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                                           सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर


                                                    " हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
                                                           तेरे चरण चूमता सागर,
                                                            श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ
                                                           वाणी में है गीता का स्वर।
                                       ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
                                                            मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।"


                                                              -भगवती चरण वर्मा        

                                                                                                                                                                                                   -                                                          देश हमारा  -कल आज और कल-                                                                                                      


                                                              ( लेखनी-अँक 30 - अगस्त 2009)  


इस अंक में- नमनः राम प्रसाद ' बिस्मिल ' । माह विशेषः श्री श्यामलाल गुप्ता 'पार्षद'  व गोपाल सिंह नेपाली। कविता धरोहरः सर्वेश्वर दयाल सक्सेना।  माह के कविः नरेश शांडिल्य। कविता आज और अभीः प्राण शर्मा,  स्नेह ठाकुर,  दिनेश ध्यानी, सुधाकर अदीब, पद्मेश गुप्त। दो बाल-कविताः भवानी प्रसाद मिश्र । 15 अगस्त विशेष प्रस्तुति- काव्य -संग्रह -देश हमारा।


मंथनः वाल्मीकि सिंह।  परिचर्चाः मुंशी प्रेमचंद । परिदृश्यः शैल अग्रवाल। कहानी धरोहरः जयशंकर प्रसाद ।  कहानी समकालीनः ममता कालिया । लघुकथाः संदीप कुमार मील'।  मुद्दाः वेदप्रताप वैदिक। गुलदस्ताः कविता शर्मा। हास्यव्यंग्यः हरीश नवल।  चांद परियाँ और तितली- दामोदर सिंह । देश-विदेश की साहित्यिक और सामाजिक गतिविधियों के समाचारों से भरपूर विविधा और नया स्तंभःचौपाल।

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                                                                                                                                                                        अपनी बात


भारत की धरती पर पैर रखते ही, चार दशक से मन को सालता वह विदेश में मिले बनवास का अवसाद पल भर में ही जाने कहां विलुप्त हो  जाता है। हमेशा की तरह ही इस बार भी  हड्डियां कपाती ठंड और तपती लू, दोनों की ही परवाह किए बगैर खुशी-खुशी दौड़-भाग रही थी. .' कुछ नहीं हो सकता मुझे, मैं तो यहीं की हूं, इसी मिट्टी की  बनी।' कहती ही नहीं, मानती भी।  शारीरिक दर्द और परेशानी छू तो रहे थे पर हरा नहीं पा रहे थे और मन वैसे ही पुलकित  पेंगे ले रहा था।  इसके हर गम और खुशी, सुख-दुख, आज भी सब मेरे बेहद अपने  ही हैं और मुझे वैसे ही पुलकित या उद्वेलित कर रहे हैं जैसे कि पहले करते थे - जानकर आश्चर्य कम, मन को संतोष  अधिक हुआ ।  अपनों के पास रहो या दूर, पूर्णतः विरक्त और वीतराग हो पाना आसान  नहीं। 


विगत चन्द महीनों में एक-के-बाद-एक, भारत की चन्द यात्राओं का सौभाग्य मिला। पुनः भागदौड़ में नहीं, फुरसत से अपनों के बीच बैठी थी और  सब कुछ बहुत पास से जानने समझने की कोशिश कर रही थी।  बाह्य बदलाव चाहे जितना भी तेज हो, अंतर्मन से  आज भी सब कुछ वैसा ही लगा। वही बेफिक्री और मस्ती...वही बेमतलब के राग द्वेष...सूखा हो या गीला,  प्रायः ढाक के तीन पत्तों-सा वही पुराना राग, हम सभी का सुना-समझा और जाना पहचाना  ... आल्हा-ऊदल और बारामासी-सा कभी सुर में तो कभी बेहद बेसुरा; ' पर हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था।'.. हर नई तकनीकी अपनाता देश  और सुखी व संपन्न होती जनता का आज भी, आजादी के 62 साल बाद भी, भरपेट शिकायतों भरा वही  एक पुराना पिटारा। किसी भी परिस्थिति में खुश न रह पाना शायद आदत होती जा रही है हमारी भी।

हाँ, एक सवाल ' क्यों मैं ही देश से, अपनों से इतनी दूर  भेज दी गई? '  मुझे भी  अक्सर परेशान करता रहता है ।

अपने देश और अपनों से जुड़े रहने की लालसा और तड़प से ही लेखनी का जन्म हुआ  था और   देखते-देखते भारत व  ब्रिटेन में ही नहीं, लेखनी परिवार अब पूरे विश्व में फैल चुका है और हम इस सद्भाव और सौभाग्य ..आपके स्नेह के हृदय से आभारी हैं। कम गौरव और आत्मबल की बात नहीं  यह कि अपने साथ दे रहे हैं...सदा साथ हैं ।  


आप सोच रहे होंगे कि  ' लेखनी' एक छोटी-सी  ई पत्रिका,  इसका और भारत का...विश्व का;  क्या संबंध?  वही, जो शायद बीज और वृक्ष का है। बूंद और लहर का, लहर और नदी का है।  सुरभि का पवन और पवन का जीवन से होता है। स्वप्न से स्वप्न-दृष्टा का ...संकल्प और साध्य का  कर्म से होता है।  पर क्या साहित्य वाकई में लोगों के सोच और संस्कारों में परिवर्तन ला सकता  है...कुछ भी लेशमात्र बदल सकता है? सहित के साथ सामूहिक सोच का कुछ तो असर होगा ही, इतना तो विश्वास है । कम-से-कम संतोष और ढाढस ... जीवन में कुछ उत्साह तो  देगा ही...सोचने पर मजबूर तो  करेगा ही.।  फल की इच्छा से कर्म,  वैसे भी हमारी सोच  या परंपराओं  में  नहीं। 


 अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी ने कभी कहा था कि -यह मत सोचो कि तुम्हारा देश तुम्हारे लिए क्या कर सकता है, यह सोचो कि तुम अपने देश के लिए क्या कर सकते हो।



‘ क्या कर सकता हूँ मैं अपने देश के लिए...किस काम आ सकता हूँ  मैं  इसके? ‘ सवाल हर जागरूक देशप्रेमी के मन में अक्सर उठा करता है। अपने देश को , अपनों को जानने समझने की , उनकी मदद करने की, किसी काम आने की इच्छा स्वाभाविक ही है और यह सवाल जितना व्यक्तिगत और स्वभावजन्य है उतना ही इसका जवाब भी.। योग्यता , आंतरिक और बाह्य परिस्थितियां, सब पर ही तो निर्भर करता है यह...सफलता या असफलता ही नहीं, प्रयासों की परिणति तक।


जवाब को जानने से पहले जरूरी है  बदलती परिस्थितियों को भलीभांति जान पाना। संस्कृति और वर्तमान परिस्थितियों को समझना, बदलते युग के रुचि-रुझान जान लेना। समझना कि देश की वास्तविक जरूरतें क्या हैं और क्या होंगी निकट भविष्य में?  जानना अपने परिवर्तित भूगोल-इतिहास को, संपन्नता और विपन्नता को ।...जानना उस अतीत को जिसपर संस्कृति और सभ्यता की नींव पड़ी  थी और इस वर्तमान को जो आज हमें बांहों में लिए खड़ा है। भविष्य के सपने क्या हैं...जरूरतें क्या हैं और अपेक्षाएँ क्या हैं हमसे? यह सब तभी संभव है जब रुचि गहरी हो, वाकई में प्यार हो।


भारत के संदर्भ में बात करें तो  विभिन्न दार्शनिक , पर्यटक और विदेशी आक्रमकारियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से बहुत कुछ लिखा और बताया है सोने की  इस 'चिड़िया ' के बारे में। यह भी कि आज भले ही इसके नन्हे भूखे-नंगे हों, परन्तु कभी दूध की नदिया बहा करती थीं यहां। पर यह तो लुटेरे, व्यापारियों और कोष व सीमा बढ़ाने को ललायित विदेशी सुल्तानों की नजर थी, स्वजन और परिजनों की नहीं। यदि लूटने नहीं जा रहे और अलग नहीं हैं, तो ' सोने की चिड़िया ' और ' दूध की नदी ' को देखने का हमारा तरीका बाहरवालों से बिल्कुल  भिन्न होगा...चमकते चमकीले  ही नहीं, हमें इसके क्षत-विक्षत और टूटे पर भी दिखेंगे। प्यार, परवाह और संरक्षण की भावना भी निहित होगी हमारी दृष्टि में  । सामूहिक हितों के प्रति जागरूकता और तत्परता भी होगी  इसके प्रति  हमारे  इरादों में ।‘प्यार और लगाव हो तो इच्छित को जानने-समझने, उसके अस्तित्व के विभिन्न पहलुओं की जांच-पड़ताल का क्रम ...आत्मसात करने की यात्रा अपने-अपने तरीके से लगातार और आजीवन करता ही  रहता है व्यक्ति।      

 स्वाधीन भारत आजादी के 63' वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। मुड़कर देखें तो  बहुत कुछ ऐसा हासिल किया है जिसपर हर भारतीयों को गर्व है।आखिर हो भी क्यों न , एक लम्बे संघर्ष और  पूर्वजों की अनगिनित कुर्बानियों के बाद ही तो आज हम इस स्थिति में हैं कि स्वाधीनता का सुख भोग सकें , गुलाम नहीं आजाद देश के नागरिक कहला पाएँ...विदेशों में भी हमने अपना एक मुकाम बना ही लिया है । पर आसान नहीं था संघर्ष, खुद भारत तक को  दो टुकड़ों में बटना पड़ा था, तब  जाकर आजाद हो पाया था...वह भी विभाजित और खंडित। और इस बटवारे की पीर आज भी दोनों ही हिस्सों में कसकती रहती है...दुःख दे रही है।  बमतलब की कटुता और वैमनस्य का कारण बनी रहती है और  दोनों देशों की प्रगति में बाधा बनती आई है। 


सारी चमक-दमक, नाम और शोहरत  के बाद भी कहीं कुछ ऐसा है जो अभी तक सही नहीं लग पाता ...चांद के दाग -सा खटकता ही रह जाता है...आम आदमी की बुनियादी जरूरतें, सहज मानवता और एक-दूसरे के प्रति भरोसे का पूर्ण अभाव... हमारी अपनी व्यक्तिगत सहिष्णुता, बहुत कुछ है जिसकी अनुपस्थिति को हम देखकर, महसूस करके  भी  अनदेखा करने के आदी होते जा रहे हैं। सच बोलना, सच का साथ देना, सरफरोशी की तमन्ना जैसी है आज के हमारे आजाद देश में। आजाद, उच्छृंखल जीवन -शैली हमारी नहीं, पर हमारे चारो तरफ है। आजाद भारत का पर्याय तेजी से पश्चिमीकरण और भौतिकवाद होता जा रहा  है...महाजन वृत्ति है , जो शायद सबको रास नहीं आती , फिर भी सब चुप हैं। परिवर्तन चाहते तो  हैं पर  लाने की, कुछ करने की किसीको कोई जल्दी नहीं, कोई चेष्टा नहीं ।


यूँ तो सब के सब अंधेरों से बहुत बेजार हैं
रोशनी के बास्ते फिर भी नहीं तैयार है -



कमलेश भट्ट कमल


आध्यात्म, स्वाभिमान और सहिष्णुता...जीव मात्र के प्रति सद्भाव और करुणा ही शायद हमारी संस्कृति के मूलमंत्र रहे हैं। इन्ही के सहारे हमने दूसरों को जाना और अपनाया है और इन्ही  ने दूसरों की आँखों में भारत को अपनी विशिष्ट 'भारतीय' पहचान  दी है...पहचान जिसका प्रतिनिधित्व राम और कृष्ण  ही नहीं, गौतम व गांधी ने भी किया है...पहचान जिसका चेहरा आज विश्वीकरण की आँधी में  कुछ-कुछ मटमैला-सा दिख रहा है । 


लेखनी का  यह तीसवां अंक है। देश, संस्कार, संस्कृति ही नहीं, मानवता के  उज्ज्वल भविष्य ; खुद अपनी अस्मिता, अपने योगदान तक को तलाशती, आपकी नन्ही ' लेखनी ' भी कम महत्वाकांक्षी नहीं है, अपने अथक इरादों में ।   


शायद प्रेमचन्द के शब्दों में बात  कुछ और स्पष्ट  हो पाए;


  जब तक साहित्य का काम केवल मनबहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियां गा-गाकर सुलाना;  केवल आंसू बहाकर जी हल्का करना था, तब तक उसके लिए काम की आवश्यकता न थी। वह दीवाना था जिसका गम दूसरे खाते थे। मगर हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो---जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।


क्या हम जगने को तैयार हैं, जगना  चाहते हैं ? बात हताशा या निराशा की नहीं, जीवन की है। अपनों की है।  मौत के बाद कोई वजह नहीं रहती, परन्तु जीने की सौ वजहें  हैं। कवि ' निशंक' की इन पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करती हूँ ;


अभी भी है जंग जारी

वेदना सोई नहीं है,

मनुजता होगी धरा पर

संवेदना खोई नहीं है,




-किया है बलिदान जीवन

निर्बलता ढोई नहीं है

कह रहा हूं ए वतन

तुझसे बड़ा कोई नहीं है।





हर भारतवासी और भारत-वंशी को 15 अगस्त और  सावन में पड़ने वाले दूसरे महत्वपूर्ण पर्व रक्षाबंधन की अशेष शुभकामनाएँ, बधाई व सुखद  और नेहपगी स्मृतियां !


                                                                                                                                     -शैल अग्रवाल            

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                                                                                                                                                                         ए मातृभूमि


                                                                                                                                                             रामप्रसाद बिस्मिल

ऐ मातृभूमि!








ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो।
प्रत्येक भक्त तेरा , सुख -शान्ति-कान्तिमय हो।।

अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में;
संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो।

तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो।।
तेरी प्रसन्नता ही आनन्द का विषय हो।।

वह भक्ति दे कि 'बिस्मिल' सुख में तुझे न भूले,
वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।। 







मेरी भावना









न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
मुझे वर दे यही माता, रहूँ भारत पे दिवाना।

करूँ   मैं  देश  की  सेवा , पड़ें  चाहे  करोड़ों  दुख,
अगर फिर जन्म लूँ आकर तो हो भारत में ही आना।

मुझे हो प्रेम हिन्दी से, पढ़ूँ हिन्दी लिखूँ हिन्दी
चलन हिन्दी चलूँ, हिन्दी पहनना ओढ़ना खाना।

रहे  मेरे  भवन  में  रोशनी  हिन्दी  चिरागों  की
स्वदेशी ही रहे बाजा बजाना राग का गाना।

लगे इस देश के ही अर्थ मेरे धर्म, विध्या, धन,
करूँ मैं प्राण तक अर्पण, यही है सत्य प्रण ठाना।

सम्हल कर पहन ले भारत वदन पर भक्ति का चोला
चढ़ा लो प्रेम की रंगत, दुई का त्याग कर बाना।

नहीं कुछ भी असंभव है जो चाहो दिल में तुम 'बिस्मिल'
उठा  लो  देश  हाथों  पर,  न  समझो  अपना  बेगाना।










तेरे चरणों में सिर नवाऊँ ।








हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में सिर नवाऊँ ।
मैं भक्ति भेंट अपनी, तेरी शरण में लाऊँ ।।

माथे पे तू हो चंदन, छाती पे तू हो माला ;
जिह्वा पे गीत तू हो मेरा, तेरा ही नाम गाऊँ ।।

जिससे सपूत उपजें, श्री राम-कृष्ण जैसे;
उस धूल को मैं तेरी निज शीश पे चढ़ाऊँ ।।

माई समुद्र जिसकी पद रज को नित्य धोकर;
करता प्रणाम तुझको, मैं वे चरण दबाऊँ ।।

सेवा में तेरी माता ! मैं भेदभाव तजकर;
वह पुण्य नाम तेरा, प्रतिदिन सुनूँ सुनाऊँ ।।

तेरे ही काम आऊँ, तेरा ही मंत्र गाऊँ।
मन और देह तुझ पर बलिदान मैं जाऊँ ।।


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                                                                                                                                                                15 अगस्त-2009


झंडा ऊंचा रहे हमारा








विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

सदा शक्ति बरसाने वाला
प्रेम सुधा सरसाने वाला
वीरों को हरषाने वाला
मातृ-भूमि का तन-मन सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

इस झंडे के नीचे निर्भय
है स्वराज का सुंदर निर्णय
बोलो भारत माता की जय
स्वतंत्रता है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

आओ प्यारे वीरों आओ
देश धर्म पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिलकर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा

इसकी शान न जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय करके दिखलाए
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा


                -श्यामलाल गुप्ता 'पार्षद'













स्वतंत्रता का दीपक




घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रता दिया,
रुक रही न नाव हो, ज़ोर का बहाव हो,
      आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
      यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है!

यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना,
यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना,
शांति हो, अशांति हो, युद्ध, संधि क्रांति हो,
      तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं!
      देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है!

तीनचार फूल है, आसपास धूल है
बाँस है, बबूल है, घास के दुकूल है,
वायु भी हिलोर से, फूँक दे, झकोर दे,
      कब्र पर, मजार पर, यह दिया बुझे नहीं!
      यह किसी शहीद का पुण्य प्राणदान है!

झूमझूम बदलियाँ, चूमचूम बिजलियाँ
आँधियाँ उठा रहीं, हलचलें मचा रहीं!
लड़ रहा स्वदेश हो, शांति का न लेश हो
      क्षुद्र जीतहार पर, यह दिया बुझे नहीं!
      यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है!

                            - गोपालसिंह नेपाली 


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                                                                                                                                                       कविता धरोहर


                                                                                                                                                   सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

अजनबी देश है यह








अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।








 


रंग तरबूजे का








रंग तरबूजे का
महक खरबूजे की !

 

रो-गाकर आजादी लाए
पहन लंगोटी खादी,
चार कदम भी चल नहीं पाए
इतनी चढ़ गई बादी
रंग तरबूजे का
महक खरबूजे की !
अमरीका में डांस करें
औ’ रूस में मारें कुश्ती
देखो अपने नेताओं की
यारों धींगा मुश्ती।
रंग तरबूजे का
महक खरबूजे की !

 

 

 

घन्त मन्त दुई कौड़ी पावा










घन्त मन्त दुई कौड़ी पावा
कौड़ी लै के दिल्ली आवा,

दिल्ली हम का चाकर कीन्ह
दिल दिमाग भूसा भर दीन्ह,

भूसा ले हम शेर बनावा
ओह से एक दुकान चलावा,

देख दुकान सब किहिन प्रणाम
नेता बनेन कमाएन नाम,

नाम दिहिस संसद में सीट
ओह पर बैट के कीन्हा बीट,

बीट देख छाई खुशिहाली
जनता हंसेसि बजाइस ताली,

ताली से ऐसी मति फिरी
पुरानी दीवार उठी
नई दीवार गिरी।

 

 




भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं।









भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं।
उसे तबतक घूरो
जब तक तुम्हारी आंखें
सुर्ख न हो जाएं।
और तुम कर भी क्या सकते हो
जब वह तुम्हारे सामने हो?










जब भी









जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।

झपटता बाज,
फन उठाए सांप,
दो पैरों पर खड़ी
कांटों से नन्ही पत्तियां खाती बकरी,
दबे पांव झाड़ियों में चलता चीता,
डाल पर उलटा लटक
फल कुतरता तोता,

या इन सबकी जगह
आदमी होता।

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                                                                                                                                                              माह के कवि


                                                                                                                                                                नरेश शांडिल्य

क्या हम भी औरों-से होंगे






 





क्या हम भी औरों से होंगे
इक दिन ऐसा भी आएगा
पांव हमारे जब कालीनों
की कोमलता को चूमेंगे

 
किस्मत एक दिन रंग लाएगी
औ हम सत्त-दौलत की
बस्ती-गलियारों में घूमेंगे                                                                                                                                                              क्या हम पर भी धन-सत्ता का
तब मस्ताया नशा चढ़ेगा

 
क्या हम भी मूल्यों, आदर्शों
की कोरी बकवास कहेंगे

 
क्या हम भी लड़खड़ा जाएंगे
खुदगर्जी-झंझावातों में

 
इस मिट्टी को बंजर कहकर
उड़ जाएंगे आकाशों में

 
जिस गोदी ने हमको पाला
जिन हाथों ने हमें संभाला

 
जिन आंखों के तारे हैं हम
जिन सांसों के वारे हैं हम

 
जिसका दूध रगों में बहता
जिसका लहू हृदय में रहता

 
जिसने निःश्छल प्रीत लुटाई
जिसने हम पर वारी ममता

 
अपना जिगर काटकर देना
भी जिसकी नजरों में कम था

 
हमको सूखे में रखने को
जो मिट्टी गीले में सोई

 
इक दिन खुशियां घर लौटेंगी
इस लालच में बरसों रोई

 
लत्ते बेचे, गहने बेचे
खुद को तीर तीर कर डाला

 
हम पर मोती वारे जिसने
तोड़ गले से अपनी माला

 
ऐसी माँ, ऐसी मिट्टी को
रिश्तों की भीगी चिठ्ठी को

 
जब फाड़ेंगे इन हाथों से
क्या हमको कुछ पीर न होगी
क्या हमको कुछ दर्द न होगा

 
माँ के उर को ऊसर कहकर
माँ का दर ठुकराने वाले

 
हम भी क्या बेपेंदी वाले
उन काले-गोरों से होंगे

 
क्या हम भी औरों से होंगे

 
राजा आएँगे, जाएँगे
कुछ यश. कुछ अपयश पाएँगे

 
मगर देश फिर देश रहेगा
फर्ज हमारा शेष रहेगा

 
राजा नंगा है कहने से
ही अब इति-श्री न होगी

 
आओ हम दर्पण में झाँकें
अपनी औकातों को आँकें

 
बैठें, सोचे, खोजें ये सब
किसने लूटा अपना वैभव

 
किसने लूटा देश हमारा
किसने लूटा भाईचारा
किसने लूटा अमन हमारा
किसने लूटा सब्र हमारा

 
जो भी उनके साथी निकले
वो स्वदेश के घाती निकले

 
क्या हम भी ईमान बेचकर
संस्कार, सम्मान बेचकर

 
निष्ठुर मन के, सज्जन दिखने
वाले, उन चोरों से होंगे

 
क्या हम भी औरों से होंगे

 
यह मिट्टी जहाँ वेद मिले थे
राम-कृष्ण के कमल खिले थे

 
यह मिट्टी गीता की मिट्टी
यह मिट्टी सीता की मिट्टी

 
यह दधीचि की अस्थि मिट्टी
हरिश्चन्द्र की सच्ची मिट्टी 

 
यह विक्रम की खड्ग सरीखी
शक-हूणों के रुधिर सनी-सी

 
यह मिट्टी राजेन्द्र चोल की
दक्षिण के वैभव अमोल की

 
यह द्रविड़ की दिव्य आरती
जिसके गायक सुकवि भारती

 
यह अशोक के प्रियदर्शन-सी
यह कलिंग के परिवर्तन-सी

 
यह मिट्टी नालन्दा वाली
चन्द्रगुप्त-चाणक्यों वाली

 
यह मिट्टी कबीर की मिट्टी
यह नानक-रहीम की मिट्टी

 
यह प्रताप की हल्दी घाटी
वीर शिवा के गढ़ की माटी

 
यह लक्ष्मी बाई की झाँसी
यह गाँधी की काबा-काशी

 
यह उत्तुंग-हिमालय वाली
गंगा-सी नदियों की पाली

 
यह छः ऋतुओं की पटरानी
जिसका नहीं विश्व में सानी

 
यह मिट्टी यह मेरी मिट्टी
यह मिट्टी यह तेरी मिट्टी

यह मिट्टी हम सबकी मिट्टी
यह मिट्टी यह रब की मिट्टी

 
जिसे विवेकानन्द ने अपने
हाथों में लेकर चूमा था

 
जिसके परचम को लेकर वो
देश-विदेश में घूमा था

 
अब इस मिट्टी के प्रसून की
रंगत पल-पल बिगड़ रही है

 
इसकी ओस, तितलियां, खुशबू
देखो दर-दर भटक रही है

 
ये अतीत के तथ्य हमें अब
क्योंकर लगते हैं सपने-से

 
इसकी वजह पूछनी होगी
हमको आज स्वयं अपने से

 
जिस मिट्टी के सुमन ने हमको
अब तक केवल दिया-दिया है

 
क्या हमने भी इसकी खातिर
अपना कुछ कर्तव्य किया है

 
आज सुमन की आंखें नम हैं
इसे चाहने वाले कम हैं

ऐसे बेदर्दी-मौसम में
सोचें आज कहाँ पर हम हैं

 
साथ छोड़कर चले गए जो
हां, इस मुरझा रहे सुमन का
क्या हम भी तन-मन के काले
उन कृतघ्न भौरों-से होंगे

 
क्या हम भी औरों से होंगे 











आजादी के चाँद पर, बँटवारे का दाग।
मन में लेकर मुहर्रम, कैसे खेलूँ फाग।।

 

मैने देखा देश का, बड़ा सियासतदान।
न चेहरे पर आँख थी, न चेहरे पर कान।।

 

राजा तुझको माफ हैं, यों तो सौ-सौ खून।
लेकिन किसी गरीब का, गीला मत कर चून।।

 

बस कल से मत डालना इस घर में अख़बार।
रोज़-रोज़ कैसे सहे, इतना अत्याचार।।

 

झोपड़ियों की लाश पर, खड़ी महल की लाट।
शाही जाज़िम के लिए, उघड़े लाखों टाट।।

 

कहते, सुनते, देखते, बुरा-बुरा सब ओर।
गांधी के बन्दर हुए, लोभी, लंपट, चोर।।

 

सदी चढ़ी इककीसवीं, बदी खड़ी मुंह बाय।
मुमकिन है बदलाव पर, बीड़ा कौन उठाय।।

 

जाने वाले वक्त की बता रही है चाल।
आने वाले वक्त में, बदतर होंगे हाल।।

 

अंग्रेजी का कलेण्डर, ऐसा आया रास।
भूले हम अपने दिवस, अपने सम्वत् मास।।

 

अंग्रेजी में क्या रंगे, हालत हुई अजीब।
ना अपनी तारीख अब, ना अपनी तहज़ीब।।

 

नहीं बपौती किसी की, ज्ञान और विज्ञान।
धूप-हवा पर सभी का, हक है एक समान।

 

पैसा ऐसा है अगर, मैं फक्कड़ की ठीक।
बची रहे इन्सानियत, बेशक माँगू भीख।।

 

दौलत की लत ना पड़े, सिर को चलूँ उठाय।
इतना ही दे रामजी, बस इज्जत रह जाय।।

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                                                                                                                                                    कविता आज और अभी


                 मेले में








घर वापस जाने की सुध-बुध बिसराता   है   मेले   में
लोगों की रौनक में जो भी  खो  जाता   है    मेले  में


किसको याद आते हैं घर के दुखडे,झंझट  और झगड़े
हर कोई खुशियों में खोया मदमाता    है     मेले   में


नीले-पीले,लाल ,गुलाबी   पहनावे   हैं     लोगों      के
इन्द्रधनुष     का सागर  जैसे   लहराता    है  मेले    में


सजी -सजायी हाट -दुकानें ,खेल-तमाशे   और   झूले
कैसा - कैसा रंग  सभी का  भरमाता     है  मेले    में


जेबें  खाली  कर  जाते  हैं  क्या बच्चे और क्या    बूढे
शायद  ही  कोई  कंजूसी   दिखलाता    है    मेले     में


तन तो क्या मन भी मस्ती में झूम उठता है हर इक का
जब बचपन का दोस्त अचानक  मिल जाता है मेले में


जाने - अनजाने लोगों में फर्क नहीं   दिखता     कोई
जिस से बोलो वो अपनापन  दिखलाता  है     मेले      में


डर कर हाथ पकड़ लेती हैं हर माँ अपने बच्चे     का
ज्यों ही कोई बिछडा   बच्चा  चिल्लाता  है    मेले     में


ये दुनिया  और दुनियादारी   एक   तमाशा  है      भाई
हर बंजारा     भेद     जगत के समझाता   है    मेले     में


रब  न करे ,कोई बेचारा मुंह   लटकाए    घर     लौटे
ज़ेब अपनी कटवाने   वाला     पछताता     है     मेले     में


राम करे ,हर गाँव - नगर  में मेला हर दिन  लगता  हो
निर्धन   और   धनी  का  अंतर  मिट जाता  है  मेले   में  


                                                 प्राण शर्मा 








         छोड़ आया हूँ










हरी धरती,खुले नीले गगन को छोड़ आया हूँ
कि कुछ सिक्कों की खातिर मैं वतन को छोड़ आया हूँ.


