख़तरों को न्योता देने की आदत नहीं थी ज्योतिर्मयी बैनर्जी की।
"सूरत शक्ल पर मत जा। देखने में ही भोली लगती है वह बस। देखना शादी के बाद दो बरस भी पति रह पाए तो बहुत समझना।" अस्सी घाट पर पुजारी के टूटे और आधे पानी में तैरते पुराने पट्टे पे आँखें बंद किए लेटे बेटे को समझा लिया था उन्होंने अपने असंगत तर्क-वितर्कों के साथ -- बिना परवाह किए या देखें कि कैसे शाम का अँधेरा गंगा की छाती पर ही नहीं, बेटे के मुँह पर भी फैल चुका था और वह सुर्ख सूरज आँसू भरी आँखों को अपनी ही पलकों में छुपाए चुपचाप ही बहती नदी तक को ले डूबा था। बात वह यों ही आई गई हो जाती, अगर दो बरस बाद ही एकबार फिर से मुलाक़ात न हो जाती गौरी से उनकी।
नंदिता को लेने ससुराल गए थे प्रणव। वहीं कमच्छा की चौमुहानी पर ही थी प्रणव की ससुराल। सामने ताज़े संतरों को देखकर गाड़ी रुकवा ली थी उन्होंने। अकेले ही उतर गए थे वह, साल भर के बेटे तन्मय को गाड़ी के अंदर ही सोता हुआ छोड़कर। लौटे तो हाथों के तोते उड़ गए। बेटा नहीं था गाड़ी में। मिनटों में ही पूरी दुनिया घूम गई थी। अब किससे पूछें, क्या करें, सोच ही रहे थे वह, कि किसी ने बताया कि सामने के घर में रहने वाली महिला ले गई हैं बच्चे को यह कहकर कि बच्चे के माँ बाप आएँ तो, वहाँ सामने उस घर पर भेज देना।
धड़कते मन से दौड़े थे घर की तरफ़ वह और दरवाज़े पर ही पत्थर का बुत बन कर जम गए थे। सामने दरवाज़े पर रंजन शास्त्री का नाम पत्र था और तन्मय को गोदी में लिए खुद गौरी खड़ी थी उनके आगे-- बंगाली लाल बॉर्डर की सफ़ेद साड़ी से सर ढके और चमकते लाल सिंदूर से माथे के बीचोबीच निकली लंबी पूरी माँग भरे हुए। कानों में दुहरे झूमर वाले सोने के झुमके और गले में मंगलसूत्र और हाथ भर-भर कर हाथी दाँत के लाल हरी नक्काशी वाली चूड़ियाँ और चाँदी का कड़ा। गोरे सुंदर माथे पर सूरज-सी चमकती सिंदूर की वह बिंदिया-- पल्लू से बँधा बाएँ कंधे पर झूलता ताली का गुच्छा-- बंगालिनों से ज़्यादा बंगालिन लगी थी वह मद्रासन उन्हें।
"आओ भास्कर, अंदर आओ।" मानो प्रणव को कहीं पीछे छोड़ आई थी वह, हाँ इसी नाम से पुकारा था उस वक्त उन्हें। प्रणव ख़ामोशी से देहली लाँघकर अंदर आ गए थे। मन में होती उथल-पुथल से काँपते घुटनों को बैठने की, सहारे की सख़्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। कुछ भी पूछ पाएँ वह, इससे पहले ही लुंगी बाँधते, रंजन दा आ गए थे बैठक में, "कब आए प्रणव तुम?" रंजन दादा गौरी से ज़्यादा सहज लग रहे थे उस वक्त। कम से कम उसी पुराने प्रणव नाम से तो पुकारा था उन्होंने उसे। एक ही झटके में पूरा अतीत, सारी पहचान झुठलाई तो नहीं थी। "मैं तो तुम्हारे बेटे को देखते ही समझ गया था कि यह प्रणव का ही बेटा है- वही रूप रंग सबकुछ ही तो तुमपर गया है। मैंने ही गौरी से कहा था कि अंदर ले चलो बच्चे को, यहाँ घर में आराम से सोएगा। आख़िर हम भी तो कुछ लगते हैं इसके।"
सब कुछ ही चुभ ही रहा था प्रणव के मन में- जो सहज था वह भी और जो असहज होने के कारण अनदेखा नहीं कर पा रहा था वह, वह भी। झुकी आँखों से ही एकबार फिर गौरी के मन को पढ़ना चाहा उन्होंने, पर वह तो बेल के शरबत से भरे दोनों गिलास मेज़ पर टिका, बेटी के साथ मग्न खेल रही थी। गोदी में खेलती छह महीने की वैदेही माँ सी ही सुंदर थी। "किस्मत वाले हो भास्कर तुम, जो तुम्हारा बेटा पसंद आया इन्हें। हँसकर बोली थी वह (प्रणव नाम न लेने की मानो कसम खा ली थी उसने) "मेरी वैदेही में तो पेंटिंग की तरह नुक्स निकालते रहते हैं ये। (उसके मुँह से निकला 'ये' शब्द सहज होते हुए भी अंदर तक बींध गया था प्रणव को) "नाक नक्श तो बहुत अच्छे हैं गौरी, बस रंग में ज़रा सफ़ेद और मिलाना भूल गईं हो तुम।" रंजन दादा ने बीच में ही उसकी बात काटते हुए कहा और फिर तो उनके खुद के हँसी ठहाकों से पूरा कमरा गूँजने लगा। यह वही रंजन दा थे जो गौरी और प्रणव को अपने सबसे ज़्यादा होनहार शिष्य समझते थे। शांति निकेतन की परंपरा के अनुसार गुरु श्री नंदलाल बोस से व्यक्तिगत रूप में मिलाने ले गए थे उन दोनों को। कितना आदर करते थे प्रणव और गौरी भी उनका। रंजन दा की हर बात ब्रह्म वाक्य थी। दादा द्वारा परोसे गए किसी तिरस्कार, किसी अपमान या डाँट का कभी बुरा नहीं माना था गौरी और प्रणव ने। उस दिन भी नहीं, जब गौरी से दादा ने माँ की प्रतिमा बनाने के लिए शीशे के आगे नग्न होकर खुद ही को स्केच करने को कहा था। और गौरी ने वैसा ही किया भी था। दादा को दिखाते समय कोई शरम या विकार नहीं उठा था उस किशोरी के मन में - ठीक भी तो है माता-पिता गुरु और ईश्वर से कैसा परदा-- इन्हीं के हाथों से तो हमारी संरचना और भरण-पोषण हुआ है। पल भर में ही प्रणव ने पढ़ लिया था उसके पारदर्शी मन को। पर उसकी नज़र जब स्केच पर गई थी तो पूरी बीर बहूटी हो गई थी वहीं गौरी और यह देखकर अच्छा लगा था प्रणव को। उसका पुरुषत्व भी तो सचेत हो उठता था गौरी के टमाटर से लाल गालों को देखते ही पर आज कितना बदल गया है सब कुछ- कोई भाव नहीं आए-गए थे गौरी के शांत चेहरे पर। एक शादी मात्र ने कितनी दूरी ला दी थी उन दोनों के बीच। चिढ़ हो रही थी उसे सामने बैठे गौरी के पति से।
"मेरी बेटी है वैदेही, कुछ तो मेरा लेगी ही।" काले कलूटे रंजन दा साँवली सलोनी वैदेही पर पूरी तरह से मुग्ध थे और अपनी ही रौ में बोले जा रहे थे। रंजन दा को इतना खुश कभी नहीं देखा था प्रणव ने। आख़िर क्यों न हों, कहते हैं छोटी उम्र की बीबी से शादी करके बुढ्ढ़ा आदमी भी जवाँ हो जाता है फिर गौरी तो पूरे बीस साल छोटी थी उनसे। जिन्हें साधु समझता था वही रंजन दा राक्षस निकले, उसीकी सीता को चुराकर ले गए-- किस अशोक वन में डाल दिया है इन्होंने इसे, पर यह जघन्य अपराध हुआ तो हुआ कैसे? अचानक अपने गुरु शेखर दा के प्रति बरसों से बैठी सारी श्रद्धा उड़न छू हो गई थी प्रणव के मन से। क्या गौरी की मर्ज़ी से भी हुई थी यह शादी? क्या पता औरतों का मन वैसे ही बहुत चंचल होता है-- प्रणव के लिए अब और वहाँ बैठना मुश्किल हो चला था और तब फिर से आने का वादा करके चुपचाप चले आए थे वह वहाँ से उठकर, बिना शरबत का गिलास पिए, बिना नमस्ते कहे और बिना ही गोल मटौल सुंदर-सी वैदेही की गोदी में लिए या प्यार किए। गौरी और रंजन दा दोनों ही आए थे कार तक छोड़ने, बस वही किसी से आँखें नहीं मिला पा रहे थे।
उसके बाद उनकी मुलाक़ात गौरी और रंजन दा से अगले वर्ष उसी दुर्गा कुंड के पूजा-पंडाल में ही हुई थीं। वैदेही दौड़ने भागने लगी थी और गौरी पूरी तरह से अपनी घर गृहस्थी में रम चुकी थी। माँ से बहुत अच्छी दोस्ती थीं गौरी की। पूजा की सारी तैयारी उसी के हाथ में रहती थी। यों तो वह भी घर-गृहस्थी में पूरी तरह से रम चुके थे पर जब भी माँ और गौरी को दुर्गा मंदिर की सीढ़ियों पर एकसाथ बैठे देखते तो मन के अंदर का एक चोर कोना बुरी तरह से आहत होकर कराहने लग जाता। आख़िर चार साल से कुंडली मारकर बैठा वह प्रश्न फुफकार ही उठा था गौरी को अकेले देखकर उस दिन। वहीं घर के आगे दुर्गा कुंड की सीढ़ियों पर ही रोका था प्रणव ने गौरी को। क्या तुम खुश हो गौरी? कभी हमारे बारे में भी सोचती हो क्या? बहुत ही दयनीय और विचलित लग रहे थे प्रणव बैनर्जी उस समय। अब रोए कि तब। मानो उत्तर नहीं, सहारा माँग रहे हों गौरी से। और तब बहुत ही दृढ़ और ठहरा हुआ जवाब दिया था गौरी ने उन्हें, बिल्कुल अपने स्वभाव की ही तरह। जिंद़गी सोचने नहीं, जीने के लिए होती है भास्कर। कर्म करना ही हमारे बस में है, और कुछ नहीं। और फिर बादल और भिखारी की कैसी ज़िद, कैसा मान-सम्मान? ना ही तब कुछ समझ पाए थे प्रणव बैनर्जी और ना ही आजतक जान पाए कि उन्माद और अनुराग के उस छोटे से एक पल में क्या समझा दिया था गौरी ने उन्हें और खुद को।
