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                                                                                                                                         कविता आज और अभी

   धुँध में


अजीब मौसम है
यह आँसुओं सा
उमड़ता-जमता
धरती के सीने से
आह बन
जो उठता धुँआ
धरती के सीने पे
कहर-सा बरसता
धुँध बनकर
जम गए सपने
आँखों के नम काँच पे
और फैलता गया
अँधेरा रातभर -
फिसल-फिसल
काँपती उँगलियों के
ठँडे बेजान पोरों से
पर सूखी-नंगी मनकी
नादान ये टहनियाँ
करती रहीं
इन्तजार आज भी
जाने किसका
यूँ एड़ियों पे
उचक-उचक

-शैल अग्रवाल





साथ आओगे तो ...



साथ आओगे तो मुझको हौसला मिल जाएगा
साँस लेने का समझ लो सिलसिला बन जाएगा
यूं अकेला भी चलूँ तो कौन रोकेगा मुझे
तुम रहोगे साथ तो ये रास्ता कट जाएगा
थे बहुत छोटे तो सारे भाई-बन्धु एक थे
क्या पता था के बड़े होंगे तो घर बंट जाएगा
आपके होने का दम जो लोग भरते है यहाँ
आने दो कोई मुसीबत सब पता चल जाएगा
प्यार दे कर जीत लो इस ज़िंदगी की जंग को
हो कोई दुश्मन तुम्हारे रंग में ढल जाएगा

                              -गिरीश पंकज





       पाप


हमें लगता है

मरने के बाद भी

पुरखों की आत्माएँ

भटकती रहती हैं

विरोध करते रहते हैं वे

उनके साथ हुए वर्ताव का


गाँव के ओझा को

सुनाई दे जाती हैं उनकी आवाजें

उनके अदृश्य हाथ

चाहे उठते रहते हों दुआओं में


पर ओझा कर देता है

हमारे कलुष की पुष्टि

पुरखे बन जाते हैं

पाप आत्माएँ


पीढ़ियों के बीच रहती है

खाली जगह

हमारे समय तक आते जाते

फैल जाता है उसमें आकाश

जहाँ उठती रहती हैं

हमारे ही पापों की अनुगूँजें। 

           -तेजराम शर्मा





पिंड दान


क्या तुम्ही हो वहाँ पर
सुन सकते हो मुझे
स्वीकारते हो अर्पण
या फिर यह
अन्धी आस्था मेरी
बिखर जाएगी
यूं ही लहरों सी
धुन धुन के सर
झाग फेंकती  
संस्कार और
अनुष्ठानों के
पथरीले तट।

शैल अग्रवाल





  जीवन के रंग


जीवन के होते है कई रंग
जो हर पल बनते बिगड़ते रहते हैं
इन्द्रधनुष की तरह

बिजली की चमक के साथ
गरजते हुए बादलों की तरह
बरसती रहती है जिंदगी

लहराती बलखाती नदी की तरह
इठलाती है जिंदगी
पेडो में उगते नव-पल्लव
हहराती हवा में झूमते नाचते
सिखाते है जिंदगी को
एक नया सबक

उगती हुई धरती के सीने पर
खड़ी होती है जब अट्टालिकाएँ
जिंदगी बेबसी के आंसू रोती है

और जब आती है ऋतुएँ बदल-बदल कर
बदल देती है आबो हवा
बदलते रहतें है जिंदगी के रंग
कभी सुख में
कभी दुःख में --

    -किशोर काला






  मुट्ठी भर


बचपन में

माँ मुट्ठी भर आटा

रोज परात से एक कनस्तर में

डालती थी

सदाव्रत के लिए

नियम अटल था

बस मुट्ठी भर


पर मेरी उंगलियों के बीच से

रेत की तरह फिसल रहे हैं

मुट्ठी भर सपने

मुट्ठी भर हवा

मुट्ठी भर आकाश

मुट्ठी भर धूप

मुट्ठी भर देश भी

         -तेजराम शर्मा





  जीवन


जीवन पाया और जिया भी

पाया क्या प्रतिपल में।

जीने वाले जी लेते हैं

जीवन को कुछ पल में।


जो जीते हैं नहीं देखते

कितने पल जीवन में।

कितना जीवन तो बाकी है

आने वाले क्षण में।


गगन मचलते मेघ मगन हैं

जग गागर भरने में।

बूंदें बन बन बरसें वन वन

जीवन है झरने में।


चली नदी जब करती कलकल

लगी रही बहने में।

पर्वत आगे रोके राहें

जीवन है चलने में।


व्यस्त पवन है गंधभार से

जगत प्राण देने में।

देकर जीवन देना जीवन

जीवन है सहने में।


हँसकर खिलना खिलकर हँसना

हँसते जो मिटने में।

फूल कहे तो जीवन जी लो

जीवन ये हँसने में।


पंछी गाते गीत जगत के

अपनी मीठी धुन में।

मस्त जरूरत में जीने की

मन की लगी लगन में।


जीवन देखो और जियो भी

मत देखो उलझन में।

जीवन गति है कभी रुके तो

ढूँढ़ो अपने मन में।

    -रामाश्रय सिंह