विदेशी भूमि पर माना लिए फिरता हूँ तन लेकिन
वतन की सौंधी मिट्टी में मैं मन को छोड़  आया हूँ


पराये घर में कब मिलता है अपने घर के जैसा सुख
मगर मैं हूँ कि घर के चैन-धन को  छोड़ आया हूँ


नहीं भूलेगी   जीवन भर वो सब अठखेलियाँ  
अपनी जवानी के सुरीले   बांकपन     को     छोड़    आया हूँ


समायी  हैं  मेरे मन  में अभी तक खुशबूएं    उसकी
भले  ही फूलों से महके   चमन को    छोड़    आया  हूँ 


कभी  गाली, कभी  टंटा कभी   खिलवाड़   यारों    से 
बहुत पीछे   हंसी  के उस चलन  को  छोड़    आया   हूँ 


कोई हमदर्द था अपना कोई  था   चाहने      वाला 
ह्रदय के   पास  बसते    हमवतन    को   छोड़   आया  हूँ


कहाँ   होती है   कोई मीठी  बोली अपनी   बोली    सी 
मगर मैं " प्राण "  हिंदी की फबन   को  छोड़   आया हूँ           


                                                        प्राण शर्मा









        कैसी दौड़!









यह कैसी दौड़ है?
यह अंधी दौड़ है
बिना रेफरी की दौड़ है

 

न कोई पाबंदी, न लिहाज, न मुरव्वत
अपनी ही दौड़ में मशगूल है हर इंसान
न साथी की चिंता, न किसी की खबर
अपनी ही दौड़ में मस्त बिना जाने अंजाम

यह कैसी दौड़ है?

 
दौड़ रहे हैं सब अटकलों पर दिशाभ्रान्त
पर दूसरों के हारने पर आती है मुस्कान
गोया, किसी की हार अपनी जीत का बन जाता है पैगाम
कब, कहां अपना हो ऐसा ही हाल नहीं जानता यह अनजान

यह कैसी दौड़ है?

 
बहुतों को तो यह भी नहीं पता है
कि दौड़ना कहाँ तक है
बस दौड़ ही दौड़ का ध्येय है
अदृश्य मंजिल की ओर दम फुलाए दौड़ता ही जाता है

यह कैसी दौड़ है?

 
यह कैसी दौड़ है?
यह अँधी दौड़ है
बिना रेफरी की दौड़ है

        - स्नेह ठाकुर




 

आँगन की कच्ची मिट्टी









अपने छोटे से मकान के पिछवाड़े
लगा रखी है मैने फुलवाड़ी
क्योंकि मुझे शौक है फूलों का

 
तुमने अपने आलीशान स्वर्ण-महल के पीछे
बना लिया है पक्का चबूतरा
और एक कोने में
सोने चांदी से बने कटघरे में
उगाए हैं बारूद के पौधे
जो अपनी विषाक्त सासें उगल-उगल
झुलसा रहा हैं वातावरण

 
मुरझा रहे हैं हरे-भरे खेत
उड़ रहा है जीव-जन्तुओं का चैन
धरती में पड़ गई दरार
खलबला उठा समन्दर का पानी

 
तुम मुस्कुरा रहे हो व्यंग्य से
देख मेरी छोटी-सी फुलवाड़ी।

 
हां,
शायद मेरा प्रयत्न नगण्य है
या शायद नहीं भी
शायद मेरा यह छोटा-सा प्रयास
क्रांति की चिंगारी बन
जगा दे विस्तृत जागृति

 
बारूद की जानलेवा ज़हरीली दुर्गंध की अपेक्षा
मजबूती से धरती पकड़े
मेरे फूल-पौधों की जड़ें
लहरा दें हर दिशा में सुगंध ही सुगंध,
इसी आशा से छोड़ रखी है मैने
आँगन में अपने अस्तित्व की कच्ची मिट्टी

                            स्नेह ठाकुर









   गांव का गजोधर









गांव से चलकर
आ पहुंचे हैं
शहर गजोधर भइया।
गाड़ी, मोटर
रेल्मपेल्ला
देखा
ठेलम् ठेला।

आ पहुंचे जब
बस अड्ड़े पर
चिल्लम पौं का भोंपू
बार-बार वे
जेब टटोलत
कहीं न कट ये जाये।

पूछ-पाछकर
बैठै बस में
जगह न तिलभर पाई
खडे  गजोधर
जेब टटोले
अभी सलामत ठहरी।

टिकी निगाहें
पारखी झट से
घेरा उसकोे सबने
टागे-पीछे
धक्का मुक्का
पता नही क्यों होता।

पल में हल्की
भीड़ हो गई
राहत गजोधर पाये
जेब पे हाथ गयो
जब हाय ये
कैसे कटगई भाई?

पल में सपने
चूर हो गये
सब अरमान
तो टूट ही गये
सच ही कहा था
संभल के रहना
लेकिन इससे अधिक क्या करता
हाथ जेब पर
जेब हाथ पर
लेकिन दिल्ली के चोरों ने
शायद मेरे ही हाथों से
जेब ये काटी
मेरी शायद।
हाय मैं कैसे अब
घर जाऊँ
कैसे अब सामान
ले जाऊँ?
यों हि गजोधर
सोच रहे थे
कैसे - कैसे
लोग यहां है
लगते सब सूरत से
भोले
लेकिन लगता सब
पहुंचे हैं
पल में
सब कुछ
कर यों ड़ाला
जैसे अकल को
मार गया था पाला
लेकिन कब अरू
कैसे काटी
मेरा हाथ तो
जेब पे ठहरा
कैसे उसने काटी भइया।।


             -दिनेश ध्यानी



जन्तर-मन्तर की संतानें









जन्तर-मन्तर की संताने
देखो कैसी चादर ताने,
कल तक दाने-दाने फिरते
अब दोनों हाथों से खाते।
जन्तर-मन्तर जब से आये
तब से दीन-हीनता भागे
इनकी हर दिन भई दिवाली
जन्तर-मन्तर गुल्लक खाली।

जन्तर-मन्तर से जो जन्मे
इनकी करनी अजब अजूबे
गांधी की सूरत पर मरते
इसकी खातिर कुछ भी करते।

जन्तर मन्तर से हैं चमकें
कुछ नेता कुछ क्रातिंवीर हैं
गांधी नोट की पूजा करते
लोगों निसदिन हैं ठगते।

कलमकार है कुछ अतिवादी
जो लोगों को लड़ा रहे हैं
जातिवाद नारा देकर
अपनी रोटी चला रहे हैं।

जन्तर-मन्तर की संतानें
देखो कैसा नाटक करते
आन्दोलन की आड़ में देखो
अपना घर अब भी ये भरते।।


                    -दिनेश ध्यानी

 


 






जय जय सीताराम








पेड़ नहीं जब आम के, कैसी कोयल कूक।
काँव-काँव कौए करें, यूकिलिप्टस मूक।।



नदी काटती गाँव को , जनजीवन संचार।
कृषक बेचारा क्या करे, अपढ़ लंठ लाचार।।



अमला-सरकारी बना, सबका तारनहार।
अंधा बाँटे रेवड़ी, अपने ही परिवार।।



हेलिकॉप्टर ले उड़ा, मंत्री जी को भोर।
नभ में उड़ता देवता, मरभुक्खों में शोर।।



नोन-तेल-लकड़ी भई, घर-घर का जपनाम।
मदिरालय मंदिर भया , जय-जय सीताराम।।


                                          सुधाकर अदीब








   सबसे मँहगा न्याय








जंगल बीच मचान का, है अजीब पैबंद।
शांतिपूर्ण माहौल में, हिंसा का छलछंद।।



इक हड्डी के वास्ते, जैसे लड़ते श्वान।
सत्ता के संघर्ष में पगलाते इँसान।।



अपने-अपने स्वार्थ में, मरते-खपते लोग।
रोम-रोम में व्याप्त है, राजनीति ज्यों रोग।।



वाणी में चातुर्य हो, डाकू हो घनघोर।
संसद में साधू बना, फिरता पक्का चोर।।



बुरे-भले का फर्क भी, रहा नहीं जग माँय।
सबसे सस्ता  झूठा है, सबसे मँहगा न्याय।।


                                      सुधाकर अदीब    











    गेहूं का रंग









कल लंदन की एक बस्ती में
मेरे पिता से
वृद्ध दिखने वाले पर
उछालता हुआ
बियर का कैन
निकल गया कोई अँग्रेज।

पहले मन में आया
कि भिड़ जाऊँ उस गोरे से
फिर देख कर
सहमी सी लकीर
उस वृद्ध के चेहरे पर
मैने थाम लिया उसका हाथ
और महसूस किया
उस स्पर्श से
उनके कदमों की
बढ़ती हुई शक्ति को।

वे बोले “कहाँ से हो?”
मैने कहा “लखनऊ से, और आप?”
वे बोले “लाहौर से।“

तब से
आने लगी है मुझे
हर ‘गेहुंए’
गेहूं के रंग में
अपने परिवार की महक।


         - पद्मेस गुप्त 

 

 

 
दोहरी नागरिकता









एक नए स्वप्न में जी रहे हैं
आजकल कृष्ण,
किसी ने उनसे कहा है
कि वे अब
दोनों के साथ रह सकते हैं,
यशोदा के भी और देवकी के भी !

 
अब उन्हें नहीं
देना पड़ेगा तौल कर
इस प्रश्न का उत्तर
कि वे किससे अधिक प्रेम करते हैं
यशोदा से, या फिर देवकी से!
उतारना चाहते हैं वे कोख का कर्ज
निभाना चाहते हैं वे कुछ फर्ज
देवकी के गांव पर
बिना छोड़े यशोदा की अँगुली
जिसे पकड़ कर
आज खड़े हैं कृष्ण
अपने पाँव पर।
मुक्त हो जाएंगे अब वे
तन और मन
के बँटवारे से,
नहीं उठेंगे
अब उनकी निष्ठा पर कोई सवाल,
नहीं कहलाए जाएंगे
वे अपनों के बीच पराए,
सिर्फ भाव, शब्द या इतिहास ही नहीं
दे सकेंगे वे
कुछ अधिकार भी
जन्मभूमि के
विरासत में,
चल सकेंगे
दोनों माँओं
के हाथों को
थाम कर अब कृष्ण।

 
इस नए स्वप्न में
दोहरी नागरिकता के
जी रहे हैं आज
विश्व के कोने कोने में
फैले हुए
भारत के कृष्ण।

       -पद्मेश गुप्त

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                                                                                                                                                                           मंथन


                                                                                                                                                        -वाल्मीकि प्रसाद सिंह

 भारत का नव निर्माण

नव प्रवर्तनकारी, मनोवृत्तिपरक एवं सांस्थानिक अनुक्रियाओं के लिए विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन अपेक्षित है। समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर भारत का सम्मिलित एवं समावेशित संस्कारों का निर्माण करने की जरूरत है। यह निश्चित रूप से उस समाज के लिए उतना कठिन भी नहीं है जो अतीत में मेल-मिलाप से रहा और विभिन्न विचारों का आत्मसात किया तथा विशेष रूप से धार्मिक क्षेत्र में 33 करोड़ देवी-देवताओं के लिए छविओं और प्रथाओं का सर्जन किया। पश्चिम और संसार के अन्य भागों में ईसाइयत और इस्लाम के आगमन से काफी पहले से भारत हिंदुत्व, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के बीच सभ्यतापरक आजमाइश की महतवपूर्ण क्रीडास्थली था। यहूदि धर्म और ईसाइयत- दोनों प्रथम शताब्दी में भारत आए। इस्लाम ने भी भारतीय प्रायद्वीप के तटवर्ती नगरों में 8वीं शताब्दी के बाद प्रवेश किया। 9वीं शताब्दी में पर्शिया के जरथ्रुष्टियों (पारसी) ने जब मुस्लिम आक्रमणकारियों से अपने धर्म के प्रति खतरा महसूस किया, तो वे भारत के उत्तरी-पश्चिमी तट की ओर चले गए। उनके वंशज आज भी वहां विद्यमान हैं और पारसियों के रूप में जाने जाते हैं। 15 वीं शताब्दी में सिख धर्म का जन्म हिंदुत्व और इस्लाम के संघर्षरत विरोध के मध्य शांति लाने के उद्देश्य से हुआ था। विगत शताब्दी में जब तिब्बतियों ने अपने धर्म और संस्कृति के प्रति खतरे को महसूस किया तो उन्होंने शरण के लिए भारत को चुना और उनकी एक बड़ी जनसंख्या आज यहां निवास करती है।

सांस्कृतिक बाहुल्य भारत की सम्यतापरक अनुभूतियों की एक बुनियादी विशेषता है। भारत अपने आचरण में स्वभाव से नास्तिक नहीं है बल्कि धर्मों का सम्मुचय है। यह भारत में भाईचारे से युक्त जीवन की ही विशेषता थी कि महात्मा गांधी- एक धर्म परायण हिन्दू –अपनी प्रार्थना सभा में सभी प्रमुख ग्रन्थों के अवतरणों को पढ़ा करते थे। भारत में धर्म-निरपेक्ष नीतियां यह सुनिश्चित करती हैं कि राष्ट्र धर्म के मामले में निष्पक्ष रहेगा। किंतु सांस्कृतिक बाहुल्य विभिन्न आस्थाओं और विश्वास के तरीकों के समृद्ध होने की अपेक्षा रखता है। धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक भिन्नता लोकनीति के निर्माण के लिए आधार प्रदान करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि विवादों को संवाद के माध्यम से सुलझा लिया जाएगा और संसार के विभिन्न भागों में होनेवाली चिंतन प्रक्रिया में विचारों के प्रवाह में कोई अवरध नहीं आएगा।

यह सत्य है कि लोकतंत्र आतंकवाद के प्रति क्षीण होते हैं, क्योंकि लोकतंत्रिक मान्यताएं ठोस आतंकवाद विरोधी कार्यवाही में सुस्त होती हैं। गहन निगरानी, स्वतंत्रता पर रोक-टोक, कार्यकलापों पर प्रतिबंध एवं अन्य ऐसी थका देने वाली सुरक्षा प्रक्रियाएं लोकतंत्र में अत्यधिक अलोकप्रिय हैं क्योंकि यह नागरिकों की जीवन गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। लेकिन फिर भी दीर्घकाल में मात्र अपनी एकता और दृढ़ निश्चय के बल पर लोकतंत्र आतंकवादी शक्तियों को पराजित कर देंगे।

यह जगप्रसिद्ध है कि जिस औद्योगिक क्रांति ने यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका पर गहरा प्रभाव डाला, भारत उससे अछूता रहा। सौभाग्य से भारत संसार भर में सूचना और संचार क्रांति के प्रमुख केन्द्रों में से एक है। सौफ्टवेयर एवं व्यवसाय प्रक्रिया बाह्य साधनाधारित आयात द्रुत गति से बढ़ रहे हैं। इस ज्ञानाधारित उद्योग की सामर्थ्य इस बात से देखी जा सकती है कि आज भारत संसार की प्रमुख कंपनियों को उत्तम सेवाएँ प्रदान करता है।

हाल ही के वर्षों में आर्थिक क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां निश्चय ही प्रभावशाली है। भारतीय अर्थव्यवस्था ने 1980 से 2002 तक प्रतिलर्ष 6 प्रतिशत और 2002 से 2006 तक प्रतिवर्ष 7 प्रतिशत से अधिक की संवृद्धि दर्शायी है। मध्यवर्गीय भारतीयों की संख्या 25 करोड़ है। फिर भी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और राजस्थान में गरीबों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए इसे 20 करोड़ और बढ़ाने के लिए संगठित नीतिगत कार्यवाई की आवश्यकता है। भारत की नई नई आर्थिक नीति ने व्यवसायी वर्ग की सर्जउर्जा को, उन मध्यस्थ नीतियों को हटाकर उदार किया है जिसने राजनीतिज्ञों और लोकसेवकों को अत्याधिक विवेकाधिकार प्रदान किए। निपुणता, उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धा पर अभूतपूर्व ध्यान दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में सत्यनिष्ठा पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि भारतीय चेतना अब भी नैतिक मूल्यों को पर्याप्त महत्व देती है। जनजीवन में यही सत्यनिष्ठा आर्थिक निपुणता और पारदर्शी कार्यनैतिकता से जुड़ी हुई है, इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सूचना का अधिकार ( सूचना का अधिकार अधिनियम-2005) भ्रष्टाचार पर रोक लगाने, अन्याय के विरुद्ध लड़ने और सरकार को पारदर्शी बनाने में जनसामान्य के हाथों में एक प्रभावशाली अस्त्र के रूप में उभरा है।

भारतीय महिलाओं के मध्य एक निःशब्द क्रान्ति उत्पन्न हो रही है। भारत के लोकतंत्र ने 12 लाख मनोनीत महिला कर्मचारियों की सहभागिता को सुनिश्चित किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग 10 लाख सक्रिय महिला अल्प-वित्त कामगारों द्वारा संपोषित हो रही है और एक अरब के इस देश में आधे से अधिक कामकाजी महिलाएं हैं। पंचायती राज के विकेन्द्रीकरण के अनुभव गरीबी का उन्मूलन करने में आवश्यक प्रेरणा प्रदान कर सकते हैं।

आज के भारत में लोकतंत्र समावेशन (मेल मिलाप) का समर्थन करता है ( जाति और धार्मिक स्तरों पर ध्रुवीकरण के बावजूद) और यह भारत की प्रमुख भाषओं में शिक्षा और इंटरनेट सुविधाओं की उपलब्धता के जरिए आगे बढ़ेगा। इसका एक अर्थ बेहतर शासन, एक अधिक जीवंत समाजतथा बाजार और हमारी जनता की समृद्धि भी होगा। हमें ऐसे वातावरण का निर्माण और संपोषण करना है जो स्पर्धा, निपुणता और समावेशन को समर्थ और प्रोत्साहित करेगा। इसके लिए हमें नूतन विचारों पर आधारित अभिनव नीतियों और नए कार्यक्रमों की आवश्यकता है और इन नीतियों को कार्यान्वित करने हेतु आवश्यक है निर्भीकता और संकल्पशक्ति। संवाद लोकतंज्ञ का एक अनिवार्य गुण –इसे सुनिश्चित करेगा।                      

भविष्य का भारत

मैं भारत के इतिहास का जिज्ञासु विद्यार्थी रहा हूँ। मैने अपने देश को समझने में घटनाओं के शासक-केन्द्रित वृतांत की रूढ़िवादी सोच में कमियां पाई हैं। इसलिए मैने संतों, रहस्यवादियों, कवियों तथा मूर्तिकारों, वैज्ञानिकों एवं अभियंताओं किसानों और शिल्पकारों की वाणी सुनने का प्रयास किया। मैंने औरों की अपेक्षा अपने गांवों में रहने वाले साधारण लोगों से बहुत कुछ सीखा। मैने यही पाया कि हमारे देश को समझने में लोक साहित्य एवं लोककथाएं वैज्ञानिक अविष्कारों, आर्थिक प्रक्रियाऔं और राजनीतिक घटनाओं जितनी ही महत्वपूर्ण हैं।

गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी ने मुझे इस बात का कायल कर दिया कि प्रतिशोध और हिंसा के लम्बे इतिहास के बावजूद सत्य और अहिंसा ने भारत के हृदयस्थल में निवास किया है। महाभारत की विपत्तियों का यही संदेश है कि प्रतिशोध के कारण कृष्ण और उनके वंश सहित लगभग सभी का विनाश हुआ। सबक स्पष्ट है कि हिंसा और प्रतिशोध उच्छृंखल समाज तथा नैतिकता और भावनाओं के ऊसर का कारण बनते हैं। इसी संदर्भ में मैंने पाया कि आशा और विश्वास के साथ दूसरे व्यक्ति के सत्य के दृष्टिकोण के प्रति आदरभाव ने भारतीय जनजीवन की समृद्धि में महान रूप से योगदान किया है। ऋगवेद में यह सर्वोत्तम ढंग से व्यक्त हुआ है कि सत्य एक ही है संत उसका वर्णन नाना रूपों में करते हैं।

मेरा अनुमान है कि ‘ एक सत्य अनेक अभिव्यक्तियां ‘- इस पद्धति का सूत्रपात हमारे ऋषियों द्वारा नैसर्गिक पदार्थों की जटिलताओं, उनके अंतसंबंध दोनों को समझाने तथा समाज में विविध आस्थाओं और रियाजोंवाले लोगों के सौहाद्रपूर्ण जीवन के लिए किया होगा। बौद्ध पद्धति न केवल सभी दृष्टिकोणों के समान आदर पर बल देती है बल्कि यह एक ऐसी वृत्ति को आत्मसात् करने की मांग भी करती है जिसमें एक व्यक्ति यह समझता है कि दूसरे व्यक्ति का दृष्टिकोण संभवतः उचित हो सकता है और यही महत्वपूर्ण है। उन लोगों के दृष्टिकोण जिनसे आप पूरी तरह सहमत नहीं हैं, को समझना ही एक ऐसे समाज के निर्माण को सीखने की ओर पहला चरण है जो ऐसे मतभेद को दूर करता है।

जैसे-जैसे हम समस्त देश का भ्रमण करते जाते हैं, भारत की संस्कृति की विलक्षणता और मानवता के प्रति इसके योगदान के प्रति लोगों में व्याप्त भावप्रवण धारणा से अवगत होते जाते हैं। भारत का संविधान यह स्पष्टतः व्यक्त करता है कि यह भारत की जनता है जो आनेवाले समय में यह निर्णय करेगी कि भविष्य में यह किस प्रकार का देश होगा।

कोई भी एक ऐसे भारत की तस्वीर बना सकता है जो घोर गरीबी का उन्मूलन करने, अपने समाज को सामंजस्य प्रदान करने और शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में सफल होगा। अपनी प्राचीन सभ्यता के साथ-साथ अपने नैतिक दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए इसे एक सशक्त एवं प्रभावशाली राष्ट्र बनना है। हालांकि इसके संप्रदायगत समूह पनप सकते हैं फिर भी भविष्य के भारत को ऐसा दिखना चाहिए जैसा संविधान की प्रस्तावना हम सबको इसके निर्माण का आदेश करती है- ‘ एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र ‘।

मेरा भावी भारत

21 वीं सदी के प्रथम दशक में, मुझे आश्चर्य हुआ कि मेरे नाती-पोते और उनके बाद वाली पीढ़ियां कैसा भारत पाएंगे। आगामी वर्षों में आर्थिक और राजनैतिक तौर पर एक विश्वव्यापी प्रतियोगी के रूप में भारत का उद्भव और साथ ही भारत की सांस्कृतिक विरासत का महती बोध स्पष्ट है। भारत में विशेषकर 1947 से अब तक हुए विकास ने मुझे यह विश्वास दिलाया है कि नई सहस्त्राब्दि में हम सभ्यतापरक उपलब्धियों या आर्थिक क्षमता के रूप में विश्व का सामना खाली हाथ नहीं करेंगे। हममें से कई चीन और भारत की हालिया तीव्र आर्थिक संबृद्धि को वैश्विक अर्थव्यवस्था और राज्य व्यवस्था के ऊपर उनके आधिपत्य के तौर पर देखते हैं।

मैं यह भी विश्वास करता हूं कि कल का भारत गरीबी और निरक्षरता के संकटों से मुक्त होगा। भारतीय समाज और शासन व्यवस्था जब तक साहित्य और कला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में सर्जनात्मक सोच को प्रोत्साहित करेंगे तथा लोकतांत्रिक संस्थानों और एक सम्मिलित सोच और न्यायोचित समाज व्यवस्था को प्रमुखता देते रहेंगे, इसकी पुरातन सभ्यतापरक क्षमता निरंतर नूतना प्राप्त करती रहेगी।

भारत का इतिहास, इसकी उपलब्धियां और त्रुटियां कभी-कभी मुझे प्रसन्न कर देती हैं और कभी-कभी मुझे विवषशतावश खिन्नता होती है। किंतु मुझे सदैव गर्व अनुभव होता है, संकुचित राष्ट्रवादी भाव से नहीं बल्कि मूल्यों के व्यापक अर्थ में, जो भारत अपनी संतानों को प्रदान करता हैः एक सरल जीवन शैली, पारिवारिक एकात्म, दूसरों के दृष्टिकोणों के प्रति सहिष्णुता, आध्यात्मिक अन्वेषण तथा परिस्थितिकी के प्रति आदर। भारत को समझने की यह यात्रा सदा रोचक एवं निरंतर है और दृष्टि के आगे कोई पूर्ण विराम नहीं।          

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                                                                                                                                                            परिचर्चा


                                                                                                                                                          -मुँशी प्रेमचन्द

महाजनी सभ्यता




जागीरदारी सभ्यता में बलवान भुजाएँ और मजबूत कलेजा जीवन की आवश्यकताओं में परिगणित थे, और साम्राज्यवाद में बुद्धि और वाणी के गुण तथा मूक आज्ञापालन उसके आवश्यक साधन थे, पर उन दोनों स्थितियों में दोषों के साथ कुछ गुण भी थे। मनुष्य के अच्छे भाव लुप्त नहीं हो गए थे। जागीरदार अगर दुश्मन के खून से अपनी प्यास बुझाता था तो अकसर अपने किसी मित्र या उपकारक के लिए जान की बाजी भी लगा देता था। बादशाह अगर अपने हुक्म को कानून समझता था और उसकी अवज्ञा को कदापि सहन न कर सकता था, तो प्रजापालन भी करता था। न्यायशील भी होता था। दूसरे के देश पर चढ़ाई वह या तो किसी अपमान-अपकार का बदला लेने के लिए करता था या अपनी आन-बान, रोब-दाब कायम करने के लिए या फिर देश-विजय और राज्य-विस्तार की वीरोचित महत्वाकांक्षा से प्रेरित होता था। उसकी विजय का उद्देश्य प्रजा का खून चूसना कदापि न होता था। कारण यह था कि राजा और सम्राट जनसाधारण को अपने स्वार्थ साधन और धन-शोषण की भट्टी का ईंधन न समझते थे, किंतु उनके दुख-सुख में शरीक होते थे और उनके गुण की कद्र करते थे।