अब तो पूरे तीस साल हो चुके थे रंजन दा को उस अभागन से शादी किए हुए। गौरी के किसी काल सर्प ने अभीतक तो उन्हें नहीं ही डँसा था, बल्कि पहले से भी ज़्यादा स्वस्थ और सुखी लगते थे वे। माँ से ही गौरी की सारी ख़बर मिलती रहती थी उन्हें। अभी पिछले महीने ही बेटी वैदेही की भी शादी कर दी है गौरी ने एक सुगढ़ और धनाढय बंगाली परिवार में। माँ ने लिखा था वर बहुत ही सुंदर और सुयोग्य है और उन्हीं के कहने पर गौरी पत्री-वत्री के पचड़े में भी नहीं पड़ी थी। क्या रखा है इन बातों में, बिना बात ही अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं। माँ की चरण रज लेकर विवाह के काम शुरू कर दिए थे। वे ही सब सँभाल लेंगी सब हँसकर बस इतना ही कहा था गौरी ने। और सब सँभाल लिया था माँ ने जैसे कि गौरी को सँभाल लिया था। और फिर सँभालती भी क्यों न, पिछले तीस साल से निर्जला व्रत करती है माँ का। पूजा के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती है वह। माँ ने ही बताया था कभी उसे यह सब और यह भी कि कैसे पत्री वाली बात की वजह से हुई बदनामी की वजह से कोई भी शादी नहीं करना चाहता था गौरी से। और तब गौरी की माँ के आँसू नहीं देखे गए थे उनसे। और उन्होंने खुद ही जैसे तैसे राजी किया था शास्त्री जी को शादी के लिए। कहा था उनसे कि सोचते क्या हो अब, घर में रोटी बनाने वाली आ जाएगी, बुढ़ापे का सहारा रहेगी। आपका घर बस जाएगा और अभागिन के माथे का कलंक मिट जाएगा। शास्त्री जी तो राज़ी हो ही गए थे, उसने भी कोई ना-नुकुर नहीं की। गौरी तो वाकई में गऊ निकली। एक आपत्ति नहीं की, जिस खूँटे से बाँधी, चुपचाप बँध गई। कहाँ होती हैं आजकल ऐसी शांत लड़कियाँ, वह भी इतनी पढ़ी-लिखी, गुणी और संस्कारी। शास्त्री जी आजतक बहुत ही खुश हैं गौरी के साथ। उनके तो मानो पिछले जन्म के पुण्य ही उदय हो गए हैं। जी जान से पति की सेवा करती है अपनी गौरी - हमारे भी हर सुख-दुख में भी, यही तो काम आती है-- हर ज़रूरत हारी-बीमारी पर तुरंत ही आ खड़ी होती है आँगन में। मानो पिछले जनम की बेटी या घर की बहू हो।
अच्छा तो माँ ने अब तक रिश्ता जोड़ ही लिया कुलच्छिनी के साथ। प्रणव की आँखें आँसुओं में डूबी हुई थीं, लिखे से भी ज़्यादा अनलिखा छू और विचलित कर रहा था उन्हें। समझ में नहीं आया कि हँसे या रोएँ - नहीं जानते थे वे कि माँ की उस एक नादानी जिसने मन को बस एक रिसता नासूर बना दिया था, भला कैसे और कब माफ़ कर पाएँगे वह? ठीक सामने नंदिता और तन्मय दोनों ही बैठे थे। चुपचाप ही, आँखें चुराकर डबडबाई आँखें पोंछ डालीं उन्होंने-- जेब में रखे रूमाल तक का ध्यान नहीं रहा उन्हें। विचलित करने वाला वह सपना भी तो कुछ ऐसे ही, गौरी की यादों की तरह ही भुलाए नहीं भूल रहा था। गौरी की तरह ही, आस्था और विश्वास पर प्रश्न चिह्न लगाए जा रहा था। खुद अपनी माँ से, उसके आँचल से दूर लिए जा रहा था उन्हें-- एक ऐसी पश्चाताप की आग में झोंक रहा था उन्हें जिससे बाहर आने को आजीवन झटपटाते रहे हैं वह। कभी गौरी का चेहरा माँ के चेहरे में तबदील हो जाता, तो कभी माँ का नंदिता के में। इंग्लैंड से भारत और फिर दिल्ली से बनारस तक का वह सफ़र एक ऐसे ही व्यग्र उहापोह में ही बीता था उनका।
घर के दरवाज़े पर हमेशा की तरह ही, अल्पना और मंगल दीप जलाकर ही स्वागत किया था माँ ने उनका, पर दिए की लौ की वह ललक माँ के चेहरें पर नहीं दिखी थी प्रणव को आज। पोपले मुँह की बिना दांतों की मुस्कान और झुर्रियों भरी खाल के साथ झूलते हाथ, उसी सपने वाली बूढ़ी देवी माँ की याद दिला रहे थे उन्हें। बाबा तो माँ से भी ज़्यादा बूढ़े दिख रहे थे। उम्र के बढ़ते शिकंजों ने कमर ही नहीं, उनके मन तक तो तोड़ दिया था। पाँच मिनट सीधे खड़े तक नहीं रह पाते थे वे तो- कोई उल्लास, कोई ललक नहीं थी उन रीती आँखों में। चारपाई पर लेटे-लेटे गीता हाथ में लिए, सीलिंग को घूरते रहना बस यही एक दिनचर्या थी उनकी। माँ सुबह सात बजे टी.वी. खोल देतीं तो वह भी रात के ग्यारह बजे तक उनके आगे बेमतलब ही चिल्ला-चिल्लाकर सो जाता पर सूनी थकी वे आँखें न सो पातीं। अब मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ सकता, प्रणव ने निश्चय किया।
"पर हम अकेले कहाँ हैं? यह गौरी है न हमारे पास।" मानो माँ ने बेटे की आँखों के दर्द को पढ़ लिया था, माँ झट से पल्ले से आँसू पोंछते हुए बोली थीं, "हमारे हर सुख-दुख की साथी।" "और फिर बनारस और दुर्गा माँ को छोड़कर कहाँ जाएँगे हम अब? लोग तो जाने कहाँ-कहाँ से मरने के लिए काशी आते हैं और हम कहीं और जाएँ, नहीं, ऐसा नहीं होगा।" बाबा बीच में ही माँ की बात काटकर बोल पड़े थे।
इसके पहले कि वह कुछ जवाब दे पाए, शब्दों के दुख से उबर पाए, गौरी चौके से तीर की तरह आई और बाबा को आराम कुरसी पर बिठाकर चाय का प्याला पकड़ा गई थी। बड़ों को चुप और शांत करने का इतना अच्छा तरीका तो पहले कभी नहीं देखा था उन्होंने। कितनी समझदार हो गई है यह गौरी- प्रणव ने ध्यान से गौरी को देखा। कुछ भी तो नहीं बदला था, वही कद काठी, वही विश्वसनीय आँखें और वही पुरानी आश्वासन देती मुस्कान। बस इक्की-दुक्की बालों में गुथी चाँदी की लकीरें ही गुज़रे वक्त की साक्षी थीं। उनके खाने पीने का, कमरा ठीक करने का, सब इंतज़ाम गौरी ने ही तो किया था। प्रणव को लगा कि उनसे भी ज़्यादा माँ और बाबा की सगी हो चुकी थी गौरी। और तब पहली बार प्रणव अपने मन के बीहड़ में जा छुपे थे, हर दुख-दर्द, एक-एक पछतावे और आँसू की गठरी साथ लेकर। सभी ने तो गौरी को पा लिया था सिवाय उनके। उद्वेलित मन फूट-फूट कर रोना चाहता था, शिकायत करना चाहता था अम्मा बाबा से, खुद गौरी से भी, परंतु पचास वर्षीय प्रणव बैनर्जी ने खुद को, एक बार फिर से सँभाल ही लिया।
उस शाम मंदिर में अष्टमी की पूजा थी। पंडाल फूलों से सजा हुआ था। गेंदा, गुलाब और चमेली की मालाओं ने माँ के भव्य गोल गुंबद को पूरी तरह से ढक दिया था। अशोक की पत्तियों में गुंथे गुलाब और बेले के फूल वातावरण को भीनी-भीनी और अनूठी गंध दे रहे थे। धूप-दीप और अगरबत्ती के साथ दिए में जलती वह घी और सामग्री की महक दूर गली तक जा फैली थी। माँ का अभूतपूर्व शृंगार हुआ था आज। कल विदा जो थी। गुलाबी गोटे की साड़ी, हरा किमख़ाब का ब्लाउज़। माथे पर झूमर और माथा पट्टी। नाक में नथ, होठों पर लाली और बड़ी-बड़ी मुस्कुराती आँखों में वह मनोहारी काजल की लकीर। पैरों में पायल व आलता और मेहंदी लगे हाथों में कलाई भर-भरकर चूड़ियाँ। प्रणव की आँखें टिक नहीं पा रही थीं, न माँ पर और ना ही गौरी पर। गौरी भी तो आज पूरे ही शृंगार में थी। उसने भी तो गुलाबी गोटे वाली साड़ी ही पहनी थी। नथ, माँग टीका, सब लगाए थे। याद नहीं रहा उन्हें कि परसों ही, सप्तमी की पूजा पर सिंदूर दान के बाद माँ ने ही यह गुलाबी साड़ी गौरी और नंदिता, दोनों को दी थीं। और दिए थे टीका, चूड़ी, बिंदी, पायल, आलता सभी कुछ। बरसों के बाद उस दिन प्रणव के तबले पर अपने सितार के साथ जुगलबंदी की थी गौरी ने। भैरवी, जैजैवंती से लेकर दीप और हिंडोल राग तक, डूब गए थे वे दोनों एक दूसरे में, सब कुछ भूल और भुलाकर। मानो अपने-अपने शरीरों से निकलकर दो आत्माएँ एक दूसरे के मन में राधाकृष्ण-सी जा बैठी थीं। दूर बैठकर भी दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी।
अचानक प्रणव बैनर्जी उठे और धनुचि हाथ में लेकर माँ के आगे नाचना शुरू कर दिया। बरसों बाद आज बहुत खुश थे वह। ढाक, मृदंग और पखवाज़ की आवाज़ें तेज़ होती चली गईं और साथ में ही लय में झूमते उनके पैर भी। शरीर में आज किशोरों-सी फुर्ती थी। धुएँ के बादल सर के ऊपर, कंधों पर, मुँह के चारों तरफ़ सफ़ेद रंग के कई-कई चक्र पर चक्र बना रहे थे। गोरे वक्ष पर काले बालों के बीच चंद सफ़ेद बाल पसीने की बूँदों में भीगे सोने से चमक रहे थे और सावन में झूमते मयूर से प्रणव अपनी दोनों बाहों को ऊपर उठाए, सधे नर्तक और साधक की तरह घूम-घूमकर कलैयाँ लिए जा रहे थे। पसीने की बूँदें अब धार बनी झरते पंखों-सी झर रही थीं और हाँफती साँसों की उनकी जयजयकार माइक से होकर पूरे ही पंडाल में गूँज रही थी। होश नहीं था उन्हें आज कुछ भी। नियोन की लाल पीली नीली हरी सतरंगी आभा फेंक रहे बल्ब, लटकी माला से गोरे चिट्टे तन को एक नयी आभा और रूप दे रहें थे और गौरी की आँखें अलौकिक रूप की एक-एक छवि मन में उतारें जा रही थी। एकटक देखती गौरी की आँखों में आज कोई शरम या लोकलाज नहीं थी। हाथ में झाँझ लिए गाती गौरी पूरी मीरा ही तो दिख रही थी उस वक्त। माई मैंने गोविंद लीन्हो मोल, कोई कहे सस्तो कोई कहे महँगो, लीन्हो तराजू तोल -- उनकी भटकती आत्माओं से ही, दोनों की आँख से बहते आँसू ज़मीन पर कहीं मिलकर अब एक हो चुके थे। बंद पलकों के अंदर पलता वह सपना आज किलक-किलक कर कुलाचें ले रहा था। माँ जब भी आती हैं, नयी शुरुआत लेकर आती है और जाती हैं तो भक्तों की झोली में सबकुछ डाल जाती हैं और उन दोनों ने तो, भिखारियों-सी मन की रिक्त झोली माँ के चरणों के नीचे बिछा दी थी।
