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                                                                                                                                                                लघुकथा


                                                                                                                                                   डॉ. श्याम सखा श्याम

चुनाव और चम्पा

इधर कुछ दिनों से उसके पति पर चुनाव का भूत सवार था, उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते, नहाते-धोते, बस चुनाव।

चुनाव भी क्या, झाड़ू पार्टी का भूत सवार था। झाड़ू पार्टी का बहुमत आएगा, झाड़ू पार्टी की सरकार बनेगी, क्योंकि झाड़ू पार्टी के प्रधान उनकी जाति के थे।

चिड़िया पार्टी तो गई समझो, वह अक्सर गुनगुनाता फिरता था।

काना बाती कुर्र

चिड़िया उड़ गई फुर्र

उसे चिड़िया पार्टी पर काफी गुस्सा था। उनके हल्के के विधायक चिड़िया पार्टी के थे और उन्ही की शिकायत पर उसका ताबादला यहां हुआ था।

पति उसे पिछले तीन दिन से एक डम्मी मतपत्र दिखलाकर बारबार समझा रहे थे कि झाड़ू पर मोहर कैसे लगानी है! कागज कैसे मोड़ना है ! उसने तो जूते के खाली डिब्बे की मतपेटी बनाकर उसे दिखलाया था कि वोट कैसे डालनी है !

आज वे मतदान केन्द्र पर सबसे पहले पहुंच गए थे। फिर भी आधे घंटे बाद ही उन्हें अंदर बुलाया गया। चुनाव कर्मचारी उनकी उतावली पर हंस रहे थे।

फिर उसका अंगूठा लगवाकर उसकी अँगुली पर निशान लगाया गया, उसका दिल कर रहा था कि अपनी ठुड्डी पर एक तिल बनवा ले, निशान लगाने वाले से।

पिछले चुनाव में उसकी भाभी ने अपने ऊपरी होठ पर एक तिल बनवाया था। हालाँकि उसका भाई बहुत गुस्साया था, इस बात पर। जब उसकी भाभी हँसती थीं तो तिल मुलक-मुलक जाता था। उसकी भाभी तो मुँह भी कम धोती थीं उन दिनों, तिल मिट जाने के डर से। पर वह लाज के मारे तिल न बनवा पाई। मर्द जाति का क्या भरोसा, क्या मान जाए क्या सोच ले!

उसका पति वन विभाग में कुछ था। क्या था? पता नहीं। कौन सर खपाई करे! वह वन विभाग में था, इसकी जानकारी भी उसे यहीं आकर हुई जब वे फारेस्ट कॉलोनी के एक कमरे के क्वार्टर में रहने लगे।

यहाँ आकर चम्पा, हाँ यही उसका नाम था न, बहुत खुश थी। यहीं उसे पता लगा कि चम्पा का फूल भी होता है। और वो इतना सुंदर खुशबू वाला होता है और तो और उसकी माँ, चमेली के नाम का फूल भी था, यहाँ। इतनी हरियाली, इतनी साफ-सुथरी आबो-हवा, इतना अच्छा मौसम, जिंदगी में पहली बार मिला था उसे। फिर सर्दियों में उसका पति उसे शिमला ले गया था। कितनी नरम-नरम रूई के फाहों जैसी बर्फ थी देखकर पहले तो वह भौंचक्की रह गई और फिर बहुत मजे ले लेकर बर्फ में खेलती रही। इतना खेली थी कि उसे निमोनिया हो गया था।

यहाँ कोई काम-धाम भी तो नहीं था उसे। चौका-बर्तन और क्वार्टर के सामने को फुलवाड़ी में सारा दिन बीत जाता था। वहाँ सारा दिन ढोर-डंगर का काम, खेत-खलिहान का काम और ऊपर से सास के न खत्म होने वाले ताने। फिर ढेर सारे ननद देवरों की भीड़ में, कभी पति से मुँह भरकर बात भी नहीं हो पाई थी उसकी।

उसने मतपत्र मेज पर फैला दिया। हाय! री दैया ! मरी झाड़ू तो सबसे ऊपर ही थी। उसने और निशान देखने शुरू किए। कश्ती, तीर कमान। तीर कमान देखकर उसे रामलीला याद आई। उसे लगा चिड़िया उदास है, पतंग हाँ पतंग उसे हँसती नजर आई। साईकल, हवाई जहाज, हाथी सभी कितने अच्छे निशान थे और झाड़ू से तो सभी अच्छे थे। अभी वह सोच भर रही थी कि निशान कहाँ लगाए? तभी वह बाबू जिसने उसे मत पत्र दिया था बोला- “ बीबी जल्दी करो और लोगों को भी बोट डालने हैं। “

उसने मोहर उठाई और मेज पर फैले मतपत्र पर झाड़ू को छोड़कर सब निशानों पर लगा दी और मोहर लगाते हुए वह कह रही थी कि चिड़िया जीते, साईकल जीते, कश्ती जीते पर झाड़ू न जीते।

झाड़ू को जितवाकर वह अपना संसार कैसे उजाड़ ले? हालांकि वह मन ही मन डर रही थी कि कहीं पति को पता न लग जाए।