कई दशाब्दियों पूर्व बड़ी गरम चर्चा चली साहित्य और राज्याश्रय के अंतर्विरोध पर और धुरी हीनता नाम का पदार्थ साहित्य की आलोचना से आ जुड़ा। आजकल वह चर्चा ठंडी हो चली है। अब चर्चा गरम है कि साहित्य सेकुलर हो, दलित हो, स्त्री विमर्श और जाने क्या-क्या हो। मेरे मित्र स्व. वासुदेव गोस्वामी ' साहित्य-संगीत-कला विहीनः साक्षात्पशुपुच्छविषानहीनः' की विनोदपूर्ण व्याख्या करते थे। कहते थे कि आदमी अगर साहित्य-संगीत-कला से युक्त नहीं है तो बिना सींग-पूँछ के पशु है, साहित्य-संगीत-कला से युक्त है सींग-पूँछवाला पशु है। सींग या सिंह का संबंध एक ओर श्रृंगार से है, दूसरी ओर आदि वाद्य सिंगी या सिंगा से है। पूँछ का संबंध चित्रकला की तूलिका से है और साहित्य तो साक्षात गऊ है ही। पंडितों ने उसे कामधेनु भी कहा है। गऊ शब्द 'गम' अर्थात जाना धातु से बना है, इसलिए वह स्वभाव से ही चार चरणवाला है। वह गतिशील है, कोई प्रगतिशील कहना चाहे तो प्रगतिशील कह ले, वह है बड़ा सीधा-सादा पशु, बड़ा पालतू। खूँटे से बाँध दो तो बँध जाए। अपने ढंग से तब चलता है जब छुट्टा छूट जाए। वैसे अपनी स्वतंत्रता में प्रतिरोध बर्दाश्त नहीं करता, उकसाने पर मरखना भी हो जाता है। ज्यादा नहीं, बस आतंकित भर करने को। हाँ, यह बात जरूर है कि इस मामले में बड़ा संवेदनशील होता है कि उसका जो इलाका है उसमें अगर कोई आता है तो मरने-मारने पर उतारू हो जाता है।
इस समय विचार का मुद्दा यह है कि साहित्य का जनतंत्र से क्या नाता है या उलटकर कहें तो जनतंत्र का साहित्य से क्या लेना-देना है। जनतंत्र के लिए जो तीन अभिलक्षण चाहिए, उनमें पहला है कि चुनाव हो और चुनाव में राजा-रंक सभी भागीदार हों, दूसरा कि उसमें असहमति की छूट हो, लेकिन तीसरा कि निर्णय बहुमत के आधार पर हो।
साहित्य इस मामले में तो जनतांत्रिक है कि वह सबको संबोधित है, प्राणिमात्र के सुख-दुःख के साथ उसकी साझेदारी है और साझेदारी को प्रेषित करना ही उसका धर्म है; लेकिन मूल्यांकन मत-संग्रह द्वारा नहीं होता। लोकप्रियता की दृष्टि से या आजकल के परिप्रेक्ष्य में बिक्री की दृष्टि से बहुत सी उत्तम रचनाएँ अपने समय में लोकप्रिय नहीं होतीं और न उनकी बिक्री ही अधिक होती है। पर कालांतर में वे ही सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति के कंठ में बस जाती हैं और उनकी गूंज बिना किसी प्रचार के दूर-दूर तक फागुन-चैत महीने के अरधान की तरह फैल जाती है। साहित्य लिखनेवाले को एक भी पारखी मिल जाता है तो अपने को कृतार्थ समझता है और पारखी न भी मिले, सहृदय श्रोता भी मिल जाये तो उसका संप्रेषण सार्थक हो जाता है।
साहित्य और जनतंत्र की प्रक्रिया में एक अंतर और भी है। जनतंत्र चलता तो है सहमति के आधार पर. पर असहमति को बर्दाश्त करता चलता है। साहित्य ठीक उलटे, असहमति पर ही चलता है। असहमति ही एक तरह से साहित्य के लिए इकसावा होती है; पर उसका उद्देश्य लोगों को अपनी और खींचना होता है।