पूजा के उस शोर-शराबे में किसी ने नहीं देखा या जाना उनके उस हठ और पागलपन को, सिवाय नंदिता के जो अब घर वापस लौटने के लिए बेचैन थीं। घर आकर माँ ने बेटे की एक शिशु की तरह नज़र उतारी और पत्नी ने रातभर पैर दबाए, फिर भी ताप के सन्निपात में रातभर जाने क्या-क्या बड़बड़ाते रहे थे प्रणव बैनर्जी। माँ और नंदिता को दुर्ग महा काली माँ गौरी जैसे शब्दों के अलावा कुछ भी तो समझ में नहीं आ पाया था - या फिर शायद वे समझना ही नहीं चाहती थीं-- तरकस से निकले तीर की तरह वक्त को वापस भी तो नहीं लाया जा सकता? निश्चय ही माँ आ गई हैं सर पर, ऐसा कहकर माँ ने मंदिर से औघड़ और ओझा तक को बुलवा लिया था बेटे की झाड़-फूँक के लिए।
सुबह माँ की विदाई का समय था। बेटी की विदाई की तरह ही हर आँख भीगी हुई थी और पंडाल में भोर से ही एक व्यस्त चहलकदमी थी। कहीं प्रसाद बन रहा था तो कहीं रथ सज रहा था। सवारी उठाने वाले लड़के माथे पर चंदन और तिलक लगाए प्रतिबद्ध प्रतीक्षा कर रहे थे और सध्य-स्नाता सुहागिनें के लंबे काले बालों से टपकी गंगाजल की बूँदें वातावरण में आचमन और संकल्प-सा-- पूजा का एक पावन माहौल बना रही थीं। पुष्पांजलि के उस सौम्य पल में, सुबह-सुबह ही सभी श्रद्धालु पंक्तिबद्ध हाथ जोड़े खड़े थे।
कुंड के किनारे से, अस्सी और वरुणा से, राजा दरवज्जे के कोठे से, हाथी की सूँड से, सूअर के दाँत से और जाने कहाँ-कहाँ की मिट्टी से बनी और जुड़ी वह माँ की प्रतिमा सजीव थी आज। आँखें चंचल थीं और कुछ कहना चाह रही थीं। पुजारी पारी-पारी से हथेलियों पर पुष्प रख रहा था और श्रद्धालु माँ के चरणों पर अर्पण कर, अगले के लिए जगह छोड़, आगे बढ़ते जा रहे थे। माँ, नंदिता, गौरी, तन्मय, वैदेही सभी ने विधिवत श्रद्धांजलि दी थी पर प्रणव की पारी आते ही गदगद वह माँ के पैरों में लेट गए। आँखें उठीं तो सामने माँ की प्रतिमा में गौरी थी-- वहीं आँखें, वहीं मुस्कुराहट, सँभल पाना मुश्किल ही था अब। और तब बहते आँसुओं से ही पैर पखारने लगे वह माँ के। "या तो मुक्ति दो मुझे इस प्रीत और राग से या फिर स्वयं में लीन करो। और नहीं सहा जाता यह बिछोह मुझसे।" हिचकियों में डूबी आवाज़ फसफसी और अस्पष्ट थी। फूलों को चरणों में छोड़, अष्ट भुजाओं की तरफ़ बाहें फैला दी थीं अब प्रणव बैनर्जी ने। गौरी और नंदिता दोनों ही उनकी तरफ़ लपकीं और इसके पहले कि वह पागलपन एक तमाशे में बदले, वहाँ से उठाकर घर ले आई थीं उन्हें। "आज तुम्हारी तबियत ठीक नहीं। रात भर के सोए नहीं हो। अब कहीं नहीं जाना, बस आराम करो।" ज्योतिर्मयी की आवाज़ सख्त़ और बेटे के लिए चिंतित थी। परंतु प्रणव को कौन रोक सकता था अब-- आज गौरी में माँ, और माँ में गौरी नज़र आई थीं उन्हें। पर न माँ को बाहों में ले सकते थे वे और न ही गौरी के चरणों में बैठकर पूजा कर सकते थे। माँ का विसर्जन हो चुका था और गौरी कबकी अपने घर जा चुकी थी।
एक बार फिर अपनी ही सोच की भँवरों में डूब चुके थे वे। अपने ही विकारों में घूमते-घूमते दम घुट रहा था उनका। पर कीचड़ से उगे कमल के फूल-सा मन हमेशा से ही इस देह के अंदर रहकर भी, देह से परे ही तो रहता है। इसे कौन सा बंधन, किस दूरी ने रोका है कभी? और मन के इसी गुण ने उबार लिया उन्हें तब। संसार में रहकर भी लिप्त नहीं हो पाना कभी, कैसे सीखा गौरी तुमने? आँख के आँसुओं को पोंछता उनका मन गौरी के बगल में जा बैठा था। उससे बस एक यही सवाल पूछे जा रहा था।
अनजान गुत्थियों को सुलझाता, धरती आकाश के बीच कहीं अपनी ही दुनिया में भटकता उनका मन, बस यही एक ऐसी गुत्थी थी जिसे नहीं सुलझा पा रहा था पर कभी टूटे नहीं थे वह। उनका हठी मन अक्सर ही उन्हें एक ऐसी दुनिया में ले जाता था, जो कि दूसरों के बनाए नियमों पर नहीं, स्व-निर्धारित मूल्यों और संकल्पों की धुरी पर ही घूमना जानती थी। एक ऐसी दुनिया जो कि रात-दिन को अँधेरे और उजेरे की धूनी पर बिठाकर एक अनूठी ज्योति जला देती थी उनके अंतस के तमस में। मन में बसे इस संसार में जहाँ कई अपने थे, हमेशा साथ रहते थे कई ऐसे अनाम और अनजान चेहरे भी थे जिन्हें देखने और पहचानने को उनका व्यग्र मन ललकता ही रह जाता था, पर वे अधगढ़ी मूर्तियाँ कभी भी स्पष्ट और साकार रूप लेकर सामने न आतीं, बस मरु में चमकते कनों-सी छलती और भरमाती ही रह जाती। यह दुर्गा माँ भी उस अनंत का ऐसा ही एक रूप है क्या? छी, छी क्या सोच रहे हैं वह-- प्रणव बैनर्जी ने अपनी राक्षसी सोच को धिक्कारा और संयम की लगाम से रोक लिया।
इसका यह अर्थ नहीं कि जीवन संयमहीन, अराजक और अतृप्त था उनका। बेहद धैर्यवान सुलझे और सधे स्वभाव के थे प्रणव बैनर्जी। जो मिल गया, या जिसे अपना कह दिया, उससे ही खुश रहना भलीभाँति आता था उन्हें भी। नियतिवादी नहीं थे वे, पर सब्र करना बचपन से ही सीख लिया था उन्होंने। बस थोड़ी-सी ज़िद और एक हठी आग्रह था उनकी सोच में-- मन के बहुत ही पक्के थे पर वह, संयम की लगाम से कसकर रखते थे खुद को। चीज़ों को त्याग तो सकते थे पर खुद को बस काट कर अलग नहीं कर पाते थे प्रणव बैनर्जी। मन में कुछ ठान लिया और सही लगा तो चल पड़ते थे उसी राह पर, फिर चाहे पथ में कितने भी आँधी-तूफ़ान आएँ, परवाह नहीं थी उन्हें इसकी। असल में एक विरोधाभास का नाम था प्रणव भास्कर बैनर्जी- एक उलझी हुई गुत्थी थे, बेहद समझदार दिखते प्रणव भास्कर बैनर्जी।
स्थिति जब असह्य हो चली तो महाकाल की उस अर्धरात्रि में ही बिस्तर से उठकर बाहर आ गए वे। कदम स्वत: ही गौरी के घर तक ले गए थे उन्हें पर एक भी आवाज़ नहीं दी थी उन्होंने, इतना होश और संयम था अभी उनके पास। घंटों दरवाज़े को फूलों से सजाने के बाद प्रणव बैनर्जी एकबार फिर उठे और घर से दस कदम दूरी पर बसे अस्सी घाट की कीचड़ लगी सीढ़ियाँ उतरने लगे। गंगा की मटमैली लहरों में डूबे, आज शरीर ही नहीं आत्मा तक को धो देना चाहते थे वे। रात के उस अँधेरे में जब हाथ को हाथ नहीं सूझता, किनारे पर बँधी रस्सी की वह कसी गाँठ तक खोल डाली थी उन्होंने और नाव खुद ही खेते-खेते मझधार तक चले गए थे-- वहीं, जहाँ सुबह-सुबह माँ का विसर्जन किया गया था। परेशान आँखें माँ को ढूँढ़ रही थीं और होठ गौरी को आवाज़ दे रहे थे। ऐसी ही आँसुओं में डूबी पूरी वह रात, नाव खेते-खेते और माँ को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते ही निकाल दी थी उन्होंने। किनारों पर जलती लाशों की उस धुँधली रौशनी में कहीं तो गंगा की लहरों पर तैरते बुदबुदे थे तो कहीं फूल, पत्ती और बेलपत्र- बस और कुछ नहीं।
कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढ़ा उन्होंने? कहीं अधजला मुर्दा दिख रहा था तो कहीं तैरता मरा कुत्ता। फूल पत्ती कौवा बिल्ली सब दिख रहे थे पथराई आँखों को सिवाय देवी माँ के। गंगा की लहरों के बीच विलुप्त हो चुकी थीं वे। अधीर प्रणव के बहते आँसू भी वापस नहीं ला पा रहे थे माँ को अब।
सूरज की पहली किरन के साथ ही अचानक उनके मन की व्यग्रता ने ढूँढ़ ही निकाला था उन्हें। गंगा के दूसरे किनारे पर कमर तक कीचड़ में फँसी माँ की वह मूर्ति मानो आठों बाहें फैलाए बस उन्हीं का इंतज़ार कर रही थीं। किरन का प्रकाश सीधा मुकुट और चेहरे पर था और देवी के रूप की उस आभा से पूरा का पूरा गंगा का पाट जगमग कर रहा था। प्रणव ने दौड़कर मूर्ति को बाहों में भर लिया। पागलों की तरह दुलारने लगे उसे। गोदी में सर रखकर बच्चों की तरह एकबार फिर फूट-फूट कर रोने लगे वे, "वादा करो अब मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाओगी गौरी।" पता नहीं थके मन का भ्रम था या फिर सन्निपात का असर, माँ की वह मूर्ति हिली और एक आँसू मूर्ति की बायीं आँख से गिरकर उनकी सूनी हथेली पर फैल गया। मूर्ति अब हाथों से फिसलकर दूर मझधार की तरफ़ बही जा रही थी। गंगा की जिस लहर ने मूर्ति को वहाँ उनके लिए रोककर रखा था, अब वही उन्हें उनसे दूर बहा ले जा रही थी। पहले गर्दन फिर हाथ-- एक-एक करके सब डूब रहे थे- धीरे-धीरे हिलते डुलते, मानो अगले साल फिर आने का वादा कर रही थीं माँ।
सच और झूठ का जन्म एक ही दिन, एक ही समय में हुआ था। जन्म लेने के साथ ही झूठ के पांव नहीं थे। दोनों हाथ तो थे किंतु छोटे-छोटे। रंग-रूप से झूठ एकदम काल-कलूटा था। इसके विपरीत-सच एकदम सुंदर गोरा, पूर्णतः स्वस्थ एवं चुस्त था।
समय गुजरता गया, झूठ और सच बड़े होते गए...। लोग सब की तारीफ करते और झूठ का मखौल उड़ाते।
लोगों के इस व्यवहार से झूठ के मन में हीन भावना घर करने लगी। वह दुखी और कमजोर होने लगा। सच से अपने भाई का यह दुख देखा न गया। उसने उसको समझाया,“ भाई! रंग-रूप से कुछ नहीं होता। व्यवहार और सिद्धांत अच्छे होने चाहिएं। और उसमें एकरूपता होनी चाहिए, और होनी चाहिए सच्ची दृढ़ता। “