मगर इस महाजनी सभ्यता में सारे कामों की गरज महज पैसा होती है। किसी देश पर राज्य किया जाता है , तो इसलिए कि महाजनों, पूजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा नफा हो। इस दृष्टि से मानो आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है। मनुष्य समाज दो भागों में बंट गया है। बड़ा हिस्सा उन लोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने बस में किए हुए हैं। इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं, जरा भी रू-रियायत नहीं, उसका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और एक दिन चुपचाप इस दुनिया से बिदा हो जाए। अधिक दुख की बात तो यह है कि शासक वर्ग के विचार और सिद्धांत शासित वर्ग के भीतर भी समा गए हैं, जिसका फल यह हुआ है कि हर आदमी पने को शिकारी समझता है और उसका शिकार है समाज। वह खुद समाज से बिल्कुल अलग है, अगर कोई संबंध है, तो यह कि किसी चाल या युक्ति से वह समाज को उल्लू बनाए और उससे जितना लाभ उठाया जा सकता हो, उठा ले।

धन-लोभ ने मानव भावों को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लिया है। कुलीनता और शराफत, गुण और कमाल की कसौटी पैसा, और केवल पैसा है। जिसके पास पैसा है, वह देवता स्वरूप है, उसका अंतःकरण कितना ही काला क्यों न हो साहित्य, संगीत और कला...सभी धन की देहली पर माथा टेकनेवालों में हैं। यह हवा इतनी जहरीली हो गई है कि इसमें जीवित रहना कठिन होता जा रहा है। डॉक्टर और हकीम हैं कि वह बिना लंबी फीस लिए बात नहीं करता। वकील और बैरिस्टर हैं कि वह मिनटों को अशर्फियों से तोलता है। गुण और योग्यता की सफलता उसके आर्थिक मूल्य के हिसाब से मानी जा रही है। मौलवी और पंडित जी भी पैसों के बिना पैसेवालों के गुलाम हैं;  अखबार उन्हीका राग अलापते हैं। इस पैसे ने आदमी के दिलोदिमाग पर इतना कब्जा जमा लिया है कि उसके राज्य पर किसी ओर से आक्रमण करना कठिन दिखाई देता है। यह दया और स्नेह, सच्चाई और सौजन्य का पुतला मनुष्य़ दया ममताशून्य जड़-यंत्र बनकर रह गया है। इस महाजनी सभ्यता ने नये-नये नीति-नियम गढ़ ले हैं जिन पर आज समाज की व्यवस्था चल रही है। उनमें से एक यह है कि समय ही धन है। पहले समय जीवन था, और उसका सर्वोत्तम उपयोग विद्या-कला का अर्जन अथवा दीन-दुखीजनों की सहायता था, अब उसका सबसे बड़ा सदुपयोग पैसा कमाना है। डॉक्टर साहब हाथ मरीज की नब्ज पर रखते हैं और निगाह घड़ी की सूंई पर। उनका एक-एक मिनट एक-एक अशर्फी है। रोगी ने अगर एक अशर्फी नजर की है तो वह उसे एक मिनट से ज्यादा वक्त नहीं दे सकते। रोगी अपनी दुख-गाथा सुनाने के लिए बेचैन है, पर डॉक्टर साहब का उधर बिल्कुल ध्यान नहीं। उन्हें उसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं। उनकी निगाह में उस व्यक्ति का अर्थ केवल इतना ही है कि वह उन्हें फीस देता है। यह जल्द से जल्द नुस्खा लिखेंगे और दूसरे रोगी को देखने चले जाएँगे। मास्टर साहब पढ़ाने आते हैं, उनका एक घण्टा पूरा हुआ, वह उठ खड़े हुए। लड़के का सबक अधूरा रह गया है तो रह जाए, उनकी बला से, वह एक घंटे से अधिक समय कैसे दे सकते, क्योंकि समय रुपया है। इस धन-लोभ ने मनुष्यता और मित्रता का नाम शेष करा डाला है। पति को पत्नी या लड़कों से बात करने की फुरसत नहीं, मित्र और संबंधी किस गिनती में हैं। जितनी देर वह बातें करेगा, उतनी देर में तो कुछ कमा लेगा। कुछ कमा लेना ही जीवन की सार्थकता है, शेष सब कुछ समय-नाश है। बिना खाए-सोए काम नहीं चलता, बेचारा इससे लाचार है और इतना समय नष्ट करना ही पड़ता है।

आपका कोई मित्र या संबंधी अपने नगर में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है, तो समझ लीजिए उसके यहां अब आपकी रसाई मुमकिन नहीं। आपको उसके दरे-दौलत पर जाकर कार्ड भेजना होगा। उन महाशय को बहुत से काम होंगे, मुश्किल से आपसे एक दो बातें करेंगे या साफ जवाब दे देंगे कि आज फुर्सत नहीं है। अब यह पैसे के पुजारी हैं, मित्रता और शील-संकोच के नाम पर कब की तिलांजलि दे चुके हैं।

आपका कोई दोस्त वकील है और आप किसी मुकदमे में फंस गए हैं, तो उनसे किसी प्रकार की सहायता की आशा न रखिए। वो आपसे लेन-देन की बात शायद न करेगा, पर आपके मुकदमे की ओर तनिक भी ध्यान न देगा। इससे तो कहीं अच्छा है कि आप किसी अपरिचित के पास जाएँ और उसकी पूरी फीस अदा करें। ईश्वर न करे कि आज किसीको किसी चीज में कमाल हासिल हो जाये, फिर उसमें मनुष्यता नाम मात्र को न रह जाएगी, उसका एक-एक मिनट कीमती हो जाएगा।

इसका अर्थ यह नहीं कि व्यर्थ की गपशप में समय नष्ट किया जाए, पर यह अर्थ अवश्य है कि धन-लिप्सा को इतना बढ़ने न दिया जाए कि वह मनुष्यता, मित्रता, स्नेह-सहानुभूति सबको निकाल बाहर करे।

पर आप उस पैसे के गुलाम को बुरा नहीं कह सकते। सारी दुनिया जिस प्रवाह में बह रही है, वह भी उसी में बह रहा है। मान-प्रतिष्ठा सदा से मानवीय आकांक्षाओं का लक्ष्य रहा है। जब विद्या-कला मान प्रतिष्ठा का साधन थी, उस समय लोग इन्ही का अर्जन-अभ्यास करते थे। जब धन उसका एकमात्र उपाय है, तब मनुष्य मजबूर है कि एकनिष्ठ भाव से उसकी उपासना करे। यह कोई साधु-महात्मा, सन्यासी-वन्यासी नहीं, वह देख रहा है कि उसके पेशे में जो सौभाग्यशाली सफलता की कठिन यात्रा पूरी कर सके हैं, वह उसी राजमार्ग के पथिक थे, जिस पर वह खुद चल रहा है। समय धन है एक सफल व्यक्ति का। वह उसको इस सिद्धांत का अनुसरण करते देखता है, फिर वह भी उसी के पद चिन्हों का अनुसरण करता है, तो उसका क्या दोष? मान प्रतिष्ठा की लालसा तो दिल से मिटाई नहीं जा सकती। वह देख रहा है कि जिसके पास दौलत नहीं और इसलिए नहीं कि उन्होंने वक्त को दौलत नहीं समझा, उनको कोई पूछनेवाला नहीं। वह अपने पेशे में उस्ताद है फिर भी उसकी कहीं पूछ नहीं। जिस आदमी में तनिक भी जीवन की आकांक्षा है वह तो इस उपेक्षा की स्थिति में नहीं रह सकता। उसे तो मुरौवत, दोस्ती, और सौजन्य को धता बताकर लक्ष्मी की अराधना में अपने को लीन कर देना होगा, तभी इस देवी का वरदान उसे मिलेगा, और वह कोई इच्छाकृत कार्य नहीं किंतु सर्वथा बाध्यकारी है। उसके मन की अवस्था अपने आप कुछ इस तरह की हो गई है कि उसे धनार्जन के अलावा किसी काम से लगाव नहीं रहा। अगर उसे किसी सभा या व्याख्यान में आधा घंटा बैठना पड़े तो समझ लो, वह कैद की घड़ी काट रहा है। उसकी सारी मानसिक, भौतिक और सांस्कृतिक दिलचस्पियां इसी केन्द्र बिन्दु पर आकर एकत्र हो गई हैं। और क्यों न हों? वह देख रहा है कि पैसे के सिवा उसका और कोई अपना नहीं। स्नेही मित्र भी अपनी गरज लेकर ही उसके पास आते हैं। स्वजन-संबंधी भी उसके पैसे के ही पुजारी हैं। वह जानता है कि अगर वह निर्धन होता, तो वह जो दोस्तों का जमघट लग रहा है, उनमें से एक के भी दर्शन न होते, इन स्वजन-संबंधियों में से एक भी पास न फटकता। उसे समाज में अपनी एक हैसियत बनानी है, बुढ़ापे के लिए कुछ बचाना है। लड़कों के लिए कुछ कर जाना है, जिससे उन्हें दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें। इस निष्ठुर सहानुभूतिशून्य दुनिया का उसे पूरा अनुभव है। अपने लड़कों को वह उन कठिन अवस्थाओं में नहीं पड़ने देना चाहता, जो सारी आशाओं-उमंगों पर पाला गिरा देती हैं, हिम्मत-हौसले को तोड़कर रख देती हैं। उसे वह सारी मंजिलें जो एक साथ जीवन के आवश्यक अंग हैं, खुद तय करनी होंगीं और जीवन को व्यापार के सिद्धांत पर चलाए बिना वह उऩमें से एक भी मंजिल पार नहीं कर सकता।


इस सभ्यता का दूसरा सिद्धांत है बिजनेस इज बिजनेस अर्थात् व्यवसाय व्यवसाय है, उसमें भावुकता के लिए गुंजाइश नहीं। पुराने जीवन सिद्धान्त में वह लठमार साफगोई नहीं है, जो निर्लज्जता कही जा सकती है और जो इस नवीन सिद्धांत की आत्मा है। जहाँ लेन-देन का सवाल है, रुपए-पैसे का मामला है, वहाँ न दोस्ती की गुजर है, न मुरौवत का, न इंसानियत का, ‘ बिजनेस‘ में दोस्ती कैसी? जहां किसी ने इस सिद्धांत की आड़ ली और आप लाजवाब हुए। फिर आपकी जबान नहीं खुल सकती। एक सज्जन जरूरत से लाचार होकर अपने किसी महाजन मित्र के पास जाते हैं और चाहते हैं कि वह उनकी कुछ मदद करे। वह भी आशा रखते हैं कि शायद सूद की दर में वह कुछ रियायत कर दे, पर जब देखते हैं कि यह महानुभाव मेरे साथ भी वही कारबारी वर्ताव कर रहे हैं, तो कुछ रियायत की प्रार्थना करते हैं, मित्रता और घनिष्टता के आधार पर आँखों में आंसू भरकर बड़े करुण स्वर में कहते हैं-महाशय, मैं इस समय बड़ा परेशान हूं , नहीं तो आपको कष्ट न देता। ईश्वर के लिए मेरे हाल पर रहम कीजिए। समझ लीजिए कि एक पुराने दोस्त...वहीं बात काटकर आज्ञा के स्वर में फरमाया जाता है-लेकिन जनाब , आप ‘  बिजनेस इज बिजनेस‘  से भूल जाते हैं। उस दिन कातर प्रार्थी परमानो बम का गोला गिरा। अब उसके पास कोई तर्क नहीं, कोई दलील नहीं। चुपके से उठकर अपनी राह लेता है या फिर अपने व्यवसाय-सिद्धांत के मित्र की भक्त मित्र की सारी बातें कबूल कर लेता है।

इस महाजनी सभ्यता ने दुनिया में जो नयी रीति-नीतियां चलाई हैं, उनमें सबसे अदिक और रक्त-पिपासु यही व्यवसायवाला सिद्धांत है। मियां-बीबी में बिजनेस, बाप-बेटे में बिजनेस, गुरु-शिष्य में बिजनेस! सारे मानवीय, आध्यात्मिक, और सामाजिक नेह-नाते समाप्त। आदमी –आदमी के बीच बस कोई लगाव है तो बिजनेस का। लानत है इस ‘ बिजनेस‘ पर ! लड़की अगर दुर्भाग्यवश क्वारी रह गयी और अपनी जीविका का कोई उपाय न निकाल सकी, तो अपने बाप के घर में ही लौंडी बन जाना पड़ता है। यों लड़के-लड़कियां सभी घरों में कामकाज करते ही हैं, पर उन्हें कोई टहलुआ नहीं समझता, पर इस महाजन सभ्यता में लड़की एक खास उम्र के बाद लौंडी और अपने भाइयों की मजदूरनी हो जाती है। पूज्य पिताजी भी अपने पितृ-भक्त बेटे के टहलुए बन जाते हैं और मां अपने सपूत की टहलुई। स्वजन-संबंधी तो किसी गिनती में नहीं। भाई भी भाई के घर आए तो मेहमान है। अकसर तो उसे मेहमानी का बिल भी चुकाना पड़ता है। इस सभ्यता की आत्मा है व्यक्तिवाद, आप स्वार्थी बना सब कुछ अपने लिए।

पर यहां भी हम किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते। वही मान-प्रतिष्ठा, वही भविष्य की चिंता, वही अपने बाद बीबी-बच्चों के गुजर का सवाल, वही नुमाइश और दिखावे की आवश्यकता हर एक की गर्दन पर सवार है, और वह हिल नहीं सकता। वह इस सभ्यता के नीति नियमों का पालन न करे तो उसका भविष्य अँधकारमय है।

अब तक दुनिया के लिए सभ्यता की रीति-नीति का अनुसरण करने के सिवा और कोई उपाय न था। उसे झख मारकर उसके आदेशों के आगे सिर झुकाना पड़ता था। महाजन अपने जी में फूला फिरता था। सारी दुनिया उसके चरणों पर नाक रगड़ रही थी। बादशाह उसका बंदा, वजीर उसकी महत्वाकांक्षाओं के सामने सिर झुकाए हुए, हर मुल्क में उसका बोलबाला।

परन्तु अब एक नयी सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम में उदय हो रहा है, जिसने इस नाटकीय महाजनवाद या पूंजीवाद की जड़ खोदकर फेंक दी है, जिसका मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो अपने शरीर या दिमाग से मेहनत करके कुछ पैदा कर सकता है, राज्य और समाज का परम सम्मानित सदस्य हो सकता है, और जो केवल दूसरों की मेहनत या बाप-दादों के जोड़े हुए धन पर रईस बना फिरता है वह पतिततम प्राणी है। उसे राज्य प्रबंध में राय देने का हक नहीं और वह नागरिकता के अधिकारों का भी पात्र नहीं। महाजन इस नयी लहर से अति उद्विग्न होकर बौखलाया हुआ फिर रहा है और सारी दुनिया के महाजनों की शामिल आवाज इस नयी सभ्यता को कोस रही है, उसे शाप दे रही है। व्यक्ति -स्वातंत्र्य, धर्म-विश्वास की स्वाधीनता, अपनी अंतरात्मा के आदेश पर चलने की आजादी, इन सबको घातक , गला घोट देने वाली बताई जा रही है। उस पर नए-नए लांछन लगाए जा रहे हैं, नयी-नयी हुरमतें तराशी जा रही हैं। वह काले से काले रंग में रंगी जा रही है, कुत्सित रूप में चित्रित की जा रही है। उन सभी साधनों से जो पैसे वालों के लिए सुलभ हैं, काम लेकर उसके विरुद्ध प्रचार किया जा रहा है। पर सच्चाई है , जो इस सारे अंधकार को चीरकर दुनिया में अपनी ज्योति का उजाला फैला रही है।

निस्संदेह इस नयी सभ्यता ने व्यक्ति-स्वातंत्र्य के पंजे, नाखून और दांत तोड़ दिए हैं। उसके राज्य में अब एक पूंजीपति लाखों मजदूरों का खून पीकर मोटा नहीं हो सकता। उसे अब यह आजादी नहीं कि अपने नफे के लिए साधारण आवश्यकता की वस्तुओं के दाम चढ़ा सके, अपने माल की खपत कराने के लिए युद्ध करा दे, गोला-बारूद और युद्ध-सामग्री बनाकर दुर्बल राष्ट्रों का दमन कराए। अगर उसकी स्वाधीनता ही स्वाधीनता है तो निस्संदेह नयी सभ्यता में स्वाधीनता नहीं पर यदि स्वाधीनता का अर्थ यह है कि जनसाधारण को हवादार मकान, पुष्टिकर भोजन, साफ-सुथरे गांव, मनोरंजन और व्यवसाय की सुविधाएं, बिजली के पंखे और रोशनी सस्ता और सद्यः सुलभ न्याय प्राप्त हो, तो इस समाज-व्यवस्था में जो स्वाधीनता और आजादी है, वह दुनिया की किसी सभ्यतम कहानेवाली जाति को भी सुलभ नहीं है। धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ अगर पुरोहितों, पादरियों, मुल्लाओं की मुफ्तखोर जमात के दंभमय उपदेशों और अँधविश्वास-जनित रूढ़ियों का अनुसरण है तो निःसंदेह वहां इस स्वातंत्र्य का अभाव है, पर धर्म स्वातंत्र्य का अर्थ यदि लोकसेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनीयती, शरीर और मन की पवित्रता है, तो इस सभ्यता में धर्माचरण की जो स्वाधीनता है, और किसी देश को उसके दर्शन भी नहीं हो सकते।

जहां धन की कमी-वेशी के आधार पर असमानता है वहां ईर्ष्या, जोर-जबर्दस्ती, बेईमानी, झूठ, मिथ्या अभियोग-आरोप, वेश्यावृत्ति, व्यभिचार और सारी दुनिया की बुराइयां अनिवार्य रूप से मौजूद हैं। जहां धन का आधिक्य नहीं, अधिकांश मनुष्य एक ही स्थिति में हैं, वहां जलन क्यों हो और अब क्यों हो ?  सतीत्व विक्रय क्यों हो और व्यभिचार क्यो हो? झूठे मुकदमे क्यों चलें और चोरी-डाके की वारदातें क्यों हों? वे सारी बुराइयां तो दौलत की देन हैं। पैसे के प्रसाद हैं। महाजनी सभ्यता ने इनकी सृष्टि की है। वही इनको पालती है और वही यह भी चाहती है कि जो दलित, पीड़ित और वंचित हैं, वे इसे ईश्वरीय विधान समझकर अपनी स्थिति पर संतुष्ट रहें। उनकी ओर से तनिक भी विरोध-विद्रोह का भाव दिखाया गया, तो उनका सिर कुचलने के लिए पुलिस, अदालत है, काला पानी है। आप शराब पीकर उसके नशे से बच नहीं सकते। आग लगाकर चाहें कि लपटें न उठें, असंभव है। पैसा अपने साथ यह सारी बुराइयां लाता है, जिन्होंने दुनिया को नरक बना दिया है इस पैसा-पूजा को मिटा दीजिए, सारी बुराइयां अपने आप मिट जाएंगी, जड़ न खोदकर केवल फुनगी की पत्तियां तोड़ना बेकार है। यह नयी सभ्यता धनाड्यता को हेय और लज्जाजनक तथा घातक विष समझती है। वहां कोई आदमी अमीरी ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है। गहनों से लदकर कोई स्त्री सुंदरी नहीं बनती, घृणा का पात्र बनती है। साधारण जन-समाज से ऊंचा रहन-सहन रखना वहां बेहूदगी समझी जाती है। शराब पीकर वहां बहका नहीं जा सकता, अधिक मद्यपान वहां दोष समझा जाता है, धार्मिक दृ,टि से नहीं, किंतु शुद्ध सामाजिक दृष्टि से, क्योंकि शराबखोरी से आदमी में धैर्य और कष्ट-सहन, अध्यवसाय और श्रमशीलता का अंत हो जाता है।

-हां, इस समाज-व्यवस्था ने मनुष्य को वह स्वाधीनता नहीं दी है कि वह जन-साधारण को अपनी महत्वाकांक्षाओं की तृप्ति का साधन बनाए  और तरह-तरह के बहाने से उसकी मेहनत का फायदा उठाए या सरकारी पद प्राप्त करके मोटी-मोटी रकमें उड़ाए और मूछों पर ताव देता फिरे। वहां ऊंचे से ऊंचे अधिकारी की तनख्वाह भी उतनी ही है, जितनी एक कुशल कारीगर की। वह गगन-चुंबी प्रसादों में नहीं रहता, तीन-चार कमरों में ही उसे गुजर करना पड़ता है। उनकी श्रीमती रानी साहिबा या बेगम बनी हुई स्कूलों में इनाम बांटती नहीं फिरतीं, बल्कि अक्सर मेहनत मजदूरी या किसी अखबार के दफ्तर में काम करती हैं। सरकारी पद पाकर वह अपने को लाट साहब नहीं बल्कि जनता का सेवक समझता है। महाजनी व्यवस्था का प्रेमी इस समाज व्यवस्था को क्योंपसंद करने लगा जिसमें उसे दूसरों पर हुकूमत जताने के लिए सोने-चांदी के ढेर लगाने की सुविधाएं नहीं ? पूंजीपति और जमींदार तो इस सभ्यता की कल्पना से ही कांप उठते हैं। उनकी जड़ी का कारण हम समझ सकते हैं। पर जब वह लोग भी उसकी खिल्ली उड़ाने और उस पर फब्तियां कसने लगते हैं जो अनजाने में महाजनी सभ्यता का उल्लू सीधा कर रहे हैं, तो हमें उनकी दास-मनोवृत्ति पर हंसी आती है। जिसमें मनुष्यता, आध्यात्मिकता, उच्चता और सौंदर्यबोध है, वह भी कभी ऐसी समाज-व्यवस्था की सराहना नहीं कर सकता, जिसकी नींव लोभ, स्वार्थपरता और दुर्लभ मनोवृत्ति पर खड़ी हो। ईश्वर ने तुम्हें विध्या और कला की संपति दी है, तो उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग यही है कि उसे जन-समाज की सेवा में लगाओ, यह नहीं कि उससे जन समाज पर हुकूमत चलाओ, उसका खून चूसो और उल्लू बनाओ।


धन्य है यह सभ्यता, जो मालदारी और व्यक्तिगत संपति का अंत कर रही है, और जल्दी या देर से दुनिया उसका पदानुसरण अवश्य करेगी।  यह सभ्यता अमुक देश की समाज-रचना अथवा धर्म, मजहब से मेल नहीं खाती या उसके अनुकूल नहीं है –यह तर्क नितांत असंगत है। ईसाई मजहब का पौधा जेरुसलम में उगा और सारी दुनिया उसके सौरभ में बस गई। बौद्ध धर्म ने उत्तर भारत में जन्म ग्रहण किया और आधी दुनिया ने उसे गुरुदक्षिणा दी । मानव स्वभाव अखिल विश्व में एक ही है। छोटी-मोटी बातों में अंतर हो सकता है, पर मूलस्वरूप की दृष्टि से संपूर्ण जाति में कोई भेद नहीं। जो शासन-विधान और समाज व्यवस्था एक देश के लिए कल्याणकारी है, वह दूसरे देशों के लिए भी हितकर होगी। हां, महाजनी सभ्यता और उसके गुर्गे अपनी शक्ति भर उसका विरोध करेंगे , उसके बारे में भ्रम-जनक बातों का प्रचार करेंगे, जन-साधारण को बहकाएँगे, उनकी आंख में धूल झोकेंगे, पर जो सत्य है एक न एक दिन उनकी विजय होगी और अवश्य होगी।

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                                                                                                                                                             परिदृश्य


                                                                                                                                                                   -शैल अग्रवाल

  यात्रा और पड़ाव

यात्रा और पड़ाव दो शब्द, दो पहलू, दोनों का अलग-अलग अस्तित्व, पर एक ही सूत्र से जुड़े हुए, जैसे कि प्रयास और प्राप्ति। पड़ाव न हो तो कोई यात्रा शुरू ही न हो और यात्रा न हो तो पड़ाव कहां? यात्राओं का भी तो अपना एक अलग संसार होता है - विशेषकर भारत की रेल यात्राओं का। 
यहां विदेशों में आप रेल में बैठते हैं और अपने इच्छित मुकाम से पहले उतरने की सोच ही नहीं सकते पर भारत में यात्री चाहें तो भी रेल के डिब्बों में स्थिर या तटस्थ होकर नहीं बैठ सकता। उसके वक्त, पत्रिका, खाना सभी चीजों पर सह यात्रियों का समानाधिकार होता है। शायद ही दुनिया में कहीं और ऐसा होता हो - पर हो भी क्यों नहीं- भारत जैसा देश भी तो दुनिया में कहीं और नहीं। छोटे बड़े स्टेशनों पर रूकती, मनमानी चाल से चलती ये रेलगाड़ियां, समय के महत्व और निर्धारित तालिका का मज़ाक उड़ाती हर प्लेटफार्म, हर शहर, हर कस्बे, हर गांव के स्टेशन पर रूकती हैं और इतनी देर तक रूकती हैं कि घंटों ऊबने के बाद (गाड़ी घंटो रूके या मिनटों कई आपको ऐसे मिल जाएंगे जिनकी हर स्टेशन पर रूके बिना यात्रा पूरी ही नही होती।) वह  हर स्टेशन पर मिलने वाली  हर वस्तु  का  जायका लेने उतरेगा ही। भारत की सारी पत्रिकाएं पढ़ डालता है - घबराकर अगली बार फिर कभी रेल में न बैठने का झूठा संकल्प तक कर डालता है वह तो। वैसे भी यह तो मन पर ही है कि पत्रिका पढ़ने के साथ-साथ बनारस का लंगड़ा, इलाहाबाद का अमरूद और खुरजा की खुरचन खाएं या ना खाएं - अगर विश्वास न हो तो आप भी कभी आजमा कर देखिए ये जायके - कैसे हर छोटे से डिब्बे में एक नई दुनिया सिमट आती है - कैसे इसमें बैठे अजनबी और परिचित गपशप करते यात्रा को एक और नया आयाम - नई रफ्तार दे डालते हैं। यह बात दूसरी है कि उस शगल में कोई भी सामान जो आप घर से लेकर चले थे वह उतरते वक्त भी आपके साथ होगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी न तो सहयात्री दे पाएंगे और न ही भारत का रेल- विभाग।