जनतंत्र सर्वहित का संकल्प ही नहीं लेता, उस संकल्प की पूर्ति न कर पाए तो वह सत्ता को अस्वीकार भी कर देता है। साहित्य मुखर रूप से संकल्प भी नहीं लेता और पूर्ति तो अकेले उससे होती नहीं। पूर्ति तो उस समाज से होती है, जो साहित्य के संस्कार से दीपित हुआ है। अगर समाज साहित्य से प्रभावित होकर भी तटस्थ रह जाता है तो साहित्य ऐसे में कुछ विशेष कर नहीं पाता। साहित्य अनुभाविता पैदा करता है, कर्ता नहीं। यदि करता भी है तो प्रत्यक्ष नहीं। यह दूसरी बात है कि आल्हा-ऊदल सुनकर दो गाँव में लाठी चल गई हो और इस आधार पर उसे युद्ध का कारण मान लिया गया हो। दरअसल आल्हा-ऊदल के नाते सोया हुआ प्रतिशोध भाव जगता है और उसका परिणाम लठैती की जोर-अजमाइश के रूप में सामने आ जाता है। यह भी हो सकता है कि नए प्रणय-प्रसंग में कुछ दोहे, कुछ शेर और अब तो फिल्मी गीत भी कुछ उद्दीपन कर देते हों ; पर वहाँ भी साहित्य भला बुरा एक बहाना भर होता है। एक सीमा तक जनतंत्र भी बहुत कुछ नहीं कर पाता, करने की बात ही करता रहता है। जनतंत्र जितना ही स्वतंत्र होता है उतना ही कायदे-कानूनों का परतंत्र होता है। इसलिए जनतंत्र की गति धीमी होती है, उसके दावे जरूर बड़े तेज होते हैं। साहित्य तो कोई दावा ही नहीं करता। केवल वैसा ही दावा करता है जो अपने को मंत्र मान रहा हो। तुलसीदास-कबीरदास ने तो दावा नहीं किया था, न प्रसाद ने किया था, लेकिन ऐसे समझदार लोग जरूर हुए जिन्होंने तुलसी के दोहे-चौपाइयों को विभिन्न अनुष्ठानों के लिए मंत्र मान लिया। काशी के ही एक अध्यापक ' कामायनी' की पंक्तियों को ताबीज में रखकर देते थे और उससे तिजला ज्वर ठीक करते थे। कुछ साहित्यकार भी ऐसे होते हैं जो साबर मंत्र ही लिखते हैं--' अनमिल आखर अरथ न जाके।' ऐसी किसी रचना पर ही सम्मति देते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि यह साबर मंत्र है। साहित्य में न तो ' अनमिल आखऱ ' हो सकता है, न ' आखर' अरथहीन हो सकता है। आखर का अर्थ के साथ मिलना आवश्यक ही नहीं, परम आवश्यक है। जनतंत्र में सत्ता का प्रायः जन से अनमिल भाव ही रहता है। ऐसी सत्ता टिकाऊ भी नहीं होती।
साहित्य की एक भूमिका बड़ी जबर्दस्त है। वह जनतंत्र की भावना को जगाए रखता है, क्योंकि साहित्य का प्राण है असहमति। बाणभट्ट ने ' हर्षचरित ' में लिखा हर्ष आश्रयदाता थे ; लेकिन उसमें जहाँ वह प्रसंग आता है जहाँ हर्ष की सेना राज्यश्री को ढूँढ़ने और मौखरि राजधानी पर आक्रमण करने वाली सेना का पीछा करने निकली है। वहाँ पर बाणभट्ट का चित्त उद्विग्न हो जाता है, क्योंकि सेना विंध्य के उपांत ग्रामों की फसल कुचलती हुई जा रही है। उनका उद्वेग कई रूपों में प्रकट होता है। बच्चे दूर से सैनिकों को चिढ़ाकर भाग रहे हैं। एक अध्यापक निर्भय होकर सामने आता है--कैसा राजा, जिसकी सेना किसानों की फसल बरबाद कर रही है। सबसे करुण प्रसंग तब आता है जब कुछ खरगोश झाड़ियों से प्रयाण करती हुई सेना की पगचाप सुन कुतुहलवश बाहर निकलते हैं और सैनिकों के पदत्राणों