झूठ फिर भी दुखी था। खिर सच ने सदाशय का परिचय देते हुए झूठ से कहा, “देख भाई! मुझे तो ईश्वर ने ऐसी शक्ति दी है जो कभी हारती नहीं। मैं चाहूं तो तुझे पूरा शरीर दे दूं। “
और झूठ ने सच को पूरा शरीर दे दिया। सच ने झूठ से वादा लिया कि वह जब चाहेगा उससे अपना शरीर और आत्मा दोनों ही वापस ले लेगा।
इस बात को एक अरसा गुजर चुका है। किंतु झूट ने सच की आत्मा तो वापस दी, किंतु शरीर वापस नहीं किया। सच काशरीर लेकर झूठ...सफेद बन गया है। लोग अब झूठ की तारीफ के पुल बांधने लगे और सच का मखौल उड़ाने लगे हैं।
डॉ. भारती खुवालकर
धर्मांतरण का राज
उसने उस भूखे व्यक्ति को भरपेट भोजन कराया, और उसके बाद सामान्य औपचारिकता के नाते यूँ ही पूछ लिया- भाई तुम्हारा नाम क्या है? तुम किस ईश्वर को मानते हो? तुम्हारा धर्म क्या है? इस पर उस व्यक्ति का जवाब था-आज से तुम मुझे जो नाम दोगे वही मेरा नाम होगा। मेरे ईश्वर तुम हो...सिर्फ तुम, और तुम्हारा धर्म ही मेरा धर्म है।
प्रागैतिहासिक मानव द्वारा अग्नि की खोज मानव जाति की सभ्यता में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। अग्नि या प्रकाश ने मनुष्य का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। लगभग सभी सभ्यताओं में प्रकृति को प्रकाश, जल, वायु, धरती और ध्वनि के रूप में सदैव से पूजा जाता रहा है। अँधियारे में दीप या मोमबत्ती जलाने से मनुष्य को अँधियारे के भय को दूर करने और जानवरों से अपनी सुरक्षा करने में सहायता मिली।
हिन्दुओं में घरों या मंदिरों में दीप प्रज्वलित करके भगवान की उपासना चिरकाल से चली आ रही है। सूर्य और अग्नि के प्रतीक के रूप में दीप सदैव मंगलकारी माना गया है। दीप को पावनता प्रदान किये जाने के कारण शिल्पकार को इसे अधिक सुंदर, कार्यशील और सुरुचिपूर्ण बनाने की प्रेरणा मिली।
आरंभ में दीप का मुख्य भाग पत्थर या सीप का बनाया जाता था। उसके बाद पकी मिट्टी (टेराकोटा) और धातु के दीप बनने लगे। भारत के प्रमुख ग्रन्थों में स्वर्ण और बहुमूल्य पत्थरों से बने दीपों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
आरंभ में दीप का मुख्य भाग पात्र के आकार का था जिसके एक तरफ बत्ती के लिए चोंच बनी होती थी। बाद में इसे अधिक गरिमामय आधार प्रदान किया गया। अनेक घरों में विशेषकर दक्षिण भारत में एक साधारण सा 'कुथुविलक्कू ' या एक छोटा पीतल का दीप होता है जिसे प्रतिदिन प्रज्वलित किया जाता है। यह साधारण आम-सा दिया भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न रूप में दिखाई देता है, साधारण मिट्टी का, जो प्रकाश के त्योहार 'दिवाली' में प्रत्येक घर में जलाया जाता है से लेकर केरल और तामिलनाडु के मन्दिरों के विशालकाय आनुष्ठानिक दीप और कुछ ऐसे दीपों के रूप में जो केवल संग्रहालयों में ही दिखाई देते हैं।
पारम्परिक भारतीय दीप को मुलतः चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है। आरती दीप, खड़े किये जाने वाले दीप, श्रंखला दीप और मुगल दीप। आरती दीप को सामान्यतः प्रार्थना के समय हाथ में पकड़ा जाता है जिसके कारण इस दीप का हैंडल नाग या मझली के रूप में सुरुचिपूर्ण ढंग से घुमाव लिये हुए होता है। खड़े किये जाने वाले दीप कई प्रकार के होते हैं और आम तौर पर धातु से बनाये जाते हैं और मन्दिरों में प्रयुक्त होते हैं। एक वृक्ष दीप प्रकार भी होती है जिसमें कई शाखाएँ होती हैं। इस श्रेणी में दीपलक्ष्मी संभवतः सबसे प्रचलित है। यह दीप नारी आकृति के समान होता है और इसका उद्गम भारत में रहने वाले रोमन लोगों के बनाये दीपों से हुआ माना जाता है। तामिलनाडु के धातु शिल्पकारों ने समय एवं कलानुरूप इसे नैन-नक्श, आकार, परिधान व आबूषणों से सज्जित कर विभिन्न रूप प्रदान किये।
लटकने वाले दीपों का प्रयोग भी मुख्यतः मंदिरों में होता है। इसमें अनेक पंक्तियां होती हैं। ये मंदिर के सभा-कक्ष या गर्भ-गृह की छत से लटके होते हैं और इनके प्रकाश से प्रतिमा की आभा और सौंदर्य में चार चांद लग जाते हैं। इस दीप का एक प्रमुख प्रकार 'थुंगा विलक्कू' या अखंड दीप होता है। इस दीप का उल्लेख चोल शिलालेखों में भी होता है। इसे निद्राहीन दीप भी कहते हैं क्योंकि यह सारी रात प्रज्वलित रहता है और वह भी इसमें बिना तेल डाले या बत्ती बदले हुए। इस दीप की रचना भी बहुत महत्वपूर्ण है। इसका तैल एक गोल पात्र में रखा होता है जिसमें से बत्ती एक बारी में एक बूंद ही सोखती है। इस दीप में तैल निकासी छिद्र, बत्ती की मोटाई और वायु प्रवेशिका के आकार में पूर्ण सामन्जस्य होना आवश्यक है।
मुगल दीप दो प्रकार के होते हैं, लटकने वाले गोलाकार दीप और मंजूषा के आकार के दीप। मुगल शाषकों के हरमों में ग्रीष्माकाल के दौरान सुगंधित जल से भरे छोटे कुंड होते थे। उनके जल की सतह छोटे-छोटे दीपों से सज्जित होती थी और उन दीपों पर रेशमी आवरण होता था। युवतियां बाजुबंदों से क्रीडा करती थी जिन्हे किसी गेंद के समान इधर-उधर फेंका जाता था। दीपों का आकार कुछ इस तरह का होता था कि तैल कभी छलकता नहीं था।
इन दीपों को गढ़ने के प्रमुख केन्द्र भारत के केरल और तामिल नाडु राज्य में स्थित हैं।
प्रायः पर्वोत्सव-अवतार, महापुरुष विशेष जन-हितैषी घटना, कृषि आदि को केन्द्र में रखकर मनाए जाते हैं। दक्षिण भारतवर्ष में भी इन्ही किन्ही कारणों से उत्प्रेषित हो मनाते हैं तथा अपनी उमंग को नृत्य-गायन-वाद्य और श्रद्धा भाव से व्यक्ति सम्प्रेषित करते हैं। दक्षिण भारत के चार राज्यों-आंध्रप्रदेश, तामिलनाडु, कर्नाटक और केरल में अनेक पर्वों का महत्व है, जिनमें अपनी स्थानीय विशेषताएँ हैं-
1. केरल-समुद्र तट पर अवस्थित प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न राज्य है। यहां के जीवन पर लोक संस्कारों का प्रभाव है। नारियल के हरे-भरे विशाल वृक्ष, प्राकृतिक हरियाली जन-मन का स्वागत करती है तथा उनके तन-मन को हरा। यहां का वातावरण लोगों को आकर्षित करता है।
क. ओणम्- केरल का ‘ओणम’ त्योहार अत्यंत प्रसिद्ध है। यह एक प्रकार का जलोत्सव है। इस पर्व पर नौका प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। नौका प्रतियोगिता को ’ वल्लम -कलि ’ भी कहा जाता है। वल्लम यानि नाव और कलि यानि खेल अर्थात नौकाओं का खेल। इस दिन लोग षडरस भोजन करते हैं और नवीन वस्त्र धारण कर नौकाओं का खेल देखने जाते हैं। ’ ओणम ’ के संबंध में अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। लोगों का विश्वास है कि महाबली प्रतिवर्ष श्रावण मास के श्रवणा (ओणम) नक्षत्र के दिन केरल आकर अपनी प्रजा को देखता है। इसलिए केरल के निवासी अपने राजा के स्वागत में यह त्योहार मनाते हैं। अनेक वैष्णव कवियों ने इस पर्व का वर्णन ग्रन्थों में किया है।
ख. विषु- केरल का दूसरा प्रसिद्ध पर्व ’विषु ’ है। लोकमान्यता है कि विषु के दिन सबसे पहिले, जिस वस्तु पर दृष्टि पड़ती है उसका एक वर्ष तक प्रभाव रहता है। अच्छी वस्तु दिखने पर मंगल होता है। इसलिए पिछली रात को सुन्दर वस्तुएँ केरलवासी सजाकर घर में रखते हैं।
ग. तिरुवातिरा- यह महिलाओं का पर्व है। पौष मास के आद्रा नक्षत्र के दिन यह पर्व मनाया जाता है। लोक विश्वास है कि तपस्यारत पार्वती को इसी दिन भगवान शिव के दर्शन हुए थे। इस पर्व को स्त्रियाँ सौभाग्य के लिए और कन्याएँ वर प्राप्ति के लिए करती हैं। यह व्रत सात दिनों तक चलता है और अंतिम दिन पार्वति की सविधि पूजा अर्चना कर यह व्रत समाप्त होता है। इस पर्व में ब्रह्म-महूर्त चार बजे सुबह नारियाँ तालाब या नदी के जल में खड़ी रहती हैं। वे गीत के द्वारा मन्मथ की स्तुति करती हैं तथा हाथों से पानी पर ताल देती हैं। सूर्योदय तक यह क्रम चलता है। रात्रि बेला में वृत्ताकार व्यूह बनाकर लास्य शैली में नारियाँ गाती हैं।
2. कर्नाटक- कर्नाटक पहले मैसूर राज्य था। यहाँ का दशहरे का त्योहार सबसे महत्वपूर्ण है, लोकप्रिय भी। अश्विनी शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। इसे विजयदशमी भी कहते हैं। इस दिन राम ने रावण का वध करके विजय श्री प्राप्त की थी। इसी के उपलक्ष्य में यह त्योहार मनाया जाता है।
विजय दशमी के दिन महाराज मैसूर का जुलूस बड़े ही ठाट-बाट और शान शौकत से निकलता था; जिसमें सामन्त सेना के सिपाही शोभा-यात्रा में निकलते थे। इस शोभा यात्रा के केन्द्र होते थे महाराज, जिनकी सवारी सुसज्जित हाथी पर निकलती थी। यह अपने राज्य की सीमा को पारकर शमी वृक्ष की पूजा करते थे और उसके बाद राज्यप्रासाद में वापस आते थे।