उस रात का माहौल तो कुछ और भी ज्यादा अनूठा था - लग ही नहीं रहा था कि हम सब भारत में यात्रा कर रहे हैं। सामने सीट पर बैठी यूरोपियन महिलाएं - वहीं नहीं, हर कूपे - पूरे डिब्बे में ही, चारो तरफ बस यूरोपियन ही यूरोपियन थे। हम चार बनारसी, बनारस से देहली जाते, बनारस से बनकर चलती शिव-गंगा में विदेशियों जैसा महसूस कर रहे थे। आदत से मजबूर भाभी ने अपने पूरी-सब्जी  के रोल बांटने शुरू कर दिए, फिर लोगों ने उन्हें मांग-मांग कर खाना शुरू कर दिया। हम सब भूखे रह गए पर भाभी का कुशल गृहणी वाला अहसास पूरी तरह से तृप्त हो चुका था। भारत का पर्यटन विभाग अच्छा काम कर रहा है - सोने के लिए खुद को व्यवस्थित करते हुए मैंने सोचा।

अभी बस नौ ही बजे थे - और गाड़ी मात्र बीस पच्चीस मील चलकर पुन: खड़ी हो गई। शायद इसने भी उसी खास बनारसी अन्दाज़ में निश्चय कर लिया था कि पहले आराम फिर काम। अब ऐसी खिजलाती मन:स्थिति में नींद का न आ पाना स्वाभाविक ही था, ऊपर से उन्होंने एक और दुखती रग पकड़ ली, 'अगर ऐसा ही था तो यह बनारस से ही क्यों नहीं लेट चली, कम से कम यूँ भागदौड़ तो न करनी पड़ती। हाथ में पकड़ी पत्रिका एकबार फिरसे हवा में ही लटकी रह गई और आंखों ने कुछ और रूचिकर ढूंढ़ना शुरू कर दिया।

विभूति संभाल कर रख ली न- पता नहीं तुम क्या सोचती हो पर मुझे तो बहुत ही भिन्न और रहस्यमय लगा यह बनारस शहर? सामने बैठी विदेशी सहयात्रिणी दूसरी से पूछ रही थी।

हां एक ही नदी के किनारे हजारों का नहाना, शवों का जलना, पूरे शहर के गन्दे नालों का भी उसी में गिरना और उसी पानी को पवित्र व चमत्कारी समझ श्रद्धा से हजारों का पी जाना, वह भी बिना बीमार या परेशान हुए - तुम्हीं बताओ पूरे विश्व में और कहां, किस देश में ऐसा देखने को मिलेगा? दूसरी ने प्रश्न पर प्रश्न उछाला।

अच्छा था या बुरा - असंभव ही है मेरे लिए तो कुछ कह पाना - गंगा किनारे की बस हवा मात्र लेने से ही वह दार्शनिक हो चली थी - वह शवों का एक के बाद एक लगातार चौबीसों घंटे जलते रहना और बगल के ही घाट पर धार्मिक मंत्रोच्चारण के साथ आरतियां - धूप अगरबत्ती के संग उठती वह जले मुर्दों और ठहरे पानी की सड़ांध और उसपर से भी अपंगु सा चाहकर भी हमारा वहां से न हटना, देखते ही रह जाना - निश्चय ही एक सम्मोहन का सा ही तो अनुभव है अलादीन की गुफा  की तरह छोटी-छोटी वे गलियों और उनमें बिखरी कला व संस्कृति - इतनी गंदगी के बाद भी मन करता था, घूमो और घूमो - घूमते ही रहो जब तक घूम सको - क्या पता और न जाने क्या मिल जाए, किससे मुलाकात हो जाए, कौन हमारा भविष्य बताने लगे - क्या नाम था - पहली ने पुन: कौतुहल के साथ पूछा? मेरी आंखों ने अब गौर से उन विदेशों सहयात्रिणियों को पढ़ना शुरू कर दिया था।

कौन सी, कुंजगली या विश्वनाथ गली, जहां सबसे पुराना शिव का मन्दिर है या वह साड़ी वाली गली, किस गली की बात कर रही हो तुम ?- हाथ की सुन्दर और सुरूचिपूर्ण चांदी की चूड़ियों को प्यार से अपनी कलाई पर घुमाते हुए दूसरी ने पलट कर पूछा - अच्छा एक बात बताओ क्या तुम सचमें पुनर्जन्म में विश्वास करती हो?

अब तो सोने की कोशिश भी व्यर्थ थी, पानी का गिलास मुंह से लगाए जाने कब उनकी बातों में  खो चुकी थी । वे भी समझ चुकी थी कि मुझे उनकी बातों में आनन्द आ रहा था और उनकी ही तरह मेरा भी सोने का कोई इरादा नहीं था। अब तटस्थ रह पाना असंभव था क्योंकि तटस्थता मेरी और मात्र भूमि की अस्मिता से टकरा रही थी। इस बार मेरी तरफ देखते हुए उसने प्रश्न दोहराया - मैं आप से ही पूछ रही हूँ - रूचिकर होगे स्वयं एक भारतीय के इस विषय पर विचार?

हां, यहां भारत में तो सब ऐसा ही कहते और मानते हैं, पर सच  कहूँ  तो मुझे तो कोई अन्दाज़ा नहीं। मरने के बाद यदि पुनर्जन्म होता भी है तो हमें तो पता नहीं चल पाता क्योंकि न तो यादें ही बचती हैं और न ही यादगारें। शायद हमारी जिन्दा रहने की, निरंतरता की इच्छा ही हमें ऐसा सोचने और समझने पर मजबूर करती हों - पर फिर बुद्धि, ज्ञान और कौशल्य में इतना फरक क्यों - शायद पुनर्जन्म होता ही है - पता नहीं, मरने के बाद ही निश्चित रूप से बता पाउंगी - मैंने हंसकर विषय बदल दिया - आप भी देहली ही जा रही हैं क्या? हां, हम २५ साथी छह हफ्ते पहले पर्यटन और शोध के लिए आस्ट्रेलिया से भारत आए थे। हम सभी शिक्षक या शोध विद्यार्थी हैं और भारत और आस्ट्रेलिया, दो देशों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए यहां पर हैं। हमारे दोनों देशों की सरकार एक दूसरे के विकास में सांझी होना चाहती हैं।

यह तो बहुत ही अच्छी बात है। फिर आपने क्या क्या जाना और समझा - वार्तालाप खुद-ब-खुद एक और रूचिकर मोड़ ले रहा था।

यही कि भारत एक बहुत ही विविधता और विरोधाभास का देश है - भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विविधता का - एक नया समाज होते हुए भी - स्वतंत्र भारत आज भी एक बहुत ही प्राचीन देश है। ज्ञान विज्ञान में विश्व का नेतृत्व करते हुए भी अनगिनत रूढ़ि और अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ है। अमीरी और गरीबी का अन्तर तो बहुत ही ज्यादा है यहां पर। शहरों और गांवों के रहन-सहन में भी यही दूरी है। तरह तरह के तकनीकी और आर्थिक विकास के बावजूद भी यहां कोई सुनियोजित सामाजिक ढांचा है ही नहीं। एक ऐसा ढांचा जिसके सहारे गरीब से गरीब भी जीवन की तृणमूल जरूरतें पा सके। कम से कम एक सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली में हर बच्चे को पढ़ने का अवसर तो मिलना ही चाहिए।

सही कहती हैं आप - मैं उससे पूर्णत: सहमत थी। पर जब ऐसा अमेरिका जैसे धनाढ्य और सक्षम देश में भी पूर्णत: संभव नहीं हो पाया तो भारत तो अभी भी इतना सक्षम नहीं। आपके क्या सुझाव या सलाह हैं इस विषय पर? विचार जानना मेरे लिए जरूरी था क्योंकि यह किसी राजनीतिज्ञ के नहीं, एक विदेशी आम नागरिक के विचार थे जो पिछले पांच छह हफ्ते से भारत भ्रमण कर रहे थे और तटस्थ होकर सोच सकते थे। मुझे यह लिखते हुए कोई खेद नहीं कि जो कुछ भी सुना वह काफी खरा और रचनात्मक था।

उसने कहा कि माना भारत और ऑस्ट्रेलिया दो ऐसे देश हैं जिन्होंने इसके पहले कभी एक दूसरे को कोई विशेष महत्व नहीं दिया क्योंकि ऑस्ट्रेलिया भारत को एक गरीब और पिछड़ा देश समझता था और भारत ऑस्ट्रेलिया को एक आराम-तलब और आलसी देश। पर आज ऑस्ट्रेलिया के निवासी भारत के बारे में फरक तरह से सोचने लग गए हैं और शायद भारत के निवासी ऑस्ट्रेलिया के बारे में भी। दोनों ही देश (भारत और ऑस्ट्रेलिया) आज ब्रिटेन के साथ विश्व की नम्बर दो ताकत बनकर उभरने को तैयार हैं। दोनों ही देश विज्ञान और तकनीकी जानकारी में अभूतपूर्व उन्नति कर रहे हैं। वास्तव में देखा जाए तो स्पर्धनीय उन्नति - हमारे पास मिलाकर छह नोबल पुरस्कार हैं। और हम लोग यदि इस ज्ञान को आपस में मिल-बांटकर आगे बढ़ें तो बहुत आगे बढ़ सकते हैं। कपास के बीजों पर चल रही हमारी वह शोध  जिससे कि हम डीजल का कोई विकल्प बनाने की उम्मीद में हैं, एक ऐसी ही उल्लेखनीय खोज हैं। आज नियंत्रित मिसाइल्स और सैटेलाइट पर सारा सौफ्ट वेयर मुख्यत: भारत में ही बनाया जा रहा है और आज भारत की कॉर्नर शॉप वाली मानसिकता भी बदलती नज़र आ रही है। बांटना चाहूँगी आपके साथ एक चुटकुला जो इसी विषय पर हाल ही में कहीं सुना या पढ़ा था - प्रश्न - क्या वजह हैं कि भारतीय क्रिकेट में तो बहुत अच्छे हैं पर फुटबॉल में नहीं? जवाब - क्योंकि कॉर्नर मिलते ही वह दुकान खोलकर बैठ जाते हैं। मजाक और बातें दोनों ही गम्भीर थी, पर हंसे बिना न रह सकी और एक छोटी सी मुस्कान के साथ चुटकुले को बांटती वह अगले मुद्दे पर आ गई।

भारत की खुद की उन्नति और सूझ-बूझ व विश्व में चारों तरफ फैले भारतीयों के योगदान ने आज भारत को पूरे विश्व के आगे प्रमुख स्थान पर खड़ा कर दिया है। और आज भारत का रहन-सहन और काम करने का तरीका भी करीबकरीब विश्व-स्तर के बराबर का ही होता जा रहा है क्योंकि जनता जागरूक हो रही है और ताकत धीरे-धीरे नेताओं के हाथों से फिसल कर जनता के पास पहुँच रही है। आज बाहर से जो यहां शोध करने के लिए आते हैं उन्हें भारत इतना अच्छा और संभावनाओं से पूर्ण लगता है कि कई यहीं रह जाते हैं या रहना चाहते हैं। यहां की सस्ती मजदूरी और तुलनात्मक सस्ता रहन सहन भी इसकी एक वजह हो सकती है। विश्व की कई मुख्य कम्पनियां अपने ऑफिस अपने देशों से यहां ला रही हैं। संचार विभाग में तो ब्रिटेन और अमेरिका दोनों की ही मुख्य कम्पनियों ने अपने ऑफिस यहां बदल लिए हैं। निश्चित ही भारत आज पर्यटक और व्यापारी दोनों के लिए ही आकर्षण का केन्द्र बन चुका है और विकसित औद्योगिक देशों को अच्छी टक्कर दे रहा है।

मंत्र-मुग्ध सी सुन रही थी मैं पर उसके रुकते ही  पूछे बिना नहीं रह पाई। यह सब तो अच्छा ही अच्छा है, कुछ ऐसा भी तो हुआ होगा जो त्रुटिपूर्ण या खराब लगा होगा आपको, आज के इस भारत में?

हां बताया न एक सुनियोजित योजना और ढांचे की कमी, विशेषत: शिक्षा और विभाजित समाज के संदर्भ में। एक भारतीय होने के नाते आप क्या सोचती हैं कि आपके देश में क्या-क्या कमी है? उसने उसी सहज जिज्ञासा से गेंद मेरी पाली में वापस फेंक दी और अब जवाब देने की मेरी बारी थी। उसका सहज सा वह सवाल मुझे पूरी तरह से झकझोर चुका था - एक बार फिर रेशमी तहों के अन्दर देखने को मजबूर थी मैं।

हमारा खुद में, अपने देश में पूर्णत: गौरव न ले पाना, और निरंतर की स्वार्थी मानसिकता, इन दो कमजोरियों ने हमें तोड़ रखा है और नतीजा यह है कि नागरिक उत्तरदायित्वों के प्रति हम आज भी पूर्णत: अनभिज्ञ ही हैं। इसके ज्वलंत उदाहरण है कि आज भी घर झाड़-पोंछकर कूड़ा हम घर के दरवाजे पर खुशी-खुशी और बेझिझक फेंक आते हैं - अपना घर साफ रहे, बस यही काफी है हमारे लिए- गली, मुहल्ले और देश से आज भी हमें कोई मतलब नहीं। यदि बात अस्तित्व की लड़ाई की होती तो समझी जा सकती थी पर दूसरों के प्रति इतनी निरासक्ति कभी भी एक विकसित देश के विश्वास और आशावादी समझ का परिचय नहीं दे सकती, बहुत कुछ सीखना हैं हमें अभी आप सबसे, मैंने झुकी नजरों से जवाब दिया। विदेशी जो मेरे पूरे देश में घूम चुकी थी, उसके अनुभवों को मैं महसूस करने की कोशिश कर रही थी और समझ पा रही थी कि हजार अच्छे अनुभवों के साथ-साथ कुछ अनुभव और आभास आज भी शर्मनाक ही रहे होंगे इनके - पर इसका यह मतलब नहीं कि भारतीय होने के लिए शर्मिन्दा हूँ। कमियां कहां नहीं होती - जरूरत बस समझने और जानने की है। हम सब जानते हैं कि स्वच्छ भारत ही स्वस्थ भारत होगा, और स्वस्थ राष्ट्र ही सशक्त राष्ट्र होगा। सिर्फ आत्म-श्लाघा के घोड़ो पर सवार होकर लड़ाइयां नहीं जीती जा सकती - इसके लिए भी समझ की ढाल और कर्तव्य की तलवार चाहिए। २०१० तक एड़स् जैसी बीमारियां भारत में सबसे अधिक होंगी - ऐसी अफवाहों को हमें निर्मूल करना ही होगा क्योंकि भारत अब पिछड़ा देश नहीं, प्रगतिशील देश भी नहीं - आधुनिक और सशक्त इक्कीसवीं सदी का एक प्रमुख और विकसित देश है और एशिया के केन्द्र में खड़ा है।

      


                                                                                                                                                         अप्रैल २००४

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                                                                                                                                                        कहानी -धरोहर


                                                                                                                                                        -जयशंकर प्रसाद

गुदड़ी में लाल

दीर्घ निश्वासों का क्रीड़ा-स्थल, गर्म-गर्म आंसुओं का फूटा हुआ पात्र ! कराल काले की सारंगी , एक बुढ़िया का जीर्ण कंकाल, जिसमें अभिमान के लय में करुणा की रागिनी बजा करती है।

अभागिनी बुढ़िया, एक भले घर की बहू-बेटी थी। उसे देखकर दयालु वयोवृद्ध, हे भगवाल! कहकर चुप हो जाते थे। दुष्ट कहते थे कि अमीरी में बड़ा सुख लूटा है। नव-युवक देश-भक्त कहते थे, देश दरिद्र है, खोखला है। अभागे देश में जन्म-ग्रहण करने का फल भोगती है। आगामी भविष्य की उज्जवलता में विश्वास रखकर हृदय के रक्त पर संतोष करे। जिस देश का भगवान ही नहीं;  उसे विपत्ति क्या! सुख क्या!

परन्तु बुढ़िया सबसे यही कहा करती थी- “ मैं नौकरी करूंगी। कोई मेरी नौकरी लगा दो। “ देता कौन। जो एक घड़ा जल भी नहीं भर सकती, जो स्वयं नहीं उठकर सीधी खड़ी हो सकती थी, उससे कौनकाम कराए? किसी की सहायता लेना पसंद नहीं, किसी की भिक्षा का अन्न उसके मुँह में पैठता ही न था। लाचार होकर बाबू रामनाथ ने उसे अपनी दुकान में रख लिया। बुढ़िया की बेटी थी वह दो पैसे कमाती थी। अपना पेट पालती थी, परन्तु बुढ़िया का विश्वास था कि कन्या का धन खाने से उस जन्म में बिल्ली, गिरगिट और भी क्या-क्या होता है। अपना-अपना विश्वास ही है, परन्तुधार्मिक विश्वास हो या नहीं, बुढ़िया को अपने आत्माभिमान का पूर्ण विश्वास था। वह अटल रही। सर्दी के दिनों में अपने ठिठुरे हाथों से वह अपने लिए पानी भरके रखती। अपनी बेटी से संभवतः उतना ही काम कराती जितना अमीरी के दिनों में कभी-कभी उसे अपने घर बुलाने पर कराती।

बाबू रामनाथ उसे मासिक वृत्ति देते थे और भी तीन-चार पैसे उसे चबैनी के, जैसे और नौकरों को मिलते थे मिला करते थे। कई बरस बुढ़िया के बड़ी प्रसन्नता से कटे। उसे नतो दुःख था और न सुख। दुकान में झाड़ू लगाकर उसकी बिखरी हुई चीजों को बटोरे रहना और बैठे-बैठे थोड़ा-घना जो काम हो करना बुढ़िया का दैनिक कार्य था। उससे कोई नहीं पूछता था कि तुमने कितना काम किया। दुकान के और नौकर यदि दुष्टतावश उसे छेड़ते भी थे, तो रामनाथ उन्हें डाँट देता था।

बसन्त, वर्षा, शरद और शिशिर की संध्या में जब विश्व की वेदना, जगत की थकावट, धूसर चादर में मुँह लपेटकर क्षितिज के नीरव प्रान्त में सोने जाती थी;  बुढ़िया अपनी कोठरी में लेटे रहती। अपनी कमाई के पैसे से पेट भर कर, कठोर पृथ्वी के कोमल रोमावली के समान हरी-हरी दूब पर भी लेटे रहना किसी-किसी के सुख की संख्या है, वह सबको प्राप्त नहीं। बुढ़िया धन्य हो जाती थी, उसे संतोष होता।

एक दिन उस दुर्बल, दीन, बुढ़िया को बनिये की दुकान में लाल मिरचें फटकना पड़ा। बुढ़िया ने किसी-किसी कष्ट से उसे सँवारा, परन्तु उसकी तीव्रता वह सहन न कर सकी। उसे मूर्झा आ गई। रामनाथ ने देखा और देखा अपने कठोर ताम्बे के पैसे की ओर। उसके हृदय ने धिक्कारा;  परन्तु अंतर्आत्मा ने ललकारा। उस बनिया रामनाथ को साहस हो गया। उसने सोचा क्या इस बुढ़िया को वह ‘पेंशन ‘ नहीं दे सकता । क्या उनके पस इतना अभाव है? अवश्य दे सकता है। उसने मन में निश्चय किया।

“ तुम बहुत थक गई हो, अब तुमसे काम नहीं हो सकता।  “

बुढ़िया के देवता कूच कर गए। उसने कहा-  “ नहीं नहीं, अभी तो मैं अच्छी तरह काम कर लेती हूँ। “  

“ नहीं अब तुम काम करना बन्द कर दो, मैं तुमको घर बैठे दिया करूँगा।  “

 “ नहीं बेटा ! अभी तुम्हारा काम मैं अच्छा भला किया करूँगी। “

बुढ़िया के गले में कांटे पड़ गए थे। किसी सुख की इच्छा से नहीं, पेंशन के लोभ से भी नहीं। उसके मन को धक्का लगा। वह सोचने लगी-  ‘ मैं बिना किसी काम के किये इसका पैसा कैसे लूंगी? क्या यह भीख नहीं ? ‘ आत्माभिमान झनझना उठा। हृदय तन्त्री के तार कड़े होकर चढ़ गए। रामनाथ ने मधुरता से कहा -  “ तुम घबराओ मत,  तुमको कोई कष्ट न होगा। “

बुढ़िया चली आई। उसकी आँखों में आँसू न थे। आज वह सूखे कंठ भी हो गई। घर जाकर बैठी, कोठरी में अपना सामान एक ओर सुधारने लगी। बेटी ने कहा-  “ मां , यह क्या करती हो ? “

मां ने कहा -  “ चलने की तैयारी। “

रामनाथ अपने मन में अपनी प्रशंसा कर रहा था, अपने को धन्य समझता था। उसने समझ लिया कि हमने आज एक अच्छा काम करने का संकल्प लिया है। भगवान इससे अवश्य प्रसन्न होंगे। 

बुढ़िया अपनी कोठरी में बैठी-बैठी विचारती थी, “ जीवन भर के संचित इस अभिमान-धन को एक मुठ्ठी अन्न की भिक्षा पर बेच देना होगा। असह्य! भगवान क्या मेरा इतना सुख भी नहीं देख सकते ! “  उन्हें सुनना होगा। वह प्रार्थना करने लगी।

 “ इस अनन्त ज्वालामयी सृष्टि के कर्ता! क्या तुम्हीं करुणा-निधान हो ? क्या इसी डर से तुम्हारा अस्तित्व माना जाता है ? अभाव, आशा, असंतोष और आर्तनादों के आचार्य! क्या तुम्ही दीनानाथ हो ? तुम्ही ने वेदना का विषम जाल फैलाया है ? तुम्ही ने निष्ठुर दुःखों को सहने के लिए मानव-हृदय सा कोमल पदार्थ चुना है और उसे विचारने के लिए, स्मरण करने के लिए दिया है अनुभवशील मस्तिष्क? कैसी कठोर कल्पना है, निष्ठुर ! तुम्हारी कठोर करुणा की जय हो ! मैं चिर पराजित हूँ। “

सहसा बुढ़िया के शीर्ण मुख पर कांति आ गई। उसने देखा एक स्वर्गीय ज्योति उसे बुला रही है। वह हँसी, फिर शिथिल होकर लेट रही।

रामनाथ ने दूसरे ही दिन सुना कि बुढ़िया चली गई। वेदना-क्लेशहीन अक्षयलोक में उसे स्थान मिल गया। उस महीने की पेंशन से उसका दाह कर्म करा दिया। फिर एक दीर्घ निश्वास छोड़कर बोला, “ अमीरी की बाढ़ में न जाने कितनी वस्तु कहाँ से आकर एकत्र हो जाती हैं, बहुतों के पास उस बाढ़ के घट जाने पर केवल कुर्सी, कोच और टूटे गहने रह जाते हैं, परन्तु बुढ़िया के पास रह गया था सच्चा स्वाभिमान-" गुदड़ी के लाल।"

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                                                                                                                                                                कहानी समकालीन