से कुचले जाकर चिंदी-चिंदी बिखर जाते हैं। इस निर्ममता का बहुत ही द्रावक वर्णन बाणभट्ट ने किया है। मुझे ऐसा लगता है कि ' हर्षचरित ' को इसीलिए बाणभट्ट ने अधूरा छोड़ दिया था। संभवतः राज्याश्रय को भी इसीलिए वे आगे सहन नहीं कर पाए। रीतिकाल के भी बहुत सारे कवि हैं, जो राज्याश्रय में रहकर भी राज्याश्रय को ठुकराते रहे। साहित्यकार किसी का मनसबदार बनकर रहना नहीं गवारा कर सकता। वह इसलिए जनतंत्र में एक कारक घटक बनता है, प्रतिरोध को शक्ति देता है--सत्ता के प्रतिरोध की शक्ति ; साहस के साथ खड़े होने का निर्भय भाव देता है।
परन्तु जनतंत्र क्या साहित्य का मूल्य ठीकठाक आँकता है ? आँक पाता है ? यह प्रश्न उठता है और इसका उत्तर ठीक-ठीक मिलता नहीं। दिखावे के रूप में तो उसे आदर मिलता है। अमेरिका का राष्ट्रपति रॉबर्ट फ्रास्ट को शपथ ग्रहण के समय आदरपूर्वक बुलाता है। जवाहरलाल नेहरू उसकी--
' हरियाली सुहानी है, रुको नहीं
मीलों जाना है, वादे निभाने हैं।'
कविता की पंक्तियाँ दुहराते रहते थे। गांधी जी के लिए तो मानस सबकुछ था, ' रघुपति राघव राजाराम ' के बल पर वे ब्रिटिश शासन को चुनौती देते रहते थे। स्वतंत्रता के संघर्ष में बंकिमचंद्र चटोपाध्याय को ' आनंदमठ ' और उसमें आया हुआ ' वंदे मातरम ' गीत आंदोलन में प्राण फूंकता था। यह सब सही है, पर क्या साहित्य ' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ' तक ही सीमित है अथवा जहाँ कविता का विषय राजनीति न हो, राजनीति का कर्णधार न हो, सृष्टि का सौंदर्य हो, सृष्टि की विसंगति की व्यथा हो, देवदास के जंगलों के कागज की लुगदी में रूपांतरित होने की कथा हो, हिम शिखरों के हिम के पिघलते जाने की व्यथा हो, ऐसे विषय का प्रभाव जनतंत्र पर पड़ता है कि नहीं पड़ता है? पड़ता भी हो तो, स्थूल अर्थों की कतरनें पेश करने वाले लोगों की जय हो! ऐसी बातें सिंहासन तक पहुंचती नहीं हैं। इसलिए जनतंत्र में संस्कृति का गहरा अर्थ तिरोहित रह जाता है, केवल कुछ साज-बाज, रंग-रोगन और लटक-मटक संस्कृति के पर्याय बनने लगते हैं। गाहे-बगाहे राजनेताओं के फतबे भी सुनने को मिलते हैं कि साहित्य ऐसा लिखिए, वैसा लिखिए और इसी में जनतंत्र की तस्बीर बोंदी हो जाती है। वैसे ही जैसे किसी फिल्म को बनाते समय पैसा देनेवाले सेठ का देर तक अच्छा फिल्मांकन देखते-देखते धैर्य छूट जाता है, चिल्ला उठता है--अब तो कोई गाना गवाओ--भले ही प्रसंग चिता पर सुलाए जाते शव का हो। सेठ को शव से भी गाना चाहिए। इस तरह के प्रसंग या तो भाँड़ पैदा करते हैं या विदूषक। यह सुनिश्चित करना कि किसी साहित्य की आवाज जनतंत्र के नियामकों के पास पहुँचे, आसान नहीं है। आवाज पहुँचने में किसी-न-किसी का बुरा बनने का डर है और तंत्र कोई भी हो, आदमी बुरा बनना नहीं चाहता। इसलिए आवाज पहुँचाने वाले की जरूरत न रहे, ऐसे जनतंत्र की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। नौकरशाही ने सुरक्षा का ऐसा आडंबर रच रखा है कि एक प्राचीर खड़ी हो गई है जिसका ' जनता दरबारों ' से भी टूटना नहीं हो पाता। जनता दरबार खुद एक तरह के ओट बन जाते हैं--आत्ममुग्धता के।