कर्नाटक में नवरात्र में गुड़ियों का त्योहार मनाया जाता है। यह स्त्रियों का त्योहार है। नवरात्र में गुड़ियों का दरबार लगता है। गुड़ियों को सजाकर अनेक देवताओं की पूजा भी की जाती है। इस पर्व का संबंध अर्जुन और उत्तरा के संबंध से है।
3. आंध्रप्रदेश-
क. उगादि पर्व- आंध्रप्रदेश में ’ उगादि ’ पर्व मनाया जाता है। यह ’ युगादि ’ का अपभ्रंश है। इसे ’ संवत्सदी ’ भी कहते हैं जिसका अर्थ है- ’ वर्ष का पहला दिन ’। यह पर्वोत्सव चैत्र शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। यह दिन आंध्रप्रदेश में वसंत के आगमन का सूचक है।
ख. एरुवाक पुन्नम- ’एरुवाक पुन्नम्’ कृषि समाज का पर्व है, जिसे ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा दिन मनाया जाता है। ’पुन्नम ’ का अर्थ पूर्णिमा है। यह वर्षाऋतु के आरम्भ में होता है।पहली बार इसी दिन खेतों में हल चलाया जाता है। इस पर्व पर किसान अपने बैल सजाते हैं। उनकी विधि-विधान से पूजा करते हैं। कृषि कर्म निर्विघ्न लाभप्रद हो, इसी की भगवान से प्रार्थना करते हैं।
ग. संक्रान्ति- ’एरुवाक पुन्नम’ कृषि कर्म के आरम्भ का अनुष्ठान है , तो संक्रान्ति इसकी सफलता का उत्सव है। यह पर्व मार्गशीर्ष और पौष के मध्य मनाया जाता है। इस पर्व का चलन उत्तर भारत में भी है संक्रांति के दिन दान करने का विधान है। बालिकाएँ गोबर लेकर उसमें गेंदे का फूल लगाती हैं। इसे ’गोब्बम्पा ’ कहते हैं। इसकी परिक्रमा कर बालिकाएँ तालियाँ पीटकर नाचती-गाती हैं। इसी समय नारियाँ ’ गुब्बी’ अर्थात गौरी व्रत करती हैं।
घ. विनायक चवती- किसानों और विद्यार्थियों में विशेष रूप से विनायक की पूजा का विधान है। उत्तर भारत में इसका रूप गणेश चतुर्थी का है। इस अवसर पर विनायक अर्थात गणेश की मूर्ति की पूजा-अर्चना की जाती है। दूसरे दिन इनका विसर्जन कर दिया जाता है।
ङ. श्रावण पूर्णिमा- उत्तर भारत के समान आँध्र में रक्षाबन्धन की परंपरा नहीं है। श्रावण पूर्णिमा के दिन वेद पाठ आरम्भ किया जाता है। इस दिन नया जनेऊ पहनते हैं। इसी मास की पंचमी को नागों की पूजा की जाती है। इस पूजा का विधान भारतीय परम्परा है।
4- तामिलनाडु- पोंगल- इस राज्य का प्रमुख पर्व पोंगल है। इसे ..यहाँ के निवसी उत्साह से मनाते हैं। ’ पोंगल ’ का शब्दार्थ है ’पकाया गया चावल ’ (भात) यह पकवान सूर्यदेव को अर्पित किया जाता है; इसलिए इसका नाम ’ पोंगल’ है। पोंगल-तीन-पत्तियों में रखकर सूर्यदेव को अर्पित करते हैं। इस शुभावसर पर पारिवारिकजन शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। इस शुभावसर पर पारिवारिकजन शुभकामनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। कार्डों से शुभ-संदेश भेजते हैं। आजकल सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन भी होते हैं। इस प्रकार यह त्योहार धार्मिकता के साथ सांस्कृतिक भी है।
भारतवर्ष की मूल दृष्टि आनन्दवादी है। इसी भावना से उत्प्रेरित होकर यहाँ के निवासी पर्वों का आयोजन परम्परागत ढंग से करते हैं। इन पर्वायोजन में आनंद, उमंग, उत्साह की लहरियों का संगम होता है; जिन्हें एक दूसरे हिल-मिलकर मनाते हैं।
नेपाल का हाल भी अजीब है| जरा दो मामलों पर गौर कीजिए-एक उपराष्ट्रपति की हिंदी शपथ का और दूसरा पशुपतिनाथ मंदिर के पुजारियों का ! यूं तो ये नेपाल के आंतरिक मामले मालूम पड़ते हैं और कहा जा रहा है कि इनका भारत से क्या लेना-देना ? लेकिन सच्चाई यह है कि ये दोनों मामले जुड़े हुए हैं और ये भारत पर नेपाल के भारत-विरोधी तत्वों का सीधा प्रहार हैं| यदि ये मामले भारत से जुड़े हुए नहीं भी होते| इनका चर्चा तक नहीं होता|
उप-राष्ट्रपति परमानंद झा ने अगर हिंदी में शपथ ले ली तो कौनसा देश-द्रोह कर दिया ? अगर वे अंग्रेजी में शपथ लेते तो क्या उसे भी देश-द्रोह कहा जाता ? नहीं कहा जाता, क्योंकि अंग्रेजी बि्रटेन की भाषा है, भारत की नहीं| हिंदी में शपथ लेना पाप है, क्योंकि वह भारत की भाषा है| नेपाल के पहाड़ी नागरिकों का यह विरोध हिंदी-विरोध नहीं है, यह भारत-विरोध है| यदि यह उनका हिंदी-विरोध होता तो वे हिंदी लिखते-बोलते-पढ़ते क्यों ? हिंदी सिनेमा और सीरियलों के पीछे वे पागल क्यों हुए रहते हैं ? लाखों की संख्या में वे हिंदी क्यों सीखते और भारत आकर नौकरियां क्यों करते ? झा की हिंदी-शपथ को विरोध करनेवाले नेपाली हिंदी को भारत के वर्चस्व का प्रतीक मानते हैं| वे मानते हैं कि नेपाल के मधेसी हिंदी के बहाने भारत को हमारे सिर पर थोप रहे हैं| यह ठीक है कि नेपाल के मधेसी लोग घर में भोजपुरी, मैथिली, अवधी आदि बोलते हैं लेकिन उनकी संपर्क और सामूहिक पहचान की भाषा हिंदी है| उनकी जनसंख्या नेपाल की आधी के बराबर है| इस बार संसद में भी उनका प्रतिनिधित्व जोरदार है| राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति भी मधेसी ही बने हैं| यदि वे संसद में हिंदी बोलें तो इसमें गलत क्या है? सदभावना पार्टी के संस्थापक स्व. गजेन्द्र नारायण सिंह जब नेपाली संसद में धोती-कुर्ता पहनकर जाते और हिंदी बोलते तो उन्हें निकाल बाहर किया जाता था| अब से लगभग 20 साल पहले स्पीकर दमनप्रसाद धुंगाना ने मेरे आग्रह पर गजेंद्र बाबू को स्ववेश पहनने और स्वभाषा बोलने की अनुमति दी थी लेकिन 20 वर्षों में नेपाल के उग्र राष्ट्रवादी तत्व इस लोकतांत्रिक प्रगति को पचा नहीं पाए और उन्होंने उप-राष्ट्रपति परमानंद झा के विरूद्घ कृत्सित अभियान छेड़ दिया है| उन्होंने झा के विरूद्घ उच्चतम न्यायालय में मुकदमे दायर किए है और उनके विरूद्घ काठमांडो में उत्तेजक प्रदर्शन किए है| उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी है लेकिन झा है कि डटे हुए है| उन्होंने उच्चतम न्यायालय के फैसले को मानने से मना कर दिया है| उन्होंने न तो दुबारा नेपाली में शपथ ली है और न ही उप-राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया है| वे छुट्रटी पर चले गए हैं| परमानंद झा नेपाल के लाखों मधेसियों के महानायक बन गए हैं| यों तो नेपाल के उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर रह चकु हैं लेकिन उनके इस संघर्ष ने उन्हें नेपाल के इतिहास पुरूषों की श्रेणी में बिठा दिया है| वे चाहते तो उच्चतम न्यायालय के आदेश को मान लेते और दुबारा नेपाली में शपथ ले लेते लेकिन उन्होंने कुर्सी के मुकाबले अपनी सामूहिक अस्मिता को अधिक महत्व दिया| उन्होंने कहा कि उन्होंने हिंदी में हू-बहू वही शपथ ली है, जो मूल नेपाली में है| वे शपथ का अनुवाद करते गए और बोलते गए| अंतरिम संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि शपथ केवल नेपाली भाषा में ही लेनी चाहिए| यदि संविधान भाषा, जात और मजहब के आधार पर भेदभाव के विरूद्घ है तो वह हिंदी में शपथ लेने के विरूद्घ कैसे हो सकता है ? परमानंद झा की देखादेखी माधव नेपाल मंत्रिमंडल के दो अन्य सदस्यों - लक्ष्मणलाल कर्ण और सरोजकुमार यादव ने भी हिंदी में शपथ ली है| कलावती दुसाध ने भोजपुरी में शपथ ली है| नेपाल का न्यायालय कहां-कहां हथेली अड़ाएगा ? संपूर्ण मधेस की जनता आज परमानंद झा के साथ है| क्या नेपाल के उग्र राष्ट्रवादी लोग नेपाल को दो हिस्सों में बांटना चाहते हैं ? क्या वे वहां श्रीलंका-जैसी स्थिति पैदा करना चाहते हैं ? नेपाल के उग्र राष्ट्रवादियों का यह तर्क बिल्कुल बोदा है कि हिंदी भारत की भाषा है, इसीलिए वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे| क्या उन्हें पता नहीं कि भारत के संविधान में नेपाली भाषा को भी अन्य भारतीय भाषाओं के बराबर ही मान्यता प्राप्त है ? क्या वे 'भारतीय' होने के कारण नेपाली भाषा को भी रद्रद कर देंगे ? यदि इस तर्क को आगे बढ़ाएंगे तो पाकिस्तान में उर्दू, बांग्लादेश में बांग्ला और श्रीलंका में तमिल का भी कोई संवैधानिक स्थान नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब भाषाएं भी भारत की संवैधानिक भाषाए हैं| दक्षिण एशिया की संरचना ही ऐसी है कि एक-दूसरे की भाषाओं, मजहबों, जातियों आदि का विस्तार एक-दूसरे की सीमाओं के भीतर तक है| इसी यथार्थ की स्वीकृति नेपाल के भावी संविधान में होनी है| नेपाली और हिंदी, दोनों राजभाषाएं बनकर रहेंगी| ऐसी स्थिति मे नेपाली न्यायालय और नेपाल राष्ट्रवादियों को यह नया सिरदर्द खड़ा करने की जरूरत क्या है ?
