सच-मुच के आये को कौन खोले द्वार! हाथ अवश नैन मुँदे हिये दिये पाँवड़े पसार!
कौन खोले द्वार!
तुम्ही लो स्त्रहास खोल तुम्हारे दो अनबोल बोल गूँज उठे थर-थर अन्तर में सहमें साँस लुटे सब, घाट-बाट, देह-गेह चौखटे-किवार।
मीरा सौ बार बिकी है गिरिधर ! बेमोल ! सच मुच के आये को कौन खोले द्वार!
नाच
एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ। जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ वह दो खम्भों के बीच है। रस्सी पर मैं जो नाचता हूँ वह एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक का नाच है। दो खम्भों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ उस पर तीखी रोशनी पड़ती है जिस में लोग मेरा नाच देखते हैं। न मुझे देखते हैं जो नाचता है न रस्सी को जिस पर मैं नाचता हूं न खम्भों को जिस पर रस्सी तनी है न रोशनी को ही जिस में नाच दीखता हैः लोग सिर्फ नाच देखते हैं। पर मैं जो नाचता हूँ जो जिस रस्सी पर नाचता हूँ जो जिन खम्भों के बीच है जिस पर जो रोशनी पड़ती है उस रोशनी में उन खम्भों के बीच उस रस्सी पर असल में मैं नाचता नहीं हूँ। मैं केवल उस खम्भे से इस खम्भे तक दौड़ता हूँ कि इस या उस खम्भे से रस्सी खोल दूँ कि तनाव चुके और ढील में मुझे छुट्टी हो जाये- पर तनाव ढीलता नहीं और मैं इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ता हूँ पर तनाव वैसा ही बना रहता है सब कुछ वैसा ही बना रहता है। और वही मेरा नाच है जिसे सब देखते हैं मुझे नहीं रस्सी को नहीं खम्भे नहीं रोशनी नहीं तनाव नहीं देखते हैं नाच !
चीनी चाय पीते हुए
चाय पीते हुए मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।
आप ने कभी चाय पीते हुए पिता के बारे में सोचा है ? अच्छी बात नहीं है पिताओं के बारे में सोचना। अपनी कलई खुल जाती है।
हम कुछ दूसरे हो सकते थे। पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है कि हम कुछ दूसरे हुए होते तो पिता के अधिक निकट हुए होते अधिक उन जैसे हुए होते। कितनी दूर जाना होता है पिता से पिता जैसा होने के लिए !
पिता भी सवेरे चाय पीते थे। क्या वह भी पिता के बारे में सोचते थे- निकट या दूर ?
बोलो चिड़िया
चिड़िया को जितने भी नाम दिए थे सब झूठे पड़ गये स्वयं जब बोली चिड़िया नहीं कहा कुछ मैं नेः ताका किया से चुप चिड़िया ने भी नहीं कहा चिड़िया केवल बोली रही अप्रतिम गुणातीत आप्लवनकरी
बोलो, बोलो, बोलो, चिड़िया भरो जगत् को एक बार फिर डूब चलूँ मैं डूब चलूँ पर डूबूँ नहीं रहूँ सुनता सुनने में रहूँ अनश्वर बोलो चिड़िया बोलो, बोलो, बोलो !