ऐसी परिस्थिति में साहित्य की भूमिका बड़ा कठिन हो जाती है। उसे कुछ कहना भी है और कुछ नहीं भी कहना है। कुछ कहने के लिए छोड़ देना है, चुप रहना है। आपदकाल में एक भविष्यद्रष्टा आलेचक ने भविष्यवाणी की थी कि अब वक्त आ गया है कि लोग चिरई-चिरूँग के बारे में बात करेंगे, राजनीति के बारे में सीधी बात नहीं करेंगे। उन्होंने मान लिया कि चिरई-चुरूँग, पेड़-पौधे की बात करना साहित्य के लिए मानो बड़ी छोटी बात हो। सर्वभोजी जीवन पद्धति में भी भोज्य के रूप में ही सही, चिरई-चुरूँग और पेड़-पौधों की जरूरत तो है ही। उनके आरक्षण की भी चिंता है; पर साहित्य में यह काम गोया बहुत घटिया है। वैसे उनकी भविष्यवाणी के बावजूद बहुत कुछ वैसा लिखा जाता रहा है जो उसके विपरीत था। उसी काल में भाई ने ' त्रिकाल-संध्या' ' लिखीलेकिन बहुत सारे कवि रचनाकार चुपे थे या उसे अनदेखा करके कुछ ऐसा लिख रहे थे जो अन्याय का प्रतिरूप दिखाकर उसका सामना करने के तौर-तरीके बता रहे थे। ङमारी समझ में ऐसा ही साहित्य जीता है। तुलसीदास ने अकबर और जहाँगीर का नाम नहीं लिया, कबीरदास ने सिकंदर लोदी का नाम नहीं लिया, कुँभदास ने अकबर का नाम नहीं लिया। इन उपेक्षाओं में बहुत बड़ी शक्ति थी और इसलिए ये उपेक्षाएँ सर्वभाव से भावित मनुष्य की अपेक्षाएँ पूरी करने में अधिक सहायक हुईँ।
जो जनतंत्र ऐसे साहित्य का महत्व समझता है और जितना समझता है उतना ही बडा जनतंत्र बनता है। जनतंत्र और साहित्य के बीत एक ऐसा ही रिश्ता एक स्वस्थ रिश्ता है। ऐसा खुला पर बेनाम रिश्ता ही रिश्ता है। न नजदीकी अच्छी है, न दूरी अच्छी है।
जनतंत्र यदि अपना हित चाहता है और साहित्य का भी हित चाहता है तो उसे साहित्य को हकीकी रिश्तेदाक नहीं बनाना चाहिए। साहित्यकार के राजनीतिक विचार हो सकते हैं , पर राजनीतिक विचार का साहित्य नहीं होता। साहित्य विचार देता है और जनतंत्र से भी यह अपेक्षा है कि वह साहित्य को विचार न दे--साहित्य से विचार ले और अपने विचार में संशोधन भी आमंत्रित करे। दोनों के बीच में इतनी औपचारिक दूरी होगी तो हित्य जनतंत्र की प्रक्रिया को सक्रिय कर सकेगा। जनतंत्र की प्रक्रिया में पहले ही लिखा जा चुका है कि असहमति एक आवश्यक घटक है, वह अआसहमति सबसे स्वस्थ रूप में, बिना किसी उपद्रव के साहित्य से आती है। साहित्य जनतंत्र से यही अपेक्षा रखता है कि वह खुल करके साँस ले सकता है, वैसे जनतंत्र का जहाँ दम घुटता है वहाँ भी साहित्य मौन भी रहता है तो उसका मौन कम मुखर नहीं रहता। साहित्य जनतंत्र का पहरेदार नहीं है। जैसा कि पत्रकारिता होने का दावा करती है। साहित्य केवल संभावनाओं का संकेत है। कोई आदेश-निर्देश या परामर्श नहीं है। वह एक गहन विमर्श है और ऐसा विमर्श है जिसमें अपने को भी बख्शा नहीं जाता। ऐसा साहित्य ही समय की सजगता रखता हुआ भी अपने समय का अतिक्रमण करता है।