माओवादियों की स्थिति भी विचित्र् है| उन्होंने न्यायालय के निर्णय की आलोचना की है लेकिन उन्होंने उप-राष्ट्रपति को भी गलत कहा है| उनका कहना है कि उप-राष्ट्रपति भोजपुरी या मैथिली में शपथ लेते तो ठीक रहता याने उन्होंने हिंदी में शपथ क्यों ली ? न्यायालय की आलोचना उन्होंने इसीलिए की कि वे मधेसियों से बैर मोल नहीं लेना चाहते| वे जन-विरोधी दिखाई नहीं पड़ना चाहते| इसीलिए उन्होंने भोजपुरी-मैथिली का दाव भी मार दिया लेकिन उनका हिदी-विरोध, शुद्घ भारत-विरोध है| भारत विरोध का ही दूसरा पैंतरा है, पशुपतिनाथ मंदिर के पुजारियों का अपमान ! पुजारी हिंदू हैं, ब्राह्रमण हैं, शास्त्रनुयायी हैं, सुप्रशिक्षित हैं लेकिन उनका एकमात्र् दोष यही है कि वे भारतीय हैं| अगर वे भारत के नागरिक नहीं होते, इंडोनेशिया या पाकिस्तान या मोरिशस के होते तो माओवादियों को कोई आपत्ति नहीं होती| माओवादी सैकड़ों वर्षो से चली आ रही इस परंपरा को आखिर क्यों तोड़ना चाहते हैं ? वे मानते हैं कि जैसे हिंदी भारत के वर्चस्व का प्रतीक है वैसे ही भारतीय पुजारी भी भारतीय दादागिरी का प्रतीक हैं| भारत को चुनौती दिए बिना नेपाल का राष्ट्रवाद पंगु है ? नेपाल में राष्ट्रवाद और साम्यवाद का यह जहरीला घालमेल क्या किसी फाशीवाद से कम है ? माओवादी सरकार ने भारतीय पुजारियों को हटा दिया था| अब एमाले-सरकार का यह कर्तव्य है कि उसने कर्नाटक से जो पुजारी बुलवाए हैं, उनके सम्मान की रक्षा में वह कोई कसर न छोड़े| हिंदी का सवाल हो या भारतीय पुजारियों का सवाल, भारत सरकार को भी दो-टूक राय रखनी चाहिए| उसे नेपाल की सरकार और भारत-विरोधी ताकतों दोनों को बता देना चाहिए कि वे मर्यादा-भंग न करे, वरना उसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे| यह नहीं हो सकता कि नेपाल को भारत 2000 करोड़ की आर्थिक सहायता भी दे और वहां वह भारत-विरोधी अभियानों को भी बर्दाश्त करता रहे|
चीन और पाकिस्तान, भारत की इस नरमी का काफी बेजा फायदा उठा रहे हैं| नेपाल अरबो-खरबों के नकली नोटों का अड्रडा बनता जा रहा है और चीनी सरकार नेपाली फौज में भी घुसपैठ के रास्ते तलाश रही है| पड़ौसी देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है लेकिन नेपाल में आजकल जो हो रहा है, वह भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकता है| इसके अलावा दक्षिण एशिया के सबसे बड़े राष्ट्र होने के नाते यह देखना भी उसका कर्त्तव्य है कि पड़ौसी देशों में कहीं गृह-युद्घ की खिचड़ी तो नहीं पक रही है| नेपाल की रक्षा और भारत की रक्षा अलग-अलग नही है| भारत पर प्रहार करके नेपाल स्वयं को सुरक्षित कैसे रख सकता है ?
कान्तिमयी, क्रान्तिमयी, जीवन की ज्योतिर्मयी, स्वर्णमयी लंका के सम्राट, महापण्डित, दसकन्धर रावण की...जै।...रावण की, जै...। अचानक जयकारें गूँजे और फिर बादलों की गड़गड़ाहट-सी हँसी गूँजी और फिर एक पॉप संगीत से भी ज्यादा भयानक स्वर उभरा। कोई कह रहा था,’हम लंकेश हैं। हा...हा...हा...हम लंकेश हैं। ’ आंखें खुलीं तो देखा वाकई दस सीस और बीस भुजाधारी रावण सामने घड़ा था। जैसे परेड मैदान का रावण (पुतला) भाग कर मेरे पास आ गया हो।
’ प्रातः स्मरणीय, प्रतिभा के प्रदीप्त सूर्य, पाण्डित्य के अपार पारावार, कविता कर्ममनि से कमल कान्त, गौरव के गुरत्व दिव्य, यौग के युगावतार ब्राह्मण जयी रावण को प्रणाम।’ मुझे नहीं मालूम कि भयवश अथवा इसलिए कि मैं एक दिन पूर्व रामलीला देखकर आया था, मैने उसकी मक्खनपुर्सी की। वह ठहाका लगाकर हंसा और सामने के सोफे को अपना पुष्पक विमान जानकर बैठते हुए बोला, ’ वाह! तू भी मक्खनियाँ भाषा बोलने लगा रे ! तेरे भीतर किसी चमचे की आत्मा उतर आई है क्या ? ’
मैं रावण के बदले-बदले तेवरों को देखकर हैरान था। उसने मेरी हैरानी भांप ली थी जैसे। बोला, ’ डोन्ट वरी ! मैं तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ूंगा।...क्योंकि तेरे पास अब बिगड़ने के लिए बचा ही क्या है ? ’ मैने उसे आश्चर्य से देखा तो वह मुँह नम्बर तीन से मुस्कराया फिर उसी से बोला, ’ चिंता मत करो प्यारे ! आज अचानक मेरे मन में आया कि इस बार दशहरे पर जाते-जाते एक झन्नाटेदार इंटरव्यू प्रकाशित करवाता जाऊँ।...इन दिनों जब मायावती, कासीराम, मुलायम सिंह, चन्द्रास्वामी जैसे छोटे-छोटे प्राणी इंटरव्यू दे रहे हैं तो मैं कोई इनसे कम तिकड़मबाज तो हूँ नहीं जो इंटरव्यू न दे सकूँ। सो फटाफट हो जाए क्वैश्चन और आन्सर और मैं ( कलाई नम्बर 8 पर बंधी घड़ी देखते हुए ) भागूं। अभी आठ बजे हैं । दस बजे राम जी मारेंगे मुझे।...समय से नहीं पहुँचा तो बेचारे का मेहनताना काट लिया जाएगा। ’
अब मेरा भय निकल गया था ! मेरे सामने रावण नहीं, ’ एक्सक्लूसिव ’ खड़ा था मैने लपक के उसके पाँव छू लिए। वह बुदबुदाया , ’ अबे बुद्धू, मेरे पाँव मत छू। कांसी ने देख लिया तो तुझे शम्बूक का चाचा मानकर पार्टी में शामिल कर लेगा। धरी रह जाएगी तेरी ’नागरिकगिरी’ ? ’
मैने बिना समय गँवाए इंटरव्यू शुरू कर दिया।
फ्रश्न- अच्छा रावण जी ! पहले तो आप यह बताइये कि आपको हर वर्ष जलाया जाता है तो आप हर वर्ष जिन्दा कैसे हो जाते हैं?
उत्तर- (मुंह नं.1 से हँसा और नं. दस से रोने लगा) गुड क्वेश्चन। यह एक रहस्यमय बात है जो कोई नहीं जानता है। तुमने पूछा है तो बता रहा हूँ।
सच तो यह है कि जब भी कोई नई सरकार आती है तो गरीबी खत्म करने का वादा जरूर करती है, पर कोई गरीबी खत्म करता है क्या ? नहीं करता है। क्योंकि यदि गरीबी खत्म हो गई तो वे वोट किसके नाम पर मांगेंगे। बस इसी तरह मुझे भी मारने का नाटक किया जाता है।...वे जानते हैं कि रावण मार दिया गया तो फिर अगले साल रामलीला कैसे होगी ? रामलीला नहीं होगी तो कितने राम, लक्ष्मण, दशरथ के घर उजड़ जायेंगे ? यही तो अफसोस है कि मैं कभी मरता ही नहीं?
प्रश्न- अच्छा आपको वाकई मरना हो तो कैसे मारा जाये ?