                                                                                                                                                                  -ममता कालिया  

         आजादी

बहुत लाड़ करती थीं दादी मेरा।
कोठरी, आंगन पार करती हुई मैं आई और दादी की पीठ पर झूल गई, ' दादी, मन नहीं लग रहा, जायें खेल आयें।'
दादी ने अपनी उंगली से सवा तोले की चमचमाती अंगूठी उतारी और छत की मोटी नाली में, जिसमें से बरसातों में परनाला गली में पड़ - पड़ गिरता था, फेंक दी। मुझसे बोलीं, ' जा ढूंढ कर ला तो जानूं ।'
मैं कूदती - कूदती सीढ़ियां उतर गई । नीचे गली की नाली में पानी के बहाव से अंगूठी आगे भागी जा रही थी। मैं नाली के साथ भागती गई - भागती गई। सात घटिया की नाली, अंगूठी पाना हं- खेल नहीं था। हांफते- हांफते निचाई तक पहुंची तो अंगूठी जमीन तले के गटर में गायब हो चुकी थी।
जिस तेज़ी से गई थी उसी सुस्ती से लौट कर छत पर पहुंच कर मैं बिसूरी, ' दादी...'
दादी अपनी एक टांग पर उठकर आईं, ' खबरदार जो रोई।' फिर पास आकर गोद में उठा कर कहा, ' आज तेरे बाबा आयेंगे तो फिर नाप दे दूंगी।'
मैं खुश हो गई। पांच साल की थी न इसलिये यह पता नहीं चला कि पहली बार ही बनवाने में बाबा को कितनी मुश्किल आई थी और साल भर तक घर के हर खर्चे का हिसाब लगाते समय बाबा उस अंगूठी की कीमत बताया करते थे। इसी पर एक दिन दादी ने गुस्से में अंगूठी चूल्हे में डाल दी, ' लो ठंडक पड़ी तुम्हारे अन्दर, लो यह लो, और लो,' कहती हुई दादी अपनी चूड़ियां, कड़े और लच्छे भी आग में झौंकने लगीं थीं कि मां ने पीछे से उन्हें थाम लिया।
मां से इसीलिये चिढ़ती थीं दादी। मां ने बीच - बचाव किया नहीं कि दादी का पारा गरम। फिर दादी पता नहीं क्या - क्या बकने लगतीं, उन्हें रांड, हरामज़ादी कहने के साथ - साथ बाबा की पतुरिया कह डालतीं। तब बाबा तख्त से उठ कर आते और दादी को एक लात मार कर घर से बाहर चले जाते।
घर एकदम सन्न रह जाता। दादी न रोतीं न चीखतीं, बस सतर अपने तख्त़ पर बैठ जातीं। उनकी शक्ल कुछ अजीब ढंग से सख्त हो जाती। वे अपने दायें हाथ का पंजा बार - बार फैलातीं - सिकोड़तीं, फिर एक टांग पर उठ कर मां की कोठरी के सामने होकर मुनादी करतीं, ' आज चूल्हा नहीं जलेगा बहू, खबरदार जो चौके में घुसी।'
मां ने भी उन्हें जलाने की कसम खाई हुई थी। उनकी इस घोषणा के साथ - साथ मां छींके पर से आलू उतार कर काटने लगतीं। दादी एक बार फिर गालियों की बौछार करती हुई, मुझे मां के पास से छीन कर पूजावाली कोठरी में आ जातीं। मैं उनका धचक-धचक चलना देखती और मज़ा लेती। दादी के गुस्से के बारे में मुझे सिर्फ इतना पता था कि अगर वे पूजाघर में आकर धूप जलायें तो समझो गुस्सा उतरने ही वाला है।
फिर मैं धीरे से पूछती, ' दादी पान खाओगी?' और बस दादी की घर- भर से सुलह हो जाती।
दादी के पान चौके में रखे पानी के बड़े तमेड़े में पड़े रहते। सुबह सुबह छिट्टू पान दे जाता और मैं कैंची से काट - काट कर लम्बी कतरनें बना देती। दादी का कहना था, मुझसे पहले इस घर में कभी किसी ने उन्हें पान लगा कर नहीं खिलाया।
मैं तमेड़े में से पान की एक कतरन लेकर चौके के आले से पानदान लेती और सीधे हाथ की पहली उंगली से उस पर चूना, कत्था लगाती, सुपारी का चूरा रखती और पीली तम्बाकू की पांच पत्तियां। कभी - कभी पान लेकर जाने के सिलसिले में कतरन में से एकाध पत्ती या सुपारी खिसक जाती। दादी झट पहचान जातीं, ' आज हमारे लटूरबाबा पान बनाना भूल गये।'
मैं पूछती, ' दादी, क्या कम है, चूना, कत्था?'
' नहीं।'
' सुपारी?'
' नहीं।'
' फिर?'
' पत्ती।'
और मैं पत्ती लेने रसोई में भागती।
कभी दादी नहाने को गुसलखाने में घुस जातीं तो मेरा वक्त न कटता। मैं गुसलखाने की मोरी में झुककर झांकती और उसी में से बातचीत शुरू हो जाती -
' दादी, कितनी देर लगाओगी?'
' अभी तो मैं पैर रगड़ रही हूँ।'
बिना ठहरे में कहती -
और अब क्या कर रही हो?
दादी जवाब देतीं, फिर मैं सवाल करती, फिर वे जवाब देतीं। मेरा नया सवाल हाज़िर होता। जब मोरी में से साबुन का झागदार पानी निकलता तो मैं ताली पीटती, अहा हा, दादीजी नहा चुकीं, अहा हा! '
अगर मां आंगन में होतीं तो मुझे देख देखकर दांत पीसतीं -' आना रात को मेरे पास, अच्छी तरह बताऊंगी।'
रात को दादी के पास सोने में मुझे डर लगता था। सोने से पहले वे बाबा के पैर दबाती थीं। कभी - कभी मैं सो जाती और बीच रात में पेशाब के लिये आंख खुलती तो देखती, दादी तब तक पैर ही दाब रही हैं।
मैं कहती, ' दादी सो जाओ।'
दादी लम्बी सांस लेतीं, ' मैं तो अब लकड़ियों में ही सोऊंगी, ये मरे पैर मेरा दम ही खींच लेंगे किसी रोज़।'
और बाबा जिन्हें अनिद्रा की पुरानी बीमारी थी, चीख पड़ते, " ससुरी हमें गाली देती है, एक टांग भगवान ने लेली, एक हम तोड़ देंगे, समझी।'
दादी - बाबा की लड़ाई में मैं बहुत अकेली पड़ जाती। दादी तड़ातड़ जवाब देती रहतीं थीं, फिर बाबा उठकर उन्हें दो एक धौल जमा कर मुंह फेर कर लेट जाते।
मैं इसीलिये मां के पास सोती थी।
मां रात में मेरा गाल नोंचते हुए घुड़कतीं, ' आई बड़ी दादी की मनैती, पढ़ना न लिखना, दिन भर चुअरियों की तरह उसके कामों में लगे रहना। उसका क्या है। उसका क्या है उसकी मां कुंजड़न थी। वह तो पनवाड़न लगती है तू भी पनवाड़न बनेगी! '
दिन में अगर किसी बात पर मैं मां से रूठ जाती तो ये सब बातें दादी तक पहुंचा देती। और दादी का संवाद शुस्र् हो जाता, ' हां - हां, हम कुंजड़न की बेटी ही पर तुम कोई कलट्टर की जाई नहीं हो। तुम्हारा बाप भी वही परचूनिया रहा, तराजू लिये - लिये चल बसा। किरियाकरम में बीस आदमी न जुड़े ...।'
मां मेरी तरफ देखती और अंगारा बन जातीं। मैं उस दिन दादी का आंचल न छोड़ती। उस रात फिर मेरी पिटाई होती। बचाव के लिये मैं ज़ोर - जोर से रोना शुरू कर देती। दादी अपने कमरे से पुकारतीं, " मुन्नी, मुन्नी, री बहू मेरे लटूरबाबा को हाथ न लगाना, हां।'
बाल मेरे बहुत छोटे छोटे थे। दिन में तीन बार दादी कस-कस कर चोटी करतीं और कलाया बांध देतीं पर मेरे बाल फिर आगे पीछे से निकल कर आंखों पर बिखर जाते । नाममात्र को कलाया बंधा रह जाता। इसलिये दादी ने मेरा नाम लटूरबाबा रखा था। मेरे और भी दर्जनों नाम थे। दादी कहतीं, ' डॉक्टर मुन्नालाल, ज़रा मेरा छुनछुना गरम कर दे बेटा।'
मैं चौके में जाकर वह कटोरा उठाती जो घी और हल्दी से हमेशा पीला रहता था। फिर दादी उसमें एक कलछी घी, हल्दी और पिसी हुई सोंठ डाल कर चूल्हे पर चढ़ा देतीं। उसका छुन - छुन छुनछुनाना मुझे बड़ा अच्छा लगता। जब हल्दी नारंगी रंग की हो जाती तो मैं चिल्लाती दादी, छुनछुना तैयार है।
दादी संडासी से उतार कर मेरे सहारे से धचक धचक चलती हुई कमरे में आ जातीं। मैं उनके सामने घुटने सिकोड़ कर बैठ जाती। दादी अपनी सूखी पतली लौकी जैसी टांग के पंजे में बंधे रूअड़ के पुलिन्दे पर से पत्टी उतारतीं और रूअड़ हटाकर देखतीं। इस पैर का छोटा सा पंजा था, मेरे हाथ बराबर और उसकी छोटी छोटी जुड़ी उंगलियों में नाखून नहीं थे। दादी दोनों हाथों से पैर थाम कर कहतीं , ' अरे राम रे, बड़ी टीस होती है चलते चलते।'
मैं पूछती, 'दादी कब ठीक होगी तुम्हारी टांग?'
दादी रूई से पंजे पर हल्दी - सोंठ लगातीं, ' जब मेरा लटूरबाबा डॉक्टर मुन्नालाल बनेगा तब।'
और मैं निश्चय कर लेती कि छप्पर वाली गली के नुक्कड़ पर बैठने वाले डॉक्टर मुन्नालाल से भी बड़ी डॉक्टर बनूंगी। सबसे पहले दादी की टांग ठीक करूंगी, फिर अपने बाल, फिर बानू की गुड़िया, फिर... मेरी समझ में यह सब काम डॉक्टर के ही करने के थे।
दादी टांग की पीड़ा भूलने के लिये कहतीं, ' मुन्नी री कहानी सुनेगी?'
' कौन सी? दादी वह सुनाओ चतुर कौए वाली।'
दादी की कहानी शुरू हो जाती।
सावन में घर के बाहर वाले छप्पर में झूला पड़ जाता। हम सब छोटी बड़ी लड़कियां एक दूसरी को झोंटे दे दे कर झुलातीं और गातीं - शिवशंकर चले कैलाश, बुंदियां पड़ने लगीं
गौरी जी ने बोई हरी - हरी मेंहदी, तो शिवजी ने बोय दई भंग... बुंदियां पड़ने लगीं
कभी कभी दादी मुझे झुलातीं और अपना प्रिय गाना सुनातीं -
' बाग में पपीहा बोले मैं जानूं कोई आया रे
आया रे मेरा बब्बू बेटा
सौ - सौ चीजें लाया रे,
बाप को चद्दर, मां को धोती
मुन्नी को चूड़ी लाया रे
बहन की तीअर भूल आया, सौ - सौ नाम धराया रे
बाग में पपीहा बोले...
घर में जिसको जिस चीज़ की ज़रूरत होती, गाने में उसी के अनुसार रद्दोबदल होती रहती। बब्बू बेटा सबके लिये फितूरी, दुशाला, सूटर, चप्पल और न जाने क्या - क्या लाते रहते, बस बुआ की चीजें भूलते जाते।
मां सारा दिन काम करतीं और बड़बड़ाती और सोते समय भी। मैं पूछती, ' यह तुम सारा दिन क्या बोलती रहती हो मां, कुछ सुनाई भी नहीं देता ठीक से।'
मां दांत पीसतीं, ' तुझसे मतलब, तू सारा दिन उसके चील - कौए उड़ाया कर।'
बाबू आगरा में पढ़ते थे।
जब मैं थोड़ी बड़ी हो गई, मैं ने देखा बाबू जब आगरे से लौटते, मां रात में देर तक उनसे झगड़ा करतीं, ' हमारी मिट्टी क्यों खराब की ब्याह करके? या हमें ले चलो या यहीं अपने हाथ से ख़त्म कर दो। हमसे नहीं होती सारी उमर बुड्ढे - बुड्ढी की टहल - फिकिर। सारा दिन ऐसा लगता है जैसे तख्त पर दो मेंढक बिठा दिये हों।'
बाबू गुस्सा हो जाते। गाली- गलौज उन्हें पसन्द नहीं थी, गुस्से के मारे अपनी खटिया खींच कर दूर कोने में ले जाते।
बाबू के आने पर दादी इतनी खुश हो जातीं कि लगता वे बिलकुल ठीक हो गई हैं, न उनका पैर दुखता है, न आंखें पनियाती हैं। उस दिन वे अपने हाथ से खाना बनातीं और सामने बैठ कर खिलातीं। मैं सोचती, बाबू जल्दी- जल्दी आया करें तो कितना अच्छा हो।
एक बार बाबू आगरे से लौटने पर टीन का एक कंघा लाये। घर आने पर दादी ही उनका बक्स खोलती थीं। कंघा निकाल कर बोलीं, ' मेरे लिये लायौ?'
बाबू सर खुजाने लगे, ' अम्मा रास्ते में बाल बिगड़ जाते हैं हवा से, येई मारे ले आयौ।'
दादी ने चुपचाप कंघा वापस रख दिया।
जब बाबू चले गये, तो एक दिन मैं ने देखा, मां उसी कंघे से बाल संवार रही हैं, मैं ने फौरन जाकर दादी से कहा।
दादी तख्त पर से उठ कर आईं, ' खसम से लेकर इतरा रही है।ये छिछोरापन यां न करियो। हम भी कहें छोरा का दिल क्यों रत्ती - रत्ती हुऔ जाय है, मां को देने के नाम पै!
दादी सारा दिन कुपित रहीं। मां जहां खड़ी होतीं, उनके पीछे घुड़कने लगतीं -
' चिट्ठी लिखी थी बड़के को?'
' हमसे कहती तो कंघा न मिलता?'
' रोज पत्तियां काढ़ा करैगी का?'
मां ने कुछ नहीं कहा। बाल बांध कर विजयी मुस्कान के साथ कंघा आले में रख दिया।
शाम को दादी ने मुझसे कहा, ' मुन्नी, ज़रा वह कंघा तो उठा ला।'
हम दोनों उस समय छत पर बैठे थे। मैं ने नीचे जाकर आले में से कंघा लाकर दे दिया। दादी ने झट कंघा उस मोटी नाली में डाल दिया जिसमें से बारिशों में परनाला पड़ - पड़ गिरा करता था। मैं ने मचल कर कहा, ' दादी ढूंढ कर लाऊं?'
दादी ने आंख दिखाई, ' पैर तोड़ देंगे, खबरदार!'
घर में दो लोगों से दादी की बिलकुल नहीं पटती थी। हम थे कुल चार। मैं बड़ी फूली फिरती थी, दादी की चहेती जो थी। मां से निपटने के बाद बाबा का नम्बर आता था। छत की दीवार से जुड़ी लेकिन घर के बाहर जो कोठरी थी उसीमें दुकान थी। मेरे मन में दुकान को लेकर हमेशा कौतुक बना रहता था। दुनिया भर का सामान बाबा उस छोटी सी दुकान में रखते थे। दादी कभी हल्दी, कभी दाल के लिये मुझे दुकान की तरफ रवाना कर देतीं। मैं पहले झिर्री में से झांक कर देखती, बिलकुल बाइस्कोप का मज़ा आता। बोरों के पीछे चूहों की धमाचौकड़ी कभी दिख जाती तो दिन दिलचस्प हो जाता। फिर मैं दुकान के सामने वाले दरवाजे पर जाकर बाबा से चीज़ की फरमायश करती। बाबा खाली बैठे होते तो भी एक बार मना ज़रूर करते, ' चल भाग, दुकानदारी न खराब किया कर सुबह - सुबह।'  मैं फिर भी न जाती। वहीं फ्रॉक समेट कर बैठ जाती। तब पिण्ड छुड़ाने के लिये बाबा पुड़िया बांध कर मेरी तरफ फेंक देते।
दादी को यह सब पसन्द नहीं था। बाबा दुकान से काफी हुज्जत के बाद एक दिन का सामान निकाल कर देते थे। अगले दिन फिर वही खींचातानी। दादी ने कई बार कहा कि तराज़ू से तौल कर सेर पक्की दाल और पंसेरी चावल अलग रख दें पर बाबा इसे फिजूलखर्ची मानते थे। वे कहते, ' ज़्यादा दिखेगी तो ज़्यादा उठेगी।' एक बार तो वे काली मिर्च की डिबिया चौके से उठा कर ले गये कि ये आठ रूपये की बिक जायेगी।
हम लोग कभी - कभी विश्रामघाट जाते थे। वहां औंधे पड़े कछुए देखकर मुझे डर लगता और मज़ा भी आता। दादी उन्हें छू: - छू: कर दूर भगा देतीं और देर तक नहातीं। वहां उनकी कुछेक सहेलियां मिल जातीं। कपड़े बदलते , माला फेरते दुनिया जहान की बाते कर ली जातीं। ऐसी बातचीत के दौरान ही दादी को मनसा ने बताया कि डैम्पियर पार्क में एक बड़ा लायक डॉक्टर आया है, वकीलनी की टांग ऐसी ठीक की है कि कल तक बिस्तर पर हाय - हाय चिल्लाने वाली वकीलनी आज दगड़ - दगड़ करती फिर रही है। दादी सुनकर बहुत खुश हुईं, 'आज जमना मैया ने हमारी सुन ली, हम अभाल ( अभी हाल) जायेंगे वहां।'
जितनी तेज़ वे चल सकती थीं, उतनी तेज़ चलती हुई वे घर आईं और बिना सुस्ताये सीधी बाबा की दुकान पर खड़ी हो गईं, ' अजी, डैम्पियर पार्क में एक बड़े डागडर आये हैं, हमें दिखाय लाओ।'
बाबा को बात पसन्द नहीं आई, ' का भयो है तोय?'
दादी को गुस्सा आ गया, ' तुम हमारी दूसरी टांग भी तोड़ दो, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।'
बाबा बोले, ' अच्छे डागडर की फीस भी अच्छी होगी, का फायदा? तुम्हें कौन ब्याह रचाना है। मऱ्ज और कर्ज समय पाकर जाते हैं बब्बू की मां। डागडरन की चीर फाड़ से तो या जनम भी खराब वा जनम भी खराब।'
दादी दुकान से हट आईं। मैं ने दोपहर में कहा, ' चलो दादी, चुपके से डाक्टर को दिखा आयें।'
दादी कुछ नहीं बोलीं बस मुझे कस कर छाती से लगा लिया। उस दिन के बाद से उन्होंने पैर में छुनछुना लगाना भी बन्द कर दिया।
पता नहीं क्यों दादी को अगर फोड़ा - फुन्सी निकलती तो वह जल्दी ठीक नहीं होती थी। वह धीरे धीरे फैलती जाती फिर उसमें मवाद पड़ जाता। दादी आंगन के नीम की पत्तियां पीस कर उस पर बांधती पर फोड़ा बहुत दिनों के बाद ठीक होता। अब तो उन्होंने यह सब भी बन्द कर दिया था।
मां कभी दादी के पास नहीं बैठतीं। काम में लगी रहतीं और जब काम न करती होतीं तो अपनी कोठरी में आंखों पर हाथ रख करकर पड़ रहतीं। मैं जाकर पूछती, ' मां क्या बात है, थक गई हो?'
वे कुछ न बोलतीं।
मैं कहती, ' कहां दर्द है लाओ दबा दूं।'
मां मेरा हाथ झटक देतीं, ' जा भाग उसी के पास।'
एक बार बाबू आगरे से लौटे। उनके बक्से में से कुछ लड्डू निकले, सूख गये थे, लेकिन स्वादिष्ट। बाबू ने सबको एक - एक दिया, ' हमारे कॉलेज में बंटे थे, आज़ादी मिल गई उसी खुशी में पन्द्रह अगस्त को बांटे गये।'
दादी चौंक उठीं, ' का मिल गयौ है?'
' आज़ादी, आज़ादी, अब हम गुलाम नहीं रहे, हमारा अपना राज हो गया। गांधी बाबा ने सुराज दिला दियौ है।'
' अब का हौगो?'
' हौगो का? इतनी बड़ी बात है, तुम समझ ही नहीं रही हो तो का करैं। सबको आज़ादी मिल गई अब।'
मैं बिना समझे ताली बजाने लगी, ' अहा जी - अहा जी, आज़ादी मिल गई अहा जी।'
दादी अचम्भे से बोलीं, ' सबौ को मिल गई?'
' हां - हां ।'
उन्होंने एक लम्बी सांस खींची, ' हमें ना मिलौ गांधी बाबा नहीं तो वासे कहती एकठो फितूरी दिलाय दें, आज़ादी का कहा करैं, न ओढ़बे की चीज न बिछाबै की!'
बाबू खिन्न हो गये, ' तुम्हें कुछ भी समझाना बड़ा मुश्किल है अम्मा।'
दादी ने अपना लड्डू थोड़ा - सा चख कर मुझे ही दे दिया। मां ने अपने हिस्से का लड्डू अनखाया रसोई की पड़हरी पर रख दिया जहां नज़र पड़ते ही चील की तरह झपट्टा मार मैं उठाकर खा गई।
बाबू इस बार घर पर पूरे वक्त बस पढ़ते ही रहे। मेरे लिये भी एक किताब लाये थे और सुबह - सुबह पढ़ाते थे। जब मैं जल्द समझ लेती तो मां की ओर देख कर कहते, ' मुन्नी की बुद्धि में कोई खोट नहीं। बस निचावली नहीं बैठती, यही मुश्किल है।'
बाबा घर में होती चहल- पहल से बेखबर अपनी दुकान में गद्दी पर बैठ कर गल्ला गिनते रहते। एक दिन ब्यालू के बाद बाबू से बोले, 'बब्बू तेरी पढ़ाई खत्म भयै वाली है, दुकान गद्दी संभारौ अब। मैं बहुत थक गयौ हूँ ।'
बाबू सन्न रह गये।
बाबा बोले, ' आखरी साल है न जे?'
' हां, बाऊजी।'
'तो बस इस बार तुम हिसाब - किताब समझ लो। दिवाली पर बहीखाता, बांट - तराजू तुम्हीं पूजियो आय के।'
' दुकान पर बैठने के लिये तो मैं एम. ए. नहीं कर रहा हूँ बाऊजी, मैं ज़ोरों से नौकरी ढूंढ रहा हूँ, पास होने तक मिल ही जायेगी।'
बाबा एकदम भड़क गये, ' नहीं बैठेंगे, का मतलब? का इसीलिये तोय पढ़ायौ है कि तू पढ़ लिख कर कुर्सी तोड़े! ससुरी फीस भरी है जनम भर। मर - मर कर पढ़ायौ है कि लोगों के सामने छाती ठोंक कर कहैं, ' देखो मेरा छोरा ऐ, सोलह क्लास पढ़ौ है।'
बाबूजी दबी ज़ुबान में बोले, ' लेकिन मैं ने तो बूरा तोलने के लिये पढ़ाई नहीं की।'
'मोपै नायं तेरी फीस के स्र्पे, चाहे जा कान सुन चाहे वा कान। पिछला रूपया भी मुझे लौटाल दे जो अपनी मैया को दूध पिये हौ।'
दादी बीच में बोलीं, ' अभी उमर का है, फिर नौकरी करेगा तबौ स्र्पये घर में आयेंगे।'
' चुप रह, तोय का समझ है। कल को अलगौझा हुआ तो पैसा अपने बटुए में रखैगो की नहीं?'
इतनी दूर की कौड़ी दादी को नहीं सूझी थी। चाहती तो वे भी थीं कि बाबू उनकी आंखों के सामने रहें, लेकिन इस वक्त वे चाहती थीं कि बाबू के आने पर घर में सब राजी - खुशी रहे, लड़ाई - झगड़ा न हो। इसी वजह से वे मां को भी बार - बार कहतीं थीं, ' हंसी - खुशी से काम किया कर, सूजो हुओ म्हौंड़ो बब्बूएै ज़रा पसन्द नहीं।'
मां तमक कर कहतीं, ' हमें तो बंसीवाले ने ऐसा ही बना कर भेजा है, ऐसे ही रहेंगे। शक्ल उधार कहां से लायें?'
बाबू भुनभुनाते घर में घूमते रहे, ' अजीब किस्सा है ये, पढ़ - लिख कर भी बांट तराजू से सिर फोड़ो। पढ़ने का क्या फायदा अगर अपना रास्ता चुनने की आज़ादी न हो!'
दादी ने सुन कर उसांस भरी, ' तोय तो फिर भी कछु है, मोय देख! ये इतनौ बड़ौ फोड़ो है पीठ पे पर तेरे बाबू जर्राह के नहीं ले जाते। रे बब्बू, तेरी नौकरी लगे तो सबसे पहले मोय डागदर के ले चलियो।'
बाबू बोले, ' तुम मेरे पास ही रहा करना अम्मा।'
पीठ के फोड़े में चीरा लगाना था। चीरा लगाने के जर्राह सात स्र्पये मांग रहा था। जब - जब फोड़े का मवाद दर्द के चपक्के मारता, दादी कराहती हुई जर्राह से जाकर हुज्जत कर आतीं। जर्राह कभी टस से मस न हुआ। दादी दुखी होकर कहतीं, ' अच्छी आज़ादी आई मरे चीर फाड़ के भी स्र्पये लगने लगे। पहले यही जर्राह एक सेर गुड़ लेकर चीरा लगाबे था।'
बाबा ने समझाया, ' अरी मैं तो कहूँ इसे बिलकुल न छेड़। पुल्टिस बांधे जा, ससुर आपई फूटैगो।'
फोडा नहीं फूटा। धीरे - धीरे सारे शरीर में मवाद फैल गया। तख्त पर लेटे लेटे कराहतीं, किसी से कुछ न मांगती न पूछतीं।
गली की पाठशाला में मेरा नाम लिखवा दिया गया था। नई सहेलियों, नई किताबों में मैं मशगूल हो गई, फिर भी सुबह स्कूल जाने से पहले और स्कूल से लौटने पर सबसे पहले मैं दादी के पास ही दौड़ी आती,' दादी, मैं स्कूल जा रही हूँ ', 'दादी, मैं आ गई।' दादी मेरे सिर पर हाथ फेर कर मुझे चूम लेतीं। दो, तीन और चार का पहाड़ा दादी के पास बैठकर ही याद किया था मैं ने। याद कर मैं उन्हें सुनाती, वे आंखें बन्द करके सुनती रहतींं।
एक दिन स्कूल में सफेद कपड़े पहन कर आने के लिये कहा गया। सुबह - सुबह पन्द्रह अगस्त का जलसा था। मैं मुंह अंधेरे नहा कर तैयार हो गई। स्कूल जाने से पहले दादी की कोठरी में गई, ' दादी, आज आज़ादी का दिन है, हम स्कूल जा रहे हैं, तिरंगा झंडा फहराया जायेगा।'
दादी बोलीं, ' री मुन्नी, थोड़ी आजादी मेरे लिये भी ले आना पुड़िया में बांध कै।'
मैं हंस पड़ी।
जन गण मन गाने के बाद बहनजी ने सबको लाइन में खड़ा करके बताशे बांटे। दोना भर बताशे थे लेकिन हम लड़कियों को लग रहा था, जैसे झउआ - भर हों। कई लड़कियों ने तो उसी समय अपना हिस्सा चबा डाला। मैं ने दो बताशे मुंह में डाले और चूसती रही। घर आते हुर मैं ने सोचा आधे दादी के लिये रख दूंगी और दादी को आज जन गण मन गा कर सुनाऊंगी।
कोठरी में जाकर मैं ने पीठ के पीछे हाथ ले जाकर कहा, ' देखो दादी, मैं सच्ची - मुच्ची आज़ादी लाई हूँ, पुड़िया में बांधकर।'
यह क्या! दादी न हंसी न बोलीं, न मेरी तरफ करवट ली।
मैं झपटकर दादी के पास पहुंच उन्हें हिलाने लगी।
दादी आसानी से नहीं हिलीं। उन्हें वाकई आज़ादी मिल चुकी थी। 


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                                                                                                                                                                    लघुकथा


                                                                                                                                                          -संदीप कुमार मील

तीन खबरें

 सेठ गंगाप्रसाद की हवेली के पिछवाडे में एक छोटा सा बगीचा था,जिसे सेठ गुप्त और व्यक्तिगत मसलो के लिए इस्तेमाल करता था। सेठ का मानना था कि यह दुनिया की सबसे सुरक्षित ज़गह है, जहां परिंदा भी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ दाखिल नहीं हो सकता है। वो बात अलग थी कि कभी कभी कुछ कबूतर सेठ की बगैर मर्ज़ी दाखिल हो जाते थे। यहाँ पर सेठ कुछ खास किस्म के लोगों से ही मिलता था । इस बगीचे में सेठ के गुप्त वार्तालाप में उनका नौकर रामुडा भी मौजूद रहता था। जिसकी सूरत देखने से ही पता चलता था की उसे सेठ ने भगवान को विशेष तौर पर रिश्वत देकर अपने लिये बनवाया है, क्योंकि वो सेठ के हर आदेश को उनकी आँखों से समझ लेता था। सेठ कभी कभार मजाक में कहा करता था कि रामुडा और मेरी आँखों के कनेक्शन एक है जिसे दुनिया में हम दोनों के आलावा कोई नहीं समझ सकता है । सेठ की दुनियाँ भी तो उसी कस्बे तक सीमित थी और उसका मानना था कि इस कस्बे को लूटने का पटा उसे खुद भगवान ने दिया है जिसका कोई लिखित दस्तावेज नहीं है और अगर है भी तो भगवान की भाषा आम आदमी के समझ में नहीं आती। वो तो सिर्फ दुनिया के चंद सेठ जैसे ज्ञानियों के ही समझ की बात है।  फिर भी सेठ दिखने में बहुत ही सज्जन लगता था और उसके चेहरे की चमक को देख कर तो एक बार रात में चाँद की चमक भी फीकी पड़ गयी थी जिसे पंडितों ने चंद्रग्रहण की संज्ञा दी थी। इसिलए सेठ आजकल चाँद पर रहम करके रात को अपने कमरे से बाहर नहीं निकलते और अगर निकलते भी है तो चेहरे पर नकाब लगा कर ताकि दुनियाँ को रोटी मिले या न मिले कम से कम चाँद तो नसीब हो जाये। जिसे भूखे बच्चे मामा समझ कर रोटी मांगें और रात भर इंतजार करके सो जाये क्योंकि रोटी तो सेठ की तिजोरी में बंद थी जो सड तो सकती थी मगर भूखे को नहीं मिल सकती थी। सेठ जी सुबह सुबह पूजापाठ करके बगीचे में आकार बैठ गये और फिर उन्होंने जिस तरह से रामुडा को पुकारा उस आवाज से साफ जाहिर था कि आज कोई गंभीर वार्तालाप होने वाला है। रामुडा आकर बोला,' सेठ जी आज अख़बार में आया है कि सरकार ने शराब पर पाबंदी लगा दी है '. सेठ जी गंभीर मुद्रा में कुछ देर शांत रहे जैसे मुहँ से कोई अमृत धारा निकलने का रास्ता तलाश रहीं हो, फिर बोले,' सतयुग में तो देवता भी सोमरस पीते थे और वो सोमरस का प्रसाद जनता को जरुर मिलना चाहिए, उसे हम सरकारी कानून को तोड़ कर भी जनता को उपलब्ध कराएँगे। यही हमारा धर्म और व्यवहार दोनों है.'। वैसे तो सेठ जी की कोशिश हमेशा रहती थी कि वो धर्म को व्यवहार  में उतारे मगर उनकी इच्छा इतनी प्रबल थी कि व्यवहार आखिर विजय पाता जिसे धार्मिक आचरण की संज्ञा देने के लिए वो तीन ब्राह्मण परिवारों का पालन पोषण करते थे।  हुआ यूँ कि सेठ गंगा प्रसाद और प्रेम लाडखानी उसी पिछवाडे के बगीचे में बैठ कर अवैध शराब बनाने कि योजना बना रहे थे। पास खडा रामुडा चुप चाप देख रहा था। दोनों ने तय किया कि कस्बे के बहार प्रेम लाडखानी कि जमीं है जो चारों ओर से टीलो से घिरी हुई है , वहां शराब बना कर सेठ की उस गोदाम में भरी जायेगी जिसकी जानकारी वो तीनो के अलावा कोई नहीं रखता। शराब निर्माण जोर शौर से शुरू हुआ। भारतीय पुलिस को तो सेठ जैसे लोगो ने पैसे की थेली से नपुंसक बना दिया है। बिना वैज्ञानिक विधि के शराब बना कर सेठ की गोदाम में भर दी गयी और धीरे धीरे बिक्री शुरू हुई । आज पहले ही दिन की बिक्री काफी हुई तो पैसे का हिसाब लगाते लगाते रात के 2 बज गए इसलिए रमुडा को घर लोटने में देरी हो गयी थी।. दूर से ही उसे रोने चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। रामुदा  की जान निकल गयी। असमान में मोरो के चिल्लाने की आवाज़ से कलेजा फट रहा था। पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कांपती आवाज़ में बोला,' तुम्हारा  ....सुरेश..नही .... ज़हरीली शराब..'. रामुदा की मुठियाँ बंद हो चुकी थी पैरों में घोडे की ताकत आ गयी थी वो एक चीख के साथ वापस दोड़ा,' सेठ..ठ..ठ ..ठ .' मोहन हकाबक्का देखता रह गया न पीछे दोड़ सका न रो सका.।


सुबह अखबार में तीन खबर थी-


-1. ज़हरीली शराब से 250 लोगो की मौत 


2. सेठ गंगा प्रसाद की गोदाम में आग - लाखों का नुकसान 


3.प्रेम लाडखानी के खेत के पास एक लावारिस लाश मिली।

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                                                                                                                                                                            मुद्दा


                                                                                                                                                             -डॉ.  वेदप्रताप वैदिक




कानून की छोटी सी दुम


 कोई अ-मुददा कैसे मुददा बनता है, इसका ताज़ा उदाहरण है, दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला !


समलैंगिकता पर दिया गया फैसला ! स्वयं यह फैसला और इस फैसले में उछाला गया मुद्रदा क्या सचमुच कोई मुद्रदे हैं ? भारतीय समाज में समलैंगिकता ज्वलंत मुददा कब रहा है ? न उस समय जब 1861 में लार्ड मैकाले ने यह कानून भारत पर थोपा था, न प्राचीन काल में और न ही आज ! अपवादस्वरूप तो वह मनु और वात्स्यायन के काल में भी था| लेकिन जी हॉं, यह बि्रटिश समाज और यूरोपीय समाज का गहरा सिरदर्द जरूर था| उसी औपनिवेशक सिरदर्द को मैकाले ने भारत पर थोप दिया|

                              साम्राज्यवादी शासन के कारिंदे जब दूर देशों को गुलाम बनाने जाते थे तो अपने साथ अपने बीवी-बच्चों को नहीं ले जाते थे| खास तौर से 1857 के खून-खराबे के बाद ! फौजियों की तरह वे अनजान और सुनसान प्रदेशों में कुण्ठामय जीवन बिताते थे| वे स्थानीय औरतों से संपर्क जरूर करते थे लेकिन उन्हें हमेशा रंगे हाथ पकड़े जाने का डर रहता था, क्योंकि संतान से बड़ा प्रमाण क्या हो सकता था| इसीलिए पुरूष शासक पुरूष शासितों को अपना शिकार बनाते थे| ताकि अपराध भी करें और उसका प्रमाण भी न रहे| साथ ही वंश-श्रेष्ठता भी बनी रहे| इस दिन-रात फैलती बीमारी का इलाज करने के लिए मैकाले ने समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करवाया था|

                              1861 के कानून के मुताबिक हर तरह की समलैंगिकता अपराध थी| जो डराकर, जो लालच देकर और जो बलपूर्वक किया जाए, वह समलैंगिक सहवास तो अपराध था ही, उस सहवास को भी अपराध माना गया, जो दो वयस्क पुरूष आपसी सहमति से करते थे| इसके भी दो कारण थे| एक तो किसी शासित या पर-निर्भर से किसी भी मुद्रदे पर सहमति लेना काफी आसान होता है और दूसरी बात, जो कि विक्टोरियाई इंग्लैंड में बहुत महत्वपूर्ण थी, वह यह थी कि स्त्री-पुरूष के समवाय से बनी परिवार नाम की संस्था की रक्षा ! समलैंगिकता याने परिवार-प्रभंजन ! ईसाई नैतिकता का नकार ! पति और पत्नी, दोनों ही एक-दूसरे को धोखा देने की छूट पा जाएंगे| दूसरे शब्दों में परिवार नामक संस्था अपने आप भंग या भग्न हो जाएगी| भारत में राज करनेवाले ब्रिटिश परिवार सही-सलामत रहें, इस दृष्टि से मैकाले ने ठीक ही किया लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि अंग्रेज के बिदा होते ही यह मुद्रदा भी बिदा हो गया ? मुद्दा तो बिदा हो गया लेकिन वह अपनी कानून की दुम यहीं छोड़ गया| इस छोटी-सी दुम को दिल्ली उच्च-न्यायालय ने अब काटकर फेंक दिया है| इस पर ताली बजाने या छाती कूटने की क्या जरूरत है ?

                      इस छोटी-सी दुमकटाई को आखिर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है ? सारे टी वी चैनल और अखबारों के मुखपृष्ठ इस फैसले से रंगे हुए हैं| समलैंगिक स्त्रियां बड़े फूहड़ अंदाज में स्त्रियों का और पुरूष पुरूषों का आलिंगन-चुंबन करते हुए दिखाए जा रहे हैं| इन लोगों से कोई पूछे कि यह कौनसी स्वतंत्र्ता है ? यह कौनसी गरिमा है ? हमारे यहां तो ऐसा बर्ताव सभी के लिए वर्जित है, चाहे वे पति-पत्नी ही क्यों न हो ? यह भारत है, यह ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस नहीं है| हमारी अदालतें, हमारे अखबार और हमारे चैनल-सभी पश्चिम की गुलामी में लगे हुए हैं| नक़ली समस्याओं और नक़ली समाधानों पर वे पगलाए जाते हैं|

                     समलैंगिकता के समर्थकों का यह तर्क तथ्यों के बिल्कुल विपरीत है कि आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने वालों को पुलिस तंग करती है| कोई दो पुरूष या दो स्त्री अपने शयन-कक्ष में स्वेच्छा और सहमति से क्या करते हैं, इससे दूसरों को क्या मतलब है ? पुलिस उन्हें परेशान क्यों करेगी ? पुलिस को पता कैसे चलेगा ? जब तक दोनों में से कोई एक, शिकायत या चर्चा या प्रचार न करे, किसी को भी क्या पता चल सकता है ? आपने अपनी रसोई में बैठकर निंबू का अचार खाया है या आम का, इससे किसी तीसरे को क्या लेना देना ? पुलिस और अदालत को तभी बीच में आना पड़ता है, जब मामला जोर-जबर्दस्ती का हो| जोर-जबर्दस्ती ही बलात्कार है| वह समलिंगी हो या उभयलिंगी,  वह गलत है, गैर-कानूनी है, अनैतिक है| स्वेच्छावाले कितने मामले पिछले डेढ़ सौ साल में पकड़े गए हैं और अदालत के सामने लाए गए हैं ? क्या कोई आंकड़ा उपलब्ध है ? जिस 'नाज़ फाउंडेशन' ने यह मामला अदालत में जीता है, उसके कर्ता-धर्ता को पुलिस ने दस साल पहले इसलिए पकड़ा था कि उन्होंने बेंगलुरू में लोगों को समलैंगिक सहवास का प्रशिक्षण देने के लिए बाक़ायदा कक्षाएं शुरू कर दी थीं| अगर कोई विषमलैंगिक सहवास का प्रशिक्षण देने लगे और उसमें भी यदि अश्लीलता आदि हो तो वह भी कानून की गिरफ्रत में आ जाएगा|

                 दिल्ली की अदालत ने सहमति पर बहुत जोर दिया है लेकिन अदालत से कोई पूछे कि कौनसी सहमति बड़ी है ? स्थायी सहमति या तात्कालिक सहमतियॉं ? विवाह स्थायी सहमति है| क्या उसे भंग करना कानूनी जुर्म नहीं है ? चाहे विवाहित पुरूष किसी परस्त्री के साथ सहवास करे या पुरूष पुरूष के साथ करे, जुर्म तो वह है ही|  वह व्यभिचार  (एडल्ट्री) है| इसीलिए समलैंगिक सहवास अपराध नहीं है, यह छूट उन्हीं पर लागू होती है, जो विवाहित नहीं हैं| जो लोग प्राकृतिक तौर पर समलैंगिक ही पैदा होते है, उन्हें यह फैसला राहत जरूर पहुंचाएगा| यह फैसला न तो सब प्रकार की समलैंगिकता, न सब प्रकार के समलैंगिक सहवास और न ही समलैंगिक विवाह को जायज़ ठहराता है| यह विवाहेतर समलैंगिकता को भी जायज नहीं ठहराता| इसीलिए पश्चिमी समलैंगिकता के अंध-समर्थक जो उत्सव मना रहे हैं, वह बचकाना है| अदालत ने सिर्फ एक उपनिवेशवादी प्रावधान को रद्द किया है| उसने अनैतिकता और अश्लीलता का लाइसेंस नहीं बांटा है| वास्तव में तथाकथित समलैंगिकों के प्रति हमारा रवैया वहीं होना चाहिए जो विकलांगों के प्रति होता है| अदालत ने अपने फैसले के समर्थन में जो लंबी-चौड़ी दलीलें दी हैं और नेहरू व मूलभूत अधिकारों को भी घसीटा है, वह अनावश्यक है| अदालत के अनेक तर्क ऐसे हैं, जिसका दुरूपयोग वे लोग अवश्य करेंगे, जो अपनी उद्दाम वासनाओं पर किसी भी प्रकार का नियंत्र्ण नहीं चाहते| वे मानव समाज को पशु-समुदाय से भी नीचे ले जाना चाहते हैं| ऐसे लोग पुरूष से पुरूष के बीच ही नहीं, पुरूष और पशुओं के बीच भी सहवास को उचित समझते हैं| क्या स्वतंत्र्ता के नाम पर कानून आदमी को जानवर बनने की इजाजत दे सकता है ? अदालत को यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून मानव-जीवन के हर पहलू का नियामक नहीं हो सकता| कानून राज्य की संतान है लेकिन समाज राज्य से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है| समाज अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपवाद तो मान सकता है और कुछ हद तक उनकी उपेक्षा भी कर सकता है लेकिन वह उन्हें प्रोत्साहन नहीं दे सकता ? वह अपनी जड़ें खुद क्यों खोदेगा ? यदि स्त्री-पुरूष के स्वच्छ संबंधों से बना परिवार ही नष्ट हो गया तो सृष्टि आगे कैसे बढ़ेगी ? राज्य और समाज, दोनों जीवित कैसे रहेंगे ?

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                                                                                                                                                                          गुलदस्ता


                                                                                                                                                                   -कविता शर्मा

वर्तमान संदर्भ में संगीत चिकित्सा में  व्यवसाय की सम्भावनाएँ

कला एवं विज्ञान के समन्वय से संगीत चिकित्सा का प्रचलन प्रारम्भ होता है। संगीत एक कला है और चिकित्सा एक विज्ञान है। यह एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें किसी भी व्यक्ति के रोगों की चिकित्सा संगीत के माध्यम से की जाती है।
 संगीत में निहित ध्वनि के विभिन्न स्वरूपों में आकर्षक ध्वनियों से रचित संगीत का सीधा संबंध मानव मन के सूक्ष्म एवम् कोमल संवेगों से है। ध्वनि तरंगें संवेगत्मक रूप से अपने प्रभाव से पीड़ित व्यक्ति को विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। ध्वनि का विशेष रूप से किया गया संघात रसायनिक परिवर्तन पैदा करता है। इस प्रकार विशिष्टि ध्वनियों के मिश्रण से निर्मित संगीत विभिन्न प्रकार के भावों का निर्माण कर मानव मन व शरीर पर गहरा असर करता है। इस प्रभावोत्पादक क्षमता का प्रयोग जब चिकित्सा के रूप में शारीरिक एवम् मानसिक संतुलन को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से किया जाता है तो यह प्रभावात्मक प्रक्रिया  संगीत चिकित्सा के नाम से जानी जाती है।
 संगीत जहां मनुष्य को मानसिक शांति प्रदान करता है, उसे तनाव मुक्त कर उसके अनेक रोगों को दूर करता है वहीं उसे व्यवसाय की भी नई राह दिखाता है। भारतीय संस्कृति में रोग निवारण की दृष्टि से संगीत के प्रयोग की प्राचीनता यह सिद्ध करती है कि संगीत की अपरिमित प्रयोगात्मक शक्ति, उसकी व्यापकता एवम् प्रभावोत्पादकता की नींव जितनी सुदृढ़ है उतनी ही व्यवसाय की सम्भावनाओं से परिपूरित है। चिकित्सा एवं संगीत दोनों ज्ञान प्रणालियों को समन्वित कर व्यवसाय करने की अनेक सम्भावनाएं हैं। भारतवर्ष में संगीत चिकित्सा से संबंधित कोई विशेष साहित्य पुस्तकें आदि उपलब्ध नहीं हैं। केवल अनुभवों पर आधारित लेख ही पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलते हैं जो कि संगीत चिकित्सा का प्रचार-प्रसार करने में सक्षम नहीं हैं जबकि जन साधारण 'संगीत चिकित्सा` विषय का ज्ञान प्राप्त कर अपने-अपने रोगानुसार स्वयं अपनी सांगीतिक चिकित्सा कर सकता है तथा संगीत चिकित्सा को व्यवसाय के रूप में अपना कर दूसरों को भी रोगों से मुक्त कर सकता है। क्योंकि यह चिकित्सा पद्धति बिना किसी दुष्परिणाम के समस्त प्राणियों जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों पर अपना स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव उत्पन्न कर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है।

इतनी विशेषताओं को आत्मसात करने के बावजूद भी संगीत चिकित्सा को व्यवसाय के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से सफलता प्राप्त नहीं हुई है क्योंकि संगीत चिकित्सा को लेने वाले तथा अन्य चिकित्सक इसे एक स्वतंत्रता व्यवसाय रूप देने के लिए प्रयासरत नहीं है। संगीत चिकित्सा को व्यवसाय के  क्षेत्र में सफलता दिलाने के लिए सबल प्रयास करने होंगे यदि संगीत चिकित्सा को एक अदम्य शक्ति मानकर कार्य किया जाए तथा इसके व्यवसायिक पक्ष पर अधिक कार्य किया जाए तो निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।
 

भारतीय संगीत चिकित्सा ही मुख्य रूप से संगीत चिकित्सा विषय की जनक है। वर्तमान काल में सन् १९९३ से प्रारम्भ हुई ''भारतीय संगीत चिकित्सा एवं अनुसंधान परिषद में संगीत चिकित्सा विभिन्न वैज्ञानिक दृष्टिकोणें को ध्यान में रखकर संगीत के माध्यम से विभिन्न रोगों के मरीजों पर जो प्रयोग किए जा रहे हैं वे बहुत ही चमत्कारी तथा सम्भावनाओं से परिपूर्ण हैं। 
 
आजकल प्राय: सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में और अन्य प्रचार माध्यमों में संगीत चिकित्सा विषय में हो रहे शोधकार्य एवं प्रयोगों के समाचार और लेख पढ़ने को मिलते हैं लेकिन ये सभी विदेशों में हो रहे प्रयोग और शोधकार्य के उदाहरण देते हुए नहीं थकते।


 डॉ. भास्कर खांडेकर जी के अनुसार - ''संगीत चिकित्सा सिर्फ लेख लिखने के तौर पर अपनाने का विषय ही नहीं है। विदेशों में तो संगीत चिकित्सा को सहर्ष अपनाया जा चुका है। हमारे देश में थोड़ी जागरूकता की कमी है। संगीत चिकित्सा में संगीत के विद्यार्थियों के लिए स्वरोजगार की पूर्ण सभ्भावनाएँ हैं।`` 


 विदेशों में संगीत चिकित्सा द्वारा व्यवसाय हमारे देश की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध है एवम् वहां इसे अन्य चिकित्सा पद्धतियों के बराबर का स्तर भी प्राप्त है। साथ ही साथ वहां संगीत चिकित्सक पृथक-पृथक होते हैं जो संगीत द्वारा चिकित्सा करते हैं हमारे देश में भी इस दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए। विभिन्न आयुवर्ग के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के संगीत तैयार करने चाहिए। इस संबंध में किए गए प्रयोग संगीत चिकित्सा के व्यवसाय में काफी लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। जैसे कि 'चीन में एक नई म्यूजिक इलैक्ट्रोथेरपी` (संगीत विद्युतीय चिकित्सा पद्धति) का प्रयोग आरम्भ हो चुका है। इस पद्धति द्वारा कुछ विशेष रोगों को दूर करने में उच्च सफलता प्राप्त हुई। इस पद्धति में एक्यूप्रेशर बिंदुओं के बीच विद्युत प्रवाहित की जाती है तथा साथ ही साथ उसे संगीत भी सुनाया जाता है ... उपरोक्त प्रयोगों के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि संगीत चिकित्स को किसी भी अन्य चिकित्सा पद्धति के साथ उपयोग करने पर रोगी को जल्द रोग मुक्त किया जा सकता है। इस प्रकार विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को संगीत के साथ जोड़कर रोगों का उपचार और भी अधिक प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता है। 


 संगीत का सम्बन्ध मनोभावों से है तथा मनुष्य की समस्त शारीरिक क्रियाएं मन से  जुड़ी हैं। संगीत न केवल मनुष्य अपितु प्रत्येक जगत प्राणी के स्वास्थ्य को सुप्रभावित करता है। आज संगीत की आरोग्य दायिनी शक्ति पर निरन्तर शोध किए जा रहे हैं व इसके लाभकारी परिणाम भी हमारे समक्ष आए हैं। डॉ. कविता चक्रवर्ती के अनुसार - ''मनोवैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास है कि संगीत में अच्छी औषधियों के मुकाबले रोग-विनाशक गुण हैं। अमेरिका के लगभग पांच सौ से अधिक डाक्टर अपने रोगियों की चिकित्सा संगीत द्वारा करने का प्रयास कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में सफलता भी मिली है। उन्होंने पता लगाया है कि खास तरह की लय-ध्वनि तथा वाद्ययंत्र रोगों के नियंत्रण में सहायक होते हैं।  संगीत द्वारा हिस्टीरिया जैसे भयानक रोगों के उन्मूलन के उदाहरण भी हमारे समक्ष आए हैं। 'पागलों के अस्पताल` ; में संगीत चिकित्सा पद्धति ;डनेपबंस जीमतंचलद्ध काम में लाते हैं। असामान्य व्यक्ति में मानसिक बीमारियां अधिकतर काल्पनिक होती हैं। जिन व्यक्तियों में ये बीमारियां अधिक हैं उन्हें व्यवसायिक उपचार ;व्बबनचंजपववदंस जीमतंचलद्ध दी जाती है। इस चिकित्सा में व्यक्ति का ध्यान दूसरी तरफ किया जाताहै। यह नृत्य व गीत सीख सकता है। 


 इस प्रकार संगीत चिकित्सा पद्धति से अनेक रोगों का उपचार संभव है जैसे- डायबिटीज, ब्लड-प्रेशर, हायपरटेंशन, अनिद्रा, अस्थमा, सिरदर्द, कुछ अंशों में माइग्रेन, अपचन, कब्ज, हृदय रोग नियंत्रण, यौन मनोरोग, मन:स्ताप, मद्यपान और नशीले पदार्थों की आदत से मुक्ति मनोरोग, मानसिक भेदता आदि तथा व्यक्ति में एकाग्रता, इच्छाशक्ति बढ़ाने, मानसिक संतुलन, कार्यकुशलता, स्मरणशक्ति एवं अन्य दिमागी शाक्तियों को बढ़ाने के लिए भी संगीत चिकित्सा के प्रयोग लाभदायक सिद्ध हुए हैं। 


 गर्भवती महिलाओं पर भी संगीत के प्रभाव से संबंधित अनेक अनुसंधान किए गए है। इस दिशा में अभी और भी कार्य किया जा कसता है। डॉ. भास्कर खांडेकर के अनुसार - ''गर्भवती महिलाओं के लिए पूरे नौ माह का कोर्स तैयार करके करीब २६ महिलाओं पर किया गया परीक्षण सफल रहा और अन्य रोगों के अनेक मरीजों पर भी संगीत चिकित्सा का प्रयोग परीक्षण जारी है अत: इस प्रकार के कोर्स तैयार करके भी संगीत चिकित्सा द्वारा व्यवसाय संभव है।
 

ऐसी भी मान्यता है कि संगीत में स्वभाव को परिष्कृत करने की शक्ति होती है। इससे कल्पना, सृजनशक्ति तथा रचनात्मकता बढ़ती है। जीवन का दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है। व्यक्ति का एकाकीपन दूर होकर आत्मविश्वास बढ़ता है। तनाव, भय, घबराहट, थकान आदि दूर होते हैं। धैर्य और सहिष्णुता का संचार होता है।


 ऐसी अलौकिक अद्भुत क्षमता सम्पन्न संगीत को जीवन का अभिन्न अंग बना लेने पर हम तन मन से स्वस्थ रह सकेंगे। पर यहां भी ध्यान देना जरूरी है कि कौन सा संगीत किस रोगी को और कितनी मात्रा में प्रभावशाली रहेगा।  भारतीय शास्त्रीय संगीत में अनेक प्रकार के राग होते हैं तथा प्रत्येक राग की अपनी अलग-अलग प्रकृति होती है। किसी भी रोग के लिए, किसी एक राग का निर्धारण नहीं किया जा सकता। किसी एक ही रोग के लिए अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग रागों का प्रयोग हो सकता है। चिकित्सीय संगीत या राग का निर्धारण सिर्फ व्यक्ति परीक्षण करने के बाद ही निश्चित किया जाता है, अत: किसी भी राग या संगीत का प्रयोग चिकित्सक के निर्देशानुसार ही करें।
 

इसके अतिरिक्त संगीत चिकित्सा का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह अन्य किसी उपचार प्रक्रिया में बाधक नहीं होती। संगीत चिकित्सा का प्रयोग किसी भी पद्धति के साथ भली प्रकार हो सकता है। यह एक  सहायक; ैनचचवतजपअम ज्तमंजउमदजद्ध के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।  दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से बचने के लिए भी इसका प्रयोग किया जा सकता है।
 

आजकल बाजार में 'संगीत चिकित्सा` या ''म्यूजिक थैरापी` या ''मेडिटेशन म्यूजिक` के कैसेट भी उपलब्ध हैं। जिनका प्रयोग संगीत चिकित्सक के परामर्श करने के बाद ही करना चाहिए क्योंकि यह जरूरी नहीं कि इस तरह के कैसेट प्रत्येक व्यक्ति को लाभप्रद हो। इससे ज्ञात होता है कि संगीत चिकित्सा के व्यवसाय को सूक्ष्म रूप से अपनाया जा रहा है। 
 

संगीत द्वारा स्वास्थ्य वर्धन के क्षेत्र में अनेक शोध प्रयोग व परीक्षण किए जा रहे हैं परन्तु इसे व्यवहार में चिकित्सा के रूप में अपनाने हेतु जागरूकता अभी शैशवकाल में ही दिखाई देती है। हरिद्वार उ.प्र. में स्थित शान्तिकुंज के ब्रह्मवर्चस्व संस्थान सांगीतिक चिकित्सा के विषय में शोधकार्य कर रही है। इसके अतिरिक्त जर्मनी के डॉ. राल्क स्पिटगें के दर्द निवारक चिकित्सालय में नई दिल्ली में स्थित 'शक्ति विकास प्रकल्प` के संस्थापक व अध्यक्ष ई. कुमार, नेशनल इंस्टीच्यूट आफ मेंटल हेल्थ की डॉ. वी.एन. मंजुला आदि जैसे और अधिक संस्थान स्थापित किए जाएँ अर्थात संगीत द्वारा उपचार के संदर्भ में अधिक जागरूकता दिखाई जाए तो बिना किसी दुष्प्रभाव के असाध्य  व्याधियों का निवारण हो सकता है।  तथा संगीत चिकित्सा को व्यावसायिक रूप से भी अपनाया जा सकता है।


इस विषय पर जबलपुर विश्वविद्यालय से सम्बन्धित डॉ. वि.वि. गोर कहते हैं - ''स्वर चिकित्सा से रोग भी हटाये जा सकते हैं। इस कार्य में अब कलाकार और सरकार दोनों 'कारों` को आगे बढ़ना चाहिए।


संगीत चिकित्सा में व्यवसाय की अपार सम्भावनाएं हैं। बशर्ते संगीत चिकित्सा का ज्ञान हो सिर्फ व्यवसाय की दृष्टि से ही कोई प्रयोग नहीं करना चाहिए। संगीत चिकित्सा की शिक्षा के लिए देश के विभिन्न कालेज महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संगीत चिकित्सा को विषय के रूप में रखा जाना चाहिए जिसमें संगीत चिकित्सा से सम्बन्धित कोर्स करवाए जाए जिनमें संगीत चिकित्सा से सम्बन्धित शिक्षकों व अध्यापकों की नियुक्ति की जा सकें।
मद्रास के अपोलो अस्पताल में संगीत चिकित्सा विभाग है जिसमें संगीत चिकित्सा की शिक्षा दी जाती है। यह न्दकमत ळतंकनंजम ब्वनतेम तीन साल का होता है जिसमें ६ सेमेस्टर होते हैं। एक साल में दो सेमेस्टर देने होते हैं तथा अंतिम सेमेस्टर में एक प्रोजेक्ट वर्क होता है जो १२ हफ्ते एक अस्पताल में रहकर पूरा किया जाता है। इस कोर्स की फीस १२,५०० रुपये प्रति सेमेस्टर होती है।