उत्तर- ( दसों मुँह हँसते हुए) बहुत खूब ! मुझसे ही मेरी मौत का सामान पूछ रहे हो । पर मैं कोई नेता तो हूँ नहीं जो साफ-साफ न बोल कर लफ्फाजी करूँ...। सुनो प्यारे ।...अब मुझे मारना इतना आसान नहीं कि विभीषण रहस्य बता दे और मैं ’हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आए कभी तो मत रोना’ गाते-गाते विदा ले लूँ।...अब मेरे प्राणतत्व सिर्फ मेरी नाभि में नहीं हैं बच्चू। सगे भाई की धोखाधड़ी ने सिखा दिया है सब कुछ। इसलिए थोड़ा-थोड़ा अंश बाँट दिया है कई लोगों को। अब मारो...कैसे मारोगे ?
प्रश्न- किस-किस को सौंपे हैं प्राण तत्व ?
उत्तर- अधिकांश खद्दरधारी नेताओं, वर्दीधारी पुलिस जनों, सूदखोर सेठों, कमीशनखोर ठेकेदारों, ट्यूशनखोर शिक्षकों, घूसखोर अफसरों, कुछ तथाकथित स्वामियों, कट्टरपंथी धर्मगुरुओं, कलमबेच पत्रकारों व सत्तामुखी लेखकों जैसे तमाम लोगों के बीच रहता हूँ मैं। पहली बात तो आप मुझे पहचान नहीं पायेंगे और यदि पहचान गये तो मार नहीं पायेंगे। क्योंकि अब मुझे मारने के लिए इस देश में कोई भी ऐसा नहीं रहा जिसके साथ पूरा देश हो।
प्रश्न- क्यों...s श्री राम हैं जी तो हमारे देश में ?
उत्तर ( फिर से हंसा है) तुम किस राम की बात कर रहे हो ?
उस टुइयां राम की जो सरकंडे का तीर लेकर मंच पर खड़ा होता है । या उस राम की जिसके सम्मान में मायावती, कांसीराम अपनी संपूर्ण सेना के साथ अपशब्द वाचन कर रहे हैं? या उस राम की जिसको नारा बनाकर कुछ लोग इन्द्रप्रस्थ की गद्दी पाने की तिकड़म में हैं। अथवा उस राम की जिसे आधुनिक अर्जुन ने पूरे ’सहमत ’ के साथ सीता का भाई बताया था। अथवा उस राम की जिनकी अभी तक जन्म-भूमि तक तय नहीं हो पाई है । भैये ! भूल जाओ कि ये राम मेरा कुछ बिगाड़ पायेंगे ।...सच तो यह है कि इन रामों का पूरे रामदल ने मेरी सेना में विलय कर लिया है।
प्रश्न- अच्छा रावण जी यह बताइये कि जो लोग राम को अन्यायी बता रहे हैं आप उनसे तो बहुत खुश होंगे?
उत्तर- नहीं बिल्कुल नहीं ! अहसान फरामोश और धोखेबाज हैं वे। मुझे उन पर कतई विश्वास नहीं। क्योंकि जो लोग अपने पूर्वजों ( श्रीराम) के नहीं हो सकते, वे मेरे कैसे हो सकते हैं ? प्रश्न- रावण जी! यदि आप को इस देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो?
उत्तर- ( आल्टरनेट मुँहों से हँसता है) दिस इज वेरी फनी क्वैश्चन।... फ्रधानमंत्री और मैं...। न मम्मी न। जरा सोचो इन दिनों प्रधानमंत्री बने रहने का खास गुण है मौनव्रत। और मेरे तो दस मुँह हैं। एक नहीं बोलेगा तो दूसरा बोल देगा। नागरिक जी! एक बात गांठ बाँध लो कि मैं चाहे जितना पापी, अन्यायी हूँ पर मेरे भी सिद्धांत हैं। मैं वोट के खातिर न तो आतंकवादियों को विरियानी खिला सकता हूँ, न तिरँगा जलाने पर खामोश रह सकता हूँ। मेरी गति भी इतनी धीमी नहीं है कि चार सालों में बस ‘ चार कदम चलूँ‘ वह भी जमीन की ओर नहीं बल्कि सूरज की ओर। न बाबा न मैं प्रधानमंत्री नहीं बन सकता।
प्रश्न- मेरे ख्याल से पहले एक-एक गिलास पानी, फिर एक-एक चाय हो जाये फिर आगे बात की जाये।
उत्तर- (रावण का शरीर काँप-सा उठा) नो, बिल्कुल नहीं। मैं न पानी पीयूँगा, न चाय। तुम्हारे शहर का पानी इतना गन्दा है कि मैं उसे पीकर मरना नहीं चाहता हूँ। और बच्चे तुम अपना पानी बचा के रखो वैसे यदि मैने तेरा पानी पी लिया तो तेरा शहर एक-एक बूँद पानी को तरस जायेगा।
प्रश्न- अच्छा तो रावण जी यह बताइए कि आपके विशेष कार्यक्रम जैसे- ‘ जेहि जेहि देश द्विज धेनु पावैं, नगर, गांव, पुर आग लगावैं । ‘ आदि अभी भी चल रहे हैं या नहीं।
उत्तर- बहुत अच्छी तरह से। जहाँ तक देश के द्विजों अर्थात प्रतिभा सम्पन्नों का सवाल है तो उन्हें निपटाने के लिए हमने आरक्षण व्यवस्था कर दी है और धेनु अर्थात सीधे-सादे लोगों के लिए भी माकूल इंतजामात किए हैं। तंदूर काण्ड, मुजफ्फर नगर में सामूहिक बलात्कार आदि इसके उदाहरण हैं।...और जहाँ तक नगर-गाँव में आग लगाने की बात है तो भाई हम अब ‘आलू मण्डी ‘ जैसी आग तो कम साम्प्रदायिकता की आग ज्यादा लगवाते हैं। ( इसी बीच उसने दांयी टांग सामने पड़ी स्टूल पर फैलाई तो अंगूठे से खून रिसता देखकर मैं चौंक गया ।) वैसे यही और भी कई...।
प्रश्न – (बीच में टोककर) आपके अँगूठे में यह चोट...?
उत्तर- अरे हाँ ! अभी एक रैली में, मेरे एक खाकी वर्दीधारी मित्र ने पुष्पक विमान उठवा लिया था जो अभी वापस नहीं आया है। सो पैदल आना पड़ा। शहरों की सड़कें तो बिल्कुल कुआँ छाप हैं। यह तो कहो सिर्फ अँगूठा घायल हुआ। बच गया नहीं तो मैनहोल में होता।...अब देखिए मेरे चेले कितने फास्ट हो गए हैं। सौ में से नब्बे खा जाते हैं। भाई मैं तो कहता हूँ कि बेईमानी करो पर ईमानदारी के साथ। ( उसने कलाई घड़ी पर निगाह डाली और उठ खड़ा हुआ !) अच्छा अब चलते हैं...समय हो रहा है।
प्रश्न- जाते-जाते एक सवाल और! आप देश के नवजवानों के लिए कुछ कहेंगे।
उत्तर- वत्स! यही सवाल मेरे सिराहने बैठकर लक्ष्मण ने किया था।...मुझे याद नहीं कि क्या जवाब दिया था मैने। पर इस समय तो युवा पीढ़ी को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है क्योंकि...
‘ उसके एक हाथ में लॉटरी है और दूसरे में पान मसाला। दिल में रम्मा-रम्मा है और जुबान पर ताला।
उन्हें कहो कि बेरोजगारों की लाइन में खड़े हों ‘ दे दाता के नाम ‘ गायें, और- शाम को मैनड्रेक्स खाकर किसी अस्तबल में सो जायें
वरना मांगते-मांगते उनकी जबान का चमड़ा छिल जायेगा। यह लंका नहीं, हिन्दुस्तान है प्यारे अब यहाँ उन्हें कोई आदर्श नहीं मिल पायेगा ? ‘
इसी के साथ उसने एक बार फिर हुँकार भरी और बोला,‘ अच्छा ! गुड बाई। अगले वर्ष मिलेंगे...। मत भूलना कि हम लंकेश हैं...।‘ और इसी के साथ मेरी नींद खुल गयी। छत पर चढ़कर देखा तो सामने के पार्क में रावण का पुतला धूं-धूं जल रहा था। उससे फूट रहे एक-एक पटाखे से आवाज आ रही थी- ‘ हम लंकेश हैं...। हम लंकेश हैं...। ‘
किसे सादगी कहें और किसे अय्याशी ? हवाई जहाज की 'इकॉनामी क्लास' में यात्रा को सादगी कहा जा रहा है| इन सादगीवालों से कोई पूछे कि हवाई-जहाज में कितने लोग यात्रा करते हैं ? मुश्किल से दो-तीन करोड़ लोग ! 100 करोड़ से ज्यादा लोग तो हवाई जहाज को सिर्फ आसमान में उड़ता हुआ ही देखते हैं| तो हवाई- यात्रा सादगी हुई या अय्याशी ? देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो साल में एक बार भी रेल यात्रा तक नहीं करते| करोड़ों ऐसे हैं कि रेल और जहाज उनकी पहुंच के ही परे हैं| करोड़ों लोग ऐसे भी हैं, जो कभी कार में ही नहीं बैठे| तो क्या मोटर कार, रेल और जहाज में यात्रा करने को अय्याशी माना जाए ? नहीं माना जा सकता| जिन्हें जरूरत है और जिनके पास पैसे हैं, वे यात्रा करेंगे| उन्हें कौन रोक सकता है ? वे यह भी चाहेंगे कि विशेष श्रेणियों में यात्रा करें| सवाल सिर्फ आराम का ही नहीं है, रूतबे का भी है| रूतबा असली मसला है, वरना दो-तीन घंटे की हवाई- यात्रा और पांच-छह घंटे की रेल- यात्रा में कौन थककर चूर हो सकता है| अगर पूरी रात की रेल या जहाज की यात्रा है तो रेल की शयनिका या जहाज की 'बिजनेस क्लास' को अय्याशी कैसे कहा जा सकता है ? जिन्हें गंतव्य पर पहुंचकर तुरंत काम में जुटना है, उनके लिए यह आवश्यक सुविधा है|
लेकिन हमारे नेताओं ने कई 'अनावश्यक सुविधाओं' को 'आवश्यक सुविधा' में बदल दिया है| माले-मुफ्त, दिले-बेरहम | नेताओं के आगे रोज़ नाक रगड़नेवाले धनिक अगर इन सुविधाओं को भोग रहे हैं तो नेता पीछे क्यों रहें ? पांच-सितारा होटलों में रहनेवाले नेता क्या सच बोल रहे हैं ? देश के बड़े से बड़े पूंजीपति की भी हिम्मत नहीं कि वह अपने रहने पर एक-डेढ़ लाख रू. रोज़ महिनों तक खर्च कर सके| वह नेता ही क्या, जो अपनी जेब से पैसा खर्च करे| या तो कोई पूंजीपति उसका बिल भरता है या डर के मारे होटल ही उसे लंबी रियायत दे देता है| मंत्रियों ने यह कहकर पिंड छुड़ा लिया कि होटलों के साथ 'उनका निजी ताल-मेल' है| पत्रकारों को खोज करनी चाहिए थी कि यह निजी ताल-मेल कैसा है? यदि ये मंत्री लोग अपना पैसा खर्च कर रहे होते तो प्रणब मुखर्जी को कह देते कि भाड़ में जाए, आपकी सादगी ! हमारी जीवन-शैली यही है| हम ऐसे ही रहेंगे, जैसा कि मुहम्मद अली जिन्ना कहा करते थे| वे यह भी पूछ सकते थे कि मनमोहनजी, प्रणबजी, सोनियाजी, अटलजी, आडवाणीजी ! जरा यह तो बताइए कि आपके घर कौनसी पांच-सितारा होटलों से कम हैं ? क्या उनका किराया दो-तीन लाख रू. रोज से कम हो सकता है ? डॉ. राममनोहर लोहिया कहा करते थे कि भारत का आम आदमी तीन आने रोज़ पर गुजारा करता है और प्रधानमंत्री (नेहरू) पर 25 हजार रू. रोज खर्च होते हैं ! आज हमारे मंत्रियों पर उनके रख-रखाव, सुरक्षा और यात्र पर लाखों रू. रोज़ खर्च होते हैं जबकि 80 करोड़ लोग 20 रू. रोज़ पर गुजारा करते है| सिर्फ पांच-सितारा होटल छोड़कर कर्नाटक भवन या केरल भवन में रहने से सादगी का पालन नहीं हो जाता और न ही साधारण श्रेणी में यात्र करने से ! ये कोरा दिखावा है लेकिन यह दिखावा अच्छा है| इस दिखावे के कारण देश के पांच-सात लाख राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को कुछ शर्म तो जरूर आएगी, जैसे कि एक सांसद को आई थी, सोनियाजी को इकॉनामी क्लास में देखकर ! साधारण लोगों पर भी इसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़ेगा|
लेकिन इससे देश की समस्या का हल कैसे होगा ? बाहर-बाहर सादगी और अंदर-अंदर अय्रयाशी चलती रहेगी| सादगी हमारा आदर्श नहीं है| हमने हमारे समाज को अय्रयाशी की पटरी पर डाल दिया है और हम चाहते हैं कि हमारी रेल सादगी के स्टेशन पर पहुंच जाए| हमने रास्ता केनेडी और क्लिंटन का पकड़ा है और हम चाहते हैं कि हम लोहिया और गांधी तक पहुंच जाएं| नेताओं के दिखावे से हम आखिर कितनी बचत कर पाएंगे ? बचत और सादगी का संदेश देश के दहाड़ते हुए मध्य-वर्ग तक पहुंचना चाहिए| हम यह न भूलें कि जो राष्ट्र अय्रयाशी के चक्कर में फंसते हैं, वे या तो दूसरे राष्ट्रों का खून पीते हैं या अपनी ही असहाय जनता का! रक्तपान के बिना साम्राज्यवाद और पूंजीवाद जिंदा रह ही नहीं सकते| गांधीजी ठीक ही कहा करते थे कि प्रकृति के पास इतने साधन ही नहीं हैं कि सारे संसार के लोग अय्याशी में रह सके| हमने अपने देश के दो टुकड़े कर दिए हैं| एक का नाम है, 'इंडिया' और दूसरे का है, 'भारत' ! इंडिया अय्याशी का प्रतीक है और भारत सादगी का ! भारत की छाती पर हमने इंडिया बैठा दिया है| 'इंडिया' के भद्रलोक के लिए ही पांच-सितारा होटलें हैं, चमचमाती बस्तियां हैं, सात-सितारा अस्पताल हैं, खर्चीले पब्लिक स्कूल हैं, मनोवांछित अदालते हैं| चिकनी सड़कें, वातानुकूलित रेलें और जहाज हैं जबकि 'भारत' के (अ) भद्रलोक के लिए अंधेरी सरायें हैं, गंदी बस्तियां हैं, बदबूदार अस्पताल हैं, टूटे-फूटे सरकारी स्कूल हैं, तिलिस्मी अदालते हैं, गड्रढेदार सड़के हैं, खटारा बसें हैं और मवेशी-श्रेणी के रेल के डिब्बे हैं| जब तक यह अंतर कम नहीं होता, जब तक समतामूलक समाज नहीं बनता, जब तक देश में प्रत्येक व्यक्ति के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, सुरक्षा और मनोरंजन की न्यूनतम व्यवस्था नहीं होती, सादगी सिर्फ दिखावा भर बनी रहेगी| हमारे नेतागण अपनी शक्ति 'भारत' से प्राप्त करते हैं और उसका उपयोग 'इंडिया' के लिए करते हैं| 'भारत' की सादगी उसकी मजबूरी है| उसका आदर्श भी 'इंडिया' ही है| इसीलिए हर आदमी चूहा-दौड़ में फंसा हुआ है| मलाई साफ़ करने पर तुला हुआ है| उसे कानून-क़ायदे, लोक-लाज और लिहाज़-मुरव्वत से कोई मतलब नहीं है| इस मामले में नेता सबसे आगे हैं| जो जितना बड़ा नेता, वह उतने बड़े ठाठ-बाठ में रहेगा| इस जीवन-शैली पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती| उल्टे, दिल में यह हसरत जोर मारती रहती है कि हाय, हम नेता क्यों न हुए ? अगर आम लोगों को इस अय्याशी पर एतराज़ होता तो वे चौराहों पर नेताओं को पकड़-पकड़कर उनकी खबर लेते, उनकी आय और व्यय पर पड़े पर्दो को उघाड़ देते और भ्रष्टाचार के दैत्य का दलन कर देते| यह कैसे होता कि अकेली दिल्ली में नेताओं के बंगलों के रख-रखाव पर 100 करोड़ रू. खर्च हो जाते और देश के माथे पर जूं भी नहीं रेंगती| हमारे नेता और अफसर हर साल अरबों रू. की रिश्वत खा जाते हैं और आज तक किसी नेता ने जेल की हवा नहीं खाई | जापान और इटली में भ्रष्टाचार के कारण दर्जनों सरकारें गिर गईं और ताइवन के प्रसिद्घ राष्ट्रपति चेन जेल में सड़ रहे हैं लेकिन हमारे सारे नेता राजा हरिशचंद्र बने हुए हैं| हमारे नेता और अफसर इसीलिए राजा हरिशचंद्र का नक़ाब ओढ़े रहते हैं कि भारत के लोगों ने भ्रष्टाचार को ही शिष्टाचार मान लिया है| यह राष्ट्रीय स्वीकृति ही हमारे लोकतंत्र् का कैंसर है| यह कैंसर शासन, प्रशासन, संसद, अदालत और सारे जन-जीवन में फैल रहा है| इसे देखकर अब किसी को गुस्सा भी नहीं आता| अय्रयाशी ही भ्रष्टाचार की जड़ है| ठाठ-बाट, अय्याशी और दिखावा हमारे राष्ट्रीय मूल्य बन गए हैं| अय्याशी के दिखावे को सादगी के दिखावे से कुछ हद तक काटा जा सकता है लेकिन जिस देश में अय्रयाशी सत्ता और संपन्नता का पर्याय बनती जा रही हो, वहां सादगी का दिखावा कुछ ही दिनों में दम तोड़ देगा| यह ठीक है कि विदेह की तरह रहनेवाले सम्राट जनक, प्लेटो के दार्शनिक राजा, अपनी मोमबत्तीवाले कौटिल्य, टोपी सीनेवाले औरंगजेब और प्रारंभिक इस्लामी खलीफाओं की तरह नेता खोज पाना आज असंभव है लेकिन सादगी अगर सिर्फ दिखावा बनी रही और अय्याशी आदर्श तो मानकर चलिए कि भारत को रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता !
छू काली कलकत्ते वाली तेरा वचन न जाए खाली मैं हूँ जादूगर अलबेला असली भानमती का चेला सीधा बंगाले से आया जहाँ जहाँ जादू दिखलाया सबसे नामवरी है पाई उंगली दाँतों तले दबाई जिसने देखा, खेल निराला जम कर खूब बजाई ताली चाहूँ तिल का ताड़ बना दूँ रुपयों का अंबार लगा दूँ अगर कहो तो आसमान पर तुमको धरती से पहुंचा दूँ ऐसे ऐसे मंतर जानूँ दुख संकंट छू मंतर कर दूँ बने कबूतर, बकरी काली।
-चन्द्रपाल सिंह यादव 'मयंक` (1925 - 2000)
गुड़िया रानी
मेरी भोली गुड़िया रानी सुनती मुझसे रोज़ कहानी। आँखें नीली सुन्दर बाल परियों जैसी इसकी चाल । बढ़िया जूते, कपड़े पहने मेरी गुड़िया के क्या कहने
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
खेलने की जगह
एक छोटी सी लड़की है .उसका नाम है अन्वी ।.अन्वी छेः साल की है।.अन्वी बहुत प्यारी लड़की है। अपने माँ पिता और भाई के साथ डेनटन में रहती है। उस की एक गन्दी आदत थी, जब भी वो कंही अपने माँ पिता के साथ जाती थी तो पार्किन की जगह पर खेलने लगती थी। माँ ने उसे बहुत बार समझाया, कहा, "अन्वी पार्किंग की जगह खेलने की नही होती है। ", पर वो मानती नही थी ।.एक दिन वो अपने पापा के साथ वालमार्ट गई। सामान खरीदने के बाद उस की नजर एक बहुत सुंदर डॉल पे पड़ी । उस ने पापा से कहा, "पापा प्लीज ये मेरे लिए ले लीजिये। " पापा ने वो डॉल ले ली। अन्वी बहुत खुश थी ।.सामान ले के अन्वी पापा के साथ .बाहर निकली । पापा के साथ चलते चलते कार के पास आई । .पापा कार में सामान रखने लगे और अन्वी अपनी आदत के अनुसार वंही पार्किंग की जगह में अपनी डॉल के साथ खेलने लगी। पापा सामान रखने में लगे थे उन्होंने ध्यान नही दिया । तभी एक कार ने जो की पीछे कर रहा था, देखा नही अन्वी को टक्कर मारी। अन्वी गिर गई। उस को थोडी चोट लगी पर उस की डॉल टूट गई ।अन्वी को बहुत दुःख हुआ ।.पापा ने देखा और अन्वी को उठा लिया। प्यार किया। अन्वी रो रही थी चोट से नही, उस की डॉल जो टूट गई थी उस लिए। .पापा ने कहा की देखो तुम को माँ ने कितनी बार समझाया है की पार्किंग में नही खेलते पर तुम समझती नही। अन्वी को अपनी गलती का अहसास हो गया था, उस ने कहा की अब वो ऐसा नही करेगी।