इसके अतिरिक्त एक और कोर्स है जिसे ।कअंदबमक स्मअमस डनेपब जीमतंचल ब्वनतेम कहते हैं। यह एक साल का होता है इसमें भी दो सेमेस्टर होते हैं तथा छ: महीने में एक सेमेस्टर देना आवश्यक होता है। इसकी पात्रता सायक्लोजी और शास्त्रीय संगीत में एम.ए. होनी चाहिए। इन दोनों विषयों के ४+४ थ्योरी पेपर होते हैं तथा दूसरे सेमेस्टर में एक प्रोजेक्ट वर्क होता है। इस कोर्स की फीस ३०,००० रुपये प्रति सेमेस्टर है।  संगीत की उच्च शिक्षण पूर्ण करने पर कोई न कोई व्यवसाय अपनाना आवश्यक हो जाता है। व्यवसाय अर्थात् उदर निर्वाह के साथ अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किया जाने वाला ऐसा कार्य, जिससे धन प्राप्त किया जा सके।  संगीत चिकित्सा की विकास यात्रा का अवलोकन करने पर हम समझते हैं कि संगीत चिकित्सा में भी व्यवसाय के विभिन्न क्षेत्र खुल गये हैं।

1-          Hospital : general, Psychiatric

2-          Schools, special schools

3-          Outpatient clinics

4-          Mental helath center

5-          Nursing homes

6-          Day centers

7-          Correctional facilities

8-          TheCommunity

9-          Hospices           


उपर्युक्त कार्यों के अलावा और भी कार्यक्षेत्रों की सम्भावनाएं हो सकती हैं। स्वयं के संगीत चिकित्सा केन्द्र भी चलाये जा सकते हैं। इन सभी क्षेत्रों में व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत कुशलता व चातुर्य का समावेश कर अपनी रुचि अनुसार व्यवसाय प्राप्त कर सकते हैं।
 
सफल व्यवसायी संगीतज्ञ बनने के लिए मूल मंत्र


भूलोक पर जन्मे समस्त जीवधारियों में मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के कारण उसे उदर शान्ति के अतिरिक्त आवास, वस्त्रादि व आस पास के परिवेश में हो रहे नित नए परिवतनों के अनुरूप स्वयं को परिवर्तित करना भी आवश्यक होता है जिससे वह समाज की धारा में प्रवाहमान हो पाए। इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मानव कुछ न कुछ क्रियाकलाप करता है परन्तु वह जितने भी यत्न प्रयत्न कर ले अपनी समस्त सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उसे आदान-प्रदान की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरण के लिए एक किसान अनाज उगाकर अपनी उदर अग्नि को शान्त करने की व्यवसथा कर लेता है परन्तु समाज में रहने के लिए उसे अन्य वस्तुएँ भी चाहिए जैसे वस्त्र की आवश्यकता उसे जुलाहे के पास ले जाएगी, निवास स्थान की आवश्यकता उसे ग्रह निर्णायकों के पास ले जाएगी और इसी प्रकार जुलाहे को वस्त्र के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का अभाव उसे अनेक उत्पादकों के पास ले जाता है।
इन सभी कारणों के परिणाम स्वरूप ही 'व्यवसाय` का जन्म हुआ प्रतीत होता है। आधुनिक युग में 'व्यवसाय` मनुष्य के जीवन का आवश्यक अंग है, तथा व्यवसाय जीवन की गति भी है। प्रत्येक व्यक्ति के साथ वह स्वभाविक रूप से जुड़ा हुआ है प्रयत्नपूर्वक भी उसे जीवन से विलंग नहीं किया जा सकता।


भारतीय आद्य चिन्तकों ने जीवन के प्रत्येक क्रम व गति को 'व्यवसाय` कहा है अर्थात जीवन का व्यवहार व्यवसाय से रहित नहीं हो सकता। इस सृष्टि की जड़-चेतना व सत्ता व्यवसाय के अवलम्ब पर ही एक-दूसरे से ग्रन्थित है व सृष्टि क्रम को एकरूपता प्रदान किए हुए है। व्यवसाय को कर्म की संज्ञ्या  इसीलिए भी दी जा सकती है क्योंकि बिना व्यवसाय के मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। हम जगत में जो कुछ भी कर्म करते हैं, वह सब 'व्यवसाय` ही है चाहे कला हो, समाज हो, सेवा हो, राजनीतिक क्रिया कलाप अथवा धनोपार्जन ... ये सभी व्यवसाय के ही रूप हैं।  व्यवसायों की दुनिया बहुत जटिल है। इनके क्षेत्र में लगभग ८० हजार व्यवसाय आते हैं और प्रत्येक व्यवसाय के अन्तर्गत अनेक कार्य आते हैं।

आधुनिक समय में सामान्य जीवन इस सीमा तक जटिल हो चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति को समाज में रहते हुए अपने दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कोई न कोई व्यवसाय अवश्य अपनाना पड़ता है। इसीलिए संगीत साधना में लीन व्यक्ति भी इन नैतिक कठोरताओं के व्यास से बाहर पग नहीं रख सकता अर्थात् उसके लिए भी न्यूनाधिक रूप में जीविकोपार्जन करना अति आवश्यक होता है।
ॅपजदमेे जीमंबिज जींज पद सवतके चतंलमत जीम पितेज चमजपजपवद पे वित कंपसल इतमंक दव वदम बंद बवअमतेीपच ळवक वत सवअम ीपे दमपहीइवनत वद ंद मउचजल ेजवउंबीण्


इसी कारण संगीत जैसी पवित्रा संवेददात्मक व अलौकिक आनन्द प्रदान करने वाली ललित कला को भी व्यवसायों की श्रृंखला में सम्मिलित होना पड़ा।


संगीत जिस प्रकार अध्यात्मिकता व रंजकता के क्षेत्र में अपना लक्ष्य व उपादेयता रखता है उसी प्रकार व्यवसायिक क्षेत्र में भी इसका अपना महत्व है। कहने का तात्पर्य है कि संगीत जहां एक ओर हमें रंजकता व अध्यात्मिकता की ओर अगंसर करता है वहीं संगीत हमें अर्थ प्राप्ति भी कराता है और इस अर्थ की प्राप्ति हमें संगीत को 'व्यवसाय` के रूप में अपनाने से होती है। व्यक्ति विशेष के व्यवसाय का उसके जीवन में महत्व केवल इसीलिए नही होता कि उसके जीवन का अधिकांश समय उसके व्यवसाय संबंधी क्रिया-कलापां में व्यतीत होता है बल्कि उसका महत्व सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक रूप से भी उसके जीवन में होता है क्योंकि व्यवसाय केवल जीविका उपार्जित करने का साधन ही नहीं है अपितु व्यक्ति विशेष के जीने का ढंग एवं उसके द्वारा समाज के लिए दिए गए योगदान का प्रतीक भी होता है। व्यवसाय मानव विशेष के विचार, प्रवृतियों, कौशल, जीवन शैली, जीवन स्तर व समाज में उसके योगदान को दर्शाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति से किसी बाह्य स्थल पर उसका नाम उसके पिता का नाम और पिता का व्यवसाय जान लिया जाए तो उसकी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति तथा उसके सामर्थ्य का अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार व्यवसाय सीधे ही व्यक्ति की सामाजिक स्तर से संबंधित होता है। व्यक्ति को अपनी पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति, शारीरिक, मानसिक सामर्थ्य व रुचि के अनुरूप  ही व्यवसाय अपनाना चाहिए इस कारण संगीत प्रेमी, संगीत के विद्यार्थी आदि के लिए इसे ही व्यवसाय के रूप में अपनाना उचित भी है।  केवल व्यवसाय विशेष के प्रति इच्छा रखना ही पर्याप्त नहीं होता। जब महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस से उनकी सफलता का रहस्य पूछा गया तो उन्होंने कहा कि -

ष्जीम ेनबबमेे कमचमदके ९९: वद चमतेनंजपवद ंदक वदसल १: वद पदेचपतंजपवदण्ष्

आज विश्व में संगीत व्यवसाय का अधिकाधिक विकास ही नहीं हो रहा अपितु वह धीरे-धीरे जटिल भी होता जा रहा है। संगीत व्यवसाय को सफलता के साथ चलाना एक आसान कार्य नहीं है। इसे सफलता के साथ चलाने के लिए निम्नलिखित मूल मंत्रों का ध्यान में रखना अति आवश्यक है :-

१. साहस : व्यवसाय एक अत्यंत साहस का कार्य है। प्रत्येक संगीत के व्यक्ति में वे सब गुण विद्यमान नहीं होते जो किसी कुशल व्यवसायी संगीतज्ञ में होने चाहिए। संगीत एक ऐसा विषय है जिसके व्यवसाय में अत्यधिक रूप से पूंजी खर्च होती है। केवल वे ही लोग व्यवासय को प्रारम्भ करने की चेष्टा करते हैं जो अपनी पूंजी को दांव पर लगा सकते हैं। साहसी में यही गुण होता है कि वह भविष्य में आने वाली परिस्थितियों को पहले से ही अनुमानित कर लेता है।
२. सुपरिभाषित उद्देश्य :- किसी भी व्यवसाय को सफलता के साथ चलाने के लिए यह परम आवश्यक है कि उसके उद्देश्यों को स्पष्ट एवं निश्चित रूप से निर्धारित किया जाए बिना सुनिश्चित उद्देश्य के किसी भी व्यवसाय को सफलता के साथ नहीं चलाया जा सकता।  सर्वप्रथम व्यक्ति को अपनी अभिरुचि के अनुसार अपना शिक्षण पूर्ण करना चाहिए। कोई भी व्यवसाय करने से पहले उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि वह किस क्षेत्र में समर्थ है उसका क्या उद्देश्य है जैसे :-संगीतज्ञ, शिक्षक, नर्तक, डनेपब ।ततंदहम, शास्त्रकार, पत्रकार, मार्किटिंग, संगीत चिकित्सक, पार्श्व संगीत आदि जिस दिशा में भी वह कदम रखे उसके उद्देश्य सुपरिभाषित होने चाहिए।
३. उचित योजना :- उद्देश्यों को सुनिश्चित करने के उपरान्त उन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उचित योजना तैयार की जानी चाहिए। योजना का तात्पर्य भविष्य के बारे में विचार करना, घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना, उनके अनुसार कार्यक्रम तैयार करना जैसे कोई संगीत संस्था खोलना, संगीत विद्यालय, कोई निजी संस्था आदि खोलना । उनमें कितने विद्यार्थी हों, कितने वाद्य, विद्यार्थियों के लिए क्या-क्या सुविधाएं होनी चाहिए आदि सभी मामलों के लिए एक उचित योजना तैयार करना और उसके अनुरूप व्यवसाय चलाना उसकी सफलता के लिए अति आवश्यक है।
४. सुदृढ़ संगठन :- संगीत व्यवसाय की सफलता इसके संगठनों  के ऊपर भी बहुत कुछ निर्भर करती है। प्रत्येक व्यवसाय में आवश्यक व्यक्तियों की नियुक्ति करना उन्हें उचित स्थानों पर नियुक्त करना, उनमें कार्यों का समुचित वितरण करना, उनके   अधिकारों को निश्चित करके  सौंपना, संगीत के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक व्यक्तियों की नियुक्ति करना जैसे - गायक, वादक, नर्तक, उन्हें उचित स्थानों पर नियुक्त करके उनके आपसी सम्बन्धों को परिभाषित करना, उनमें आपस में परस्पर समन्वय तथा संतुलन स्थापित करना अति आवश्यक है।
५. व्यवसाय का स्थानीकरण :- संगीत के किसी भी व्यवसाय की सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि उसे ऐसी जगह पर स्थापित किया जाए कि वहां से उसे सफलतापूर्वक संचालित किया जा सके। अनेक व्यवसायिक संस्थाए या तो असफल हो जाती हैं या अधिक उन्नति नहीं कर पाती क्योंकि वे स्थानीकरण पर विशेष ध्यान नहीं देती। यदि व्यवसाय का स्थान (सवबंजपवद) उचित नहीं है तो ग्राहकों को आकर्षित करने में कठिनाई होगी। इसलिए इन बातों पर समुचित ढंगसे विचार करके ही उचित निर्णय लेना चाहिए।

६. ग्राहक संतुष्टि :-
किसी भी व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना है, लेकिन इसे ग्राहकों की संतुष्टि के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसीलिए व्यवसायी को अपने ग्राहकों की रुचि, पसन्द और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही सेवाओं का उत्पादन करना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति सुगम संगीत में रुचि रखता है तो उसे भजन, गीत, गज़ल आदि की शिक्षा देनी चाहिए। यदि शास्त्रीय संगीत में रुचि है तो शास्त्रीय संगीत से सम्बन्धित शिक्षा देनी चाहिए क्योंकि इस तरह से ग्राहक की संतुष्टि तो होगी ही साथ ही ग्राहक की संगीत के प्रति रुचि और अधिक बढ़ जाएगी।

७. व्यवासय में निरंतरता :- व्यवसाय नियमित रूप से निरन्तर सम्पादित होने वाला कार्य है। क्षणिक लाभ की भावना से प्रेरित होकर किया गया कोई कार्य व्यवसाय के अध्ययन के क्षेत्र से बाहर माना जाएगा उदाहरणार्थ यदि किसी व्यक्ति के पास कोई पुराना वाद्य है और उसे बेचकर वह लाभ अर्जित कर लेता है तो उसके इस कार्य को व्यवसाय की संज्ञा कदापि नहीं दी जा सकती किन्तु यदि वही व्यक्ति उन्हीं वाद्यों को नियमित रूप से क्रय कर बेचने का कार्य प्रारम्भ कर दे तो उसे हम व्यवसाय कहेंगे।
८. पर्याप्त वित्त :- वित्त किसी भी व्यवसाय का नि:संदेह जीवन रक्त है। बिना पर्याप्त वित्त अथवा पूंजी के कोई भी व्यवसाय अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकता यदि पूंजी कम होगी तो भी कठिनाई होगी और यदि पूंजी अधिक होगी तो भी यह उचित नहीं है। वित्त के बिना किसी भी व्यवस्था को संचालित करना असम्भव है। वित्त की मात्रा निर्धारित करते समय व्यवसाय के थोड़े समय तथा लम्बे समय के दोनों ही उद्देश्यों को ध्यान में रखना चाहिए और उसी के अनुसार स्थायी पूंजी की मात्रा निश्चित करनी चाहिए।
९. कुशल प्रबन्ध और नेतृत्व :- व्यवसाय की सफलता के लिए आवश्यक है यदि उपरोक्त सभी तत्व विद्यमान हों किन्तु उसका प्रबन्धक अकुशल हो तो व्यवसाय कभी भी सफल नहीं हो सकता। कभी-कभी प्रबन्धक संगीत की थोड़ी बहुत शिक्षा लेकर अपने विद्यार्थी को वही रागों की कुछ अथवा सीमित शिक्षा देते हैं। उन्हें विषय की गहराई ना समझाते हुए केवल व्यवसायिक दृष्टि से ही सिखाते हैं जिससे विद्यार्थी सम्पूर्णता से विषय का अध्ययन नहीं कर पाते। इसलिए व्यवसाय छोटा हो या बड़ा उसकी सफलता बहुत कुछ उसके प्रबन्धक की कुशलता पर निर्भर करती है यदि प्रबन्धक कुशल है तो वह एक असफल व्यवसायिक संस्था को सफल व्यवसायिक संस्था में आसानी से बदल सकता है।
१०. अनुसंधान और विकास की गतिविधियां :- आज संगीत के प्रतिस्पर्द्धात्मक व्यवसायिक युग में यह अत्यन्त आवश्यक है कि संगीत के विभिन्न क्षेत्रों में शोध करने की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। कोई भी व्यवसाय तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि निरन्तर अनुसंधान और विकास द्वारा उसे पहले से श्रेष्ठतर बनाने का प्रयास न किया जाए। संगीत व्यवसायी को यह प्रयत्न करना चाहिए कि संगीत कला में श्रेष्ठता का विकास हो और ग्राहकों को दी जाने वाली सेवाओं में सुधार हो। संगीत व्ययवसाय की अधिकतम सफलता के लिए हर सम्भव क्षेत्र में अभिनव परिवर्तन की आवश्यकता होती है और यह शोध के द्वारा ही सम्भव है।


नि:संदेह यह कटु सत्य है कि एक संगीत साधक को समाज की कठोरताओं का सामना करते हुए अर्थोपार्जन के प्रश्न को स्मृति में रखना पड़ता है परन्तु इस क्रिया में अर्थात् अपने कला कौशल का व्यवसाय करते हुए कला के आदर्शों व गरिमा के स्तर को सदैव दृष्टिगत रखना चाहिए।  कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई संगीतकार अपनी कला का प्रयोग जीविकोपार्जन के उद्देश्य से करता है तो कला के नैतिक मूल्यों, मर्यादाओं, मान, प्रतिष्ठा व गौरव आदि के स्तर को गगनोमुखी रखना अर्थात् संगीत कला का उतरोत्तर विकास करना उसका परम कर्त्तव्य है।
 
संगीत के क्षेत्र में व्यवसायिक सम्भावनाएं
संगीत कला को ललित कलाओं में सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्राप्त है। मन को एकाग्र कर मोक्ष द्वार तक ले जाने वाला संगीत के अतिरिक्त सुगम व सरल मार्ग और कोई नहीं है। यही इसकी सर्वश्रेष्ठता का प्रमुख कारण है। जीवन यात्रा के प्रत्येक क्षेत्र में संगीत का योग होने के कारण मानव सहज ही इससे सम्बद्ध हो जाता है। संगीत आदिकालीन कला है, जिसका प्रादुर्भाव सृष्टि रचना के साथ ही हो चुका था। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय संगीत का इतिहास आरम्भ से ही उपलब्धियों का इतिहास रहा है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक की लंबी यात्रा करते हुए भारतीय संगीत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं जिसका एक विशाल रूप हमारे सामने प्रस्तुत है।


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अनेक राजनैतिक, सामाजिक परिवर्तन हुए। संगीत सामान्य जनता के बीच शिक्षण-संस्थाओं तथा संगीत सम्मेलनों के रूप में प्रतिष्ठित हो गया और संगीत का विकास अत्यधिक तेजी से होने लगा। आज मनुष्य के जीवन का हर एक क्षेत्र संगीत से प्रभावित है यही कारण है कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों की रुचि संगीत के प्रति बढ़ती जा रही है परन्तु संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात तथा उपाधि और प्रमाण पत्र एवं शोध आदि प्राप्त करने के बाद भी समस्या होती है कि वह अपने जीवन को किस राह पर लेकर जाए। शिक्षा पूर्ण होन के तुरन्त बाद वह अपनी नौकरी या व्यवसाय के प्रति चिंतित हो जाता है।


आज व्यवसाय मनुष्य का आवश्यक अंग है। व्यवसाय अर्थात् समाज में रहने के लिए मनुष्य जीवन यापन का जो सहारा लेता है उसे व्यवसाय कहते हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज की मर्यादाओं का पालन करने हेतु व समाज की धारा में प्रवाहमान होने हेतु मनुष्य को कोई व्यवसाय अवश्य अपनाना पड़ता है और संगीत अन्य विषयों की भांति समाज को व्यवसाय प्रदान करने का एक सबल माध्यम सिद्ध हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि संगीत जहां एक ओर हमें रंजकता व अध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करता है वहीं संगीत हमें अर्थ प्राप्ति भी कराता है और इस अर्थ की प्राप्ति हमें संगीत को व्यवसाय के रूप में अपनाने से होती है। जीवन के अनेक क्षेत्रों में संगीत की विशेषताओं का व्यापक रूप सामने आया है। जीविका, अर्थोपार्जन तथा विश्ेाष योग्यता की दृष्टि से संगीत के अनेक आयाम दृष्टिगत होते हैं जैसे संगीत, हाई स्कूल से लेकर स्नातकोत्तर एवं शोध स्तर तक के पाठ्यक्रम में संगीत को विषय के रूप में मान्यता, आकाशवाणी केन्द्रों का देश भर में संजाल, संगीत सम्मेलनों की परम्परा, सांस्कृतिक केन्द्र, दूरदर्शन, कैसेट्स एवं कैसेट प्लेयर के रूप में संगीत की सहज उपलब्धता, संगीतज्ञों की जीविका के लिये बहुआयामी माध्यम है परन्तु संगीत में परोक्षत: सकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद वर्तमान संगीत एवं संगीतज्ञ के लिए समस्यायें बढ़ी हैं और नयी चुनौतियां सामने आ रही हैं। बदलते सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में संगीत की नई सम्भावनाएं दृष्टिगोचर होती है। ऐसे में अनेक क्षेत्र हैं, जिनमें संगीत के माध्यम से विशेष योग्यता द्वारा मात्र मनोरंजन अथवा संगीत शिक्षक की अपेक्षा आर्थिक दृष्टि से कैरियर के लिए अनेक आकर्षक अवसर उपलब्ध हो सकते हैं जैसे -
१. शिक्षक - वर्तमान समय में विद्यालयों, शिक्षण-संस्थाओं तथा विश्वविद्यालयों  में शिक्षक के रूप में अनेक पदों पर कार्य कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त आजकल व्यक्तिगत शिक्षण अर्थात् प्राइवेट टयूशन के द्वारा भी व्यवसाय किया जा सकता है।
२. मंच प्रदर्शक - मंच प्रदर्शन का व्यवसाय अत्यंत चकाचौंध पूर्ण व चित्ताकर्षक व्यवसाय है। मंच प्रदर्शन से जहां एक और कलाकार अपनी कला के माध्यम से श्रोताओं को आनन्दित करता है वहीं दूसरी ओर कला के माध्यम से जीविका को भी प्राप्त करता है। मंच प्रदर्शन द्वारा अनेक सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक समारोहों, मेलों आदि पर गज़ल,़ भजन व गीतों आदि के गायक, वाद्य वादक व नर्तक अपनी कला कौशल का प्रदर्शन कर अपनी जीविकोपार्जन कर सकते हैं।
३. शास्त्रकार एवं प्रकाशक :- संगीत शास्त्रकारों का संगीत कला के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान समय में अनेक संगीत शास्त्री, अपने ग्रंथों के प्रकाशन द्वारा धन अर्जित कर सकते हैं। ग्रंथों के प्रकाशन से लेखकों के अतिरिक्त प्रकाशक भी अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। संगीत की सौम्यता व माधुर्य में शास्त्रबद्धता का उत्कृष्ट व उचित समन्वय ये शास्त्रकार कुशलतापूर्वक कर सकते हैं।
४. पार्श्वसंगीत :-  पार्श्व संगीत का प्रयोग करने वाले स्थलों में चित्रपट व दूरदर्शन सबसे अधिक प्रचार में है। इसके अतिरिक्त अन्य कई स्थलों जैसे - दैनिक कार्यक्रमों के प्रारम्भ होने की धुन, समाचार प्रारम्भ होने से पूर्व की धुन व अनेक मनोरंजक कार्यक्रम, सिनेमा, नाटक, विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में संगीत की व्यवसायिक सम्भावनाएं प्रदर्शित होती हैं जिनमें अपनी क्षमता के अनुसार कार्य किया जा सकता है।
५. संगीत निर्देशन :- संगीत निर्देशन का कार्यक्षेत्र अत्यंत विशाल है। संगीत की प्रत्येक विद्या में संगीतकार के लिए व्यवसाय की नयी राहें नज़र आती हैं। देशभक्ति गीत, वन्दना, पर्वोत्सव गीत, बाल-गीत, बंदिशें, सांस्कृतिक आयोजनों के गीत आदि सभी में संगीतकार की आवश्यकता अनुभव की जाती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो पैसा और प्रसिद्धि दोनों देता है। अत: इस कार्यक्षेत्र का चयन कर जीविकोपार्जन किया जा सकता है।
६. विज्ञापन संगीत :- इस आधुनिक व्यावसायिक युग में विज्ञापन उद्योग आकाशवाणी केन्द्रों, दूरदर्शन व टेलिविजन के विभिन्न चैनलों में अपनी चरम सीमा पर पहुंचा हुआ है, जहां विज्ञापन के रूवरूप व स्वभाव के अनुसार संगीत का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हो रहा है। संगीत के विद्यार्थी भी उसमें अपनी सेवाएं दे सकते हैं। जिंगल, ऐनीमेटिड फिल्म कार्टून आदि में भी युवा संगीतकार अपना करियर बना सकते हं।
७. संगीत पत्रकार, समीक्षक व संपादक :- कोई भी संगीतकार अपने कला कौशल के प्रदर्शन के पश्चात उसके लिए जन साधारण की प्रतिक्रिया अवश्य जानना चाहता है। इसके अतिरिक्त यदि कलाकारों के आलोचक भी हों तो उन्हें अपनी त्रुटियों का आभास भी हो जाता है। इन सब कार्यों की निष्पति एक पत्रकार ही कर सकता है। आजकल स्थान-स्थान पर हो रहे कार्यक्रमों का अवलोकन करके उसकी आलोचनात्मक व्याख्या विभिन्न समाचारपत्रों, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, वार्षिक पत्रिकाओं में करके एक पत्रकार के रूप में जीविकोपार्जन किया जा सकता है। संगीत सम्मेलन, संगीत गोष्ठियां, विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित संगीत कार्यक्रमों के आयोजकों में संगीत समीक्षक के रूप में कार्य कर सकते हैं। ये पत्रकार, समीक्षक, आलोचक व सम्पादक आदि अर्थोपार्जन के साथ-साथ जन-कल्याण के विरुद्ध यदि कोई कार्य हो रहा हो तो उस पर तुरन्त अंकुश लगाने का कार्य भी कर सकते हैं।
८. वाद्य निर्माण व मरम्मत :- वाद्याों के निर्माण के अभाव में सांगीतिक कार्यक्रमों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। असंख्य वाद्य निर्माता सांगीतिक वाद्यों के निर्माण द्वारा अर्थोपार्जन कर रहे हैं। आधुनिक समय में इलैक्ट्रानिक्स वाद्य जैसे इलैक्ट्रिक तानपुरा, इलैक्ट्रानिक लहरा इलैक्ट्रानिक तबला आदि का अत्यधिक प्रचलन है। इसके अतिरिक्त विदेशी यंत्र सिंथेसाइजर, इलैक्ट्रानिक ड्रम आदि विदेशी वाद्य यंत्र भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके प्रचार से इनके निर्माताओं व वितरकों को अच्छे व्यवसाय के साधन उपलब्ध हुए हैं तथा आगे और भी साधन उपलब्ध हो सकते हैं।
९. आकाशवाणी (रेडियो) :- आकाशवाणी में प्रदर्शन द्वारा आजीविका प्राप्ति के सशक्त माध्यम है। आकाशवाणी में वह आर्टिस्ट तथा स्टाफ आर्टिस्ट के रूप में रोजगा़र प्राप्त कर सकता है। आजकल रेडियो में एफ.एम. का एक ऐसा नया दौर आया है जिसमें अनेक चैनल पर सांगीतिक कार्यक्रम दिए जाते हैं। इसमें क्श्र ;क्पेब श्रवबामलद्धए त्श्र;त्ंकपव श्रवबामलद्धए टश्र ;टपकमव श्रवबामलद्ध के पद पर कार्य किया जा सकता है। इसमें कलाकारों के साक्षात्कार, मंच प्रदर्शन, नई-नई एलबम आदि इन सबके बारे में जानकारी भी दी जाती है।
१०. ध्वनि मुद्रण (रेकार्डिस्ट) :- आज संगीत के क्षेत्र में तकनीक विकसित हो गयी है। संगीत के विभिनन क्षेत्रों में इस नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। फलरूवरूप रेकार्डिंग के नये-नये तंत्र, नये-नये साधन उपलब्ध हैं। ऐसी तकनीक आत्मसात करना उपयुक्त हो सकता है। अपना निजी ;ैवनदक त्मबवतकपदह ैजनकपवद्ध हो तो वह आर्थिक प्राप्ति का अच्छा साधन है। संगीत के साथ विद्यार्थी अगर ये तकनीक सीख सकेगा, तो दुनिया में उसे बहुत सारे अवसर उपलब्ध होंगे।
११. संगीत विपणन :- संगीत विपणन पक्ष आज सबसे आवश्यक है क्योंकि किसी भी बात की लोकप्रियता उसके मार्किटिंग पर ही आधारित होती है। आज चाहे शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, सुगम संगीत, सूफी संगीत या भक्ति रचनायें हो, सभी कुछ बहुत लोकप्रिय हो रहा है, हजारों की संख्या में लोग इस संगीत को सुनने के लिए पहुंचते हैं। हमारे मेधावी विद्यार्थी इस क्षेत्र की सम्भावनाओं को समझकर अपने संगीत कौशल का प्रयोग कर सकते हैं और इसे जीविकोपार्जन का मार्ग बना सकते हैं।
१२. वैबसाइट :- वैबसाइट हमारे पारम्परिक संगीत में शिक्षित युवा वर्ग की जीविका का एक अपूर्व साधन बन सकता है। विश्व भर में भारतीय संगीत के प्रति रूझान बढ़ रहा है, इसे सीखने व समझने की उत्सुकता बढ़ रही है। वेबसाइट के माध्यम से भारतीय संगीत की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है तथा विदेशों तक भी पहुंचायी जा सकती है। इस प्रकार इस क्षेत्र को भी व्यवसाय के रूप में अपनाया जा सकता है।
१३. संगीत चिकित्सा :- संगीत को आरोग्य दायिनी शक्ति कहा गया है। संगीत जहां मनुष्य को मानसिक शांति प्रदान करता है, उसे तनावमुक्त करता है वहीं उसे इस क्षेत्र में व्यवसाय की राह भी दिखाता है। विदेशों में म्यूजिक थैरेपी की बहुत दिशाएं खुली हुई हैं परन्तु हमारे यहां इस क्षेत्र में संकुचित दायरा है । आज को युवा पीढी इस क्षेत्र में अपनी किस्मत को आजमा सकती है। वर्तमान में संगीत चिकित्सा से सम्बन्धित शिक्षा ग्रहण करके विद्यार्थी भ्वपेचपजंसेए हमदमतंसए च्ेलबीपंजतपब ेबीववसेए वनजचंजपमदज बसपदपबेए उमदजंस ीमंसजी बमदजमतेए छनतेपदह ीवउमे स्थानों पर नियुक्त होकर संगीत व्यवसाय कर सकते हैं।
उपर्युक्त कार्यों के अलावा संगीत के क्षेत्र में और भी व्यवसायिक सम्भावनाएं हो सकती हैं जैसे संगीत नाटिका, ऑपेरा, सहगान, समूहगान, संगीत प्रेक्षाग्रह, तकनीक, ध्वन्यांकन प्राविधिक अभियन्त्रिक, कम्प्यूटर, उच्चानुशीलन, उद्घोषक, फ्यूंजन म्यूजिक, बच्चों की शिक्षा में संगीत का प्रयोग, गीत-बिन्दशों का स्वरों मं बांधना (कम्पोजीशन), संगीत द्वारा श्रमिकों की कार्यक्षमता, उत्पादन में वृद्धि आदि के रूप में संगीत की नवीन व्यवसायिक सम्भावनाएं सामने आ रही हैं। संगीत सुनने, सीखने, सुरक्षित रखने की तकनीक में बड़ा सुधारहुआ है, सुविधायें सुलभ हो गयी है। ऐसा परिवेश निर्मित हो चुका कि नये परिवेश, नयी सम्मभावनाओं के कारण भारतीय संगीत अनेकानेक विशेषताओं से समृद्ध होता जायेगा तथा अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण भारतीय संगीत न केवल अद्वितीय बल्कि शाश्वत रहेगा।

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                                                                                                                                                                   हास्य -व्यंग्य


                                                                                                                                                                      - हरीश नवल

चलो, चलें लालकिला मैदान

दिल्ली का नाम आते ही मस्तिष्क के मानचित्र पर लालकिला उभरता है और लालकिला के उभरते ही दीखता है लालकिला मैदान जहां आँधी हो या तूफान, पर आम आदमी को पहुँचना होता है-कम-से-कम एक बार अपनी खोई हुई आजादी को ढूँढने, तिरंगे में अपने रंग देखने।

वर्षों पूर्व जब अंग्रेजी राज में ठंडी सड़क इस मैदान के बीचोबीच बनी, दिल चीरकर बनी। इसके दो हिस्से हो गए और जामा मस्जिद की तरफ वाले हिस्से का नाम परेड का मैदान हो गया। मैदान के दोनों भागों में एक-एक दरगाह है जहां सावन के बाद दार्शनिक कव्वालियों का जोर होता है। इन कव्वालियों में खुदा की इबादत और अकीदत होती है। इसी से शायद यह मैदान और हिस्सों में बंटने से बच गया। यही वह मैदान है जहाँ सन् सैंतालिस से एक पागल गाता रहा-‘ इस दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा ‘। इसी बोल पर एक फिल्मी गीत भी मशहूर हुआ। पागल तो चल बसा पर दिल के दो टुकड़ों की तरह बसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान इस मैदान में लगातार दिखाई देते हैं।

यह लालकिला मैदान बड़ा ही चित्र-विचित्र है। चित्र तो इसके सारे जहां में पाए जाते हैं। विदेशी पर्यटक यहां आकर एक चित्र लालकिला का और एक चित्र उनसे भीख मांगते, दुनिया का दर्द अपने चेहरे पर लाते हुए अंधे, लूले, लंगड़े या तगड़े भिखारियों के जरूर खींचते हैं।

अहा! लालकिला का मैदान, तेरी है निराली शान। तेरे सीने पर हर बरस आधे अगस्त में आधी रात को पाई गई ‘ आजादी  ‘ (?) की दुहाई देने वाले देश के कर्णधार भारत की शानदार अर्थ-व्यवस्था के बारे में बोलते, मतदाताओं को तोलते, वोटों की भीख मांगते हैं। तू सचमुच महान है, नीचे ठीक लालकिला की नाक के नीचे दरिद्रनारायण नोटों की भीख मांगते हैं। फोटो दोनों के खिंचते हैं, एक से पता चलता है कि कितनी गरीबी है, दूसरी से ज्ञात हो जाता है कि किसकी वजह से गरीबी है।

हे लालकिला मैदान। इन वोटों और नोटों की भिक्षावृत्ति के बीच तेरे दामन पर खड़ा बेचारा निरीह मतदाता विगत पचास वर्षों से तीन बार जोर से जयहिनद बोलता है और अंटी खोलता है-वोट नेता को , नोट भिखारी को दे देता है और अगली बार तक आने के लिए खोखला होकर घर को चल देता है और तू देखता रहता है?

दूर से देखने पर लालकिला को अपनी बांहों में घेरे खाई आपको नजर नहीं आती है। ऐसी खूबसूरत खाई हमारे हर बड़े नेता के साथ होती है। दरअसल जितनी बड़ी और गहरी खाई होती है, उतना ही बड़ा हमारा नेता होता है। दूर से वह आपको जमीन से आपकी सतह से जुड़ा नजर आता है पर जैसे ही आप करीब जाते हैं, वह दूर होता है और आप खाई में गिर जाते हैं।

लालकिला के मैदान में बड़े नेता पिछली आधी सदी से जा रहे हैं और तोपों की सलामी पा रहे हैं। कभी सलामी राजा, महाराजा या वीरों के लिए होती थी, आज होती है हमारे अपने द्वारा लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए हमारे बीच के नेताओं के लिए जो चुनाव के बाद हमारे नहीं, खबरों के बीच होते हैं।

वाह क्या सीन है। जरा हमारे कमेंट्रेटर के साथ देखें तो---

‘राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजली अर्पित कर प्रधानमंत्री लालकिला की ओर रवाना हो गए हैं। वे अब लाहौरी दरवाजे की ओर से आ रहे हैं। सेना के तीनों अंगों के सशत्र सैनिक  ‘अटेंशन ‘ हो गए हैं। सेना का बैंड ‘आ जा आयी बहार ‘ धुन बजाकर नेता का स्वागत कर रहा है। देखिए, राष्ट्रगान गाने के लिए पधारे दिल्ली के तीन सौ स्कूलों से ढाई हजार बच्चे प्रिय नेता के अभिवादन के लिए उठ रहे हैं। वे जागे हैं पर उनके पैर सो गए हैं। उनके सोए पैर देश के प्रतीक हैं जो केवल नेता के अभिवादन के लिए ही जागता है। प्रधानमंत्री मैदान में उतर आए हैं, वे बहुत चुस्त और प्रसन्नवदन हैं। मैदान में खड़े सहस्त्रों व्यक्तियों को देख सहायक से कुछ कह रहे हैं कि अपनी पार्टी ठीक काम कर रही है, सुबह-सुबह सारा मैदान भर गया है। सहायक कुछ फुसफुसा रहा है, वह यही बता रहा होग ‘ सर, सुबह मैदान जाने से पहले ही हमने इन्हें लालकिला मैदान में मंगवा लिया है। ‘

 प्रधानमंत्री सलामी मंच पर पहुंच रहे हैं। सेना के जवान सलामी दे रहे हैं, सलामी धुन बज रही है। पुरानी चलती हुई धुन है,‘ मेरा सलाम ले ले, दिल का पैगाम ले ले  ‘। सेना का निरीक्षण करते हुए प्रिय नेता साथ-साथ चल रहे फौजी अफसरों से कदम नहीं मिला पा रहे हैं, दरअसल समूचा देश उनके कदम से कदम मिलाकर चलता है, वे किसी से कैसे मिला लें।

...वे अब लालकिला के भीतर प्रवेश कर गए हैं, बाहर वी.आई.पी लाउंज में बैठे वी.आई.पी. उचक-उचककर उन्हें अपनी शकल दिखा चुके हैं।

बैंड की धुन अब भी बज रही है---

हम तुम्हारे लिए, तुम हमारे लिए

लीजिए, प्रिय नेता को इक्कीस तोपों की सलामी दी जा रही है, कहा कुछ भी जाए, पर यही सच है। कुछ देर आप गरजती तोपों की सलामी सुनें...धांय धांय धांय...

तो जनाब, सीन देखा आपने? कैसा लगा ? आम जनता के खास प्रतिनिधि जब तोप की सलामी लेते हैं, जाने क्यों आम जनता बड़ी खुश होती है। वास्तव में हमारे नेता खुद ही बड़ी तोप हैं। कुल मिलाकर बाईस हैं, शेष इक्कीस सलामी के लिए सुलग रही हैं। वे सुलगती तोपें वे पक्षीय-विपक्षीय नेता हैं जो कभी लालकिला आकर ऐसी सलामी लेने की इच्छा लिए हुए हैं।

पटेल ने रजवाड़े मिटा दिए, प्रिवी पर्स भी बन्द हो गए पर हमारे नेताओं के रजवाड़े बनने लगे, फूलने लगे, फलने लगे, फलों से लदने लगे, लदकर झुकने लगे, जनता को झुलाने लगे। इनके पर्स का मुकाबला बेचारा ‘ प्रिवी ‘ भी क्या करता ? तब के कितने राजा उनके दरबार में मंत्री-संतरी हो गए हैं।

लालकिला का मैदान शक्ति का परिचायक है। इसने शाहजहां, औरंगजेब से लेकर नादिरशाह तक की शक्ति देखी है। आखिरी मुगल बादशाह जफर के वंशजों को इसी मैदान में तोप से उड़ाकर हमारे आका अंग्रेजों की शक्ति भी इसने देखी है। वतन के लिए मरते और वतन को चापलूसी से मारते देखा है इस मैदान ने।

यही है वह मैदान जहां से ले जाकर सुभाषचन्द्र बोस के साथियों को लालकिला में हो रहे अभियोगों में पेश किया गया। यही है वह मैदान जहां हर वर्ष जनवरी के अंतिम सप्ताह में होने वाले दूसरे बड़े राष्ट्रीय पर्व वाले दिन चौदह किलोमीटर दूर राजपथ से चली आती सेना के जवान परेड समाप्त होने पर जूते उतारकर छालों को दबाते देखे जाते हैं। मैदान साफ-साफ देखता है कि शाही आलम आज भी कायम है।

यह मैदान कभी पतंगबाजी और गिल्ली-डंडा के राष्ट्रिय टूर्नामेंटों के लिए विख्यात था। यहां सलूनों पर अभी भी मैच लड़ाए जाते हैं। आज भीरंग-बिरंगी पतंगें उड़ाई जाती हैं। क्या मजबूत सद्दी प्रयोग की जाती है, क्या तीखा सीसे से गुजारा गया मांजा इस्तेमल होता है। जिस दल ने पतंग बढ़ा ली वह विजेता, जिसकी कट गई वह परास्त। मांजे पर मांजा कैसे रगड़ा जाए कि डोर दूसरे की कटे, अपने की नहीं ‘- यही मैदान सिखाता है, तभी तो कुछ सोचकर ही नेताओं ने इस मैदान में वार्षिक त्सव मनाने की परम्परा रखी है।

गिल्ली-डंडा क्रीड़ा का वर्णन कवियों ने राम और कृष्ण के संदर्भ में भी किया है। इस मैदान ने इसे भी राष्ट्रीय खेल बनाया है-गुल्ली कैसे उड़े, गुच्ची कैसे पटे, डंडा कैसे चले, अन्नस पर कैसे पड़े –सब यहीं से सीखते हैं।

लालकिला मैदान में संध्या समय चम्पी होती है, चम्पी का भी राष्ट्रीय महत्व है। चम्पी करके दल बदल किया जाता है। सरकारें बदल जाती हैं या देर तक टिकी रहती हैं।   हे लालकिला मैदान! तुम ये सब खेल दिखाते रहो-सिखाते रहो, तुम्हारे शिष्य सीखते रहे, तुम कुछ नहीं मांगते, कुछ नहीं कहते हो, वे रहते हैं, तुम सहते हो, वे फलित होते हैं पद-दलित होते हो। वे अपनी कठोरता तुम्हे दे तुमसे आद्रता पाते हैं। वे खुश होते हैं, तुम खुश्क होते हो।

और हे भारत के दिल दिल्ली के वासियों! चलो-चलो, बढ़ते चलो। चलो-चलो, बढ़ते चलो, सजते चलो, लालकिला मैदान तुम्हे पुकारता है।

चलो आँधी या तूफान में लालकिला मैदान में, वही तुम्हारा भविष्य है। जय हिन्द। जय लालकिला। जय लालकिला मैदान।  

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                                                                                                                                                                               चौपाल


ऋतुओं की रानी कहाती वर्षा ऋतु का भारत में बड़ी बेसब्री से इन्तजार होता है विशेषकर भयंकर तपन और गर्मी के बाद पहली बारिश का। त्योहारों और हर्ष-उल्लास से भरी यह वो रंगारंग ऋतु है, जब बागों में ही नहीं मन में भी मयूर नाचने लगते हैं।


लेखनी के पाठकों के लिए प्रस्तुत है  मुंबई से भेजा श्री देवमणि पाण्डे जी का एक शब्दचित्र और देहली से भेजे श्री शमशेर अहमद खान के चंद छायाचित्र।

मुम्बई में मौसम की पहली बारिश हुई। रात में ही बारिश  की पाजेब से छम-छम की आवाज़ें आनी शुरु हो गईं थीं । सुबह देखा तो सड़क का धुला हुआ चेहरा बहुत सुंदर लग रहा था । मेरे पड़ोस के पेड़ों पर जमी हुई धूल और धुँए की परत साफ़ हो गई है । तन पर हरियाली की शाल ओढ़े हुए वे मस्ती में झूम रहे हैं । हवाओं को छूने के लिए मचल रहे हैं । सुबह घर से बाहर निकलकर देखा तो कुछ चौराहे दो-तीन फीट पानी में डूबे हुए मुस्करा रहे थे । पानी को चीरकर आगे बढ़ती हुईं गाड़ियाँ मन में उल्लास जगा रहीं हैं । अपना लिखा हुआ एक गीत याद आ रहा है । आइए मिलकर गुनगुनाएं- 

                                                     मौसम की पहली बारिश 



छ्म छम छम दहलीज़ पे आई मौसम की पहली बारिश                                                                                                 
गूंज उठी जैसे शहनाई मौसम की पहली बारिश

वर्षा का आंचल लहराया
सारी दुनिया चहक उठी

बूंदों ने की सरगोशी
तो सोंधी मिट्टी महक उठी

मस्ती बनकर दिल में छाई मौसम की पहली बारिश
रौनक़ तुझसे बाज़ारों में
चहल पहल है गलियों में
फूलों में मुस्कान है तुझसे
और तबस्सुम कलियों में

झूम रही तुझसे पुरवाई मौसम की पहली बारिश


पेड़-परिन्दें, सड़कें, राही
गर्मी से बेहाल थे कल

सबके ऊपर मेहरबान हैं
आज घटाएं और बादल 

राहत की बौछारें लाई मौसम की पहली बारिश

बारिश के पानी में मिलकर
बच्चे नाव चलाते हैं
छत से पानी टपक रहा है
फिर भी सब मुस्काते हैं

हरी भरी सौग़ातें लाई मौसम की पहली बारिश

सरक गया जब रात का घूंघट
चांद अचानक मुस्काया
उस पल हमदम तेरा चेहरा
याद बहुत हमको आया
कसक उठी बनकर तनहाई
मौसम की पहली बारिश



13 जुलाई को सावन माह का पहला सोमवार था । सावन में तीज का त्योहार मनाया जाता है । राजस्थान में इसे हरियाली तीज और उत्तर प्रदेश में कजरी तीज या माधुरी तीज कहा जाता है । हरापन समृद्धि का प्रतीक है । स्त्रियाँ हरे परिधान और हरी चूड़ियाँ पहनती हैं । हरे पत्तों और लताओं से झूलों को सजाया जाता है । झूले और कजरी के बिना सावन की कल्पना नहीं की जा सकती । हमारे यहाँ हर त्योहार के पीछे कोई न कोई सामाजिक या वैज्ञानिक कारण होता है । कुछ लोगों का कहना है कि बरसात में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है । झूला झूलने से हमें अधिक ऑक्सीजन मिलती है ।

 

कजरी में प्रेम के दोनों पक्ष यानी संयोग और वियोग दिखाई देते हैं । कभी-कभी इसके पीछे बड़ी मार्मिक दास्तान भी होती है । आज़ादी के आंदोलन का दौर था । शहर में कर्फ़्यू लगा हुआ था । एक नौजवान अपने प्रियतम से मिलने जा रहा था । एक अँग्रेज़ सिपाही ने गोली चला दी । मारा गया । मगर वह आज भी कजरी में ज़िंदा है - 'यहीं ठइयाँ मोतिया हेराय गइले रामा हो...।'

 

मॉरीशस और सूरीनाम से लेकर जावा-सुमात्रा तक जो लोग आज हिंदी का परचम लहरा रहे हैं, कभी उनके पूर्वज एग्रीमेंट पर यानी गिरमिटिया मज़दूर के रूप में वहाँ गए थे । इन लोगों को ले जाने के लिए मिर्ज़ापुर सेंटर बनाया गया था । वहाँ से हवाई जहाज़ के ज़रिए इन्हें रंगून पहुँचाया जाता था । जहाँ पानी के जहाज़ से ये विदेश भेज दिए जाते थे । बनारस की कचौड़ी गली में रहने वाली धनिया का पति जब इस अभियान पर रवाना हुआ तो कजरी बनी । उसकी व्यथा-कथा को सहेजने वाली कजरी आपने ज़रूर सुनी होगी-

 

मिर्ज़ापुर कइले गुलज़ार हो ...कचौड़ी गली सून कइले बलमू 

यही मिर्ज़ापुरवा से उड़ल जहजिया
पिया चलि गइले रंगून हो... कचौड़ी गली सून कइले बलमू 

 

इस कजरी को शास्त्रीय गायिका डॉ.सोमा घोष जब मुम्बई के एक कार्यक्रम में गा रही थीं तो उनके साथ संगत कर रहे थे भारतरत्न स्व.उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ । उन्होंने शहनाई पर ऐसा करुण सुर उभारा जैसे कलेजा चीरकर रख दिया हो । भाव भी कुछ वैसे ही कलेजा चाक कर देने वाले थे । प्रिय के वियोग में धनिया पेड़ की शाख़ से भी पतली हो गई है । शरीर ऐसे छीज रहा है जैसे कटोरी में रखी हुई नमक की डली गल जाती है - 

डरियो से पातर भइल तोर धनिया
तिरिया गलेल जैसे नोन हो... कचौड़ी गली सून कइले बलमू

 

डॉ.सोमा घोष को स्व.उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ अपनी पुत्री मानते थे । .सोमा जी हर साल उस्तादजी की याद में कार्यक्रम करती हैं । पिछले साल के कार्यक्रम में उन्होंने 'यादें' नामक सीडी रिलीज़ की । उसमें यह लाइव कजरी शामिल है ।

 

25 साल से मुंबई में हूँ । अपने गाँव में आख़िरी बार जो झूला देखा था उसकी स्मृतियाँ अभी भी ताज़ा हैं । आँख बंद करता हूँ तो झूले पर कजरी गाती हुई स्त्रियाँ दिखाईं पड़ती हैं - 'अब के सावन मां साँवरिया तोहे नइहरे बोलइब ना ।'   

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                                                                                                                                                     चांद परियाँ और तितली


प्रेरक प्रसंगः ऊँच-नीच

एक बार कहीं जाने के लिए स्वामी विवेकानन्द राजस्थान के एक स्टेशन पर पहुंचे। रेलवे लाइनों में गड़बड़ी के कारण उन्हें तीन दिनों तक वहीं ठहरना पड़ा। लोग आते रहे और उनसे धर्मचर्चा चलती रही। किसी ने स्वामी जी से खाने-पीने के लिए नहीं कहा, न उन्होंने किसी से कुछ मांगा। तीसरी रात को सबके चले जाने के बाद एक दीन-हीन व्यक्ति ने उनसे निवेदन किया, “ महाराजजी! आपने तीन दिनों से नाश्ता तक नहीं किया है। इससे मेरे प्राणों को बड़ी पीड़ा हो रही है। “

स्वामीजी ने उससे पूछा,  “ क्या तुम मुझे कुछ खाने को दोगे ? “

उसने कहा “ मेरा मन तो चाहता है किंतु मैं चमार हूँ। साथ ही मैं खेतड़ी के राजा की प्रजा हूं। यदि उन्हें पता चल गया कि मैने एक सन्यासी को अपने घर का खाना खिलाया है तो मेरे प्राणों पर बन आएगी। मैं आटा-दाल लाकर आपको दे सकता हूँ। आप स्वयं बनाकर खा लें। “

उन्होंने उससे कहा, “ मैं तुम्हारा बनाया भोजन ही करूंगा। तुम्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। “

वह रोटियां बनाकर ले आया और स्वामीजी ने खाना खाकर उससे कहा, “ इस समय यदि देवताओं के राजा इंद्र भी स्वर्णपात्र में अमृत लाकर देते तो तुम्हारे द्वारा दिए गए भोजन के आगे उसका स्वाद भी फीका होता। “ कहते-कहते स्वामीजी की आँखें भर आईं।

स्वामीजी से उच्च जाति के कुछ लोगों ने कहा, “आपने इसके द्वारा बनाये गये भोजन को खाकर अच्छा नहीं किया।“

स्वामीजी ने कहा, “ तीन दिनों तक लगातार आप लोगों ने मुझे बोलने पर मजबूर किया किंतु किसी ने मेरे भोजन की सुध नहीं ली। जिसने मुझे भोजन कराया उसे आप नीच कहते हैं और स्वयं को ऊंच ? उसने जो मनुष्यता दिखलाई उससे वह नीच कैसे हो गया ? “

खेतड़ी के राजा को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने उस व्यक्ति का सम्मान किया और इतना दिया कि उसकी गरीबी समाप्त हो गई।


                                                                                                                                       प्रस्तुतिः दामोदर सिंह





दो बाल गीत


1.









अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
हाट से लौटे,
ठाट से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे .

बात बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं.
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची.
अब वह जीता,अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे -
सबके खिले हुए थे चेहरे !

मगर एक कोई था फक्कड,
मन का राजा कर्रा - कक्कड;
बढा भीड को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड कर.

अक्कड मक्कड ,
धूल में धक्कड,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड,
गर्जन गूंजी,रुकना पडा,
सही बात पर झुकना पडा !

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लडने में मत खोऒ
चलो भाई चारे को बोऒ!

खाली सब मैदान पडा है,
आफ़त का शैतान खडा है,
ताकत ऐसे ही मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ।



 

2.








कठपुतली
गुस्से से उबली
बोली - ये धागे
क्यों हैं मेरे पीछे आगे ?

तब तक दूसरी कठपुतलियां
बोलीं कि हां हां हां
क्यों हैं ये धागे
हमारे पीछे-आगे ?
हमें अपने पांवों पर छोड दो,
इन सारे धागों को तोड दो !

बेचारा बाज़ीगर
हक्का-बक्का रह गया सुन कर
फिर सोचा अगर डर गया
तो ये भी मर गयीं मैं भी मर गया
और उसने बिना कुछ परवाह किए
जोर जोर धागे खींचे
उन्हें नचाया !

कठपुतलियों की भी समझ में आया
कि हम तो कोरे काठ की हैं
जब तक धागे हैं,बाजीगर है
तब तक ठाट की हैं
और हमें ठाट में रहना है
याने कोरे काठ की रहना है 


                            

-भवानी प्रसाद मिश्र